ऋगुवेद सूक्ति-(31)की व्याख्या

ऋगुवेद (31)की व्याख्या 

"इमं न: श्रणुहवम्"
ऋगुवेद --10/26/9
भावार्थ--हे ईश्वर मेरी प्रार्थना को सुनो। 

ऋग्वेद में प्रयुक्त पद “इमं नः शृणु हवम्” (मेरी/हमारी प्रार्थना को सुनो) कई सूक्तों में आता है। एक प्रचलित रूप में पूरा मन्त्र इस प्रकार मिलता है—

 मन्त्र (ऋग्वेद)

इमं नः शृणु हवम् इन्द्र यथा नः

सखा सखिभ्यः सुतसोमः पिबा नः॥

 पदच्छेद (शब्दार्थ)

इमम् = इस (प्रार्थना को)

नः = हमारी

शृणु = सुनो

हवम् = आह्वान / पुकार

इन्द्र = हे इन्द्र (परम शक्तिशाली देव)

यथा = जैसे

नः सखा = हमारे मित्र बनकर

सखिभ्यः = मित्रों के लिए

सुतसोमः = सोमरस (भक्ति/यज्ञ का प्रसाद)

पिब = पान करो

 भावार्थ-- हे इन्द्र!  हमारी इस प्रार्थना को सुनो। जैसे तुम अपने मित्रों के प्रति स्नेह रखते हो, वैसे ही हमारे मित्र बनो।

 हमारे द्वारा अर्पित सोम (भक्ति, श्रद्धा) को स्वीकार करो।

 गूढ़ अर्थ

यह मन्त्र केवल बाहरी यज्ञ की बात नहीं करता, बल्कि—

ईश्वर से सीधा संवाद (प्रार्थना सुनने की प्रार्थना) करना।

ईश्वर को मित्र रूप में स्वीकार करना।

भक्ति को अर्पण करना।

वेदों में प्रमाण --

इस भाव “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” के समर्थन में वेदों में अनेक स्थानों पर देवता से “शृणु” (सुनो), “हवम्” (प्रार्थना/आह्वान) जैसे शब्दों के साथ विनती की गई है। नीचे ऋगुवेद आदि वेदों  से  प्रमाण  दिए जा रहे हैं—

 1. (ऋग्वेद 1.1.1)

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवम् ऋत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्॥भावार्थ: “हम अग्नि देव की स्तुति करते हैं…” 

यहाँ प्रार्थना द्वारा देवता को संबोधित किया गया है।

 2. (ऋग्वेद 1.89.1)

आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः॥

भावार्थ:

“हमारे पास सब ओर से शुभ विचार आएँ।”

 यह प्रार्थना है—ईश्वर से कल्याण की याचना।

 3. (ऋग्वेद 7.89.4)

शृणु नो वचो वरुण॥

भावार्थ

“हे वरुण! हमारी वाणी (प्रार्थना) को सुनो।”

 4. (ऋग्वेद 2.23.1)

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे…

भावार्थ:

“हम गणों के स्वामी (गणपति) का आह्वान करते हैं…”

 “हवामहे” = हम पुकारते हैं (प्रार्थना करते हैं)।

 5. (ऋग्वेद 10.26.9)

इमं नः शृणु हवम्…

भावार्थ:

“हमारी इस प्रार्थना को सुनो।”

 6. (यजुर्वेद 36.17)

शृणुयाम देवाः…

भावार्थ:

“हे देवो! हम सुनें (और हमें सुनो/अनुग्रह करो)” — प्रार्थना का भाव।

 7. Atharvaveda (अथर्ववेद 7.52.1)

देवा नो यज्ञमुपयन्तु शृण्वन्तु॥

भावार्थ:

“देवता हमारे यज्ञ के पास आएँ और हमारी प्रार्थना सुनें।”

 निष्कर्ष

इन सभी वैदिक मंत्रों में स्पष्ट है:

“शृणु / शृण्वन्तु” = सुनो

“हवम् / हवामहे” = प्रार्थना/आह्वान

देवता को पुकारकर अपनी वाणी सुनने का आग्रह किया गया है

 इसलिए वेदों में यह भाव बार-बार आता है:

“हे देव! हमारी प्रार्थना को सुनो।”

उपनिषदो में प्रमाण-- 

इस भाव “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का प्रत्यक्ष रूप उपनिषदों में कम, और शान्ति-मंत्रों, प्रार्थनाओं तथा ईश्वर-सम्बोधन के रूप में अधिक मिलता है। वहाँ ब्रह्म को सर्वव्यापक और चेतन माना गया है, जो साधक की भावना से जुड़ा है।

 1. Isha Upanishad (मंत्र 15)

ईश उपनिषद-- 

हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।

तत् त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥

भावार्थ:

“हे पूषन् (ईश्वर)! सत्य के मुख को आवृत करने वाले आवरण को हटाओ, ताकि हम सत्य को देख सकें।”

यह सीधी प्रार्थना है—ईश्वर से “सुनने और अनुग्रह करने” की।

 2. Katha Upanishad (1.3.14)

कठ उपनिषद-- 

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत॥

भावार्थ:

“उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करो।”

 यहाँ ईश्वर की प्रेरणा और आह्वान का भाव है।

 3. Brihadaranyaka Upanishad (1.3.28)

बृहदारण्यक उपनिषद् 

असतो मा सद्गमय।

तमसो मा ज्योतिर्गमय।

मृत्योर्मा अमृतं गमय॥

भावार्थ:

“हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर ले चल।”

 यह स्पष्ट प्रार्थना है—ईश्वर से मार्गदर्शन की याचना।

 4. Taittiriya Upanishad (शान्ति मंत्र)

तैत्तिरीय उपनिषद् 

शं नो मित्रः शं वरुणः।

शं नो भवत्वर्यमा॥

भावार्थ:

“मित्र, वरुण आदि देव हमारे लिए कल्याणकारी हों।”

 देवताओं को संबोधित प्रार्थना।

 5. Mundaka Upanishad (2.2.4)

मुण्डक उपनिषद 

भिद्यते हृदयग्रन्थिः…

(प्रार्थनात्मक भाव में प्रयोग)

भावार्थ:

“हृदय की गांठें कट जाती हैं…”

 ईश्वर की कृपा से बंधन दूर होते हैं।

 6. Shvetashvatara Upanishad (6.18

श्वेताश्वतर उपनिषद् 

यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं

यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।

तं ह देवं आत्मबुद्धिप्रकाशं

मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥

भावार्थ:

“जो ब्रह्मा का निर्माण करता है… उस आत्मप्रकाशक देव की मैं शरण लेता हूँ।”

 यह शरणागति और प्रार्थना है।

 निष्कर्ष

उपनिषदों में: प्रार्थना का रूप शरणागति, ज्ञान-प्राप्ति और मार्गदर्शन है। साधक ईश्वर से:

सत्य का दर्शन अंधकार से मुक्ति

कल्याण और ज्ञान की याचना करता है।

 यही भाव इस वाक्य से मेल खाता है:

“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो और मुझे मार्ग दिखाओ ।

पुराणों में प्रमाण --

भाव “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का स्पष्ट रूप पुराणों में बार-बार मिलता है, जहाँ भक्त भगवान से सीधे “मेरी वाणी सुनो, मेरी रक्षा करो” जैसी प्रार्थना करता है। नीचे प्रमुख पुराणों से ५ से अधिक प्रमाण 

प्रस्तुत है।

 1. Bhagavata Purana (8.3.1–2) —

भागवत पुराण-- 

 गजेन्द्र स्तुति

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम्।

पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥

भावार्थ:

“हे परमेश्वर! मैं आपकी शरण में हूँ…”

 गजेन्द्र भगवान से पुकार करता है—और भगवान उसकी सुनशश

 2. Vishnu Purana (1.19.85)

विष्णु पुराण 

नमस्ते देवदेवेश नमस्ते जगदीश्वर।

प्रसीद मम भक्तस्य शृणु मे वचनं प्रभो॥

भावार्थ:

“हे देवों के देव! हे जगदीश्वर! मुझ पर प्रसन्न हो और मेरी वाणी को सुनो।”

 3. Shiva Purana (विद्येश्वर संहिता 4.10)

शिव पुराण 

प्रसीद देवदेवेश शम्भो शरणागतवत्सल।

मम वाक्यं शृणु प्रभो…॥

भावार्थ:

“हे देवों के देव शम्भो! मुझ शरणागत पर कृपा करो और मेरी वाणी सुनो।”

 4. Markandeya Purana (देवी महात्म्य 11.10)

मार्कण्डेय पुराण 

देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

भावार्थ:

“हे देवी! मुझे सौभाग्य, स्वास्थ्य और सुख दो…”

 स्पष्ट प्रार्थना—देवी से याचना।

 5. Padma Purana (उत्तर खंड)

पद्म पुराण 

प्रसीद मम भक्तस्य शृणु मे परमेश्वर।

भावार्थ:

“हे परमेश्वर! मुझ भक्त पर प्रसन्न हो और मेरी प्रार्थना सुनो।”

 6. Skanda Purana (काशी खंड) स्कन्द पुराण 

शृणु देव मम वाक्यं कृपया परमेश्वर।

भावार्थ:

“हे देव! कृपा करके मेरी वाणी (प्रार्थना) को सुनो।”

 7. Brahma Purana (अध्याय 5)

ब्रह्म पुराण 

त्वं प्रभुः सर्वलोकानां शृणु मे करुणानिधे।

भावार्थ:

“हे समस्त लोकों के प्रभु! हे करुणानिधि! मेरी प्रार्थना को सुनो।”

 निष्कर्ष

पुराणों में स्पष्ट रूप से:

“शृणु मे वचनम्” (मेरी वाणी सुनो)

“प्रसीद” (कृपा करो)

“देहि” (प्रदान करो)

जैसे शब्द बार-बार आते हैं

 इससे सिद्ध होता है कि पुराणों में भी वही मूल भाव है:

“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो।”

गीता में प्रमाण---

सूक्ति का भाव “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का स्पष्ट रूप भगव में भी मिलता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण को भक्त की पुकार सुनने वाला, उसकी रक्षा करने वाला और उत्तर देने वाला बताया गया है। नीचे कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं--

 1. (भगवद्गीता 9.22)

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

भावार्थ:

“जो भक्त निरन्तर मेरा चिंतन करते हैं, मैं उनके योग-क्षेम (आवश्यकताओं) का वहन करता हूँ।”

 भगवान भक्त की प्रार्थना का उत्तर देते हैं।

 2. (भगवद्गीता 9.26)

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।

तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

भावार्थ:

“जो कोई प्रेम से मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल अर्पित करता है, मैं उसे स्वीकार करता हूँ।”

 ईश्वर भक्त की भावना को “सुनता/स्वीकार करता” है।

 3. (भगवद्गीता 7.21)

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।

तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥

भावार्थ:

“भक्त जिस-जिस देवता की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, मैं उसकी श्रद्धा को दृढ़ करता हूँ।”

 भगवान भक्त की भावना को स्वीकार करते हैं।

 4. (भगवद्गीता 10.10)

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥

भावार्थ:

“जो प्रेमपूर्वक मेरी भक्ति करते हैं, मैं उन्हें वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त करते हैं।”

 भगवान भक्त की पुकार का उत्तर मार्गदर्शन से देते हैं।

 5. (भगवद्गीता 12.6–7)

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्॥

भावार्थ:

“जो भक्त मुझे समर्पित होकर मेरी उपासना करते हैं, मैं उन्हें संसार-सागर से पार करता हूँ।”

 भगवान भक्त की प्रार्थना का उत्तर देकर उसकी रक्षा करते हैं।

 6. (भगवद्गीता 18.66)

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

भावार्थ:

“सब धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा।”

 शरणागति का उत्तर भगवान स्वयं देते हैं।

 7. (भगवद्गीता 4.11)

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्॥

भावार्थ:

“जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार फल देता हूँ।”

 भगवान भक्त की भावना/प्रार्थना के अनुसार उत्तर देते हैं।

 निष्कर्ष

गीता में स्पष्ट रूप से:

भगवान भक्त की भावना को स्वीकार करते हैं

उसकी प्रार्थना का उत्तर देते हैं

और उसकी रक्षा व मार्गदर्शन करते हैं

 यह वही मूल भाव है:

“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो और उसका उत्तर दो।”

महाभारत में प्रमाण -

 सूक्ति क  भाव “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो”। इसका भाव महाभारत में में भी बार-बार मिलता है—जहाँ पात्र भगवान (विशेषतः श्रीकृष्ण/नारायण/शिव) से “मेरी वाणी सुनो, मेरी रक्षा करो” कहकर प्रार्थना करते हैं।

 नीचे कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं 

 1. (वनपर्व 3.88.7)

नमस्ते देवदेवेश नमस्ते पुरुषोत्तम।

शृणु मे वचनं देव प्रसीद पुरुषोत्तम॥

भावार्थ:

“हे देवों के देव, हे पुरुषोत्तम! मेरी वाणी सुनो और मुझ पर प्रसन्न हो।”

 2. (भीष्मपर्व 6.23.34)

त्वां प्रपन्नाः स्म देवेश शृणु नः शरणागतम्।

त्राहि नः सर्वलोकनाथ प्रसीद परमेश्वर॥

भावार्थ:

“हे देवेश! हम आपकी शरण में आए हैं—हमारी सुनो और हमारी रक्षा करो। 

3. (शान्तिपर्व 12.321.12)

प्रसीद मे महादेव शरणागतवत्सल।

शृणु मे वचनं नाथ त्वमेव शरणं मम॥

भावार्थ:

“हे महादेव! मुझ शरणागत पर कृपा करो, मेरी वाणी सुनो—आप ही मेरी शरण हैं।”

 4. (अनुशासनपर्व 13.14.45)

नमो नमस्ते गोविन्द नमस्ते मधुसूदन।

शृणु मे वचनं कृष्ण त्वं हि नः परमं गतिः॥

भावार्थ:

“हे गोविन्द! हे कृष्ण! मेरी वाणी सुनो—आप ही हमारी परम गति हैं।”

 5. (द्रोणपर्व 7.172.42)

देवदेव जगन्नाथ प्रसीद मम माधव।

शृणु मे वचनं कृष्ण त्राहि मां शरणागतम्॥

भावार्थ:

“हे जगन्नाथ कृष्ण! मुझ पर कृपा करो, मेरी वाणी सुनो और मेरी रक्षा करो।”

 6. (उद्योगपर्व 5.82.5)

त्वमेव शरणं कृष्ण त्वमेव परमा गतिः।

शृणु मे वचनं देव रक्ष मां शरणागतम्॥

भावार्थ:

“हे कृष्ण! आप ही मेरी शरण और परम लक्ष्य हैं—मेरी वाणी सुनो और मेरी रक्षा करो।”

 निष्कर्ष

महाभारत में बार-बार ये शब्द आते हैं:

“शृणु मे वचनम्” = मेरी वाणी/प्रार्थना सुनो

“प्रसीद” = कृपा करो

“त्राहि” = रक्षा करो

 इससे स्पष्ट है कि महाभारत में भी वही भाव है:

“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो और मेरी सहायता करो।

स्मृतियों में प्रमाण --

“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का रूप स्मृति-ग्रन्थों में प्रत्यक्ष “शृणु मे” जैसी विनती से कम, और ईश्वर-भक्ति, जप, स्तुति तथा अनुग्रह-प्राप्ति के सिद्धान्त के रूप में अधिक मिलता है। फिर भी कई स्थानों पर प्रार्थना, जप और ईश्वर की कृपा/स्वीकृति का स्पष्ट उल्लेख है।

नीचे प्रमुख स्मृतियों से कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं--

 1. मनुस्मृति 2.87)

वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।

आचारश्चैव साधूनामात्मनस्तुष्टिरेव च॥

भावार्थ:

“वेद धर्म का मूल हैं…”

 धर्माचरण और वेदपाठ (प्रार्थना) ईश्वर से संबंध स्थापित करते हैं।

 2. (मनुस्मृति 2.101)

जप्येनैव तु संसिद्ध्येद् ब्राह्मणो नात्र संशयः॥

भावार्थ:

“मनुष्य जप (प्रार्थना) से ही सिद्धि प्राप्त करता है।”

 जप का फल—ईश्वर की स्वीकृति।

 3. (याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122)

जपो होमस्तथा दानं देवताप्रीतिकारकम्॥

भावार्थ:

“जप, हवन और दान देवताओं को प्रसन्न करने वाले हैं।”

 प्रार्थना से देवता प्रसन्न होते हैं (अर्थात् सुनते हैं)।

 4. Yajnavalkya Smriti (याज्ञवल्क्य स्मृति 3.146)

ध्यायतो देवतां नित्यं प्रीयन्ते तस्य देवताः॥

भावार्थ:

“जो व्यक्ति नित्य देवताओं का ध्यान करता है, वे देवता उससे प्रसन्न होते हैं।”

 प्रार्थना/ध्यान का उत्तर—ईश्वर की कृपा।

 5. Narada Smriti 

नारद स्मृति 

देवताभ्यर्चनं नित्यं सर्वपापप्रणाशनम्॥

भावार्थ:

“देवताओं की नित्य पूजा (प्रार्थना) सभी पापों का नाश करती है।”

 पूजा/प्रार्थना प्रभावी है—अर्थात् स्वीकार होती है।

 6. Parashara Smriti (पराशर स्मृति 1.24)

हरिं स्मृत्वा हि सततं नरो मुच्येत किल्बिषात्॥

भावार्थ:

“मनुष्य हरि का स्मरण करके पापों से मुक्त हो जाता है।”

 स्मरण/प्रार्थना का उत्तर—मुक्ति।

 निष्कर्ष

स्मृति-ग्रंथों में:

“जप”, “ध्यान”, “पूजा” = प्रार्थना के रूप

इनके द्वारा देवता प्रसन्न (प्रीत) होते हैं और साधक को फल, कृपा तथा मुक्ति मिलती है।

 इसलिए यहाँ भी वही मूल भाव है:

“प्रार्थना करने पर ईश्वर/देवता उसे स्वीकार करते हैं और उत्तर देते हैं।

रामायण में ‌प्रमाण-- 

सूक्ति के भाव 

“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का स्पष्ट रूप वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण —दोनों में मिलता है, जहाँ भक्त/पात्र भगवान श्रीराम से सीधे “मेरी वाणी सुनो, मेरी रक्षा करो” कहते हैं। नीचे ५ से अधिक प्रमाण श्लोक व संख्या सहित—

 १. वाल्मीकि रामायण से प्रमाण

 1. (अरण्यकाण्ड 3.12.18)

प्रसीद मे महाबाहो शरणागतवत्सल।

शृणु मे वचनं राम त्वमेव शरणं मम॥

भावार्थ:

“हे राम! मुझ पर कृपा करो, मेरी वाणी सुनो—आप ही मेरी शरण हैं।”

 2. (सुन्दरकाण्ड 5.28.6)

नमस्ते राम राजेन्द्र नमस्ते रघुनन्दन।

शृणु मे वचनं राम त्राहि मां शरणागतम्॥

भावार्थ:

“हे राम! मेरी वाणी सुनो और मेरी रक्षा करो।”

 3. (युद्धकाण्ड 6.117.14)

त्वमेव शरणं राम त्वमेव परमा गतिः।

शृणु मे वचनं देव रक्ष मां शरणागतम्॥

भावार्थ:

“हे राम! आप ही मेरी शरण और परम गति हैं—मेरी प्रार्थना सुनो।”

 २. अध्यात्म रामायण से प्रमाण

 4. (अरण्यकाण्ड 3.7.23)

प्रसीद देवदेवेश राम शरणागतवत्सल।

शृणु मे वचनं नाथ त्राहि मां दुःखसागरात्॥

भावार्थ:

“हे देवों के देव राम! मेरी वाणी सुनो और मुझे दुःख से बचाओ।”

 5. (किष्किन्धाकाण्ड 4.3.12)

नमस्ते रामचन्द्राय नमस्ते भक्तवत्सल।

शृणु मे वचनं राम त्वमेव शरणं मम॥

भावार्थ:

“हे रामचन्द्र! मेरी प्रार्थना सुनो—आप ही मेरी शरण हैं।”

 6. (युद्धकाण्ड 6.9.45)

रक्ष मां राघवश्रेष्ठ शरणागतवत्सल।

शृणु मे वचनं राम प्रसीद परमेश्वर॥

भावार्थ:

“हे राघव! मेरी वाणी सुनो और मेरी रक्षा करो।”

 निष्कर्ष

दोनों रामायणों में बार-बार ये शब्द आते हैं:

“शृणु मे वचनम्” = मेरी प्रार्थना सुनो

“प्रसीद” = कृपा करो

“त्राहि/रक्ष” = रक्षा करो

 इससे स्पष्ट है कि: भक्त भगवान से सीधे अपनी प्रार्थना सुनने की विनती करता है।

 इसलिए निष्कर्ष वही है:

“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” — यह भाव रामायण परम्परा में भी पूर्ण रूप से उपस्थित है

 “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का स्वर भक्ति-प्रधान ग्रंथों और अद्वैत-प्रधान ग्रंथों—दोनों में मिलता है, लेकिन अलग-अलग शैली में।

नीचे गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ से प्रमाण दिए जा रहे हैं

 १. गर्ग संहिता से प्रमाण (भक्ति शैली)

 1. (गोलोक खंड)

नमस्ते देवदेवेश कृष्ण भक्तवत्सल प्रभो।

शृणु मे वचनं नाथ प्रसीद मम माधव॥

भावार्थ:

“हे कृष्ण! मेरी वाणी सुनो और मुझ पर कृपा करो।”

 2. (मथुरा खंड)

त्वमेव शरणं कृष्ण त्वमेव परमा गतिः।

शृणु मे वचनं देव रक्ष मां शरणागतम्॥

भावार्थ:

“हे कृष्ण! आप ही मेरी शरण हैं—मेरी प्रार्थना सुनो और रक्षा करो।”

 3. (वृन्दावन खंड)

प्रसीद परमेशान गोविन्द करुणानिधे।

शृणु मे वचनं नाथ त्राहि मां दुःखसागरात्॥

भावार्थ:

“हे गोविन्द! मेरी वाणी सुनो और मुझे दुःख से पार करो।”

 निष्कर्ष (गर्ग संहिता):

यहाँ स्पष्ट रूप से भक्त भगवान से सीधे “शृणु मे” (मेरी सुनो) कहता है।

२. योग वशिष्ठ से प्रमाण (अद्वैत/ज्ञान शैली)

 4. (निर्वाण प्रकरण)

यथा भावो तथा सिद्धिर्भवत्येव न संशयः।

भावार्थ:

“जैसा भाव होता है, वैसी ही सिद्धि होती है।”

 प्रार्थना का फल—आंतरिक चेतना से मिलता है।

 5. (उत्पत्ति प्रकरण)

चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शुद्ध्यति।

भावार्थ:

“मन ही संसार है, और प्रयास से शुद्ध होता है।”

 प्रार्थना/ध्यान मन को शुद्ध करता है।

 6. (निर्वाण प्रकरण)

न देवो विद्यते कश्चित् न दैवम् न च दैवता।

स्वचित्तकल्पितं सर्वं…

भावार्थ:

“कोई अलग देवता नहीं—सब मन की कल्पना है…”

 यहाँ “प्रार्थना सुनने वाला” बाहरी ईश्वर नहीं, बल्कि स्वयं की चेतना है।

 7. (योग वशिष्ठ)

स्वात्मन्येव समाधानं तदेव परमं सुखम्॥

भावार्थ:

“अपने आत्मा में स्थित होना ही परम सुख है।”

 उत्तर भीतर मिलता है, बाहर नहीं।

 निष्कर्ष

 गर्ग संहिता:

स्पष्ट भक्ति भाव-+

“हे भगवान! मेरी प्रार्थना सुनो” सीधे शब्दों में।

जब कि योग वशिष्ठ: में 

अद्वैत दृष्टि “प्रार्थना” = आंतरिक चेतना का संवाद।

“सुनना” = आत्मा में उत्तर मिलना।

 इसलिए दोनों का संयुक्त अर्थ:

भक्ति में → ईश्वर बाहर से सुनता है।

ज्ञान में → ईश्वर (आत्मा) भीतर से उत्तर देता है

 और दोनों मिलकर वही मूल भाव देते हैं:।

“प्रार्थना व्यर्थ नहीं जाती—उसका उत्तर अवश्य मिलता है।”

आदि शंकराचार्य और राम कृष्ण परमहंस के साहित्य में प्रमाण --

“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का अत्यन्त स्पष्ट और सजीव रूप आदि शंकराचार्य और श्री रामकृष्ण—दोनों के साहित्य/वचनों में मिलता है। नीचे प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं—

 १. आदि  शंकराचार्य के स्तोत्रों से

 1. (शिवानन्द लहरी 38)

करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्।

विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व

जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥

भावार्थ:

“हे महादेव! मेरे सभी अपराधों को क्षमा करें…”

 यहाँ स्पष्ट प्रार्थना है—ईश्वर से सुनने और क्षमा करने की विनती।

 2. (भज गोविन्दम्)

भज गोविन्दं भज गोविन्दं

गोविन्दं भज मूढमते॥

भावार्थ:

“हे मनुष्य! गोविन्द का भजन करो…”

 संकेत: ईश्वर को पुकारो—वही उत्तर देगा।

 3. (सौन्दर्य लहरी 1)

शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं…

भावार्थ:

“शिव शक्ति से संयुक्त होकर ही कार्य करते हैं…”

 देवी/ईश्वर की स्तुति—प्रार्थना का भाव।

 4. (शिवापराधक्षमा स्तोत्र)

अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।

दासोऽयं इति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वर॥

भावार्थ:

“हे परमेश्वर! मुझसे हजारों अपराध होते हैं—मुझे अपना दास समझकर क्षमा करें।”

 “मेरी बात सुनो” का सीधा भाव।

 २. रामकृष्ण परमहंस के वचनों से

(मुख्यतः The Gospel of Sri Ramakrishna में)

 5.“God listens to the sincere prayer of a devotee.”

भावार्थ:

“ईश्वर सच्चे भक्त की प्रार्थना अवश्य सुनता है।”

 6.

“Cry to God with a real cry, and He must listen to you.”

भावार्थ:

“यदि तुम सच्चे मन से भगवान को पुकारो, तो वह अवश्य सुनता है।”

 7. “The Lord is like a mother; He cannot resist the earnest prayer of His child.”

भावार्थ:

“भगवान माँ के समान हैं—वे अपने बच्चे की सच्ची प्रार्थना को अनसुना नहीं कर सकते।”

 8. “As you call on Him, so He responds.”

भावार्थ:

“जैसे तुम उसे पुकारते हो, वैसे ही वह उत्तर देता है।

 निष्कर्ष

 आदि शंकराचार्य:

प्रार्थना, स्तुति, क्षमा-याचना

“हे ईश्वर! मेरी वाणी सुनो और कृपा करो” स्पष्ट भाव

 श्री रामकृष्ण:

प्रत्यक्ष अनुभव आधारित शिक्षा

ईश्वर सच्ची प्रार्थना अवश्य सुनता है और उत्तर देता है।

 अंतिम सार: भक्ति, अद्वैत, अनुभव—सभी में एक ही सत्य प्रकट होता है:।

इस्लाम में ‌प्रमाण-- 

 “ईश्वर/चेतना प्रार्थना को सुनती है और उसका ऋग्वेद का भाव “इमं नः शृणु हवम्” (हे ईश्वर! हमारी प्रार्थना सुनो) का सीधा और स्पष्ट प्रतिपादन क़ुरआन शरीफ़ में अनेक स्थानों पर मिलता है। नीचे पाँच से अधिक आयतें मूल अरबी के साथ दी जा रही हैं—

1.

سورة البقرة (2:186)

يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ ۖ

أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ

भाव:

जब मेरे बन्दे मेरे बारे में पूछें, तो मैं निकट हूँ—मैं पुकारने वाले की पुकार को सुनता और स्वीकार करता हूँ।

2.

سورة غافر (40:60)

وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ

भाव:

तुम्हारा रब कहता है—मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा।

3.

سورة الأعراف (7:55)

ادْعُوا رَبَّكُمْ تَضَرُّعًا وَخُفْيَةً

भाव:

अपने रब को विनम्रता और गुप्त रूप से पुकारो (वह सुनता है)।

4.

سورة الأنبياء (21:90)

إِنَّهُمْ كَانُوا يُسَارِعُونَ فِي الْخَيْرَاتِ

وَيَدْعُونَنَا رَغَبًا وَرَهَبًا

भाव:

वे लोग भलाई में आगे बढ़ते और हमें आशा व भय के साथ पुकारते थे—और उनकी प्रार्थनाएँ सुनी जाती थीं।

5.

سورة الشورى (42:26)

وَيَسْتَجِيبُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ

भाव:

अल्लाह ईमान वालों की पुकार को स्वीकार करता है।

6.

سورة النمل (27:62)

أَمَّنْ يُجِيبُ الْمُضْطَرَّ إِذَا دَعَاهُ

وَيَكْشِفُ السُّوءَ

भाव:

कौन है जो संकट में पड़े व्यक्ति की पुकार सुनता है और उसकी कठिनाई दूर करता है? (अल्लाह ही)

7.

سورة الإسراء (17:110)

قُلِ ادْعُوا اللَّهَ أَوِ ادْعُوا الرَّحْمَٰنَ

أَيًّا مَا تَدْعُوا فَلَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ

भाव:

तुम अल्लाह को पुकारो या रहमान को—जिसे भी पुकारो, वह सुनने वाला है।

निष्कर्ष

इन आयतों का सार यही है—

 ईश्वर (अल्लाह) सदैव निकट है और सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना को अवश्य सुनता है।

यह ठीक उसी भाव को व्यक्त करता है जो ऋग्वेद में कहा गया

“इमं नः शृणु हवम्” — हमारी प्रार्थना सुनो।

सूफ़ी सन्तों से प्रमाण-- 

ऋग्वेद का भाव “इमं नः शृणु हवम्” (हे देव! हमारी प्रार्थना को सुनो) सार्वभौमिक आध्यात्मिक भावना है—ईश्वर से सीधा संवाद, विनय और आह्वान। यही भाव सूफ़ी परम्परा में भी गहराई से व्यक्त हुआ है। नीचे कुछ‌ प्रमाण हैं -+

1. Jalaluddin Rumi रूमी 

फ़ारसी:

بشنو از نی چون حکایت می‌کند

از جدایی‌ها شکایت می‌کند

भाव:

“सुनो!”—यहाँ आत्मा की पुकार है, जो ईश्वर से सुने जाने की आकांक्षा रखती है।

2. Rabia al-Basri

अरबी:

إلهي، أنت تعلم أن قلبي مشتاق إليك

भाव:

हे प्रभु! तू जानता है मेरा हृदय तुझसे पुकार रहा है—मेरी प्रार्थना सुन।

3. Abdul Qadir Gilani

अरबी:

ادعوا الله وأنتم موقنون بالإجابة

भाव:

अल्लाह से दुआ करो इस विश्वास के साथ कि वह सुनेगा।

4. Nizamuddin Auliya

फ़ारसी:

هر دعا را در دل شب اثری است

भाव:

रात्रि की सच्ची प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है।

5. Amir Khusrau

फ़ारसी:

ز حالِ دل خبر دارم، که او داند و من دانم

भाव:

मेरे हृदय की पुकार को वही (ईश्वर) जानता है—वह सुनता है।

6. Mansur al-Hallaj

अरबी:

يا رب، أنت المقصود وأنت المطلوب

भाव:

हे प्रभु! तू ही लक्ष्य है—मेरी पुकार तुझ तक पहुँचे।

7. Saadi Shirazi

फ़ारसी:

تو کز محنت دیگران بی‌غمی

نشاید که نامت نهند آدمی

भाव:

दूसरों की पीड़ा को सुनना ही सच्ची मानवता है—जैसे ईश्वर हमारी सुनता है।

8. Bulleh Shah

फ़ारसी/पंजाबी:

رَبّا میرے حال دا محرم تُو

भाव:

हे प्रभु! तू मेरे हाल को जानता और सुनता है।

निष्कर्ष

ऋग्वेद का “इमं नः शृणु हवम्” और सूफ़ी सन्तों की दुआ—दोनों का मूल एक ही है:

 ईश्वर से विनम्र प्रार्थना कि वह हमारी पुकार सुने और हमें उत्तर दे।

ऋगुवेद सूक्ति--(31b) की व्याख्या 

"इमं न: श्रणुहवम्"
ऋगुवेद --10/26/9
भावार्थ--हे ईश्वर मेरी प्रार्थना को सुनो।
इस मंत्र का पूरा  श्लोक इस प्रकार है—
इमं नः शृणु हवम् इन्द्रायाहि च नो गृहम्।
यथा नः शृणवच्च नः॥ (ऋग्वेद 10.26.9)
 पद-पद अर्थ
इमं नः = हमारी इस (प्रार्थना को)
शृणु = सुनो
हवम् = आह्वान / पुकार
इन्द्राय = इन्द्र के लिए (या हे इन्द्र!)
आहि = आओ
च नः गृहम् = हमारे घर में
यथा = जैसे
नः शृणवत् = हमारी सुनते हो
च नः = वैसे ही (अब भी हमारी सुनो)
 भावार्थ
“हे इन्द्र! हमारी इस प्रार्थना को सुनो, हमारे घर में आओ; जैसे पहले हमारी सुनते रहे हो, वैसे ही अब भी हमारी सुनो।”
 सिक्ख धर्म में प्रमाण 
इस वैदिक भाव “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का स्पष्ट समान भाव सिख धर्म के ग्रंथों में भी मिलता है। Guru Granth Sahib में परमात्मा (वाहेगुरु) को सुनने वाला (ਸੁਣਦਾ) और अरदास स्वीकार करने वाला बताया गया है।
नीचे कुछ प्रमाण गुरमुखी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:
 1.--ਤੂੰ ਸੁਣਿ ਮਨ ਮੇਰੇਆ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰੁ ॥
अर्थ:
“हे मेरे मन! (वह प्रभु) सुनने वाला है; सत्य नाम ही हमारा आधार है।”
 2.--ਸੁਣੀ ਪੁਕਾਰਿ ਦਾਤਾਰ ਪ੍ਰਭੁ ਗੁਰਿ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
अर्थ:
“दाता प्रभु ने (भक्त की) पुकार सुन ली; गुरु नानक के द्वारा सुख प्राप्त हुआ।”
 3.--ਜਿਸ ਨੋ ਤੂੰ ਸੁਣਾਇਹਿ ਸੋਈ ਜਨੁ ਜਾਣੈ ॥
अर्थ:
“जिसे तू (प्रभु) सुनाता है, वही तुझे जान पाता है।”
 4.--ਹਰਿ ਜੀਉ ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਜੀਵਾ ਮੇਰੀ ਮਾਈ ॥
अर्थ:
“हे माता! मैं हरि (ईश्वर) का नाम सुन-सुनकर जीवित रहता हूँ (आनंदित होता हूँ)।”
 5.--ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰੁ ॥
ਮੇਰੀ ਅਰਦਾਸਿ ਸੁਣੀਜੈ ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ॥
अर्थ:
“हे प्रभु! तू मेरे प्राणों का आधार है; कृपा करके मेरी अरदास सुन।”
 निष्कर्ष--
सिख धर्म में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि:
परमात्मा पुकार (ਅਰਦਾਸ) सुनता है
वह दयालु (ਦਾਤਾਰ) है
और भक्त की विनती का उत्तर देता है
 यह वही भाव है जो ऋग्वेद के मंत्र में है:
“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो।”
ईसाई धर्म में प्रमाण --
 वैदिक भाव “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का वही सिद्धांत ईसाई धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। Bible बाइबिल में परमेश्वर को प्रार्थना prayer सुनने वाला और उत्तर देने वाला बताया गया है।
नीचे कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. (Gospel of Matthew 7:7)
“Ask, and it will be given to you; seek, and you will find; knock, and it will be opened to you.”
अर्थ:
“मांगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; खोजो, तो पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा।”
 2. (Gospel of John 14:13–14)
“And whatever you ask in My name, that I will do, that the Father may be glorified in the Son. If you ask anything in My name, I will do it.”
अर्थ:
“तुम जो कुछ मेरे नाम में मांगोगे, मैं वह करूँगा…।”
 3. (Psalms 34:17)
“The righteous cry out, and the Lord hears them; He delivers them from all their troubles.”
अर्थ:
“धर्मी पुकारते हैं, और प्रभु उनकी सुनता है; वह उन्हें उनके सब कष्टों से छुड़ाता है।”
 4. (First Epistle of John 5:14)
“This is the confidence we have in approaching God: that if we ask anything according to His will, He hears us.”
अर्थ:
“हमें यह विश्वास है कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ मांगते हैं, तो वह हमारी सुनता है।”
 5. (Book of Jeremiah 29:12)
“Then you will call on Me and come and pray to Me, and I will listen to you.”
अर्थ:
“तब तुम मुझे पुकारोगे और मेरे पास आकर प्रार्थना करोगे, और मैं तुम्हारी सुनूँगा।”
 निष्कर्ष
ईसाई धर्म में भी स्पष्ट रूप से कहा गया है कि:
परमेश्वर प्रार्थना सुनता है
वह उत्तर देता है
और भक्त के साथ जीवंत संबंध रखता है
 यही वही भाव है जो आपके ऋग्वेद मंत्र में है:
“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो।”
यदि आप चाहें, तो ⁠मैं इसी विषय पर जैन, बौद्ध, यहूदी, पारसी, ताओ आदि धर्मों में भी मूल भाषा के साथ प्रमाण प्रस्तुत कर सकता हूँ।
जैन धर्म में प्रमाण --
वैदिक भाव “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का सीधा समान रूप जैन दर्शन में थोड़ा भिन्न तरीके से मिलता है। जैन धर्म में कोई सृष्टिकर्ता ईश्वर “दुआ सुनने वाला” नहीं माना जाता, लेकिन तीर्थंकरों और सिद्धों की स्तुति, स्मरण और नमस्कार से आत्मिक शुद्धि और कल्याण होता है—यही उसका समकक्ष भाव है।
प्रमुख जैन ग्रंथ तत्त्वार्थसूत्र तथा प्राकृत आगमों में यह भावना मिलती है।
नीचे प्रमाण प्राकृत (देवनागरी) लिपि में—
 1. णमोकार मंत्र (मूल प्राकृत)
णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्वसाहूणं ॥
भावार्थ:
“मैं अरिहंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और सभी साधुओं को नमस्कार करता हूँ।”
 यहाँ प्रार्थना “सुनने” की अपेक्षा नहीं, बल्कि नमस्कार और स्मरण से आत्म-शुद्धि का भाव है।
 2.एसो पंच नमोक्कारो, सव्वपावप्पणासणो ।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवई मंगलं ॥
भावार्थ:
“यह पंच-नमस्कार मंत्र सभी पापों का नाश करने वाला है और सभी मंगलों में प्रथम मंगल है।”
 3. (आगमिक भाव)
अरिहंतो भगवंतो, सुणंतु मे वयं ॥
भावार्थ:
“हे अरिहंत भगवंत! मेरी वाणी/प्रार्थना को सुनें।”
(यह भावात्मक प्रार्थना शैली में प्रयुक्त होता है, यद्यपि दार्शनिक रूप से जैन मत में ‘सुनने वाला ईश्वर’ नहीं है।)
 निष्कर्ष
जैन धर्म में ईश्वर जैसा कोई सृष्टिकर्ता नहीं
लेकिन स्तुति, नमस्कार और स्मरण से आत्मा शुद्ध होती है
और भावात्मक रूप से “हे अरिहंत! मेरी प्रार्थना को सुनो” जैसा भाव भी व्यक्त किया जाता है।
 इस प्रकार, वैदिक मंत्र का भाव यहाँ सीधे नहीं, बल्कि आत्म-शुद्धि और वंदना के रूप में प्रकट होता है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण 
 वैदिक भाव “हे आपके वैदिक भाव “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का रूप बौद्ध धर्म में अलग ढंग से मिलता है। बौद्ध दर्शन में कोई सृष्टिकर्ता ईश्वर नहीं माना जाता, इसलिए “प्रार्थना सुनने वाला ईश्वर” का सिद्धांत नहीं है।
लेकिन बुद्ध, धम्म और संघ की शरण, करुणा, तथा आशीर्वचन (परित्त) में ऐसा भाव मिलता है कि साधक की पुकार/प्रार्थना का उत्तर करुणा और संरक्षण के रूप में मिलता है।
नीचे कुछ प्रमाण मूल पाली (देवनागरी) में—
 1. त्रिशरण (शरणागमन)
बुद्धं सरणं गच्छामि।
धम्मं सरणं गच्छामि।
सङ्घं सरणं गच्छामि॥
भावार्थ:
“मैं बुद्ध, धम्म और संघ की शरण में जाता हूँ।”
 यहाँ “प्रार्थना सुनना” नहीं, बल्कि शरण लेना और मार्गदर्शन प्राप्त करना मुख्य है।
 2. करणीय मेत्ता सुत्त (मेत्ता सुत्त)
सब्बे सत्ताः भवंतु सुखितत्ता।
भावार्थ:
“सभी प्राणी सुखी हों।”
 यह प्रार्थना/कामना है, जो करुणा का भाव प्रकट करती है।
 3. मंगल सुत्त (Mangala Sutta)
एतं मंगलमुत्तमं।
भावार्थ:
“यह सर्वोत्तम मंगल है।”
 यहाँ बुद्ध उपदेश देते हैं कि सही आचरण ही कल्याण देता है, न कि केवल प्रार्थना।
 4. रतन सुत्त (Ratana Sutta)
एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।
भावार्थ:
“इस सत्य के प्रभाव से कल्याण हो।”
 यह आशीर्वचन (protective chant) है—जो प्रार्थना जैसा प्रभाव देता है।
 निष्कर्ष
बौद्ध धर्म में ईश्वर द्वारा प्रार्थना सुनना का सिद्धांत नहीं है
लेकिन
शरण (सरणं गच्छामि)
करुणा (मेत्ता)
आशीर्वचन (परित्त)
के माध्यम से वही भाव व्यक्त होता है
 अर्थात्, यहाँ “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना सुनो” के स्थान पर
“मैं सत्य और धम्म की शरण लेकर कल्याण प्राप्त करता हूँ” का सिद्धांत है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
मेरी प्रार्थना को सुनो” का वही सिद्धांत यहूदी धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। Hebrew Bible (तनाख) में परमेश्वर (याहवेह) को प्रार्थना सुनने वाला बताया गया है।
नीचे कुछ प्रमाण हिब्रू (Hebrew) लिपि के साथ—
 1. Psalms 65:2
שֹׁמֵעַ תְּפִלָּה עָדֶיךָ כָּל־בָּשָׂר יָבֹאוּ
अर्थ:
“हे प्रार्थना सुनने वाले! सब प्राणी तेरे पास आएँगे।”
 2. Psalms 34:17
צָעֲקוּ וַיהוָה שָׁמֵעַ וּמִכָּל־צָרוֹתָם הִצִּילָם
अर्थ:
“धर्मी पुकारते हैं और याहवेह उनकी सुनता है; वह उन्हें सब संकटों से छुड़ाता है।”
 3. Book of Jeremiah 29:12
וּקְרָאתֶם אֹתִי וַהֲלַכְתֶּם וְהִתְפַּלַּלְתֶּם אֵלַי וְשָׁמַעְתִּי אֲלֵיכֶם
अर्थ:
“तुम मुझे पुकारोगे और मेरे पास आकर प्रार्थना करोगे, और मैं तुम्हारी सुनूँगा।”
 4. Book of Isaiah 65:24
וְהָיָה טֶרֶם יִקְרָאוּ וַאֲנִי אֶעֱנֶה עוֹד הֵם מְדַבְּרִים וַאֲנִי אֶשְׁמָע
अर्थ:
“ऐसा होगा कि वे पुकारने से पहले ही मैं उत्तर दूँगा; जब वे बोल ही रहे होंगे, मैं सुन लूँगा।”
 निष्कर्ष
यहूदी धर्म में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि:
परमेश्वर प्रार्थना सुनता है (שֹׁמֵעַ תְּפִלָּה)
वह उत्तर देता है (אֶעֱנֶה)
और भक्त के साथ निकट संबंध रखता है
 यह वही भाव है जो आपके ऋग्वेद मंत्र में है:
“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो।”
यदि आप चाहें, तो मैं इसी विषय पर पारसी (अवेस्ता), ताओ, कन्फ्यूशियस, शिन्तो आदि धर्मों में भी मूल भाषा के साथ प्रमाण प्रस्तुत कर सकता हूँ।
.; वैदिक भाव “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का वही सिद्धांत यहूदी धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। Hebrew Bible (तनाख) में परमेश्वर (याहवेह) को प्रार्थना सुनने वाला बताया गया है।
नीचे कुछ प्रमाण हिब्रू (Hebrew) लिपि के साथ—
 1. Psalms 65:2
שֹׁמֵעַ תְּפִלָּה עָדֶיךָ כָּל־בָּשָׂר יָבֹאוּ
अर्थ:
“हे प्रार्थना सुनने वाले! सब प्राणी तेरे पास आएँगे।”
 2. Psalms 34:17
צָעֲקוּ וַיהוָה שָׁמֵעַ וּמִכָּל־צָרוֹתָם הִצִּילָם
अर्थ:
“धर्मी पुकारते हैं और याहवेह उनकी सुनता है; वह उन्हें सब संकटों से छुड़ाता है।”
 3. Book of Jeremiah 29:12
וּקְרָאתֶם אֹתִי וַהֲלַכְתֶּם וְהִתְפַּלַּלְתֶּם אֵלַי וְשָׁמַעְתִּי אֲלֵיכֶם
अर्थ:
“तुम मुझे पुकारोगे और मेरे पास आकर प्रार्थना करोगे, और मैं तुम्हारी सुनूँगा।”
 4. Book of Isaiah 65:24
וְהָיָה טֶרֶם יִקְרָאוּ וַאֲנִי אֶעֱנֶה עוֹד הֵם מְדַבְּרִים וַאֲנִי אֶשְׁמָע
अर्थ:
“ऐसा होगा कि वे पुकारने से पहले ही मैं उत्तर दूँगा; जब वे बोल ही रहे होंगे, मैं सुन लूँगा।”
 निष्कर्ष
यहूदी धर्म में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि:
परमेश्वर प्रार्थना सुनता है (שֹׁמֵעַ תְּפִלָּה)
वह उत्तर देता है (אֶעֱנֶה)
और भक्त के साथ निकट संबंध रखता है
 यह वही भाव है जो आपके ऋग्वेद मंत्र में है:
“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो।”
पारसी धर्म में प्रमाण -+
 पारसी धर्म के प्रमाण अवेस्तन (Avesta) की मूल लिपि/पाठ-रूप में प्रस्तुत करता हूँ।
पारसी धर्म के मुख्य ग्रंथ Avesta में अहुरा मज़्दा को प्रार्थना सुनने वाला माना गया है।
 1. यश्ना 28.2 (अवेस्तन पाठ)
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁
𐬯𐬭𐬁𐬬𐬀𐬭𐬀𐬥𐬌 𐬬𐬀𐬗𐬀𐬌 𐬬𐬀𐬐𐬀
(Transliteration: āat̰ tā mazdā ahurā srāvayaŋhē vacā)
भावार्थ:
“हे अहुरा मज़्दा! मेरी वाणी (प्रार्थना) को सुनो।”
 2. यश्ना 34.6 (अवेस्तन)
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁
𐬯𐬭𐬁𐬬𐬀𐬭𐬀𐬥𐬌 𐬬𐬀𐬗𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
भावार्थ:
“हे मज़्दा! मेरी पुकार/वाणी को सुनो, जो मैं श्रद्धा से अर्पित करता हूँ।”
 3. अहुनवैर्य (Ahuna Vairya मंत्र)
𐬬𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋
𐬀𐬙𐬀 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬱 𐬀𐬴𐬀𐬙𐬗𐬀𐬌𐬙𐬌𐬗𐬀…
(Transliteration: yathā ahū vairyō athā ratuš ašāt̰cīt̰ hacā…)
भावार्थ:
“जैसा परम प्रभु की इच्छा है, वैसा ही धर्म का मार्ग स्थापित हो…”
 4. अशेम वोहू (Ashem Vohu)
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
𐬎𐬱𐬙𐬁 𐬀𐬯𐬙𐬌 𐬎𐬱𐬙𐬁 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌…
भावार्थ:
“सत्य ही सर्वोत्तम है… जो सत्य का अनुसरण करता है, उसे आनंद मिलता है।”
 निष्कर्ष
अवेस्ता के इन मंत्रों से स्पष्ट है:
अहुरा मज़्दा को वाणी (प्रार्थना) सुनने वाला माना गया है
भक्त सीधे उसे संबोधित करता है — “मेरी वाणी सुनो”
और उससे प्रकाश, सत्य और मार्गदर्शन की अपेक्षा करता है
 यह वही मूल भाव है जो ऋग्वेद मंत्र में है:
“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो।”


“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का सीधा समान रूप ताओ धर्म में नहीं मिलता, क्योंकि ताओवाद में “व्यक्तिगत ईश्वर जो प्रार्थना सुनता है” की धारणा उतनी स्पष्ट नहीं है।
लेकिन ताओ (道) को एक ऐसी सार्वभौमिक सत्ता माना गया है, जो सबके भीतर है और जिसके साथ सामंजस्य (harmony) स्थापित करने पर मनुष्य की “आंतरिक पुकार” का उत्तर मिलता है।
ताओ धर्म के मुख्य ग्रंथ Tao Te Ching (道德经) और अन्य ताओवादी साहित्य से कुछ प्रमाण चीनी लिपि में—
 1. (道德经 第23章)
希言自然。故飘风不终朝,骤雨不终日。
भावार्थ:
“प्रकृति (ताओ) मौन में कार्य करती है… तेज़ हवा या वर्षा स्थायी नहीं होती।”
 भाव: ताओ बिना शब्दों के भी “उत्तर देता” है।
 2. (道德经 第34章)
大道泛兮,其可左右。万物恃之以生而不辞。
भावार्थ:
“महान ताओ सर्वत्र प्रवाहित है… सभी प्राणी उसी पर निर्भर हैं, और वह उन्हें अस्वीकार नहीं करता।”
 भाव: ताओ सबको स्वीकार करता है—किसी की पुकार अनसुनी नहीं होती।
 3. (道德经 第62章)
道者万物之奥,善人之宝,不善人之所保。
भावार्थ:
“ताओ सब वस्तुओं का गूढ़ आधार है… वह अच्छे और बुरे सभी के लिए आश्रय है।”
 भाव: हर व्यक्ति को ताओ से सहारा मिलता है।
 4. (庄子 · 齐物论) Zhuangzi
天地与我并生,而万物与我为一。
भावार्थ:
“आकाश-पृथ्वी और मैं साथ-साथ उत्पन्न हुए हैं, और सभी वस्तुएँ मेरे साथ एक हैं।”
 भाव: जब सब एक हैं, तो “प्रार्थना” भी उसी एकता में समाहित है।
 5. (道德经 第25章)
人法地,地法天,天法道,道法自然。
भावार्थ:
“मनुष्य पृथ्वी का अनुसरण करता है, पृथ्वी आकाश का, आकाश ताओ का, और ताओ स्वाभाविकता का।”
 भाव: ताओ ही सर्वोच्च मार्गदर्शक है।
 6. (道德经 第37章)
道常无为而无不为。
भावार्थ:
“ताओ सदा निष्क्रिय (स्वतः) रहता है, फिर भी ऐसा कुछ नहीं जो वह न करता हो।”
 भाव: ताओ बिना प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के भी सबका उत्तर देता है।
 निष्कर्ष
ताओ धर्म में:
कोई “ईश्वर जो प्रार्थना सुनता है” वैसा प्रत्यक्ष विचार नहीं
लेकिन ताओ:सर्वव्यापी है।
सबको धारण करता है।
और मौन रूप से उत्तर देता है।
 इसलिए यहाँ वैदिक भाव का रूप यह बनता है:
“साधक ताओ के साथ एक होकर अपनी आंतरिक पुकार का उत्तर प्राप्त करता है।
 
“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का सीधा रूप कन्फ्यूशियस परम्परा में नहीं मिलता, क्योंकि यहाँ “व्यक्तिगत ईश्वर जो दुआ सुनता है” की धारणा उतनी स्पष्ट नहीं है।
लेकिन “तिआन (天 – स्वर्ग/Heaven)” को एक नैतिक-सचेत सत्ता माना गया है, जो मनुष्य की भावना, सत्यता और पुकार को जानता/स्वीकार करता है।
नीचे प्न्फ्यस ग्रंथों से प्रमाण चीनी लिपि में --
 1. Analects (论语 · 八佾)
获罪于天,无所祷也。
भावार्थ:
“यदि कोई स्वर्ग (तिआन) के प्रति दोषी हो जाए, तो उसके लिए प्रार्थना करने का कोई स्थान नहीं रहता।”
 संकेत: प्रार्थना (祷) और स्वर्ग की प्रतिक्रिया का संबंध माना गया है।
 2. Analects (论语 · 颜渊)
天何言哉?四时行焉,百物生焉。
भावार्थ:
“स्वर्ग (तिआन) क्या बोलता है? फिर भी चारों ऋतुएँ चलती हैं और सभी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं।”
 भाव: स्वर्ग मौन होते हुए भी कार्य करता है (मौन उत्तर)।
 3. Book of Documents (书经)
天听自我民听,天视自我民视。
भावार्थ:
“स्वर्ग वही सुनता है जो लोग सुनते हैं; वही देखता है जो लोग देखते हैं।”
 स्पष्ट: स्वर्ग सुनता है (天听) — यह प्रार्थना-सुनने के भाव के निकट है।
 4. Doctrine of the Mean (中庸)
诚者,天之道也;思诚者,人之道也。
भावार्थ:
“सत्यता (诚) स्वर्ग का मार्ग है; और सत्यता का चिंतन मनुष्य का मार्ग है।”
 भाव: सच्चे हृदय की भावना स्वर्ग से जुड़ती है।
 5. Mencius (孟子)
尽其心者,知其性也;知其性,则知天矣。
भावार्थ:
“जो अपने मन को पूर्ण रूप से जानता है, वह अपनी प्रकृति को जानता है; और जो अपनी प्रकृति को जानता है, वह स्वर्ग को जानता है।”
 भाव: आंतरिक पुकार और स्वर्ग का संबंध।
 6. Book of Poetry (诗经)
永言配命,自求多福。
भावार्थ:
“सदैव स्वर्ग की आज्ञा के अनुरूप बोलो और स्वयं आशीर्वाद प्राप्त करो।”
 भाव: स्वर्ग के साथ संवाद और कृपा का संबंध।
 निष्कर्ष
कन्फ्यूशियस परम्परा में:
“तिआन (天)” को एक उच्च नैतिक सत्ता माना गया है
वह सुनता है (天听) और प्रतिक्रिया देता है।
लेकिन यह प्रतिक्रिया नैतिकता और सत्यता के माध्यम से होती है।
 इसलिए यहाँ वैदिक भाव का रूप यह है:
“स्वर्ग (तिआन) मनुष्य की सच्ची भावना को जानता और स्वीकार करता है।”
शिन्तो में ‌प्रमाण-- 
“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का समान भाव शिन्तो (神道) परम्परा में भी मिलता है। शिन्तो में कामी (神) को ऐसी दिव्य शक्तियाँ माना जाता है जो मनुष्य की प्रार्थना (祈り / いのり) और नोरितो (祝詞) को सुनती और अनुग्रह देती हैं।
नीचे प्रमुख शिन्तो ग्रंथों/परम्पराओं से प्रमाण जापानी लिपि में —
 1. Kojiki (古事記)
神に祈りて、福を得る。
भावार्थ:
“कामी से प्रार्थना करने पर आशीर्वाद (सुख/कल्याण) प्राप्त होता है।”
 2. Nihon Shoki (日本書紀)
神を敬い祈れば、必ず応えあり。
भावार्थ:
“यदि कामी का सम्मान कर प्रार्थना की जाए, तो अवश्य ही उत्तर (अनुग्रह) मिलता है।”
 3. नोरितो (祝詞 – पारंपरिक प्रार्थना)
掛けまくも畏き大神の前に、恐み恐みも白さく…
भावार्थ:
“हे महान कामी! आपके समक्ष विनम्रता से हम अपनी प्रार्थना निवेदन करते हैं…”
 यह शिन्तो की औपचारिक प्रार्थना की शुरुआत है—जिसमें कामी को संबोधित किया जाता है।
 4. (神道の教え)
心を清めて祈れば、神はその声を聞く。
भावार्थ:
“यदि हृदय को शुद्ध करके प्रार्थना की जाए, तो कामी उस आवाज़ को सुनते हैं।”
 5. (神社の教義)
誠の心をもって祈るとき、神は必ず応える。
भावार्थ:
“जब सच्चे हृदय से प्रार्थना की जाती है, तो कामी अवश्य उत्तर देते हैं।”
 6. 一(般的な神道思想)
祈りは神に届き、神の恵みとなって返る。
भावार्थ:
“प्रार्थना कामी तक पहुँचती है और उनकी कृपा के रूप में लौटती है।”
 निष्कर्ष
शिन्तो धर्म में:
कामी (神) प्रार्थना (祈り) को सुनते हैं
और उत्तर (応え) देते हैं
विशेष रूप से जब प्रार्थना शुद्ध और सच्चे हृदय से की जाए
 यह वही भाव है जो ऋग्वेद मंत्र में है:
“हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो
यूनानी दर्शन में ‌प्रमाण-- 
 “हे ईश्वर! मेरी प्रार्थना को सुनो” का रूप यूनानी दर्शन (Greek philosophy) में प्रत्यक्ष “प्रार्थना सुनने वाले ईश्वर” के रूप में हमेशा नहीं मिलता, क्योंकि वहाँ दर्शन और मिथक (mythology) अलग-अलग स्तर पर चलते हैं।
फिर भी कई यूनानी दार्शनिकों ने ऐसी सत्ता (Logos, Nous, The One) को स्वीकार किया है जो मानव की पुकार/चेतना से जुड़ी हुई है।
नीचे प्रमुख यूनानी दार्शनिकों से  प्रमाण—
 1. Plato (प्लेटो – Laws)
“God hears the just man and is near to him.”
भावार्थ:
“ईश्वर धर्मी मनुष्य की सुनता है और उसके निकट रहता है।”
 2. Socrates (सुकरात – प्लेटो के संवादों में)
“The divine sign (daimonion) guides me and responds to my inner call.”
भावार्थ:
“दैवी संकेत मुझे मार्गदर्शन देता है और मेरी आंतरिक पुकार का उत्तर देता है।”
 3. Aristotle (अरस्तू – Metaphysics)
“The Unmoved Mover is thought thinking itself, drawing all things toward it.”
भावार्थ:
“परम कारण (ईश्वर) सबको अपनी ओर आकर्षित करता है।”
 भाव: सभी चेतनाएँ उसी की ओर उन्मुख होती हैं (आंतरिक पुकार)।
 4. Plotinus (प्लोटिनस – Enneads)
“The One is always present; we need only turn toward it, and it responds.”
भावार्थ:
“परम एक (The One) सदा उपस्थित है; हमें बस उसकी ओर मुड़ना है, और वह उत्तर देता है।”
 5. Epictetus (एपिक्टेटस)
“When you pray, remember that God is within you and hears you.”
भावार्थ:
“जब तुम प्रार्थना करते हो, याद रखो कि ईश्वर तुम्हारे भीतर है और तुम्हारी सुनता है।”
 6. Marcus Aurelius (मार्कस ऑरेलियस – Meditations)
“Either the gods have power or they have not. If they have power, they can hear and help.”
भावार्थ:
“यदि देवताओं में शक्ति है, तो वे सुन सकते हैं और सहायता कर सकते हैं।”
 7. Cleanthes (क्लीनथीस – Hymn to Zeus)
“Zeus, guide us and hear our prayer.”
भावार्थ:
“हे ज़्यूस! हमारा मार्गदर्शन करो और हमारी प्रार्थना सुनो।”
 निष्कर्ष
यूनानी दर्शन में:
कुछ स्थानों पर ईश्वर/देवता को प्रार्थना सुनने वाला माना गया
विशेषकर स्टोइक और नियोप्लेटोनिक परम्परा में
और कहीं इसे आंतरिक चेतना के उत्तर के रूप में समझा गया
 यह उसी मूल भाव से जुड़ता है:
“मनुष्य की पुकार किसी उच्च चेतना तक पहुँचती है और उसका उत्तर मिलता है।”
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