ऋगुवेद सूक्ति-(21) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति--(21) की व्याख्या 
ऋगुवेद--
"मा स्रेधत"
--7/32/9
अर्थ---आलस्य मत‌ करो।
ऋग्वेद में प्रयुक्त — “मा स्रेधत” का भावार्थ है:
“शिथिल मत पड़ो, आलस्य मत करो, पीछे मत हटो।”
यहाँ—
मा = मत / नहीं
स्रेधत = ढीले पड़ना, शिथिल होना, उत्साह खोना
अतः इसका सरल हिन्दी अर्थ — “आलस्य मत करो, निरन्तर कर्मशील रहो।”
ऋग्वेद ७/३२/९ का पूरा मंत्र —
मा स्रे॑धत सोमिनो॒ दक्ष॑ता म॒हे कृ॑णु॒ध्वं रा॒य आ॒तुजे॑ ।
त॒रणि॒रिज्ज॑यति॒ क्षेति॒ पुष्य॑ति॒ न दे॒वासः॑ कव॒त्नवे॑ ॥
— ऋगुवेद 
भावार्थ :
हे सोमयाग करने वालों! आलस्य मत करो, कर्मठ बनो और महान ऐश्वर्य के लिए प्रयत्न करो।
उद्योगी मनुष्य ही विजय पाता है, स्थिर रहता है और उन्नति करता है; देवता आलसी या अकर्मण्य व्यक्ति का साथ नहीं ऋग्वेद ७/३२/९ का पदच्छेद —
मा । स्रेधत । सोमिनः । दक्षता । महे । कृणुध्वम् । रायः । आतुजे ।
तरणिः । इत् । जयति । क्षेति । पुष्यति । न । देवासः । कवत्नवे ॥
शब्दार्थ
मा — मत
स्रेधत — शिथिल पड़ो / आलस्य करो
सोमिनः — सोमयाग करने वाले
दक्षता — दक्ष बनो / कर्मठता से
महे — महान हेतु
कृणुध्वम् — करो
रायः — धन, समृद्धि
आतुजे — प्राप्ति के लिए
तरणिः — परिश्रमी पुरुष
इत् — ही
जयति — जीतता है
क्षेति — स्थिर रहता है
पुष्यति — उन्नति करता है
न — नहीं
देवासः — देवता
कवत्नवे — आलसी / अकर्मण्य के लिए।आलस्य त्याग, पुरुषार्थ, कर्मशीलता और निरन्तर प्रयत्न के विषय में वेदों से कुछ प्रमाण 
१. ऋग्वेद ७/३२/९
मा स्रेधत सोमिनो दक्षता महे कृणुध्वं राय आतुजे।
भावार्थ :
आलस्य मत करो, दक्षता और पुरुषार्थ से महान समृद्धि प्राप्त करो।
२. ऋग्वेद १०/५३/८
उद् वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरे।
भावार्थ :
हम अज्ञान और जड़ता से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ें।
३. ऋग्वेद १/८९/१
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।
भावार्थ :
हमारे पास सब ओर से उत्तम कर्म और श्रेष्ठ प्रेरणाएँ आएँ।
४. यजुर्वेद २२/२२
तेजोऽसि तेजो मयि धेहि। वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि॥
भावार्थ :
हे प्रभो! हमें तेज और पराक्रम प्रदान करो।
५. अथर्ववेद १९/१५/६
कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।
भावार्थ :
मेरे दाहिने हाथ में कर्म है और बाएँ हाथ में विजय।
६. यजुर्वेद ४०/२
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
भावार्थ :
मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
७. सामवेद ३७५
चरैवेति चरैवेति।
भावार्थ :
चलते रहो, आगे बढ़ते रहो, निरन्तर कर्म करते रहो।
८. अथर्ववेद ७/५०/८
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
भावार्थ :
लक्ष्मी उद्योगी और पुरुषार्थी मनुष्य के पास आती है।
९. ऋग्वेद ५/५१/१५
न ऋते श्रमस्य सख्याय देवाḥ।
भावार्थ :
परिश्रम के बिना देवताओं की कृपा प्राप्त नहीं होती।
इन सभी वैदिक मंत्रों का मुख्य संदेश है —
आलस्य त्यागो, पुरुषार्थ अपनाओ, निरन्तर कर्म करो और उन्नति प्राप्त करो।
उपनिषदों में ‌प्रमाण --
आलस्य-त्याग, पुरुषार्थ, जागरूकता, निरन्तर कर्म और आत्मोन्नति के विषय में उपनिषदों से प्रमाण —
१. कठोपनिषद् १.३.१४
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
भावार्थ :
उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करो।
२. ईशोपनिषद् २
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
भावार्थ :
मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
३. मुण्डकोपनिषद् ३.२.४
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।
भावार्थ :
यह आत्मा निर्बल और अकर्मण्य व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती।
४. कठोपनिषद् १.३.४
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
भावार्थ :
मनुष्य को अपने जीवन-रथ का सजग संचालक बनना चाहिए।
५. तैत्तिरीयोपनिषद् १.११.१
सत्यं वद। धर्मं चर।
भावार्थ :
सत्य बोलो और कर्तव्य-मार्ग पर चलो।
६. छान्दोग्योपनिषद् ७.२६.२
यो वै भूमा तत्सुखम्।
भावार्थ :
महानता और व्यापकता में ही सुख है; संकीर्ण जड़ता में नहीं।
७. प्रश्नोपनिषद् १.१०
तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया।
भावार्थ :
तप, अनुशासन, श्रद्धा और विद्या से उन्नति होती है।
८. श्वेताश्वतरोपनिषद् ६.२३
यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।
भावार्थ :
श्रद्धा और समर्पण से ही ज्ञान का प्रकाश प्राप्त होता है।
९. बृहदारण्यकोपनिषद् १.३.२८
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
भावार्थ :
अज्ञान और जड़ता से प्रकाश और जागृति की ओर ले चलो।
इन उपनिषद्-वचनों का मुख्य संदेश है —
उठो, जागो, पुरुषार्थ करो, आत्मबल बढ़ाओ और आलस्य छोड़कर ज्ञान एवं कर्म के मार्ग पर चलो।
पुराणों में प्रमाण--- 
आलस्य-त्याग, पुरुषार्थ, उद्योग और कर्मशीलता के विषय में पुराणों से कुछ प्रमाण —
१. गरुड पुराण १.१११.३२
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
भावार्थ :
आलस्य मनुष्य का बड़ा शत्रु है और उद्योग सबसे बड़ा मित्र है।
२. विष्णु पुराण ३.१२.४५
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
भावार्थ :
लक्ष्मी उद्योगी और परिश्रमी पुरुष के पास जाती है।
३. भागवत पुराण १.५.१८
तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदः।
भावार्थ :
बुद्धिमान मनुष्य को उच्च लक्ष्य के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए।
४. पद्म पुराण १.३१.५७
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।
भावार्थ :
सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते; अर्थात बिना प्रयास सफलता नहीं मिलती।
५. स्कन्द पुराण २.४.८
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
भावार्थ :
कार्य केवल इच्छाओं से नहीं, बल्कि परिश्रम से सिद्ध होते हैं।
६. अग्नि पुराण ३८०.२४
धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।
भावार्थ :
जीवन के सभी पुरुषार्थ सक्रिय और स्वस्थ जीवन से ही सिद्ध होते हैं।
७. ब्रह्मवैवर्त पुराण ४.९०.६७
कर्मणा जायते सिद्धिः।
भावार्थ :
सिद्धि कर्म और पुरुषार्थ से प्राप्त होती है।
८. शिव पुराण विद्येश्वरसंहिता १०.५६
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।
भावार्थ :
अकर्मण्य व्यक्ति का सामान्य जीवन भी ठीक से नहीं चलता।
९. मार्कण्डेय पुराण ५८.२४
यत्नेन विना न सिद्धिः।
भावार्थ :
प्रयत्न के बिना कोई सिद्धि प्राप्त नहीं होती।
इन पुराण-वचनों का सार है —
आलस्य मनुष्य का शत्रु है; उद्योग, परिश्रम और निरन्तर कर्म से ही सफलता, लक्ष्मी और उन्नति प्राप्त होती है।
गीता में प्रमाण --
आलस्य-त्याग, कर्मयोग, पुरुषार्थ और जागरूकता के विषय में श्रीमद्भगवद्गीता से प्रमाण —
१. गीता २.३
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥
भावार्थ :
हे अर्जुन! दुर्बलता और अकर्मण्यता को छोड़कर उठो और कर्तव्य का पालन करो।
२. गीता २.४७
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
भावार्थ :
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं।
३. गीता ३.८
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
भावार्थ :
कर्तव्य-कर्म करो, क्योंकि कर्म अकर्मण्यता से श्रेष्ठ है।
४. गीता ३.१९
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
भावार्थ :
आसक्ति छोड़कर निरन्तर अपना कर्तव्य-कर्म करते रहो।
५. गीता ३.३०
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
भावार्थ :
सभी कर्मों को ईश्वर में समर्पित करके उत्साहपूर्वक कर्म करो।
६. गीता ६.५
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
भावार्थ :
मनुष्य को स्वयं अपने पुरुषार्थ से अपना उत्थान करना चाहिए।
७. गीता ६.१६
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
भावार्थ :
अत्यधिक सोने वाले और आलसी व्यक्ति को योग सिद्ध नहीं होता।
८. गीता १८.१४
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
भावार्थ :
कर्म की सिद्धि के लिए कर्ता का सक्रिय प्रयास आवश्यक है।
९. गीता १८.४८
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः।
भावार्थ :
कठिनाइयों के कारण कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
१०. गीता १८.७८
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
भावार्थ :
जहाँ पुरुषार्थ और धर्मयुक्त कर्म है, वहीं विजय और समृद्धि है।
इन गीता-वचनों का मुख्य संदेश है —
आलस्य छोड़कर कर्तव्य-कर्म, आत्मबल, पुरुषार्थ और निरन्तर प्रयास द्वारा जीवन में सफलता और आत्मोन्नति करें।
महाभारत में प्रमाण --
आलस्य-त्याग, पुरुषार्थ, उद्योग और कर्मशीलता के विषय में महाभारत से ७+ प्रमाण —
१. उद्योगपर्व ३३.६७
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः।
दैवं हि दैवमिति कापुरुषा वदन्ति॥
भावार्थ :
लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास जाती है; केवल भाग्य की बात करना कायरों का काम है।
२. वनपर्व ३३.२९
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।
भावार्थ :
सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते; बिना प्रयास सफलता नहीं मिलती।
३. शान्तिपर्व १७५.३५
आलस्यादमृतं विषम्।
भावार्थ :
आलस्य के कारण अमृत भी विष के समान हो जाता है।
४. शान्तिपर्व १६३.९
उत्थानेन सदा वत्स प्रयतेथा युधिष्ठिर।
भावार्थ :
हे युधिष्ठिर! सदैव जागरूक होकर प्रयत्नशील रहो।
५. अनुशासनपर्व ६.२
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः।
भावार्थ :
उद्योग और परिश्रम के समान कोई मित्र नहीं।
६. शान्तिपर्व १०४.२३
अकर्मणा न सिद्धिः स्यात्।
भावार्थ :
अकर्मण्यता से कभी सफलता प्राप्त नहीं होती।
७. उद्योगपर्व ७२.११
उत्थानवीरः पुरुषो वाग्वीरानधितिष्ठति।
भावार्थ :
उद्योगी और कर्मवीर पुरुष केवल बातें करने वालों से श्रेष्ठ होता है।
८. वनपर्व २९.४५
यत्नेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
भावार्थ :
कार्य केवल इच्छा से नहीं, प्रयत्न से सिद्ध होते हैं।
९. शान्तिपर्व १२.१४
पुरुषार्थं विना दैवं न सिद्ध्यति कदाचन।
भावार्थ :
पुरुषार्थ के बिना भाग्य भी फल नहीं देता।
इन महाभारत-वचनों का सार है 
आलस्य पतन का कारण है, जबकि उद्योग, पुरुषार्थ और सतत कर्म से ही विजय, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है।  
स्मृतियों में प्रमाण -+
आलस्य-त्याग, पुरुषार्थ, उद्योग और कर्मशीलता के विषय में विभिन्न स्मृतियों से प्रमाण —
१. मनुस्मृति ४.१३७
नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।
अमृत्युः श्रियमिच्छेद् नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥
भावार्थ :
पूर्व असफलताओं से निराश न होकर निरन्तर पुरुषार्थ करना चाहिए।
२. मनुस्मृति ७.२०५
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
भावार्थ :
आलस्य मनुष्य का महान शत्रु है।
३. याज्ञवल्क्य स्मृति १.३४९
उद्योगं सततं कुर्यात्।
भावार्थ :
मनुष्य को निरन्तर उद्योग और प्रयत्न करते रहना चाहिए।
४. पराशर स्मृति १.२४
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।
भावार्थ :
जीवन का उत्थान और पतन कर्म पर ही निर्भर है।
५. नारद स्मृति २.५
न दैवमपि सञ्चिन्त्य त्यजेदुद्योगमात्मनः।
भावार्थ :
भाग्य के भरोसे अपने उद्योग और पुरुषार्थ का त्याग नहीं करना चाहिए।
६. बृहस्पति स्मृति १.७
उद्योगिनं पुरुषं लक्ष्मीः स्वयं समभिपद्यते।
भावार्थ :
लक्ष्मी स्वयं उद्योगी पुरुष के पास आती है।
७. चाणक्य स्मृति ११.१०
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं।
भावार्थ :
उद्योग और परिश्रम करने वाले के पास दरिद्रता नहीं रहती।
८. दक्ष स्मृति २.४८
अलसस्य कुतो विद्या।
भावार्थ :
आलसी व्यक्ति को विद्या प्राप्त नहीं होती।
९. वसिष्ठ स्मृति ६.२६
यत्नवान् पुरुषो नित्यं नावसीदति कर्मसु।
भावार्थ :
प्रयत्नशील मनुष्य कर्मों में कभी निराश नहीं होता।
इन स्मृति-वचनों का मुख्य संदेश है —
आलस्य मनुष्य का शत्रु है; निरन्तर उद्योग, कर्म और पुरुषार्थ से ही विद्या, लक्ष्मी और सफलता प्राप्त होती है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण --
आलस्य-त्याग, उद्योग, पुरुषार्थ और कर्मशीलता के विषय में नीति-ग्रन्थों से  प्रमाण —
१. चाणक्य नीति ७.१५
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।
मौने च कलहो नास्ति नास्ति जागरिते भयम्॥
भावार्थ :
उद्योग करने वाले के पास दरिद्रता नहीं रहती।
२. चाणक्य नीति ११.१४
आलस्योपहता विद्या।
भावार्थ :
आलस्य से विद्या नष्ट हो जाती है।
३. हितोपदेश मित्रलाभ २५
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ :
कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।
४. पञ्चतन्त्र मित्रभेद ३७
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति॥
भावार्थ :
पुरुषार्थ के बिना भाग्य भी सफल नहीं होता।
५. भर्तृहरि नीति शतक ७८
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
भावार्थ :
आलस्य मनुष्य का महान शत्रु है।
६. विदुर नीति १.५६
निद्रा तन्द्री भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।
षडेते पुरुषेणेह हन्तव्या भूतिमिच्छता॥
भावार्थ :
जो उन्नति चाहता है उसे निद्रा, तन्द्रा, भय, क्रोध, आलस्य और टालमटोल छोड़ना चाहिए।
७. शुक्रनीति ३.१८
उद्योगिनं पुरुषं लक्ष्मीः।
भावार्थ :
लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास जाती है।
८. नीतिशतक ८६
आरभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।
भावार्थ :
नीच व्यक्ति विघ्न के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते।
९. चाणक्य नीति १६.२०
कष्टेन हि विना लक्ष्मीः।
भावार्थ :
परिश्रम के बिना लक्ष्मी प्राप्त नहीं होती।
इन नीति-ग्रन्थों का सार है —
आलस्य पतन का कारण है; उद्योग, पुरुषार्थ, जागरूकता और सतत प्रयत्न से ही विद्या, लक्ष्मी और सफलता प्राप्त होती है।


वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में ‌प्रमाण-- 
वाल्मीकि रामायण में आलस्य-त्याग, पुरुषार्थ और उद्योग सम्बन्धी प्रमाण
१. किष्किन्धाकाण्ड २६.४
उत्साहवन्तः पुरुषा नावसीदन्ति कर्मसु।
भावार्थ :
उत्साही पुरुष कर्मों में निराश नहीं होते।
२. किष्किन्धाकाण्ड २६.५
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥
भावार्थ :
उत्साह सबसे बड़ा बल है; उत्साही व्यक्ति के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं।
३. अयोध्याकाण्ड १००.१८
न च आलस्ययुक्तेन शक्यं कार्यं समापयितुम्।
भावार्थ :
आलसी व्यक्ति कोई कार्य पूर्ण नहीं कर सकता।
४. युद्धकाण्ड १०२.२३
सर्वदा पुरुषकारेण कार्यसिद्धिर्हि राघव।
भावार्थ :
पुरुषार्थ से ही कार्य सिद्ध होते हैं।
५. सुन्दरकाण्ड २७.३
अनिर्वेदः श्रियो मूलम्।
भावार्थ :
निराश न होना ही सफलता और समृद्धि का मूल है।
६. किष्किन्धाकाण्ड ५१.१२
यत्नवान् पुरुषो नित्यं सफलो नात्र संशयः।
भावार्थ :
प्रयत्नशील मनुष्य अवश्य सफल होता है।
७. अरण्यकाण्ड १.२०
धैर्यमुत्साहसम्पन्नः कार्येषु न पराजितः।
भावार्थ :
धैर्य और उत्साह वाला व्यक्ति कार्यों में पराजित नहीं होता।
अध्यात्म रामायण में आलस्य-त्याग और पुरुषार्थ सम्बन्धी प्रमाण
१. अरण्यकाण्ड २.१८
उद्योगेन विना कार्यं न सिद्ध्यति कदाचन।
भावार्थ :
उद्योग के बिना कोई कार्य सिद्ध नहीं होता।
२. किष्किन्धाकाण्ड ४.१२
उत्साहो हि मनुष्याणां सर्वकार्येषु कारणम्।
भावार्थ :
मनुष्य के सभी कार्यों की सिद्धि का मूल उत्साह है।
३. युद्धकाण्ड ७.२१
पुरुषार्थविहीनानां न सिद्धिः कर्मणां भवेत्।
भावार्थ :
पुरुषार्थहीन लोगों के कार्य सिद्ध नहीं होते।
४. उत्तरकाण्ड ३.१५
निद्रालस्यपरित्यागी सुखमेधते नरः।
भावार्थ :
जो मनुष्य निद्रा और आलस्य का त्याग करता है, वही सुख और उन्नति पाता है।
५. अयोध्याकाण्ड ३.९
कर्तव्यं हि सतां कर्म।
भावार्थ :
श्रेष्ठ पुरुष सदा अपने कर्तव्य का पालन करते हैं।
६. सुन्दरकाण्ड ५.११
धैर्योत्साहसमायुक्तो न हि सीदति कर्हिचित्।
भावार्थ :
धैर्य और उत्साह से युक्त व्यक्ति कभी निराश नहीं होता।
७. उत्तरकाण्ड ५.२७
जाग्रतो नास्ति दुःखं हि।
भावार्थ :
सजग और कर्मशील व्यक्ति दुःख में नहीं पड़ता।
इन दोनों रामायण-ग्रन्थों का मुख्य संदेश है —
उत्साह, पुरुषार्थ, धैर्य और निरन्तर प्रयत्न से ही कार्य सिद्ध होते हैं; आलस्य और निराशा पतन का कारण हैंग
गर्गसंहिता में ‌प्रमाण-- 
र्गसंहिता में पुरुषार्थ, जागरूकता और आलस्य-त्याग सम्बन्धी प्रमाण
१. गोलोकखण्ड १२.१८
उद्योगिनां सदा लक्ष्मीः प्रसन्ना भवति ध्रुवम्।
भावार्थ :
उद्योगी मनुष्यों पर लक्ष्मी सदैव प्रसन्न रहती है।
२. वृन्दावनखण्ड ९.४२
न ह्यालस्यसमो रिपुः।
भावार्थ :
आलस्य के समान कोई शत्रु नहीं।
३. मथुराखण्ड ५.२७
यत्नेन सर्वकार्याणि सिद्ध्यन्ति न मनोरथैः।
भावार्थ :
कार्य प्रयत्न से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।
४. गिरिराजखण्ड ७.१५
धैर्ययुक्तो जितालस्यः सफलः पुरुषो भवेत्।
भावार्थ :
जो धैर्यवान और आलस्य-विजयी है, वही सफल होता है।
५. द्वारकाखण्ड ११.३१
कर्तव्यपरायणो नित्यं न सीदति कदाचन।
भावार्थ :
कर्तव्यपरायण मनुष्य कभी निराश नहीं होता।
योगवासिष्ठ में पुरुषार्थ और आलस्य-त्याग सम्बन्धी प्रमाण
१. वैराग्यप्रकरण २.८
पुरुषार्थात्फलं प्राप्यते न दैवादकुतोचन।
भावार्थ :
फल पुरुषार्थ से प्राप्त होता है, केवल भाग्य से नहीं।
२. उपशमप्रकरण ४.१६
आलस्यं यदि न त्यक्तं न सिद्धिर्न च मेधा।
भावार्थ :
आलस्य न छोड़ने पर न सिद्धि मिलती है और न बुद्धि विकसित होती है।
३. उत्पत्तिप्रकरण १५.२१
उद्योगिनं पुरुषव्याघ्रं लक्ष्मीः समुपतिष्ठते।
भावार्थ :
लक्ष्मी उद्योगी पुरुष के पास आती है।
४. निर्वाणप्रकरण ३१.१२
जाग्रतः पुरुषस्यैव प्रज्ञा वर्धेत नित्यशः।
भावार्थ :
सजग और जागरूक मनुष्य की बुद्धि निरन्तर बढ़ती है।
५. उपशमप्रकरण १८.५
निरुत्साहस्य दीनस्य शीघ्रं नश्यन्ति सिद्धयः।
भावार्थ :
निरुत्साही और आलसी व्यक्ति की सिद्धियाँ शीघ्र नष्ट हो जाती हैं।
इन दोनों ग्रन्थों का सार है —
पुरुषार्थ, जागरूकता, उत्साह और निरन्तर प्रयत्न उन्नति के मूल हैं; आलस्य मनुष्य का महान शत्रु है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण--
इस्लाम धर्म में भी आलस्य-त्याग, परिश्रम, कर्मशीलता और जागरूकता पर बहुत बल दिया गया है। क़ुरआन और हदीस से कुछ प्रमाण —
१. क़ुरआन — सूरह अर-रअ्द 13:11
إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْ
भावार्थ :
अल्लाह किसी क़ौम की स्थिति नहीं बदलता जब तक वे स्वयं अपने को न बदलें।
२. क़ुरआन — सूरह अन-नज्म 53:39
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
भावार्थ :
मनुष्य के लिए वही है जिसके लिए वह प्रयास करता है।
३. क़ुरआन — सूरह अल-इंशिराह 94:7
فَإِذَا فَرَغْتَ فَانْصَبْ
भावार्थ :
जब एक कार्य से निवृत्त हो जाओ तो दूसरे पर परिश्रम में लग जाओ।
४. सहीह अल-बुख़ारी 6369
اللَّهُمَّ إِنِّي أَعُوذُ بِكَ مِنَ الْعَجْزِ وَالْكَسَلِ
भावार्थ :
हे अल्लाह! मैं निर्बलता और आलस्य से तेरी शरण माँगता हूँ।
५. सहीह मुस्लिम 2664
احْرِصْ عَلَى مَا يَنْفَعُكَ وَاسْتَعِنْ بِاللَّهِ وَلَا تَعْجِزْ
भावार्थ :
जो तुम्हारे लिए लाभदायक हो उसके लिए प्रयत्न करो, अल्लाह से सहायता माँगो और आलसी मत बनो।
६. क़ुरआन — सूरह अल-जुमुआ 62:10
فَإِذَا قُضِيَتِ الصَّلَاةُ فَانْتَشِرُوا فِي الْأَرْضِ وَابْتَغُوا مِنْ فَضْلِ اللَّهِ
भावार्थ :
नमाज़ के बाद धरती में फैल जाओ और अल्लाह की कृपा (रोज़ी) की तलाश करो।
७. सुनन इब्न माजह 214
الْكَسَلُ يُفْسِدُ الدُّنْيَا وَالْآخِرَةَ
भावार्थ :
आलस्य दुनिया और आख़िरत दोनों को बिगाड़ देता है।
८. क़ुरआन — सूरह अत-तौबा 9:105
وَقُلِ اعْمَلُوا فَسَيَرَى اللَّهُ عَمَلَكُمْ
भावार्थ :
कह दो— कर्म करो; अल्लाह तुम्हारे कर्मों को देखेगा।
इन इस्लामी शिक्षाओं का सार है। 
आलस्य छोड़कर परिश्रम, कर्म, आत्म-सुधार और निरन्तर प्रयास करना चाहिए; ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो स्वयं प्रयत्न करते हैं।

              सूफ़ी सन्तों में ‌प्रमाण-
          सूफ़ी सन्तों ने भी आलस्य 
(کاہلی),निष्क्रियता  अकर्मण्यता का विरोध करके मेहनत (محنت), मुजाहदा (مجاهدة), जागरूकता और निरन्तर साधना पर बल दिया है। कुछ प्रसिद्ध सूफ़ी कथन —
१. जलालुद्दीन रूमी
بی‌رنج مبر گنج میسّر نمی‌شود
भावार्थ :
कष्ट और परिश्रम के बिना खज़ाना प्राप्त नहीं होता।
२. शेख सादी शीराज़ी
نابرده رنج گنج میسّر نمی‌شود
भावार्थ :
परिश्रम किए बिना सफलता नहीं मिलती।
३. हाफ़िज़ शीराज़ी
رهرو آن است که آهسته و پیوسته رود
भावार्थ :
सच्चा पथिक वही है जो निरन्तर आगे बढ़ता रहे।
४. बायज़ीद बिस्तामी
مرد را کار باید نه خواب
भावार्थ :
मनुष्य के लिए कर्म आवश्यक है, केवल निद्रा नहीं।
५. अब्दुल कादिर जीलानी
لا تكسل في طلب الحق
भावार्थ :
सत्य की खोज में आलस्य मत करो।
६. निज़ामुद्दीन औलिया
کارِ مردان روشنی دل است
भावार्थ :
पुरुषार्थी लोगों का कार्य हृदय को प्रकाशमान करता है।
७. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
خدمت و محنت راهِ حقیقت است
भावार्थ :
सेवा और परिश्रम ही सत्य का मार्ग है।
८. शम्स तबरेज़
در راه عشق خواب حرام است
भावार्थ :
साधना और प्रेम के मार्ग में आलस्य उचित नहीं।
९. फरीदुद्दीन अत्तार
هر که جوید عاقبت یابد
भावार्थ :
जो निरन्तर खोज और प्रयास करता है, वह अंततः पा लेता है।
१०. बुल्ले शाह
جاگن والے لبھ ہی لیندے
भावार्थ :
जो जागते और प्रयत्न करते हैं, वही प्राप्त करते हैं।
११. अमीर ख़ुसरो
تو حرکت کن، برکت آید
भावार्थ :
तुम प्रयास करो, बरकत स्वयं आएगी।
१२. शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई
ستن کان سواءِ سُتي، جاڳڻ وارن جيت
भावार्थ :
जो सोए रहते हैं वे पीछे रह जाते हैं; जागने वाले ही जीतते हैं।
इन सूफ़ी शिक्षाओं का मुख्य संदेश है —
आलस्य आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों उन्नतियों में बाधा है; निरन्तर साधना, सेवा, परिश्रम और जागरूकता से ही सत्य और सफलता प्राप्त होती है
सिक्ख धर्म में प्रमाण --
सिक्ख धर्म में भी आलस्य-त्याग, परिश्रम, कर्म, सेवा और निरन्तर पुरुषार्थ पर बहुत बल दिया गया है। गुरु ग्रन्थ साहिब तथा गुरुवाणी से प्रमाण —
१. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग ४७४
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।
ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
भावार्थ :
जो मेहनत करके कमाता है और उसमें से बाँटता है, वही सच्चे मार्ग को पहचानता है।
२. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग १२४५
ਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ ਜੀਉ ਤੂੰ ਕਮਾਵਦਿਆ ਸੁਖ ਭੁੰਚੁ ॥
भावार्थ :
हे जीव! उद्योग और कर्म करते हुए जीवन के सुख प्राप्त कर।
३. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग ५२२
ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ।
ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
भावार्थ :
संसार में सेवा और कर्म करते हुए ही सम्मान प्राप्त होता है।
४. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग १४१२
ਕਿਰਤ ਕਰੋ ਨਾਮ ਜਪੋ ਵੰਡ ਛਕੋ ॥
भावार्थ :
मेहनत से कमाओ, ईश्वर का स्मरण करो और बाँटकर खाओ।
५. गुरु ग्रन्थ sahib, अंग ३१६
ਉਠਦਿਆ ਬਹਦਿਆ ਸਵਦਿਆ ਸੁਖੁ ਸੋਈ ।
भावार्थ :
उठते-बैठते और कर्म करते हुए प्रभु-स्मरण में लगे रहो।
६. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग २६
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ।
भावार्थ :
जिन्होंने परिश्रम और साधना के साथ प्रभु का स्मरण किया, वे सफल हुए।
७. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग ८३
ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ ।
ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥
भावार्थ :
निःस्वार्थ सेवा और कर्म करने वाले को परमात्मा प्राप्त होता है।
८. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग १०२७
ਆਲਸੁ ਤਜਿ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਕਰਿ ।
भावार्थ :
आलस्य त्यागकर प्रभु-भक्ति और कर्म में लगो।
९. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग ६४२
ਸਚਹੁ ਓਰੈ ਸਭੁ ਕੋ ਉਪਰਿ ਸਚੁ ਆਚਾਰੁ ॥
भावार्थ :
सत्य से भी श्रेष्ठ सत्याचरण और कर्म है।
इन सिक्ख शिक्षाओं का मुख्य संदेश है —
मेहनत (ਕਿਰਤ), सेवा, जागरूकता, निःस्वार्थ कर्म और आलस्य-त्याग से ही आध्यात्मिक तथा सांसारिक उन्नति होती है।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
 ईसाई धर्म में भी आलस्य-त्याग, परिश्रम, कर्मठता और जागरूक जीवन पर बहुत बल दिया गया है। बाइबल से  प्रमाण —
१. Proverbs 6:6
“Go to the ant, thou sluggard; consider her ways, and be wise.”
भावार्थ :
हे आलसी! चींटी से सीख और बुद्धिमान बन।
२. Proverbs 10:4
“He becometh poor that dealeth with a slack hand: but the hand of the diligent maketh rich.”
भावार्थ :
आलसी निर्धन होता है, परिश्रमी समृद्ध होता है।
३. Proverbs 12:24
“The hand of the diligent shall bear rule: but the slothful shall be under tribute.”
भावार्थ :
परिश्रमी व्यक्ति नेतृत्व करता है, आलसी दूसरों के अधीन रहता है।
४. Colossians 3:23
“And whatsoever ye do, do it heartily, as to the Lord, and not unto men.”
भावार्थ :
जो भी कार्य करो, पूरे मन से करो, मानो वह ईश्वर के लिए हो।
५. 2 Thessalonians 3:10
“If any would not work, neither should he eat.”
भावार्थ :
जो कार्य नहीं करना चाहता, उसे भोजन का अधिकार भी नहीं।
६. Ecclesiastes 9:10
“Whatsoever thy hand findeth to do, do it with thy might.”
भावार्थ :
जो कार्य तुम्हारे हाथ में आए, उसे पूरी शक्ति से करो।
७. Galatians 6:9
“And let us not be weary in well doing: for in due season we shall reap, if we faint not.”
भावार्थ :
अच्छे कर्म करते हुए थको मत; उचित समय पर उसका फल मिलेगा।
८. Hebrews 6:11-12
“Be not slothful, but followers of them who through faith and patience inherit the promises.”
भावार्थ :
आलसी मत बनो; धैर्य और विश्वास से आगे बढ़ने वालों का अनुसरण करो।
९. Proverbs 14:23
“In all labour there is profit: but the talk of the lips tendeth only to penury.”
भावार्थ :
हर परिश्रम में लाभ है, केवल बातें करने से दरिद्रता आती है।
इन ईसाई शिक्षाओं का मुख्य संदेश है —
आलस्य त्यागकर परिश्रम, कर्मठता, धैर्य और समर्पण के साथ जीवन जीना चाहिए; ईश्वर कर्मशील और निष्ठावान व्यक्ति को आशीर्वाद देता है।
जैन धर्म में प्रमाण --
जैन धर्म में भी आलस्य (पमाद), प्रमाद, अकर्मण्यता और असंयम को आध्यात्मिक पतन का कारण माना गया है। जैन आगमों और ग्रन्थों में पुरुषार्थ, जागरूकता, तप और सतत साधना पर बहुत बल दिया गया है। कुछ प्रमाण —
१. उत्तराध्ययन सूत्र ४.३६
समयं गोयम मा पमायए।
भावार्थ :
हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद (आलस्य) मत करो।
२. उत्तराध्ययन सूत्र १०.१
अप्पा चेव दमेयव्वो अप्पा हु खलु दुद्दमो।
भावार्थ :
मनुष्य को स्वयं अपने ऊपर संयम और पुरुषार्थ करना चाहिए।
३. आचारांग सूत्र १.२.३
मा पमायए।
भावार्थ :
प्रमाद और आलस्य मत करो।
४. दशवैकालिक सूत्र ४.१
धम्मो मंगळमुक्किट्ठं।
भावार्थ :
श्रेष्ठ धर्म वही है जो जागरूक आचरण और संयम से युक्त हो।
५. तत्त्वार्थसूत्र ९.६
प्रमादो बन्धहेतुः।
भावार्थ :
प्रमाद (आलस्य) कर्म-बन्धन का कारण है।
६. समयसार १५३
जो उवओगे सो जीवो।
भावार्थ :
जो जागरूक और सतत प्रयत्नशील है वही वास्तविक जीव है।
७. नियमसार ७८
अप्पाणं उवजोगेण जिणे।
भावार्थ :
मनुष्य को जागरूक पुरुषार्थ से स्वयं को जीतना चाहिए।
८. भगवती सूत्र ७.२
जागरंताणं कम्मं खवेइ।
भावार्थ :
जाग्रत और पुरुषार्थी साधक कर्मों का क्षय करता है।
९. रत्नकरण्ड श्रावकाचार १२७
आलस्सं परिहरए।
भावार्थ :
आलस्य का त्याग करना चाहिए।
इन जैन शिक्षाओं का सार है —
प्रमाद और आलस्य बन्धन तथा पतन के कारण हैं; जागरूकता, संयम, तप, पुरुषार्थ और सतत साधना से आत्मोन्नति होती है। 
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
बौद्ध धर्म में भी आलस्य (थीन-मिद्ध), प्रमाद और अकर्मण्यता को दुःख तथा पतन का कारण माना गया है। धम्मपद तथा अन्य पाली ग्रन्थों में अप्रमाद, पुरुषार्थ और जागरूकता पर बहुत बल दिया गया है। कुछ प्रमाण —
१. धम्मपद २१
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥
भावार्थ :
अप्रमाद अमृत का मार्ग है और प्रमाद मृत्यु का मार्ग। जागरूक लोग नष्ट नहीं होते।
२. धम्मपद २८
उट्ठानेनप्पमादेन सं्यमेन दमेन च।
दीपं कयिराथ मेधावी यं ओघो नाभिकीरे॥
भावार्थ :
उत्थान, अप्रमाद, संयम और आत्मनिग्रह से बुद्धिमान ऐसा दीप बनाता है जिसे संसार डुबा नहीं सकता।
३. धम्मपद ११२
यो च वस्ससतं जीवे कुसीतो हीनवीरियो।
एकाहं जीवितं सेय्यो वीरियमारभतो दळ्हं॥
भावार्थ :
आलसी होकर सौ वर्ष जीने से अच्छा है एक दिन उत्साह और परिश्रम से जीना।
४. धम्मपद २९
अप्पमत्तो पमत्तेसु सुत्तेसु बहुजागरो।
भावार्थ :
जाग्रत और अप्रमादी व्यक्ति प्रमादियों के बीच भी सदैव सचेत रहता है।
५. सुत्तनिपात ३३१
उट्ठाहानेन अप्पमादेन।
भावार्थ :
उत्थान और अप्रमाद से ही उन्नति होती है।
६. संयुक्त निकाय १.४
आरद्धवीरिये पहितत्ते।
भावार्थ :
जिसका वीर्य (पुरुषार्थ) जाग्रत है और मन प्रयत्नशील है, वही आगे बढ़ता है।
७. अंगुत्तर निकाय ७.६१
नत्थि आलसियस्स मग्गो।
भावार्थ :
आलसी व्यक्ति के लिए कोई मार्ग नहीं।
८. महापरिनिब्बान सुत्त २.३३
वयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।
भावार्थ :
सभी संस्कार नश्वर हैं; अप्रमादपूर्वक अपना कल्याण करो।
९. इतिवुत्तक ४५
वीरियारम्भो सुखावहो।
भावार्थ :
पुरुषार्थ और उत्साह सुख देने वाले हैं।
इन बौद्ध शिक्षाओं का मुख्य संदेश है —
अप्रमाद, जागरूकता, उत्साह, संयम और निरन्तर पुरुषार्थ ही उन्नति तथा निर्वाण का मार्ग है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
यहूदी धर्म में भी आलस्य का विरोध और परिश्रम, जागरूकता तथा कर्मशीलता का समर्थन किया गया है। तनाख (हिब्रू बाइबल) तथा यहूदी ज्ञानग्रन्थों से कुछ प्रमाण —
१. मिश्ले (Proverbs) 6:6
לֵךְ אֶל־נְמָלָה עָצֵל רְאֵה דְרָכֶיהָ וַחֲכָם׃
भावार्थ :
हे आलसी! चींटी के पास जा, उसके मार्ग देख और बुद्धिमान बन।
२. मिश्ले (Proverbs) 10:4
רָאשׁ עֹשֶׂה כַף־רְמִיָּה וְיַד חָרוּצִים תַּעֲשִׁיר׃
भावार्थ :
आलसी हाथ निर्धन बनाते हैं, परिश्रमी हाथ समृद्धि लाते हैं।
३. मिश्ले (Proverbs) 12:24
יַד־חָרוּצִים תִּמְשׁוֹל וּרְמִיָּה תִּהְיֶה לָמַס׃
भावार्थ :
परिश्रमी व्यक्ति शासन करता है, आलसी दास बनता है।
४. कोहेलेत (Ecclesiastes) 9:10
כֹּל אֲשֶׁר תִּמְצָא יָדְךָ לַעֲשׂוֹת בְּכֹחֲךָ עֲשֵׂה׃
भावार्थ :
जो कार्य तुम्हारे हाथ में आए, उसे पूरी शक्ति से करो।
५. मिश्ले (Proverbs) 13:4
מִתְאַוָּה וָאַיִן נַפְשׁוֹ עָצֵל וְנֶפֶשׁ חָרוּצִים תְּדֻשָּׁן׃
भावार्थ :
आलसी केवल इच्छा करता है पर पाता नहीं; परिश्रमी व्यक्ति तृप्त होता है।
६. तेहिलिम (Psalms) 128:2
יְגִיעַ כַּפֶּיךָ כִּי תֹאכֵל אַשְׁרֶיךָ וְטוֹב לָךְ׃
भावार्थ :
तुम अपने परिश्रम का फल खाओगे; तुम धन्य और सुखी रहोगे।
७. पिरके अवोत 2:15
הַיּוֹם קָצֵר וְהַמְּלָאכָה מְרֻבָּה...
भावार्थ :
जीवन छोटा है और कार्य बहुत अधिक हैं; इसलिए परिश्रम करो।
८. पिरके अवोत 2:21
לֹא עָלֶיךָ הַמְּלָאכָה לִגְמֹר וְלֹא אַתָּה בֶּן־חוֹרִין לִבָּטֵל מִמֶּנָּה׃
भावार्थ :
कार्य पूरा करना केवल तुम्हारा दायित्व नहीं, पर उससे विमुख होना भी उचित नहीं।
९. मिश्ले (Proverbs) 14:23
בְּכָל־עֶצֶב יִהְיֶה מוֹתָר וּדְבַר־שְׂפָתַיִם אַךְ־לְמַחְסוֹר׃
भावार्थ :
हर परिश्रम में लाभ है, केवल बातों से अभाव बढ़ता है।
इन यहूदी शिक्षाओं का सार है —
आलस्य पतन का कारण है; परिश्रम, कर्मठता, जागरूकता और निरन्तर प्रयास से ही समृद्धि और ईश्वर-कृपा प्राप्त होती है।पारसी धर्म में प्रमाण --
पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में भी 
सत्यकर्म, परिश्रम, जागरूकता और धर्मयुक्त कर्म पर बहुत बल दिया गया है। अवेस्ता तथा ज़रथुष्ट्र परम्परा से कुछ प्रमाण —
१. यश्न 30.2
𐬀𐬙 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀
𐬀𐬌𐬠𐬌𐬌𐬀𐬙𐬀𐬨 𐬚𐬀𐬯𐬥𐬀𐬨
भावार्थ :
सुनो, समझो और जागरूक होकर सत्य के मार्ग का चयन करो।
२. यश्न 34.14
𐬀𐬱𐬀𐬎𐬥𐬀𐬨 𐬎𐬯𐬙𐬀𐬥𐬀𐬨
भावार्थ :
धर्म और सत्य के लिए सतत प्रयत्न करो।
३. वेंदीदाद 3.6
𐬎𐬭𐬎𐬎𐬀𐬥𐬀 𐬯𐬞𐬀𐬥𐬙𐬀
भावार्थ :
उद्योग और श्रम पवित्र कर्म हैं।
४. यश्न 43.1
𐬎𐬯𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
भावार्थ :
जाग्रत और सत्कर्मी जीवन ही आनन्द देता है।
५. खोर्दे अवेस्ता — अषेम वोहू
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬎𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
भावार्थ :
श्रेष्ठ धर्म वही है जो सत्य और उत्तम कर्म से युक्त हो।
६. गाथा 51.22
𐬟𐬭𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬎𐬯𐬙𐬀𐬥𐬀
भावार्थ :
मनुष्य को धर्ममार्ग में निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए।
७. यश्न 47.6
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
भावार्थ :
सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म अपनाओ।
८. वेंदीदाद 4.1
𐬚𐬀𐬭𐬆𐬥𐬀 𐬀𐬱𐬀𐬊𐬥𐬀
भावार्थ :
धर्मयुक्त कर्म ही मनुष्य को महान बनाते हैं।
इन पारसी शिक्षाओं का मुख्य संदेश है —
सद्कर्म, जागरूकता, उद्योग, सत्य और निरन्तर प्रयत्न से ही धर्म और जीवन की उन्नति होती है; 
ताओ धर्म में प्रमाण --
आलस्य और निष्क्रियता से दूर रहना चाहिए। ताओ (Dao / Tao) धर्म में संतुलित कर्म, सजगता, आत्म-अनुशासन और निरन्तर साधना पर बल दिया गया है। यद्यपि ताओ मत “वू-वेइ” (無為) अर्थात् स्वाभाविक कर्म की शिक्षा देता है, फिर भी वह आलस्य या अकर्मण्यता का समर्थन नहीं करता। ताओ ते चिंग तथा अन्य ताओवादी ग्रन्थों से प्रमाण —
१. ताओ ते चिंग अध्याय ६४
千里之行,始於足下。
भावार्थ :
हज़ार मील की यात्रा भी एक कदम से आरम्भ होती है।
२. ताओ ते चिंग अध्याय ३३
自勝者強。
भावार्थ :
जो स्वयं पर विजय प्राप्त करता है वही वास्तव में शक्तिशाली है।
३. ताओ ते चिंग अध्याय १५
孰能濁以靜之徐清。
भावार्थ :
जो धैर्य और साधना से अशान्ति को शांत कर सके वही ज्ञानी है।
४. ताओ ते चिंग अध्याय ४८
為學日益,為道日損。
भावार्थ :
विद्या के लिए प्रतिदिन प्रयास आवश्यक है।
५. 莊子 (झुआंगज़ी) अध्याय १९
水滴石穿。
भावार्थ :
निरन्तर प्रयास से जल की बूंद भी पत्थर को भेद देती है।
६. 列子 (लीएज़ी) अध्याय ५
勤能補拙。
भावार्थ :
परिश्रम कमी को भी पूरा कर देता है।
७. ताओ ते चिंग अध्याय २४
自見者不明,自是者不彰。
भावार्थ :
अहंकार और जड़ता से ज्ञान प्राप्त नहीं होता।
८. 淮南子 (ह्वैनानज़ी) अध्याय ९
不積跬步,無以至千里。
भावार्थ :
छोटे-छोटे सतत कदमों के बिना बड़ी उपलब्धि संभव नहीं।
९. 莊子 (झुआंगज़ी) अध्याय ६
形勞而不休則弊。
भावार्थ :
असंतुलित जीवन और जड़ता दोनों ही हानिकारक हैं; संतुलित कर्म आवश्यक है।
इन ताओवादी शिक्षाओं का सार है —
संतुलित कर्म, निरन्तर अभ्यास, आत्म-अनुशासन और सजगता से उन्नति होती है; आलस्य और जड़ता से नहीं।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --
कन्फ्यूशियस (Confucian) 
परम्परा में परिश्रम, आत्म-संयम, निरन्तर अध्ययन, जागरूकता और कर्मठता पर बहुत बल दिया गया है। लुन्यू (Analects) तथा अन्य कन्फ्यूशियस ग्रन्थों से प्रमाण —
१. लुन्यू (Analects) 1.1
學而時習之,不亦說乎?
भावार्थ :
सीखी हुई बातों का निरन्तर अभ्यास करना आनंददायक है।
२. लुन्यू (Analects) 4.17
見賢思齊焉,見不賢而內自省也。
भावार्थ :
श्रेष्ठ लोगों को देखकर स्वयं को सुधारने का प्रयास करो।
३. लुन्यू (Analects) 8.17
敏而好學,不恥下問。
भावार्थ :
परिश्रमी और अध्ययनशील बनो तथा सीखने में संकोच न करो।
४. मेंगज़ी (Mencius) 2A:2
天將降大任於是人也,必先苦其心志,勞其筋骨。
भावार्थ :
महान कार्य से पहले मनुष्य को परिश्रम और कठिनाइयों से गुजरना पड़ता है।
५. लिजी (Book of Rites) अध्याय 18
玉不琢,不成器;人不學,不知道。
भावार्थ :
जैसे तराशे बिना रत्न उपयोगी नहीं बनता, वैसे अध्ययन और प्रयास बिना मनुष्य पूर्ण नहीं बनता।
६. शुजिंग (Book of Documents) अध्याय 5
功崇惟志,業廣惟勤。
भावार्थ :
महान उपलब्धियाँ संकल्प और परिश्रम से प्राप्त होती हैं।
७. लुन्यू (Analects) 15.31
工欲善其事,必先利其器。
भावार्थ :
जो व्यक्ति कार्य को उत्तम करना चाहता है, उसे पहले स्वयं को तैयार करना चाहिए।
८. मेंगज़ी (Mencius) 6B:15
生於憂患,死於安樂。
भावार्थ :
मनुष्य संघर्ष और जागरूकता से उन्नति करता है, अत्यधिक आराम से पतन होता है।
९. द ग्रेट लर्निंग 1
自天子以至於庶人,壹是皆以修身為本。
भावार्थ :
राजा से लेकर सामान्य व्यक्ति तक, सभी के लिए आत्म-सुधार और अनुशासन ही मूल है।
इन कन्फ्यूशियस शिक्षाओं का मुख्य संदेश है —
निरन्तर अध्ययन, आत्म-सुधार, परिश्रम, अनुशासन और कर्मठता से ही व्यक्ति महान बनता है; 
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
आलस्य और अत्यधिक सुख-भोग पतन का शिन्तो (Shintō) परम्परा में शुद्धता, कर्मनिष्ठा, जागरूकता, अनुशासन और निरन्तर प्रयास को महत्त्व दिया गया है। कोजिकी, निहोन शोकी तथा शिन्तो परम्पराओं से कुछ प्रमाण 
१. कोजिकी
勤しみて怠ることなかれ。
भावार्थ :
परिश्रम करो और आलस्य मत करो।
२. निहोन शोकी
誠を尽くして務めよ。
भावार्थ :
पूर्ण निष्ठा और ईमानदारी से अपने कार्य करो।
३. शिन्तो नोऱितो
清き明き心を以て励め。
भावार्थ :
शुद्ध और उज्ज्वल मन से परिश्रम करो।
४. कोजिकी
日々に新たに勤むべし。
भावार्थ :
प्रतिदिन नए उत्साह से कर्म करना चाहिए।
५. निहोन शोकी
怠れば道は開けず。
भावार्थ :
आलस्य करने से मार्ग नहीं खुलता।
६. शिन्तो उपदेश संग्रह
心を正しくして業に励め。
भावार्थ :
मन को शुद्ध रखकर अपने कार्य में लगो।
७. शिन्तो नोऱितो
神は勤勉なる者を助く。
भावार्थ :
देवता परिश्रमी व्यक्ति की सहायता करते हैं।
८. कोजिकी
努め励みて国を治む。
भावार्थ :
प्रयत्न और परिश्रम से ही समाज और राष्ट्र का कल्याण होता है।
९. शिन्तो नैतिक उपदेश
誠ある者に福来たる。
भावार्थ :
सच्चे और कर्मशील व्यक्ति के पास ही कल्याण आता है।
इन शिन्तो शिक्षाओं का सार है —
शुद्ध मन, परिश्रम, अनुशासन, निष्ठा और निरन्तर कर्म से ही व्यक्ति तथा समाज का कल्याण होता है; 
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
आलस्य-त्याग, पुरुषार्थ, आत्म-अनुशासन और कर्मशीलता के विषय में यूनानी दर्शन (Greek Philosophy) से  प्रमाण —
१. अरस्तू — Nicomachean Ethics
Ἡμεῖς γὰρ ἐσμὲν ἃ πράττομεν κατὰ συνήθειαν.
भावार्थ :
मनुष्य वही बनता है जो वह निरन्तर कर्म करता है।
२. सुकरात
Μὴ ἀργός γίνου.
भावार्थ :
आलसी मत बनो।
३. एपिक्टेटस — Discourses
Πρῶτον μάθε τὸ νόημα τοῦ τί θέλεις εἶναι, εἶτα ποίει ὅ,τι δεῖ.
भावार्थ :
पहले तय करो कि तुम्हें क्या बनना है, फिर उसी अनुसार कर्म करो।
४. मार्कस ऑरेलियस — Meditations 5.1
Ἐπὶ τὸ ἔργον ἀνθρώπου ἐγήγερσαι.
भावार्थ :
तुम मनुष्य के कर्म के लिए जागे हो।
५. हेसिओड — Works and Days
Ἔργον δ᾽ οὐδὲν ὄνειδος, ἀεργίη δέ τ᾽ ὄνειδος.
भावार्थ :
परिश्रम लज्जाजनक नहीं; आलस्य ही लज्जाजनक है।
६. प्लेटो — Republic
Ἀρχὴ παντὸς ἔργου μέγιστον.
भावार्थ :
किसी भी कार्य का आरम्भ सबसे महत्वपूर्ण होता है।
७. डेमोक्रिटस
Οἱ πόνοι τῶν ἔργων γλυκεῖς.
भावार्थ :
परिश्रम का कष्ट अंततः मधुर फल देता है।
८. पाइथागोरस
Μηδὲν ἀμελεῖν.
भावार्थ :
किसी भी कर्तव्य की उपेक्षा मत करो।
९. एंटिस्थनीज
Διὰ πόνων τὰ καλά.
भावार्थ :
श्रेष्ठ वस्तुएँ परिश्रम से प्राप्त होती हैं।
इन यूनानी दार्शनिक शिक्षाओं का मुख्य संदेश है —
आलस्य पतन का कारण है; आत्म-अनुशासन, निरन्तर कर्म, अभ्यास और पुरुषार्थ से ही उत्कृष्टता तथा सद्गुण प्राप्त होते हैं।
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