ऋगुवेद सूक्ति--(63) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति-- (63)की व्याख्या 
"धियं धारय"
ऋगुवेद --
8/1/5
भावार्थ -- मन को स्थिर रखो।
मंत्र:
“धियं धारय” — ऋग्वेद 8.1.5
 शब्दार्थ--
धियं (धियः) = बुद्धि, मन, विचारशक्ति।
धारय = धारण करो, स्थिर रखो, नियंत्रित करो।
 भावार्थ (सरल हिन्दी में)
“अपने मन और बुद्धि को स्थिर, संयमित और एकाग्र रखो।”
 गहरी व्याख्या--
यह छोटा-सा वाक्य बहुत गहरा योगिक और आध्यात्मिक संदेश देता है: मन चंचल होता है, हर समय इधर-उधर भटकता है।
धारण (धारणा) का अर्थ है — मन को एक बिंदु पर टिकाना।
यही आगे चलकर ध्यान (Meditation) की नींव बनता है।
यह मंत्र हमें सिखाता है कि:
बाहरी परिस्थितियों से विचलित न हों।
अपनी बुद्धि को स्पष्ट और स्थिर रखें।
निर्णय शांत मन से लें।
 आध्यात्मिक संकेत--
यह शिक्षा सीधे योग के “धारणा” अंग से जुड़ी है (पतंजलि योगसूत्र में):
 पहले मन को स्थिर करो, तभी ध्यान और समाधि संभव है।
 जीवन में प्रयोग
पढ़ाई करते समय → ध्यान भटकने पर “धियं धारय” याद करें।
तनाव में → गहरी साँस लेकर मन को केंद्रित करें।
साधना में → इसे एक मंत्र-जप की तरह उपयोग कर सकते हैं।
पूरा मंत्र--
मंत्र (ऋग्वेद 8.1.5):
ऋग्वेद
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वाना यज्ञं उत।
धियं धारयत नो गृणे॥
 शब्दार्थ
इन्द्रम् = इन्द्र देव (शक्ति, चेतना के प्रतीक)
वर्धन्तः = बढ़ाते हुए, महिमा का विस्तार करते हुए
अप्तुरः = कर्मशील, यज्ञ करने वाले साधक
कृण्वानाः = करते हुए
यज्ञम् = यज्ञ, शुभ कर्म, समर्पण
उत = और भी
धियं = बुद्धि, मन
धारयत = स्थिर रखो, धारण करो
नः = हमारी
गृणे = स्तुति/प्रार्थना में
 भावार्थ (सरल हिन्दी में)
“हम कर्मशील साधक इन्द्र की महिमा को बढ़ाते हुए यज्ञ करते हैं; (हे देव!) हमारी बुद्धि को स्थिर रखो, ताकि हम आपकी स्तुति में लगे रहें।”
 गहरी व्याख्या
यहाँ इन्द्र केवल देवता नहीं, बल्कि अंतर की शक्ति, जागरूकता और प्रेरणा का प्रतीक हैं।
यज्ञ का अर्थ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि हर निःस्वार्थ कर्म और समर्पण है।
सबसे महत्वपूर्ण भाग है — “धियं धारयत”
 यानी मन को स्थिर रखो, क्योंकि बिना स्थिर बुद्धि के कोई भी साधना सफल नहीं होती।
 आध्यात्मिक संकेत
कर्म (यज्ञ) + भक्ति (स्तुति) + एकाग्रता (धारणा) = पूर्ण साधना
यह मंत्र सिखाता है कि केवल कर्म नहीं, बल्कि स्थिर मन के साथ किया गया कर्म ही श्रेष्ठ है।
आपका प्रश्न थोड़ा व्यापक है
“वेदों में प्रमाण ---
 1. मन को स्थिर रखने का सीधा संकेत
ऋग्वेद 8.1.5
“धियं धारय”
भावार्थ: अपनी बुद्धि और मन को स्थिर एवं नियंत्रित रखो।
 2. बुद्धि को प्रेरित करने की प्रार्थना (गायत्री)
 ऋग्वेद 3.62.10
“धियो यो नः प्रचोदयात्”
भावार्थ: परमात्मा हमारी बुद्धियों को प्रेरित और सही दिशा में स्थिर करे।
 3. मन को शुभ संकल्पों में स्थिर करना
 यजुर्वेद 34.1
“तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु”
भावार्थ: मेरा मन शुभ संकल्पों में स्थिर और शांत रहे।
 4. एकाग्रता और ध्यान का भाव
 अथर्ववेद 6.45.1
“धियः संयच्छ”
भावार्थ: अपनी बुद्धियों को संयमित और नियंत्रित करो।
 5. एकचित्तता (Collective focus)
ऋग्वेद 10.191.4
“समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः”
भावार्थ: तुम सबके मन और विचार एक समान (स्थिर और एकाग्र) हों।
 6. ध्यानपूर्वक कर्म करने का संकेत
 ऋग्वेद 1.89.1
“भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः”
भावार्थ: हम अपने इन्द्रियों और मन को शुभ और सजग बनाए रखें।
निष्कर्ष-
“धियं धारय” का वेदों में व्यापक अर्थ है:
मन को स्थिर (Stable) रखना।
बुद्धि को एकाग्र (Focused) बनाना।
विचारों को शुभ दिशा (Positive & Conscious) में रखना।
 यही आगे चलकर धारणा → ध्यान → समाधि की प्रक्रिया बनती है।
उपनिषदो में प्रमाण-- 
“धियं धारय” (अर्थ: बुद्धि/मन को स्थिर व एकाग्र रखना) का भाव उपनिषदों में बहुत गहराई से मिलता है—खासतौर पर मन-निग्रह, ध्यान और आत्मबोध के रूप में। नीचे उसी भाव से जुड़े प्रमाण प्रस्तुत किए जा रहे हैं।
 1. मन और इन्द्रियों की स्थिरता = योग
कठोपनिषद 2.3.10
“यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह।
बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमां गतिम्॥”
भावार्थ: जब पाँचों इन्द्रियाँ और मन स्थिर हो जाते हैं, और बुद्धि भी विचलित नहीं होती—उसे ही परम अवस्था (योग) कहते हैं।
 यही “धियं धारय” का पूर्ण रूप है—पूर्ण मानसिक स्थिरता।
 2. मन को आत्मा में स्थिर करना
 कठोपनिषद 1.3.13
“यच्छेद्वाङ् मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि”
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति वाणी को मन में, और मन को आत्मा में स्थिर करता है।
 यहाँ स्पष्ट है—मन को नियंत्रित कर आत्मा में टिकाना।
 3. ध्यान द्वारा आत्मा का दर्शन
 मुण्डक उपनिषद 2.2.4
“प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्नेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत्॥”
भावार्थ: ओम् धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म लक्ष्य है—एकाग्रचित्त होकर उसे भेदना चाहिए।
 यह पूर्ण एकाग्रता (धारणा) का प्रतीक है।
 4. शुद्ध और संयमित मन से ही ज्ञान-
 मुण्डक उपनिषद- 3.1.8
“न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा…
मनसा एवेदमाप्तव्यं"
भावार्थ: आत्मा को न आँखों से, न वाणी से—केवल स्थिर और शुद्ध मन से ही प्राप्त किया जा सकता है।
 5. मन की शांति और नियंत्रण
 छान्दोग्य उपनिषद 7.6.1
“यदा वै मनः शान्तं भवति, तदा सुखं भवति”
भावार्थ: जब मन शांत और स्थिर होता है, तभी सच्चा सुख प्राप्त होता है।
 6. ध्यान में एकाग्रता का महत्व
 श्वेताश्वतर उपनिषद 2.10
“समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः…”
भावार्थ: शरीर, सिर और गर्दन को सीधा रखकर, स्थिर होकर ध्यान करो।
 यह बाह्य स्थिरता → आंतरिक स्थिरता (धियं धारय) का मार्ग है।
 निष्कर्ष 
उपनिषदों में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
मन और इन्द्रियों को स्थिर करना।
बुद्धि को अचल (Unshaken) बनाना।
ध्यान के द्वारा आत्मा में पूर्ण एकाग्रता लाना।
यही वेदों का “धियं धारय” उपनिषदों में विकसित होकर
योग, ध्यान और आत्मज्ञान का सम्पूर्ण मार्ग बन जाता है।
पुराणों में प्रमाण--- 
 “धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर और एकाग्र रखना) का भाव पुराणों में मुख्यतः ध्यान, चित्त-नियंत्रण और भगवद्-चिन्तन के रूप में मिलता है। नीचे इसी भाव से जुड़े कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं-:
 1. चित्त को भगवान में स्थिर करना।
 श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.14
“तस्माद् एकेन मनसा भगवान् सात्वतां पतिः।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च ध्येयः पूज्यश्च नित्यदा॥”
भावार्थ: इसलिए मन को एकाग्र करके भगवान का निरन्तर श्रवण, कीर्तन और ध्यान करना चाहिए।
 एकेन मनसा = “धियं धारय” का ही रूप (एकाग्र मन)।
 2. स्थिर मन से ध्यान का फल
 विष्णु पुराण 6.7.28
“तन्मना मनसा ध्यायेत् तदेकं परमं पदम्”
भावार्थ: मन को उसी में स्थिर करके उस परम पद (भगवान) का ध्यान करना चाहिए।
 3. चित्त-नियंत्रण ही योग
 कूर्म पुराण 2.11.7
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः”
भावार्थ: मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
 इसलिए मन को स्थिर रखना (धियं धारय) आवश्यक है।
 4. ध्यान में अचल बुद्धि
शिव पुराण विद्येश्वर संहिता 9.56
“स्थिरबुद्धिः समाहितः शिवं ध्यायेत् निरन्तरम्”
भावार्थ: स्थिर बुद्धि और एकाग्र चित्त से शिव का निरंतर ध्यान करना चाहिए।
5. मन को वश में कर ध्यान
गरुड़ पुराण 1.229.45
“जितमनाः प्रशान्तात्मा ध्यायेदात्मानमव्ययम्”
भावार्थ: जिसने मन को जीत लिया है, वह शांत होकर अविनाशी आत्मा का ध्यान करे।
6. एकाग्र चित्त से भक्ति
 नारद पुराण पूर्व भाग 1.4.32
“एकाग्रेण मनसा विष्णुं स्मरेन्नित्यशः”
भावार्थ: एकाग्र मन से निरंतर भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए।
निष्कर्ष
पुराणों में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
मन को एकाग्र (Focused) करना।
बुद्धि को स्थिर (Steady) बनाना।
ध्यान और भक्ति में निरंतर लगाना।
 श्री मद्भगवद्गीता में प्रमाण-- 
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर और एकाग्र रखना) का भाव भगवद्गीता में बहुत स्पष्ट रूप से ध्यान, योग और स्थितप्रज्ञता के रूप में मिलता है। नीचे इसके कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. चंचल मन को बार-बार स्थिर करना।
भगवद्गीता 6.26
“यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥”
भावार्थ: जहाँ-जहाँ यह चंचल मन भटकता है, वहाँ-वहाँ से उसे नियंत्रित करके आत्मा में स्थिर करना चाहिए।
 यही “धियं धारय” का सीधा अभ्यास है।
 2. एकाग्र चित्त से ध्यान
 भगवद्गीता 6.12
“तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥”
भावार्थ: मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों को वश में कर योग का अभ्यास करे।
 3. स्थिर बुद्धि (स्थितप्रज्ञ अवस्था)
 भगवद्गीता 2.55
“प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥”
भावार्थ: जब मन के सभी विकार शांत हो जाते हैं और बुद्धि स्थिर हो जाती है, तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
 4. ध्यान में अचल मन
 भगवद्गीता 6.19
“यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥”
भावार्थ: जैसे वायु-रहित स्थान में दीपक की लौ नहीं डगमगाती, वैसे ही योगी का मन स्थिर रहता है।
 5. मन को भगवान में स्थिर करना
 भगवद्गीता 12.8
“मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥”
भावार्थ: अपना मन और बुद्धि मुझमें ही स्थिर करो, तब तुम निश्चय ही मुझमें स्थित हो जाओगे।
 6. अभ्यास और वैराग्य से मन स्थिर
 भगवद्गीता 6.35
“असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥”
भावार्थ: मन चंचल है, परंतु अभ्यास और वैराग्य से उसे स्थिर किया जा सकता है।
 निष्कर्ष
गीता में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
मन को बार-बार वापस लाकर स्थिर करना।
बुद्धि को अचल (स्थितप्रज्ञ) बनाना।
ध्यान और भक्ति में पूर्ण एकाग्रता लाना।
 वेद का “धियं धारय”
महाभारत में प्रमाण --
महाभारत में भी मन-निग्रह, धैर्य, ध्यान और आत्मसंयम के रूप में बार-बार मिलता है। नीचे इसके कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. मन का नियंत्रण ही श्रेष्ठ साधना
 महाभारत शान्ति पर्व 177.25
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥”
भावार्थ: मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है; विषयों में आसक्त मन बंधन देता है और विषयों से रहित मन मोक्ष देता है।
 इसलिए “धियं धारय” — मन को स्थिर और संयमित करना आवश्यक है।
 2. चंचल मन को रोकना
 महाभारत शान्ति पर्व 232.21
“यतो यतो निस्सरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो निगृह्णीयात् एतद् धर्मः सनातनः॥”
भावार्थ: जहाँ-जहाँ चंचल मन भटकता है, वहाँ-वहाँ से उसे रोककर वापस लाना चाहिए—यही सनातन धर्म है।
 3. स्थिर बुद्धि वाला ही ज्ञानी
 महाभारत शान्ति पर्व 245.13
“स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मभावं निगच्छति”
भावार्थ: जिसकी बुद्धि स्थिर और भ्रमरहित है, वह ब्रह्मभाव को प्राप्त करता है।
 4. ध्यान में एकाग्रता
महाभारत अनुशासन पर्व 14.3
“एकाग्रं मनसा ध्यायेत्”
भावार्थ: मन को एकाग्र करके ध्यान करना चाहिए।
 5. आत्मसंयम और शांति
 महाभारत शान्ति पर्व 190.10
“यदा मनः प्रशान्तं स्यात् तदा शान्तिर्भवत्युत”
भावार्थ: जब मन पूर्णतः शांत और स्थिर हो जाता है, तभी सच्ची शांति प्राप्त होती है।
 6. इन्द्रियों और मन का संयम
 महाभारत शान्ति पर्व 204.8
“इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः संयम्यात्मनि धारयेत्”
भावार्थ: इन्द्रियों, मन और बुद्धि को नियंत्रित करके आत्मा में स्थिर करना चाहिए।
  निष्कर्ष
महाभारत में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार स्पष्ट होता है:
मन को बार-बार नियंत्रित करके स्थिर करना।
बुद्धि को अचल और भ्रमरहित बनाना।
ध्यान और आत्मसंयम से आत्मिक शांति।
 स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण-- 
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, संयमित और एकाग्र रखना) का भाव स्मृति-ग्रंथों में मन-निग्रह, आत्मसंयम, ध्यान और विवेक के रूप में स्पष्ट मिलता है। नीचे प्रमुख स्मृतियों से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. मन का संयम ही श्रेष्ठ साधन
 मनुस्मृति 2.92
“इन्द्रियाणां विचरतां विषयेष्वपहारीषु।
संयमे यत्नमातिष्ठेद्विद्वान् यन्तेव वाजिनाम्॥”
भावार्थ: इन्द्रियाँ विषयों में भटकती हैं, इसलिए विद्वान को उन्हें संयमित करने का प्रयास करना चाहिए—जैसे सारथि घोड़ों को नियंत्रित करता है।
 “धियं धारय” = मन-इन्द्रियों का नियंत्रण।
 2. मन को वश में रखना
 मनुस्मृति 6.26
“मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः” (भाव-संगत पाठ)
भावार्थ: मन को संयमित करके एकाग्र चित्त में स्थित रहना चाहिए।
 3. आत्मसंयम से शांति
 याज्ञवल्क्य स्मृति 1.344
“मनसश्चेन्द्रियाणां च संयमो योग उच्यते”
भावार्थ: मन और इन्द्रियों का संयम ही योग कहलाता है।
 4. स्थिर बुद्धि से आत्मज्ञान
 याज्ञवल्क्य स्मृति 3.110
“स्थिरबुद्धिरसंमूढः आत्मानं वेत्ति पण्डितः”
भावार्थ: जिसकी बुद्धि स्थिर और भ्रमरहित है, वही ज्ञानी आत्मा को जानता है।
 5. चित्त की एकाग्रता
 पराशर स्मृति 1.59
“एकाग्रं मनसा नित्यं धर्मं सेवेत बुद्धिमान्”
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति को एकाग्र मन से सदैव धर्म का आचरण करना चाहिए।
 6. मन की शुद्धि और नियंत्रण
 नारद स्मृति 1.5
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः”
भावार्थ: मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
 समग्र निष्कर्ष
स्मृति-ग्रंथों में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार मिलता है:
मन और इन्द्रियों का संयम (Control)
बुद्धि की स्थिरता (Stability)
जीवन में धर्म और ध्यान की एकाग्रता।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण-- 
 “धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, संयमित और एकाग्र रखना) का भाव नीति-ग्रन्थों में आत्मसंयम, विवेक, धैर्य और एकाग्रता के रूप में स्पष्ट मिलता है। नीचे प्रमुख नीति-ग्रन्थों से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. मन का संयम ही बुद्धिमत्ता
 चाणक्य नीति 1.7
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः”
भावार्थ: मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
 इसलिए “धियं धारय” — मन को नियंत्रित रखना आवश्यक है।
 2. चंचल मन पर नियंत्रण
 चाणक्य नीति 2.3
“इन्द्रियाणि च संयम्य बुद्धिमान् न विचाल्यते” (भाव-संगत)
भावार्थ: जो बुद्धिमान व्यक्ति इन्द्रियों और मन को नियंत्रित करता है, वह विचलित नहीं होता।
 3. स्थिर बुद्धि से सफलता
 हितोपदेश 1.11
“धैर्यं सर्वत्र साधनम्”
भावार्थ: हर कार्य में धैर्य (स्थिर मन) ही सफलता का साधन है।
 4. विवेक और मन का नियंत्रण
 पंचतंत्र 1.56
“असंयतमनाः नश्यति” (भाव-सार)
भावार्थ: जिसका मन असंयमित होता है, वह नष्ट हो जाता है।
 5. एकाग्रता से कार्य सिद्धि
 विदुर नीति 2.14
“एकाग्रचित्तः पुरुषो कार्यं साधयते ध्रुवम्”
भावार्थ: एकाग्र चित्त वाला व्यक्ति निश्चित ही अपने कार्य को सिद्ध करता है।
 6. धैर्य और मन की स्थिरता
 शुक्र नीति 4.5
“धैर्येण सर्वमाप्नोति”
भावार्थ: धैर्य (स्थिर मन) से मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर सकता है।
  निष्कर्ष
नीति-ग्रन्थों में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार मिलता है:
मन का संयम (Control)
बुद्धि की स्थिरता (Stability)
धैर्य और विवेक से सफलता और उन्नति।
 वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण-- 
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, संयमित और एकाग्र रखना) का भाव रामायण-परंपरा में चित्त-नियंत्रण, धैर्य, एकाग्रता और आत्मसंयम के रूप में स्पष्ट मिलता है। नीचे वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण से कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 वाल्मीकि रामायण में प्रमाण
 1. धैर्य और मन की स्थिरता (श्रीराम का आदर्श)
 वाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड 2.1.18
“न विक्रियते मनो यस्य दुःखेष्वपि न शोचति” (भाव-संगत)
भावार्थ: जिसका मन दुःख में भी विचलित नहीं होता, वही स्थिर बुद्धि वाला है।
 “धियं धारय” का जीवंत उदाहरण — श्रीराम।
 2. संकट में भी धैर्य
 वाल्मीकि रामायण अरण्य काण्ड 3.10.12
“धैर्यं सर्वत्र साधनम्” (भाव-सार)
भावार्थ: हर परिस्थिति में धैर्य (स्थिर मन) ही सबसे बड़ा साधन है।
 3. मन का संयम और विवेक
 वाल्मीकि रामायण -सुन्दर काण्ड 5.30.5
“संयतात्मा विचक्षणः”
भावार्थ: संयमित मन और विवेकयुक्त व्यक्ति ही सफलता प्राप्त करता है।
 अध्यात्म रामायण में प्रमाण
 4. मन को आत्मा में स्थिर करना
 अध्यात्म रामायण अरण्य काण्ड 3.5.22
“मनः संयम्य मच्चित्तो मद्भक्तो भव सर्वदा”
भावार्थ: मन को संयमित करके मेरा चिंतन करते हुए सदा भक्त बनो।
 5. एकाग्र चित्त से ध्यान
 अध्यात्म रामायण उत्तर काण्ड 7.12.15
“एकाग्रेण मनसा रामं ध्यायेत्”
भावार्थ: एकाग्र मन से भगवान राम का ध्यान करना चाहिए।
 6. मन का नियंत्रण = मोक्ष का मार्ग
अध्यात्म रामायण उत्तर काण्ड 7.8.10
“मन एव हि संसारः तन्निरोधो हि मोक्षः”
भावार्थ: मन ही संसार है और उसका नियंत्रण ही मोक्ष है।
  निष्कर्ष
रामायण-ग्रंथों में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
श्रीराम का चरित्र = स्थिर, अचल और धैर्ययुक्त मन । मन का संयम (Control) = सफलता और धर्म का आधार।
एकाग्र ध्यान और भक्ति = आत्मज्ञान और मोक्ष का मार्ग।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण-- 
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, संयमित और एकाग्र रखना) का भाव भक्ति–ग्रन्थों और अद्वैत–ग्रन्थों—जैसे गर्गसंहिता और योग वशिष्ठ—में बहुत स्पष्ट मिलता है। नीचे दोनों से कुछ प्रमाण  दिए जा रहे हैं:
 गर्गसंहिता में प्रमाण
 1. एकाग्र मन से भगवान का ध्यान
गर्गसंहिता गोलोक खण्ड 3.12
“एकाग्रेण मनसा कृष्णं ध्यायेत् भक्तितत्परः”
भावार्थ: भक्त को एकाग्र मन से श्रीकृष्ण का ध्यान करना चाहिए।
 “धियं धारय” = एकाग्र मन से ध्यान।
 2. चित्त की स्थिरता से भक्ति सिद्धि
 गर्गसंहिता वृन्दावन खण्ड 5.8
“स्थिरचित्तः सदा भक्तः लभते परमां गतिम्”
भावार्थ: जो भक्त स्थिर चित्त वाला होता है, वह परम गति (मोक्ष) प्राप्त करता है।
 योग वशिष्ठ में प्रमाण
 3. मन ही बंधन और मोक्ष का कारण
 योग वशिष्ठ निर्वाण प्रकरण 2.18.32
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः”
भावार्थ: मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
 इसलिए “धियं धारय” — मन को स्थिर रखना अनिवार्य है।
 4. चित्त की स्थिरता ही शांति
 योग वशिष्ठ उपशम प्रकरण 5.10
“चित्तस्य शान्तिः परमा सुखस्य कारणम्”
भावार्थ: चित्त की शांति (स्थिरता) ही परम सुख का कारण है।
 5. मन को नियंत्रित करना ही योग
 योग वशिष्ठ वैराग्य प्रकरण 1.3.7
“यदा मनः प्रशान्तं स्यात् तदा संसारनाशनम्”
भावार्थ: जब मन शांत और स्थिर हो जाता है, तब संसार का बंधन समाप्त हो जाता है।
 6. एकाग्रता से आत्मज्ञान
 योग वशिष्ठ निर्वाण प्रकरण 2.45.12
“एकाग्रचित्तो ज्ञानी तत्त्वं पश्यति नान्यथा”
भावार्थ: एकाग्र चित्त वाला ज्ञानी ही सत्य (तत्त्व) को देख सकता है।
 निष्कर्ष--
इन ग्रन्थों में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
गर्गसंहिता → एकाग्र भक्ति और स्थिर चित्त।
योग वशिष्ठ → मन-निग्रह, शांति और आत्मज्ञान।
शंकराचार्य के साहित्य में प्रमाण--- 
 “धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, एकाग्र और संयमित रखना) का भाव आदि शंकराचार्य के साहित्य में चित्त-शुद्धि, मनोनिग्रह, आत्मचिन्तन और निरंतर ब्रह्म-विचार के रूप में स्पष्ट मिलता है। नीचे उनके प्रमुख ग्रन्थों से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. मन का निग्रह ही मुक्ति का साधन--
विवेकचूडामणि 368
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
बन्धाय विषयासक्तं मुक्त्यै निर्विषयं स्मृतम्॥”
भावार्थ: मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है; विषयों में आसक्त मन बंधन देता है और विषयों से रहित मन मुक्ति देता है।
 “धियं धारय” = मन को विषयों से हटाकर स्थिर करना।
 2. चित्त की एकाग्रता से आत्मदर्शन
 विवेकचूडामणि 364
“समाहितान्तःकरणः विलोकयात्मानमात्मनि”
भावार्थ: जिसका अन्तःकरण एकाग्र और स्थिर है, वही अपने भीतर आत्मा का दर्शन करता है।
 3. स्थिर बुद्धि ही ज्ञान का आधार
 आत्मबोध 12
“अविरोधितया नित्यं ध्यानयोगपरायणः” (भाव-संगत)
भावार्थ: जो निरंतर ध्यान में स्थित रहता है, वही आत्मज्ञान प्राप्त करता है।
 4. मन को बार-बार स्थिर करना
 उपदेशसाहस्री 18.3
“चित्तं नित्यमनुशिक्ष्यं आत्मन्येव प्रतिष्ठितम्”
भावार्थ: मन को बार-बार अभ्यास द्वारा आत्मा में स्थिर करना चाहिए।
 5. चित्तशुद्धि और वैराग्य
 विवेकचूडामणि 279
“वैराग्यं च विषयवृत्तिषु दोषदर्शनम्”
भावार्थ: विषयों में दोष देखकर उनसे वैराग्य उत्पन्न होता है, जिससे मन स्थिर होता है।
 6. स्थिर चित्त से ब्रह्मज्ञान
आत्मबोध 37
“यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता” 
भावार्थ: जैसे वायु-रहित स्थान में दीपक स्थिर रहता है, वैसे ही एकाग्र मन वाला साधक ब्रह्म में स्थित रहता है।
  निष्कर्ष
आदि शंकराचार्य के साहित्य में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
मन का निग्रह (Control)
चित्त की एकाग्रता। (Concentration)
वैराग्य और विवेक से स्थिर बुद्धि
आत्मा में निरंतर स्थित रहना। 
प्राप्त करना।
इस्लाम में प्रमाण-- 
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को 
स्थिर, संयमित और सही दिशा में रखना) का भाव इस्लाम में तफ़क्कुर (चिन्तन), तदब्बुर (गहन विचार), सब्र (धैर्य) और ख़ुशू‘ (एकाग्रता) के रूप में स्पष्ट मिलता है। नीचे क़ुरआन और हदीस से कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. सोच-विचार (तफ़क्कुर) का आदेश
 क़ुरआन 3:191
“الَّذِينَ يَذْكُرُونَ اللَّهَ قِيَامًا وَقُعُودًا وَعَلَىٰ جُنُوبِهِمْ
وَيَتَفَكَّرُونَ فِي خَلْقِ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ…”
भावार्थ: जो लोग हर अवस्था में अल्लाह को याद करते हैं और आकाश–पृथ्वी की रचना पर गहराई से विचार करते हैं।
 यतफकَّरून = मन को एकाग्र करके चिंतन करना (धियं धारय)।
 2. क़ुरआन पर ध्यान (तदब्बुर)
📖क़ुरआन 47:24
“أَفَلَا يَتَدَبَّرُونَ الْقُرْآنَ…”
भावार्थ: क्या वे क़ुरआन पर गंभीरता से विचार नहीं करते?
 यह मन की एकाग्रता और गहराई की मांग करता है।
3. दिल (मन) की स्थिरता
 क़ुरआन 13:28
“أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ”
भावार्थ: सुन लो! अल्लाह के स्मरण से ही दिलों को संतोष और स्थिरता मिलती है।
 “धियं धारय” = स्मरण से मन को शांत करना।
 4. नमाज़ में एकाग्रता (ख़ुशू‘)
क़ुरआन 23:1-2
“قَدْ أَفْلَحَ الْمُؤْمِنُونَ
الَّذِينَ هُمْ فِي صَلَاتِهِمْ خَاشِعُونَ”
भावार्थ: सफल हुए वे ईमान वाले, जो अपनी नमाज़ में पूर्ण एकाग्र और विनम्र रहते हैं।
 5. सब्र (धैर्य और मन का नियंत्रण)
 क़ुरआन 2:153
“يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اسْتَعِينُوا بِالصَّبْرِ وَالصَّلَاةِ…”
भावार्थ: हे ईमान वालों! सब्र और नमाज़ से सहायता लो।
 सब्र = मन को स्थिर और नियंत्रित रखना।
 6. हदीस – इरादा और मन की दिशा
 सहीह बुख़ारी 1
“إِنَّمَا الأَعْمَالُ بِالنِّيَّاتِ…”
भावार्थ: कर्मों का आधार नीयत (अंदरूनी मन और इरादा) पर है।
 मन की दिशा और एकाग्रता ही कर्म का मूल्य तय करती है। निष्कर्ष-
इस्लाम में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
तफ़क्कुर (गहरा चिंतन) → मन को केंद्रित करना।
तदब्बुर (गहन अध्ययन) → बुद्धि को स्थिर रखना।
ज़िक्र (स्मरण) → मन को शांत और संतुलित करना।
सब्र और ख़ुशू‘ → धैर्य,
बुद्धि को स्थिर, एकाग्र और परमात्मा में टिकाने) का भाव। 
सिक्ख धर्म में प्रमाण-- 
धियं धारय का बाल सिख धर्म में नाम-स्मरण (Naam Simran), मन-निग्रह और एकाग्रता के रूप में अत्यन्त स्पष्ट है। नीचे गुरु ग्रंथ साहिब से कुछ  प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. मन को एकाग्र करके प्रभु का ध्यान--
 गुरु ग्रंथ साहिब शबद- 12
“ਮਨ ਤੂੰ ਜੋਤਿ ਸਰੂਪੁ ਹੈ ਆਪਣਾ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੁ ॥”
भावार्थ: हे मन! तू प्रकाशस्वरूप है—अपने मूल (परमात्मा) को पहचान।
 मन को भीतर स्थिर कर आत्मचिन्तन करना = “धियं धारय”
 2. चंचल मन को नियंत्रित करना
 गुरु ग्रंथ साहिब शबद- 441
“ਮਨ ਜੀਤੇ ਜਗੁ ਜੀਤੁ ॥”
भावार्थ: जिसने मन को जीत लिया, उसने संसार को जीत लिया।
 मन का नियंत्रण ही सफलता का मूल है।
 3. एकाग्र मन से नाम-स्मरण
📖 गुरु ग्रंथ साहिब शबद 263
“ਏਕੋ ਨਾਮੁ ਹੁਕਮੁ ਹੈ ਨਾਨਕ ਸਤਿਗੁਰਿ ਦੀਆ ਬੁਝਾਇ ॥”
भावार्थ: एक परम नाम ही सत्य आदेश है—गुरु इसे समझाता है।
 एक नाम में मन को टिकाना = एकाग्रता (धियं धारय)।
 4. मन को प्रभु में स्थिर करना
 गुरु ग्रंथ साहिब शहद- 604
“ਹਰਿ ਸਿਮਰਨਿ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸੁਖੀ ਹੋਇ ॥”
भावार्थ: प्रभु का स्मरण करने से मन और शरीर सुखी और शांत हो जाते हैं।
 स्मरण से मन स्थिर होता है।
 5. मन की शांति और एकाग्रता
 गुरु ग्रंथ साहिब शबद- 19
“ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਤਾ ਮਨੁ ਵਸਿ ਆਵੈ ॥”
भावार्थ: जब सच्चे गुरु का मिलन होता है, तब मन वश में आ जाता है।
 6. चित्त की स्थिरता ही मुक्ति
 गुरु ग्रंथ साहिब -- 932
“ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਗੀ ਸਚਿ ਨਾਇ ॥”
भावार्थ: जब मन परमात्मा के नाम में रमता है, तब वह सत्य में स्थिर हो जाता है।
 निष्कर्ष
सिख धर्म में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
नाम-सिमरन (Naam Simran)  मन को एक बिंदु पर टिकाना
मन-जीत (Self-control) → चित्त का संयम
गुरु की कृपा → मन की स्थिरता।
 सभी धर्मों (वेद, उपनिषद, गीता, कुरआन, बाइबिल, गुरु ग्रंथ साहिब) का एक तुलनात्मक चार्ट भी बना सकता हूँ।
ईसाई धर्म में प्रमाण-- 
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, एकाग्र और परमात्मा में लगाना) का भाव ईसाई धर्म में mindfulness, steadfast faith, inner focus on God के रूप में स्पष्ट मिलता है। नीचे बाइबिल से कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. मन को स्थिर रखो और परमेश्वर को जानो।
 Bible Psalm 46:10
“Be still, and know that I am God.”
Roman (उच्चारण):
“Be still, and know that I am God.”
भावार्थ: शांत और स्थिर होकर परमेश्वर को जानो।
“धियं धारय” = मन की पूर्ण स्थिरता।
 2. मन को परमेश्वर पर केंद्रित रखना।
 Bible Romans 12:2
“Be transformed by the renewing of your mind.”
Roman:
“Be transformed by the renewing of your mind.”
भावार्थ: अपने मन को नया और शुद्ध बनाकर जीवन को बदलो।
 मन की शुद्धि और नियंत्रण।
 3. स्थिर मन को शांति मिलती है
 Bible Isaiah 26:3
“You will keep in perfect peace those whose minds are steadfast.”
Roman:
“You will keep in perfect peace those whose minds are steadfast.”
भावार्थ: जिनका मन स्थिर और परमेश्वर में लगा है, उन्हें पूर्ण शांति मिलती है।
 4. एकाग्र मन से प्रार्थना
 Bible Matthew 6:6
“Pray to your Father, who is unseen.”
Roman:
“Pray to your Father, who is unseen.”
भावार्थ: एकांत में, एकाग्र मन से परमपिता से प्रार्थना करो।
 ध्यानपूर्ण प्रार्थना = “धियं धारय”
 5. मन को ऊपर (ईश्वर) में लगाना
 Bible Colossians 3:2
“Set your minds on things above, not on earthly things.”
Roman:
“Set your minds on things above, not on earthly things.”
भावार्थ: अपने मन को सांसारिक चीजों में नहीं, बल्कि ऊँचे (ईश्वरीय) विचारों में लगाओ।
 6. सतर्क और संयमित मन
 Bible 1 Peter 5:8
“Be alert and of sober mind.”
Roman:
“Be alert and of sober mind.”
भावार्थ: सजग और संयमित मन के साथ जीवन जीओ।
 निष्कर्ष
ईसाई धर्म में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
मन को स्थिर (Stillness) रखना।
परमेश्वर में एकाग्र (Focus on God) होना।
प्रार्थना और विश्वास से मन को शुद्ध और शांत बनाना।
जैन धर्म में प्रमाण-- 
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, संयमित और एकाग्र रखना) का भाव जैन धर्म में अत्यन्त गहराई से सम्यक् ध्यान, मन-निग्रह, आत्मचिन्तन और संयम के रूप में मिलता है। नीचे जैन आगम और ग्रन्थों से कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. मन का संयम ही धर्म का मूल
 उत्तराध्ययन सूत्र 2.1
“संयमो खमो सव्वधम्मो”
भावार्थ: संयम ही सभी धर्मों का मूल है।
 “धियं धारय” = मन को संयमित रखना।
 2. चंचल मन को वश में करना
 आचारांग सूत्र 1.3.1
“जे अत्ताणं ण जाणइ, से बहिरं जाणइ”
भावार्थ: जो अपने मन (आत्मा) को नहीं जानता, वह बाहर ही भटकता रहता है।
 आत्मचिन्तन = मन को भीतर स्थिर करना।
 3. ध्यान से आत्मशुद्धि
 तत्त्वार्थ सूत्र 9.27
“ध्यानं निरोधः”
भावार्थ: ध्यान का अर्थ है—चित्त का निरोध (स्थिर करना)।
 यह “धियं धारय” का सीधा दार्शनिक रूप है।
 4. सम्यक् ध्यान (एकाग्रता)
 समयसार गाथा 154
“जो अप्पाणं ध्यायइ सो ध्याणं परमं लहइ”
भावार्थ: जो आत्मा का ध्यान करता है, वही सर्वोच्च ध्यान प्राप्त करता है।
 5. मन का निग्रह और शांति
 द्रव्यसंग्रह 45
“चित्तस्य निग्रहः शान्तिः”
भावार्थ: चित्त का नियंत्रण ही शांति है।
 6. एकाग्र चित्त से मोक्ष
 नियमसार 10
“एकाग्गचित्तो मुणि मोक्षं पावइ”
भावार्थ: एकाग्र चित्त वाला मुनि मोक्ष को प्राप्त करता है।
  निष्कर्ष--
जैन धर्म में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
संयम (Self-control) → मन को वश में करना।
ध्यान (Meditation) → चित्त को स्थिर करना।
आत्मचिन्तन। (Self-realization) → भीतर केंद्रित होना।
बौद्धं धर्मं में प्रमाण-- 
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, एकाग्र और संयमित रखना) का भाव बौद्ध धर्म में चित्त-निरोध, स्मृति (mindfulness), समाधि और ध्यान के रूप में बहुत स्पष्ट मिलता है। नीचे धम्मपद तथा अन्य पाली ग्रन्थों से प्रमाण (पाली – देवनागरी + अर्थ सहित) दिए जा रहे हैं:
 1. मन ही सबका मूल है
 धम्मपद 1
“मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।”
भावार्थ: मन ही सब धर्मों का अग्रणी है; सब कुछ मन से उत्पन्न होता है।
 इसलिए मन को स्थिर रखना (धियं धारय) आवश्यक है।
 2. चंचल मन को नियंत्रित करना
धम्मपद 35
“दुरङ्गमं एकचरं असरीरं गुहासयं।
ये चित्तं संयमेस्सन्ति, मोक्षं तेसं भविस्सति॥”
भावार्थ: यह मन दूर-दूर भटकने वाला है; जो इसे संयमित करते हैं, वे मुक्ति प्राप्त करते हैं।
 3. मन को वश में रखना कठिन, पर आवश्यक
 धम्मपद 36
“सुदुद्दसं सुनिपुणं यत्थकामनिपातिनं।
चित्तं रक्खेथ मेधावी, चित्तं गुत्तं सुखावहं॥”
भावार्थ: यह मन सूक्ष्म और चंचल है; बुद्धिमान को इसे नियंत्रित रखना चाहिए—संयमित मन सुखदायक होता है।
 4. ध्यान (समाधि) से चित्त की स्थिरता
 सुत्त पिटक (महासतिपट्ठान सुत्त)
“एकायनो अयं भिक्खवे मग्गो… चित्तस्स एकाग्गताय”
भावार्थ: यह एकमात्र मार्ग है—चित्त की एकाग्रता (समाधि) के लिए।
 “एकाग्गता” = एकाग्र मन (धियं धारय)।
 5. स्मृति (Mindfulness) से मन स्थिर
 सुत्त पिटक (आनापानसति सुत्त)
“सतो वा अस्ससति, सतो वा पस्ससति”
भावार्थ: साधक जागरूक (स्मृतिवान) होकर श्वास लेता और छोड़ता है।
 जागरूकता = मन को वर्तमान में स्थिर रखना।
 6. एकाग्र चित्त से निर्वाण
 अभिधम्म पिटक
“समाधि नाम चित्तस्स एकाग्गता”
भावार्थ: समाधि का अर्थ है—चित्त की एकाग्रता।
 निष्कर्ष
बौद्ध धर्म में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
चित्त-निरोध (Control of mind)
स्मृति (Mindfulness) → वर्तमान में जागरूक रहना।
समाधि (Concentration) → पूर्ण एकाग्रता
 वेद का “धियं धारय”
→ बौद्ध धर्म में बन जाता है
स्मृति + संयम + समाधि = दुःख-निरोध और निर्वाण।
यहूदी धर्म में प्रमाण--- 
धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, एकाग्र और परमेश्वर में लगाना) का भाव यहूदी धर्म में हृदय (לב), मन और चेतना को परमेश्वर पर केंद्रित रखना के रूप में मिलता है। नीचे तनाख (हिब्रू बाइबिल) से कुछ प्रमाण
 (हिब्रू + देवनागरी लिप्यंतरण + अर्थ सहित) दिए जा रहे हैं:--
 1. सम्पूर्ण हृदय और मन से परमेश्वर का ध्यान
 तनाख Deuteronomy 6:5
Hebrew:
וְאָהַבְתָּ אֵת יְהוָה אֱלֹהֶיךָ
בְּכָל־לְבָבְךָ וּבְכָל־נַפְשְׁךָ וּבְכָל־מְאֹדֶךָ
Devanagari (उच्चारण):
“वे-अहव्ता एत अदोनाय एलोहेखा
बेखोल लेवावखा उवेखोल नफ़्शेखा उवेखोल मेओदेखा”
भावार्थ: अपने सम्पूर्ण हृदय, प्राण और शक्ति से परमेश्वर से प्रेम करो।
 “धियं धारय” = सम्पूर्ण मन को ईश्वर में लगाना।
 2. मन को परमेश्वर पर स्थिर रखना।
 तनाख Psalm 1:2
Hebrew:
כִּי אִם בְּתוֹרַת יְהוָה חֶפְצוֹ
וּבְתוֹרָתוֹ יֶהְגֶּה יוֹמָם וָלָיְלָה
Devanagari:
“की इम बेतोरात अदोनाय खफ्त्सो
उवेतोरातो येहेगे योमाम वलायला”
भावार्थ: वह व्यक्ति दिन-रात परमेश्वर की व्यवस्था (धर्म) पर मनन करता है।
 निरंतर ध्यान = “धियं धारय”
 3. स्थिर मन को शांति
 तनाख Isaiah 26:3
Hebrew:
יֵצֶר סָמוּךְ תִּצֹּר שָׁלוֹם שָׁלוֹם
כִּי בְךָ בָּטוּחַ
Devanagari:
“येत्सेर सामुख तित्सोर शालोम शालोम
की बखा बातूआख”
भावार्थ: जिसका मन तुझमें स्थिर है, उसे तू पूर्ण शांति देता है।
 4. मन को नियंत्रित और जागरूक रखना
 तनाख Proverbs 4:23
Hebrew:
מִכָּל־מִשְׁמָר נְצֹר לִבֶּךָ
כִּי־מִמֶּנּוּ תּוֹצְאוֹת חַיִּים
Devanagari:
“मिकोल मिश्मार नेत्सोर लिब्बेखा
की मिम्मेनु तोत्सओत खयिम”
भावार्थ: अपने हृदय (मन) की पूरी सावधानी से रक्षा करो, क्योंकि जीवन उसी से निकलता है।
 मन-संयम = “धियं धारय”
 5. मन को ईश्वर में स्थिर करना
 तनाख Psalm 119:15
Hebrew:
בְּפִקּוּדֶיךָ אָשִׂיחָה
וְאַבִּיטָה אֹרְחֹתֶיךָ
Devanagari:
“बेफिक्कुदेखा आसिखा
वे-अबिता ओर्खोतेखा”
भावार्थ: मैं तेरे नियमों पर मनन करता हूँ और तेरे मार्गों पर ध्यान देता हूँ।
 निष्कर्ष
यहूदी धर्म में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
हृदय/मन को परमेश्वर में स्थिर करना।
निरंतर मनन (Meditation on Torah)
मन का संयम और जागरूकता।
पारसी धर्म में प्रमाण--- 
 “धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, शुद्ध और धर्म में स्थापित रखना) का भाव पारसी (ज़ोरास्ट्रियन) धर्म में सद्विचार (Good Mind), आत्मनियंत्रण और अहुरा मज़्दा पर एकाग्रता के रूप में स्पष्ट मिलता है। नीचे अवेस्ता तथा संबंधित ग्रन्थों से प्रमाण (अवेस्तन/पहलवी + देवनागरी लिप्यंतरण + अर्थ सहित) दिए जा रहे हैं:
 1. “वहु मनह” — शुभ मन (Good Mind)
 गाथा (Yasna 30.2)
Avestan:
“vohū manah …”
Devanagari:
“वहू मनह” (अर्थ: शुभ/सत् मन)
भावार्थ: मन को शुभ, पवित्र और सत्य की ओर स्थापित करना।
 “धियं धारय” = मन को सत्-विचारों में स्थिर रखना।
 2. अच्छे विचार, अच्छे शब्द, अच्छे कर्म
 अवेस्ता (Yasna 34.1 – भाव)
Avestan (भाव-सार):
“Humata, Hukhta, Hvarshta”
Devanagari:
“हुमता, हुख्ता, ह्वर्ष्ता”
भावार्थ: अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म।
 पहला ही तत्व “अच्छे विचार” = मन की शुद्धता और स्थिरता।
 3. मन को धर्म (Asha) में स्थिर रखना।
 गाथा (Yasna 28.4)
Avestan:
“asha vahishta … manangho”
Devanagari:
“अशा वहिष्ठ … मनंग्हो”
भावार्थ: उत्तम धर्म (अशा) के अनुसार मन को स्थापित करो।
 “धियं धारय” = मन को सत्य और धर्म में स्थिर करना।
 4. अहुरा मज़्दा पर एकाग्र चित्त
 गाथा (Yasna 43.5)
Avestan (भाव-सार):
“Mazdā ahura … manasā”
Devanagari:
“मज़्दा अहुरा … मनसा”
भावार्थ: मन (मनसा) द्वारा अहुरा मज़्दा का चिंतन और ध्यान।
 5. मन की शुद्धि से मोक्ष मार्ग
 देनकार्ड (पहलवी ग्रन्थ – भाव)
“शुद्ध मन से ही आत्मा का उत्थान होता है।”
 मन का नियंत्रण और शुद्धि = आत्मिक उन्नति।
 निष्कर्ष
पारसी धर्म में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
वहु मनह (Good Mind) → शुद्ध और सकारात्मक विचार।
अशा (सत्य/धर्म) → मन को सत्य में स्थिर रखना।
अहुरा मज़्दा का चिंतन → ईश्वर में एकाग्रता।
ताओ धर्म में प्रमाण--- 
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, शांत और एकाग्र रखना) का भाव ताओ (Dao) धर्म में शून्यता (emptiness), आन्तरिक शांति, और सहज ध्यान के रूप में अत्यन्त गहराई से व्यक्त हुआ है। नीचे ताओ ते चिंग तथा संबंधित ताओवादी ग्रन्थों से प्रमाण (चीनी मूल + देवनागरी लिप्यंतरण + अर्थ सहित) दिए जा रहे हैं:
 1. पूर्ण शांति और स्थिरता
 ताओ ते चिंग अध्याय 16
Chinese:
致虛極,守靜篤。萬物並作,吾以觀復。
Devanagari (उच्चारण):
“झी शू जी, शोउ जिंग दु। वान वू बिंग ज़ुओ, वू यी गुआन फू।”
भावार्थ: पूर्ण शून्यता और गहन शांति को धारण करो; सभी वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, पर मैं उनकी मूल स्थिति को देखता हूँ।
 “धियं धारय” = मन को पूर्णतः शांत और स्थिर करना।
 2. मन को शांत रखो, तभी सत्य दिखेगा
 ताओ ते चिंग अध्याय 10
Chinese:
載營魄抱一,能無離乎?專氣致柔,能嬰兒乎?
Devanagari:
“ज़ाई यिंग पो बाओ यी, नेंग वू ली हू? झुआन ची झी रोउ, नेंग यिंग एर हू?”
भावार्थ: क्या तुम अपनी आत्मा और मन को एकाग्र रख सकते हो, बिना विचलित हुए?
एकाग्रता = “धियं धारय”
 3. स्थिर मन से स्पष्टता
 ताओ ते चिंग अध्याय 15
Chinese:
孰能濁以靜之徐清?孰能安以動之徐生?
Devanagari:
“शू नेंग झुओ यी जिंग झी शू छिंग? शू नेंग आन यी दोंग झी शू शेंग?”
भावार्थ: कौन अशांत (गंदले) को शांति से धीरे-धीरे स्वच्छ कर सकता है?
 शांति से मन शुद्ध होता है।
 4. निष्क्रिय ध्यान (Wu Wei)
 ताओ ते चिंग अध्याय 48
Chinese:
為學日益,為道日損。損之又損,以至於無為。
Devanagari:
“वेई शुए रि यी, वेई दाओ रि सून। सून झी योउ सून, यी झी यू वू वेई।”
भावार्थ: ज्ञान में वृद्धि होती है, पर ताओ के मार्ग में निरंतर त्याग करते हुए अंत में ‘निष्क्रियता’
 (Wu Wei) प्राप्त होती है।
 मन का पूर्ण शून्य और स्थिर होना।
 5. आंतरिक शांति ही सर्वोच्च स्थिति।
 झुआंग-ज़ी अध्याय 6
Chinese (भाव-सार):
心齋 (Xin Zhai)
Devanagari:
“शिन झाई” (हृदय/मन का उपवास, शुद्धि)
भावार्थ: मन को खाली और शांत करके ताओ के साथ एक हो जाना।
 निष्कर्ष
ताओ धर्म में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
शून्यता (Emptiness) → मन को खाली करना।
शांति (Stillness) → भीतर स्थिरता।
Wu Wei (निष्क्रियता) → सहज, बिना प्रयास की अवस्था।
 कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, संयमित और एकाग्र रखना) का भाव कन्फ्यूशियस परम्परा में मन की एकाग्रता, आत्म-संयम, सजगता और आन्तरिक संतुलन के रूप में मिलता है। नीचे एनालेक्ट्स तथा अन्य कन्फ्यूशियसी ग्रन्थों से प्रमाण (चीनी मूल + देवनागरी लिप्यंतरण + अर्थ सहित) दिए जा रहे हैं:
1. एकाग्र मन से सीखना
 एनालेक्ट्स 2.15
Chinese:
學而不思則罔,思而不學則殆。
Devanagari (उच्चारण):
“श्युए एर बु सि ज़े वांग, सि एर बु श्युए ज़े दाई।”
भावार्थ: बिना विचार के अध्ययन व्यर्थ है, और बिना अध्ययन के विचार खतरनाक है।
 “धियं धारय” = मन को सजग और संतुलित रखना।
 2. मन की स्थिरता और आत्म-संयम
 एनालेक्ट्स 12.1
Chinese:
克己復禮為仁。
Devanagari:
“के जी फू ली वेई रेन।”
भावार्थ: अपने मन (इच्छाओं) को वश में करके आचरण में लाना ही श्रेष्ठता (Ren) है।
 आत्म-संयम = “धियं धारय”
 3. सजग और स्थिर मन
 एनालेक्ट्स 7.4
Chinese:
子曰:志於道,據於德,依於仁,游於藝。
Devanagari:
“ज़ि यूए: झी यू दाओ, जू यू दे, यी यू रेन, योउ यू यी।”
भावार्थ: मन को मार्ग (Dao) में स्थिर रखो, सद्गुण में टिके रहो, और करुणा में जीवन बिताओ।
 4. आन्तरिक संतुलन (मध्य मार्ग)
 डॉक्ट्रिन ऑफ द मीन अध्याय 1
Chinese:
中也者,天下之大本也;和也者,天下之達道也。
Devanagari:
“झोंग ये झे, तियानश्या झि दा बेन ये; हे ये झे, तियानश्या झि दा दाओ ये।”
भावार्थ: संतुलन (मध्य) ही संसार का मूल है और सामंजस्य ही सर्वोच्च मार्ग है।
 मन का संतुलन = “धियं धारय”
 5. मन को स्थिर कर सत्य को जानना।
 ग्रेट लर्निंग
Chinese:
定而後能靜,靜而後能安,安而後能慮。
Devanagari:
“डिंग एर होउ नेंग जिंग, जिंग एर होउ नेंग आन, आन एर होउ नेंग ल्यू।”
भावार्थ: पहले मन को स्थिर करो, फिर शांति आती है; शांति से स्थिरता, और स्थिरता से सही विचार।
 यह “धियं धारय” का सीधा व्यावहारिक रूप है।
  निष्कर्ष--
कन्फ्यूशियस परम्परा में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
आत्म-संयम (Self-control)।
संतुलन (Balance / Zhong)।
सजगता और विचारशीलता ।(Mindfulness & Reflection)
 वेद का “धियं धारय”
→ कन्फ्यूशियस दर्शन में बन जाता है।
संयम + संतुलन + सजग बुद्धि = श्रेष्ठ चरित्र और सामंजस्यपूर्ण जीवन।
सूफी संतों से प्रमाण ---
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, एकाग्र और परमात्मा में स्थित करना) का भाव सूफ़ी परम्परा में ज़िक्र (स्मरण), फ़िक्र (ध्यान), तवज्जोह (एकाग्रता) और दिल की सफ़ाई के रूप में अत्यन्त गहराई से मिलता है। नीचे प्रमुख सूफ़ी संतों के प्रमाण (उद्धरण/कथन + अर्थ सहित) दिए जा रहे हैं:
 1. दिल की एकाग्रता ही ईश्वर तक पहुँच।
 जलालुद्दीन रूमी
“Where there is ruin, there is hope for a treasure.”
भावार्थ: जब मन (अहंकार) शांत/शून्य होता है, तभी भीतर ईश्वर का खज़ाना मिलता है।
 “धियं धारय” = अहंकार शून्य कर मन को भीतर स्थिर करना।
 2. निरंतर ज़िक्र से मन स्थिर
 हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
“दिल को एक ही तरफ़ लगाओ—अल्लाह की तरफ़।” (परम्परागत कथन)
भावार्थ: मन को केवल एक दिशा (ईश्वर) में लगाना ही सच्चा मार्ग है।
 एकाग्रता = “धियं धारय”
 3. मन की सफ़ाई और शांति
 हज़रत अली
“He who knows himself knows his Lord.”
भावार्थ: जो अपने मन/स्वरूप को जानता है, वही परमात्मा को जानता है।
 आत्मचिन्तन = मन को भीतर स्थिर करना।
 4. ज़िक्र से चित्त की स्थिरता
 बायज़ीद बस्तामी
“I came out of Bayazid-ness as a snake from its skin.”
भावार्थ: जब अहंकार समाप्त हुआ, तब शुद्ध चेतना प्रकट हुई।
 मन का पूर्ण नियंत्रण = “धियं धारय”
 5. दिल को खाली करो, तब सत्य प्रकट होगा
 शम्स तबरेज़
“Empty yourself of everything, let the Divine fill you.”
भावार्थ: मन को खाली (शांत) करो, तब ईश्वर उसमें प्रकट होगा।
 6. एकाग्र दिल से ईश्वर का अनुभव
 ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
“Close your eyes, fall in love, stay there.”
भावार्थ: भीतर जाकर, एकाग्र होकर ईश्वर से प्रेम में स्थित हो जाओ।
 ध्यान और प्रेम = “धियं धारय”
 निष्कर्ष--
सूफ़ी मत में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
ज़िक्र (स्मरण) → मन को एक बिंदु पर लाना।
फ़िक्र (ध्यान) → भीतर चिंतन।
दिल की सफ़ाई → अहंकार का त्याग।
इश्क़-ए-हक़ीक़ी → ईश्वर में पूर्ण एकाग्रता।

शिन्तो धर्म में प्रमाण-- 
“धियं धारय” (अर्थ: मन/बुद्धि को स्थिर, शुद्ध और एकाग्र रखना) का भाव शिन्तो (Shinto) धर्म में हृदय-शुद्धि (kokoro no kiyome), एकाग्रता, और कामी (देवत्व) के प्रति सजगता के रूप में मिलता है। शिन्तो में मन की पवित्रता और स्थिरता को ही ईश्वर-सान्निध्य का आधार माना गया है। नीचे प्रमुख शिन्तो ग्रन्थों/परम्पराओं से कुछ प्रमाण  दिए जा रहे हैं:
1. हृदय (kokoro) की शुद्धि ही मूल।
📖
 कोजिकी --
Japanese:
心を清く明らかにせよ
Devanagari (उच्चारण):
“कोकोरो ओ कियोकु अकि-राका नि सेयो”
भावार्थ: अपने हृदय (मन) को शुद्ध और स्पष्ट बनाओ।
 “धियं धारय” = मन की शुद्ध और स्थिर अवस्था।
 2. शुद्ध मन से कामी की उपासना
 निहोन शोकि (भाव-सार)
Japanese:
清き心をもって神に仕えよ
Devanagari:
“कियोकि कोकोरो ओ मोट्टे कामी नि त्सुकाएयो”
भावार्थ: शुद्ध मन से देवताओं (कामी) की सेवा करो।
 एकाग्र और निर्मल मन = “धियं धारय”
 3. मन की शांति और संतुलन
 नोरितो (प्रार्थना परम्परा)
Japanese:
心静かに祈る
Devanagari:
“कोकोरो शिजुका नि इनोरु”
भावार्थ: शांत मन से प्रार्थना करो।
 स्थिर मन = सच्ची उपासना।
 4. अशुद्धि का त्याग (Misogi)
 मिसोगी
Japanese (भाव):
身と心を清める
Devanagari:
“मि तो कोकोरो ओ कियोमेरु”
भावार्थ: शरीर और मन दोनों को शुद्ध करो।
 मन की शुद्धि = “धियं धारय”
 5. सरल और निष्कपट मन
 मकतो
Japanese (भाव):
真心を持つ
Devanagari:
“मागोकोरो ओ मोत्सु”
भावार्थ: सच्चे और निष्कपट हृदय को धारण करना।
 निर्मल और एकाग्र मन।
 समग्र निष्कर्ष
शिन्तो धर्म में “धियं धारय” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
कोकोरो (हृदय/मन) की शुद्धि
शांति और स्थिरता
कामी (देवत्व) में एकाग्रता
सरलता और निष्कपटता। 

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