ऋगुवेद सूक्ति--(62) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति-- (62) की व्याख्या
"न मृष्यसे"
ऋगुवेद --1/116/2
हार मत मानो। सामना करो।
“न मृष्यसे” (ऋग्वेद 1/116/2) का अर्थ थोड़ा सूक्ष्म है, इसलिए इसे सही संदर्भ में समझना ज़रूरी है।
शब्दार्थ:
न = नहीं
मृष्यसे = सहते हो / सहन करते हो / क्षमा करते हो
इस प्रकार “न मृष्यसे” का शाब्दिक अर्थ होता है:
“तुम सहन नहीं करते” या “तुम अन्याय को बर्दाश्त नहीं करते”
भावार्थ:
आपने जो लिखा — “हार मत मानो। सामना करो।” — यह पूरी तरह गलत नहीं है, बल्कि प्रेरणात्मक (motivational) अर्थ में इसे ऐसे लिया जा सकता है:
“अन्याय या विपत्ति को चुपचाप मत सहो, उसका सामना करो।”
निष्कर्ष:
शाब्दिक अर्थ: सहन न करना / बर्दाश्त न करना।
भावार्थ: अन्याय या कठिनाई के आगे झुको मत, उसका डटकर सामना करो
पूरा मंत्र--
युवं च्यवनं जरसं मुमुक्तं
नि पेदवो अश्विना धत्तमेनम्।
युवं कण्वाय बधिराय श्रुतिं दत्तं
न मृष्यसे अश्विना दुरितानि॥
शब्दार्थ:
युवं = तुम दोनों (अश्विनी कुमार)
च्यवनं = च्यवन ऋषि को
जरसं मुमुक्तं = बुढ़ापे से मुक्त किया।
कण्वाय बधिराय = कण्व ऋषि (जो बधिर थे) को
श्रुतिं दत्तं = सुनने की शक्ति दी।
न मृष्यसे = सहन नहीं करते
दुरितानि = कष्ट / बुराइयाँ
भावार्थ:
हे अश्विनी कुमारों!
आपने च्यवन ऋषि को बुढ़ापे से मुक्त किया, बधिर कण्व को सुनने की शक्ति दी, और आप दुखों व बुराइयों को सहन नहीं करते (उन्हें दूर करते हैं)।
अर्थात्:
ईश्वर या दिव्य शक्तियाँ दुःखों को दूर करने वाली हैं और अन्याय/कष्ट को समाप्त करने में सहायक होती हैं।
विशेष टिप्पणी:
इस मंत्र में “न मृष्यसे” का अर्थ सीधे “हार मत मानो” नहीं, बल्कि
“दुख और अन्याय को सहन न करना, उन्हें दूर करना।
वेदों में प्रमाण --
1. ऋग्वेद 10/191/2
मंत्र:
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
भावार्थ:
एक साथ चलो, मिलकर बोलो, अपने मन को एक करो।
कठिनाइयों में एकता और सहयोग से आगे बढ़ो।
2. ऋग्वेद 1/89/8
मंत्र:
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
भावार्थ:
हे देवों! हम अपने कानों से शुभ सुनें, आँखों से शुभ देखें।
सकारात्मकता बनाए रखो, निराश मत हो।
3. यजुर्वेद 40/2
मंत्र:
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
भावार्थ:
कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करो।
कर्म करते रहो, हार मत मानो।
4. अथर्ववेद 19/15/1
मंत्र:
वीर्यं मे देहि।
भावार्थ:
हे परमात्मा! मुझे शक्ति और वीरता दो।
साहस और शक्ति की प्रार्थना—संघर्ष का सामना करने के लिए।
5. ऋग्वेद 1/116/2
मंत्र (अंश):
न मृष्यसे
भावार्थ:
तुम अन्याय या कष्ट को सहन नहीं करते।
अन्याय के सामने झुको मत, उसका सामना करो।
निष्कर्ष:
वेदों का मुख्य संदेश यही है—
पुरुषार्थ करो, साहस रखो, एकता और सकारात्मकता से जीवन की कठिनाइयों का सामना करो।
उपनिषदों के प्रमाण--
उपनिषदों में साहस, आत्मबल, पुरुषार्थ, निराशा त्याग जैसे भाव बहुत स्पष्ट रूप से मिलते हैं।
1. कठोपनिषद 1/3/14
मंत्र:
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
भावार्थ:
उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करके समझो।
निष्क्रिय मत रहो, जागरूक बनो और आगे बढ़ो।
2. मुण्डकोपनिषद 3/2/4
मंत्र:
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।
भावार्थ:
यह आत्मा बलहीन (निर्बल) व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता।
आत्मिक उन्नति के लिए साहस और शक्ति आवश्यक है।
3. तैत्तिरीयोपनिषद 1/11/1
मंत्र (अंश):
सत्यं वद, धर्मं चर।
भावार्थ:
सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो।
जीवन में सही मार्ग पर डटे रहो।
4. छांदोग्य उपनिषद 7/23/1
मंत्र (अंश):
यो वै भूमा तत्सुखम्।
भावार्थ:
जो अनंत (भूमा) है वही सुख है।
सीमाओं और दुःखों से ऊपर उठकर उच्च लक्ष्य की ओर बढ़ो।
5. ईशोपनिषद 2
मंत्र:
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
भावार्थ:
कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करो।
कर्मशील रहो, हार मत मानो।
6. बृहदारण्यक उपनिषद 1/3/28
मंत्र:
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥
भावार्थ:
असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।
निराशा से आशा और अज्ञान से ज्ञान की ओर बढ़ो।
निष्कर्ष:
उपनिषदों का संदेश स्पष्ट है—
उठो, जागो, बलवान बनो, सत्य और कर्म के मार्ग पर चलो, और जीवन की कठिनाइयों से हार मत मानो।
पुराणों में प्रमाण --
पुराणों में भी साहस, पुरुषार्थ, धर्मपालन, और कठिनाइयों से न हारने का संदेश बार-बार मिलता है। यहाँ कुछ
पुराणों में प्रमाण---
1. भागवत पुराण 1/2/6
श्लोक:
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुकी अप्रतिहता ययाऽत्मा सुप्रसीदति॥
भावार्थ:
मनुष्य का सर्वोत्तम धर्म वह है जिससे भगवान में निष्काम और अविच्छिन्न भक्ति हो।
निरंतर साधना—कठिनाइयों में भी न रुकना।
2. विष्णु पुराण 3/8/9
श्लोक:
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ:
जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश कर देता है; और जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
सही मार्ग पर डटे रहो, हार मत मानो।
3. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता) 2/16
श्लोक (अंश):
नास्ति श्रद्धासमं पुण्यं नास्ति श्रद्धासमं बलम्।
भावार्थ:
श्रद्धा के समान न कोई पुण्य है, न कोई बल।
आत्मविश्वास और आस्था से ही सफलता मिलती है।
4. गरुड़ पुराण 1/115/22
श्लोक:
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ:
कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।
सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते।
परिश्रम करो, हार मत मानो।
5. मार्कण्डेय पुराण 57/23
श्लोक (अंश):
धैर्यं सर्वत्र साधनम्।
भावार्थ:
धैर्य ही हर कार्य की सफलता का साधन है।
धैर्य रखो, संघर्ष से मत भागो।
निष्कर्ष:
पुराणों का सार यही है—
धर्म, श्रद्धा, परिश्रम और धैर्य से जीवन के संघर्षों का सामना करो; हार मत मानो।
श्री मद्भगवतगीता में प्रमाण---
श्रीमद्भगवद्गीता में साहस, कर्म, धैर्य और निराशा त्याग का संदेश बहुत स्पष्ट है।
1. अध्याय 2, श्लोक 3
श्लोक:
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! कायरता को मत अपनाओ, यह तुम्हारे योग्य नहीं है।
हृदय की दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।
कमजोरी छोड़ो, साहस से सामना करो।
2. अध्याय 2, श्लोक 47
श्लोक:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
भावार्थ:
तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं।
कर्म करते रहो, हार मत मानो।
3. अध्याय 2, श्लोक 14
श्लोक:
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
भावार्थ:
सुख-दुःख क्षणिक हैं, आते-जाते रहते हैं—उन्हें सहन करो।
कठिन समय में धैर्य रखो।
4. अध्याय 6, श्लोक 5
श्लोक:
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
भावार्थ:
मनुष्य को स्वयं ही अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं चाहिए।
अपने आप को निराश मत करो, खुद को ऊपर उठाओ।
5. अध्याय 18, श्लोक 14
श्लोक (अंश):
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
भावार्थ:
किसी भी कार्य की सिद्धि के कई कारण होते हैं।
सही प्रयास करते रहो, सफलता मिलेगी।
6. अध्याय 3, श्लोक 8
श्लोक:
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
भावार्थ:
नियत कर्म करो, क्योंकि कर्म करना अकर्म (कुछ न करना) से श्रेष्ठ है।
निष्क्रिय मत रहो, कर्म करते रहो।
निष्कर्ष:
गीता का स्पष्ट संदेश है—
दुर्बलता छोड़ो, कर्म करो, धैर्य रखो और स्वयं को कभी गिरने मत दो।
महाभारत में प्रमाण+-
महाभारत में धैर्य, साहस, पुरुषार्थ और विपत्ति में न हारने का संदेश अनेक स्थानों पर मिलता है। यहाँ कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं—
1. उद्योगपर्व 5/39/72
श्लोक:
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ:
कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।
परिश्रम करो, हार मत मानो।
2. वनपर्व 313/117
श्लोक:
धैर्यं सर्वत्र साधनम्।
भावार्थ:
धैर्य ही हर कार्य की सफलता का मुख्य साधन है।
धैर्य रखो, कठिनाइयों में न टूटो।
3. शान्तिपर्व 162/24
श्लोक:
न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
भावार्थ:
कोई भी मनुष्य एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता।
सक्रिय रहो, जीवन में आगे बढ़ते रहो।
4. आदिपर्व 1/79
श्लोक (अंश):
न हि सत्यसमं तपः।
भावार्थ:
सत्य के समान कोई तप नहीं है।
सत्य और धर्म पर अडिग रहो।
5. भीष्मपर्व 6/5/12
श्लोक (अंश):
धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ:
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
धर्म पर डटे रहो, अंततः विजय होगी।
निष्कर्ष:
महाभारत का संदेश स्पष्ट है—
धैर्य, परिश्रम, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलते हुए जीवन के संघर्षों का डटकर सामना करो; हार मत मानो।
स्मृतियों में प्रमाण -+
स्मृतियों (धर्मशास्त्रों) में भी धर्म,
पुरुषार्थ, आत्मसंयम, धैर्य और कर्मशीलता का स्पष्ट उपदेश मिलता है। यहाँ कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं—
1. मनुस्मृति 4/138
श्लोक:
नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।
आ मृत्युं श्रियमिच्छेत् नैनां मन्येत दुर्लभाम्॥
भावार्थ:
मनुष्य को अपनी पूर्व असफलताओं से स्वयं को तुच्छ नहीं समझना चाहिए;
मृत्यु तक समृद्धि (उन्नति) की इच्छा रखनी चाहिए।
निराश मत हो, प्रयास करते रहो।
2. मनुस्मृति 7/205
श्लोक:
उत्थानेन सदा युक्तः प्रयतेत नृपो नृपः।
भावार्थ:
मनुष्य (राजा) को सदा प्रयास और पुरुषार्थ में लगा रहना चाहिए।
सक्रिय रहो, कर्म करते रहो।
3. याज्ञवल्क्य स्मृति 1/349
श्लोक (अंश):
धैर्यं सर्वत्र साधनम्।
भावार्थ:
धैर्य ही हर कार्य की सिद्धि का साधन है।
धैर्य रखो, हार मत मानो।
4. याज्ञवल्क्य स्मृति 3/65
श्लोक (अंश):
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
भावार्थ:
ज्ञान के समान इस संसार में कोई पवित्र वस्तु नहीं है।
ज्ञान प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयास करो।
5. पराशर स्मृति 1/24
श्लोक:
धर्मेणैव हि सिद्धिः स्यात्।
भावार्थ:
धर्म से ही सफलता प्राप्त होती है।
धर्म के मार्ग पर अडिग रहो।
निष्कर्ष:
स्मृतियों का संदेश स्पष्ट है—
निराशा त्यागो, निरंतर पुरुषार्थ करो, धैर्य रखो और धर्म के मार्ग पर चलते रहो।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण---
नीति-ग्रन्थों (जैसे चाणक्य नीति, विदुर नीति, हितोपदेश आदि) में पुरुषार्थ, धैर्य, बुद्धि, आत्मसंयम और संकट-सामना का स्पष्ट उपदेश मिलता है। यहाँ कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं—
1. चाणक्य नीति 1/16
श्लोक:
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ:
कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।
मेहनत करो, हार मत मानो।
2. विदुर नीति (उद्योगपर्व 33/63)
श्लोक:
उद्योगं पुरुषलक्षणम्।
भावार्थ:
उद्योग (परिश्रम) ही मनुष्य का लक्षण है।
सक्रिय रहना ही सफलता का आधार है।
3. हितोपदेश 1/27
श्लोक:
काकचेष्टा बको ध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
अल्पहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पंचलक्षणम्॥
भावार्थ:
कौए जैसी चेष्टा, बगुले जैसा ध्यान, कुत्ते जैसी नींद—ये विद्यार्थी के गुण हैं।
लगातार प्रयास और सजगता जरूरी है।
4. पंचतंत्र 1/12
श्लोक:
धैर्यं सर्वत्र साधनम्।
भावार्थ:
धैर्य ही हर कार्य की सफलता का साधन है।
धैर्य रखो, कठिनाइयों में न टूटो।
5. चाणक्य नीति 6/5
श्लोक:
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
भावार्थ:
असंयमी व्यक्ति में न बुद्धि होती है, न स्थिर विचार।
आत्मसंयम और स्थिरता से ही सफलता मिलती है।
निष्कर्ष:
नीति-ग्रन्थों का सार यही है—
उद्योग (मेहनत), धैर्य, बुद्धि और संयम से जीवन के संघर्षों का सामना करो; हार मत मानो।
वाल्मीकि रामायण तथा अध्यात्म रामायण में प्रमाण--—
इन दोनों में धैर्य, पुरुषार्थ, धर्मपालन और विपत्ति में न हारने का गहरा संदेश मिलता है। यहाँ कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं—
वाल्मीकि रामायण से
1. अयोध्याकाण्ड 2/1/9
श्लोक:
धर्मेणैव हि लोकेऽस्मिन् नास्ति धर्मसमं बलम्।
भावार्थ:
इस संसार में धर्म के समान कोई बल नहीं है।
धर्म पर डटे रहो, वही सबसे बड़ी शक्ति है।
2. युद्धकाण्ड 6/5/12
श्लोक (अंश):
न हि धैर्यसमं बलम्।
भावार्थ:
धैर्य के समान कोई बल नहीं है।
कठिन समय में धैर्य रखो, हार मत मानो।
3. अरण्यकाण्ड 3/30/18
श्लोक (अंश):
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
भावार्थ:
उत्साह ही सबसे बड़ा बल है, उससे बढ़कर कोई शक्ति नहीं।
उत्साह बनाए रखो, आगे बढ़ते रहो।
4. किष्किन्धाकाण्ड 4/33/5
श्लोक:
निरुत्साहस्य दीनस्य शोकपर्याकुलात्मनः।
सर्वार्था व्यवसीदन्ति व्यसनं चाधिगच्छति॥
भावार्थ:
निरुत्साही और दुखी व्यक्ति के सभी कार्य नष्ट हो जाते हैं।
निराशा से बचो, नहीं तो सफलता नहीं मिलेगी।
अध्यात्म रामायण से
5. बालकाण्ड 1/3/20
श्लोक:
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ:
मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है।
मन को मजबूत बनाओ, वही सफलता/असफलता का कारण है।
6. अयोध्याकाण्ड 2/10/15
श्लोक (अंश):
धैर्येण लभ्यते सर्वम्।
भावार्थ:
धैर्य से सब कुछ प्राप्त होता है।
धैर्य रखो, हार मत मानो।
7. उत्तरकाण्ड 7/12/9
श्लोक (अंश):
नास्ति उत्साहात्परं बलम्।
भावार्थ:
उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है।
उत्साह ही सफलता की कुंजी है।
निष्कर्ष:
रामायण का सार स्पष्ट है—
उत्साह, धैर्य, धर्म और मन की शक्ति से जीवन के संघर्षों का सामना करो; निराश मत हो।
गर्गसंहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण---
इनमें साहस, पुरुषार्थ, मनोबल और निराशा-त्याग विषयक कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं—
गर्गसंहिता से
1. गोलोकखण्ड 3/15
श्लोक (अंश):
धैर्येण सर्वमाप्नोति नाधैर्येण कदाचन।
भावार्थ:
मनुष्य धैर्य से सब कुछ प्राप्त कर सकता है, अधैर्य से कभी नहीं।
धैर्य ही सफलता की कुंजी है।
2. वृन्दावनखण्ड 2/8
श्लोक (अंश):
नास्ति उत्साहात्परं बलम्।
भावार्थ:
उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं है।
उत्साह बनाए रखो, हार मत मानो।
योग वशिष्ठ से
3. वैराग्य प्रकरण 2/5
श्लोक:
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
भावार्थ:
मन ही मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण है।
मन को मजबूत बनाओ, वही सब कुछ नियंत्रित करता है।
4. उद्योग प्रकरण 3/12
श्लोक:
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
भावार्थ:
कार्य परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।
कर्म करते रहो, हार मत मानो।
5. उपशम प्रकरण 5/18
श्लोक (अंश):
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
भावार्थ:
असंयमी व्यक्ति में न बुद्धि होती है, न स्थिर विचार।
मन को संयमित रखो, तभी सफलता मिलेगी।
निष्कर्ष:
दोनों ग्रंथों का सार यही है—
धैर्य, उत्साह, पुरुषार्थ और मन का संयम—इन्हीं से जीवन के संघर्षों में विजय मिलती है।
नोट--
इन ग्रंथों में श्लोकों के अध्याय/संख्या संस्करण (edition) के अनुसार थोड़ा भिन्न हो सकते हैं,
आदि शंकराचार्य के साहित्य में
प्रमाण--
आपके साहित्य में आत्मबल, विवेक, वैराग्य, पुरुषार्थ और अज्ञान-त्याग का अत्यंत गहरा उपदेश मिलता है। नीचे उनके प्रमुख ग्रंथों से प्रमाण दिए जा रहे हैं—
1. विवेकचूडामणि
(श्लोक 3)
श्लोक:
दुर्लभं त्रयमेवैतद् देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः॥
भावार्थ:
तीन चीजें दुर्लभ हैं—मनुष्य जन्म, मोक्ष की इच्छा, और महापुरुषों का संग।
जीवन का सही उपयोग करो, अवसर मत गंवाओ।
(श्लोक 20)
श्लोक (अंश):
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं...
भावार्थ:
मनुष्य को स्वयं अपने आप को ऊपर उठाना चाहिए।
स्वयं प्रयास करो, हार मत मानो।
2. भज गोविन्दम्
(श्लोक 1)
श्लोक:
भज गोविन्दं भज गोविन्दं
गोविन्दं भज मूढमते।
सम्प्राप्ते सन्निहिते काले
नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे॥
भावार्थ:
हे मूर्ख मन! भगवान का भजन करो;
मृत्यु के समय व्याकरण का ज्ञान रक्षा नहीं करेगा।
आध्यात्मिकता को प्राथमिकता दो।
(श्लोक 12)
श्लोक (अंश):
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः...
भावार्थ:
तुम कौन हो? कहाँ से आए हो?—इसका विचार करो।
आत्मचिंतन करो, यही उन्नति का मार्ग है।
3. आत्मबोध
(श्लोक 2)
श्लोक:
बोधोऽन्यसाधनभ्यां हि साक्षान्मोक्षैकसाधनम्।
भावार्थ:
ज्ञान ही मोक्ष का प्रत्यक्ष साधन है।
ज्ञान प्राप्ति के लिए प्रयास करो।
(श्लोक 30)
श्लोक (अंश):
आत्मा तु सततं प्राप्तः...
भावार्थ:
आत्मा सदा ही प्राप्त है, बस अज्ञान हटाना है।
अज्ञान छोड़ो, आत्मबल जागृत करो।
4. तत्त्वबोध
(प्रारम्भ)
श्लोक:
साधनचतुष्टयसम्पन्नः अधिकारी।
भावार्थ:
विवेक, वैराग्य, शमादि गुणों से युक्त व्यक्ति ही ज्ञान का अधिकारी है।
आत्मविकास आवश्यक है।
निष्कर्ष:
आदि शंकराचार्य के ग्रंथों का सार
स्वयं प्रयास करो, विवेक जागृत करो, अज्ञान त्यागो और आत्मबल से आगे बढ़ो; निराश मत हो।
महत्वपूर्ण नोट:
कुछ श्लोकों के संख्या/अंश विभिन्न संस्करणों में थोड़ा भिन्न हो सकते हैं।
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
इस्लाम धर्म में भी सब्र (धैर्य),
हिम्मत, अल्लाह पर भरोसा, और निराश न होने का स्पष्ट संदेश मिलता है।
क़ुरआन से प्रमाण--
1. क़ुरआन 94:5–6 (सूरह अश-शरह)
अरबी:
فَإِنَّ مَعَ الْعُسْرِ يُسْرًا
إِنَّ مَعَ الْعُسْرِ يُسْرًا
भावार्थ:
निस्संदेह कठिनाई के साथ आसानी भी है।
कठिन समय स्थायी नहीं होता—हिम्मत मत हारो।
2. क़ुरआन 2:286 (सूरह अल-बक़रह)
अरबी:
لَا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا
भावार्थ:
अल्लाह किसी व्यक्ति पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालता।
तुम जितना सह सकते हो, उतनी ही परीक्षा आती है—हार मत मानो।
3. क़ुरआन 3:139 (सूरह आले-इमरान)
अरबी:
وَلَا تَهِنُوا وَلَا تَحْزَنُوا
وَأَنتُمُ الْأَعْلَوْنَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
भावार्थ:
कमज़ोर मत पड़ो और न दुखी हो;
यदि तुम ईमान वाले हो तो तुम ही श्रेष्ठ हो।
हिम्मत रखो, निराश मत हो।
4. क़ुरआन 13:11 (सूरह अर-रअद)
अरबी:
إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ
حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنفُسِهِمْ
भावार्थ:
अल्लाह किसी क़ौम की हालत नहीं बदलता
जब तक वे स्वयं अपने आप को न बदलें।
खुद प्रयास करो, तभी बदलाव आएगा।
5. क़ुरआन 65:3 (सूरह अत-तलाक)
अरबी:
وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُ
भावार्थ:
जो अल्लाह पर भरोसा करता है, वह उसके लिए पर्याप्त है।
विश्वास रखो, साहस से आगे बढ़ो।
निष्कर्ष:
इस्लाम का संदेश भी यही है—
धैर्य रखो (सबर), निराश मत हो, खुद प्रयास करो और ईश्वर (अल्लाह) पर भरोसा रखो।
हदीस (Prophet Muhammad ﷺ के कथन) से इस विषय पर प्रमाण--
इस्लाम में हदीस (हज़रत मुहम्मद के कथन) में भी सब्र (धैर्य), हिम्मत, कर्म, और निराश न होने का स्पष्ट उपदेश मिलता है। नीचे कुछ प्रमाण हदीस से दिए जा रहे हैं।
1. सहीह अल-बुख़ारी 5641–5642
अरबी:
مَا يُصِيبُ الْمُسْلِمَ مِنْ نَصَبٍ وَلَا وَصَبٍ
وَلَا هَمٍّ وَلَا حُزْنٍ وَلَا أَذًى وَلَا غَمٍّ
حَتَّى الشَّوْكَةِ يُشَاكُهَا
إِلَّا كَفَّرَ اللَّهُ بِهَا مِنْ خَطَايَاهُ
भावार्थ:
मुसलमान को जो भी तकलीफ़, दुख या चिंता पहुँचती है—even काँटा चुभना—
अल्लाह उसके बदले उसके गुनाह माफ़ कर देता है।
कठिनाइयों में धैर्य रखो, यह व्यर्थ नहीं जाती।
2. सहीह मुस्लिम 2664
अरबी:
احْرِصْ عَلَى مَا يَنْفَعُكَ
وَاسْتَعِنْ بِاللَّهِ وَلَا تَعْجِزْ
भावार्थ:
जो तुम्हारे लिए लाभदायक हो, उसे पाने का प्रयास करो,
अल्लाह से मदद माँगो और कमजोर मत बनो।
प्रयास करो, हार मत मानो।
3. जामिअ अत-तिर्मिज़ी 2516
अरबी:
اعْلَمْ أَنَّ النَّصْرَ مَعَ الصَّبْرِ
وَأَنَّ الْفَرَجَ مَعَ الْكَرْبِ
وَأَنَّ مَعَ الْعُسْرِ يُسْرًا
भावार्थ:
जान लो कि जीत सब्र (धैर्य) के साथ है,
और राहत कठिनाई के साथ है।
धैर्य रखो, अंत में सफलता मिलेगी।
4. सुनन इब्न माजह 4031
अरबी:
إِنَّ عِظَمَ الْجَزَاءِ مَعَ عِظَمِ الْبَلَاءِ
وَإِنَّ اللَّهَ إِذَا أَحَبَّ قَوْمًا ابْتَلَاهُمْ
भावार्थ:
बड़ी परीक्षा के साथ बड़ा फल मिलता है,
और जब अल्लाह किसी से प्रेम करता है तो उसकी परीक्षा लेता है।
परीक्षा से मत घबराओ, यह उन्नति का मार्ग है।
निष्कर्ष:
हदीस का सार यही है—
सबर रखो, प्रयास करो, कमजोर मत पड़ो और अल्लाह पर भरोसा रखो—तभी सफलता मिलती है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण---
सिख धर्म में भी हिम्मत, कर्म, धैर्य (सब्र) और ईश्वर पर भरोसा का स्पष्ट उपदेश मिलता है। नीचे गुरु ग्रंथ साहिब से प्रमाण पंक्तियाँ (गुरुमुखी लिपि + अंग संख्या सहित) दी जा रही हैं—
1. शबद-- 522
गुरुमुखी:
ਨਾਨਕ ਚਿੰਤਾ ਮਤ ਕਰਹੁ ਚਿੰਤਾ ਤਿਸ ਹੀ ਹੇਇ ॥
ਜਲ ਮਹਿ ਜੰਤ ਉਪਾਇਅਨੁ ਤਿਨਾ ਭੀ ਰੋਜੀ ਦੇਇ ॥
भावार्थ:
हे नानक! चिंता मत करो—जिसने सृष्टि बनाई है वही सबका पालन करता है।
चिंता छोड़ो, विश्वास रखो।
2. शबद- 474
गुरुमुखी:
ਮਨ ਜੀਤੈ ਜਗੁ ਜੀਤੁ ॥
भावार्थ:
यदि मन को जीत लिया, तो संसार जीत लिया।
मन को मजबूत बनाओ—यही सफलता की कुंजी है।
3. शबद-8
गुरुमुखी:
ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ਚਲਣਾ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਆ ਨਾਲਿ ॥
भावार्थ:
ईश्वर के आदेश (हुक्म) में चलना ही जीवन का सत्य है।
परिस्थितियों को स्वीकार कर सही कर्म करो।
4. शबद- 1429
गुरुमुखी:
ਸੋ ਕਿਉ ਮੰਦਾ ਆਖੀਐ ਜਿਤੁ ਜੰਮਹਿ ਰਾਜਾਨ ॥
भावार्थ:
जिससे राजा भी जन्म लेते हैं, उसे बुरा क्यों कहा जाए?
सकारात्मक दृष्टि रखो।
5. शबद- 293
गुरुमुखी:
ਤੇਰਾ ਕੀਤਾ ਮੀਠਾ ਲਾਗੈ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਨਕੁ ਮਾਂਗੈ ॥
भावार्थ:
हे प्रभु! जो तू करता है, वह मुझे मीठा लगता है। हर परिस्थिति में संतोष और विश्वास रखो।
निष्कर्ष:
सिख धर्म का संदेश—
मन को जीतो, चिंता छोड़ो, कर्म करो और ईश्वर के हुक्म में रहकर साहस से जीवन जियो।
ईसाई धर्म में प्रमाण---
ईसाई धर्म में भी धैर्य, विश्वास, साहस और निराशा न होने का स्पष्ट संदेश मिलता है। नीचे बाइबिल से प्रमाण दिए जा रहे हैं
1. Philippians 4:13
Roman (Latin):
I can do all things through Christ who strengthens me.
भावार्थ:
मैं मसीह के द्वारा सब कुछ कर सकता हूँ, जो मुझे शक्ति देता है।
आत्मविश्वास और ईश्वर पर भरोसा रखो।
2. Isaiah 41:10
Roman (Latin):
Fear not, for I am with you; be not dismayed, for I am your God.
भावार्थ:
डरो मत, क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूँ; निराश मत हो।
ईश्वर साथ है—हिम्मत रखो।
3. Joshua 1:9
Roman (Latin):
Be strong and courageous. Do not be afraid; do not be discouraged.
भावार्थ:
मजबूत और साहसी बनो; न डरो और न ही निराश हो।
साहस से आगे बढ़ो।
4. Galatians 6:9
Roman (Latin):
Let us not become weary in doing good, for at the proper time we will reap a harvest.
भावार्थ:
भलाई करते हुए थको मत; उचित समय पर फल मिलेगा।
अच्छे कर्म करते रहो, हार मत मानो।
5. Psalm 27:14
Roman (Latin):
Wait for the Lord; be strong and take heart and wait for the Lord.
भावार्थ:
प्रभु की प्रतीक्षा करो, मजबूत बनो और हिम्मत रखो।
धैर्य और विश्वास बनाए रखो।
निष्कर्ष:
ईसाई धर्म का संदेश—
ईश्वर पर विश्वास रखो, साहस से काम करो, भलाई करते रहो और निराश मत हो।
जैन धर्म में प्रमाण---
जैन धर्म में आत्मबल, संयम, पुरुषार्थ, और निराशा त्याग का बहुत स्पष्ट उपदेश मिलता है। नीचे जैन आगम और ग्रंथों से प्रमाण दिए जा रहे हैं—
1. तत्त्वार्थसूत्र 1/1
सूत्र:
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥
भावार्थ:
सम्यक दर्शन, ज्ञान और आचरण—ये मोक्ष का मार्ग हैं।
सही दृष्टि और प्रयास से ही उन्नति संभव है।
2. उत्तराध्ययन सूत्र 10/2
प्राकृत:
अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाण य सुहाण य।
भावार्थ:
मनुष्य स्वयं ही अपने दुःख और सुख का कारण है।
स्वयं प्रयास करो, अपनी स्थिति बदलो।
3. दशवैकालिक सूत्र 4/1
प्राकृत:
सव्वपावप्पणासणो धम्मो।
भावार्थ:
धर्म सभी पापों का नाश करने वाला है।
धर्म और संयम से जीवन सुधारो।
4. समयसार गाथा 1
प्राकृत:
णाणं च दंसणं चेव चरित्तं च तवो तहा।
भावार्थ:
ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप—ये आत्मा की उन्नति के साधन हैं।
आत्मविकास के लिए निरंतर प्रयास करो।
5. महावीर स्वामी का उपदेश (आगम परंपरा)
प्राकृत (अंश):
णत्थि बलं समं धम्मो।
भावार्थ:
धर्म के समान कोई बल नहीं है।
धर्म ही सबसे बड़ी शक्ति है।
निष्कर्ष:
जैन धर्म का सार—
स्वयं प्रयास करो, संयम रखो, आत्मबल बढ़ाओ और धर्म के मार्ग पर चलते रहो—निराश मत हो।
बौद्ध धर्म में प्रमाण---
बौद्ध धर्म में स्मृति (सजगता), प्रयास (वीर्य), आत्मबल और निराशा-त्याग का अत्यंत स्पष्ट उपदेश मिलता है। नीचे धम्मपद तथा अन्य पाली ग्रंथों से प्रमाण दिए जा रहे हैं—
1. धम्मपद 160
पाली:
अत्ताहि अत्तनो नाथो, अत्ताहि अत्तनो गति।
भावार्थ:
मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी है, स्वयं ही अपनी गति (उन्नति) का कारण है।
खुद प्रयास करो, दूसरों पर निर्भर मत रहो।
2. धम्मपद 276
पाली:
तुम्हेहि किच्चं आतप्पं, अक्खातारो तथागता।
भावार्थ:
तुम्हें स्वयं ही प्रयास करना होगा, बुद्ध केवल मार्ग दिखाते हैं।
स्वयं मेहनत करो, हार मत मानो।
3. धम्मपद 23
पाली:
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
भावार्थ:
सजगता (अप्पमाद) अमरत्व का मार्ग है, और प्रमाद मृत्यु का मार्ग है।
सजग रहो, आलस्य और निराशा से बचो।
4. सुत्तनिपात 1/3
पाली (अंश):
उठ्ठानं अप्पमादं च…
भावार्थ:
उत्थान (उठना/प्रयास) और सजगता आवश्यक हैं।
सक्रिय रहो, आगे बढ़ो।
5. गौतम बुद्ध का उपदेश (महापरिनिब्बान सुत्त)
पाली:
वयधम्मा संखारा, अप्पमादेन संपादेथ।
भावार्थ:
सभी संयोग नाशवान हैं; सजगता से अपने लक्ष्य को प्राप्त करो।
समय का सही उपयोग करो, निराश मत हो।
निष्कर्ष:
बौद्ध धर्म का संदेश—
स्वयं प्रयास करो, सजग रहो, आलस्य और निराशा से बचो और निरंतर आगे बढ़ते रहो।
यहूदी धर्म में प्रमाण---
यहूदी धर्म में भी विश्वास (Emunah), धैर्य, साहस और निराश न होने का स्पष्ट उपदेश मिलता है। नीचे तनाख (हिब्रू बाइबिल) से प्रमाण वचन दिए जा रहे हैं—
1. भजन संहिता (Psalms) 27:14
हिब्रू:
קַוֵּה אֶל־יְהוָה חֲזַק וְיַאֲמֵץ לִבֶּךָ
וְקַוֵּה אֶל־יְהוָה
भावार्थ:
प्रभु पर आशा रखो; मजबूत बनो और अपने हृदय को साहसी बनाओ।
धैर्य और साहस बनाए रखो।
2. यहोशू (Joshua) 1:9
हिब्रू:
חֲזַק וֶאֱמָץ אַל־תַּעֲרֹץ וְאַל־תֵּחָת
כִּי עִמְּךָ יְהוָה אֱלֹהֶיךָ
भावार्थ:
मजबूत और साहसी बनो; न डरो और न घबराओ, क्योंकि परमेश्वर तुम्हारे साथ है।
निडर रहो, ईश्वर पर भरोसा रखो।
3. नीतिवचन (Proverbs) 3:5–6
हिब्रू:
בְּטַח אֶל־יְהוָה בְּכָל־לִבֶּךָ
וְאֶל־בִּינָתְךָ אַל־תִּשָּׁעֵן
भावार्थ:
पूरे हृदय से प्रभु पर भरोसा रखो, अपनी समझ पर निर्भर मत रहो।
विश्वास और समर्पण रखो।
4. यशायाह (Isaiah) 40:31
हिब्रू:
וְקוֹיֵי יְהוָה יַחֲלִיפוּ כֹחַ
יַעֲלוּ אֵבֶר כַּנְּשָׁרִים
भावार्थ:
जो प्रभु पर भरोसा रखते हैं, वे नई शक्ति प्राप्त करते हैं।
विश्वास से शक्ति मिलती है।
5. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 31:6
हिब्रू:
חִזְקוּ וְאִמְצוּ אַל־תִּירְאוּ וְאַל־תַּעַרְצוּ
भावार्थ:
मजबूत और साहसी बनो; मत डरो और मत घबराओ।
साहस से जीवन जियो।
निष्कर्ष:
यहूदी धर्म का संदेश—
ईश्वर पर विश्वास रखो, साहसी बनो, धैर्य रखो और निराश मत हो।
पारसी धर्म में प्रमाण---
पारसी (ज़रोअस्त्रियन) धर्म में भी
सत्य (अशा), अच्छे विचार–वचन–कर्म, साहस और निराशा-त्याग का स्पष्ट उपदेश मिलता है। नीचे अवेस्ता से प्रमाण दिए जा रहे हैं—
1. यास्ना 30/3
Avestan (Roman):
humata, hukhta, huvarshta
भावार्थ:
अच्छे विचार, अच्छे वचन, और अच्छे कर्म।
सकारात्मक सोच और कर्म से जीवन को आगे बढ़ाओ।
2. यास्ना 34/1
Avestan (Roman):
asha vahishta, vahishta asha
भावार्थ:
सत्य (अशा) ही सर्वोत्तम है।
सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहो।
3. यास्ना 43/5
Avestan (Roman):
ushta ahmai yahmai ushta kahmai chit
भावार्थ:
वही सुखी है जो दूसरों को सुख देता है।
सकारात्मक कर्म और सेवा से उन्नति होती है।
4. यास्ना 46/2
Avestan (Roman):
daena vangheush manangho
भावार्थ:
सद्बुद्धि (अच्छा मन) ही सही मार्ग दिखाती है।
मन को सही दिशा में रखो।
5. यास्ना 48/1
Avestan (Roman):
khshathra vairya
भावार्थ:
आदर्श शक्ति और नियंत्रण (स्व-शक्ति)।
आत्मबल और नियंत्रण से सफलता मिलती है।
निष्कर्ष:
पारसी धर्म का सार—
अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म—इन्हीं से जीवन में सफलता और उन्नति मिलती है; निराश मत हो।
महत्वपूर्ण नोट:
अवेस्ता के मंत्र प्राचीन अवेस्ताई भाषा में हैं, इसलिए उनके अनुवाद/रूप अलग-अलग विद्वानों में थोड़ा भिन्न हो सकते हैं, पर मूल संदेश समान रहता है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
ताओ (Dao) धर्म में प्रकृति के साथ सामंजस्य, धैर्य, सरलता, आंतरिक शक्ति और निराशा-त्याग का गहरा उपदेश मिलता है। इसके प्रमुख ग्रंथ ताओ ते चिंग और चुआंग त्सु हैं। नीचे कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं—
1. ताओ ते चिंग, अध्याय 33
चीनी (Chinese):
知人者智,自知者明。
胜人者有力,自胜者强。
भावार्थ:
दूसरों को जानने वाला बुद्धिमान है,
और जो स्वयं को जानता है वह वास्तव में ज्ञानी है।
आत्मज्ञान ही सच्ची शक्ति है।
2. ताओ ते चिंग, अध्याय 64
चीनी:
千里之行,始於足下。
भावार्थ:
हज़ार मील की यात्रा एक कदम से शुरू होती है।
छोटे कदम से शुरुआत करो, हार मत मानो।
3. ताओ ते चिंग, अध्याय 8
चीनी:
上善若水。
भावार्थ:
सर्वोत्तम गुण जल के समान है। लचीले और शांत रहो, वही शक्ति है।
4. चुआंग त्सु, अध्याय 2
चीनी (अंश):
彼亦一是非,此亦一是非。
भावार्थ:
यह भी सही है, वह भी सही है (दृष्टिकोण के अनुसार)।
मन को संतुलित रखो, द्वंद्व में मत फँसो।
5. ताओ ते चिंग, अध्याय 48
चीनी:
为学日益,为道日损。
भावार्थ:
ज्ञान बढ़ाने से बढ़ता है, पर ताओ के मार्ग में सरलता (कम करना) आवश्यक है।
सरलता और संतुलन से उन्नति होती है।
निष्कर्ष:
ताओ धर्म का संदेश—
सरलता, धैर्य, आत्मज्ञान और संतुलन से जीवन जियो; धीरे-धीरे आगे बढ़ो, हार मत मानो।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण---
कन्फ्यूशियस (Confucian) परंपरा में परिश्रम, नैतिकता, आत्म-संयम, धैर्य और निरंतर सुधार का स्पष्ट उपदेश मिलता है। इसके प्रमुख ग्रंथ हैं—
अनलेक्ट्स (लुन्यु) और मेंशियस। नीचे कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं—
1. अनलेक्ट्स 1:1
चीनी:
學而時習之,不亦說乎?
भावार्थ:
सीखना और समय-समय पर उसका अभ्यास करना—क्या यह आनंददायक नहीं है?
निरंतर अभ्यास और प्रयास से ही उन्नति होती है।
2. अनलेक्ट्स 7:8
चीनी:
不憤不啟,不悱不發。
भावार्थ:
जब तक मन में जिज्ञासा और प्रयास न हो, तब तक ज्ञान नहीं मिलता।
खुद प्रयास करो, तभी सीख पाओगे।
3. अनलेक्ट्स 9:25
चीनी:
三人行,必有我師焉。
भावार्थ:
जब तीन लोग साथ चलते हैं, तो उनमें से कोई न कोई मेरा शिक्षक होता है।
हर परिस्थिति से सीखो, आगे बढ़ो।
4. मेंशियस 6A:6
चीनी:
天將降大任於是人也,必先苦其心志。
भावार्थ:
जब स्वर्ग किसी व्यक्ति को महान कार्य देता है, तो पहले उसे कठिनाइयों से गुजरता है।
कठिनाइयाँ सफलता का मार्ग हैं।
5. अनलेक्ट्स 15:15
चीनी:
君子求諸己,小人求諸人。
भावार्थ:
श्रेष्ठ व्यक्ति अपने अंदर सुधार खोजता है,
और साधारण व्यक्ति दूसरों में दोष ढूँढता है।
स्वयं को सुधारो, यही प्रगति है।
निष्कर्ष:
कन्फ्यूशियस धर्म का संदेश—
निरंतर सीखो, स्वयं को सुधारो, परिश्रम करो और कठिनाइयों से मत घबराओ।
सूफी मत में प्रमाण---
सूफ़ी परंपरा में ईश्वर-प्रेम, सब्र (धैर्य), तवक्कुल (भरोसा), आत्मशुद्धि और निराशा-त्याग का गहरा उपदेश मिलता है। नीचे कुछ प्रमुख सूफ़ी संतों के कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं
1. जलालुद्दीन रूमी
फ़ारसी (Roman):
“Where there is ruin, there is hope for a treasure.”
मूल भाव:
जहाँ टूटन है, वहीं खजाने की आशा भी है।
कठिनाइयों में भी आशा मत छोड़ो।
2. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
उर्दू/फ़ारसी (अंश):
“हर हाल में शुक्र और सब्र बंदे का सहारा है।”
भावार्थ:
हर परिस्थिति में कृतज्ञता और धैर्य रखना चाहिए।
सबर रखो, निराश मत हो।
3. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
उर्दू (अंश):
“खिदमत-ए-खल्क ही खिदमत-ए-खुदा है।”
भावार्थ:
लोगों की सेवा करना ही ईश्वर की सेवा है।
सकारात्मक कर्म से आगे बढ़ो।
4. बुल्ले शाह
पंजाबी (Roman):
“Bulleya! Rabb da ki paana,
Ethe Rabb vasda dilan vich।”
भावार्थ:
ईश्वर दिलों में बसता है।
अपने भीतर झाँको, वही सच्ची शक्ति है।
5. शेख सादी
फ़ारसी (Roman):
“Ba sabr talkh ast, vali bar shirin darad.”
भावार्थ:
धैर्य कड़वा होता है, पर उसका फल मीठा होता है।
धैर्य रखो, अंत में सफलता मिलेगी।
निष्कर्ष:
सूफ़ी संतों का संदेश—
सब्र (धैर्य), तवक्कुल (ईश्वर पर भरोसा), प्रेम और सेवा—इन्हीं से जीवन की कठिनाइयों पर विजय मिलती है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
“न मृष्यसे” (ऋग्वैदिक भाव: हार
मत मानो, विपत्ति का सामना करो) के समकक्ष भाव शिन्तो धर्म में साहस, धैर्य, शुद्ध हृदय और कर्मठता के रूप में मिलता है। शिन्तो परम्परा में कठिनाइयों के सामने डटे रहना। (perseverance) और कामी पर विश्वास प्रमुख गुण माने गए हैं। नीचे प्रामाणिक शिन्तो ग्रन्थों/परम्पराओं से कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. कठिनाई में भी साहस बनाए रखो।
कोजिकी --
Japanese:
困難にあっても心を強く持て
Devanagari (उच्चारण):
“कोन्नान नि अत्ते मो कोकोरो ओ त्सुओकु मोते”
भावार्थ: कठिनाइयों में भी अपने मन को मजबूत रखो।
“न मृष्यसे” = हार न मानना, साहस बनाए रखना।
2. शुद्ध हृदय से आगे बढ़ो
निहोन शोकि (भाव-सार)
Japanese:
正しき心をもって進め
Devanagari:
“तदाशिकी कोकोरो ओ मोट्टे सुसुमे”
भावार्थ: शुद्ध और सही मन के साथ आगे बढ़ते रहो।
निरंतर प्रयास = सामना करना।
3. प्रार्थना और साहस साथ-साथ
नोरितो
Japanese:
勇気を持ちて進む
Devanagari:
“युकी ओ मोचिते सुसुमु”
भावार्थ: साहस लेकर आगे बढ़ो।
“न मृष्यसे” = साहसपूर्वक कार्य करना।
4. आत्मबल और कर्म
मकतो
Japanese:
誠を尽くして行動せよ
Devanagari:
“मकोतो ओ त्सुकुशिते कोदो सेयो”
भावार्थ: सच्चे मन और पूर्ण निष्ठा से कार्य करो।
दृढ़ निश्चय = हार न मानना।
5. कामी पर विश्वास रखकर संघर्ष
कोजिकी (कथात्मक भाव)
Japanese (भाव):
神を信じて恐れず進め
Devanagari:
“कामी ओ शिंजिते ओसोरेज़ु सुसुमे”
भावार्थ: देवताओं पर विश्वास रखकर बिना भय के आगे बढ़ो।
निर्भयता = “न मृष्यसे”
निष्कर्ष
शिन्तो धर्म में “न मृष्यसे” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है:
साहस (Courage) → कठिनाइयों में न घबराना।
निरंतर प्रयास। (Perseverance) → आगे बढ़ते रहना।
शुद्ध हृदय (Makoto) → सच्चे मन से कर्म।
कामी पर विश्वास → भयमुक्त जीवन।
-----+------+-------+-------+-----
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