ऋगुवेद सूक्ति--(61)की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति--(61) की व्याख्या
"बलं धेहि"
ऋगुवेद --
4/9/6
भाव--शक्ति प्रदान करो।
ऋग्वेद मण्डल 4, सूक्त 9, मन्त्र 6 का “बलं धेहि” पद अत्यन्त सारगर्भित है।🔹 मूल मन्त्र (ऋग्वेद 4/9/6)
बलं धेहि तनूषु नो बलमिन्द्रानुत्सु नः।
बलं तोकाय तनयाय जीवसे॥
पदच्छेद--
बलम् = शक्ति, सामर्थ्य
धेहि = धारण करो / प्रदान करो
तनूषु = हमारे शरीरों में
नः = हमें / हमारे लिए
तोकाय = संतानों के लिए
तनयाय = पुत्र/वंश के लिए
जीवसे = जीवन के लिए
भावार्थ
हे देव (विशेषतः इन्द्र)!
हमारे शरीरों में शक्ति प्रदान करो,
हमारे संघर्षों (युद्धों/कठिनाइयों) में शक्ति दो, हमारी संतानों और वंश के लिए भी जीवनदायिनी शक्ति दो।
इसलिए “बलं धेहि” का संक्षिप्त अर्थ —
“हमें शक्ति प्रदान करो” या “हममें बल स्थापित करो” है।
सायणाचार्य के अनुसार अर्थ--
सायणाचार्य के भाष्य में “बलं धेहि” का अर्थ है —
“हे इन्द्र! हमारे शरीर और कर्मों में पराक्रम और सामर्थ्य स्थापित करो, जिससे हम जीवन और कर्तव्य में सफल हों।”
उनके अनुसार यहाँ “बल” केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक शक्ति भी है।
वेदों में प्रमाण --
“बलं धेहि” (हमें शक्ति दो) का भाव वेदों में कई स्थानों पर स्पष्ट रूप से मिलता है।
1. ऋग्वेद प्रमाण
ऋग्वेद 4/9/6
बलं धेहि तनूषु नो बलमिन्द्रानुत्सु नः।
बलं तोकाय तनयाय जीवसे॥
भावार्थ:
हे इन्द्र! हमारे शरीर, कर्म और संतानों के लिए शक्ति प्रदान करो।
2. ऋग्वेद (अन्य समान भाव)
ऋग्वेद 1/80/2
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वाना यज्ञमुत्तमम्।
अपो न शोषमुद्यताः॥
भावार्थ:
हम इन्द्र की स्तुति करते हैं—वे हमें उत्साह और शक्ति देते हैं।
3. यजुर्वेद प्रमाण
यजुर्वेद 22/22
तेजोऽसि तेजो मयि धेहि।
वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि।
बलमसि बलं मयि धेहि॥
भावार्थ:
तू तेज है—मुझमें तेज स्थापित कर।
तू वीर्य (ऊर्जा) है—मुझमें वीर्य स्थापित कर।
तू बल है—मुझमें बल स्थापित कर।
यह “बलं धेहि” का सबसे स्पष्ट और प्रसिद्ध वैदिक प्रमाण है।
4. अथर्ववेद प्रमाण
अथर्ववेद 19/9/1
ओजोऽसि ओजो मयि धेहि।
बलमसि बलं मयि धेहि॥
भावार्थ:
तू ओज (ऊर्जा) है—मुझे ओज दे।
तू बल है—मुझे बल प्रदान कर।
5. सामवेद (सार रूप)
सामवेद में भी अनेक मन्त्र ऋग्वेद से लिए गए हैं, जिनमें इन्द्र से बल, ओज और उत्साह देने की प्रार्थना बार-बार आती है।
निष्कर्ष
वेदों में “बलं धेहि” का भाव बार-बार इस रूप में आता है—
शारीरिक शक्ति, मानसिक साहस
आध्यात्मिक ऊर्जा।
अर्थात् यह केवल शरीर का बल नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन-शक्ति (Holistic Power) की प्रार्थना है।
उपनिषदों में प्रमाण --
उपनिषदों में “बलं धेहि” (हमें शक्ति दो) शब्द ठीक उसी रूप में बहुत कम मिलता है, परन्तु बल (आत्मिक शक्ति, तेज, ओज) की महिमा और उसकी आवश्यकता स्पष्ट रूप से बताई गई है।
1. तैत्तिरीयोपनिषद् (3.2.1)
बलं वै प्राणः।
प्राणे हि बलं प्रतिष्ठितम्॥
भावार्थ:
प्राण ही बल है; वास्तव में बल प्राण में ही स्थित है।
यहाँ “बल” को जीवन-ऊर्जा (प्राणशक्ति) के रूप में बताया गया है।
2. छान्दोग्योपनिषद् (7.8.1)
बलं वै विज्ञानाद् भूयः।
शतं विज्ञानवताम् एको बलवान् आन्दोलयति॥
भावार्थ:
बल (शक्ति) ज्ञान से भी श्रेष्ठ है; एक बलवान व्यक्ति सौ ज्ञानियों को भी प्रभावित कर सकता है।
यहाँ “बल” का अर्थ आत्मिक सामर्थ्य और प्रभावशक्ति है।
3. मुण्डकोपनिषद् (3.2.4)
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः॥
भावार्थ:
यह आत्मा (परम सत्य) निर्बल व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि आध्यात्मिक प्राप्ति के लिए भी बल (आत्मिक शक्ति) आवश्यक है।
4. कठोपनिषद् (1.2.23)
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः॥
भावार्थ:
यह आत्मा केवल वचन, बुद्धि या अधिक श्रवण से नहीं मिलती।
इसका तात्पर्य यह भी है कि आंतरिक शक्ति (बल), तप और पात्रता आवश्यक है।
5. बृहदारण्यकोपनिषद् (1.3.28)
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
भावार्थ:
असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरता की ओर ले चल।
यह भी एक प्रकार की आध्यात्मिक शक्ति (बल) की प्रार्थना है।
निष्कर्ष
उपनिषदों में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार व्यक्त हुआ है—
प्राण ही बल है (जीवन ऊर्जा)
आत्मिक शक्ति के बिना आत्मज्ञान संभव नहीं
बल केवल शरीर का नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सामर्थ्य है
इसलिए उपनिषदों का संदेश है:
“आत्मबल (Inner Strength) ही सर्वोच्च बल है।
पुराणों में प्रमाण---
पुराणों में “बलं धेहि” (हमें शक्ति प्रदान करो) का भाव अनेक स्तोत्रों और प्रार्थनाओं में स्पष्ट रूप से मिलता है।
1. मार्कण्डेय पुराण (देवीमहात्म्य 5.16)
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
भावार्थ:
हे देवी! मुझे सौभाग्य, आरोग्य और सुख दो।
मुझे रूप, विजय (शक्ति) और यश दो, और शत्रुओं का नाश करो।
यहाँ “जयं देहि” और “देहि” के माध्यम से शक्ति (बल) की प्रार्थना है।
2. विष्णु पुराण (1.19.85)
त्वं बलं त्वं तपो विष्णो त्वं तेजः परमं प्रभो॥
भावार्थ:
हे विष्णु! आप ही बल हैं, आप ही तप हैं, आप ही परम तेज हैं।
यहाँ भगवान को ही बल का स्रोत बताया गया है।
3. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता 4.24 – भावानुसार)
त्वमेव बलं देव त्वमेव परमा गतिः॥
भावार्थ:
हे देव! आप ही बल हैं और आप ही परम गति (सहारा) हैं।
4. भागवत पुराण (10.14.58)
त्वत्तो बलं बलवतां चरेषु॥
भावार्थ:
हे भगवान! बलवानों का बल भी आपसे ही प्राप्त होता है।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि सभी प्रकार का बल (शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक) ईश्वर से ही आता है।
5. स्कन्द पुराण (भावानुसार)
बलं देहि महादेव त्राहि मां शरणागतम्॥
भावार्थ:
हे महादेव! मुझे बल प्रदान करो, मैं आपकी शरण में हूँ।
निष्कर्ष
पुराणों में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
देहि (दो) शब्द द्वारा बार-बार शक्ति की प्रार्थना। भगवान को ही बल का मूल स्रोत माना गया।
बल का अर्थ केवल शरीर नहीं, बल्कि विजय, साहस और आध्यात्मिक शक्ति भी है।
इसलिए पुराणों का सार है:
“ईश्वर ही बल का स्रोत है, उसी से बल माँगना चाहिए।”
गीता में प्रमाण---
श्रीमद्भगवद्गीता में “बल (शक्ति)” का भाव कई स्थानों पर स्पष्ट रूप से वर्णित है।
1. भगवद्गीता 7.11
बलं बलवतामस्मि कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! मैं बलवानों का वह बल हूँ जो काम और राग से रहित है।
यहाँ भगवान कहते हैं कि शुद्ध (सात्त्विक) बल ही दिव्य है।
2. भगवद्गीता 10.36
तेजस्तेजस्विनामहम्॥
भावार्थ:
मैं तेजस्वियों का तेज हूँ।
“तेज” भी एक प्रकार का आंतरिक बल (ऊर्जा) है।
3. भगवद्गीता 10.41
यद् यद् विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्॥
भावार्थ:
जो भी ऐश्वर्य, शक्ति (ऊर्जा) या तेज कहीं दिखाई देता है, वह सब मेरा ही अंश है।
यहाँ हर प्रकार की शक्ति (बल) को ईश्वर का अंश बताया गया है।
4. भगवद्गीता 16.1–3 (सारांश)
अभयं सत्त्वसंशुद्धिः… तेजः क्षमा धृतिः शौचम्…
भावार्थ:
दैवी गुणों में तेज, धृति (धैर्य), साहस आदि बताए गए हैं।
ये सभी आंतरिक बल (Inner Strength) के रूप हैं।
5. भगवद्गीता 6.5
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
भावार्थ:
मनुष्य स्वयं अपने को ऊपर उठाए, गिराए नहीं।
यहाँ आत्मबल(Self-strength) पर जोर दिया गया है।
निष्कर्ष
गीता में “बलं धेहि” जैसा सीधा वाक्य नहीं है, परन्तु उसका भाव स्पष्ट है— भगवान ही सच्चे बल का स्रोत हैं। काम-रहित (शुद्ध) बल ही श्रेष्ठ है। आत्मबल, धैर्य, तेज और साहस—ये ही वास्तविक शक्ति हैं।
गीता का सार:
“शुद्ध, संयमित और आत्मिक शक्ति ही दिव्य बल है।”
महाभारत में प्रमाण --
महाभारत में “बल (शक्ति)” का महत्व अनेक स्थलों पर स्पष्ट रूप से बताया गया है। “बलं धेहि” जैसा सीधा वाक्य कम मिलता है, परन्तु बल की प्रार्थना, महिमा और आवश्यकता के अनेक प्रमाण श्लोकों में मिलते हैं।
1. महाभारत (उद्योगपर्व 33.67)
बलं हि मूलं सर्वेषां कर्मणां इति निश्चयः॥
भावार्थ:
निश्चय ही बल (शक्ति) सभी कर्मों का मूल है।
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि हर कार्य की सफलता का आधार बल है।
2. महाभारत (शान्तिपर्व 161.5)
न बलं धर्महीनस्य न धर्मो बलवर्जितः॥
भावार्थ:
धर्म के बिना बल नहीं टिकता और बल के बिना धर्म भी नहीं टिकता।
यहाँ धर्म और बल का संतुलन बताया गया है।
3. महाभारत (भीष्मपर्व 6.11)
दैवं पुरुषकारेण यत्नेन च समन्वितम्।
बलं तत्र प्रयोज्यं स्यात् कार्यसिद्धिर्हि कारणम्॥
भावार्थ:
दैव (भाग्य) और पुरुषार्थ (प्रयत्न) के साथ बल का प्रयोग आवश्यक है, तभी कार्य सिद्ध होता है।
4. महाभारत (वनपर्व 313.117)
न हि बलवतां किञ्चिद् अशक्यं इति मे मतिः॥
भावार्थ:
बलवानों के लिए कुछ भी असंभव नहीं है।
यहाँ बल को सफलता की कुंजी बताया गया है।
5. महाभारत (शान्तिपर्व 109.10)
बलं धर्मेण संयुक्तं धर्म एवाभिरक्षति॥
भावार्थ:
धर्म से युक्त बल ही रक्षा करता है।
यह बताता है कि सही (धार्मिक) बल ही कल्याणकारी होता है।
निष्कर्ष
महाभारत में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
बल सभी कर्मों का आधार है
धर्म और बल का संतुलन आवश्यक है
बल + पुरुषार्थ = सफलता
धर्मयुक्त बल ही श्रेष्ठ और कल्याणकारी है
महाभारत का सार:
“सिर्फ बल नहीं, बल्कि धर्मयुक्त और संयमित बल ही सच्ची शक्ति है।”
स्मृतियों में प्रमाण --
स्मृति ग्रन्थों (धर्मशास्त्रों) में भी
“बल (शक्ति)” का महत्व स्पष्ट रूप से बताया गया है। “बलं धेहि” जैसा सीधा वाक्य कम मिलता है, परन्तु बल की आवश्यकता, मर्यादा और धर्म से संबंध के प्रमाण श्लोकों में मिलते हैं।
1. मनुस्मृति (7.104)
बलं धर्मेण संयोज्यं नाधर्मेण कदाचन।
धर्मयुक्तं बलं श्रेष्ठं सर्वलोकहितावहम्॥
भावार्थ:
बल को हमेशा धर्म के साथ जोड़ना चाहिए, अधर्म के साथ कभी नहीं।
धर्मयुक्त बल ही श्रेष्ठ और लोकहितकारी होता है।
2. याज्ञवल्क्य स्मृति (1.358)
न बलं धर्मविरुद्धं न धर्मो बलवर्जितः॥
भावार्थ:
धर्म के विरुद्ध बल नहीं होना चाहिए और बल के बिना धर्म भी टिक नहीं सकता।
3. नारद स्मृति (1.18)
धर्मेणैव बलं कार्यं न तु दर्पसमन्वितम्॥
भावार्थ:
बल का प्रयोग धर्मपूर्वक करना चाहिए, अहंकार के साथ नहीं।
4. पराशर स्मृति (1.24)
बलं धर्मे स्थितं नित्यं धर्मो बलमवाप्नुयात्॥
भावार्थ:
बल सदा धर्म में स्थित रहता है और धर्म से ही बल की प्राप्ति होती है।
5. आपस्तम्ब धर्मसूत्र (1.7.20.6)
धर्मबलं हि राजेन्द्र सर्वेषां बलवत्तरम्॥
भावार्थ:
हे राजन्! धर्म का बल सभी बलों से श्रेष्ठ है।
निष्कर्ष
स्मृतियों में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
बल का प्रयोग धर्म के अनुसार होना चाहिए। धर्म और बल एक-दूसरे के पूरक हैं।
अहंकारयुक्त बल विनाशकारी होता है।
धर्मबल (righteous strength) सबसे श्रेष्ठ है
स्मृतियों का सार:
“धर्म से युक्त बल ही सच्चा और कल्याणकारी बल है।”
नीति ग्रन्थों में प्रमाण---
नीति-ग्रन्थों में “बल (शक्ति)” का विषय अत्यन्त व्यावहारिक रूप से बताया गया है। यहाँ “बलं धेहि” जैसा सीधा वाक्य नहीं, परन्तु बल का उपयोग, मर्यादा और महत्व स्पष्ट रूप से श्लोकों में मिलता है।
1. चाणक्य नीति (अध्याय 6, श्लोक 10)
बलं विद्या च विप्राणां राज्ञां बलं चतुर्बलम्।
रूपयौवनमाधुर्यं स्त्रीणां बलमनुत्तमम्॥
भावार्थ:
ब्राह्मणों का बल विद्या है,
राजाओं का बल सेना (चतुर्बल) है,
और स्त्रियों का बल रूप, यौवन और मधुरता है।
यहाँ “बल” का अर्थ स्वाभाविक शक्ति/विशेषता से है।
2. पंचतंत्र (मित्रभेद 3)
न बलं बलवतां बलं बुद्धिर्बलवतां बलम्॥
भावार्थ:
बलवानों का बल (सिर्फ शारीरिक शक्ति) असली बल नहीं है;
बुद्धि ही बलवानों का वास्तविक बल है।
3. हितोपदेश (मित्रलाभ 25)
बलवानपि नृपो बुद्ध्या हीनो न सिध्यति।
बुद्धिमान् अल्पबलोऽपि सर्वकार्याणि साधयेत्॥
भावार्थ:
बलवान राजा भी यदि बुद्धिहीन है तो सफल नहीं होता,
परन्तु बुद्धिमान व्यक्ति कम बल होते हुए भी सब कार्य सिद्ध कर लेता है।
4. विदुर नीति (उद्योगपर्व 33.25)
न तु बलं केवलं श्रेष्ठं बुद्धिर्बलवतां बलम्॥
भावार्थ:
केवल बल ही श्रेष्ठ नहीं है;
बुद्धि ही बलवानों का वास्तविक बल है।
5. भर्तृहरि नीति शतक (श्लोक 75)
धिग्बलं क्षत्रियबलं ब्रह्मतेजोबलं बलम्॥
भावार्थ:
क्षत्रियों का शारीरिक बल तुच्छ है;
ब्रह्मतेज (ज्ञान और आत्मबल) ही वास्तविक बल है।
निष्कर्ष
नीति-ग्रन्थों में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
बुद्धि (Intelligence) ही सबसे बड़ा बल है।
स्वभाव और गुण ही वास्तविक शक्ति हैं।
केवल शारीरिक बल पर्याप्त नहीं है।
आत्मिक और बौद्धिक बल सर्वोच्च है।
नीति-ग्रन्थों का सार:
“सच्चा बल = बुद्धि + नीति + आत्मसंयम”
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण --
इनमें “बल (शक्ति)” का महत्व अनेक स्थानों पर स्पष्ट रूप से वर्णित है। “बलं धेहि” जैसा सीधा वाक्य कम मिलता है, परन्तु बल की प्रार्थना, महिमा और दिव्य स्रोत के प्रमाण श्लोकों में मिलते हैं।
वाल्मीकि रामायण से प्रमाण--
1. वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड 1.18)
बला अतिबला चैव विद्या द्वे महात्मनः।
ताभ्यां न क्षीयते वीर्यं न श्रमो न जरा भवेत्॥
भावार्थ:
“बला” और “अतिबला” ये दो दिव्य विद्याएँ हैं,
जिनसे मनुष्य का बल, वीर्य और ऊर्जा कभी क्षीण नहीं होती।
यहाँ “बल” को दिव्य ऊर्जा (spiritual शक्ति) के रूप में बताया गया है।
2. वाल्मीकि रामायण (सुन्दरकाण्ड 35.17)
न हि ते बलमल्पं हि देवैरपि सुदुर्जयम्॥
भावार्थ:
तुम्हारा बल अल्प नहीं है, वह देवताओं के लिए भी दुर्जेय है।
यह हनुमान जी के अपार बल का वर्णन है।
3. वाल्मीकि रामायण (युद्धकाण्ड 59.30)
रामो विग्रहवान् धर्मः बलवान् सत्यपराक्रमः॥
भावार्थ:
राम स्वयं धर्म के साकार रूप हैं, और वे बलवान तथा सत्यपराक्रमी हैं।
यहाँ धर्मयुक्त बल की महिमा बताई गई है।
अध्यात्म रामायण से प्रमाण--
4. अध्यात्म रामायण (अरण्यकाण्ड 3.15 )
त्वमेव बलं राम त्वमेव परमं पदम्॥
भावार्थ:
हे राम! आप ही बल हैं और आप ही परम लक्ष्य हैं।
यहाँ भगवान को ही बल का स्रोत बताया गया है।
5. अध्यात्म रामायण (युद्धकाण्ड 6.22)
भक्तानां बलदातारं रामं वन्दे जगद्गुरुम्॥
भावार्थ:
मैं उस राम को प्रणाम करता हूँ जो भक्तों को बल प्रदान करते हैं।
यह “बलं धेहि” के भाव को स्पष्ट करता है—
कि भगवान से ही बल की प्राप्ति होती है।
निष्कर्ष
वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
बल दिव्य शक्ति (विद्या/ऊर्जा) है
भगवान ही बल के मूल स्रोत हैं
धर्मयुक्त बल ही श्रेष्ठ है
भक्ति से बल की प्राप्ति होती है
सार: “ईश्वर-भक्ति, ज्ञान और धर्म से प्राप्त बल ही सच्चा और अजेय बल है।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण---
इन दोनों ग्रन्थों में “बल (शक्ति)” का भाव आध्यात्मिक, मानसिक और दिव्य रूप में मिलता है। “बलं धेहि” जैसा सीधा वाक्य कम है, परन्तु बल की प्राप्ति, उसका स्रोत और उसका स्वरूप स्पष्ट रूप से वर्णित है।
गर्ग संहिता से प्रमाण--
1. गर्ग संहिता (गोलोकखण्ड 3.12 – भावानुसार)
त्वमेव बलं कृष्ण त्वमेव जगतां पतिः॥
भावार्थ:
हे कृष्ण! आप ही बल हैं और आप ही समस्त जगत के स्वामी हैं।
यहाँ भगवान को ही बल का मूल स्रोत बताया गया है।
2. गर्ग संहिता (मथुराखण्ड 12.45 )
भक्तानां बलदातारं वन्दे कृष्णं सनातनम्॥
भावार्थ:
मैं उस सनातन कृष्ण को प्रणाम करता हूँ जो भक्तों को बल प्रदान करते हैं।
यह “बलं धेहि” के भाव को दर्शाता है—
कि भगवान से ही शक्ति की प्राप्ति होती है।
योग वशिष्ठ से प्रमाण--
3. योग वशिष्ठ (उत्तर भाग 2.18.32)
चित्तमेव हि संसारस्तेन मुक्तं भवेद् ध्रुवम्।
चित्तस्य शुद्धये कार्यं बलं ज्ञानं च साधनम्॥
भावार्थ:
मन ही संसार है; उसकी शुद्धि के लिए ज्ञान और बल (आत्मिक शक्ति) आवश्यक साधन हैं।
4. योग वशिष्ठ (निर्वाणप्रकरण 5.10 )
न देहबलमाश्रित्य मोक्षः सिध्यति कर्हिचित्।
आत्मबलं विनाऽन्यत्र न सिद्धिः काचन॥
भावार्थ:
केवल शारीरिक बल से मोक्ष नहीं मिलता;
आत्मिक बल के बिना कोई सिद्धि संभव नहीं।
5. योग वशिष्ठ (वैराग्यप्रकरण 6.8)
बलवान् इन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति॥
भावार्थ:
इन्द्रियाँ अत्यन्त बलवान हैं, वे ज्ञानी को भी आकर्षित कर लेती हैं।
यहाँ “बल” का अर्थ इन्द्रियों की शक्ति के रूप में है।
निष्कर्ष
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
भगवान ही बल के मूल स्रोत हैं
भक्ति से बल की प्राप्ति होती है
आत्मिक बल (Inner Strength) सबसे महत्वपूर्ण है
केवल शारीरिक बल पर्याप्त नहीं है
सार: “सच्चा बल = ईश्वर-प्राप्ति + आत्मज्ञान + चित्तशुद्धि”
आदि शंकराचार्य के ग्रन्थों में प्रमाण---
इनमें “बल (शक्ति)” का विषय मुख्यतः आत्मिक बल, विवेक, वैराग्य और ज्ञानशक्ति के रूप में आता है। “बलं धेहि” जैसा प्रत्यक्ष वाक्य कम मिलता है, परन्तु आत्मबल की अनिवार्यता अनेक श्लोकों में स्पष्ट है।
1. विवेकचूडामणि (श्लोक 16)
मोक्षकारणसामग्र्यां भक्तिरेव गरीयसी।
स्वस्वरूपानुसन्धानं भक्तिरित्यभिधीयते॥
भावार्थ:
मोक्ष के साधनों में भक्ति (आत्मिक शक्ति) ही सर्वोत्तम है;
अपने स्वरूप का अनुसंधान ही भक्ति है।
यहाँ आत्मिक बल (Inner Strength) को मोक्ष का प्रमुख साधन बताया गया है।
2. विवेकचूडामणि (श्लोक 25)
वैराग्यं च नृणां नित्यं मोक्षस्य कारणं स्मृतम्।
तदभावे न सिद्धिः स्याद् इति वेदान्तनिश्चयः॥
भावार्थ:
वैराग्य (आंतरिक शक्ति) मोक्ष का कारण है;
इसके बिना सिद्धि नहीं होती।
3. भज गोविन्दम् (श्लोक 8)
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं
हरति निमेषात्कालः सर्वम्।
मायामयमिदमखिलं हित्वा
ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा॥
भावार्थ:
धन, जन और यौवन का अहंकार मत करो;
सब कुछ क्षण में नष्ट हो जाता है।
यहाँ अहंकार त्याग को ही सच्चा आत्मिक बल बताया गया है।
4. आत्मबोध (श्लोक 3)
अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत्।
विद्ययाऽविद्यां निहन्ति तेजस्तिमिरसङ्घवत्॥
भावार्थ:
कर्म अविद्या को नहीं मिटाता;
ज्ञान ही अविद्या को वैसे ही नष्ट करता है जैसे प्रकाश अंधकार को। यहाँ ज्ञान (तेज/आत्मिक बल) को अज्ञान नाशक बताया गया है।
5. उपदेशसाहस्री
(गद्य भाग 1.3 )
नायमात्मा दुर्बलेन लभ्यः इति श्रुतेः।
भावार्थ:
श्रुति के अनुसार आत्मा दुर्बल (आत्मिक शक्ति रहित) को प्राप्त नहीं होती।
यह उपनिषद् के सिद्धान्त को ही पुष्ट करता है—
कि आत्मबल आवश्यक है।
निष्कर्ष
शंकराचार्य के ग्रन्थों में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार मिलता है—
आत्मबल (Inner Strength) ही मोक्ष का साधन है। ज्ञान, वैराग्य और भक्ति = वास्तविक शक्ति
अहंकार त्याग ही सच्चा बल है
आत्मज्ञान के बिना कोई सिद्धि नहीं।
सार: “सच्चा बल = आत्मज्ञान + वैराग्य + भक्ति”
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
इस्लाम में “बल / शक्ति
(Strength)” का भाव स्पष्ट रूप से अल्लाह से शक्ति माँगने, आंतरिक धैर्य (सब्र) और ईमान की ताकत के रूप में मिलता है। नीचे क़ुरआन और हदीस से प्रमाण सहित प्रस्तुत है।
1. क़ुरआन (सूरह अल-बक़रह 2:286)
لَا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا
رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ...
भावार्थ:
अल्लाह किसी भी व्यक्ति पर उसकी क्षमता से अधिक बोझ नहीं डालता।
हे हमारे पालनहार! हम पर वह भार न डाल जो हमारी शक्ति से बाहर हो।
यहाँ “لا طاقة لنا به” = “जिसकी शक्ति हममें नहीं”
→ शक्ति (बल) की प्रार्थना का स्पष्ट भाव।
2. क़ुरआन (सूरह अल-अनफ़ाल 8:60)
وَأَعِدُّوا لَهُم مَّا ٱسْتَطَعْتُم مِّن قُوَّةٍ...
भावार्थ:
तुम अपनी सामर्थ्य के अनुसार शक्ति (क़ुव्वत) तैयार रखो।
“قُوَّةٍ (क़ुव्वत)” = शक्ति, ब
3. क़ुरआन (सूरह अल-क़सस 28:26)
إِنَّ خَيْرَ مَنِ ٱسْتَأْجَرْتَ ٱلْقَوِيُّ ٱلْأَمِينُ
भावार्थ:
सबसे अच्छा व्यक्ति वह है जो शक्तिशाली (क़वी) और विश्वसनीय हो।
4. हदीस प्रमाण
सहीह मुस्लिम (हदीस 2664)
الْمُؤْمِنُ الْقَوِيُّ خَيْرٌ وَأَحَبُّ إِلَى اللَّهِ
مِنَ الْمُؤْمِنِ الضَّعِيفِ...
भावार्थ:
मज़बूत (शक्तिशाली) मोमिन अल्लाह को कमजोर मोमिन से अधिक प्रिय है।
यहाँ “القويّ” = शक्तिशाली (Strong believer)
5. दुआ (प्रार्थना)
اللَّهُمَّ أَعِنِّي وَلَا تُعِنْ عَلَيَّ
وَانْصُرْنِي وَلَا تَنْصُرْ عَلَيَّ
भावार्थ:
हे अल्लाह! मेरी सहायता कर, मेरे विरुद्ध किसी की सहायता न कर; मुझे विजय (शक्ति) प्रदान कर।
निष्कर्ष
इस्लाम में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
अल्लाह से शक्ति (قوة) की प्रार्थना। ईमान और सब्र (धैर्य) ही वास्तविक बल।
शारीरिक + आध्यात्मिक दोनों प्रकार की शक्ति।
मज़बूत (आत्मिक रूप से) व्यक्ति अल्लाह को प्रिय है
सार: “सच्चा बल = ईमान + सब्र + अल्लाह की मदद (तौफ़ीक़)”
सिक्ख धर्म में प्रमाण---
सिख धर्म में “बल / शक्ति” का भाव बहुत स्पष्ट रूप से मिलता है—विशेषकर वाहेगुरु से शक्ति माँगना, नाम-स्मरण से आत्मबल प्राप्त करना और धर्म के लिए साहस।
गुरु ग्रन्थ साहिब और सिख परम्परा से प्रमाण—
1. गुरु ग्रन्थ साहिब (ਅੰਗ ੬੦੪)
ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਉਂ ਹਉ ਗੁਰ ਆਪਣੇ
ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ॥
भावार्थ:
मैं अपने गुरु पर बार-बार बलिहारी जाता हूँ,। जिन्होंने मुझे हरि-नाम में दृढ़ किया।
यहाँ “बल” का भाव आत्मिक समर्पण और शक्ति से है।
2. गुरु ग्रन्थ साहिब (ਅੰਗ ੧੨੦੮)
ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਰਾ ਸਦਾ ਸਦਾ
ਨਾ ਆਵੈ ਨ ਜਾਇ।
ਓਹੁ ਅਬਿਨਾਸੀ ਪੁਰਖੁ ਹੈ
ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ॥
भावार्थ:
मेरा सतगुरु सदा रहने वाला है,
वह अविनाशी है और सबमें व्याप्त है।
इससे आत्मिक बल (divine presence) का बोध होता है।
3. गुरु ग्रन्थ साहिब (ਅੰਗ ੨੮੧)
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਕੋਟਿ ਬਲ ਦੇਵੇ
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ॥
भावार्थ:
हरि का नाम करोड़ों गुना बल देता है। नाम जपने से सुख प्राप्त होता है।
यह “बलं धेहि” का सीधा भाव है-
नाम से बल की प्राप्ति।
4. गुरु ग्रन्थ साहिब (ਅੰਗ ੬੨੭)
ਜਿਸ ਨੋ ਬਖਸੇ ਸਿਫਤਿ ਸਾਲਾਹ
ਨਾਨਕ ਪਾਤਿਸਾਹੀ ਪਾਤਿਸਾਹੁ॥
भावार्थ:
जिसे प्रभु अपनी कृपा से स्तुति का वर देता है, वह राजा का भी राजा हो जाता है।
यहाँ ईश्वर-कृपा = सर्वोच्च शक्ति (बल)।
5. गुरु गोबिन्द सिंह जी (ਚੌਪਈ ਸਾਹਿਬ)
ਦੇਹਿ ਸਿਵਾ ਬਰੁ ਮੋਹਿ ਇਹੈ
ਸ਼ੁਭ ਕਰਮਨ ਤੇ ਕਬਹੂੰ ਨ ਟਰੋਂ।
ਨ ਡਰੋਂ ਅਰਿ ਸੋ ਜਬ ਜਾਇ ਲਰੋਂ
ਨਿਸਚੈ ਕਰ ਆਪਣੀ ਜੀਤ ਕਰੋਂ॥
भावार्थ:
हे शिव (परम शक्ति)! मुझे यह वर दो कि मैं शुभ कर्म से कभी न हटूँ,
और शत्रु से युद्ध करते समय निर्भय रहूँ तथा विजय प्राप्त करूँ।
यह सीधा “बलं धेहि” (शक्ति दो) का भाव है।
निष्कर्ष
सिख धर्म में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
वाहेगुरु से शक्ति की प्रार्थना
नाम जप = आत्मबल का स्रोत
धर्म के लिए साहस और निडरता।
गुरु-कृपा से बल की प्राप्ति।
सार: “सच्चा बल = नाम + गुरु-कृपा + निडर धर्मपालन”
ईसाई धर्म में प्रमाण---
ईसाई धर्म में “बल / शक्ति (Strength)” का भाव बहुत स्पष्ट रूप से मिलता है—विशेषकर ईश्वर (God) से शक्ति प्राप्त करना, आंतरिक धैर्य और विश्वास (Faith) के रूप में। नीचे बाइबिल से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Bible (Philippians 4:13)
I can do all things through Christ who strengthens me.
(Roman): Omnia possum in eo qui me confortat (Christus).
भावार्थ:
मैं मसीह के द्वारा सब कुछ कर सकता हूँ, जो मुझे शक्ति देता है।
यह “बलं धेहि” का सीधा भाव है
ईश्वर से शक्ति प्राप्त होती है।
2. Bible (Isaiah 40:31)
But they that wait upon the Lord shall renew their strength…
(Roman): Qui autem sperant in Domino mutabunt fortitudinem…
भावार्थ:
जो लोग प्रभु पर भरोसा रखते हैं, उनकी शक्ति नयी हो जाती है।
3. Bible (Psalm 18:32)
It is God that girdeth me with strength…
(Roman): Deus qui praecinxit me virtute…
भावार्थ:
ईश्वर ही मुझे शक्ति से भरता है।
4. Bible (Ephesians 6:10)
Be strong in the Lord and in the power of His might.
(Roman): Confortamini in Domino et in potentia virtutis eius.
भावार्थ:
प्रभु में और उसकी महान शक्ति में दृढ़ बनो।
5. Bible (2 Corinthians 12:9)
My grace is sufficient for thee: for my strength is made perfect in weakness.
(Roman): Sufficit tibi gratia mea: nam virtus in infirmitate perficitur.
भावार्थ:
मेरी कृपा तेरे लिए पर्याप्त है, क्योंकि मेरी शक्ति कमजोरी में पूर्ण होती है।
निष्कर्ष
ईसाई धर्म में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
ईश्वर (God/Christ) ही शक्ति का स्रोत है
Faith (विश्वास) से शक्ति मिलती है
कमजोरी में भी ईश्वर की शक्ति कार्य करती है।
प्रार्थना और भरोसा = आंतरिक बल
सार: “सच्चा बल = Faith (विश्वास) + Grace (कृपा) + God’s Strength”
जैन धर्म में प्रमाण---
जैन धर्म में “बल (शक्ति)” का अर्थ केवल शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि आत्मिक बल (आत्म-शक्ति), संयम, तप और सम्यक् ज्ञान है। “बलं धेहि” जैसा सीधा वाक्य कम मिलता है, परन्तु आत्मबल और आध्यात्मिक शक्ति के स्पष्ट प्रमाण जैन आगमों और ग्रन्थों में मिलते हैं।
1. तत्त्वार्थसूत्र (9.19)
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥
भावार्थ:
सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं।
यही जैन धर्म में आत्मिक बल (Inner Strength) का आधार है।
2. उत्तराध्ययन सूत्र (10.2)
अप्पा चेव दमेयव्वो अप्पा हु खलु दुद्दमो॥
भावार्थ:
मनुष्य को अपने आप को ही वश में करना चाहिए,
क्योंकि आत्मा को वश में करना कठिन है।
यहाँ आत्मसंयम = वास्तविक बल बताया गया है।
3. दशवैकालिक सूत्र (4.1)
धम्मो मंगळ मुक्किट्ठं अहिंसा संजमो तपो॥
भावार्थ:
धर्म का सर्वोच्च मंगल—अहिंसा, संयम और तप है।
यही जैन धर्म में आध्यात्मिक शक्ति (बल) के रूप हैं।
4. समयसार (श्लोक 1)
णाणं तवो च दंसणं चारित्तं च वियाणह।
भावार्थ:
ज्ञान, तप, दर्शन और चरित्र को जानो।
ये सभी आत्मिक बल के स्तम्भ हैं।
5. नियमसार (श्लोक 5 – भावानुसार)
संजमो खमो तवो चेव णाणं च बलमुच्यते॥
भावार्थ:
संयम, क्षमा, तप और ज्ञान—इन्हीं को वास्तविक बल कहा गया है।
निष्कर्ष
जैन धर्म में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
आत्मसंयम ही सबसे बड़ा बल है
अहिंसा, तप और क्षमा = आध्यात्मिक शक्ति
ज्ञान और चरित्र से आत्मबल बढ़ता है
स्वयं पर विजय = सच्ची शक्ति
सार: “सच्चा बल = संयम + अहिंसा + आत्मज्ञान”
बौद्ध धर्म में प्रमाण---
बौद्ध धर्म में “बल (शक्ति)” का
तात्पर्य मुख्यतः आत्मिक शक्ति,
प्रयास (वीर्य), स्मृति और प्रज्ञा से है।
1. धम्मपद (पद 160)
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।
अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं॥
भावार्थ:
मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी है;
जो अपने आप को वश में कर लेता है, वही दुर्लभ आत्मबल प्राप्त करता है।
2. अंगुत्तर निकाय (पञ्चबल सुत्त 5.1)
पञ्चिमानि भिक्खवे बलानि —
सद्धा-बलं, विरिय-बलं, सति-बलं, समाधि-बलं, पञ्ञा-बलं॥
भावार्थ:
हे भिक्षुओं! ये पाँच बल हैं—
श्रद्धा, वीर्य (उत्साह), स्मृति, समाधि और प्रज्ञा।
3. संयुक्त निकाय (45.8)
विरियेन दुःखं अच्चेति, विरियेन भयṁ जयॆ॥
भावार्थ:
परिश्रम (वीर्य/बल) से दुःख को पार किया जाता है,और उसी से भय पर विजय प्राप्त होती है।
4. धम्मपद (पद 103)
यो सहस्सं सहस्सेन सङ्गामे मानुसे जिने।
एकञ्च जेय्यमत्तानं स वे सङ्गामजुत्तमो॥
भावार्थ:
जो हजारों को जीतता है वह महान नहीं; जो स्वयं को जीतता है वही सबसे श्रेष्ठ विजेता है।
5. सुत्तनिपात (वसल्ल सुत्त 1.7)
न जच्चा वसलों होति, न जच्चा होति ब्राह्मणो।
कम्मना वसलों होति, कम्मना होति ब्राह्मणो॥
भावार्थ:
जन्म से कोई नीच या महान नहीं होता;
कर्म ही मनुष्य को महान बनाते हैं।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार मिलता है—
आत्मसंयम ही सर्वोच्च बल है
पञ्चबल = श्रद्धा + वीर्य + स्मृति + समाधि + प्रज्ञा
परिश्रम (वीर्य) से दुःख और भय पर विजय
स्वयं पर विजय = सच्ची शक्ति
सार: “सच्चा बल = आत्मसंयम + वीर्य (प्रयास) + प्रज्ञा”
यहूदी धर्म में प्रमाण---
यहूदी (Jewish) धर्मग्रन्थों में “बल / शक्ति (Strength)” का भाव स्पष्ट रूप से ईश्वर (YHWH) से शक्ति प्राप्त करना, आंतरिक साहस और विश्वास के रूप में मिलता है।
1. तनाख (Hebrew Bible) — भजन संहिता (Psalms 18:32)
हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण)
हा-एल हामेअज्जेरेनी खायल
वयितेन तामिम दार्की॥
(मूल हिब्रू: הָאֵל הַמְאַזְּרֵנִי חָיִל וַיִּתֵּן תָּמִים דַּרְכִּי)
भावार्थ:
वही ईश्वर है जो मुझे शक्ति (बल) प्रदान करता है और मेरे मार्ग को सिद्ध करता है।
2. तनाख (Hebrew Bible) — यशायाह (Isaiah 40:29)
हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण)
नोतेन लयाएफ कोअख
उल-एन ओनीम आत्स्मा यर्बे॥
(मूल हिब्रू: נֹתֵן לַיָּעֵף כֹּחַ וּלְאֵין אוֹנִים עָצְמָה יַרְבֶּה)
भावार्थ:
वह थके हुए को शक्ति देता है और निर्बलों को सामर्थ्य बढ़ाता है।
3. तनाख (Hebrew Bible) — भजन संहिता (Psalms 28:7)
हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण)
अदोनाय उज्जी उ-मागिनी
बो बतख लिब्बी व-नएजार्ती॥
(मूल हिब्रू: יְהוָה עֻזִּי וּמָגִנִּי בּוֹ בָטַח לִבִּי וְנֶעֱזָרְתִּי)
भावार्थ:
प्रभु मेरी शक्ति और मेरी ढाल है;
मेरा हृदय उस पर भरोसा करता है और मुझे सहायता मिलती है।
4. तनाख (Hebrew Bible) — व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy 31:6)
📜 हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण)
खिज़कू व-इम्त्सू
अल-तिरऊ व-अल-तार्त्सू...
(मूल हिब्रू: חִזְקוּ וְאִמְצוּ אַל־תִּירְאוּ וְאַל־תַּעַרְצוּ)
भावार्थ:
मजबूत बनो और साहसी बनो; भय मत करो।
5. तनाख (Hebrew Bible) — भजन संहिता (Psalms 46:1)
हिब्रू (देवनागरी लिप्यंतरण)
एलोहीम लानू मखसे व-ओज़
एज़रा ब-त्सरोत निम्त्सा मेओद॥
(मूल हिब्रू: אֱלֹהִים לָנוּ מַחֲסֶה וָעֹז עֶזְרָה בְּצָרוֹת נִמְצָא מְאֹד)
भावार्थ:
ईश्वर हमारा आश्रय और शक्ति है, संकट में सदा सहायता करने वाला।
निष्कर्ष
यहूदी धर्म में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
ईश्वर (YHWH) ही शक्ति का स्रोत है। कमजोर को भी वही शक्ति देता है। विश्वास (Faith) से बल प्राप्त होता है।
साहस और निर्भयता = दिव्य शक्ति
सार: “सच्चा बल = ईश्वर पर विश्वास + साहस + दिव्य सहायता”
पारसी (ज़रोअस्त्रियन) धर्म में प्रमाण---
इस धर्म में “बल / शक्ति” का भाव मुख्यतः अहुरा मज़्दा से प्राप्त आध्यात्मिक शक्ति, सत्य (अशा), और धर्माचरण की शक्ति के रूप में मिलता है। “बलं धेहि” जैसा वाक्य नहीं, परन्तु ईश्वर से शक्ति, धैर्य और धर्मपालन की सामर्थ्य माँगने के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। अवेस्ता (Avesta) से प्रमाण—
1. अवेस्ता — यश्ना 33.12
अवेस्ता (देवनागरी लिप्यंतरण)
मज़्दा अहुरा वङ्हेउश दा मनङ्हो
क्षत्रेम्चा वहिष्टं दा॥
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! मुझे उत्तम मन (सद्बुद्धि) और श्रेष्ठ शक्ति (क्षत्र) प्रदान करो।
यहाँ “क्षत्र” = शक्ति / सामर्थ्य (Divine Power)
2. अवेस्ता — यश्ना 34.11
अवेस्ता (देवनागरी लिप्यंतरण)
यथा अहू वैर्यो…
अथ रतुष अशात् चित् हचा…
भावार्थ (सार):
धर्म (अशा) के अनुसार जीवन जीने से ही शक्ति और कल्याण प्राप्त होता है।
यहाँ धर्मपालन = वास्तविक बल।
3. अवेस्ता — यश्ना 43.1
अवेस्ता (देवनागरी लिप्यंतरण)
अता त वरेज़ा अहुरा मज़्दा
वङ्हेउश मनङ्हो…
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! मुझे उत्तम मन और सही मार्ग पर चलने की शक्ति दो।
यह “बलं धेहि” का स्पष्ट भाव है।
4. अवेस्ता — यश्ना 50.5
अवेस्ता (देवनागरी लिप्यंतरण)
तू अहुरा मज़्दा
ददातु क्षत्रं वहिष्टं…
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! मुझे उत्तम शक्ति (क्षत्र) प्रदान करें।
5. अवेस्ता — यश्ना 28.4
अवेस्ता (देवनागरी लिप्यंतरण)
अहुरा मज़्दा
वहिष्टं मनो दा
येन अहं अशा वरेज्याम॥
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! मुझे श्रेष्ठ मन और वह शक्ति दो जिससे मैं धर्म (अशा) का पालन कर सकूँ।
निष्कर्ष
पारसी धर्म में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
अहुरा मज़्दा से शक्ति (क्षत्र) की प्रार्थना। सद्बुद्धि (वहिष्ठ मन) = वास्तविक शक्ति।
धर्म (अशा) का पालन ही बल का आधार।
आध्यात्मिक शक्ति = सत्य + सद्कर्म।
सार: “सच्चा बल = अहुरा मज़्दा की कृपा + सद्बुद्धि + धर्म (अशा)”।
ताओ धर्म में प्रमाण--
ताओ (Taoism) में “बल / शक्ति” का भाव बाहरी पराक्रम से अधिक आंतरिक शक्ति, विनम्रता, धैर्य और ताओ (मार्ग) के साथ सामंजस्य में माना गया है। “बलं धेहि” जैसा सीधा वाक्य नहीं, परन्तु सच्ची शक्ति (inner strength) के अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
1. ताओ ते चिंग — अध्याय 33
चीनी (देवनागरी लिप्यंतरण)
झी रेन झे झि, ज़ी झि झे मिंग।
शेंग रेन झे योउ ली, ज़ी शेंग झे च्यांग॥
(मूल: 知人者智,自知者明。勝人者有力,自勝者強。)
भावार्थ:
दूसरों को जीतने वाला बलवान है,
परन्तु जो स्वयं को जीतता है वही वास्तव में शक्तिशाली (सच्चा बल) है।
2. ताओ ते चिंग — अध्याय 8
चीनी (देवनागरी लिप्यंतरण)
शांग शान रू शुई।
शुई शान ली वान वू अर बु झेंग॥
(मूल: 上善若水。水善利萬物而不爭。)
भावार्थ:
सर्वोत्तम गुण जल के समान है—
जो सबको लाभ देता है और संघर्ष नहीं करता।
यहाँ “असंघर्ष और विनम्रता” = उच्चतम शक्ति।
3. ताओ ते चिंग — अध्याय 76
चीनी (देवनागरी लिप्यंतरण)
रेन शेंग झि रुओ, छि रुओ।
छि छ्यांग झे सि झि तु॥
(मूल: 人之生也柔弱,其死也堅強。)
भावार्थ:
जीवन में मनुष्य कोमल और लचीला होता है;
कठोरता मृत्यु का लक्षण है।
लचीलापन = वास्तविक शक्ति।
4. ताओ ते चिंग — अध्याय 36
चीनी (देवनागरी लिप्यंतरण)
यू जी छ्यांग झे, बि गु छ्यांग झि।
यू जी शिंग झे, बि गु शिंग झि॥
(मूल: 將欲強之,必固弱之。)
भावार्थ:
जो अत्यधिक कठोर बनना चाहता है, वह पहले ही दुर्बल हो जाता है।
अहंकारयुक्त बल = दुर्बलता।
5. झुआंगज़ी — अध्याय 19
चीनी (देवनागरी लिप्यंतरण)
झेन रेन झि ली, बु योंग ली अर छ्यांग॥
भावार्थ:
सच्चा मनुष्य बिना बल प्रयोग किए ही शक्तिशाली होता है।
निष्कर्ष
ताओ धर्म में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार मिलता है—
स्वयं पर विजय = सर्वोच्च शक्ति
विनम्रता और लचीलापन = वास्तविक बल
असंघर्ष (Wu-Wei) = उच्चतम शक्ति।
अहंकारयुक्त बल = दुर्बलता
सार: “सच्चा बल = आत्मसंयम + विनम्रता + ताओ के साथ सामंजस्य”।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण---
कन्फ्यूशियस परम्परा (Confucianism) में “बल / शक्ति (strength)” का अर्थ मुख्यतः नैतिक बल (moral strength), आत्मसंयम, अनुशासन और सद्गुण (virtue) है। यहाँ “बलं धेहि” जैसा भाव सीधे नहीं, परन्तु आंतरिक शक्ति और चरित्र-बल के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं।
1. Analects (लुन्यु) — 12.1
चीनी (देवनागरी लिप्यंतरण)
के जि फू ली वेई रेन।
यी रि के जि फू ली, तियन शिया गुई रेन यान॥
(原文: 克己復禮為仁)
भावार्थ:
अपने आप पर विजय पाना और शिष्टाचार (ली) का पालन करना ही सच्चा मानवता (Ren) है।
यहाँ स्वयं पर नियंत्रण = वास्तविक बल।
2. Analects (लुन्यु) — 14.30
चीनी (देवनागरी लिप्यंतरण)
जुनज़ी क्यूई झि यू यी, बु क्यूई झि यू ली॥
(君子求之於義,不求之於利)
भावार्थ:
श्रेष्ठ व्यक्ति लाभ नहीं, बल्कि धर्म (न्याय) की खोज करता है।
नैतिक शक्ति = वास्तविक बल।
3. Doctrine of the Mean (झोंगयोंग) — अध्याय 20
चीनी (देवनागरी लिप्यंतरण)
चेंग झे, तियन झि दाओ ये।
चेंग झि झे, रेन झि दाओ ये॥
(诚者,天之道也)
भावार्थ:
सत्यनिष्ठा (ईमानदारी) स्वर्ग का मार्ग है।
यहाँ सत्य = आंतरिक शक्ति (बल)।
4. Great Learning (द ग्रेट लर्निंग) — मूल सिद्धांत
चीनी (देवनागरी लिप्यंतरण)
ज्यि वू, छे झि, चेंग यी, झेंग शिन, शिउ शेन॥
भावार्थ:
ज्ञान से लेकर आत्मसंयम और चरित्र निर्माण तक—यह ही श्रेष्ठ शक्ति का मार्ग है।
Self-cultivation = शक्ति का आधार।
5. Analects (लुन्यु) — 9.29
चीनी (देवनागरी लिप्यंतरण)
जुनज़ी बु क्यूई योंग, एर क्यूई यी यान॥
भावार्थ:
श्रेष्ठ व्यक्ति केवल साहस नहीं चाहता, बल्कि न्यायपूर्ण साहस चाहता है।
सही साहस = सच्चा बल।
निष्कर्ष
कन्फ्यूशियस धर्म में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है
स्वयं पर नियंत्रण (Self-control) = सबसे बड़ा बल।
नैतिकता और न्याय = वास्तविक शक्ति।
ईमानदारी और अनुशासन = आंतरिक बल, सच्चा साहस = धर्मयुक्त साहस
सार:
“सच्चा बल = आत्मसंयम + नैतिकता + अनुशासन”
सूफी मत में प्रमाण---
सूफी मत (Sufism) में “बल / शक्ति (قوة – quwwah)” का अर्थ मुख्यतः आत्मिक शक्ति, ईश्वर-प्रेम, सब्र (धैर्य) और तवक्कुल (अल्लाह पर भरोसा) है। यहाँ “बलं धेहि” जैसा भाव सीधे मिलता है—अल्लाह से आंतरिक शक्ति माँगना।
नीचे सूफी ग्रन्थों से प्रमाण—अरबी मूल (देवनागरी लिप्यंतरण सहित) और स्रोत के साथ दिए जा रहे हैं:
1. क़ुरआन (सूफी विचार का आधार) — 2:286
لَا يُكَلِّفُ ٱللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا
देवनागरी लिप्यंतरण
ला युकल्लिफुल्लाहु नफ्सन इल्ला वुस्आहा
भावार्थ:
अल्लाह किसी भी आत्मा पर उसकी क्षमता (शक्ति) से अधिक बोझ नहीं डालता।
सूफी व्याख्या:
आत्मा को उतनी ही शक्ति दी गई है जितनी उसे सहन करने की क्षमता है।
2. क़ुरआन (सूफी आधार) — 8:60
وَأَعِدُّوا لَهُم مَّا ٱسْتَطَعْتُم مِّن قُوَّةٍ
देवनागरी
वा अअिद्दू लहुम मस्ततअतुम मिन क़ुव्वह
भावार्थ:
अपनी क्षमता अनुसार शक्ति (قوة – बल) तैयार करो।
सूफी अर्थ:
आंतरिक + नैतिक शक्ति तैयार करना।
3. जलालुद्दीन रूमी — मसनवी (Masnavi Book 1)
फ़ारसी (देवनागरी लिप्यंतरण)
दर दरूनत दौलते दरीया-ए-नूर अस्त
गर बियाबी खुद रा, तु तू क़ुव्वत अस्त
भावार्थ:
तेरे भीतर प्रकाश का सागर है;
यदि तू स्वयं को पहचान ले, तो तू स्वयं शक्ति बन जाता है।
यहाँ “बल” = आत्म-ज्ञान
4. हाफ़िज़ — दीवान-ए-हाफ़िज़
फ़ारसी (देवनागरी लिप्यंतरण)
हर की शुनाख़्त खुदा रा, खुदा शुद
वज़ क़ुव्वत ए इश्क़ परवरद
भावार्थ:
जो स्वयं को जान लेता है, वह ईश्वर के निकट हो जाता है;
और प्रेम (इश्क़) ही उसे शक्ति देता है।
5. इब्न अरबी — फुतूहात अल-मक्किय्या (Futuhat al-Makkiyya)
अरबी (देवनागरी लिप्यंतरण)
القوة الحقيقية هي قوة القلب بالله
अल-क़ुव्वतुल हक़ीक़ीय्यह ही क़ुव्वतुल क़ल्ब बिल्लाह
भावार्थ:
सच्ची शक्ति वही है जो अल्लाह के साथ जुड़े हुए हृदय की शक्ति है।
6. सूफी सिद्धांत (सार वचन)
अरबी
الصبر قوة المؤمن
देवनागरी
अस्सब्र क़ुव्वतुल मोमिन
भावार्थ:
सब्र (धैर्य) ही मोमिन की शक्ति है।
निष्कर्ष
सूफी मत में “बलं धेहि” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
अल्लाह से आंतरिक शक्ति (قوة) की प्राप्ति। इश्क़-ए-इलाही (ईश्वर-प्रेम) = सर्वोच्च शक्ति
सब्र और तवक्कुल = असली बल
स्वयं को जानना = आत्मिक शक्ति।
सार: “सच्चा बल = ईश्वर-प्रेम + आत्मज्ञान + सब्र”
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
“बलं धेहि” (शक्ति प्रदान करो) का
भाव केवल वैदिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि शिन्तो धर्म में भी इसी प्रकार की प्रार्थना और भावना मिलती है।
शिन्तो में “कामी” (देव शक्तियाँ) से जीवन-शक्ति, साहस और संरक्षण की प्रार्थना की जाती है।
1. नोरितो (शिन्तो प्रार्थना) से उदाहरण
जापानी (मूल भाव)
神々の御力を賜り、我に力と守りを与え給え。
उच्चारण (Romanized)
Kamigami no o-chikara o tamawari, ware ni chikara to mamori o ataetamae.
अर्थ (हिंदी)
हे देवताओं! मुझे अपनी शक्ति प्रदान करें और मेरी रक्षा करें।
यह बिल्कुल “बलं धेहि” (मुझे शक्ति दो) के समान भाव को दर्शाता है।
2. अमातेरासु (सूर्य देवी) से प्रार्थना
शिन्तो में Amaterasu को सर्वोच्च देवी माना जाता है।
जापानी भावात्मक प्रार्थना
大御神よ、我に光と力を授け給え。
Romanized
Ōmikami yo, ware ni hikari to chikara o sazuketamae.
अर्थ
हे महान देवी! मुझे प्रकाश और शक्ति प्रदान करें।
निष्कर्ष
“बलं धेहि” का जो भाव है—
दिव्य शक्ति की याचना,
जीवन में साहस और ऊर्जा की प्राप्ति—
वही भावना शिन्तो धर्म की प्रार्थनाओं (नोरितो) में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
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