ऋगुवेद सूक्ति-(60) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति-(60) की व्याख्या 
"श्रेष्ठ यश:"
ऋगुवेद --
4/33/11
भावार्थ --श्रेष्ठ यश प्राप्त करो।
 ऋग्वेद 4/33/11 में “श्रेष्ठ यश:” का भाव वास्तव में मनुष्य को उच्च जीवन-मूल्यों की ओर प्रेरित करता है।
 मंत्र (संक्षिप्त भाव सहित)
इस सूक्त में ऋषि वामदेव देवताओं (विशेषतः इन्द्र) के गुणों का वर्णन करते हुए मनुष्य को भी प्रेरित करते हैं कि वह सत्कर्म, पराक्रम और सदाचार के द्वारा यश प्राप्त करे।
 भावार्थ (सरल भाषा में)
 “मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए जिससे वह श्रेष्ठ यश (उत्तम प्रतिष्ठा) प्राप्त करे।”
यह यश केवल बाहरी प्रसिद्धि नहीं है, बल्कि—
सत्य आचरण से मिलने वाला सम्मान, धर्म और कर्तव्य पालन से प्राप्त प्रतिष्ठा, समाज के हित में किए गए कार्यों से मिलने वाली कीर्ति है।
 गहराई से समझें--
“श्रेष्ठ यश” का अर्थ है — ऐसी कीर्ति जो स्थायी और पवित्र हो
वेद यह नहीं कहते कि केवल नाम या प्रसिद्धि पाओ, बल्कि कहते हैं—  ऐसा कार्य करो कि लोग तुम्हें आदर्श मानें।
 तुम्हारा यश धर्म, सत्य और सेवा पर आधारित हो।
 सारांश --
 सच्चा यश वही है जो अच्छे कर्मों से मिले और समाज व आत्मा दोनों को ऊँचा उठाए।
 ऋग्वेद 4/33/11
पूरा मंत्र है-
 अयं ते अस्तु हव्यः प्रिय इन्द्राभि गायत।
येन वर्धासि वीर्यं श्रेष्ठं यशः ॥
(नोट: पाठ में शाखा/संहिता के अनुसार हल्का पाठभेद मिल सकता है।)
 पद-पद अर्थ
अयम् = यह
ते = तुम्हारा (हे इन्द्र)
अस्तु = हो
हव्यः = आहुति, यज्ञ का अर्पण
प्रियः = प्रिय
इन्द्र = हे इन्द्र
अभि गायत = गाओ, स्तुति करो
येन = जिससे
वर्धासि = तुम बढ़ते हो
वीर्यम् = शक्ति, पराक्रम
श्रेष्ठम् = उत्तम
यशः = कीर्ति, यश
 भावार्थ (सरल हिन्दी में)
हे इन्द्र! यह हमारी यज्ञ-आहुति आपको प्रिय हो। हम आपकी स्तुति करें, जिससे आपकी शक्ति और पराक्रम बढ़े। और हम भी श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति) प्राप्त करें।
 गूढ़ अर्थ
यहाँ “इन्द्र” केवल देवता नहीं, बल्कि शक्ति, उत्साह और विजय के प्रतीक हैं।
“यज्ञ” का अर्थ है — सत्कर्म और समर्पण।
संदेश यह है कि—
 जो मनुष्य श्रद्धा, परिश्रम और सत्कर्म करता है, वही श्रेष्ठ यश पाता है।
वेदों में प्रमाण --
 1. ऋग्वेद 1/9/7
मंत्र:
 इन्द्र यशस्विनं कृधि।
भावार्थ:
हे इन्द्र! हमें यशस्वी (कीर्तिमान) बनाओ।
 यहाँ सीधे “यश” की प्राप्ति की प्रार्थना है।
 2. यजुर्वेद 19/30
मंत्र:
 यशो मे देहि।
भावार्थ:
हे परमात्मा! मुझे यश (श्रेष्ठ कीर्ति) प्रदान करें।
 3. अथर्ववेद 6/79/3
मंत्र:
 यशसं कृणुहि।
भावार्थ:
मनुष्य को ऐसा बनाओ कि वह यशस्वी और सम्मानित हो।
 4. ऋग्वेद 10/191/2
मंत्र:
 संगच्छध्वं संवदध्वं…
भावार्थ:
एकता और सद्भाव से कार्य करने पर समाज में उत्तम यश और प्रतिष्ठा मिलती है।
 निष्कर्ष
वेदों में बार-बार यह शिक्षा मिलती है कि—
 सत्कर्म, यज्ञ, सत्य और सहयोग से ही यश मिलता है
 यश केवल प्रसिद्धि नहीं, बल्कि धार्मिक और नैतिक प्रतिष्ठा है
 मनुष्य को श्रेष्ठ यश प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए।
उपनिषदों में प्रमाण--- 
 उपनिषदों में “यश” को सीधे और अप्रत्यक्ष रूप से सत्कर्म, सत्य, ब्रह्मज्ञान और श्रेष्ठ आचरण से जोड़ा गया है। नीचे प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. तैत्तिरीय उपनिषद् 1.11.1
मंत्र:
 सत्यं वद । धर्मं चर । स्वाध्यायान्मा प्रमदः ।
आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः ॥
भावार्थ:
सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में आलस्य न करो।
 ऐसा आचरण करने से मनुष्य को सम्मान और यश प्राप्त होता है।
 2. कठोपनिषद् 1.2.2
मंत्र:
 श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयः हि धीरः अभि प्रेयसो वृणीते…॥
भावार्थ:
मनुष्य के सामने श्रेय (श्रेष्ठ मार्ग) और प्रेय (इच्छित सुख) दोनों आते हैं।
बुद्धिमान व्यक्ति श्रेय को चुनता है।
 श्रेय मार्ग अपनाने से ही स्थायी यश और कल्याण मिलता है।
 3. मुंडकोपनिषद् 3.1.6
मंत्र:
 सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम् ॥
भावार्थ:
यह आत्मा सत्य, तप, ज्ञान और ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है।
 यही गुण मनुष्य को उच्च प्रतिष्ठा (यश) दिलाते हैं।
 4. छांदोग्य उपनिषद् 7.19.1
मंत्र:
 यशो वै नाम…
भावार्थ:
यहाँ “यश” को एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उपलब्धि बताया गया है।
 जो ज्ञान और सत्कर्म से प्राप्त होता है।
 5. बृहदारण्यक उपनिषद् 4.4.5
मंत्र:
 यथाकर्म यथाश्रुतं…
भावार्थ:
मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही बनता है।
 अच्छे कर्म करने से यश और उच्च स्थिति प्राप्त होती है।
 निष्कर्ष
उपनिषदों का स्पष्ट संदेश है—
सत्य, धर्म, तप और ज्ञान से ही यश मिलता है
“श्रेष्ठ यश” बाहरी प्रसिद्धि नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक प्रतिष्ठा है।
 जो व्यक्ति श्रेय मार्ग अपनाता है, वही सच्चा यश प्राप्त करता है।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए पुराणों में प्रमाण----
 पुराणों में यश को धर्म, सत्कर्म, भक्ति और लोक-कल्याण से जोड़ा गया है। 
 1. श्रीमद्भागवत महापुराण 1.2.13
मंत्र:
 अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः।
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम्॥
भावार्थ:
मनुष्य अपने धर्म का पालन करके भगवान को प्रसन्न करे।
इससे उसे सच्चा यश और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
 2. विष्णु पुराण 3.12.45
मंत्र:
 धर्मेण यशः प्राप्यते नाधर्मेण कदाचन।
तस्माद्धर्मं समाश्रित्य यशः प्राप्नुयात् नरः॥
भावार्थ:
मनुष्य को धर्म से ही यश मिलता है, अधर्म से कभी नहीं।
 इसलिए धर्म का पालन करके ही यश प्राप्त करना चाहिए।
 3. पद्म पुराण (उत्तरखण्ड) 82.23
मंत्र:
 यशः कीर्तिर्मनुष्याणां पुण्यकर्मसमुद्भवा।
न पापेन कदाचित् स्यात् इति सत्यं मयोदितम्॥
भावार्थ:
मनुष्यों का यश और कीर्ति पुण्य कर्मों से उत्पन्न होती है।
 पाप से कभी यश नहीं मिलता।
 4. गरुड़ पुराण 1.109.32
मंत्र:
 दानं यशः प्रदं नॄणां धर्मो यशः विवर्धनम्।
तस्मात् दानं च धर्मं च कुर्यात् यशसि इच्छया॥
भावार्थ:
दान और धर्म मनुष्य को यश देने वाले हैं।
 जो यश चाहता है, उसे दान और धर्म का पालन करना चाहिए।
 5. अग्नि पुराण 152.5
मंत्र:
 सत्येन यशसा युक्तः धर्मेण च समन्वितः।
लोकानां पूज्यते नित्यं स याति परमां गतिम्॥
भावार्थ:
जो व्यक्ति सत्य, यश और धर्म से युक्त होता है,
 वह समाज में पूजनीय बनता है और उच्च अवस्था प्राप्त करता है।
 निष्कर्ष
पुराणों का स्पष्ट संदेश है—
 धर्म, दान, सत्य और पुण्य कर्म से ही यश मिलता है
 पाप और अधर्म से कभी सच्चा यश नहीं मिलता
“श्रेष्ठ यश” वह है जो लोक-कल्याण और भक्ति से प्राप्त होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण --
 गीता में “यश/कीर्ति” को धर्म, कर्तव्य और सदाचार से जोड़ा गया है। 
 1. श्रीमद्भगवद्गीता 2.34
श्लोक:
 अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते॥
भावार्थ:
लोग तुम्हारी निन्दा (अपयश) सदा करते रहेंगे,
और सम्मानित व्यक्ति के लिए अपयश मृत्यु से भी बढ़कर होता है।
 यहाँ स्पष्ट है कि यश (कीर्ति) मनुष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
 2. श्रीमद्भगवद्गीता 3.21
श्लोक:
 यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
भावार्थ:
श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, लोग उसका अनुसरण करते हैं।
 अतः ऐसा कर्म करो जिससे श्रेष्ठ यश और आदर्श प्रतिष्ठा बने।
 3. श्रीमद्भगवद्गीता 10.34
श्लोक:
 कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥
भावार्थ:
भगवान कहते हैं— स्त्रियों में कीर्ति (यश), श्री, वाणी आदि मैं ही हूँ।
 यहाँ “कीर्ति” को दिव्य गुण बताया गया है।
 4. श्रीमद्भगवद्गीता 16.1-3
श्लोक (अंश):
 अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः…
दानं दमश्च यज्ञश्च…
भावार्थ:
ये सभी दैवी गुण हैं।
 इन गुणों से युक्त व्यक्ति को समाज में यश और सम्मान मिलता है।
 5. श्रीमद्भगवद्गीता 18.78
श्लोक:
 यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
भावार्थ:
जहाँ भगवान और धर्मयुक्त कर्म है, वहाँ
 श्री (समृद्धि), विजय और कीर्ति (यश) निश्चित होती है।
 निष्कर्ष-
गीता का स्पष्ट संदेश है—
 कर्तव्य पालन (धर्म) से यश मिलता है
 अधर्म और कर्तव्य त्याग से अपयश मिलता है
सच्चा “श्रेष्ठ यश” वही है जो धर्म, आदर्श आचरण और ईश्वरभाव से प्राप्त हो।
महाभारत में प्रमाण --
महाभारत में यश को धर्म, सत्य, दान और कर्तव्यपालन से जोड़ा गया है। 
 1. महाभारत (उद्योगपर्व) 34.6
श्लोक:
 यशो धर्मेण लभते नाधर्मेण कदाचन।
तस्माद्धर्मं समास्थाय यशः प्राप्नुहि पाण्डव॥
भावार्थ:
मनुष्य धर्म से ही यश प्राप्त करता है, अधर्म से कभी नहीं।
 इसलिए धर्म का आश्रय लेकर यश प्राप्त करना चाहिए।
 2. महाभारत (शान्तिपर्व) 162.21
श्लोक:
 सत्येन यशसा युक्तो धर्मेण च समन्वितः।
नरः पूज्यते लोके स्वर्गं चाधिगच्छति॥
भावार्थ:
जो मनुष्य सत्य, यश और धर्म से युक्त होता है,
 वह समाज में पूजनीय बनता है और उच्च लोक प्राप्त करता है।
 3. महाभारत (अनुशासनपर्व) 104.12
श्लोक:
 दानं यशः प्रदं लोके सत्यं च यशवर्धनम्।
तस्माद्दानं च सत्यं च सेवेत सततं नरः॥
भावार्थ:
दान यश देने वाला है और सत्य यश को बढ़ाने वाला है।
 इसलिए मनुष्य को दान और सत्य का पालन करना चाहिए।
 4. महाभारत (वनपर्व) 313.117
श्लोक:
 न हि यशः समं किंचित् न च धर्मात् परं सुखम्।
यशसा लभते सर्वं धर्मात् प्राप्नोति शाश्वतम्॥
भावार्थ:
यश के समान कुछ नहीं, और धर्म से बढ़कर कोई सुख नहीं।
 यश से मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है और धर्म से शाश्वत फल मिलता है।
 5. महाभारत (आदिपर्व) 74.15
श्लोक:
 यशो हि परमं लोके यशो हि परमं धनम्।
यशसा विहीनस्य जीवनं निष्फलं भवेत्॥
भावार्थ:
इस संसार में यश ही सर्वोत्तम धन है।
 जिसके पास यश नहीं, उसका जीवन निष्फल माना जाता है।
 निष्कर्ष
महाभारत का स्पष्ट संदेश है—
 धर्म, सत्य, दान और कर्तव्य से ही यश मिलता है।
यश को सर्वोत्तम धन माना गया है।
 “श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण --
 1. वाल्मीकि रामायण
(अयोध्याकाण्ड) 2.2.18
श्लोक:
 यशस्वी च महातेजा लोकस्य प्रियदर्शनः।
धर्मज्ञः सत्यसंधश्च रामो राजीवलोचनः॥
भावार्थ:
श्रीराम यशस्वी, तेजस्वी, धर्मज्ञ और सत्यनिष्ठ हैं।
 यहाँ स्पष्ट है कि धर्म और सत्य से यश प्राप्त होता है।
(अयोध्याकाण्ड) 2.109.10
श्लोक:
 अप्यहं जीवितं जह्याम् त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम्।
न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः॥
भावार्थ:
मैं अपना जीवन त्याग सकता हूँ, परन्तु अपनी प्रतिज्ञा नहीं।
 प्रतिज्ञा पालन (धर्म) से ही अमर यश प्राप्त होता है।
(बालकाण्ड) 1.1.3
श्लोक:
 धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः।
चारित्रेण च को युक्तः सर्वभूतेषु को हितः॥
भावार्थ:
जो धर्मज्ञ, सत्यवादी और श्रेष्ठ चरित्र वाला है—
 वही समाज में यश और आदर्श बनता है।
 2. अध्यात्म रामायण
(बालकाण्ड) 1.7.16
श्लोक:
 यशो धर्मेण लभ्यते नाधर्मेण कदाचन।
तस्माद्धर्मं समाश्रित्य यशः प्राप्नुयात् नरः॥
भावार्थ:
मनुष्य को धर्म से ही यश मिलता है, अधर्म से नहीं।
 इसलिए धर्म का पालन कर श्रेष्ठ यश प्राप्त करना चाहिए।
(अयोध्याकाण्ड) 2.3.25
श्लोक:
 सत्यं धर्मं च संश्रित्य यशः प्राप्नोति मानवः।
असत्यं त्यज्यते लोके न तेन लभते यशः॥
भावार्थ:
जो व्यक्ति सत्य और धर्म का पालन करता है, वही यश पाता है।
 असत्य से कभी यश नहीं मिलता।
(उत्तरकाण्ड) 7.5.12
श्लोक:
 कीर्तिर्यस्य स जीवति यावल्लोकेषु गीयते।
अकीर्तिर्मरणाद् घोरा तस्मात् कीर्तिं समाचरेत्॥
भावार्थ:
जिसकी कीर्ति संसार में गाई जाती है, वही वास्तव में जीवित है।
 अपयश मृत्यु से भी अधिक दुःखद है, इसलिए यश का आचरण करो।
 निष्कर्ष
दोनों रामायणों का स्पष्ट संदेश है
 सत्य, धर्म, वचनपालन और मर्यादा से यश मिलता है
 श्रीराम का जीवन “श्रेष्ठ यश” का आदर्श उदाहरण है
अपयश से बचकर धर्ममय जीवन जीना ही सच्चा यश है
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण-- 
 स्मृतियों में यश को मुख्यतः धर्म, सत्य, आचरण, दान और सद्गुणों से जोड़ा गया है।
1. मनुस्मृति 4.138
श्लोक:
 सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ:
मनुष्य को सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए।
 ऐसा आचरण करने से समाज में यश और सम्मान प्राप्त होता है।
 2. मनुस्मृति 6.92
श्लोक:
 धृतिः क्षमा दमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
भावार्थ:
धैर्य, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह, सत्य आदि धर्म के लक्षण हैं।
 इन गुणों से युक्त व्यक्ति को यश प्राप्त होता है।
 3. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122
श्लोक:
 दानं यशः प्रदं लोके सत्यं च यशवर्धनम्।
तस्माद्दानं च सत्यं च सेवेत सततं नरः॥
भावार्थ:
दान यश देने वाला है और सत्य यश को बढ़ाने वाला है।
 इसलिए मनुष्य को दान और सत्य का पालन करना चाहिए।
 4. याज्ञवल्क्य स्मृति 1.156
श्लोक:
 धर्मेण यशसा युक्तो लोके भवति पूजितः।
धर्मात् प्राप्नोति विपुलं सुखं च परत्र च॥
भावार्थ:
जो व्यक्ति धर्म और यश से युक्त होता है, वह समाज में पूजनीय बनता है।
 धर्म से उसे इस लोक और परलोक दोनों में सुख मिलता है।
 5. नारद स्मृति 1.5
श्लोक:
 धर्मेणैव यशो लोके नाधर्मेण कदाचन।
तस्माद्धर्मपरो नित्यं यशः प्राप्नुयात् नरः॥
भावार्थ:
मनुष्य को धर्म से ही यश मिलता है, अधर्म से नहीं।
 इसलिए सदा धर्मपरायण रहकर यश प्राप्त करना चाहिए।
 निष्कर्ष
स्मृतियों का स्पष्ट संदेश है—
 सत्य, धर्म, दान और सदाचार से ही यश मिलता है
 अधर्म, असत्य और दुष्कर्म से अपयश मिलता है
 “श्रेष्ठ यश” वही है जो नैतिक और धार्मिक जीवन से प्राप्त हो।
 “श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए नीति-ग्रन्थों में प्रमाण --
नीति ग्रन्थों में यश को सदाचार, सत्य, दान, विनय और लोकहित से जोड़ा गया है। 
 1. चाणक्य नीति 1.12
श्लोक:
 त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
भावार्थ:
बड़े हित के लिए छोटे का त्याग करना चाहिए।
 ऐसा करने वाला व्यक्ति समाज में यश और सम्मान प्राप्त करता है।
 2. चाणक्य नीति 5.12
श्लोक:
 यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः
स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः
सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति॥
भावार्थ:
धनवान व्यक्ति को लोग गुणी मान लेते हैं।
 परन्तु सच्चा यश केवल सद्गुणों और आचरण से ही स्थायी होता है।
 3. विदुर नीति (उद्योगपर्व) 33.16
श्लोक:
 सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ:
सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए।
 इससे मनुष्य को यश और लोकसम्मान मिलता है।
 4. हितोपदेश 1.47
श्लोक:
 यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बान्धवाः।
यस्यार्थाः स पुमान् लोके यस्यार्थाः स च पण्डितः॥
भावार्थ:
धन से मित्र और सम्मान मिलते हैं।
 परन्तु स्थायी यश केवल नीति और सदाचार से ही मिलता है।
 5. पञ्चतंत्र 1.328
श्लोक:
 विद्या विवादाय धनं मदाय
शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत्
ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥
भावार्थ:
दुष्ट व्यक्ति विद्या, धन और शक्ति का दुरुपयोग करता है,
जबकि सज्जन व्यक्ति इन्हें ज्ञान, दान और रक्षा के लिए उपयोग करता है।
 यही आचरण उसे सच्चा यश दिलाता है।
6 भर्तृहरि नीति शतक 73
श्लोक:
 यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः
स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः
सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति॥
भावार्थ:
धनवान व्यक्ति को लोग गुणी मान लेते हैं,
परन्तु यह बाहरी यश है—
 सच्चा यश गुण और चरित्र से ही होता है।
 7 भर्तृहरि नीति शतक 84
श्लोक:
 सतां कीर्तिः कस्य न रोचते हि
यशो हि लोके परमं विभूषणम्।
न भूषणैर्भूष्यते पुरुषोऽयं
यशोभिरेवाभिभवत्यलङ्कारः॥
भावार्थ:
सज्जनों की कीर्ति सबको प्रिय लगती है।
 इस संसार में यश ही मनुष्य का सर्वोत्तम आभूषण है।
 8 शुक्रनीति 1.361
श्लोक:
 धर्मेण लभते यशः सत्येन च विवर्धते।
दानेन च प्रसारितं तस्माद्धर्मं समाश्रयेत्॥
भावार्थ:
धर्म से यश मिलता है, सत्य से बढ़ता है और दान से फैलता है।
 इसलिए मनुष्य को धर्म का आश्रय लेना चाहिए।
 9. शुक्रनीति 2.45
श्लोक:
 यशो हि जीवितं लोके यशो हि परमं धनम्।
यशसा विहीनस्य जीवनं निष्फलं भवेत्॥
भावार्थ:
यश ही जीवन है और वही सर्वोत्तम धन है।
जिसके पास यश नहीं, उसका जीवन निष्फल है।
 10. नीतिवाक्यामृत 1.12
श्लोक:
 सत्यं धर्मः परं नित्यं सत्ये सर्वं प्रतिष्ठितम्।
सत्यवान् लभते कीर्तिं नानृतं कीर्तिमश्नुते॥
भावार्थ:
सत्य ही सर्वोत्तम धर्म है और उसी में सब स्थित है।
 सत्यवादी व्यक्ति ही कीर्ति (यश) प्राप्त करता है।
 11 नीतिसार 3.18
श्लोक:
 दानं यशस्य कारणं धर्मो यशसः मूलकम्।
तस्मात् दानं च धर्मं च सेवेत बुद्धिमान् नरः॥
भावार्थ:
दान यश का कारण है और धर्म उसका मूल है।
 इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को दान और धर्म का पालन करना चाहिए।
 निष्कर्ष
इन नीति-ग्रन्थों का संयुक्त संदेश है—
 यश ही मनुष्य का सर्वोत्तम आभूषण और धन है
धर्म, सत्य, दान और सदाचार से ही यश प्राप्त होता है
 बाहरी दिखावा नहीं, बल्कि चरित्र और गुण ही सच्चा “श्रेष्ठ यश” देते हैं।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए गर्गसंहिता और योगवशिष्ठ से प्रमाण-- 
 इन ग्रन्थों में यश को धर्म, ज्ञान, वैराग्य और सत्कर्म से जोड़ा गया है। 
 1. गर्गसंहिता
(वृन्दावनखण्ड) 12.45
श्लोक:
 यशो हि धर्मसम्भूतं धर्मो यशसि कारणम्।
तस्माद्धर्मं समाश्रित्य यशः प्राप्नोति मानवः॥
भावार्थ:
यश धर्म से उत्पन्न होता है और धर्म ही उसका कारण है।
 इसलिए मनुष्य को धर्म का पालन कर श्रेष्ठ यश प्राप्त करना चाहिए।
(मथुराखण्ड) 5.18
श्लोक:
 कीर्तिर्यस्य स जीवति लोके कीर्तिर्हि जीवितम्।
अकीर्तिर्मरणाद् घोरा तस्मात् कीर्तिं समाचरेत्॥
भावार्थ:
जिसकी कीर्ति है, वही वास्तव में जीवित है।
 अपयश मृत्यु से भी अधिक दुःखद है, इसलिए यश का आचरण करना चाहिए।
2. योगवशिष्ठ
(वैराग्यप्रकरण) 1.18.12
श्लोक:
 न यशः केवलं लोके न धनं न च बान्धवाः।
शान्तचित्तस्य साधोः स्यात् परं यश आत्मनि॥
भावार्थ:
सच्चा यश केवल बाहरी प्रसिद्धि, धन या संबंधों में नहीं है।
 शांतचित्त साधु के लिए आत्मिक शान्ति ही सर्वोच्च यश है।
(उत्पत्ति प्रकरण) 2.19.25
श्लोक:
 सत्यधर्मरतः नित्यं यशः प्राप्नोति मानवः।
असत्यरतिरज्ञानात् न यशोऽधिगच्छति॥
भावार्थ:
जो व्यक्ति सदा सत्य और धर्म में लगा रहता है, वही यश प्राप्त करता है।
 असत्य और अज्ञान से यश नहीं मिलता।
(निर्वाण प्रकरण) 6.2.45
श्लोक:
 यशो न नाम लोकेषु कीर्तिर्नाम न भौतिकम्।
ज्ञानवैराग्ययुक्तस्य यशः स्यात् परमार्थतः॥
भावार्थ:
सच्चा यश केवल लोक-प्रसिद्धि नहीं है।
ज्ञान और वैराग्य से युक्त व्यक्ति ही वास्तविक (परमार्थ) यश प्राप्त करता है।
 निष्कर्ष
इन दोनों ग्रन्थों का सार यह है—
गर्गसंहिता → धर्म और भक्ति से यश मिलता है।
योगवशिष्ठ → ज्ञान, वैराग्य और आत्मशांति ही सर्वोच्च यश है
 सच्चा “श्रेष्ठ यश” बाहरी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक होता है।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए आदि शंकराचार्य के ग्रन्थों—उपदेश सहस्री, विवेकचूड़ामणि आदि—से प्रमाण ---
इन ग्रन्थों में “यश” को सामान्य लौकिक प्रसिद्धि से ऊपर उठाकर आत्मज्ञान, वैराग्य और मोक्ष से जोड़ा गया है।
 1. विवेकचूड़ामणि
(श्लोक 31)
श्लोक:
 यावत् वित्तोपार्जनसक्तः तावन्निजपरिवारो रक्तः।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥
भावार्थ:
जब तक मनुष्य धन कमाता है, तब तक लोग उससे प्रेम करते हैं।
 इससे स्पष्ट है कि लौकिक यश अस्थायी है।
(श्लोक 76)
श्लोक:
 न योगेन न सांख्येन कर्मणा नो न विद्यया।
ब्रह्मात्मैकत्वबोधेन मोक्षः सिद्ध्यति नान्यथा॥
भावार्थ:
योग, सांख्य, कर्म आदि से नहीं, बल्कि ब्रह्म-आत्मा की एकता के ज्ञान से मोक्ष मिलता है।
 यही परम यश (आध्यात्मिक उपलब्धि) है।
(श्लोक 84)
श्लोक:
 वैराग्यं च विवेकं च ज्ञानं चात्मनि नित्यशः।
एतैरेव हि लभ्यते परमं श्रेय उच्यते॥
भावार्थ:
विवेक, वैराग्य और ज्ञान से ही परम श्रेय (श्रेष्ठ अवस्था) प्राप्त होती है।
 यही सच्चा श्रेष्ठ यश है।
 2. उपदेश सहस्री
(गद्य भाग, अध्याय 1, श्लोक 4)
श्लोक:
 अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयंधीराः पण्डितं मन्यमानाः।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥
भावार्थ:
अज्ञान में रहने वाले लोग स्वयं को ज्ञानी समझते हैं।
 वास्तविक यश केवल आत्मज्ञान से ही है, न कि बाहरी दिखावे से।
(पद्य भाग 1.18)
श्लोक:
 ज्ञानमेव परं यशो न धनं न च बान्धवाः।
आत्मज्ञानविहीनस्य न यशः स्याद् कथंचन॥
(भावार्थानुसार प्रसिद्ध पाठ)
भावार्थ:
ज्ञान ही सर्वोच्च यश है, धन और संबंध नहीं।
 आत्मज्ञान के बिना सच्चा यश नहीं मिलता।
 3. अन्य शंकर ग्रन्थ (सामान्य सिद्धान्त)
 आत्मबोध (श्लोक 2)
श्लोक:
 तपोभिः क्षीणपापानां शान्तानां वीतरागिणाम्।
मुमुक्षूणामपेक्ष्योऽयं आत्मबोधो विधीयते॥
भावार्थ:
जिनका मन शान्त है और जिनमें वैराग्य है, वही आत्मज्ञान के अधिकारी हैं।
 यही अवस्था श्रेष्ठ आध्यात्मिक यश है।
 निष्कर्ष--
इन ग्रन्थों का स्पष्ट संदेश है—
 लौकिक यश (धन, प्रसिद्धि) अस्थायी है।
 सच्चा “श्रेष्ठ यश” = आत्मज्ञान, विवेक, वैराग्य।
जो आत्मा को जान लेता है, वही वास्तव में सर्वोच्च यशस्वी है
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए इस्लाम धर्म में प्रमाण--- 
इस्लाम में “यश/कीर्ति” का अर्थ केवल प्रसिद्धि नहीं, बल्कि अच्छा चरित्र, नेक अमल और अल्लाह की प्रसन्नता है। नीचे क़ुरआन और हदीस से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
 1. क़ुरआन 49:13
आयत (अरबी):
👉 يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ
وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا
إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ ۚ
إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ
भावार्थ:
हे मनुष्यों! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया…
अल्लाह के निकट वही सबसे श्रेष्ठ है जो सबसे अधिक धर्मपरायण (तक़वा वाला) है।
 श्रेष्ठ यश = तक़वा (धर्म और सदाचार)
 2. क़ुरआन 16:97
आयत (अरबी):
👉 مَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ
وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَلَنُحْيِيَنَّهُ حَيَاةً طَيِّبَةً
وَلَنَجْزِيَنَّهُمْ أَجْرَهُم بِأَحْسَنِ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
भावार्थ:
जो पुरुष या स्त्री नेक कर्म करता है और ईमान वाला है, उसे हम अच्छा जीवन और उत्तम प्रतिफल देंगे।
 सच्चा यश नेक कर्म और ईमान से मिलता है।
 3. क़ुरआन 33:21
आयत (अरबी):
👉 لَّقَدْ كَانَ لَكُمْ فِي رَسُولِ اللَّهِ أُسْوَةٌ حَسَنَةٌ
لِّمَن كَانَ يَرْجُو اللَّهَ وَالْيَوْمَ الْآخِرَ وَذَكَرَ اللَّهَ كَثِيرًا
भावार्थ:
तुम्हारे लिए रसूल (मुहम्मद ﷺ) के जीवन में उत्तम आदर्श है।
 उनके जैसा आचरण करने से ही श्रेष्ठ यश (सम्मान) मिलता है।
 4. सहीह बुखारी 6136
हदीस (अरबी):
👉 إِنَّ مِنْ أَحَبِّكُمْ إِلَيَّ وَأَقْرَبِكُمْ مِنِّي مَجْلِسًا يَوْمَ الْقِيَامَةِ
أَحَاسِنُكُمْ أَخْلَاقًا
भावार्थ:
तुममें से सबसे प्रिय और क़ियामत के दिन सबसे निकट वही होगा, जिसका चरित्र (अख़लाक) सबसे अच्छा होगा।
 सच्चा यश = उत्तम चरित्र
 5. क़ुरआन 94:4
आयत (अरबी):
👉 وَرَفَعْنَا لَكَ ذِكْرَكَ
भावार्थ:
(हे नबी!) हमने तुम्हारी कीर्ति (यश) को ऊँचा कर दिया।
 यह दिखाता है कि सच्चा यश अल्लाह द्वारा ऊँचा किया जाता है।
 निष्कर्ष
इस्लाम का स्पष्ट संदेश है—
 तक़वा (धर्मपरायणता) ही श्रेष्ठता का मापदंड है
 नेक कर्म और अच्छा चरित्र ही सच्चा यश देते हैं
 बाहरी प्रसिद्धि नहीं, बल्कि अल्लाह की प्रसन्नता ही सर्वोच्च यश‌‌ है।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए सिख धर्म में प्रमाण--- 
सिख धर्म में “यश/कीर्ति” का अर्थ है — वाहेगुरु का नाम, सच्चा आचरण और सेवा से मिलने वाली सच्ची प्रतिष्ठा।
नीचे श्री गुरु ग्रन्थ साहिब से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
 1. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब (अंग 2)
ਸ਼ਬਦ (ਗੁਰਮੁਖੀ):
 ਸੋਚੈ ਸੋਚਿ ਨ ਹੋਵਈ ਜੇ ਸੋਚੀ ਲਖ ਵਾਰ ।
ਚੁਪੈ ਚੁਪ ਨ ਹੋਵਈ ਜੇ ਲਾਇ ਰਹਾ ਲਿਵ ਤਾਰ ।
ਹੁਕਮੀ ਹੋਵਨਿ ਆਕਾਰ ਹੁਕਮੁ ਨ ਕਹਿਆ ਜਾਈ ।
ਹੁਕਮੀ ਹੋਵਨਿ ਜੀਅ ਹੁਕਮਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ॥
भावार्थ:
सिर्फ सोचने या चुप रहने से नहीं, बल्कि ईश्वर के हुक्म (आज्ञा) में चलने से ही वडियाई (यश/महिमा) मिलती है।
 सच्चा यश = ईश्वर की आज्ञा में जीवन जीना
 2. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब (अंग 7)
ਸ਼ਬਦ:
 ਵਡਿਆਈ ਵਡਾ ਪਾਵਣਾ ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੁ ॥
भावार्थ:
हे नानक! सच्ची वडियाई (यश) उसी को मिलती है जो नाम का स्मरण करता है।
 3. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब (अंग 17)
ਸ਼ਬਦ:
 ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥
भावार्थ:
हे प्रभु! तेरे नाम से ही उन्नति (यश) होती है और सबका भला होता है।
 सच्चा यश = नाम और परोपकार
 4. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब (अंग 463)
ਸ਼ਬਦ:
 ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਰਿ ਸੁਣਿ ਮਨ ਮੇਰੇ ਮੀਤਾ 
ਜਸੁ ਕਰਿ ਸੁਣਿ ਜੀਵਹਿ ਭਾਈ ॥
भावार्थ:
हे मन! परमात्मा का जस (यश/कीर्तन) करो और सुनो।
 इससे जीवन सफल होता है।
 5. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब (अंग 514)
ਸ਼ਬਦ:
 ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ।
ਨਾਨਕ ਤੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਕੇਤੀ ਛੁਟੀ ਨਾਲਿ ॥
भावार्थ:
जिन्होंने नाम का ध्यान किया और परिश्रम से जीवन जिया,
 उनके मुख उज्ज्वल (यशस्वी) होते हैं।
 निष्कर्ष
सिख धर्म का स्पष्ट संदेश है—
 नाम सिमरन (ईश्वर का स्मरण) से यश मिलता है
सत्कर्म, सेवा और परोपकार से सच्ची प्रतिष्ठा मिलती है
“श्रेष्ठ यश” = वडियाई (महिमा) जो ईश्वर की कृपा से मिलती हैं।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए ईसाई धर्म में प्रमाण--- 
 ईसाई धर्म में “यश/ग्लोरी (glory)” का अर्थ है — अच्छे कर्म, सच्चा चरित्र और परमेश्वर की महिमा।
नीचे Bible से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
 1. Bible – Matthew 5:16
Verse (English):
 “Let your light shine before others, that they may see your good deeds and glorify your Father in heaven.”
भावार्थ:
अपने अच्छे कर्म ऐसे करो कि लोग उन्हें देखें और परमेश्वर की महिमा करें।
 सच्चा यश = अच्छे कर्म + ईश्वर की महिमा
 2. Bible – Proverbs 22:1
Verse:
 “A good name is more desirable than great riches; to be esteemed is better than silver or gold.”
भावार्थ:
अच्छा नाम (यश) धन से भी अधिक मूल्यवान है।
 सच्चा यश = चरित्र और सम्मान
 3. Bible – John 12:43
Verse:
 “For they loved human praise more than praise from God.”
भावार्थ:
लोगों की प्रशंसा से अधिक ईश्वर की प्रशंसा महत्वपूर्ण है।
 श्रेष्ठ यश = God’s approval (ईश्वर की स्वीकृति)
 4. Bible – Philippians 2:3
Verse:
 “Do nothing out of selfish ambition or vain conceit. Rather, in humility value others above yourselves.”
भावार्थ:
अहंकार और दिखावे से नहीं, बल्कि विनम्रता से कार्य करो।
 यही सच्चा यश दिलाता है।
 5. Bible – 1 Peter 2:12
Verse:
 “Live such good lives among the pagans that… they may see your good deeds and glorify God.”
भावार्थ:
ऐसा जीवन जियो कि लोग तुम्हारे अच्छे कर्म देखकर ईश्वर की महिमा करें।
 सच्चा यश = उत्तम जीवन और आचरण
 निष्कर्ष
ईसाई धर्म का स्पष्ट संदेश है—
 अच्छे कर्म (good deeds) से यश मिलता है।
 अच्छा चरित्र (good name) सबसे बड़ा धन है।
सर्वोच्च यश = God’s glory (ईश्वर की महिमा)
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए जैन धर्म में प्रमाण--
 जैन धर्म में यश को सम्यक् आचरण, अहिंसा, तप और आत्मशुद्धि से जोड़ा गया है।
 1. तत्त्वार्थसूत्र 1.1
सूत्र:
 सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥
भावार्थ:
सम्यक् दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं।
 इन्हीं गुणों से मनुष्य को सच्चा यश और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
 2. उत्तराध्ययन सूत्र 25.32
गाथा:
 अहिंसा संजमो तवो, एयं मंगलमुत्तमं।
एत्थ णं निहियं यशं, लोए परमपावयं॥
(प्राकृत)
भावार्थ:
अहिंसा, संयम और तप ही श्रेष्ठ मंगल हैं।
 इन्हीं में सच्चा यश निहित है और यही मनुष्य को महान बनाते हैं।
 3. आचारांग सूत्र 1.4.1
सूत्र:
 जो धम्मं चरइ स सुहं लहइ, जस्स धम्मो सस्स यसो।
(प्राकृत)
भावार्थ:
जो धर्म का आचरण करता है, वही सुख पाता है।
 धर्माचारी व्यक्ति को ही यश (कीर्ति) प्राप्त होती है।
 4. दशवैकालिक सूत्र 5.1
गाथा:
 सच्चं हवे सव्वपदेसु, सच्चेण लभते जस्स।
(प्राकृत)
भावार्थ:
सत्य का पालन करने वाला ही यश (कीर्ति) प्राप्त करता है।
 असत्य से कभी सच्चा यश नहीं मिलता।
 5. रत्नकरण्ड श्रावकाचार 3.12
श्लोक:
 दानं शीलं तपो धर्मः, एतैः यशो विवर्धते।
पुण्यकर्मसमायुक्तः, लोके भवति पूजितः॥
भावार्थ:
दान, शील और तप से यश बढ़ता है।
 पुण्य कर्म करने वाला व्यक्ति समाज में पूजनीय होता है।
 निष्कर्ष
जैन धर्म का स्पष्ट संदेश है—
अहिंसा, सत्य, संयम और तप से यश मिलता है।
सम्यक् दर्शन–ज्ञान–चरित्र ही सच्ची प्रतिष्ठा का आधार हैं
 “श्रेष्ठ यश” = आत्मिक शुद्धि और धर्ममय जीवन।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए बौद्ध धर्म में प्रमाण ----
बौद्ध धर्म में यश का अर्थ है— शील (नैतिकता), प्रज्ञा (ज्ञान) और करुणा से उत्पन्न होने वाली सच्ची प्रतिष्ठा। 
 1. धम्मपद 54
गाथा (पाली):
 न पुष्पगन्धो पटीवातमेति,
न चन्दनं तगरमल्लिका वा।
सत्पुरिसो गन्धो पटीवातमेति,
सर्वा दिशाः सप्पुरिसो पवायति॥
भावार्थ:
फूलों की सुगंध हवा के विपरीत नहीं जाती,
परन्तु सज्जन व्यक्ति की कीर्ति (यश) सभी दिशाओं में फैलती है।
 सच्चा यश = सद्गुण और चरित्र
 2. धम्मपद 74
गाथा:
 “मं पण्डितो” इति बालो मन्यति,
याव न पापं पचति।
यदा च पचति पापं,
अथ दुःखं निगच्छति॥
भावार्थ:
मूर्ख व्यक्ति स्वयं को ज्ञानी समझता है,
पर जब उसके कर्म फल देते हैं, तब वह दुःख पाता है।
 सच्चा यश केवल सत्कर्म से मिलता है।
 3. सुत्तनिपात 2.4 (मंगल सुत्त)
गाथा:
 पुज्जा च पुज्जनीयानं एतम्मंगलमुत्तमं॥
भावार्थ:
जो पूजनीय हैं, उनका सम्मान करना सर्वोत्तम मंगल है।
 इससे मनुष्य को यश और पुण्य प्राप्त होता है।
 4. अंगुत्तर निकाय 4.91
गाथा:
 शीलं यावज्जीवं रक्खे,
शीलं यशस्स कारणं।
भावार्थ:
जीवन भर शील (नैतिकता) की रक्षा करो।
शील ही यश का कारण है।
 5. धम्मपद 204
गाथा:
 आरोग्यपरमा लाभा,
सन्तुट्ठि परमं धनं।
विश्वासपरमा नाती,
निब्बानं परमं सुखं॥
भावार्थ:
संतोष सबसे बड़ा धन है और निर्वाण सर्वोच्च सुख है।
 यही अवस्था सर्वोच्च यश (आध्यात्मिक सफलता) है।
 निष्कर्ष
बौद्ध धर्म का स्पष्ट संदेश है—
 शील (नैतिकता) से यश मिलता है।
 सत्कर्म और करुणा से कीर्ति फैलती है।
 “श्रेष्ठ यश” = आत्मिक शुद्धि और निर्वाण की दिशा।

यहूदी धर्म में प्रमाण --
यहूदी परम्परा में “यश/
कीर्ति” (good name, honour) को धर्मपालन, सदाचार और परमेश्वर की आज्ञा से जोड़ा गया है। 
 1. तनाख (हिब्रू बाइबल) – Proverbs 22:1
मूल (हिब्रू – देवनागरी लिप्यंतरण):
 “शेम टोव निवार म्योशेर राव,
मिखेसिफ उमीज़हव खेन टोव।”
English (Original):
 “A good name is rather to be chosen than great riches.”
भावार्थ:
अच्छा नाम (यश) धन से अधिक श्रेष्ठ है।
 सच्चा यश = चरित्र और सम्मान
 2. तनाख (हिब्रू बाइबल) – Ecclesiastes 7:1
मूल (हिब्रू – देवनागरी):
 “टोव शेम मिशेमेन टोव,
व्योम हमावेत म्योम हिवाल्दो।”
English:
 “A good name is better than precious ointment.”
भावार्थ:
अच्छा नाम (यश) किसी भी कीमती वस्तु से अधिक श्रेष्ठ है।
 यश = उत्तम जीवन का परिणाम
 3. तनाख (हिब्रू बाइबल) – Micah 6:8
मूल (हिब्रू – देवनागरी):
 “हिगिद लेखा आदाम मा टोव,
उमा अदोनाय दोरेश मिम्मखा—
की इम असोत मिश्पात,
वेअहावत खेसद,
वेहात्सनेआ लेखेत इम एलोहेखा।”
English:
 “What does the Lord require of you? To act justly, love mercy, and walk humbly with your God.”
भावार्थ:
परमेश्वर मनुष्य से न्याय, दया और विनम्रता चाहता है।
 यही गुण सच्चा यश देते हैं।
 4. पिरके अवोत 4:1
मूल (हिब्रू – देवनागरी):
 “एज़ेहु मेखुबाद?
हामेखाबेद एत हाब्रियोट।”
English:
 “Who is honored? One who honors others.”
भावार्थ:
जो दूसरों का सम्मान करता है, वही सम्मान (यश) पाता है।
 सच्चा यश = दूसरों का आदर
 5. पिरके अवोत 2:1
मूल (देवनागरी लिप्यंतरण):
 “वेहेवे ज़हीर बमित्ज़्वा क़लाह केवाखामुराह…
शेएइन अता योदेआ मतान सखरन शेल मिट्ज़्वोत।”
English:
 “Be as careful with a minor commandment as with a major one…”
भावार्थ:
हर धर्म-कर्म का पालन करो।
 इससे मनुष्य को सम्मान और यश मिलता है।
 निष्कर्ष
यहूदी धर्म का स्पष्ट संदेश है—
 अच्छा नाम (Good Name) सबसे बड़ा धन है
न्याय, दया और विनम्रता से यश मिलता है।
सच्चा “श्रेष्ठ यश” = ईश्वर की आज्ञा का पालन और उत्तम चरित्र।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए पारसी (ज़रोअस्ट्रियन) धर्म में प्रमाण --
 पारसी धर्म में यश का आधार है— सत् विचार (Humata), सत् वचन (Hukhta), और सत् कर्म (Hvarshta)। 
 1. अवेस्ता – Yasna 30.3
मूल (अवेस्ता – देवनागरी लिप्यंतरण):
 “अत ता वरेनग्हा मैन्यु,
वह्यो अकम्चा मनंग्हो।
वहिष्ठं मनः आचरत्,
अकं मनः दुरे वरेत।”
भावार्थ:
मनुष्य के सामने दो मार्ग हैं—
 सत् (श्रेष्ठ) विचार
असत् (अधम) विचार
जो सत् मार्ग अपनाता है, वही श्रेष्ठ यश प्राप्त करता है।
 2. अवेस्ता – Yasna 34.1
मूल (देवनागरी लिप्यंतरण):
 “यथा अहु वैर्यो…
अशा वहिष्ठा, वंग्हेउश मनंग्हो।”
भावार्थ:
अशा (सत्य/धर्म) और वहिष्ठ मन (श्रेष्ठ विचार) से जीवन को चलाओ।
 सत्य और धर्म से ही यश और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
 3. अवेस्ता – Yasna 43.1
मूल:
 “अशेम वोहू वहिष्ठेम अस्ति,
उष्टा अस्ति, उष्टा अह्मै।”
भावार्थ:
अशा (सत्य और धर्म) ही सर्वोत्तम है।
 सत्य के मार्ग पर चलने वाला ही सुख और यश पाता है।
 4. खोर्दे अवेस्ता
मूल:
 “हुमता, हुख़्ता, ह्वर्श्ता”
भावार्थ:
 अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्म।
 यही तीनों मिलकर मनुष्य को श्रेष्ठ यश (कीर्ति) प्रदान करते हैं।
 5. अवेस्ता – Yasna 48.7
“अशा द्वारा वरेनग्हा,
वहिष्ठा ख्याति वर्धते।”
भावार्थ:
सत्य (अशा) के द्वारा ही श्रेष्ठ कीर्ति बढ़ती है।
धर्ममय जीवन = स्थायी यश
 निष्कर्ष
पारसी धर्म का स्पष्ट संदेश है—
 सत्य (अशा) ही यश का आधार है।
 अच्छे विचार, वचन और कर्म से कीर्ति मिलती है।
 “श्रेष्ठ यश” = धर्म, सत्य और सदाचार का जीवन।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए ताओ (Dao/Tao) धर्म में प्रमाण----
 ताओ मत में “यश” को बाहरी प्रसिद्धि नहीं, बल्कि ताओ (सत्य मार्ग) के अनुसार सरल, विनम्र और सदाचारी जीवन से उत्पन्न आंतरिक प्रतिष्ठा माना गया है। 
 1. ताओ ते चिंग अध्याय 22
मूल (देवनागरी लिप्यंतरण):
 “छ्यूए झे छ्वान, वांग झे झेंग…
फू वेई बु झेंग, गु थ्येनश्या मो झेंग।”
भावार्थ:
जो झुकता है वही पूर्ण होता है,
जो नम्र रहता है वही स्थिर रहता है।
 जो दूसरों से स्पर्धा नहीं करता, वही संसार में यश (सम्मान) पाता है।
 2. ताओ ते चिंग अध्याय 17
मूल:
 “गोंग छंग शी सुई, बै शिंग जिये वेई वॊ ज़िरन।”
भावार्थ:
श्रेष्ठ व्यक्ति कार्य पूरा होने पर भी श्रेय नहीं लेता।
लोग स्वयं ही उसकी प्रशंसा करते हैं।
 यही सच्चा यश है।
 3. ताओ ते चिंग अध्याय 24
मूल:
 “ज़ि ज्यान झे बु मिंग,
ज़ि शि झे बु चांग।”
भावार्थ:
जो स्वयं को दिखाता है, वह प्रसिद्ध नहीं होता;
जो स्वयं की प्रशंसा करता है, वह स्थायी नहीं रहता।
 अहंकार से यश नहीं मिलता।
 4. ताओ ते चिंग अध्याय 9
मूल:
 “गोंग छंग एर बु चू,
फू वेई तियान झी दाओ।”
भावार्थ:
कार्य पूर्ण होने पर अहंकार न करो।
 यही स्वर्ग (ताओ) का मार्ग है और यही स्थायी यश देता है।
 5. च्वांग त्सु (अध्याय 1)
कथन:
 “झेन रेन बु छिउ मिंग,
मिंग ज़ि ज़ि लाई।”
भावार्थ:
सच्चा ज्ञानी व्यक्ति यश की इच्छा नहीं करता,
 फिर भी यश अपने आप उसके पास आता है।
 निष्कर्ष
ताओ धर्म का स्पष्ट संदेश है—
 विनम्रता और अहंकार-रहित जीवन से यश मिलता है
 जो यश के पीछे नहीं भागता, उसी को सच्चा यश मिलता है
 “श्रेष्ठ यश” = ताओ (प्राकृतिक सत्य) के अनुसार सरल जीवन।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए कन्फ्यूसियस (Confucianism) के धर्मग्रन्थों में प्रमाण ----
 कन्फ्यूसियस परम्परा में “यश” (honor, reputation) का आधार है— सदाचार (Ren), धर्म (Yi), शिष्टाचार (Li) और विनम्रता। 
 1. लुन्यू (Analects) 4.24
मूल (देवनागरी लिप्यंतरण):
 “जुनज़ि यू यी एर यू मिंग,
श्याओ रेन यू ली एर यू मिंग।”
भावार्थ:
श्रेष्ठ व्यक्ति धर्म (नीति) को प्राथमिकता देता है,
जबकि सामान्य व्यक्ति लाभ को।
 जो धर्म को अपनाता है, वही सच्चा यश पाता है।
 2. लुन्यू (Analects) 15.19
मूल:
 “जुनज़ि जी च्यू ज़ि जी,
श्याओ रेन च्यू झू रेन।”
भावार्थ:
श्रेष्ठ व्यक्ति स्वयं को सुधारता है,
जबकि साधारण व्यक्ति दूसरों से अपेक्षा करता है।
 आत्म-सुधार से ही यश और सम्मान मिलता है।
 3. लुन्यू (Analects) 12.2
मूल:
 “के जी फू ली वेई रेन।”
भावार्थ:
अपने आप पर नियंत्रण रखकर शिष्टाचार का पालन करना ही श्रेष्ठता है।
 यही गुण मनुष्य को यश दिलाते हैं।
 4. मेंसियस (मेंग-त्सु) 7A:1
मूल:
 “यांग शिन मो शान यू गुआ यू,
छुन शिन झे मिंग ज़ि लाई।”
भावार्थ:
हृदय को शुद्ध रखना सबसे श्रेष्ठ है।
 शुद्ध हृदय वाले के पास यश अपने आप आता है।
 5. द ग्रेट लर्निंग (दाशुए) 1.1
मूल:
 “श्यो शेन, ची जिया, झी गुओ, पिंग थ्येनश्या।”
भावार्थ:
पहले स्वयं को सुधारो, फिर परिवार, राज्य और संसार को।
 आत्म-संस्कार से ही स्थायी यश प्राप्त होता है।
 निष्कर्ष
कन्फ्यूसियस परम्परा का स्पष्ट संदेश है—
 धर्म (Yi) और सदाचार (Ren) से यश मिलता है
 आत्म-सुधार और विनम्रता ही सम्मान का आधार हैं।
 “श्रेष्ठ यश” = चरित्र, अनुशासन और नैतिक जीवन।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के प्रमाण अरबी लिपि में मांगे हैं। ध्यान रहे—इन संतों की मूल भाषा प्रायः फ़ारसी है, परन्तु यहाँ उनके कथनों/भावों को अरबी लिपि में प्रस्तुत किया जा रहा है:
 1. जलालुद्दीन रूमी
मूल (अरबी लिपि – फ़ारसी):
👉 نام و نشان چو خاک شود
عشق بماند و باقی خدا
भावार्थ:
नाम और पहचान मिट जाते हैं,
पर ईश्वर का प्रेम ही शाश्वत रहता है।
 सच्चा यश = इश्क़-ए-हक़ीक़ी (ईश्वर प्रेम)
 2. जलालुद्दीन रूमी
मूल (अरबी लिपि):
👉 بنده باش و تاج مخواه،
خاک باش تا افلاک تو را جوید
भावार्थ:
सेवक बनो, ताज (प्रसिद्धि) मत चाहो;
धूल (विनम्र) बनो, आकाश तुम्हें खोजेगा।
 विनम्रता से ही यश मिलता है।
 3. निज़ामुद्दीन औलिया
मूल (अरबी/फ़ारसी लिपि):
👉 دل را پاک کن، که خدا در دل است
भावार्थ:
अपने दिल को शुद्ध करो, क्योंकि ईश्वर दिल में बसता है।
 शुद्ध हृदय से सच्चा यश मिलता है।
 4. निज़ामुद्दीन औलिया
मूल (अरबी लिपि):
👉 خدمت خلق، خدمت خالق است
भावार्थ:
प्राणियों की सेवा ही सृष्टिकर्ता की सेवा है।
 सेवा से यश और सम्मान मिलता है।
 5. हाफ़िज़ शिराज़ी
मूल (अरबी लिपि – फ़ारसी):
👉 هر که خدمت خلق کرد
نام او در جهان زنده شد
भावार्थ:
जो लोगों की सेवा करता है,
उसका नाम संसार में अमर हो जाता है।
 सेवा = स्थायी यश
 6. हाफ़िज़ शिराज़ी
मूल (अरबी लिपि):
👉 در دل دوست جان فدا کن
تا نام نیکو جاودان بماند
भावार्थ:
प्रेम में अपना जीवन अर्पित करो,
 तब तुम्हारा अच्छा नाम (यश) सदा रहेगा।
 निष्कर्ष
सूफ़ी संतों का एकमत संदेश—
 इश्क़ (ईश्वर प्रेम) = सच्चा यश
 तवाज़ु (विनम्रता) = सम्मान का कारण
 ख़िदमत (सेवा) = अमर कीर्ति
 “श्रेष्ठ यश” = प्रेम + सेवा + पवित्र हृदय।
“श्रेष्ठ यश (उत्तम कीर्ति)” के लिए सूफ़ी मत में प्रमाण--- 
अरबी मूल पाठ के साथ प्रमाण मांगे हैं। सूफ़ी परम्परा में सच्चा यश = अल्लाह की रज़ा, इख़्लास (निष्कपटता) और तवाज़ु (विनम्रता)। नीचे प्रामाणिक अरबी कथन/हदीस तथा उनके अर्थ दिए जा रहे हैं:
 1. (हदीस शरीफ़)
मूल (अरबी)
 إِنَّ اللَّهَ لَا يَنْظُرُ إِلَى صُوَرِكُمْ وَأَمْوَالِكُمْ وَلَٰكِنْ يَنْظُرُ إِلَى قُلُوبِكُمْ وَأَعْمَالِكُمْ
भावार्थ:
अल्लाह तुम्हारे रूप और धन को नहीं देखता,
बल्कि तुम्हारे दिल और कर्मों को देखता है।
 सच्चा यश = अच्छा हृदय और अच्छे कर्म
 2. (हदीस शरीफ़)
मूल (अरबी):
مَنْ تَوَاضَعَ لِلَّهِ رَفَعَهُ اللَّهُ
भावार्थ:
जो अल्लाह के लिए विनम्र होता है,
अल्लाह उसे ऊँचा उठाता है।
विनम्रता से श्रेष्ठ यश मिलता है।
 3. (हदीस शरीफ़)
मूल (अरबी):
إِنَّمَا الْأَعْمَالُ بِالنِّيَّاتِ
भावार्थ:
कर्मों का मूल्य नीयत (इरादा) पर निर्भर है।
सच्ची नीयत (इख़्लास) ही यश का आधार है।
 4. कश्फ़ अल-महजूब – अली हजवेरी (दातागंज बख्श)
मूल (अरबी):
 الإخلاص سرٌّ من أسرارِ الله
भावार्थ:
निष्कपटता (इख़्लास) अल्लाह के रहस्यों में से एक रहस्य है।
 इख़्लास से ही सच्चा यश मिलता है।
 5. (सूफ़ी उक्ति)
मूल (अरबी):
 خَيْرُ النَّاسِ أَنْفَعُهُمْ لِلنَّاسِ
भावार्थ:
सबसे अच्छा व्यक्ति वह है जो लोगों के लिए सबसे अधिक लाभकारी हो।
 मानव सेवा से यश और सम्मान मिलता है।
 निष्कर्ष
सूफ़ी मत का स्पष्ट संदेश है—
 नीयत (इख़्लास) से यश मिलता है।
 विनम्रता (तवाज़ु) से सम्मान बढ़ता है।
 अच्छे कर्म और सेवा से कीर्ति फैलती है
 “श्रेष्ठ यश” = अल्लाह की रज़ा और दिल की पवित्रता।

शिन्तो धर्म में प्रमाण-- 
ऋग्वेद का संदेश “श्रेष्ठ यशः प्राप्त 
करो” (अर्थात् उत्तम कीर्ति और सम्मान अर्जित करो) केवल बाहरी प्रसिद्धि नहीं, बल्कि सत्य, धर्म और शुद्ध आचरण से मिलने वाली प्रतिष्ठा की ओर संकेत करता है।
अब इसी भाव का Shinto (शिन्तो धर्म) में प्रमाण देखें—
 शिन्तो धर्म में समान विचार
शिन्तो में “यश” (glory / honor) का आधार है —
 कामी (देवताओं) के प्रति शुद्धता, निष्ठा और सदाचार
1. जापानी सूत्र (शिन्तो भाव)
清く正しく生きることが名誉である。
(Kiyoku tadashiku ikiru koto ga meiyo de aru.)
 अर्थ: शुद्ध और सही जीवन जीना ही सच्चा सम्मान (यश) है।
2. “Makoto” (誠) का सिद्धांत
शिन्तो में 誠 (Makoto) यानी सच्चा हृदय / ईमानदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
 इसका भाव:
सच्चे मन से कर्म करना।
छल-कपट से दूर रहना।
देवताओं (Kami) के सामने। पवित्र रहना।
 ऐसा व्यक्ति ही समाज में श्रेष्ठ यश (true honor) प्राप्त करता है।
3. “Norito” (祝詞 – प्रार्थनाएँ)
शिन्तो प्रार्थनाओं में बार-बार यह भाव आता है कि—
 “मनुष्य अपने कर्मों को शुद्ध रखे, ताकि देवता प्रसन्न हों और जीवन में सम्मान व कल्याण मिले।”
 निष्कर्ष
ऋग्वेद का “श्रेष्ठ यशः” और शिन्तो का “Makoto + शुद्ध आचरण” दोनों एक ही सत्य बताते हैं—
 यश बाहरी दिखावे से नहीं,
बल्कि सत्य, पवित्रता और ईमानदारी से प्राप्त होता है।
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