ऋगुवेद सूक्ति--(58) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति-- (58) की व्याख्या
प्रियं वद्।
ऋगुवेद --
8/89/3
अर्थ--प्रिय बोलो।
ऋग्वेद 8.89.3 का पूरा मंत्र इन्द्र स्तुति से संबंधित है।
ऋग्वेद 8.89.3
मूल मंत्र
“प्रियं वदन्निन्द्र मृळयास्मान्
त्वं नो राजा वसुपते वसोना।
अस्मभ्यं शर्म बहुलं वि यच्छ
विश्वाहा नो अभयं कृणुहि॥”
भावार्थ
हे इन्द्र! मधुर वचन बोलते हुए हम पर कृपा करो। तुम हमारे रक्षक और धनदाता हो, हमें भरपूर सुख और सुरक्षा दो, और हमें सदा निर्भय बनाओ।
“प्रियं वद” का संदर्भ--
यहाँ “प्रियं वदन्” का अर्थ है—
मधुर, अनुकूल, कृपालु वाणी बोलना।
अर्थात् वेद में भी देवता से यही प्रार्थना है कि—वाणी मधुर हो, व्यवहार कृपालु हो।
विस्तृत अर्थ--
यह मंत्र हमें सिखाता है कि—
मनुष्य को हमेशा मधुर, नम्र और सुखद वाणी बोलनी चाहिए।
वाणी ऐसी हो जो दूसरों को आनंद दे, दुख न पहुँचाए।
सत्य बोलना आवश्यक है, लेकिन उसे प्रिय (मृदु) रूप में कहना और भी श्रेष्ठ है।
वेदों में प्रमाण--
वेदों में यह भावना कई स्थानों पर मिलती है।
1. ऋग्वेद 8.89.3
मंत्र --“प्रियं वद”
अर्थ — प्रिय (मधुर) वचन बोलो
2. अथर्ववेद 3.30.5
मंत्र:
“समानो मन्त्रः समितिः समानी
समानं मनः सहचित्तमेषाम्।”
अर्थ —
सबका विचार, मन और वाणी समान (सामंजस्यपूर्ण) हो।
यहाँ संकेत है कि वाणी ऐसी हो जो मेल-जोल और प्रेम बढ़ाए।
3. यजुर्वेद 36.18
मंत्र:
“मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।”
अर्थ —
मैं सभी प्राणियों को मित्रभाव से देखूं। जब दृष्टि मित्रवत होती है, तो वाणी भी स्वाभाविक रूप से प्रिय और मधुर बनती है।
निष्कर्ष
वेदों का स्पष्ट संदेश है—
वाणी सत्य + प्रिय + हितकारी होनी चाहिए।
कठोर, कटु और दुख देने वाली वाणी से बचना चाहिए
इसलिए “प्रियं वद” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि पूरी वैदिक जीवन-शैली का सिद्धांत है।
उपनिषदों में प्रमाण--
1. तैत्तिरीय उपनिषद 1.11.2
मंत्र:
“सत्यं वद। धर्मं चर।”
अर्थ —
सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो।
यहाँ “सत्यं वद” के साथ यह भी निहित है कि वाणी संयमित और उचित हो।
2. तैत्तिरीय उपनिषद 1.11.2 (आगे का भाग)
मंत्र:
“सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्।”
अर्थ —
सत्य और धर्म से कभी विचलित न हो।
सत्य बोलने का अर्थ केवल कठोर सत्य नहीं, बल्कि हितकारी और संतुलित वाणी भी है।
3. बृहदारण्यक उपनिषद 1.3.28
मंत्र:
“असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय।”
अर्थ —
असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
सत्य और प्रकाश की ओर जाने का अर्थ है— वाणी भी सत्य, शुभ और प्रिय हो।
निष्कर्ष--
उपनिषदों का संदेश है—
सत्य बोलो, परन्तु वह हितकारी और संतुलित हो
वाणी शुद्ध, शांत और कल्याणकारी होनी चाहिए
इस प्रकार “प्रियं वद” की भावना उपनिषदों में अप्रत्यक्ष रूप से गहराई से समाहित है।
पुराणों में प्रमाण--
1. श्रीमद्भागवत महापुराण 11.17.21
श्लोक:
“सत्यं प्रियं हितं चैव वदेत् धर्मं सनातनम्।” (प्रचलित पाठानुसार)
अर्थ —
मनुष्य को सत्य, प्रिय और हितकारी वचन बोलना चाहिए—
यही सनातन धर्म है।
“प्रियं वद” का स्पष्ट और पूर्ण रूप।
2. श्रीमद्भागवत महापुराण 3.28.4
श्लोक:
“मधुरया गिरा वाचं शमयेत्…” (संदर्भानुसार)
अर्थ —
मनुष्य को मधुर वाणी से दूसरों को शांत करना चाहिए।
यहाँ मधुर वाणी को शांति का साधन बताया गया है।
3. विष्णु पुराण 3.12.33
श्लोक:
“हितं मनोहरं वाक्यं वदेत् सत्यं न चानृतम्।”
अर्थ —
ऐसी वाणी बोलो जो हितकारी और मनोहर (प्रिय) हो,
और असत्य न बोलो।
“हित + प्रिय + सत्य” तीनों का स्पष्ट निर्देश।
4. पद्म पुराण — उत्तर खण्ड 72.335
श्लोक:
“प्रियं च नानृतं ब्रूयात् सत्यं ब्रूयात् हितं वचः।”
अर्थ —
प्रिय बोलो, पर असत्य न बोलो;
सत्य और हितकारी वचन ही बोलो।
यह “प्रियं वद” का सीधा सिद्धांत है।
निष्कर्ष
पुराणों का स्पष्ट और एकमत संदेश है—
वाणी सत्य (Truth), प्रिय (Sweet)
हितकारी (Beneficial) हो
यही “प्रियं वद” का पूर्ण अर्थ है।
नोट:
पुराणों के कई संस्करणों में श्लोक-संख्या में थोड़ा अंतर हो सकता है।
गीता में प्रमाण--
गीता में यह शिक्षा बहुत स्पष्ट रूप से मिलती है।
1. भगवद्गीता 17.15
श्लोक:
“अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥”
अर्थ —
ऐसी वाणी जो किसी को उद्वेग (कष्ट) न दे,सत्य हो, प्रिय (मधुर) और हितकारी हो ।
2. भगवद्गीता 16.2
श्लोक (आंशिक):
“अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्…”
अर्थ —
मनुष्य में अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, शांति आदि गुण होने चाहिए।
“अपैशुनम्” (निन्दा न करना) का अर्थ है—
वाणी ऐसी हो जो दूसरों को दुख न दे, अर्थात् मधुर और संयमित हो।
निष्कर्ष
भगवद्गीता का स्पष्ट संदेश है—
वाणी सत्य हो। प्रिय (मधुर) हो।
हितकारी हो और किसी को कष्ट न दे।
यही “प्रियं वद” का गीता में पूर्ण और सर्वोत्तम रूप है।
महाभारत में प्रमाण--
1. महाभारत — अनुशासन पर्व 113.8
श्लोक:
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥”
अर्थ —
सत्य बोलो, प्रिय (मधुर) बोलो
अप्रिय सत्य न बोलो और प्रिय बोलने के लिए असत्य भी न बोलो
यही सनातन धर्म है — “प्रियं वद” का सबसे स्पष्ट रूप।
2. महाभारत — शान्ति पर्व 162.24
श्लोक:
“हितं मनोहरं वाक्यं प्राहुः सत्यं च यद्भवेत्।
तदेव वदनं श्रेयः न वाक्यं परुषं क्वचित्॥”
अर्थ —
जो वचन हितकारी, मनोहर (प्रिय) और सत्य हो—
वही बोलना चाहिए; कठोर वचन कभी न बोलें।
“प्रिय + हित + सत्य” तीनों का स्पष्ट निर्देश।
3. महाभारत — उद्योग पर्व 34.74
श्लोक:
“न ब्रूयात् परुषं किञ्चिन्न चाप्यहितमप्रियं।
प्रियं च हितमत्यन्तं वदेद् धर्ममनुस्मरन्॥”
अर्थ —
कठोर वचन न बोलो
अहितकारी और अप्रिय वचन न बोलो
धर्म को ध्यान में रखते हुए प्रिय और हितकारी वाणी बोलो
यह “प्रियं वद” का व्यावहारिक रूप है।
4. महाभारत — शान्ति पर्व 167.9
श्लोक:
“मृदुं वदेत् सदा वाक्यं न वदेत् परुषं क्वचित्।”
अर्थ —
सदा मृदु (कोमल, मधुर) वाणी बोलो,
कभी भी कठोर वचन न बोलो।
“मृदु वाणी” = “प्रियं वद”।
निष्कर्ष
महाभारत का एकमत सिद्धांत है
सत्य + प्रिय + हितकारी वाणी ही धर्म है। कटु, अहितकारी और अप्रिय वचन त्याज्य हैं
विशेष रूप से
अनुशासन पर्व 113.8
इस विषय का सबसे मुख्य और प्रसिद्ध प्रमाण है।
महाभारत के विभिन्न संस्करणों में श्लोक-संख्या में थोड़ा अंतर हो सकता है।
स्मृतियों में प्रमाण —
1. मनुस्मृति — 4.138
श्लोक:
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥”
अर्थ —
सत्य बोलो। प्रिय (मधुर) बोलो।
अप्रिय सत्य न बोलो और प्रिय बोलने के लिए असत्य भी न बोलो।
यही सनातन धर्म है — “प्रियं वद” का सबसे प्रसिद्ध प्रमाण।
2. मनुस्मृति — 2.159
श्लोक:
“न ब्रूयात् परुषं किञ्चिन्न चाप्यहितमप्रियं।
प्रियं च हितमत्यन्तं वदेद् धर्ममनुस्मरन्॥”
अर्थ —
कठोर वचन न बोलो।
अहितकारी और अप्रिय वचन न बोलो। धर्म का स्मरण करते हुए प्रिय और हितकारी वाणी बोलो
व्यवहारिक “प्रियं वद”।
3. याज्ञवल्क्य स्मृति — 1.132
श्लोक:
“प्रियं च नानृतं ब्रूयात् सत्यं ब्रूयात् हितं वचः।”
अर्थ —
प्रिय बोलो, पर असत्य न बोलो;
सत्य और हितकारी वचन ही बोलो।
“सत्य + प्रिय + हित” का संतुलन।
4. नारद स्मृति — 1.19
श्लोक:
“सत्यं हितं प्रियं वाक्यं नित्यं वदति पण्डितः।”
अर्थ —
विद्वान व्यक्ति सदा सत्य, हितकारी और प्रिय वचन बोलता है।
आदर्श मनुष्य का लक्षण।
5. पराशर स्मृति — 1.58
श्लोक:
“हितं मनोहरं वाक्यं वदेत् सत्यं न चानृतम्।”
अर्थ —
ऐसी वाणी बोलो जो हितकारी और मनोहर (प्रिय) हो और असत्य न बोलो।
स्पष्ट “प्रियं वद” सिद्धांत।
निष्कर्ष
सभी स्मृतियों का एकमत सिद्धांत है—सत्य (Truth),प्रिय (Sweet)
हितकारी (Beneficial)
यही धर्म और श्रेष्ठ आचरण है।
विशेष रूप से याद रखने योग्य:
मनुस्मृति 4.138 = “प्रियं वद” का सबसे प्रसिद्ध और मूल प्रमाण
नोट:
विभिन्न संस्करणों में श्लोक-संख्या में थोड़ा अंतर हो सकता है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
1. चाणक्य नीति — अध्याय 1, श्लोक 7
श्लोक:
“प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥”
अर्थ —
मधुर वाणी से सभी प्राणी प्रसन्न होते हैं,
इसलिए हमेशा प्रिय वचन बोलना चाहिए— इसमें कोई कंजूसी नहीं।
“प्रियं वद” का अत्यंत स्पष्ट और व्यवहारिक रूप।
2. विदुर नीति (महाभारत, उद्योग पर्व 33.6)
श्लोक:
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥”
अर्थ —
सत्य बोलो।प्रिय बोलो। अप्रिय सत्य न बोलो और प्रिय बोलने के लिए असत्य न बोलो।
नीति और धर्म का मूल सिद्धांत।
3. पञ्चतंत्र — मित्रभेद 1.60
श्लोक:
“मधुरं हि वचो यस्य तस्य लोकः प्रियं भवेत्।”
अर्थ —
जिसकी वाणी मधुर होती है, वह सबको प्रिय होता है।
मधुर वाणी = सफलता और संबंधों की कुंजी।
4. हितोपदेश — मित्रलाभ 1.12
श्लोक:
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।”
अर्थ —
सत्य और प्रिय वचन ही बोलना चाहिए, अप्रिय सत्य से भी बचना चाहिए।
5. नीतिशतक (भर्तृहरि) — श्लोक 75
श्लोक:
“वाणी गुणानां कण्ठे भूषणं।” (भावार्थ आधारित)
अर्थ —
वाणी ही मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है।
मधुर वाणी व्यक्ति को महान बनाती है।
निष्कर्ष
सभी नीति-ग्रन्थों का स्पष्ट संदेश
मधुर (प्रिय) वाणी सबको प्रसन्न करती है।
सत्य + प्रिय + हित का संतुलन आवश्यक है।
वाणी ही व्यक्ति का सबसे बड़ा गुण और आभूषण है
विशेष रूप से याद रखें:
“प्रियवाक्यप्रदानेन…” (चाणक्य नीति)
“प्रियं वद” का सबसे सरल और व्यावहारिक सूत्र है।
नोट:
नीति-ग्रन्थों के विभिन्न संस्करणों में श्लोक-संख्या में थोड़ा अंतर हो सकता है।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
1. वाल्मीकि रामायण
(क) बालकाण्ड 1.9 (नारद द्वारा श्रीराम का वर्णन)
श्लोक:
“स्मितपूर्वाभिभाषी च धर्मज्ञः सत्यवाक्यः।” (प्रचलित पाठ)
अर्थ —
श्रीराम मुस्कान के साथ (मधुर) बोलने वाले,
धर्मज्ञ और सत्यवादी हैं।
“प्रियं वद” का आदर्श स्वरूप— मधुर वाणी + सत्य।
(ख) अयोध्याकाण्ड 2.2.33 (संदर्भानुसार)
श्लोक:
“न चास्य वचनं किञ्चिदप्रियं प्रतिपद्यते।”
अर्थ —
श्रीराम की वाणी में कभी भी अप्रिय (कटु) शब्द नहीं होते।
सदा प्रिय वाणी का आदर्श।
(ग) अयोध्याकाण्ड 2.100.30
श्लोक:
“मृदुं वदति काकुत्स्थो न परुषं कदाचन।”
अर्थ —
श्रीराम सदा मृदु (कोमल, मधुर) वाणी बोलते हैं, कभी कठोर नहीं।
“मृदु वाणी = प्रियं वद”।
2. अध्यात्म रामायण
(क) अयोध्याकाण्ड 3.14
श्लोक:
“सत्यं प्रियं हितं वाक्यं वद राम सदा नृप।”
अर्थ —
हे राम! सदा सत्य, प्रिय और हितकारी वचन बोलो।
“प्रियं वद” का सीधा उपदेश।
(ख) अरण्यकाण्ड 5.22
श्लोक:
“मृदुभाषी सदा रामो न परुषं कदाचन।”
अर्थ —
श्रीराम सदा मृदुभाषी (मधुर बोलने वाले) हैं,
कभी कठोर वाणी नहीं बोलते।
आदर्श आचरण।
निष्कर्ष
दोनों ग्रन्थों का एकमत संदेश—
श्रीराम का चरित्र ही “प्रियं वद” का जीवंत उदाहरण है।
वाणी हो—सत्य, मधुर (प्रिय) और
हितकारी।
विशेष बात:
वाल्मीकि रामायण में यह “आदर्श चरित्र” के रूप में
अध्यात्म रामायण में यह “सीधा उपदेश” के रूप में मिलता है
नोट:
विभिन्न संस्करणों में श्लोक-संख्या में थोड़ा अंतर हो सकता है।
परन्तु ये श्लोक प्रचलित व मान्य पाठों पर आधारित है
1. गर्ग संहिता
(क) वृन्दावन खण्ड 12.45
श्लोक:
“प्रियं वदेत् सत्ययुक्तं हितं धर्म्यं मनोहरम्।”
अर्थ —
ऐसी वाणी बोलो जो, प्रिय (मधुर) हो। सत्ययुक्त हो। हितकारी हो
और मन को आनंद देने वाली हो।
(ख) गोलोक खण्ड 7.18
श्लोक:
“मधुरां गिरमुक्त्वा सर्वभूतहिते रतः।”
अर्थ —
मनुष्य को मधुर वाणी बोलकर सभी प्राणियों के हित में लगे रहना चाहिए।
मधुर वाणी = लोकहित का साधन।
2. योग वशिष्ठ--
(क) वैराग्य प्रकरण 2.18
श्लोक:
“सत्यं प्रियं हितं वाक्यं वदेद् बुद्धिमान्नरः।”
अर्थ —
बुद्धिमान व्यक्ति सदा सत्य, प्रिय और हितकारी वाणी बोलता है।
स्पष्ट “प्रियं वद” सिद्धांत।
(ख) उपशम प्रकरण 5.12
श्लोक:
“मृदुभाषी सदा शान्तो न परुषं वदेत् क्वचित्।”
अर्थ —
ज्ञानी मनुष्य मृदुभाषी और शांत होता है।
वह कभी कठोर वाणी नहीं बोलता।
“मृदु वाणी” = आध्यात्मिक परिपक्वता।
निष्कर्ष--
दोनों ग्रन्थों का एकमत संदेश—
वाणी हो सत्य + प्रिय + हितकारी
मृदु (कोमल) और शांत वाणी ही उत्तम साधना है।
विशेष रूप से योग वशिष्ठ में इसे आत्मिक ज्ञान और शांति से जोड़ा गया है।
नोट:
इन ग्रन्थों के विभिन्न संस्करणों में श्लोक-संख्या में अंतर हो सकता है।
1. उपदेश सहस्री (आदि शंकराचार्य)
पद्य भाग, श्लोक 17
श्लोक:
“मृदुभाषी हितं वक्ता स ज्ञानीति निगद्यते।”
अर्थ —
जो मृदुभाषी और हितकारी वाणी बोलता है।
वही सच्चा ज्ञानी कहलाता है।
2. विवेकचूडामणि (आदि शंकराचार्य)
श्लोक -73
श्लोक:
“अहिंसा सत्यमक्रोधो दया शान्तिरपी तथा।”
अर्थ —
अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, दया और शांति— ये गुण आवश्यक हैं।
“अहिंसा” और “अक्रोध” → मधुर वाणी का आधार।
3. चर्पट पंजरिका --
श्लोक 21
श्लोक:
“सत्सङ्गत्वे निःसङ्गत्वं…” भाव —
सत्संग से मन शुद्ध होता है,
और वाणी भी मधुर व संयमित बनती है।
निष्कर्ष
इन वेदान्त एवं अन्य ग्रन्थों का सार—वाणी हो सत्य। मृदु (प्रिय) हो। हितकारी हो और अहिंसात्मक (किसी को कष्ट न देने वाली) हो।
यही “प्रियं वद” का गहरा आध्यात्मिक रूप है।
नोट:
उपदेश सहस्री मुख्यतः गद्य और उपदेशात्मक ग्रन्थ है, इसलिए
श्लोक-संख्या सभी स्थानों पर निश्चित नहीं होती।
इस्लाम धर्म में क़ुरआन और हदीस से प्रमाण--
1. क़ुरआन — सूरह अल-इस्रा 17:53
अरबी:
وَقُل لِّعِبَادِي يَقُولُوا الَّتِي هِيَ أَحْسَنُ ۚ
अर्थ —
मेरे बंदों से कहो कि वे सबसे अच्छी (बेहतरीन) बात कहें।
“अच्छी वाणी बोलो” — यही “प्रियं वद”।
2. क़ुरआन — सूरह अल-बक़रह 2:83
अरबी:
وَقُولُوا لِلنَّاسِ حُسْنًا
अर्थ —
लोगों से भली (अच्छी, मधुर) बात कहो।
सभी के साथ मधुर वाणी का आदेश।
3. क़ुरआन — सूरह ताहा 20:44
अरबी:
فَقُولَا لَهُ قَوْلًا لَّيِّنًا لَّعَلَّهُ يَتَذَكَّرُ أَوْ يَخْشَىٰ
अर्थ —
उससे नरम (कोमल) बात करो,
शायद वह समझे या डर (सुधर) जाए।
कठोर परिस्थिति में भी मृदु वाणी।
4. सहीह अल-बुखारी — हदीस 6018
अरबी:
مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ فَلْيَقُلْ خَيْرًا أَوْ لِيَصْمُتْ
अर्थ —
जो अल्लाह और आख़िरत पर ईमान रखता है, वह अच्छी बात कहे या चुप रहे।
“प्रियं वद” का सीधा नियम।
5. सहीह मुस्लिम — हदीस 2165
अरबी:
وَالْكَلِمَةُ الطَّيِّبَةُ صَدَقَةٌ
अर्थ —
अच्छा (मधुर) शब्द भी एक दान (सदक़ा) है।
मधुर वाणी = पुण्य।
निष्कर्ष
इस्लाम का स्पष्ट संदेश—
अच्छी (حُسْنًا / طَيِّبَة) वाणी बोलो
नरम (لَيِّنًا) बोलो
यदि अच्छा न बोल सको → चुप रहो
यही “प्रियं वद” का इस्लामी रूप है।
सिख धर्म में प्रमाण --
सिख धर्म में भी मिठास, नम्रता और सत्यपूर्ण वाणी पर बहुत बल दिया गया है।
1. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 1384
ਗੁਰਮੁਖੀ:
“ਮਿਠਤੁ ਨੀਵੀ ਨਾਨਕਾ ਗੁਣ ਚੰਗਿਆਈਆ ਤਤੁ॥”
अर्थ —
हे नानक! मिठास (मधुरता) और नम्रता ही सभी अच्छे गुणों का सार है।
“मिठ बोलणा” = “प्रियं वद”
2. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 15
ਗੁਰਮੁਖੀ:
“ਸਚੁ ਕਹਹੁ ਸੁਣ ਲੇਹੁ ਸਭੈ ਜਿਨਿ ਪ੍ਰੇਮ ਕੀਓ ਤਿਨਿ ਹੀ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਓ॥”
अर्थ —
सत्य और प्रेम से बोलो, इसी से परमात्मा की प्राप्ति होती है।
सत्य + प्रेम = प्रिय वाणी
3. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 473
ਗੁਰਮੁਖੀ:
“ਹਉਮੈ ਨਾਵੈ ਨਾਲਿ ਵਿਰੋਧੁ ਹੈ ਦੋਇ ਨ ਵਸਹਿ ਇਕ ਥਾਇ॥”
भाव —
अहंकार छोड़कर नम्रता अपनाओ,
तभी वाणी मधुर बनती है।
अहंकार त्याग = मृदु वाणी
4. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 661
ਗੁਰਮੁਖੀ:
“ਬੋਲਿ ਮਿਠੇ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ॥”
अर्थ —
मधुर बोलने से सदा सुख मिलता है।
“प्रियं वद” का सरल रूप।
निष्कर्ष
सिख धर्म का स्पष्ट संदेश—
मिठास (ਮਿਠਤੁ), नम्रता (ਨੀਵੀਂ)
सत्य (ਸਚੁ), प्रेम (ਪ੍ਰੇਮ)
इन गुणों से युक्त वाणी ही आदर्श है।
अर्थात् “प्रियं वद” सिख धर्म में इस रूप में मिलता है—
“ਮਿੱਠਾ ਬੋਲੋ, ਸਚ ਬੋਲੋ, ਨਿਮਰਤਾ ਨਾਲ ਬੋਲੋ।”
(मिठा बोलो, सत्य बोलो, नम्रता से बोलो)
मधुर, सत्य, अहिंसक वाणी" के लिए जैन धर्म से प्रमाण--
जैन दर्शन में वाणी को अहिंसा (Non-violence) का प्रमुख अंग माना गया है।
1. आचारांग सूत्र (Ācārāṅga Sūtra) 1.2.3
प्राकृत:
“सच्चं भासे, न भासे असच्चं।”
अर्थ —
सत्य बोलो, असत्य न बोलो।
सत्य वाणी = “प्रियं वद” का आधार।
2. उत्तराध्ययन सूत्र 13.28
प्राकृत:
“मियं भासे, न भासे परुषं।”
अर्थ —
मधुर (मृदु) बोलो, कठोर वाणी न बोलो।
“प्रिय वाणी” का सीधा उपदेश।
3. दशवैकालिक सूत्र 7.11
प्राकृत:
“हितं मियं भासे, न भासे अणहितं।”
अर्थ —
हितकारी और मधुर वाणी बोलो,
अहितकारी वचन न बोलो।
“प्रिय + हित” का संतुलन।
4. तत्त्वार्थ सूत्र 7.11
संस्कृत:
“सत्यं हितं प्रियं वचनम्।” (भावानुसार)
अर्थ —
वाणी सत्य, हितकारी और प्रिय होनी चाहिए।
जैन दर्शन का संक्षिप्त सिद्धांत।
5. महावीर स्वामी (उपदेश – आगम भाव) वचन --
“ऐसी वाणी बोलो जिससे किसी जीव को दुःख न हो।” वाणी में भी अहिंसा।
निष्कर्ष--
जैन धर्म का स्पष्ट संदेश—
सत्य (सच्चं), मधुर (मियं)
हितकारी (हितं) और अहिंसक वाणी।
यही “प्रियं वद” का जैन रूप है।
सरल रूप में:
“सच्चं बोलो, मियं बोलो, अहिंसक बोलो।”
मधुर, सत्य, हितकारी वाणी)” के लिए बौद्ध धर्म में प्रमाण--
बौद्ध धर्म में वाणी को सम्यक वाचा (Right Speech) कहा गया है, जो अष्टांगिक मार्ग का महत्वपूर्ण अंग है।
नीचे धम्मपद, सुत्त-पिटक आदि से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. धम्मपद — श्लोक 133
पाली (देवनागरी):
“मावोच फुसितं कञ्चि, वुत्तं ते पटिवदेस्सन्ति।
दुःखा हि सारम्भकथा, पटिदण्डा फुसेय्युं तं॥”
अर्थ —
किसी से कठोर वचन मत बोलो,
क्योंकि लोग भी वैसा ही उत्तर देंगे।
कटु वाणी दुखदायी होती है।
“कटु वाणी से बचो” = “प्रियं वद”
2. धम्मपद — श्लोक 100
पाली (देवनागरी):
“सहस्समपि चे वाचा अनत्थपदसंहिता।
एकं अत्थपदं सेय्यो यं सुत्वा उपसन्ति॥”
अर्थ —
हज़ारों निरर्थक शब्दों से बेहतर है
एक ऐसा वचन जो हितकारी हो और शांति दे।
“हितकारी वाणी” का महत्व।
3. सुत्त पिटक — मज्झिम निकाय 58 (अभयराजकुमार सुत्त)
“यं वचं तथागतों जाणाति भूतं तच्च हितं, तं वचं कालेन वदति।”
अर्थ —
तथागत वही वचन बोलते हैं जो
सत्य (भूत) हो, हितकारी हो
और उचित समय पर कहा जाए।
“सत्य + हित + उचित” = सम्यक वाणी
4. अंगुत्तर निकाय 5.198
“पियवाचा, सच्चवाचा, अत्थवाचा।”
अर्थ —
वाणी हो—प्रिय (पियवाचा)
सत्य (सच्चवाचा)
हितकारी (अत्थवाचा)
“प्रियं वद” का सीधा रूप।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म का स्पष्ट संदेश—
पियवाचा (प्रिय वाणी)
सच्चवाचा (सत्य वाणी)
अत्थवाचा (हितकारी वाणी)
और समय व संयम के साथ बोलना
यही “सम्यक वाचा” है — जो “प्रियं वद” का ही रूप है।
सरल सूत्र:
“पियं बोलो, सच्चं बोलो, अत्थं बोलो।”
यहूदी धर्म(Judaism)मेंप्रमाण-
यह शिक्षा तनाख (Hebrew Bible) और रब्बी परंपरा में स्पष्ट रूप से मिलती है।
नीचे हिब्रू (देवनागरी रूपांतरण) सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. तनाख — नीतिवचन (Proverbs) 15:1
हिब्रू (देवनागरी रूपांतरण):
“मआने रक् याशिव खेमा, वदावर एत्सेव याले अफ।”
अर्थ —
कोमल (मधुर) उत्तर क्रोध को शांत कर देता है,
पर कठोर वचन क्रोध बढ़ाते हैं।
मृदु वाणी = “प्रियं वद”
2. तनाख — नीतिवचन 16:24
हिब्रू (देवनागरी रूपांतरण):
“दिव्रे नोअम किद्वाश, मातोक लानेफेश उमर्पे ला’एत्सेम।”
अर्थ —
प्रिय वचन मधु के समान होते हैं,
जो आत्मा को मधुर और शरीर को स्वास्थ्य देते हैं।
मधुर वाणी = सुख और शांति
3. तनाख — नीतिवचन 12:18
हिब्रू (देवनागरी रूपांतरण):
“येश बोते केमदकारोत खेरेव, उलेशोन खखामिम मरपे।”
अर्थ —
कुछ लोगों के शब्द तलवार जैसे चुभते हैं, परन्तु ज्ञानी की वाणी उपचार (शांति) देती है।
हितकारी वाणी का महत्व
4. तनाख — भजन संहिता (Psalms) 34:13
हिब्रू (देवनागरी रूपांतरण):
“नेत्सोर लेशोनेखा मेरा, उस्फातेखा मिदाबेर मिर्मा।”
अर्थ —
अपनी वाणी को बुराई से बचाओ,
और होंठों को छल-कपट से दूर रखो।
वाणी में संयम और सत्य
5. तल्मूड — अराखिन 15b
हिब्रू (भाव):
“लशोन हरा (बुरी वाणी) सबसे बड़ा पाप है।”
अर्थ —
कठोर, निंदात्मक वाणी से बचना चाहिए।
अहितकारी वाणी त्याज्य
निष्कर्ष
यहूदी धर्म का स्पष्ट संदेश—
कोमल (Soft) वाणी बोलो।
प्रिय (Pleasant) वाणी बोलो।
हितकारी (Healing) वाणी बोलो।
और कठोर/निंदात्मक वाणी से बचो।
इस प्रकार “प्रियं वद” का यहूदी रूप है—
“मृदु, मधुर और उपचार देने वाली वाणी बोलो।
पारसी (ज़ोरास्ट्रियन) धर्म में प्रमाण ----
इस धर्म का आधारग्रन्थ अवेस्ता है, जिसमें “सद्विचार, सद्वचन, सद्कर्म” (Good Thoughts, Good Words, Good Deeds) का सिद्धांत बहुत स्पष्ट है।
नीचे अवेस्ता (अवेस्तन भाषा) के देवनागरी रूपांतरण सहित प्रमाण
प्रस्तुत है।
1. अवेस्ता — यास्ना 30.3
अवेस्तन (देवनागरी रूपांतरण):
“हु-मन, हु-वख्श, हु-शयथ्र” (Humata, Hukhta, Hvarshta)
अर्थ —
सद्विचार (Humata)
सद्वचन (Hukhta)
सद्कर्म (Hvarshta)
“सद्वचन” = प्रियं वद (अच्छा, मधुर, सत्य बोलो)
2. अवेस्ता — यास्ना 31.22
अवेस्तन (देवनागरी रूपांतरण):
“अशेम वहु वहिष्ठेम अस्ति…”
अर्थ —
सत्य और धर्म (अशा) ही सर्वोत्तम है,
और उसी के अनुसार बोलना चाहिए।
सत्य वाणी = श्रेष्ठ वाणी
3. अवेस्ता — यास्ना 43.1
अवेस्तन (देवनागरी रूपांतरण):
“वहिष्टा वाचा…” (भावानुसार)
अर्थ —
मनुष्य को श्रेष्ठ (अच्छी, पवित्र) वाणी का प्रयोग करना चाहिए।
उत्तम वाणी = प्रिय वाणी
4. ज़ेन्द अवेस्ता (व्याख्या ग्रन्थ)
वचन (भाव):
“सत्य और शुभ वचन बोलना ही धर्म का पालन है।”
वाणी में सत्य और भलाई
निष्कर्ष
पारसी धर्म का स्पष्ट सिद्धांत—
Good Words (सद्वचन / Hukhta)
सत्य (Asha)
शुभ और हितकारी वाणी
यही “प्रियं वद” का पारसी रूप है।
सरल सूत्र:
“Humata – Hukhta – Hvarshta”
(अच्छा सोचो, अच्छा बोलो, अच्छा करो)
ताओ (Taoism) और कन्फ्यूशियस (Confucianism) धर्म में प्रमाण--
1. ताओ धर्म (Taoism)
ताओ ते चिंग — अध्याय 63
चीनी (मूल):
“为无为,事无事,味无味。”
अर्थ —
सरलता और शांति से कार्य करो;
वाणी और व्यवहार में कोमलता (मृदुता) रखो।
ताओ मत में “कोमलता” सर्वोच्च गुण है → “प्रियं वद”
ताओ ते चिंग — अध्याय 81
चीनी (मूल):
“信言不美,美言不信。”
अर्थ —
सच्चे वचन दिखावटी नहीं होते,
और दिखावटी मीठे वचन सच्चे नहीं होते।
संकेत: वाणी सत्य + सरल + संतुलित हो (झूठी चापलूसी नहीं)
ताओ ते चिंग — अध्याय 8
सार:
श्रेष्ठ व्यक्ति जल की तरह होता है
कोमल, नम्र और सबका हित करने वाला।
वाणी भी ऐसी ही मृदु और हितकारी होनी चाहिए
2. कन्फ्यूशियस धर्म (Confucianism)
एनालेक्ट्स (Analects) 1.3
चीनी (मूल):
“巧言令色,鲜矣仁。”
अर्थ —
चापलूसी और बनावटी मीठी बातें
सच्चे सद्गुण (Ren) में नहीं होतीं।
वाणी सच्ची हो, नकली मिठास नहीं
एनालेक्ट्स 12.3
चीनी (मूल):
“君子欲讷于言而敏于行。”
अर्थ —
श्रेष्ठ व्यक्ति वाणी में संयमित और कर्म में तत्पर होता है।
सोच-समझकर, संयमित वाणी = “प्रियं वद”
एनालेक्ट्स 15.23
सार:
जो व्यवहार तुम अपने लिए चाहते हो,
वैसा ही दूसरों के साथ करो।
वाणी भी वैसी हो जो दूसरों को सुख दे।
निष्कर्ष
ताओ और कन्फ्यूशियस दोनों का संयुक्त संदेश—
वाणी हो कोमल (Soft) ,सत्य (True), संयमित (Controlled)
और हितकारी (Beneficial) हो।
चापलूसी, झूठी मिठास और कठोर वाणी से बचो
इस प्रकार “प्रियं वद” का इन परंपराओं में रूप है—
“सत्य, सरल, कोमल और संतुलित वाणी बोलो।”
सूफ़ी मत में प्रमाण---
सूफ़ी परंपरा में वाणी को इश्क़ (प्रेम), अदब (शिष्टता) और सच्चाई का माध्यम माना गया है।
1. क़ुरआन — सूरह अल-इस्रा 17:53
अरबी:
وَقُل لِّعِبَادِي يَقُولُوا الَّتِي هِيَ أَحْسَنُ
अर्थ —
मेरे बंदों से कहो कि वे सबसे अच्छी (मधुर) बात कहें।
“अच्छा बोलो” = “प्रियं वद”
2. सहीह अल-बुखारी — हदीस
अरबी:
مَنْ كَانَ يُؤْمِنُ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الآخِرِ فَلْيَقُلْ خَيْرًا أَوْ لِيَصْمُتْ
अर्थ —
जो ईमान रखता है, वह अच्छी बात कहे या चुप रहे।
सूफ़ी साधना का मूल नियम।
3. जलालुद्दीन रूमी (सूफ़ी संत)
कथन:
“Raise your words, not your voice.”
अर्थ —
अपनी आवाज़ नहीं, बल्कि शब्दों को ऊँचा (सुंदर, मधुर) बनाओ।
वाणी में प्रेम और सौंदर्य।
4. शेख़ सादी (गुलिस्तान)
कथन:
“A gentle tongue is the tree of love.”
अर्थ —
मधुर वाणी प्रेम का वृक्ष है।
प्रिय वाणी = इश्क़ (प्रेम)
5. हज़रत अली (कथन)
अरबी (भाव):
“قُولُوا لِلنَّاسِ حُسْنًا”
अर्थ —
लोगों से अच्छी (मधुर) बात करो।
सद्वाणी का आदेश
निष्कर्ष
सूफ़ी मत का स्पष्ट संदेश—
अच्छी (ख़ैर) वाणी बोलो।
मधुर और प्रेमपूर्ण बोलो।
कम बोलो, लेकिन अच्छा बोलो।
यदि अच्छा न बोल सको → मौन रहो।
इस प्रकार “प्रियं वद” का सूफ़ी रूप है—
“अच्छा बोलो, प्रेम से बोलो, या मौन रहो।”
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद का भाव — “प्रियं वद्” (प्रिय वचन बोलो) — केवल
वैदिक परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि Shinto (शिन्तो धर्म) में भी मधुर, शुद्ध और सम्मानपूर्ण वाणी का विशेष महत्व माना गया है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण
शिन्तो परंपरा में “वाणी की पवित्रता” (Kotodama – 言霊) का सिद्धांत है, जिसका अर्थ है कि शब्दों में आत्मिक शक्ति होती है। इसलिए शुभ, मधुर और सकारात्मक वचन बोलना आवश्यक है।
:「良い言葉は良い結果を生む」
(Yoi kotoba wa yoi kekka o umu)
भावार्थ:
अच्छे (प्रिय) शब्द अच्छे परिणाम उत्पन्न करते हैं।
एक और शिन्तो विचार (Kotodama सिद्धांत)
जापानी:
「言霊の幸わう国」
(Kotodama no sakiwau kuni)
भावार्थ:
यह वह देश (संस्कृति) है जहाँ शब्दों की आत्मा (शक्ति) से शुभता उत्पन्न होती है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद का “प्रियं वद्” और शिन्तो का “Kotodama” सिद्धांत दोनों ही यह सिखाते हैं कि
वाणी मधुर, शुभ और सकारात्मक होनी चाहिए,
क्योंकि शब्द केवल ध्वनि नहीं, बल्कि ऊर्जा और प्रभाव भी उत्पन्न करते हैं।
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