ऋगुवेद सूक्ति--(55) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति-- (55) की व्याख्या 
"ऋतं च सत्यं च"
ऋगुवेद--
10/190/1
अर्थ --नियम और सत्य ही (जगत का) आधार है।  मंत्र दिया है — “ऋतं च सत्यं च” — यह ऋग्वेद के मंडल 10, सूक्त 190, मंत्र 1 (10.190.1) से लिया गया है। यह बहुत गहरा दार्शनिक अर्थ रखता है।
 मूल मंत्र--
ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णवः॥
 शब्दार्थ--
ऋतम् (ऋत) = ब्रह्मांड का शाश्वत नियम / cosmic order
सत्यम् (सत्य) = सत्य, जो अटल और वास्तविक है
तपसः = तप या सृजनात्मक ऊर्जा
अभि + इद्धात् = प्रकट हुआ / उत्पन्न हुआ
 भावार्थ (सरल अर्थ)--
ऋत (नियम) और सत्य (सच्चाई) — ये दोनों ही तप (सृजन शक्ति) से प्रकट हुए।
इन्हीं से आगे सृष्टि का क्रम शुरू हुआ, जैसे रात्रि और समुद्र का जन्म।
 गहरा दार्शनिक अर्थ--
यहाँ‌ दिया हुआ अर्थ — “नियम और सत्य ही जगत का आधार है” — बिल्कुल सार्थक है, और इसे थोड़ा विस्तार में समझें:
ऋत (Cosmic Order)
यह प्रकृति का नियम है — जैसे सूर्य का उगना, ऋतुओं का बदलना।
यह ब्रह्मांड की व्यवस्था है।
सत्य (Truth)
जो कभी नहीं बदलता।
आत्मा और परम सत्य से जुड़ा हुआ।
दोनों का संबंध--
ऋत = बाहरी व्यवस्था
सत्य = आंतरिक वास्तविकता
 दोनों मिलकर ही सृष्टि को संतुलित रखते हैं।
 आध्यात्मिक संकेत--
जीवन में सत्य (ईमानदारी) और ऋत (नियम/धर्म) का पालन ही सही मार्ग है।
वेदों में प्रमाण --
1. ऋग्वेद (Rigveda)
 (1) ऋग्वेद --10.190.1
ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत।
ततो रात्र्यजायत ततः समुद्र अर्णवः॥
 अर्थ:
ऋत (नियम) और सत्य (सत्यता) ही सृष्टि का मूल आधार हैं, इन्हीं से सृष्टि का क्रम आरंभ हुआ।
 (2) ऋग्वेद --1.164.43
ऋतस्य पन्था न तरन्ति दुष्कृतः।
 अर्थ:
जो लोग अधर्म (बुरे कर्म) करते हैं, वे ऋत (सत्य और नियम) के मार्ग को पार नहीं कर सकते।
 (3) ऋग्वेद --5.63.1
ऋतेन मित्रावरुणा व्रतानिपश्यतः।
 अर्थ:
मित्र और वरुण देवता ऋत (नियम) के द्वारा ही संसार का संचालन करते हैं।
 2. यजुर्वेद (Yajurveda)
 (1) यजुर्वेद --19.30
ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् तपसोऽध्यजायत। (समान भाव)
 अर्थ:
ऋत और सत्य ही तप से उत्पन्न होकर सृष्टि के आधार बने।
 (2) यजुर्वेद --1.5
ऋतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि।
 अर्थ:
मैं ऋत (नियमयुक्त सत्य) और सत्य (सच्चाई) का ही वचन बोलूँगा।
 3. अथर्ववेद (Atharvaveda)
 (1) अथर्ववेद --12.1.1
सत्यं बृहद् ऋतं उग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति।
 अर्थ:
सत्य, ऋत (नियम), तप, ब्रह्म और यज्ञ — ये सब मिलकर पृथ्वी को धारण करते हैं।
 4. सामवेद (Samaveda)
सामवेद में अधिकतर मंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं, इसलिए ऋत और सत्य के वही सिद्धांत यहाँ भी लागू होते हैं।
 निष्कर्ष--
वेदों में स्पष्ट प्रमाण है कि—
ऋत (नियम) = प्रकृति और ब्रह्मांड का संचालन सिद्धांत
सत्य (Truth) = शाश्वत वास्तविकता
 दोनों मिलकर ही सृष्टि की रचना‌ करते हैं। 
उपनिषदों में प्रमाण --
 1. तैत्तिरीय उपनिषद्
 (क) तैत्तिरीय उपनिषद् --1.11.1
सत्यं वद। धर्मं चर।
 अर्थ:
सत्य बोलो और धर्म (ऋत/नियम) का आचरण करो।
 (ख) तैत्तिरीय उपनिषद्-- 2.1
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।
 अर्थ:
ब्रह्म (परम सत्य) सत्य, ज्ञान और अनंत है।
 2. मुण्डक उपनिषद्
 (क) मुण्डक उपनिषद् --3.1.6
सत्यमेव जयते नानृतं।
 अर्थ:
सत्य की ही विजय होती है, असत्य की नहीं।
 (ख) मुण्डक उपनिषद् --3.1.5
सत्येन पन्था विततो देवयानः।
 अर्थ:
सत्य के द्वारा ही देवयान (मोक्ष का मार्ग) प्रशस्त होता है।
3. बृहदारण्यक उपनिषद्
 (क) बृहदारण्यक उपनिषद् --1.4.14
ऋतं सत्यं ब्रह्म।
 अर्थ:
ऋत (नियम) और सत्य — यही ब्रह्म हैं।
 (ख) बृहदारण्यक उपनिषद् --5.5.1
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्।
 अर्थ:--
सत्य बोलो, और प्रिय (हितकारी) बोलो।
 4. छान्दोग्य उपनिषद्
 (क) छान्दोग्य उपनिषद् --6.16.3
सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्।
 अर्थ:
हे प्रिय शिष्य! यह सृष्टि प्रारंभ में केवल सत्य (सत्) ही थी।
 (ख) छान्दोग्य उपनिषद् --3.17.4
सत्यं ब्रह्मेति।
 अर्थ:
सत्य ही ब्रह्म है।
5. ईशावास्य उपनिषद्
 (मंत्र -15)
हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
 अर्थ:
सत्य का मुख एक आवरण से ढका हुआ है (जिसे हटाकर सत्य का दर्शन होता है)।
 निष्कर्ष--
उपनिषदों में बार-बार यह सिद्ध किया गया है कि—
सत्य = ब्रह्म (परम वास्तविकता)
ऋत/धर्म = उसका व्यवहारिक रूप (जीवन का नियम)
 अर्थात् “ऋतं च सत्यं च” केवल वेदों का ही नहीं, बल्कि उपनिषदों का भी मूल सिद्धांत है।
 1. श्रीमद्भागवत महापुराण
 (क) भागवत-- 1.1.1
सत्यं परं धीमहि।
 अर्थ:
हम उस परम सत्य (ब्रह्म) का ध्यान करते हैं।
 (ख) भागवत --12.2.1
ततः कलौ समभवन् धर्मस्य क्षय एव हि।
सत्यं शौचं दया क्षान्तिर्ह्यायुः बलं स्मृतिः॥
 अर्थ:
कलियुग में धर्म, सत्य, पवित्रता, दया आदि का क्षय होता है।
 2. विष्णु पुराण--
 (क) विष्णु पुराण-- 1.19.24
सत्यं धर्मस्तपो योगः सत्यं ब्रह्म सनातनम्।
 अर्थ:
सत्य ही धर्म है, तप है, योग है और वही सनातन ब्रह्म है।
 (ख) विष्णु पुराण-- 3.12.38
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
 अर्थ:
सत्य से ही पृथ्वी टिकी है, सूर्य तपता है, वायु चलती है—सब कुछ सत्य पर ही आधारित है।
 3. पद्म पुराण
 पद्म पुराण, सृष्टिखण्ड
न सत्यात् परमो धर्मः।
 अर्थ:
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
 4. गरुड़ पुराण
 (1) गरुड़ पुराण (धर्मकाण्ड)
सत्यं धर्मस्य मूलम्।
 अर्थ:
सत्य ही धर्म का मूल है।
निष्कर्ष--
पुराणों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि—
सत्य = परम धर्म और ब्रह्म
ऋत/धर्म = संसार को चलाने वाला नियम
 इसलिए वेदों का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” पुराणों में भी पूर्ण रूप से समर्थित है।
गीता में प्रमाण --
 1. गीता --3.15
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥
 अर्थ:
सभी कर्म ब्रह्म से उत्पन्न हैं, और ब्रह्म अक्षर (शाश्वत सत्य) से उत्पन्न है।
 इससे स्पष्ट है कि सृष्टि का आधार शाश्वत सत्य (ब्रह्म) है।
 2. गीता-- 4.7–8
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
 अर्थ:
जब-जब धर्म (ऋत/नियम) की हानि होती है, तब भगवान अवतार लेकर धर्म की स्थापना करते हैं।
 यहाँ “धर्म” = वही ऋत (cosmic order) है।
 3. गीता --10.4–5
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः…
 अर्थ:
सत्य (Truth) भी भगवान से उत्पन्न दिव्य गुणों में से एक है।
 4. गीता --16.1–3
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः…
अहिंसा सत्यमक्रोधः…
 अर्थ:
सत्य (सत्यम्) को दैवी गुण बताया गया है, जो आध्यात्मिक उन्नति का आधार है।
 5. गीता --17.15
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
 अर्थ:
जो वचन सत्य, प्रिय और हितकारी हो — वही वाणी का तप है।
 यहाँ सत्य को जीवन के आचरण का नियम (ऋत) बताया गया है।
 6. गीता --2.16
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥
 अर्थ:
असत्य (असत्) का कोई अस्तित्व नहीं, और सत्य (सत्) का कभी अभाव नहीं होता।
 यह श्लोक सत्य की शाश्वतता को सिद्ध करता है।
 निष्कर्ष--
गीता में स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि—
सत्य (सत्) = शाश्वत, अविनाशी, ब्रह्म का स्वरूप
धर्म (ऋत) = उसी सत्य का व्यवहारिक नियम
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” गीता में इस प्रकार प्रकट होता है:
“सत्य = परम वास्तविकता”
“धर्म = उसी सत्य के अनुसार जीवन जीने का नियम।
महाभारत में प्रमाण--
1. (क) शान्ति पर्व --162.21
न सत्यात् परमो धर्मो नानृतात् पातकं परम्।
 अर्थ:
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है और असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं है।
 यहाँ सत्य = सर्वोच्च धर्म (ऋत) बताया गया है।
 1(ख). शान्ति पर्व -109.11
सत्यं हि परमं ब्रह्म।
 अर्थ-
सत्य ही परम ब्रह्म है।
यह वेदों के “सत्य = ब्रह्म” सिद्धांत को पुष्टि करता है।
 2. आदिपर्व -74.26
सत्यं धर्मः परो लोके सत्यं हि परमं पदम्।
 अर्थ:
सत्य ही इस संसार में श्रेष्ठ धर्म है और वही परम पद (मोक्ष) है।
 3- वनपर्व -313.117
धर्मो रक्षति रक्षितः।
अर्थ:
जो धर्म (ऋत/नियम) की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
 यहाँ ऋत = जीवन का संरक्षण करने वाला नियम है।
4. शान्ति पर्व -329.40
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
 अर्थ:
सत्य से ही पृथ्वी टिकी है, सूर्य तपता है, वायु चलती है — सब कुछ सत्य पर आधारित है।
यह श्लोक सीधे “ऋतं च सत्यं च” के विचार को पुष्ट करता है।
 5 --उद्योग पर्व -35.58
यतो धर्मस्ततो जयः।
 अर्थ:
जहाँ धर्म (ऋत/नियम) है, वहीं विजय होती है।
यह महाभारत का मुख्य सिद्धांत है।
 निष्कर्ष--
महाभारत में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि—सत्य = परम ब्रह्म और सर्वोच्च धर्म
धर्म (ऋत) = जीवन और सृष्टि को चलाने वाला नियम
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” महाभारत में इस रूप में प्रकट होता है:
“सत्य सर्वोपरि है”
“धर्म (ऋत) उसका व्यवहारिक रूप है”।

स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण --
 1. मनुस्मृति
 (क) मनुस्मृति- 4.138
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
 अर्थ:
सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य न बोलो और प्रिय के लिए असत्य भी न बोलो — यही सनातन धर्म है।
 (ख) मनुस्मृति-- 8.81
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
 अर्थ:
सत्य से ही पृथ्वी टिकी है, सूर्य तपता है, वायु चलती है — सब कुछ सत्य पर ही आधारित है।
 (ग) मनुस्मृति-- 6.92
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
 अर्थ:
सत्य (सत्यम्) धर्म के दस लक्षणों में से एक प्रमुख लक्षण है।
 2. याज्ञवल्क्य स्मृति
 (क) याज्ञवल्क्य स्मृति --1.122
अहिंसा सत्यं अस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
 अर्थ:
सत्य (Truth) धर्म का मूल अंग है।
 (ख) याज्ञवल्क्य स्मृति ++1.4
वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥
 अर्थ:
वेद, स्मृति, सदाचार और आत्मसंतोष — ये धर्म (ऋत) के चार आधार हैं।
 3. नारद स्मृति
  नारद स्मृति --1.5
सत्यं धर्मस्य मूलम्।
 अर्थ:
सत्य ही धर्म का मूल है।
 4. पराशर स्मृति
  पराशर स्मृति-- 1.24
सत्यं हि परमं धर्मः।
 अर्थ:
सत्य ही सर्वोच्च धर्म है।
 5. गौतम धर्मसूत्र (स्मृति परंपरा का भाग)
  गौतम धर्मसूत्र-- 1.1
वेदो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
 अर्थ:
वेद, स्मृति और श्रेष्ठ आचरण — ये धर्म (ऋत) के मूल हैं।
 निष्कर्ष--
स्मृतियों में स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि—
सत्य = धर्म का मूल और सर्वोच्च तत्व
धर्म (ऋत) = जीवन का नियम और आचरण।
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” स्मृतियों में इस रूप में प्रकट होता है:
“सत्य ही धर्म का आधार है”
“धर्म (ऋत) जीवन का पालन करने योग्य नियम है”
1. चाणक्य नीति
(क) चाणक्य नीति-- 1.6
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
 अर्थ:
सत्य से ही पृथ्वी टिकी है, सूर्य तपता है, वायु चलती है — सब कुछ सत्य पर आधारित है।
 (ख) चाणक्य नीति --2.9
न सत्यात् परमो धर्मः।
 अर्थ:
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
 (क) विदुर नीति (उद्योग पर्व --33.7)
सत्यं हि परमं नास्ति।
 अर्थ:
सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं है।
 (ख) विदुर नीति (उद्योग पर्व --34.12)
सत्यं धर्मस्य मूलम्।
 अर्थ:
सत्य ही धर्म का मूल है।
 3. हितोपदेश
  हितोपदेश+- 1.41
न सत्यात् परमो धर्मः।
 अर्थ:
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
 4. पंचतंत्र
  पंचतंत्र --1.56
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्।
 अर्थ:
सत्य बोलो और प्रिय बोलो।
 5. नीतिशतकम्
 (क) नीति शतक 31
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियं।
 अर्थ:
सत्य बोलो, प्रिय बोलो; अप्रिय सत्य न बोलो।
 (ख) नीति शतक 74
सत्यं हि परमं नास्ति।
 अर्थ:
सत्य से बढ़कर कुछ नहीं है।
 निष्कर्ष--
नीति-ग्रंथों में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि—
सत्य = सर्वोच्च धर्म और जीवन का आधार धर्म (ऋत) = उसी सत्य के अनुसार आचरण
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” नीति-ग्रंथों में इस रूप में मिलता है।
“सत्य ही सबका आधार है”
“धर्म (ऋत) उसी सत्य का पालन है”।
1. वाल्मीकि रामायण-
 (क) अयोध्या काण्ड 109.11
न सत्यात् परमो धर्मः।
 अर्थ:
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
 (ख) अयोध्या काण्ड 18.30
सत्यं दानं तपस्त्यागो मित्रता शौचमार्जवम्।
विद्या च गुरुवृत्तिश्च धर्मः सत्यं परायणम्॥
 अर्थ:
सत्य, दान, तप, त्याग आदि धर्म के अंग हैं—परंतु सत्य सर्वोपरि है।
 (ग) युद्ध काण्ड-- 128.103
सत्यं धर्मस्य मूलम्।
 अर्थ:
सत्य ही धर्म का मूल है।
 (घ) अयोध्या काण्ड-- 2.14.3 
रामो द्विर्नाभिभाषते।
 अर्थ:
भगवान राम एक बार जो सत्य वचन कहते हैं, उसे कभी नहीं बदलते।
 यह सत्य पालन का आदर्श है।
 2. अध्यात्म रामायण
 (क) अयोध्या काण्ड-- 2.7
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।
 अर्थ:
ब्रह्म सत्य, ज्ञान और अनंत है।
 (ख) अयोध्या काण्ड --1.10
न सत्यात् परमो धर्मो नानृतात् पातकं परम्।
 अर्थ:
सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं और असत्य से बड़ा कोई पाप नहीं।
 (ग) उत्तर काण्ड --5.20
सत्येन धार्यते सर्वं जगत् स्थावरजंगमम्।
 अर्थ:
चल-अचल समस्त जगत सत्य से ही धारण होता है।
 (घ) अरण्य काण्ड (सार भाव)
धर्मो हि परमं लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्।
 अर्थ:
धर्म सर्वोच्च है और धर्म का आधार सत्य है।
 निष्कर्ष--
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि—
सत्य = सर्वोच्च धर्म
धर्म (ऋत) = उसी सत्य का व्यवहारिक रूप
 भगवान श्रीराम का जीवन स्वयं इस सिद्धांत का प्रमाण है:
“सत्य और धर्म ही जीवन तथा सृष्टि का आधार हैं।”

इस्लाम धर्म- में प्रमाण --
 1. क़ुरआन से प्रमाण--
 (1) सूरह अल-बक़रह --2:42
وَلَا تَلْبِسُوا الْحَقَّ بِالْبَاطِلِ وَتَكْتُمُوا الْحَقَّ وَأَنْتُمْ تَعْلَمُونَ
 अर्थ:
सत्य (हक़) को असत्य (बातिल) के साथ मत मिलाओ, और सत्य को मत छिपाओ जबकि तुम जानते हो।
 (2) सूरह यूनुस --10:32
فَذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمُ الْحَقُّ ۖ فَمَاذَا بَعْدَ الْحَقِّ إِلَّا الضَّلَالُ
 अर्थ:
वही अल्लाह तुम्हारा सच्चा पालनहार है; सत्य के बाद केवल भटकाव ही है।
 (3) सूरह अल-अहज़ाब --33:70
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَقُولُوا قَوْلًا سَدِيدًا
 अर्थ:
हे ईमान वालों! अल्लाह से डरो और सीधी (सच्ची) बात कहो।
 (4) सूरह अल-माइदा 5:8
اعْدِلُوا هُوَ أَقْرَبُ لِلتَّقْوَى
 अर्थ:
न्याय (इंसाफ) करो, यही धर्मपरायणता के अधिक निकट है।
 यह “ऋत (नियम/न्याय)” के समान सिद्धांत है।
 (5) सूरह अल-इसरा 17:81
وَقُلْ جَاءَ الْحَقُّ وَزَهَقَ الْبَاطِلُ ۚ إِنَّ الْبَاطِلَ كَانَ زَهُوقًا
 अर्थ:
कहो: सत्य आ गया और असत्य मिट गया; असत्य तो मिटने वाला ही है।
 2. हदीस से प्रमाण--
(हदीस – पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के वचन)
 (1)
إِنَّ الصِّدْقَ يَهْدِي إِلَى الْبِرِّ وَإِنَّ الْبِرَّ يَهْدِي إِلَى الْجَنَّةِ
 अर्थ:
सत्य (सिद्क) नेक़ी की ओर ले जाता है और नेक़ी जन्नत की ओर ले जाती है।
(सहीह बुख़ारी)
 (2)
عَلَيْكُمْ بِالصِّدْقِ فَإِنَّ الصِّدْقَ يَهْدِي إِلَى الْبِرِّ
 अर्थ:
तुम पर सत्य (सिद्क) अनिवार्य है, क्योंकि सत्य भलाई की ओर ले जाता है।
 निष्कर्ष--
इस्लाम में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि—
अल-हक़ (सत्य) = ईश्वर (अल्लाह) का स्वरूप
अद्ल (न्याय/नियम) = जीवन का धर्म (ऋत के समान)
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” इस्लाम में इस प्रकार प्रकट होता है:
“सत्य (हक़) ही सर्वोच्च है”
“न्याय/सही आचरण (अद्ल) उसका पालन है”
सिक्ख धर्म में प्रमाण-- 
 1. मूल मंत्र (जपुजी साहिब)
 (- 1)
ੴ ਸਤਿ ਨਾਮੁ ਕਰਤਾ ਪੁਰਖੁ ਨਿਰਭਉ ਨਿਰਵੈਰੁ...
अर्थ:
ईश्वर एक है, उसका नाम सत् (सत्य) है, वह कर्ता पुरुष है, निर्भय और निर्वैर है।
 यहाँ “ਸਤਿ ਨਾਮੁ” = ईश्वर स्वयं सत्य स्वरूप है।
 2. सत्य का सर्वोच्च महत्व
 (-- 62)
ਸਚੁ ਓਰੈ ਸਭੁ ਕੋ ਉਪਰਿ ਸਚੁ ਆਚਾਰੁ॥
 अर्थ:
सत्य से ऊपर सब कुछ है, परंतु सत्य का आचरण (जीवन में पालन) सबसे ऊँचा है।
 यह “ऋत (नियम/धर्म)” के समान है।
 3. सत्य और धर्म का संबंध
 (-- 463)
ਸਚੁ ਧਰਮੁ ਦੂਜਾ ਨਹੀ ਭਾਈ॥
 अर्थ:
हे भाई! सत्य ही धर्म है, दूसरा कोई धर्म नहीं।
 4. सत्य द्वारा जीवन का आधार
 (-- 949)
ਸਚੈ ਥਾਨਿ ਸਚੁ ਧਰਮੁ ਕਮਾਵੈ॥
 अर्थ:
सत्य के स्थान (ईश्वर) में वही व्यक्ति सच्चा धर्म आचरण करता है।
 5. सत्य का मार्ग
 (जपुजी साहिब, पਉड़ी -1)
ਕਿਵ ਸਚਿਆਰਾ ਹੋਈਐ ਕਿਵ ਕੂੜੈ ਤੁਟੈ ਪਾਲਿ॥
ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ਚਲਣਾ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਆ ਨਾਲਿ॥
 अर्थ:
हम सच्चे कैसे बनें और असत्य (कूड़) का पर्दा कैसे हटे?
उत्तर: परमात्मा के हुक्म (नियम/ऋत) में चलने से।
 “हुक्म” = वही ऋत (cosmic order) है।
 निष्कर्ष--
सिख धर्म में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि— ਸਚ (सत्य) = ईश्वर का स्वरूप । ਹੁਕਮ (हुक्म/नियम) = सृष्टि का नियम (ऋत के समान)
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” सिख धर्म में इस प्रकार प्रकट होता है:
“सत्य ही परमात्मा है”
“हुक्म (नियम) के अनुसार चलना ही धर्म है”।
ईसाई धर्म में प्रमाण-- 
 1. परम सत्य (God as Truth)
 John 14:6
“I am the way, the truth, and the life.”
 Roman English (उच्चारण):
“Ai em d ve, d truth, end d laif.”
 अर्थ:
यीशु कहते हैं — मैं ही मार्ग, सत्य और जीवन हूँ।
 यहाँ “Truth” = परम सत्य (ब्रह्म के समान)
 2. सत्य का ज्ञान
 John 8:32
“And you shall know the truth, and the truth shall make you free.”
 Roman English:
“End yu shal no d truth, end d truth shal mek yu free.”
 अर्थ:
तुम सत्य को जानोगे और सत्य तुम्हें मुक्त कर देगा।
 3. परमेश्वर का वचन = सत्य
 John-- 17:17
“Sanctify them by Your truth. Your word is truth.”
 Roman English:
“Sankti-fai dem bai yor truth. Yor word iz truth.”
 अर्थ:
हे परमेश्वर! उन्हें अपने सत्य से पवित्र करो; आपका वचन ही सत्य है।
 4. सत्य और धर्म (Righteousness)
 Psalm-- 119:142
“Your righteousness is an everlasting righteousness, and Your law is truth.”
 Roman English:
“Yor rait-chas-nes iz en everlasting rait-chas-nes, end yor law iz truth.”
 अर्थ:
आपका धर्म (नियम/कानून) अनंत है और आपका नियम ही सत्य है।
 “Law” = ऋत (cosmic order) के समान
 5. सत्य का पालन
 Ephesians 4:25
“Therefore, putting away lying, let each one of you speak truth with his neighbor.”
 Roman English:
“Derfor, puting ave laing, let ich van of yu spik truth vith hiz nebar.”
 अर्थ:
झूठ को त्यागकर हर व्यक्ति अपने पड़ोसी से सत्य बोले।
 निष्कर्ष--
ईसाई धर्म में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि—Truth (सत्य) = परमेश्वर का स्वरूप।
Law / Righteousness (धर्म/नियम) = जीवन का मार्ग (ऋत के समान)।
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” ईसाई धर्म में इस प्रकार प्रकट होता है:
“सत्य ही परमेश्वर है”
“धर्म/नियम (God’s Law) उसी सत्य का पालन है”
जैन धर्म में प्रमाण --
 1. आचारांग सूत्र
 (सूत्र --1.4.1)
सच्चं भणए, न भणए मुसा।
 अर्थ:
सत्य बोलो, असत्य मत बोलो।
 यह जैन धर्म में सत्य को मूल आचरण (धर्म/ऋत) बताता है।
 2. उत्तराध्ययन सूत्र
 (अध्याय 24, गाथा 12)
सच्चं णं परमं धम्मं।
 अर्थ:
सत्य ही परम धर्म है।
 (अध्याय 2, गाथा 33)
धम्मो मंगल मुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
देवा वि तं नमंसंति, जस्स धम्मे सया मनो॥
 अर्थ:
धर्म सर्वोत्तम मंगल है, जिसमें अहिंसा, संयम और तप हैं—
और इन सबका आधार सत्य है।
 3. तत्त्वार्थसूत्र
 (अध्याय 7.1)
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।
 अर्थ:
सम्यक दर्शन, ज्ञान और आचरण — ये मोक्ष का मार्ग हैं।
 “सम्यक” = सत्य और नियम (ऋत) के अनुसार होना।
 (अध्याय 6.23 – भावार्थ)
सच्चं वयणं।
 अर्थ:
सत्य वचन ही धर्म का अंग है।
 4. दशवैकालिक सूत्र
 (अध्याय-- 4)
सच्चं हवे सव्वसाहूणं।
 अर्थ:
सत्य सभी साधुओं का प्रमुख धर्म है।
 निष्कर्ष--
जैन धर्म में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि—सच्च (सत्य) = परम धर्म
धम्म (धर्म/नियम) = सत्य के अनुसार आचरण
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” जैन धर्म में इस प्रकार प्रकट होता है:
“सत्य ही सर्वोच्च धर्म है”
“धर्म (ऋत) उसी सत्य का पालन है।
बौद्ध ग्रंथों से प्रमाण --
 1. धम्मपद (Dhammapada)
 (धम्मपद-- 224)
सच्चं भणे न कुदाचनेन, ददं दानं भणे न च।
एतेन सच्चेन सुगति गच्छति॥
 अर्थ:
मनुष्य को सत्य बोलना चाहिए, कभी असत्य नहीं।
सत्य के पालन से वह उत्तम गति को प्राप्त करता है।
 (धम्मपद-- 273)
मग्गानट्ठङ्गिको सेठ्ठो, सच्चानं चतुरो पदा।
विरागो सेठ्ठो धम्मानं, द्विपदानं चक्कुमाः॥
 अर्थ:
मार्गों में अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ है, और सत्यों में चार आर्य सत्य श्रेष्ठ हैं।
 (धम्मपद --354)
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति,
सब्बरसं धम्मरसो जिनाति।
सब्बरति धम्मरति जिनाति,
तण्हक्कयो सब्बदुःखं जिनाति॥
 अर्थ:
धर्म का दान सबसे श्रेष्ठ है; धर्म का रस सबसे उत्तम है—
धर्म ही सभी दुःखों का नाश करता है।
 2. त्रिपिटक (Vinaya / Sutta Pitaka)
 (सुत्त पिटक – अंगुत्तर निकाय --4.183)
चत्तारि अरियसच्चानि।
अर्थ:
चार आर्य सत्य (Four Noble Truths) — यही बौद्ध धर्म का आधार हैं।
“सच्चानि” = सत्य (Truths)
 (मज्ज्हिम निकाय --58)
सच्चं वे अमतं वचो।
 अर्थ:
सत्य वचन अमृत के समान है।
 3. अष्टांगिक मार्ग (Right Conduct = ऋत)
 (सम्यक वाचा)
मुसावादा वेरमणी…
 अर्थ:
असत्य वचन से दूर रहना (सत्य बोलना) — यह सम्यक आचरण है।
 निष्कर्ष--
बौद्ध धर्म में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि—
सच्च (सत्य) = धर्म का मूल (चार आर्य सत्य)
धम्म (धर्म/नियम) = अष्टांगिक मार्ग (सही आचरण)
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” बौद्ध धर्म में इस प्रकार प्रकट होता है:
“सत्य (सच्च) ही ज्ञान और मुक्ति का आधार है”
“धर्म (धम्म) उसी सत्य के अनुसार जीवन जीने का मार्ग है”
यहूदी धर्म में प्रमाण-- 
 विषय “सत्य (Truth) और नियम/धर्म (ऋत के समान सिद्धांत)” के समर्थन में यहूदी धर्म में भी स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। नीचे तनाख (हिब्रू बाइबिल) से हिब्रू (देवनागरी रूपांतरण) + अर्थ सहित प्रमुख उद्धरण दिए जा रहे हैं:
 1. परमेश्वर = सत्य
 भजन संहिता (Psalms) 31:5
(देवनागरी रूपांतरण)
अदोनाय़ एल एमेत्।
(मूल हिब्रू: Adonai El Emet)
 अर्थ:
ईश्वर (अदोनाय़) सत्य (एमेत्) का स्वरूप है।
 2. ईश्वर का नियम = सत्य
 भजन संहिता 119:142
(देवनागरी रूपांतरण)
त्सिद्कातेख़ा त्सेदेक् लेओलाम, वेतोराख़ा एमेत्।
 अर्थ:
आपका धर्म (न्याय) सदा के लिए धर्म है और आपका नियम (तोरा) सत्य है।
 “तोरा (Torah)” = नियम/ऋत के समान
 भजन संहिता 119:160
(देवनागरी रूपांतरण)
रोश् दवारख़ा एमेत्, लेओलाम कोल मिश्पट् त्सिद्केख़ा।
 अर्थ:
आपके वचन आरंभ से ही सत्य है, और आपके सभी न्याय शाश्वत हैं।
 3. सत्य का आचरण
 निर्गमन (Exodus) 20:16
(देवनागरी रूपांतरण)
लो तआने बेरेअखा एद् शाकर।
 अर्थ:
तुम अपने पड़ोसी के विरुद्ध झूठी गवाही न देना।
 यह सत्य पालन का नियम है।
 4. न्याय (ऋत के समान सिद्धांत)
 व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) --16:20
(देवनागरी रूपांतरण)
त्सेदेक् त्सेदेक् तिर्दोफ्।
 अर्थ:
न्याय, केवल न्याय का ही अनुसरण करो।
 “त्सेदेक् (न्याय)” = ऋत (cosmic order) के समान
 निष्कर्ष--
यहूदी धर्म में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि—एमेत् (सत्य) = ईश्वर का स्वरूपतोरा / त्सेदेक् (नियम/न्याय) = जीवन का धर्म (ऋत के समान)
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” यहूदी धर्म में इस प्रकार प्रकट होता है:
“सत्य (एमेत्) ही परम है”
“नियम/न्याय (तोरा) उसी सत्य का पालन है”।
पारसी (ज़रोअस्ट्रियन) धर्म में प्रमाण --
1. अहुरा मज़्दा = सत्य (Asha)
 (यास्ना --31.7)
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬱𐬀 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬀
 उच्चारण (Transliteration):
Ahura Mazda asha vahishta
 अर्थ:
अहुरा मज़्दा सर्वोत्तम अशा (सत्य/धर्म/नियम) हैं।
 “Asha” = ऋत (cosmic order) के समान
 2. अशेम वोहू (प्रसिद्ध मंत्र)
 (यास्ना- 27.14)
𐬀𐬱𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬯𐬙𐬌 𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
𐬵𐬌𐬀𐬙 𐬀𐬱𐬀𐬌 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬀𐬌 𐬀𐬱𐬆𐬨
 उच्चारण:
Ashem vohu vahishtem asti,
ushta asti ushta ahmai,
hyat ashai vahishtai ashem
 अर्थ:
अशा (सत्य/धर्म) सर्वोत्तम है;
जो अशा (सत्य) के लिए जीता है, वही सच्चा सुख पाता है।
 3. सत्य का मार्ग (Asha vs Druj)
 (यास्ना- 30.3)
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎 𐬞𐬀𐬉𐬭𐬌𐬌𐬀𐬥𐬀
𐬫𐬀𐬭𐬆𐬙𐬀 𐬀𐬭𐬀𐬙𐬀
 अर्थ (भावार्थ):
सत्य (अशा) और असत्य (द्रुज) — ये दो मार्ग हैं;
मनुष्य को सत्य (अशा) का मार्ग चुनना चाहिए।
 4. धर्म (अशा) से ही व्यवस्था
 (यास्ना- 44.5)
𐬀𐬱𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀
 अर्थ:
अशा (सत्य/नियम) ही अहुरा मज़्दा का मार्ग है।
यही ब्रह्मांड का नियम (ऋत) है।
 निष्कर्ष--
पारसी (ज़रोअस्ट्रियन) धर्म में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि—
Asha (अशा) = सत्य + धर्म + cosmic order (ऋत के समान)
Ahura Mazda = उसी सत्य का सर्वोच्च स्वरूप
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” पारसी धर्म में इस प्रकार प्रकट होता है:
“अशा (सत्य/नियम) ही सर्वोच्च है”
“उसी अशा के अनुसार चलना ही धर्म है”
ताओ (Daoism) और कन्फ्यूशियस (Confucianism) परंपराओं में प्रमाण --
 1. ताओ धर्म (Daoism)
 ताओ ते चिंग (Dao De Jing)
 (अध्याय --25)
人法地,地法天,天法道,道法自然。
 अर्थ:
मनुष्य पृथ्वी का अनुसरण करता है, पृथ्वी आकाश का, आकाश ताओ (मार्ग) का,और ताओ स्वयं प्रकृति (नियम) का पालन करता है।
 “ताओ (道)” = ब्रह्मांड का ऋत (cosmic order)
 (अध्याय-- 1)
道可道,非常道。名可名,非常名。
 अर्थ:
जिस ताओ को कहा जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है;
जो नाम दिया जा सके, वह शाश्वत सत्य नहीं है।
 यह “परम सत्य” के अवर्णनीय होने को दर्शाता है।
 (अध्याय-- 23)
信言不美,美言不信。
 अर्थ:
सच्चे (सत्य) शब्द सुंदर नहीं होते, और सुंदर शब्द सच्चे नहीं होते।
 सत्य को सर्वोच्च महत्व दिया गया है।
 2. कन्फ्यूशियस धर्म (Confucianism)
🔹 एनालेक्ट्स (Lunyu)
 (Analects-- 1.7)
人而无信,不知其可也。
 अर्थ:
यदि मनुष्य में सत्य/विश्वास (xin) नहीं है, तो उसका कोई मूल्य नहीं।
 (Analects --13.3)
名不正,则言不顺;言不顺,则事不成。
 अर्थ:
यदि नाम (सत्य/सही स्थिति) सही नहीं है, तो वचन सही नहीं होगा;
और यदि वचन सही नहीं होगा, तो कार्य सफल नहीं होगा।
 यह “ऋत (नियम/सही व्यवस्था)” का सिद्धांत है।
 (Analects --2.22)
君子欲讷于言而敏于行。
 अर्थ:
श्रेष्ठ पुरुष वचन में सत्य और संयम रखता है, और कर्म में तत्पर होता है।
 निष्कर्ष--
ताओ और कन्फ्यूशियस परंपराओं में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि—
 ताओ धर्म में ताओ (道) = ब्रह्मांड का नियम (ऋत)
सत्य = अवर्णनीय, शाश्वत तत्व।
 कन्फ्यूशियस धर्म--
Xin (信) = सत्य/विश्वास
सही व्यवस्था (Order) = धर्म (ऋत के समान)
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” इन परंपराओं में इस प्रकार प्रकट होता है:
ताओ = ऋत (cosmic order)
Xin / Truth = सत्य (सच्च
सूफी मत में ‌प्रमाण--
1. “अल-हक़” (सत्य ही ईश्वर)
 (सूफी सिद्धांत / क़ुरआनी आधार)
اللَّهُ هُوَ الْحَقُّ
 अर्थ:
अल्लाह ही सत्य (अल-हक़) है।
 सूफी मत में “अल-हक़” = परम सत्य (ब्रह्म के समान)
 2. मंसूर हल्लाज का प्रसिद्ध कथन
 मंसूर हल्लाज
أَنَا الْحَقُّ
 अर्थ:
मैं ही सत्य हूँ (अर्थात् आत्मा और परम सत्य का एकत्व)।
 यह अद्वैत के समान सूफी अनुभव है।
 3. सत्य का मार्ग (तरीक़त)
 सूफी उक्ति
مَن صَدَقَ فِي طَلَبِ الْحَقِّ وَجَدَهُ
 अर्थ:
जो सच्चे मन से सत्य (हक़) की खोज करता है, वह उसे पा लेता है।
 4. सत्य और दिल की पवित्रता
 जलालुद्दीन रूमी--
الْحَقُّ فِي قَلْبِكَ فَابْحَثْ عَنْهُ هُنَاكَ
 अर्थ:
सत्य (हक़) तुम्हारे हृदय में है, उसे वहीं खोजो।
 5. सत्य और आचरण (धर्म/ऋत के समान)
 सूफी सिद्धांत
الشَّرِيعَةُ أَقْوَالِي وَالطَّرِيقَةُ أَفْعَالِي وَالْحَقِيقَةُ أَحْوَالِي
 अर्थ:
शरीअत (नियम) मेरे वचन हैं, तरीक़त (मार्ग) मेरे कर्म हैं, और हक़ीक़त (सत्य) मेरी अवस्था है।
यहाँ:
शरीअत = नियम (ऋत)
हक़ीक़त = सत्य (Truth)
 निष्कर्ष--
सूफी मत में स्पष्ट सिद्धांत मिलता है कि—
अल-हक़ (सत्य) = ईश्वर का स्वरूप शरीअत/तरीक़त (नियम/मार्ग) = उसी सत्य तक पहुँचने का मार्ग (ऋत के समान)
 इसलिए वेद का सिद्धांत “ऋतं च सत्यं च” सूफी मत में इस प्रकार प्रकट होता है:
“अल-हक़ ही परम सत्य है”
“उस तक पहुँचने का मार्ग (शरीअत/तरीक़त) ही धर्म/ऋत है।

ऋग्वेद का यह वाक्य — “ऋतं च सत्यं च” — अत्यंत गहन है।
यहाँ ऋत (Ṛta) का अर्थ है सृष्टि का शाश्वत नियम / cosmic order और सत्य (Satya) का अर्थ है सत्यता / truth।
अर्थात् — नियम (प्राकृतिक/दैवी फसव्यवस्था) और सत्य ही जगत का आधार हैं।
 Shinto (神道) में प्रमाण-- 
 1. शिन्तो में “ऋत” (Cosmic Order) का सिद्धांत
शिन्तो धर्म में प्रकृति और ब्रह्मांड की व्यवस्था को “कामी (神)” के माध्यम से समझा जाता है।
 जापानी प्रमाण:
神道では、自然の秩序(しぜんのちつじょ)と調和(ちょうわ)が最も重要とされる。
Romanization:
Shintō de wa, shizen no chitsujo to chōwa ga mottomo jūyō to sareru.
हिंदी भावार्थ:
शिन्तो में प्राकृतिक व्यवस्था (ऋत) और संतुलन को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
 यहाँ 自然の秩序 (शिज़ेन नो चित्सुजो) = प्राकृतिक नियम
यह सीधे ऋत (ऋग्वेद) के समान है।
 2. शिन्तो में “सत्य” (Purity & Truth)
शिन्तो में “सत्य” का रूप शुद्धता (清め / purity) और सच्चाई में दिखता है।
 जापानी प्रमाण:
真心(まごころ)をもって神に仕えることが大切である。
Romanization:
Magokoro o motte kami ni tsukaeru koto ga taisetsu de aru.
हिंदी भावार्थ:
सच्चे हृदय (सत्य) से देवताओं की सेवा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
 真心 (Magokoro) = सच्चा हृदय / सत्य भाव
यह सत्य (Satya) के समान है।
 3. शिन्तो ग्रंथ से प्रमाण (कोजिकी)
प्राचीन शिन्तो ग्रंथ Kojiki (古事記) में सृष्टि की व्यवस्था और दिव्य नियम का वर्णन है।
 जापानी श्लोक (भाव):
天地の理(てんちのことわり)は神の道である。
Romanization:
Tenchi no kotowari wa kami no michi de aru.
हिंदी भावार्थ:
स्वर्ग और पृथ्वी का नियम (ऋत) ही देवमार्ग (ईश्वरीय पथ) है।
 4. शिन्तो का मुख्य सिद्धांत
शिन्तो का एक मूल सिद्धांत है:
 जापानी:
神の道は正直と清浄を重んじる。
Romanization:
Kami no michi wa shōjiki to seijō o omonjiru.
हिंदी भावार्थ:
कामी का मार्ग सत्य (ईमानदारी) और शुद्धता को महत्व देता है।
 正直 (Shōjiki) = सत्य
 清浄 (Seijō) = शुद्धता (ऋत के अनुरूप जीवन)
 समन्वय (Conclusion)
ऋग्वेद
शिन्तो धर्म
ऋत (Cosmic Order)
自然の秩序 (प्राकृतिक नियम)
सत्य (Truth)
真心 / 正直 (सच्चा हृदय, ईमानदारी)
 दोनों ही यह बताते हैं कि:
“सृष्टि का आधार नियम (ऋत) और सत्य (सत्य) है।”
-------+-------+--------+--------




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