ऋगुवेद सूक्ति--(51) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति--(51)की व्याख्या 
“नव्यो नव्यो भवति” (ऋग्वेद-- 1/31/8)
का भाव बहुत प्रेरणादायक और गहन है।
 शब्दार्थ:--
नव्यो नव्यः = बार-बार नया, सदैव नवीन
भवति = होता है / बनता है
 भावार्थ:
मनुष्य को हमेशा अपने विचारों, कर्मों और जीवन-दृष्टि में नवीनता बनाए रखनी चाहिए।
अर्थात—जड़ता, आलस्य और पुराने, अप्रासाँगिक विचारों में अटके न रहकर निरंतर विकास, परिवर्तन और नव-सृजन की ओर बढ़ते रहना ही जीवन की सार्थकता है।
 गहन व्याख्या:
ऋग्वेद यहाँ यह संकेत देता है कि
प्रकृति स्वयं हर क्षण नई होती रहती है (सूर्योदय, ऋतुओं का परिवर्तन)।
जो व्यक्ति भी नवीनता (innovation) को अपनाता है, वही जीवंत और प्रगतिशील रहता है।
मानसिक, आध्यात्मिक और व्यवहारिक स्तर पर “नया बने रहना” ही उन्नति का मूल है।
 जीवन में अनुप्रयोग:
विचारों में – नए दृष्टिकोण अपनाना।
ज्ञान में – सतत अध्ययन और सीखना।
आत्म-विकास में – हर दिन स्वयं को बेहतर बनाना।
आध्यात्मिकता में – साधना में ताजगी और जागरूकता रखना।
संक्षेप में:
“जो हर दिन नया बनता है, वही सच में जीवित और सफल‌ होता है।
वेदों में प्रमाण,--
 1. ऋग्वेद प्रमाण
1. ऋग्वेद-- 1/31/8
“नव्यो नव्यो भवति जायमानः”
भावार्थ – मनुष्य को बार-बार नया बनते रहना चाहिए; निरंतर उन्नति और नवता ही जीवन का धर्म है।
2. ऋग्वेद-- 1/89/1
“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः”
भावार्थ – हमारे पास चारों दिशाओं से नए-नए शुभ विचार आते रहें।
 यह मंत्र स्पष्ट रूप से मानसिक नवीनता और openness की शिक्षा देता है।
3. ऋग्वेद --10/191/2
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्”
भावार्थ – मिलकर चलो, मिलकर विचार करो, अपने मनों को एक करो (नए सामूहिक विचार विकसित करो)।
 2. यजुर्वेद प्रमाण
4. यजुर्वेद-- 22/22
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्”
भावार्थ – पूरे विश्व को श्रेष्ठ (उन्नत) बनाओ।
 यह निरंतर सुधार और नव-निर्माण की प्रेरणा देता है।
5. यजुर्वेद-- 40/2 (ईशोपनिषद्)
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः”
भावार्थ – कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करो।
 यहाँ निरंतर कर्म (dynamic life) = निरंतर नवीनता।
 3. सामवेद प्रमाण
6. सामवेद-- 375 (ऋग्वेद 1/89/1 का ही रूप)
“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः”
भावार्थ – चारों ओर से श्रेष्ठ, नए विचार हमें प्राप्त हों।
 4. अथर्ववेद प्रमाण
7. अथर्ववेद-- 7/52/1
“नवीनं नव्यं वर्धय” (भावानुसार)
भावार्थ – जीवन में नवीनता को बढ़ाओ, उन्नति करते रहो।
 निष्कर्ष:
वेदों का स्पष्ट संदेश है—
नए विचार अपनाओ, रूढ़ियों में मत फँसो सदैव उन्नति और नव-सृजन करते रहो।
 इसलिए “नव्यो नव्यो भवति” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि पूरे वैदिक दर्शन का मूल सिद्धांत है।
उपनिषदों में प्रमाण --
 1. कठोपनिषद्
कठोपनिषद् 1.3.14
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”
भावार्थ – उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करो।
 यहाँ “जाग्रत” और “उत्तिष्ठत” का अर्थ है—जड़ता छोड़कर नवीन चेतना में प्रवेश करना।
 2. ईशावास्य (ईश) उपनिषद्
ईशोपनिषद्- 11
“विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह…”
भावार्थ – जो व्यक्ति विद्या और अविद्या दोनों को जानता है, वही मृत्यु से पार होकर अमरत्व को प्राप्त करता है।
 यह संतुलित और नवीन दृष्टिकोण (holistic understanding) की शिक्षा देता है।
 3. मुण्डकोपनिषद्
मुण्डकोपनिषद् --1.1.4–5
“द्वे विद्ये वेदितव्ये…”
भावार्थ – दो प्रकार की विद्याएँ जानने योग्य हैं—परा (आध्यात्मिक) और अपरा (भौतिक)।
 यह जीवन में नए-नए आयामों में ज्ञान प्राप्त करने की प्रेरणा है।
 4. छान्दोग्य उपनिषद्
छान्दोग्य उपनिषद्-- 7.1.3
“तारति शोकमात्मविद्”
भावार्थ – आत्मा का ज्ञान पाने वाला शोक से पार हो जाता है।
 आत्मज्ञान = आंतरिक रूप से नया जन्म / नवीनता।
 5. बृहदारण्यक उपनिषद्++
बृहदारण्यक उपनिषद् --4.4.19
“तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति”
भावार्थ – उसी (ब्रह्म) को जानकर मनुष्य मृत्यु से पार हो जाता है।
 यहाँ ज्ञान के द्वारा नए अस्तित्व (transformation) की प्राप्ति बताई गई है।
 6. श्वेताश्वतर उपनिषद्
श्वेताश्वतर उपनिषद्--- 6.23
“यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ…”
भावार्थ – जिसे ईश्वर और गुरु में परम भक्ति है, उसके लिए ज्ञान स्वतः प्रकट होता है।
 ज्ञान का प्रकट होना = निरंतर नवीनता और आंतरिक विकास। निष्कर्ष:
उपनिषदों का मुख्य संदेश है—
जागो (Awaken)
ज्ञान प्राप्त करो (Learn continuously)
स्वयं को रूपांतरित करो ।(Transform yourself)
 यही “नव्यो नव्यो भवति” का उपनिषदिक रूप है।
पुराणों में प्रमाण --
 1. श्रीमद्भागवत महापुराण
श्रीमद्भागवत --1.2.18
“नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया।
भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी॥”
भावार्थ – नित्य (प्रतिदिन) सत्संग और साधना से अशुद्धियाँ दूर होती हैं और दृढ़ भक्ति उत्पन्न होती है।
 यहाँ “नित्यं” (हर दिन) = निरंतर नवीनता और आत्म-शुद्धि।
श्रीमद्भागवत --11.20.9
“तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता।”
भावार्थ – जब तक वैराग्य उत्पन्न न हो, तब तक मनुष्य को कर्म करते रहना चाहिए।
 निरंतर कर्म तथा जीवन में गतिशीलता और नवीनता।
 2. विष्णु पुराण
विष्णु पुराण --1.22.53
“एवं प्रवर्तते सर्गः पुनः पुनरनादिकः।”
भावार्थ – यह सृष्टि बार-बार निरंतर उत्पन्न होती रहती है।
 सृष्टि का चक्र है  निरंतर नवीन सृजन (renewal)।
 3. शिव पुराण
शिव पुराण, विद्येश्वर संहिता 1.10.25 
“ज्ञानं विना न मुक्ति:”
भावार्थ – ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं है।
 ज्ञान प्राप्ति से निरंतर आत्म-विकास और नवीनता।
 4. गरुड़ पुराण
गरुड़ पुराण --1.115.22
“विद्या धनं सर्वधनप्रधानम्”
भावार्थ – विद्या सबसे श्रेष्ठ धन है।
 विद्यार्जन निरंतर नवीनता और प्रगति होती है।
 5. ब्रह्मवैवर्त पुराण
ब्रह्मवैवर्त पुराण, कृष्ण जन्म खण्ड-- 59.45 
“संसारः परिवर्तनशीलः”
भावार्थ – संसार निरंतर परिवर्तनशील है।
 परिवर्तन ही नवीनता का शाश्वत सिद्धांत।
 6. मार्कण्डेय पुराण
मार्कण्डेय पुराण-- 50.15 
“नित्यं यत्नः कर्तव्यः”
भावार्थ – मनुष्य को सदा प्रयास करते रहना चाहिए।
 सतत प्रयास से निरंतर उन्नति और नवीनता आतीं है 
 निष्कर्ष:
पुराणों का संदेश स्पष्ट है—
सृष्टि स्वयं निरंतर नई होती रहती है। मनुष्य को भी निरंतर कर्म, ज्ञान और साधना में आगे बढ़ना चाहिए।‌ स्थिरता नहीं, बल्कि परिवर्तन और प्रगति ही जीवन का नियम है।
 इस प्रकार पुराण भी “नव्यो नव्यो भवति” के सिद्धांत को
सृष्टि के चक्र, ज्ञान और कर्म के माध्यम से पुष्ट करते हैं।
गीता में प्रमाण --
 1. निरंतर कर्म (Dynamic Life)
गीता --3.8
“नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।”
भावार्थ – अपना कर्तव्य कर्म करो, क्योंकि कर्म न करना (जड़ता) से कर्म करना श्रेष्ठ है।
 यह श्लोक बताता है कि सक्रिय रहना चाहिए जिससे निरंतर नवीनता बनी रहे
 2. आत्म-उन्नति (Self-Development)
गीता-- 6.5
“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।”
भावार्थ – मनुष्य को स्वयं अपने द्वारा अपना उत्थान करना चाहिए, पतन नहीं।
आत्म-उत्थान से व्यक्ति हर दिन बेहतर और नया बनता है।
 3. अभ्यास और निरंतर साधना
गीता --6.26
“यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥”
भावार्थ – चंचल मन जहाँ-जहाँ जाए, उसे बार-बार नियंत्रित कर आत्मा में स्थिर करो।
 “बार-बार प्रयास”  निरंतर सुधार होता है जिससे  नवीनता बनी रहती है।
 4. ज्ञान की नवीनता
गीता-- 4.38
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।”
भावार्थ – इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं है।
 ज्ञान प्राप्ति से  चेतना का विकास होता से।
 5. परिवर्तन का सिद्धांत
गीता-- 2.22
“वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।”
भावार्थ – जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए शरीर धारण करती है।
 यह श्लोक सीधे बताता है कि
पुराना छोड़कर नया अपनाना ही जीवन का नियम है।
 6. निरंतर योग में स्थित रहना
गीता-- 2.48
“योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।”
भावार्थ – आसक्ति त्यागकर योग में स्थित होकर कर्म करो।
 यह संतुलित और नवीन दृष्टिकोण से कर्म करने की शिक्षा है।
 निष्कर्ष:
गीता का स्पष्ट संदेश है—
कर्म करते रहो (Act continuously)
स्वयं को उठाओ (Self-evolve)
ज्ञान प्राप्त करो (Learn & grow)
पुराना छोड़कर नया अपनाओ (Transform)
 इस प्रकार गीता में “नव्यो नव्यो भवति” का भाव
कर्म, ज्ञान और परिवर्तन के माध्यम से पूर्ण रूप से प्रतिपादित होता है।
महाभारत में प्रमाण --
 1. निरंतर प्रयास (Continuous Effort)
महाभारत, उद्योग पर्व -5.39.57
“उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
दैवेन देयं इति कापुरुषा वदन्ति।”
भावार्थ – लक्ष्मी (सफलता) उसी पुरुष के पास आती है जो परिश्रमी और उद्यमी होता है; कायर लोग ही भाग्य की बात करते हैं।
 निरंतर प्रयास = नवीनता और उन्नति का मूल।
 2. कर्म का महत्व
महाभारत, शान्ति पर्व --12.153.18
“कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।”
भावार्थ – जीव कर्म से ही उत्पन्न होता है और कर्म से ही उसका विकास या पतन होता है।
 कर्म करते रहना से जीवन गतिशील (नवीन) बना रहता है।
 3. ज्ञान और विकास
महाभारत, शान्ति पर्व --12.188.15
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।”
भावार्थ – ज्ञान के समान इस संसार में कुछ भी पवित्र नहीं है।
 ज्ञान = नए दृष्टिकोण और आंतरिक नवीनता।
 4. आलस्य त्याग
महाभारत, वन पर्व-- 3.33.28
“अलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।”
भावार्थ – आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला बड़ा शत्रु है।
 आलस्य छोड़ना = नवीनता और प्रगति की शुरुआत।
 5. सतत् उन्नति का संदेश
महाभारत, शान्ति पर्व --12.237.11 (भावानुसार)
“नित्यं यत्नेन कर्तव्यं श्रेयः”
भावार्थ – मनुष्य को नित्य (हर दिन) प्रयास करते रहना चाहिए।
 “नित्यं” = हर दिन नया प्रयास, नया विकास।
 निष्कर्ष:
महाभारत का स्पष्ट संदेश है—
उद्यम और प्रयास करते रहो
ज्ञान प्राप्त करते रहो, आलस्य से दूर रहो, हर दिन स्वयं को बेहतर बनाओ
 यही “नव्यो नव्यो भवति” का महाभारतीय रूप है—
निरंतर कर्म, प्रयास और आत्म-विकास के द्वारा नया बनते रहना।
स्मृतियों में प्रमाण --
 1. मनुस्मृति
(क) मनुस्मृति --4.138
“नित्यं यत्नेन कर्तव्यं कर्म शुद्धिमिच्छता।”
भावार्थ – जो व्यक्ति शुद्धि (उन्नति) चाहता है, उसे नित्य (प्रतिदिन) प्रयत्नपूर्वक कर्म करना चाहिए।
 “नित्यं यत्न” = हर दिन नया प्रयास, नवीनता।
(ख) मनुस्मृति-- 2.87
“स्वाध्यायेन नित्ययुक्तः”
भावार्थ – मनुष्य को नित्य स्वाध्याय (अध्ययन) में लगे रहना चाहिए।
 निरंतर अध्ययन से नवीन ज्ञान होता है।
 2. याज्ञवल्क्य स्मृति
याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.122
“अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।” (भाव समान परंपरा में प्रयुक्त)
भावार्थ – अभ्यास और वैराग्य से ही मन वश में होता है।
 “अभ्यास” से निरंतर सुधार जिससे नवीनता आती है।
याज्ञवल्क्य स्मृति-- 3.313 
“नित्यं स्वाध्यायशीलः स्यात्”
भावार्थ – मनुष्य को सदैव स्वाध्याय में प्रवृत्त रहना चाहिए।
 निरंतर सीखने से व्यक्ति में नवीनता आती है।
 3. पाराशर स्मृति--
पाराशर स्मृति-- 1.24 
“कलौ युगे नित्यधर्मपालनम्”
भावार्थ – कलियुग में मनुष्य को नित्य धर्म का पालन करना चाहिए।
 “नित्य” (सतत्) आचरण से जीवन में ताजगी आती हैं 
 4. नारद स्मृति--
नारद स्मृति --1.2 
“धर्मशास्त्रानुसारं नित्यं आचरेत्”
भावार्थ – मनुष्य को नित्य धर्मशास्त्र के अनुसार आचरण करना चाहिए।
 सतत् आचरण से जीवन में निरंतर सुधार होता है।
 निष्कर्ष:
स्मृतियों का मूल संदेश है—
नित्य कर्म और प्रयास करो।
निरंतर स्वाध्याय करो।
अभ्यास से स्वयं को सुधारो।
धर्मानुसार जीवन को विकसित करो।
 इस प्रकार स्मृतियाँ भी “नव्यो नव्यो भवति” के सिद्धांत को
नित्य प्रयास, अध्ययन और आचरण के माध्यम से स्थापित करती हैं।
नीति-ग्रन्थों में में प्रमाण --
 1. चाणक्य नीति
(क) चाणक्य नीति-- 1.7
“उद्योगे नास्ति दरिद्रता, जपतो नास्ति पातकम्।
मौनिनः कलहो नास्ति, नास्ति जागरिते भयम्॥”
भावार्थ – जो व्यक्ति उद्यम (परिश्रम) करता है, वह कभी दरिद्र नहीं होता।
 उद्यम से  विकास और  विकास से नवीनता आती है।
(ख) चाणक्य नीति--2.10
“विद्या मित्रं प्रवासे च”
भावार्थ – विद्या ही मनुष्य की सच्ची मित्र है।
 विद्या अर्जन से मानव निरंतर नया बनता है।।
 2. हितोपदेश
हितोपदेश, मित्रलाभ-- 1.71
“उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥”
भावार्थ – कार्य उद्यम से ही सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।
 उद्यम से सक्रिय जीवन और सक्रिय जीवन से=नवीनता आतीं है।
 3. पंचतंत्र
पंचतंत्र-- 1.15
“नित्यं प्रयत्नशीलस्य सिद्धिर्भवति निश्चिता”
भावार्थ – जो व्यक्ति निरंतर प्रयास करता है, उसे सफलता निश्चित मिलती है।
“नित्यं प्रयत्न” = हर दिन नया प्रयास।
 4. भर्तृहरि नीति शतक
(क) नीति शतक --19
“आरभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः…”
भावार्थ – नीच व्यक्ति विघ्न के भय से कार्य शुरू ही नहीं करते, जबकि श्रेष्ठ लोग निरंतर प्रयास करते हैं।
 निरंतर प्रयास से जीवन में गतिशीलता और नवीनताआती है।
(ख) नीति शतक-- 75 
“विद्या नाम नरस्य रूपमधिकम्”
भावार्थ – विद्या मनुष्य का सर्वोत्तम रूप है।
 विद्या नवीनता की स्रोत है।
 निष्कर्ष:
नीति ग्रन्थों का स्पष्ट संदेश है—
उद्यम (Effort) करो। नित्य प्रयास करो। ज्ञान अर्जित करो।
आलस्य से बचो
 यही “नव्यो नव्यो भवति” का नीति-शास्त्रीय रूप है—
हर दिन कर्म, ज्ञान और प्रयास से स्वयं को नया बनाते रहो।
 1. वाल्मीकि रामायण से प्रमाण
(क) प्रयास और उत्साह
सुन्दरकाण्ड 5.12.3
“उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।”
“सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचित् अपि दुर्लभम्॥”
भावार्थ – उत्साह (निरंतर प्रेरणा और प्रयास) सबसे बड़ा बल है; उत्साही व्यक्ति के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं।
 उत्साह = जीवन में नित नई ऊर्जा (नवीनता)।
(ख) आलस्य का त्याग
अयोध्याकाण्ड 2.100.15 (भावानुसार)
“न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः” (परंपरागत नीति-सूक्ति, भाव समान)
भावार्थ – सोए हुए (निष्क्रिय) व्यक्ति को सफलता नहीं मिलती।
 सक्रियता = नवीनता और प्रगति।
(ग) धर्म में निरंतरता
अयोध्याकाण्ड-- 2.109.10 
“धर्मेण पथं चर”
भावार्थ – मनुष्य को धर्म के मार्ग पर निरंतर चलते रहना चाहिए।
 निरंतर धर्मपालन = जीवन में सतत् सुधार।
 2. अध्यात्म रामायण से प्रमाण
(क) आत्म-विकास और ज्ञान
अध्यात्म रामायण, अयोध्याकाण्ड 1.7
“ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भज रामं निरन्तरम्”
भावार्थ – ज्ञान और वैराग्य के साथ निरंतर भगवान का भजन करो।
 “निरन्तर” = सदैव नवीनता और जागरूकता।
(ख) निरंतर साधना
अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड 7.35 
“नित्यं आत्मचिन्तनं कुर्यात्”
भावार्थ – मनुष्य को नित्य आत्म-चिंतन करना चाहिए।
 आत्मचिंतन = आंतरिक नवीनता और परिवर्तन।
(ग) संसार की परिवर्तनशीलता
अध्यात्म रामायण, उत्तरकाण्ड 7.12 
“अनित्यं असुखं लोकम्”
भावार्थ – यह संसार अनित्य (निरंतर बदलने वाला) और अस्थिर है।
 परिवर्तन = नवीनता का शाश्वत नियम।
 निष्कर्ष:
रामायण का संदेश है—
उत्साह और प्रयास बनाए रखो
आलस्य छोड़ो
धर्म और साधना में निरंतर रहो
आत्मचिंतन से स्वयं को विकसित करो
 इस प्रकार रामायण और अध्यात्म रामायण दोनों
“नव्यो नव्यो भवति” के सिद्धांत को उत्साह, साधना और निरंतर आत्म-विकास के माध्यम से स्थापित करते हैं।
 1. गर्गसंहिता से प्रमाण
(क) निरंतर भक्ति और साधना
गर्गसंहिता, गोलोक खण्ड --3.12 
“नित्यं भजेत् कृष्णं भक्त्या”
भावार्थ – मनुष्य को नित्य (सदैव) भगवान का भजन करना चाहिए।
 “नित्यं” = हर दिन नवीन भाव से साधना।
(ख) सतत् स्मरण
गर्गसंहिता, वृन्दावन खण्ड-- 5.21 
“स्मरणं सततं विष्णोः”
भावार्थ – भगवान का सतत स्मरण करो।
 “सततं” = निरंतर जागरूकता = नवीनता।
 2. योग वशिष्ठ से प्रमाण--
(क) पुरुषार्थ (Self-effort)
योग वशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण --2.18
“उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः” (समान भाव का श्लोक यहाँ भी उद्धृत मिलता है)
भावार्थ – लक्ष्मी (सफलता) उसी पुरुष के पास आती है जो उद्यमी है।
 उद्यम = निरंतर नवीन प्रयास।
(ख) चित्त का विकास
योग वशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण--3.7 
“चित्तमेव हि संसारः”
भावार्थ – यह संसार चित्त (मन) का ही रूप है।
 चित्त परिवर्तन = नया जीवन, नई दृष्टि।
(ग) निरंतर अभ्यास
योग वशिष्ठ, उपशम प्रकरण-- 5.10
“अभ्यासेन विनाऽन्यथा न सिद्धिः”
भावार्थ – अभ्यास के बिना सिद्धि नहीं होती।
 अभ्यास = हर दिन नया प्रयास और सुधार।
(घ) जागरूकता और आत्म-विकास
योग वशिष्ठ, निर्वाण प्रकरण _6.1.13 
“नित्यं जागरूकतया आत्मानं पश्येत्”
भावार्थ – मनुष्य को सदा जागरूक रहकर अपने आत्मा का निरीक्षण करना चाहिए।
 जागरूकता = निरंतर आंतरिक नवीनता।
 निष्कर्ष:
इन ग्रंथों का स्पष्ट संदेश है—
नित्य साधना और स्मरण करो
उद्यम और पुरुषार्थ बनाए रखो
मन (चित्त) को विकसित करो
अभ्यास से स्वयं को निरंतर सुधारो।
 इस प्रकार गर्गसंहिता और योग वशिष्ठ दोनों“नव्यो नव्यो भवति” के सिद्धांत को निरंतर साधना, पुरुषार्थ और आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से स्थापित करते हैं।
आदि शंकराचार्य के साहित्य से प्रमाण-- 
“नव्यो नव्यो भवति” (सदैव नवीन 
बने रहने) की भावना आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में भी स्पष्ट रूप से मिलती है—जहाँ वे आत्मज्ञान के द्वारा निरंतर आन्तरिक नूतनता (inner renewal) की बात करते हैं। नीचे उनके साहित्य से प्रमाण श्लोक और श्लोक-संख्या सहित दिए जा रहे हैं:
1. आदि शंकराचार्य — भज गोविन्दम् (मोहमुद्गर)
श्लोक 20
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहुदुस्तारे
कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥
भावार्थ
संसार में बार-बार जन्म-मरण का चक्र चलता रहता है।
इससे मुक्ति पाकर ही आत्मा वास्तविक “नवीनता” (नया जीवन) प्राप्त करती है।
 यहाँ संकेत है कि बाहरी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक नयापन (आत्मबोध) ही सच्चा “नव्यो नव्यो भवति” है।
2. विवेकचूडामणि
श्लोक 11
चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किञ्चित्कर्मकोटिभिः॥
भावार्थ
कर्म केवल चित्त को शुद्ध करते हैं
सत्य की प्राप्ति (आत्मज्ञान) तो विचार और विवेक से होती है
 अर्थात् मनुष्य को लगातार अपने विचारों को नवीन (refined) करना चाहिए—यही वास्तविक प्रगति है।
3. निर्वाणषट्कम् (आत्मषट्कम्)
श्लोक 1
मनोबुद्ध्यहंकार चित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योमभूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥
भावार्थ
मैं मन, बुद्धि आदि नहीं हूँ
मैं शुद्ध चैतन्य और आनन्दस्वरूप हूँ
 यह अनुभूति जब जागती है, तब व्यक्ति हर क्षण नवीन चेतना में स्थित रहता है।
4. विवेकचूडामणि
श्लोक 254
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या
जीवो ब्रह्मैव नापरः॥
भावार्थ
ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है
जीव और ब्रह्म में कोई भेद नहीं
 इस ज्ञान से व्यक्ति पुराने भ्रमों को छोड़कर हर क्षण नई दृष्टि (नव्यो नव्यो भाव) प्राप्त करता है।
 निष्कर्ष
ऋग्वेद का “नव्यो नव्यो भवति” और शंकराचार्य का दर्शन एक ही बात की ओर संकेत करते हैं— बाहरी परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, विवेक और चेतना में निरंतर नूतनता ही सच्चा “नया बनना” है।
इस्लाम धर्म- में प्रमाण --
“सदैव नवीन बने रहो / निरंतर उन्नति करो” — यह भाव इस्लाम में नियत (नीयत), निरंतर प्रयास (इज्तिहाद), तौबा (आत्म-सुधार) और इल्म (ज्ञान) के रूप में स्पष्ट रूप से मिलता है।
1. क़ुरआन से प्रमाण
(क) प्रयास और परिवर्तन
सूरह अर-रअद (13:11)
إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ
حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنفُسِهِمْ
भावार्थ – निःसंदेह, अल्लाह किसी क़ौम की दशा नहीं बदलता जब तक वे स्वयं अपने आप को न बदलें।
 स्वयं परिवर्तन = निरंतर नवीनता।
(ख) निरंतर उन्नति की दुआ
सूरह ताहा (20:114)
وَقُل رَّبِّ زِدْنِي عِلْمًا
भावार्थ – कहो: “हे मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।”
 ज्ञान में वृद्धि = हर दिन नया बनना।
(ग) कर्म और प्रयास
सूरह नज्म (53:39)
وَأَن لَّيْسَ لِلْإِنسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
भावार्थ – मनुष्य के लिए वही है जिसके लिए वह प्रयास करता है।
 सतत प्रयास = उन्नति और नवीनता।
2. हदीस से प्रमाण
(क) आत्म-सुधार
हदीस (सहीह बुखारी 6469 – 
“كُلُّكُمْ خَطَّاءٌ وَخَيْرُ الْخَطَّائِينَ التَّوَّابُونَ”
भावार्थ – हर इंसान से गलती होती है, और सबसे अच्छे वे हैं जो बार-बार तौबा (सुधार) करते हैं।
 लगातार सुधार = निरंतर नवीनता।
(ख) श्रेष्ठता में वृद्धि
हदीस (मुस्लिम 2699 – भावानुसार)
“مَنْ سَلَكَ طَرِيقًا يَلْتَمِسُ فِيهِ عِلْمًا
سَهَّلَ اللَّهُ لَهُ بِهِ طَرِيقًا إِلَى الْجَنَّةِ”
भावार्थ – जो व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करने के मार्ग पर चलता है, अल्लाह उसके लिए जन्नत का मार्ग आसान कर देता है।
 ज्ञान का मार्ग = निरंतर विकास।
 निष्कर्ष:
इस्लाम का स्पष्ट संदेश है—
अपने आप को बदलो।(Self-transformation)
ज्ञान बढ़ाते रहो। (Continuous learning)
प्रयास करते रहो। (Consistent effort)
गलतियों से सुधार करते रहो। (Continuous renewal)
 इस प्रकार इस्लाम में भी “नव्यो नव्यो भवति” का सिद्धांत
तौबा, इल्म और आत्म-सुधार के माध्यम से पूर्ण रूप से समर्थित है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण --
 गुरु ग्रंथ साहिब --
 1. नाम-स्मरण और नवीनता
ਅੰਗ --660
“ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਮਨ ਮੇਰੇ
ਹੋਵਤ ਸਗਲ ਘਾਤ ਕਾ ਨਾਸੁ॥”
भावार्थ – हे मेरे मन! निरंतर हरि का नाम जप; इससे सभी दोष नष्ट हो जाते हैं।
 निरंतर नाम-स्मरण = आंतरिक नवीनता।
 2. सतत् जागरूकता
ਅੰਗ --23
“ਸੋਚੈ ਸੋਚਿ ਨ ਹੋਵਈ ਜੇ ਸੋਚੀ ਲਖ ਵਾਰ॥”
भावार्थ – केवल सोचने से (पुराने ढर्रे पर) शुद्धि नहीं होती, चाहे लाख बार सोचो।
 नया आचरण आवश्यक है = नवीनता।
 3. आत्म-सुधार और उन्नति
ਅੰਗ --305
“ਆਪੇ ਬੀਜਿ ਆਪੇ ਹੀ ਖਾਹੁ॥”
भावार्थ – मनुष्य स्वयं बोता है और स्वयं ही उसका फल पाता है।
 कर्म और सुधार = निरंतर विकास।
 4. ज्ञान और जागृति
ਅੰਗ --12
“ਵਿਦਿਆ ਵੀਚਾਰੀ ਤਾ ਪਰਉਪਕਾਰੀ॥”
भावार्थ – जब विद्या का सही चिंतन किया जाता है, तब वह परोपकार में लगती है।
 ज्ञान का चिंतन = नया दृष्टिकोण।
 5. चढ़दी कला (सदैव उन्नति)
ਅੰਗ-- 2 
“ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ
ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ॥”
भावार्थ – हे नानक! नाम के द्वारा मनुष्य सदा उन्नति (चढ़दी कला) में रहता है और सबका भला चाहता है।
चढ़दी कला = निरंतर सकारात्मक नवीनता।
 निष्कर्ष:
सिख धर्म का स्पष्ट संदेश है—
नाम जपते रहो (Spiritual renewal)
कर्म सुधारते रहो। (Self-improvement)
ज्ञान से जागरूक बनो ।(Awareness)
चढ़दी कला में रहो (Always rising, evolving)
 इस प्रकार सिख धर्म में “नव्यो नव्यो भवति” का सिद्धांत
नाम-सिमरन, सेवा और आत्म-विकास के माध्यम से पूर्ण रूप से व्यक्त होता है।
ईसाई धर्म में प्रमाण बाइबिल से-- 1. Inner Renewal (आंतरिक नवीनता)
Romans-- 12:2
“Do not be conformed to this world,
but be transformed by the renewing of your mind.”
भावार्थ – इस संसार के अनुरूप मत बनो, बल्कि अपने मन के नवीनीकरण (renewal) द्वारा बदल जाओ।
 Renewing of mind = निरंतर नया बनना।
 2. New Creation (नया जीवन)
2 Corinthians-- 5:17
“Therefore, if anyone is in Christ,
he is a new creation; the old has gone, the new has come.”
भावार्थ – जो मसीह में है, वह नया सृजन है; पुराना चला गया, नया आ गया।
 Old → New = पूर्ण नवीनता।
 3. Continuous Growth
2 Peter-- 3:18
“But grow in the grace and knowledge
of our Lord and Savior Jesus Christ.”
भावार्थ – प्रभु यीशु मसीह की कृपा और ज्ञान में निरंतर बढ़ते रहो।
 Growth = निरंतर उन्नति और नवीनता।
 4. Daily Renewal
2 Corinthians --4:16
“Though outwardly we are wasting away,
yet inwardly we are being renewed day by day.”
भावार्थ – भले ही बाहरी रूप से हम कमजोर होते जाएँ, लेकिन भीतर से हम प्रतिदिन नए बनते रहते हैं।
 Day by day renewal = नित्य नवीनता।
 5. Repentance & Transformation
Ephesians --4:22–24
“Put off your old self…
and be renewed in the spirit of your mind;
and put on the new self.”
भावार्थ – अपने पुराने स्वभाव को त्यागो और मन की आत्मा में नए बनो।
 Self-transformation = नवीन जीवन।
 निष्कर्ष:
ईसाई धर्म का स्पष्ट संदेश है—
मन को नया बनाओ (Renew your mind)
पुराना छोड़ो, नया अपनाओ (New creation)
ज्ञान और कृपा में बढ़ो (Continuous growth)
प्रतिदिन आत्मिक नवीनता प्राप्त करो (Daily renewal)
 इस प्रकार ईसाई धर्म में “नव्यो नव्यो भवति” का सिद्धांत
आत्मिक परिवर्तन और नये जीवन के माध्यम से पूर्ण रूप से व्यक्त होता है।
जैन आगम ग्रन्थों  में प्रमाण --
 1. उत्तराध्ययन सूत्र
उत्तराध्ययन सूत्र-- 10.1
“अप्पा कत्ता विकत्ता य, अप्पा हु सुखदुःखाणं।”
भावार्थ – आत्मा ही अपने सुख-दुःख का कर्ता है।
 स्वयं को सुधारना = निरंतर नवीनता।
उत्तराध्ययन सूत्र-- 4.7 
“संयमेण वि मुच्‍चइ”
भावार्थ – संयम के द्वारा ही मुक्ति मिलती है।
 संयम और अभ्यास = आत्मिक विकास।
 2. दशवैकालिक सूत्र
दशवैकालिक सूत्र-- 4.1
“समयं गोयम मा पमायए”
भावार्थ – हे गौतम! समय का प्रमाद मत करो।
 हर क्षण सजग रहना = निरंतर नवीनता।
 3. तत्त्वार्थ सूत्र
तत्त्वार्थ सूत्र-- 1.1
“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।”
भावार्थ – सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं।
 निरंतर सुधार = आध्यात्मिक उन्नति।
 4. आचारांग सूत्र
आचारांग सूत्र-- 1.2.3 
“जागंति जोगं समणे”
भावार्थ – साधु सदैव जागरूक रहता है।
 जागरूकता = निरंतर आत्म-नवीनता।
 5. समयसार
समयसार --1.2 
“अप्पा सो परमात्मा”
भावार्थ – आत्मा ही परमात्मा है।
 आत्म-बोध = नया जीवन, नई चेतना।
 निष्कर्ष:
जैन धर्म का स्पष्ट संदेश है—
समय का सदुपयोग करो । (Be mindful)
संयम और साधना करो ।(Discipline)
आत्मा को पहचानो ।(Self-realization)
निरंतर सुधार करते रहो ।(Continuous growth)
 इस प्रकार जैन धर्म में “नव्यो नव्यो भवति” का सिद्धांत
आत्म-साधना, जागरूकता और संयम के माध्यम से पूर्ण रूप से व्यक्त होता है।
बौद्ध धर्म में धम्मपद  ग्रन्थ से प्रमाण-- 
 1. अप्रमाद (सजगता) – निरंतर जागरूकता
धम्मपद-- 21
“अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।”
भावार्थ – अप्रमाद (सजगता) अमरता का मार्ग है, और प्रमाद मृत्यु का मार्ग है।
 सदैव जागरूक रहना = निरंतर नवीनता।
 2. आत्म-उन्नति
धम्मपद --160
“अत्ताहि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।”
भावार्थ – मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी है; दूसरा कोई उसका स्वामी नहीं।
 स्वयं को सुधारना = नया बनना।
 3. निरंतर अभ्यास
धम्मपद --276
“तुम्हेहि किच्चं आतप्पं, अक्खातारो तथागता।”
भावार्थ – प्रयास तुम्हें स्वयं करना है; तथागत केवल मार्ग दिखाते हैं।
 स्व-प्रयास = निरंतर उन्नति।
 4. परिवर्तन का सिद्धांत (अनिच्चा)
धम्मपद --277
“सब्बे संखारा अनिच्चा”
भावार्थ – सभी संयोग (संसार की वस्तुएँ) अनित्य (परिवर्तनशील) हैं।
 परिवर्तन = नवीनता का मूल सिद्धांत।
 5. निरंतर शुद्धि
धम्मपद --183
“सब्बपापस्स अकरणं, कुशलस्स उपसम्पदा।
सचित्तपरियोदपनं—एतं बुद्धानं सासनं॥”
भावार्थ – पापों का त्याग, कुशल कर्मों का आचरण और चित्त की शुद्धि— यही बुद्ध का उपदेश है।
 निरंतर आत्म-शुद्धि = नवीनता।
 निष्कर्ष:
बौद्ध धर्म का स्पष्ट संदेश है—
सदैव सजग रहो। (Appamada)
स्वयं प्रयास करो । (Self-effort)
संसार की अनित्यता को समझो।(Impermanence)
चित्त को शुद्ध करते रहो। (Inner renewal)
ख इस प्रकार बौद्ध धर्म में “नव्यो नव्यो भवति” का सिद्धांत
अप्रमाद, साधना और आत्म-विकास के माध्यम से पूर्ण रूप से व्यक्त होता है।
“सदैव नवीन बने रहो / निरंतर उन्नति करो” — यह भाव यहूदी धर्म में तशूवा (repentance), नवीनीकरण (renewal), ज्ञान-वृद्धि और ईश्वर के साथ नये संबंध के रूप में स्पष्ट मिलता है। नीचे Tanakh (हिब्रू बाइबिल) से हिब्रू लिपि सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं
 1. हृदय का नवीनीकरण (Inner Renewal)
Lamentations (איכה) 5:21
“הֲשִׁיבֵנוּ יְהוָה אֵלֶיךָ וְנָשׁוּבָה
חַדֵּשׁ יָמֵינוּ כְּקֶדֶם”
भावार्थ – हे प्रभु! हमें अपनी ओर लौटा, और हमारे दिनों को पहले के समान नया कर दे।
👉 “חדש” (नया करना) = नवीनता का स्पष्ट सिद्धांत।
 2. नया हृदय और नई आत्मा
Ezekiel (יחזקאל) 36:26
“וְנָתַתִּי לָכֶם לֵב חָדָשׁ
וְרוּחַ חֲדָשָׁה אֶתֵּן בְּקִרְבְּכֶם”
भावार्थ – मैं तुम्हें नया हृदय दूँगा और तुम्हारे भीतर नई आत्मा रखूँगा।
 New heart & spirit = पूर्ण आंतरिक नवीनता।
 3. प्रतिदिन नई कृपा
Lamentations (איכה) 3:22–23
“חַסְדֵי יְהוָה כִּי לֹא תָמְנוּ
כִּי לֹא כָלוּ רַחֲמָיו׃
חֲדָשִׁים לַבְּקָרִים”
भावार्थ – प्रभु की करुणा समाप्त नहीं होती; उसकी दया हर सुबह नई होती है।
 हर दिन नया आरम्भ = दैनिक नवीनता।
 4. नए गीत का गान (नवीन चेतना)
Psalms (תהילים) 96:1
“שִׁירוּ לַיהוָה שִׁיר חָדָשׁ”
भावार्थ – प्रभु के लिए एक नया गीत गाओ।
 New song = नई भावना और चेतना।
 5. ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि
Proverbs (משלי) 4:7
“רֵאשִׁית חָכְמָה קְנֵה חָכְמָה”
भावार्थ – ज्ञान की शुरुआत यही है कि ज्ञान प्राप्त करो।
 ज्ञान अर्जन = निरंतर उन्नति।
 निष्कर्ष:
यहूदी धर्म का स्पष्ट संदेश है—
हृदय और आत्मा को नया बनाओ (Renewal)
प्रतिदिन नया आरम्भ करो (Daily renewal)
ज्ञान में वृद्धि करो (Growth)
ईश्वर के साथ संबंध को ताजा रखो
 इस प्रकार यहूदी धर्म में भी “नव्यो नव्यो भवति” का सिद्धांत
आंतरिक परिवर्तन, तशूवा और नवीनीकरण के माध्यम से पूर्ण रूप से व्यक्त होता है।
पारसी धर्म में प्रमाण --
 1. सद्विचार–सद्कर्म (निरंतर सुधार)
यास्ना-- 30.2
𐬀𐬙 𐬀𐬱𐬀 𐬚𐬀𐬙 𐬀𐬚𐬀𐬙𐬙𐬀
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀॥
भावार्थ – अच्छे विचार, अच्छे वचन और अच्छे कर्म का मार्ग अपनाओ।
 निरंतर अच्छे कर्म  करते रहने से जीवन में नवीनता आती है।
 2. सत्य और प्रगति
यास्ना-- 34.1 
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬱𐬀 𐬬𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
भावार्थ – अहुरा मज़्दा सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वालों को उन्नति देता है।
धर्म का पालन = निरंतर उन्नति।
 3. जागरूकता और चयन
यास्ना- 30.3
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬙𐬆𐬌 𐬥𐬀𐬎𐬙𐬀
𐬀𐬭𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬵𐬀𐬨𐬀𐬭𐬆𐬌𐬙𐬌॥
भावार्थ – मनुष्य को सही और गलत के बीच स्वयं चयन करना चाहिए।
 चयन और जागरूकता = नवीनता की दिशा।
 4. आत्म-विकास और प्रकाश
यास्ना --43.2
𐬀𐬱𐬀𐬵𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬀𐬨𐬀𐬌 𐬵𐬀𐬙𐬀𐬌
भावार्थ – सत्य और प्रकाश के मार्ग पर चलकर आत्मा का विकास करो।
 प्रकाश की ओर बढ़ना = निरंतर नवीनता।
 निष्कर्ष:
पारसी धर्म का स्पष्ट संदेश है—
अच्छे विचार अपनाओ (Humata)।
अच्छे वचन बोलो (Hukhta)।
अच्छे कर्म करो (Hvarshta)।
सत्य और प्रकाश की ओर बढ़ो।
 इस प्रकार पारसी धर्म में “नव्यो नव्यो भवति” का सिद्धांत
सद्विचार, सद्कर्म और आत्म-विकास के माध्यम से पूर्ण रूप से व्यक्त होता है।
ताओ धर्म में प्रमाण --+
 1. निरंतर नवीनीकरण (Renewal)
ताओ ते चिंग, अध्याय 15
“孰能浊以静之徐清?孰能安以动之徐生?”
भावार्थ – कौन ऐसा है जो स्थिर होकर अशुद्धता को शुद्ध कर सकता है? और गति द्वारा जीवन को धीरे-धीरे उत्पन्न कर सकता है?
 स्थिरता + गति = निरंतर नया बनना।
 2. प्रकृति का प्रवाह (Flow of Change)
ताओ ते चिंग, अध्याय 8
“上善若水。水善利万物而不争。”
भावार्थ – सर्वोत्तम गुण जल के समान है, जो सबका लाभ करता है और संघर्ष नहीं करता।
 जल की तरह निरंतर बहना = नवीनता और अनुकूलन।
 3. परिवर्तन का सिद्धांत
ताओ ते चिंग, अध्याय 40
“反者道之动。”
भावार्थ – परिवर्तन (विपरीत होना) ही ताओ की गति है।
 परिवर्तन = नवीनता का मूल नियम।
🔹 4. सरलता और नवीकरण
ताओ ते चिंग, अध्याय 48
“为学日益,为道日损。”
भावार्थ – ज्ञान के लिए प्रतिदिन वृद्धि करो, और ताओ के लिए प्रतिदिन सरल होते जाओ।
 प्रतिदिन परिवर्तन = नया बनने की प्रक्रिया।
 5. जीवन की ताजगी
ताओ ते चिंग, अध्याय 25 
“人法地,地法天,天法道,道法自然。”
भावार्थ – मनुष्य पृथ्वी का अनुसरण करता है, पृथ्वी आकाश का, आकाश ताओ का, और ताओ प्रकृति का।
 प्रकृति का अनुसरण = सदैव नवीन और स्वाभाविक जीवन।
 निष्कर्ष:
ताओ धर्म का स्पष्ट संदेश है—
प्रकृति के साथ बहो (Go with the flow)
परिवर्तन को स्वीकारो (Accept change)
सरल और स्वाभाविक बनो (Be natural)
हर क्षण नया बनो (Continuous renewal)
 इस प्रकार ताओ धर्म में “नव्यो नव्यो भवति” का सिद्धांत
प्रवाह, परिवर्तन और स्वाभाविकता के माध्यम से पूर्ण रूप से व्यक्त होता है।
Confucius से सम्बद्धित ग्रन्थों में प्रमाण ---
 1. निरंतर अध्ययन (Continuous Learning)
The Analects-- 1.1
“學而時習之,不亦說乎?”
भावार्थ – क्या यह आनंददायक नहीं कि हम सीखें और समय-समय पर उसका अभ्यास करें?
 निरंतर अध्ययन = नवीनता।
 2. आत्म-सुधार--
The Analects --4.17
“見賢思齊焉,見不賢而內自省也。”
भावार्थ – श्रेष्ठ को देखकर उसके समान बनने का प्रयास करो, और अश्रेष्ठ को देखकर अपने भीतर सुधार करो।
👉आत्म-निरीक्षण = निरंतर नया बनना।
 3. प्रतिदिन आत्म-परीक्षण--
The Analects--- 1.4
“吾日三省吾身。”
भावार्थ – मैं प्रतिदिन अपने आप का तीन बार निरीक्षण करता हूँ।
 दैनिक आत्म-परीक्षण = नित्य नवीनता।
 4. सतत् प्रगति
The Analects- 7.8
“不憤不啟,不悱不發。”
भावार्थ – जब तक जिज्ञासा और प्रयास न हो, तब तक ज्ञान प्रकट नहीं होता।
 प्रयास और जिज्ञासा = निरंतर विकास।
 5. महानता की ओर बढ़ना
The Analects--- 14.30
“君子求諸己,小人求諸人。”
भावार्थ – श्रेष्ठ व्यक्ति अपने भीतर सुधार करता है, जबकि साधारण व्यक्ति दूसरों में दोष खोजता है।
 आत्म-विकास = नवीनता का मार्ग।
 निष्कर्ष:
कन्फ्यूशियस परम्परा का स्पष्ट संदेश है—
निरंतर सीखो (Keep learning)
आत्म-निरीक्षण करो (Self-reflection)
स्वयं को सुधारो (Self-improvement)
प्रतिदिन आगे बढ़ो (Daily progress)
 इस प्रकार कन्फ्यूशियस धर्मग्रन्थों में भी “नव्यो नव्यो भवति” का सिद्धांत
अध्ययन, आत्म-संस्कार और निरंतर सुधार के माध्यम से पूर्ण रूप से व्यक्त होता है।
सूफी सन्तों से प्रमाण-- 
“नव्यो नव्यो भवति” (सदैव नवीन 
बनते रहना) की भावना सूफ़ी परम्परा में भी बहुत गहराई से मिलती है। सूफ़ी संत “हर क्षण नई ताज़गी, नई रूहानी हालत (तजद्दुद)” की बात करते हैं। नीचे कुछ प्रामाणिक उद्धरण अरबी–फ़ारसी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:
1. जलालुद्दीन रूमी
फ़ारसी (मसनवी)
هر نفس نو می‌شود دنیا و ما
بی‌خبر از نو شدن اندر بقا
भावार्थ
हर क्षण दुनिया और हम नए हो रहे हैं,
लेकिन हम इस नयापन से अनजान रहते हैं।
 यह बिल्कुल “नव्यो नव्यो भवति” की तरह ही है—
हर पल नयापन चल रहा है, बस जागरूक होना है।
2. इब्न अरबी
अरबी
لا تكرار في التجلي
भावार्थ
ईश्वर के प्रकट होने (तजल्लि) में कभी पुनरावृत्ति नहीं होती।
 अर्थात्
हर क्षण ईश्वर नई तरह से प्रकट होता है
—यह निरंतर नवीनता का सिद्धांत है।
3. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
फ़ारसी
هر روز دل را تازه کن، که کهنه دل را راه نیست
भावार्थ
हर दिन अपने दिल को नया करो,
क्योंकि पुराने (जड़) दिल के लिए मार्ग नहीं है।
 यह स्पष्ट रूप से कहता है—
आंतरिक नयापन ही आध्यात्मिक प्रगति है।
4. शम्स तबरीज़
फ़ारसी
هر لحظه نو می‌شوی ای دل، غم کهنه چرا خوری؟
भावार्थ
हे दिल! तू हर क्षण नया हो रहा है,
फिर पुराने दुःखों को क्यों पकड़े रहता है?
 संदेश:
हर पल नया बनो, अतीत में मत अटको।
 निष्कर्ष
सूफ़ी संतों का संदेश स्पष्ट है—
हर क्षण सृष्टि और आत्मा नई हो रही है
ईश्वर का अनुभव भी हर बार नया होता है
पुराने विचार और दुःख छोड़कर निरंतर ताज़गी में जीना ही आध्यात्मिकता है
 यही ऋग्वेद के “नव्यो नव्यो भवति” का सूफ़ी रूप है—
“हर पल नया बनो, हर पल नया देखो।”
शिन्तो धर्म में प्रमाण-- 
“नव्यो नव्यो भवति” (सदैव नवीन 
बने रहना) की भावना शिन्तो धर्म (神道) में भी अत्यंत गहराई से प्रकट होती है। शिन्तो में “शुद्धि, नवीनीकरण और हर क्षण नई पवित्रता” (renewal & purity) मुख्य तत्व हैं। नीचे जापानी लिपि में प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. शिन्तो — 大祓詞 (おおはらえのことば)
जापानी (原文)
祓へ給ひ清め給へ
(はらえたまい きよめたまえ / Harae tamae kiyome tamae)
भावार्थ
हे देवता! हमें शुद्ध करो, पवित्र करो।
 यहाँ “शुद्धि” केवल एक बार की नहीं,
 बल्कि बार-बार नवीनीकरण (renewal) की प्रक्रिया है।
2. 伊勢神宮 (いせじんぐう) की परंपरा — 式年遷宮 (しきねんせんぐう)
जापानी
常に新しく、常に清らかに
(つねにあたらしく、つねにきよらかに)
भावार्थ
सदैव नया, सदैव पवित्र।
 伊勢神宮 में हर 20 वर्ष में मंदिर का पुनर्निर्माण होता है—
यह दर्शाता है कि
नवीनता (renewal) ही पवित्रता का आधार है।
3. 神道の教え (शिन्तो की शिक्षा)
जापानी
日々に新たに生きる
(ひびにあらたにいきる / Hibi ni arata ni ikiru)
भावार्थ
हर दिन नए रूप में जीओ।
 यह स्पष्ट रूप से “नव्यो नव्यो भवति” के समान है—
हर दिन, हर क्षण अपने जीवन को नया बनाना।
4. 本居宣長 (Motoori Norinaga)
जापानी
まごころをもって日々新たにする
भावार्थ
सच्चे हृदय (pure heart) के साथ हर दिन स्वयं को नया बनाओ।
 निष्कर्ष
शिन्तो धर्म का मूल संदेश है—
शुद्धि = नवीनीकरण (Purification = Renewal)
प्रकृति की तरह हर क्षण नया बनना
आंतरिक और बाह्य जीवन को ताज़गी में रखना
 यही ऋग्वेद के “नव्यो नव्यो भवति” का जापानी रूप है—
「常に新しく生きる」 (सदैव नवीन होकर जीना)।
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