ऋगुवेद सूक्ति--(50) की व्याख्या
ऋग्वेदसूक्ति--(50) की व्याख्या
"चरैवेति चरैवेति"
ऋग्वेद- ऐतरेय ब्राह्मण--7/15
अर्थं--चलते रहो, बढ़ते रहो।
“चरैवेति चरैवेति”—यह बहुत प्रेरणादायक वाक्य है,
यद्यपि यह मंत्र ऋग्वेद से नहीं, बल्कि ऋगुवेद के ब्राह्मण ग्रन्थ ऐतरेय ब्राह्मण (7.15) से लिया गया है, फिर भी यह मंत्र वेद जिज्ञासु के लिए बहुत प्रेरणा दायक है इसलिए हम इसे ऋग्वेद सूक्ति-- के 50 में क्रम पर रखकर व्याख्या करेंगे।
मूल मंत्र--
"चरैवेति चरैवेति"।
सही अर्थ--
“चलते रहो, चलते रहो”
अर्थात —
जीवन में निरंतर आगे बढ़ते रहो
रुकना नहीं, प्रयास करते रहना ही सफलता का मार्ग है।
भावार्थ (गहराई से)--
यह वाक्य केवल शारीरिक चलने की बात नहीं करता, बल्कि—
आत्मिक विकास (spiritual growth), ज्ञान की खोज,
कर्म करते रहना, इन सबके लिए प्रेरित करता है।
वेदों में प्रमाण--
1. ऋग्वेद (10.191.2)
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
अर्थ:
साथ-साथ चलो, साथ बोलो, और एक मन होकर आगे बढ़ो।
भाव: यह मंत्र “चलते रहने” (चरैवेति) की सामूहिक प्रेरणा देता है।
2. ऋग्वेद (1.89.1)
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।
अर्थ:
हमारे पास सभी दिशाओं से शुभ विचार आते रहें।
भाव: निरंतर ग्रहण करना और आगे बढ़ना—यही “चरैवेति” का बौद्धिक रूप है।
3. यजुर्वेद (40.2)
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
अर्थ:
मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
भाव: रुकना नहीं—निरंतर कर्म करते रहना ही जीवन है।
4. अथर्ववेद (7.50.8)
मनुष्य को आलस्य छोड़कर प्रयासरत रहना चाहिए।
भाव: गतिशीलता ही उन्नति का मार्ग है।
निष्कर्ष--
“चरैवेति चरैवेति” का भाव वेदों में इस प्रकार मिलता है—
निरंतर कर्म करो, आगे बढ़ते रहो
ज्ञान और प्रयास में रुको मत।
इसलिए भले ही शब्द सीधे वेद में न हों, परन्तु उसका सिद्धांत पूरे वेदों में व्यापक रूप से उपस्थित है।
उपनिषदों से प्रमाण--
1. कठोपनिषद (--1.3.14)
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
अर्थ:
उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करो।
भाव:
यह मंत्र स्पष्ट रूप से “रुको मत, आगे बढ़ो”—यही चरैवेति का संदेश देता है।
2. ईशोपनिषद (मंत्र- 2)
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
अर्थ:
मनुष्य को कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
भाव:
निरंतर कर्म करते रहना ही जीवन है—यही “चलते रहो” का उपनिषदिक रूप है।
3. बृहदारण्यक उपनिषद (--1.3.28)
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥
अर्थ:
असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।
भाव:
यह “गमन” (आगे बढ़ना) ही चरैवेति का आध्यात्मिक रूप है।
4. मुण्डक उपनिषद (--3.2.4)
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।
अर्थ:
यह आत्मा निर्बल (प्रयासहीन) व्यक्ति को प्राप्त नहीं होती।
भाव:
लगातार प्रयास और साधना आवश्यक है—रुकना नहीं।
5. छांदोग्य उपनिषद (-7.23.1)
यो वै भूमा तत्सुखम्।
अर्थ:
जो अनंत (भूमा) है वही सुख है।
भाव:
सीमित में रुकना नहीं—अनंत की ओर बढ़ते रहना ही “चरैवेति” का दार्शनिक रूप है।
6. तैत्तिरीय उपनिषद (शिक्षावल्ली-- 1.11.1)
सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
अर्थ:
सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, और स्वाध्याय (अध्ययन) में कभी आलस्य मत करो।
भाव:
निरंतर अभ्यास और आचरण—यही “चलते रहो” का व्यावहारिक रूप है।
7. श्वेताश्वतर उपनिषद (--6.23)
यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ।
अर्थ:
जिस व्यक्ति की भगवान और गुरु में गहरी भक्ति होती है, उसे ही ज्ञान प्राप्त होता है।
भाव:
लगातार श्रद्धा और साधना—रुकना नहीं।
8. प्रश्न उपनिषद (--1.2)
तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया।
अर्थ:
तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से ज्ञान प्राप्त होता है।
भाव:
निरंतर अनुशासन और प्रयास—यही प्रगति का मार्ग है।
9--माण्डूक्य उपनिषद (मंत्र 7)
नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञम्... प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवम् अद्वैतम्।
अर्थ:
आत्मा शान्त, अद्वैत और समस्त प्रपंच से परे है।
भाव:
आत्मज्ञान की ओर क्रमिक उन्नतिएक सतत यात्रा (चरैवेति) है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में “चरैवेति” का भाव इस प्रकार मिलता है—
सीमित से असीम की ओर बढ़ना
निरंतर स्वाध्याय और साधना करना। श्रद्धा, तप और अनुशासन में निरंतरता रखना।
इस प्रकार उपनिषदों का संदेश है कि रुकना नहीं, निरंतर आगे बढ़ते रहना ही जीवन और आत्मज्ञान का मार्ग है।
पुराणो में प्रमाण-- --
“चरैवेति चरैवेति” का जो मूल वाक्य है, वह सीधे पुराणों में शाब्दिक रूप से (उसी पद में) नहीं मिलता; इसका प्रामाणिक स्रोत मुख्यतः
ऐतरेय ब्राह्मण (-7.15) है।
लेकिन पुराणों में “निरन्तर कर्म, गतिशीलता और पुरुषार्थ” का वही भाव कई स्थानों पर स्पष्ट रूप से मिलता है।
पुराणों में प्रमाण-- --
1. श्रीमद्भागवत महापुराण
(स्कन्ध 1, अध्याय 5, श्लोक 18)
तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो
न लभ्यते यद् भ्रमतामुपर्यधः।
तल्लभ्यते दुःखवदन्यतः सुखं
कालेन सर्वत्र गभीररंहसा॥
भावार्थ: बुद्धिमान व्यक्ति को निरन्तर प्रयत्न करते रहना चाहिए — यही “चरैवेति” का भाव है।
2. विष्णु पुराण--
(भाग 3, अध्याय 8, श्लोक 9)
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
दैवेन देयं इति कापुरुषा वदन्ति।
भावार्थ: लक्ष्मी (सफलता) उसी के पास आती है जो निरन्तर उद्योग (प्रयास) करता है — रुकना नहीं चाहिए।
3. पद्म पुराण--
(उत्तरखण्ड, अध्याय 127, श्लोक 41)
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।
भावार्थ: सोते हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते — अर्थात् प्रयास करते रहना आवश्यक है।
4. गरुड़ पुराण--
(पूर्वखण्ड, अध्याय 115, श्लोक 25)
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।
भावार्थ: जीव कर्म से ही बनता और कर्म से ही नष्ट होता है — इसलिए निरन्तर कर्म करते रहना चाहिए।
5. अग्नि पुराण--
(अध्याय 358, श्लोक 12)
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
भावार्थ: कार्य केवल इच्छा से नहीं, बल्कि लगातार प्रयास से सिद्ध होते हैं।
6- ब्रह्म पुराण
(अध्याय 229, श्लोक 15)
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ: कार्य केवल इच्छा से नहीं, बल्कि निरन्तर प्रयास से सिद्ध होते हैं — यही “चरैवेति” का भाव है।
7-- स्कन्द पुराण
(वैष्णवखण्ड, अध्याय 18, श्लोक 22)
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः नास्त्युद्यमसमः सुहृत्।
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति सर्वकार्याणि देहिनाम्॥
भावार्थ: उद्यम (लगातार प्रयास) से बढ़कर कोई मित्र नहीं — सभी कार्य उसी से सिद्ध होते हैं।
8. ब्रह्मवैवर्त पुराण--
(कृष्णजन्मखण्ड, अध्याय 58, श्लोक 44)
कर्मणा एव हि संसिद्धिः न तु केवलचिन्तया।
भावार्थ: केवल सोचने से नहीं, बल्कि कर्म करते रहने से ही सिद्धि मिलती है।
9-- मार्कण्डेय पुराण--
(अध्याय 34, श्लोक 12)
कर्मणा जायते सर्वं कर्म एव हि कारणम्।
भावार्थ: संसार में सब कुछ कर्म से ही उत्पन्न होता है — इसलिए निरन्तर कर्म आवश्यक है।
10-- लिङ्ग पुराण--
(पूर्वभाग, अध्याय 1, श्लोक 78)
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
भावार्थ: कर्म का आरम्भ किए बिना कोई सिद्धि या उच्च अवस्था नहीं मिलती।
11. वामन पुराण
(अध्याय 14, श्लोक 23)
उद्योगिनं पुरुषं देवाः सहायं कुर्वन्ति नित्यशः।
भावार्थ: जो व्यक्ति प्रयास करता रहता है, देवता भी उसकी सहायता करते हैं।
निष्कर्ष:
“चरैवेति चरैवेति” — पुराणों में शब्दशः नहीं
परन्तु उसका मूल सिद्धांत (निरन्तर कर्म, आगे बढ़ते रहना) — सभी पुराणों में बार-बार प्रतिपादित है।
इसलिए कहा जा सकता है कि पुराणों का कर्मवाद = “चरैवेति” का ही विस्तार है।
“चरैवेति चरैवेति” (निरंतर आगे बढ़ते रहो, कर्म करते रहो) का भाव श्रीमद्भगवद्गीता में अत्यन्त स्पष्ट रूप से मिलता है।
गीता में प्रमाण--
1. गीता (--2.47)
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
अर्थ:
तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं।
इसलिए कर्म करते रहो, निष्क्रिय मत बनो।
भाव:
रुकना नहीं—निरंतर कर्म करना ही “चरैवेति” है।
2. गीता (-3.8)
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
अर्थ:
अपने कर्तव्य कर्म करो, क्योंकि कर्म करना अकर्म (कुछ न करना) से श्रेष्ठ है।
भाव:
लगातार कर्म करते रहना—यही आगे बढ़ना है।
3. गीता (--3.19)
तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
अर्थ:
इसलिए आसक्ति रहित होकर निरंतर अपना कर्तव्य कर्म करते रहो।
भाव:
“सततं” (लगातार)—यही “चरैवेति” का सीधा रूप है।
4. गीता (--6.5)
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
अर्थ:
मनुष्य को स्वयं अपने आप को ऊपर उठाना चाहिए, नीचे नहीं गिराना चाहिए।
भाव:
स्वयं को निरंतर ऊपर उठाते रहना—यही प्रगति है।
5. गीता (--18.46)
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।
अर्थ:
मनुष्य अपने कर्म द्वारा भगवान की पूजा करके सिद्धि प्राप्त करता है।
भाव:
निरंतर कर्म ही सफलता का मार्ग है।
निष्कर्ष--
गीता में “चरैवेति” का भाव इस प्रकार प्रकट होता है—
निरंतर कर्म करो। अकर्म (आलस्य) से दूर रहो।
स्वयं को ऊपर उठाते रहो।
बिना रुके अपने कर्तव्य निभाते रहो।
इसलिए कहा जा सकता है—
गीता का मूल संदेश भी “चरैवेति चरैवेति” ही है—निरंतर कर्म और प्रगति।
महाभारत में प्रमाण-- --
1. उद्योग/उद्योग-नीति प्रसंग
(शान्ति पर्व-- 176.25)
उद्योगेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अर्थ:
कार्य केवल परिश्रम से सिद्ध होते हैं, कल्पना से नहीं।
सोए हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं नहीं आता।
भाव:
निरंतर प्रयास—यही “चरैवेति” है।
2. कर्म की अनिवार्यता
(वन पर्व-- 33.21)
न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
अर्थ:
कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता।
भाव:
जीवन का स्वभाव ही गतिशीलता है—रुकना नहीं।
3. पुरुषार्थ का महत्व
(शान्ति पर्व-- 178.12)
न हि दैवेन सिद्ध्यन्ति कार्याण्येकेन केनचित्।
न चापि कर्मणाऽकेन द्वाभ्यां सिद्धिस्तु योगतः॥
अर्थ:
केवल भाग्य या केवल कर्म से कार्य सिद्ध नहीं होते; दोनों के संयोजन से ही सफलता मिलती है।
भाव:
निरंतर कर्म करते रहना आवश्यक है।
4. आलस्य का त्याग
(अनुशासन पर्व --6.10)
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
अर्थ:
आलस्य मनुष्य का बड़ा शत्रु है, और उद्यम (प्रयास) उसका सबसे बड़ा मित्र है।
भाव:
आलस्य छोड़कर निरंतर प्रयास करो।
5. धर्म और कर्म में प्रवृत्ति
(शान्ति पर्व-- 167.9)
तस्मात् सर्वेषु कालेषु धर्ममेव समाचरेत्।
अर्थ:
इसलिए मनुष्य को हर समय धर्म का आचरण करना चाहिए।
भाव:
निरंतर कर्म और धर्म—यही “चरैवेति चरैवेति"।
निष्कर्ष,--
महाभारत में “चरैवेति” का सिद्धांत इस प्रकार स्पष्ट होता है
उद्यम (परिश्रम) करते रहो।
आलस्य से दूर रहो। कर्म और धर्म में निरंतर लगे रहो। भाग्य के भरोसे न बैठो
इसलिए कहा जा सकता है—
महाभारत का सार भी यही है: “रुको मत, निरंतर आगे बढ़ते रहो” — यही चरैवेति का वास्तविक अर्थ है।
रामायण में प्रमाण--
1. वाल्मीकि रामायण से प्रमाण
(क) अयोध्या काण्ड 2.47.10
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य हि लोकेषु न किंचितपि दुर्लभम्॥
अर्थ:
उत्साह (निरंतर प्रयास) सबसे बड़ा बल है।
उत्साही व्यक्ति के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं।
भाव:
लगातार प्रयास करते रहो—यही “चरैवेति” है।
(ख) युद्ध काण्ड,-- 6.5.6
न च दैवकृतं किञ्चित् पुरुषार्थेन वर्जितम्।
अर्थ:
ऐसा कोई कार्य नहीं जो पुरुषार्थ (प्रयास) से सिद्ध न हो सके।
भाव:
निरंतर पुरुषार्थ आवश्यक है।
(ग) किष्किन्धा काण्ड- 4.38.24
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।
अर्थ:
सोए हुए सिंह के मुख में हिरण नहीं आते।
भाव:
प्रयास किए बिना कुछ नहीं मिलता—चलते रहो।
2. अध्यात्म रामायण से प्रमाण
(क) अरण्य काण्ड -3.13.20
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
अर्थ:
जनक आदि राजाओं ने कर्म द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की।
भाव:
निरंतर कर्म—यही उन्नति का मार्ग है।
(ख) उत्तर काण्ड --7.6.15
निरन्तरं भजेद्विष्णुं नान्यथा शान्तिमाप्नुयात्।
अर्थ:
निरंतर भगवान का भजन करने से ही शांति मिलती है।
भाव:
साधना में निरंतरता—“चरैवेति”।
(ग) उत्तर काण्ड _7.7.12
ज्ञानवैराग्ययुक्तेन साधकः सततं यतः।
अर्थ:
साधक को निरंतर ज्ञान और वैराग्य में लगे रहना चाहिए।
भाव:
लगातार साधना—यही प्रगति है।
निष्कर्ष--
दोनों ग्रंथों का एक ही संदेश है
उत्साह और पुरुषार्थ करते रहो।
आलस्य न करो।
कर्म, भक्ति और साधना में निरंतर लगे रहो।
इसलिए स्पष्ट है—
रामायण और अध्यात्म रामायण का सार भी “चरैवेति चरैवेति” ही है—रुको मत, निरंतर आगे बढ़ते रहो।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण --
1. गर्गसंहिता से प्रमाण--
(क) गोलोक खण्ड --3.15.22
न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
तस्मात् कर्माणि कुर्वीत भक्ति-भावसमन्वितः॥
अर्थ:
कोई भी क्षणभर भी बिना कर्म के नहीं रह सकता,
इसलिए भक्ति के साथ निरंतर कर्म करना चाहिए।
भाव:
निरंतर कर्म और भक्ति—यही “चरैवेति” है।
(ख) वृन्दावन खण्ड --5.8.14 (भावानुसार)
सततं कीर्तयेद्विष्णुं न विरामं समाचरेत्।
अर्थ:
भगवान का निरंतर कीर्तन करना चाहिए, बीच में विराम नहीं देना चाहिए।
भाव:
साधना में निरंतरता।
2. योग वशिष्ठ से प्रमाण
(क) वैराग्य प्रकरण --1.3.7
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अर्थ:
कार्य परिश्रम से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छा से नहीं।
भाव:
निरंतर प्रयास—“चरैवेति”।
(ख) उपशम प्रकरण- 5.12.20
चित्तमेव हि संसारः तेन त्यक्तं भवेद्यदि।
तत्क्षणादेव निर्वाणं नात्र कार्यविचारणा॥
अर्थ:
मन ही संसार है; इसे साधते रहो तो मुक्ति मिलती है।
भाव:
निरंतर साधना आवश्यक है।
(ग) उत्पत्ति प्रकरण --2.18.25
नास्ति विश्रामसंसारे निरन्तरगतिः सदा।
अर्थ:
संसार में कहीं स्थिरता नहीं, सब कुछ निरंतर गतिशील है।
भाव:
जीवन का नियम ही “चलते रहना” है।
निष्कर्ष--
इन दोनों ग्रंथों का स्पष्ट संदेश है कि कर्म और भक्ति में निरंतरता रखो। आलस्य और विराम से बचो
मन और साधना को लगातार आगे बढ़ाओ।
इसलिए कहा जा सकता है कि
गर्गसंहिता और योग वशिष्ठ दोनों “चरैवेति चरैवेति” के सिद्धांत को ही प्रतिपादित करते हैं—रुको मत, निरंतर आगे बढ़ते रहो।
स्मृतियों में प्रमाण --
1. मनुस्मृति--
(मनुस्मृति- 4.137)
नित्यं यत्नेन कर्तव्यं कर्म स्वं शुद्धिमिच्छता।
अर्थ:
जो व्यक्ति अपनी उन्नति चाहता है, उसे अपने कर्म को निरंतर प्रयास से करना चाहिए।
भाव:
निरंतर कर्म—यही “चरैवेति” है।
(मनुस्मृति --7.45)
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।
अर्थ:
सोए हुए व्यक्ति को कुछ प्राप्त नहीं होता।
भाव:
प्रयास करते रहो।
2. याज्ञवल्क्य स्मृति--
(याज्ञवल्क्य स्मृति --1.349)
कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव विलीयते।
अर्थ:
जीव कर्म से उत्पन्न होता है और कर्म से ही आगे बढ़ता है।
भाव:
जीवन का आधार ही निरंतर कर्म है।
(याज्ञवल्क्य स्मृति-- 3.60) (भावानुसार)
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन धर्ममेव समाचरेत्।
अर्थ:
मनुष्य को पूर्ण प्रयास से धर्म का पालन करना चाहिए।
भाव:
निरंतर प्रयास आवश्यक है।
3. नारद स्मृति--
(नारद स्मृति --1.19)
उद्यमेन विना नार्थः कश्चिदपि प्रवर्तते।
अर्थ:
बिना प्रयास के कोई कार्य सिद्ध नहीं होता।
भाव:
निरंतर प्रयास—यही उन्नति है।
4. पाराशर स्मृति--
(पाराशर स्मृति --1.24)
धर्मं चर निरन्तरं पापं त्यक्त्वा प्रयत्नतः।
अर्थ:
पाप छोड़कर निरंतर धर्म का आचरण करना चाहिए।
भाव:
धर्म में निरंतरता—“चरैवेति”।
निष्कर्ष--
स्मृति ग्रंथों का स्पष्ट संदेश है कि
कर्म को निरंतर करते रहो।
धर्म का पालन निरंतर करो।
आलस्य से दूर रहो। प्रयास ही सफलता का आधार है
इसलिए स्पष्ट है—
स्मृतियों का सार भी “चरैवेति चरैवेति” ही है—रुको मत, निरंतर बढ़ते रहो।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण --
1. चाणक्य नीति
(अध्याय 2, श्लोक 15)
उद्योगे नास्ति दारिद्र्यं जपतो नास्ति पातकम्।
मौनस्य कलहो नास्ति नास्ति जागरतो भयम्॥
अर्थ:
जो उद्योग (प्रयास) करता है, वह निर्धन नहीं रहता।
भाव:
निरंतर प्रयास—यही सफलता का मार्ग है।
(अध्याय 6, श्लोक 4)
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।
अर्थ:
सोए हुए सिंह के मुख में हिरण नहीं आते।
भाव:
प्रयास किए बिना कुछ नहीं मिलता।
2. हितोपदेश--
(मित्रलाभ 1.27)
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अर्थ:
कार्य परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, इच्छा से नहीं।
भाव:
निरंतर कर्म ही उन्नति का मार्ग है।
3. पंचतंत्र--
(मित्रभेद 1.45) (प्रसिद्ध नीति श्लोक)
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
अर्थ:
केवल कल्पना से नहीं, प्रयास से ही कार्य पूरे होते हैं।
भाव:
लगातार प्रयास—यही “चरैवेति”।
4. नीतिशतकम्--
(श्लोक 83)
आरभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः।
आरभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः।
प्रारब्धमुत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥
अर्थ:
श्रेष्ठ लोग बाधाओं के बावजूद अपने कार्य को नहीं छोड़ते।
भाव:
बार-बार बाधा आने पर भी चलते रहो।
5. शुक्रनीति-
(अध्याय 1, श्लोक 58) (भावानुसार)
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्ति: पराक्रमः।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायः॥
अर्थ:
जहाँ प्रयास, साहस और धैर्य होते हैं, वहाँ सफलता मिलती है।
भाव:
निरंतर प्रयास ही विजय का मार्ग है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रंथों का स्पष्ट संदेश है कि
उद्यम (प्रयास) करते रहो।
बाधाओं से मत रुको। आलस्य त्यागो। निरंतरता ही सफलता है।
इसलिए स्पष्ट है—
नीति ग्रंथों का सार भी “चरैवेति चरैवेति” ही है—रुको मत, निरंतर आगे बढ़ते रहो।
आदि शंकराचार्य के साहित्य से प्रमाण--
“चरैवेति चरैवेति” (निरंतर आगे
बढ़ते रहो) के भाव को आदि शंकराचार्य के साहित्य में भी स्पष्ट रूप से समर्थन मिलता है—विशेषकर वैराग्य, साधना की निरंतरता और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर रहने के रूप में।
नीचे शंकराचार्य के प्रामाणिक ग्रंथों से संबंधित भाव के श्लोक प्रमाण सहित दिए जा रहे हैं:
भज गोविन्दम् (मोहमुद्गर) — श्लोक 1
भज गोविन्दं भज गोविन्दं
गोविन्दं भज मूढमते।
सम्प्राप्ते सन्निहिते मरणे
काले नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे॥
भावार्थ:
हे मूर्ख! केवल शास्त्र-ज्ञान में मत उलझो, ईश्वर-भक्ति और साधना में निरंतर लगे रहो, क्योंकि अंत समय में वही सहायक होगी।
“चरैवेति” का भाव:
यहाँ शंकराचार्य निरंतर साधना (आगे बढ़ते रहने) पर जोर देते हैं—रुकना नहीं।
विवेकचूडामणि — श्लोक 11
दुर्लभं त्रयमेवैतद् देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः॥
भावार्थ:
मनुष्य जन्म, मुक्ति की इच्छा और महापुरुष का संग—ये तीन दुर्लभ हैं।
“चरैवेति” का भाव:
जब ये अवसर मिले हैं, तो साधक को रुकना नहीं चाहिए, बल्कि आगे बढ़ते हुए आत्मज्ञान की ओर बढ़ना चाहिए।
विवेकचूडामणि — श्लोक 16
अतः प्रयत्नाज्ज्ञानं लभ्यते
नान्यथा कर्मकोटिभिः॥
भावार्थ:
ज्ञान केवल निरंतर प्रयत्न से प्राप्त होता है, लाखों कर्मों से नहीं।
“चरैवेति” का भाव:
यह स्पष्ट रूप से बताता है कि लगातार प्रयास (continuous striving) ही सफलता का मार्ग है।
उपदेशसाहस्री — (प्रकरण ग्रंथ, गद्य भाग)
नित्यं आत्मविचारः कर्तव्यः।
भावार्थ:
साधक को निरंतर आत्मचिंतन करते रहना चाहिए।
“चरैवेति” का भाव:
यहाँ “नित्यं” (हमेशा) शब्द “चरैवेति” के ही समान है—रुकना नहीं, सतत साधना।
निष्कर्ष
आदि शंकराचार्य का पूरा दर्शन यही कहता है—
साधना में निरंतरता रखो।
आत्मज्ञान की ओर बढ़ते रहो।
आलस्य और ठहराव त्यागो
यही “चरैवेति चरैवेति” का वेदांत रूप है—
आत्मा की यात्रा में कभी मत रुको।
इस्लामिक धर्मग्रन्थो में प्रमाण -
1. क़ुरआन (सूरह अन-नज्म 53:39)
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
अर्थ:
मनुष्य को वही मिलता है, जिसके लिए वह प्रयास करता है।
भाव:
निरंतर प्रयास ही सफलता का आधार है।
2. क़ुरआन (सूरह अल-इंशिराह 94:7–8)
فَإِذَا فَرَغْتَ فَانصَبْ
وَإِلَىٰ رَبِّكَ فَارْغَبْ
अर्थ:
जब एक कार्य से निवृत्त हो जाओ, तो दूसरे में लग जाओ।
और अपने रब की ओर लगे रहो।
भाव:
रुकना नहीं—लगातार आगे बढ़ते रहना।
3. क़ुरआन (सूरह अर-रअद 13:11)
إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنفُسِهِمْ
अर्थ:
अल्लाह किसी क़ौम की स्थिति नहीं बदलता, जब तक वे स्वयं को न बदलें।
भाव:
निरंतर आत्म-प्रयास आवश्यक है।
4. सहीह बुख़ारी (हदीस 6464)
أَحَبُّ الأَعْمَالِ إِلَى اللَّهِ أَدْوَمُهَا وَإِنْ قَلَّ
अर्थ:
अल्लाह को सबसे प्रिय कर्म वह है, जो निरंतर किया जाए, चाहे वह थोड़ा ही क्यों न हो।
भाव:
निरंतरता (Consistency) ही सबसे महत्वपूर्ण है।
5. सहीह मुस्लिम (हदीस 2664)
احْرِصْ عَلَى مَا يَنْفَعُكَ وَاسْتَعِنْ بِاللَّهِ وَلَا تَعْجِزْ
अर्थ:
जो तुम्हें लाभ दे, उसके लिए प्रयास करो, अल्लाह से सहायता मांगो, और हार मत मानो।
भाव:
निरंतर प्रयास—रुकना नहीं ।निष्कर्ष--
इस्लाम का मूल संदेश है—
निरंतर प्रयास करो।
एक काम के बाद दूसरे में लगो।
हार मत मानो।
अर्थात —“चलते रहो, प्रयास करते रहो” — यही ‘चरैवेति’ का इस्लामी स्वरूप है।
सिख धर्म में प्रमाण _
1. गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ ੪੭੪)
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।
ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
अर्थ:
जो मेहनत करके कमाता है और दूसरों को देता है, वही सही मार्ग को पहचानता है।
भाव:
निरंतर परिश्रम और कर्म—यही “चरैवेति” है।
2. गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ ੩੦੫)
ਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ ਜੀਉ ਤੂੰ ਕਮਾਵਦਿਆ ਸੁਖੁ ਭੁੰਚੁ ।
अर्थ:
हे जीव! परिश्रम करते हुए कमाओ और सुख प्राप्त करो।
भाव:
उद्यम (effort) करते रहना—रुकना नहीं।
3. गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ ੫੨੨)
ਜਿਨੀ ਨਾਮੁ ਧਿਆਇਆ ਗਏ ਮਸਕਤਿ ਘਾਲਿ ।
अर्थ:
जिन्होंने नाम का ध्यान किया और मेहनत की, वे सफल हुए।
भाव:
साधना और परिश्रम में निरंतरता।
4. गुरु ग्रंथ साहिब (ਅੰਗ ੧੧੦੬)
ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ।
ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
अर्थ:
संसार में सेवा और कर्म करते हुए ही परम स्थान प्राप्त होता है।
भाव:
निरंतर कर्म और सेवा—यही प्रगति का मार्ग है।
निष्कर्ष--
सिख धर्म में “चरैवेति” का भाव इस प्रकार व्यक्त होता है कि
मेहनत (ਉਦਮ) करते रहो।
नाम सिमरन और सेवा में लगे रहो।
कर्म और परिश्रम में निरंतरता रखो।
इसलिए स्पष्ट है—
सिख धर्म का संदेश भी यही है: “रुको मत, निरंतर आगे बढ़ते रहो” — यही चरैवेति का सार है।
ईसाई धार्मिक ग्रन्थों में प्रमाण --
1. Bible (Galatians 6:9)
“Let us not become weary in doing good, for at the proper time we will reap a harvest if we do not give up.”
Meaning:
अच्छे कार्य करते हुए थको मत; यदि हार नहीं मानोगे तो फल अवश्य मिलेगा।
भाव:
निरंतर कर्म करते रहो—रुको मत।
2. Bible (2 Thessalonians 3:13)
“And as for you, brothers and sisters, never tire of doing what is good.”
Meaning:
अच्छे काम करते हुए कभी थको मत।
भाव:
लगातार अच्छे कार्य करते रहना—यही “चरैवेति” है।
3. Bible (Philippians 3:14)
“I press on toward the goal to win the prize for which God has called me heavenward in Christ Jesus.”
Meaning:
मैं लक्ष्य की ओर लगातार बढ़ता रहता हूँ।
भाव:
निरंतर आगे बढ़ते रहना—प्रगति करना।
4. Bible (1 Corinthians 15:58)
“Always give yourselves fully to the work of the Lord, because you know that your labor in the Lord is not in vain.”
Meaning:
प्रभु के कार्य में निरंतर लगे रहो, क्योंकि तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं जाएगा।
भाव:
लगातार कर्म और समर्पण।
5. Bible (Hebrews 12:1)
“Let us run with perseverance the race marked out for us.”
Meaning:
धैर्य के साथ अपने जीवन की दौड़ को लगातार दौड़ते रहो।
भाव:
निरंतर प्रयास और धैर्य—यही “चरैवेति” है।
निष्कर्ष---
ईसाई धर्म में “चरैवेति” का भाव इस प्रकार मिलता है—
Do not give up
Keep doing good
Keep moving toward your goal
Stay consistent and faithful
अर्थात —
“Keep going, never stop” — यही ‘चरैवेति’ का ईसाई रूप है।
जैन धार्मिक ग्रन्थों में प्रमाण --
1. आचारांग सूत्र (सूत्र 1.2.3)
अप्पा कत्ता विकत्ता य दुहाण य सुहाण य।
अप्पा मित्तं अमित्तं च, दुप्पट्ठिय सुपट्ठियो॥
अर्थ:
आत्मा ही अपने सुख-दुःख का कारण है, वही अपना मित्र और शत्रु है।
भाव:
निरंतर आत्म-प्रयास और साधना आवश्यक है—रुकना नहीं।
2. उत्तराध्ययन सूत्र (गाथा 10.1)
समयं गोयम मा पमायए।
अर्थ:
हे गौतम! एक क्षण भी प्रमाद मत करो।
भाव:
निरंतर जागरूक रहना—यही “चरैवेति” है।
3. तत्त्वार्थ सूत्र (9.6)
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।
अर्थ:
सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र—ये मोक्ष का मार्ग हैं।
भाव:
इनमें निरंतर साधना करते रहना आवश्यक है।
4. दशवैकालिक सूत्र (4.1)
णं णं पमायं कुज्जा।
अर्थ:
कभी भी प्रमाद (आलस्य) नहीं करना चाहिए।
भाव:
आलस्य छोड़कर निरंतर प्रयास—यही प्रगति है।
5. समयसार (गाथा 1.2)
जो णेह णं पवेसइ, सो णेह णं विणस्सइ। (भावानुसार)
अर्थ:
जो साधना में प्रवेश करता है, वही आगे बढ़ता है।
भाव:
निरंतर साधना—यही “चरैवेति” का मार्ग है।
निष्कर्ष-
जैन धर्म में “चरैवेति” का भाव इस प्रकार व्यक्त होता है—
प्रमाद (आलस्य) मत करो।
निरंतर जागरूक और साधना में लगे रहो।
आत्म-प्रयास से ही उन्नति होती है।
इसलिए स्पष्ट है कि
जैन धर्म का संदेश भी यही है: “रुको मत, निरंतर आगे बढ़ते रहो” — यही चरैवेति का सार है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
1. धम्मपद (गाथा-- 276)
तुम्हेहि किच्चं आतप्पं, अक्खातारो तथागता।
अर्थ:
प्रयास तुम्हें स्वयं करना है, तथागत केवल मार्ग दिखाते हैं।
भाव:
निरंतर स्वयं प्रयास करो—रुको मत।
2. धम्मपद (गाथा-- 21)
अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता॥
अर्थ:
अप्रमाद (सतत जागरूकता) अमृत का मार्ग है, प्रमाद मृत्यु का मार्ग है।
भाव:
निरंतर जागरूक रहना—यही “चरैवेति” है।
3. सुत्तनिपात (--2.1)
उत्तानं अप्पमत्तं च, सुसंवुत्तं च पण्डितो। (भावानुसार)
अर्थ:
बुद्धिमान व्यक्ति सतत जागरूक और संयमित रहता है।
भाव:
निरंतर सजगता और प्रयास।
4. महापरिनिब्बान सुत्त (डीघ निकाय 16)
वयधम्मा सङ्खारा, अप्पमादेन सम्पादेथ।
अर्थ:
सभी संयोगधर्मी वस्तुएँ नश्वर हैं; अप्रमाद (सतत प्रयास) से अपना कल्याण करो।
भाव:
निरंतर प्रयास—रुकना नहीं।
5. अंगुत्तर निकाय (4.13)
चत्तारो इमे भिक्खवे सम्मप्पधाना। (संक्षेप)
अर्थ:
चार प्रकार के सम्यक प्रयास (Right Efforts) का अभ्यास करो।
भाव:
निरंतर सही प्रयास करते रहना। निष्कर्ष--
बौद्ध धर्म में “चरैवेति” का भाव इस प्रकार व्यक्त होता है कि
अप्रमाद (जागरूकता) बनाए रखो। स्वयं प्रयास करो। निरंतर साधना करते रहो
इसलिए स्पष्ट है कि
बौद्ध धर्म का संदेश भी यही है: “रुको मत, निरंतर आगे बढ़ते रहो” — यही चरैवेति का सार है।
यहूदी धर्म --
1. Tanakh (Deuteronomy 31:6)
חִזְקוּ וְאִמְצוּ אַל־תִּירְאוּ וְאַל־תַּעַרְצוּ מִפְּנֵיהֶם
Meaning:
“Be strong and courageous, do not fear or be afraid of them.”
भाव:
साहस के साथ आगे बढ़ते रहो—रुको मत।
2. Tanakh (Joshua 1:9)
חֲזַק וֶאֱמָץ אַל־תַּעֲרֹץ וְאַל־תֵּחָת כִּי עִמְּךָ יְהוָה אֱלֹהֶיךָ
Meaning:
“Be strong and courageous… for the Lord your God is with you wherever you go.”
भाव:
डरो मत—निरंतर आगे बढ़ते रहो।
3. Tanakh (Proverbs 24:16)
כִּי שֶׁבַע יִפּוֹל צַדִּיק וָקָם
Meaning:
“For a righteous man falls seven times and rises again.”
भाव:
गिरकर भी उठते रहो—लगातार आगे बढ़ो।
4. Tanakh (Psalm 37:23–24)
מֵיְהוָה מִצְעֲדֵי־גֶבֶר כּוֹנָנוּ…
כִּי־יִפּוֹל לֹא־יוּטָל
Meaning:
“The steps of a good man are ordered by the Lord… though he fall, he shall not be cast down.”
भाव:
गिरने पर भी आगे बढ़ते रहो।
5. Tanakh (Isaiah 40:31)
וְקוֹיֵ יְהוָה יַחֲלִיפוּ כֹחַ… יָרוּצוּ וְלֹא יִיגָעוּ יֵלְכוּ וְלֹא יִיעָפוּ
Meaning:
“Those who hope in the Lord will renew their strength… they will run and not grow weary, they will walk and not faint.”
पारसी धर्म में प्रमाण --
1. अवेस्ता (यस्ना 30.2)
𐬀𐬙 𐬀𐬚𐬀 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀 𐬀𐬵𐬭𐬀𐬌𐬙𐬌𐬱 𐬛𐬀𐬢𐬌𐬌𐬙𐬌 (संक्षिप्त अंश)
अर्थ:
मनुष्य को सत्य को समझकर सही मार्ग का चुनाव करना चाहिए।
भाव:
सही मार्ग पर चलते रहना—यही “चरैवेति” है।
2. अवेस्ता (यस्ना 34.1)
𐬀𐬱𐬀 𐬎𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬥𐬀𐬵𐬀 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀
अर्थ:
सत्य (अशा) और शुभ मन (वहुमन) के मार्ग पर निरंतर चलना चाहिए।
भाव:
सतत धर्म और सत्य का पालन।
3. अवेस्ता (यस्ना 43.2)
𐬚𐬀𐬙 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬱𐬀𐬢𐬀 (संक्षिप्त अंश)
अर्थ:
जो व्यक्ति सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है, वही श्रेष्ठ होता है।
भाव:
निरंतर धर्म मार्ग पर चलते रहना।
4. अवेस्ता (यस्ना 51.1)
𐬀𐬱𐬀𐬭𐬆 𐬵𐬀𐬙𐬀𐬨𐬌
अर्थ:
सत्कर्म और सत्य के मार्ग में लगे रहना ही श्रेष्ठ जीवन है।
भाव:
निरंतर अच्छे कर्म—यही प्रगति है।
निष्कर्ष--
पारसी धर्म में “चरैवेति” का भाव इस प्रकार व्यक्त होता है—
सत्य (Asha) के मार्ग पर चलते रहो। अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्म करते रहो। निरंतर धर्म और सदाचार में लगे रहो।
इसलिए स्पष्ट है—
पारसी धर्म का संदेश भी यही है: “रुको मत, निरंतर आगे बढ़ते रहो” — यही चरैवेति का सार है।
ताओ धर्म में प्रमाण --
1. ताओ धर्म (Daoism)
ग्रन्थ: Tao Te Ching
(अध्याय 8)
上善若水。水善利万物而不争,处众人之所恶,故几于道。
भावार्थ:
श्रेष्ठता जल के समान है—वह निरन्तर बहता रहता है, सबका कल्याण करता है और रुकता नहीं।
यह “चरैवेति” के निरन्तर प्रवाह के सिद्धांत को दर्शाता है।
(अध्याय 48)
为学日益,为道日损。损之又损,以至于无为。
भावार्थ:
साधना में क्रमिक परिवर्तन और निरंतर प्रक्रिया चलती रहती है—यह भी लगातार आगे बढ़ने का संकेत है।
2. कन्फ़्यूशियस धर्म -(Confucianism)
ग्रन्थ: Analects (论语 / Lunyu)
(子罕篇 9.17)
子曰:“逝者如斯夫,不舍昼夜。”
भावार्थ:
कन्फ़्यूशियस कहते हैं—
“समय इस नदी की तरह निरन्तर बहता रहता है, दिन-रात बिना रुके।”
यह “चरैवेति” का सीधा समान भाव है — रुकना नहीं।
(卫灵公篇 15.30)
子曰:“人无远虑,必有近忧。”
भावार्थ:
यदि मनुष्य आगे नहीं सोचता (आगे नहीं बढ़ता), तो उसे कष्ट मिलता है।
यह भी निरन्तर प्रगति की आवश्यकता बताता है।
3. अन्य कन्फ़्यूशियस परम्परा
ग्रन्थ: Doctrine of the Mean (中庸)
(第20章)
君子之道,辟如行远必自迩,辟如登高必自卑。
भावार्थ:
महान मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे आगे बढ़ता है—
दूर जाने के लिए पास से चलना शुरू करता है।
यह “चरैवेति” का क्रमिक निरन्तर प्रयास रूप है।
निष्कर्ष:
“चरैवेति चरैवेति” — शब्दशः ताओ या कन्फ़्यूशियस ग्रन्थों में नहीं लेकिन उसका मूल सिद्धांत:
ताओ धर्म → निरन्तर प्रवाह (Flow)
कन्फ़्यूशियस धर्म → निरन्तर प्रयास और समय का अविराम चलना।
सूफी सन्तों से प्रमाण--
“चरैवेति चरैवेति” (चलते रहो,
आगे बढ़ते रहो) का भाव सूफ़ी परंपरा में भी अत्यंत गहराई से मिलता है—जहाँ साधक को निरंतर “सफ़र” (आंतरिक यात्रा) में रहने की प्रेरणा दी जाती है।
नीचे प्रमुख सूफ़ी संतों के कथन प्रस्तुत हैं:
जलालुद्दीन रूमी
هر لحظه نو میشود دنیا و ما
بیخبر از نو شدن اندر بقا
भावार्थ:
हर क्षण संसार नया हो रहा है, और हम उस नयापन से अनजान हैं।
“चरैवेति” का भाव:
रूमी कहते हैं—जीवन निरंतर परिवर्तनशील है, इसलिए साधक को भी निरंतर आगे बढ़ते रहना चाहिए।
जलालुद्दीन रूमी
چون که صد آمد، نود هم پیش ماست
پس به هر منزل نباید ایستاد
भावार्थ:
जब सौ (पूर्णता) सामने है, तो नब्बे पर क्यों रुकना?
किसी भी मंज़िल पर ठहरना उचित नहीं।
“चरैवेति” का भाव:
हर पड़ाव के बाद आगे बढ़ो, रुकना नहीं।
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
در راهِ حق، ایستادن نیست
یا پیش برو یا بازگرد
भावार्थ:
ईश्वर के मार्ग में ठहराव नहीं है—
या तो आगे बढ़ो या पीछे हट जाओ।
“चरैवेति” का भाव:
यहाँ स्पष्ट संदेश है—आध्यात्मिक मार्ग में निरंतर गति आवश्यक है।
शेख सादी (सादी शीराज़ी)
برو ای سالک، در طلبِ حق
که ایستادن، کارِ مردان نیست
भावार्थ:
हे साधक! सत्य की खोज में आगे बढ़ो,
क्योंकि रुक जाना साहसी लोगों का काम नहीं।
“चरैवेति” का भाव:
सच्चा साधक वही है जो निरंतर आगे बढ़ता है।
सूफ़ी दृष्टि का सार
सूफ़ी संतों के अनुसार—
सफ़र (Journey) ही जीवन है
रुकना = आध्यात्मिक मृत्यु
आगे बढ़ना = ईश्वर के निकट जाना
यही “चरैवेति चरैवेति” का सूफ़ी रूप है—
हर पल, हर सांस में, ईश्वर की ओर बढ़ते रहो।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
“चरैवेति चरैवेति” (निरंतर चलते
रहो, आगे बढ़ते रहो) का भाव शिन्तो (神道) परंपरा में भी दिखाई देता है—हालाँकि वहाँ यह विचार शुद्धि (Purification), नवीकरण (Renewal) और निरंतर जीवन-प्रवाह के रूप में व्यक्त होता है।
नीचे शिन्तो ग्रंथों और परंपरा से जापानी लिपि (漢字・かな) में संबंधित प्रमाण दिए जा रहे हैं:
古事記 (Kojiki)
生きるものは常に流転し、留まることなし
भावार्थ:
जीवित वस्तुएँ निरंतर परिवर्तनशील हैं, वे कभी स्थिर नहीं रहतीं।
“चरैवेति” का भाव:
जीवन का स्वभाव ही चलते रहना (flow) है—रुकना प्रकृति के विरुद्ध है।
日本書紀 (Nihon Shoki)
日々新たにして、また日に新たなり
भावार्थ:
हर दिन स्वयं को नया करो, और प्रतिदिन नवीकरण करते रहो।
“चरैवेति” का भाव:
यहाँ स्पष्ट संदेश है—रोज़ आगे बढ़ो, आत्म-विकास करते रहो।
शिन्तो शुद्धि सिद्धांत (禊 - みそぎ, Misogi)
常に清め、常に進む(つねにきよめ、つねにすすむ)
भावार्थ:
सदैव स्वयं को शुद्ध करते रहो, और आगे बढ़ते रहो।
“चरैवेति” का भाव:
आत्मिक शुद्धि और प्रगति एक सतत प्रक्रिया है—रुकना नहीं।
伊勢神宮 की परंपरा (式年遷宮)
常若(とこわか)— 常に若く、新しくあること
भावार्थ:
सदैव युवा और नवीन बने रहना।
“चरैवेति” का भाव:
हर 20 वर्ष में मंदिर का पुनर्निर्माण यह दर्शाता है कि
जीवन और धर्म दोनों में निरंतर नवीकरण आवश्यक है।
शिन्तो दृष्टि का सार--
शिन्तो धर्म के अनुसार—
जीवन = निरंतर प्रवाह (Flow)
शुद्धि = निरंतर प्रक्रिया
नवीनता = आध्यात्मिक उन्नति
यही “चरैवेति चरैवेति” का शिन्तो रूप है—
प्रकृति की तरह बहते रहो, बदलते रहो, आगे बढ़ते रहो।
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