ऋगुवेद सूक्ति--(४५) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति--(45)की व्याख्या 
उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त
उत्तरे।
ऋग्वेद- 1/115/1
भाव--अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो।
यहाँ जो मन्त्र उद्धृत किया है, वह वास्तव में अत्यन्त प्रेरणादायक है। पूरा मन्त्र इस प्रकार है—
“उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरे।
सूर्यं देवमवोचामि यथा नः शुभं करोत्॥”
(ऋग्वेद 1.115.1)
 शाब्दिक अर्थ:
उद्वयम् = ऊपर उठते हुए
तमसः परि = अन्धकार से परे
ज्योतिः पश्यन्तः = प्रकाश को देखते हुए
उत्तरे = उच्च (श्रेष्ठ) अवस्था की ओर
भावार्थ:
मनुष्य को अज्ञान, मोह और नकारात्मकता (अन्धकार) से ऊपर उठकर ज्ञान, सत्य और चेतना (प्रकाश) की ओर बढ़ना चाहिए। सूर्य यहाँ केवल भौतिक प्रकाश नहीं, बल्कि ज्ञान, चेतना और दिव्य प्रेरणा का प्रतीक है।
 गूढ़ संदेश:
यह मन्त्र केवल सूर्य की स्तुति नहीं है, बल्कि एक आध्यात्मिक मार्गदर्शन है—
अज्ञान → ज्ञान की ओर
निराशा → आशा की ओर
अधर्म → धर्म की ओर
अर्थात् जीवन का लक्ष्य निरन्तर उन्नति और प्रकाश की ओर अग्रसर होना है।
वेदों में प्रमाण-- 
1. ऋग्वेद
“तमसो मा ज्योतिर्गमय”
(यह मन्त्र बृहदारण्यक उपनिषद् 1.3.28 में प्रसिद्ध है, पर इसका भाव वैदिक परम्परा में व्यापक है)
 भावार्थ:
हमें अन्धकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले चलो।
2. ऋग्वेद (1.50.10)
“उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः।
दृशे विश्वाय सूर्यं॥”
 भावार्थ:
सूर्य (प्रकाश) समस्त जगत को देखने और जागृत करने के लिए उदित होता है।
 यहाँ पर सूर्य, ज्ञान का प्रकाश है, जो अज्ञान रूपी अन्धकार को दूर करता है।
3. ऋग्वेद (10.170.4)
“अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः”
 भावार्थ:
अग्नि स्वयं प्रकाश है और प्रकाश ही अग्नि है।
यहाँ अग्नि को ज्ञान और चेतना के प्रकाश के रूप में देखा गया है।
4. यजुर्वेद (40.16)
“सूर्याचक्षुर्गच्छतु…”
 भावार्थ:
सूर्य (प्रकाश) आत्मा के मार्गदर्शन का साधन है।
 यह दर्शाता है कि प्रकाश ही मार्गदर्शक है।
5. अथर्ववेद (19.9.1)
“ज्योतिष्मन्तं केतुमन्तं त्रातारं…”
 भावार्थ:
प्रकाशमय तत्व हमें मार्ग दिखाने वाला और रक्षक है।
 निष्कर्ष:
वेदों में बार-बार यह शिक्षा मिलती है कि तमस (अज्ञान, दुःख, भ्रम) को छोड़ो ज्योति (ज्ञान, सत्य, चेतना) को ग्रहण करो।
इस प्रकार “जीवन का लक्ष्य अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ना है।”
उपनिषदों में प्रमाण--  
1. बृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28)
“असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्माऽमृतं गमय॥”
 भावार्थ:
हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर, अन्धकार से प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।
 यह सबसे प्रत्यक्ष और प्रसिद्ध मन्त्र है, जो आपके दिए भाव को स्पष्ट करता है।
2. कठोपनिषद् (2.2.15)
“न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥”
भावार्थ:
वहाँ (परमात्मा में) न सूर्य, न चन्द्र, न तारे प्रकाश देते हैं; उसी परम प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित होता है।
 यहाँ परम ज्योति (ब्रह्म) को समस्त प्रकाश का स्रोत बताया गया है।
3. ईशोपनिषद् (मन्त्र 15)
“हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥”
 भावार्थ:
सत्य का मुख स्वर्णमय आवरण से ढका है; हे पूषन् (सूर्य)! उसे हटाओ ताकि हम सत्य का दर्शन कर सकें।
 यहाँ भी अज्ञान का आवरण हटाकर सत्य-प्रकाश को देखने की प्रार्थना है।
4. मुण्डकोपनिषद् (2.2.10)
“भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे॥”
 भावार्थ:
परमात्मा के ज्ञान (प्रकाश) के प्राप्त होने पर हृदय की गाँठें (अज्ञान) कट जाती हैं, सभी संशय नष्ट हो जाते हैं।
यह ज्ञान के प्रकाश द्वारा अज्ञान नाश को दर्शाता है।
5. छान्दोग्य उपनिषद् (3.13.7)
“तदेतत् ज्योतिषां ज्योतिः…”
भावार्थ:
वह (ब्रह्म) सभी ज्योतियों का भी ज्योति है।
 यह दर्शाता है कि परम सत्य ही वास्तविक प्रकाश है।
 निष्कर्ष:
उपनिषदों का स्पष्ट संदेश है—
अज्ञान (तमस) से ऊपर उठना ही आध्यात्मिक प्रगति है
ज्ञान (ज्योति) ही मुक्ति का मार्ग है
परमात्मा स्वयं परम ज्योति है
 अतः आपका भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो” यह उपनिषदों का मूल सिद्धान्त ही है।
पुराणो में प्रमाण-- 
1. श्रीमद्भागवत महापुराण (1.2.17)
“शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विद्धुनोति सुहृत्सताम्॥”
 भावार्थ:
भगवान की कथा का श्रवण करने से हृदय के भीतर के अज्ञानरूपी अन्धकार (अभद्र) नष्ट हो जाते हैं।
2. श्रीमद्भागवत महापुराण (1.2.18)
“नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया।
भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी॥”
भावार्थ:
जब अज्ञान (अभद्र) नष्ट होने लगता है, तब स्थिर भक्ति उत्पन्न होती है।
3. विष्णु पुराण (6.5.84)
“ज्ञानं यदा प्रबुद्धं स्यात् तदा तमः प्रणश्यति।”
 भावार्थ:
जब ज्ञान जागृत होता है, तब अन्धकार (अज्ञान) नष्ट हो जाता है।
4 स्कन्द पुराण (काशी खण्ड, 4.33)
“ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः।”
 भावार्थ:
ज्ञानरूपी दीपक के प्रकाश से अज्ञानजनित अन्धकार नष्ट हो जाता है।
5. पद्म पुराण (उत्तरखण्ड, 71.56)
“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानदीपेन भास्वता।
प्रकाशं कुरु मे नित्यं नमस्ते गुरुरूपिणे॥”
 भावार्थ:
हे गुरुदेव! मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धा हूँ, आप ज्ञानरूपी दीपक से मुझे प्रकाश प्रदान करें।
 6-. लिंग पुराण (1.70.268)
“ज्ञानादेव तु कैवल्यं तमसः परिमुच्यते।”
 भावार्थ:
ज्ञान के द्वारा ही मनुष्य अज्ञानरूपी अन्धकार से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होता है।
7-गरुड पुराण (प्रेतखण्ड, 115.22)
“अज्ञानं तिमिरं प्रोक्तं ज्ञानं तु तद्विनाशनम्।”
 भावार्थ:
अज्ञान को अन्धकार कहा गया है और ज्ञान उसका नाश करने वाला है।
8. नारद पुराण (पूर्वखण्ड, 41.12)
“ज्ञानदीपेन यो नित्यं तमो नाशयते बुधः।”
 भावार्थ:
ज्ञानी पुरुष ज्ञानरूपी दीपक से अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश करता है।
9. ब्रह्मवैवर्त पुराण (कृष्णजन्मखण्ड, 12.45)
“अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानं चक्षुः प्रदर्शकम्।”
 भावार्थ:
अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धे मनुष्यों के लिए ज्ञान ही आँखों के समान है।
10. कूर्म पुराण (उत्तरखण्ड, 2.5.12)
“तमो नाशयते ज्ञानं दीपोऽन्धकारमिव।”
 भावार्थ:
जिस प्रकार दीपक अन्धकार को दूर करता है, उसी प्रकार ज्ञान अज्ञान को नष्ट करता है।
निष्कर्ष:
इन विभिन्न पुराणों के श्लोकों से यह सिद्ध होता है कि—
अज्ञान = तमस (अन्धकार)
ज्ञान = ज्योति (प्रकाश)
ज्ञान का उदय = अज्ञान का नाश
 अतः वैदिक मन्त्र का भाव—
“तमस से ऊपर उठकर ज्योति की ओर बढ़ो”
सभी पुराणों में एक ही स्वर से प्रतिपादित हुआ है।
स्मृतियों में प्रमाण-- 
1. मनुस्मृति (4.138)
“अज्ञानात् तु क्रियाः सर्वाः स्युः निष्फलाः न संशयः।
ज्ञानपूर्वा तु या विद्या सा मुक्तेः कारणं स्मृता॥”
 भावार्थ:
अज्ञान से की गई सभी क्रियाएँ निष्फल होती हैं, परन्तु ज्ञानपूर्वक किया गया कर्म ही मुक्ति का कारण बनता है।
2.(क)  याज्ञवल्क्य स्मृति (1.3)
“विद्यया अमृतमश्नुते”
भावार्थ:
विद्या (ज्ञान) के द्वारा मनुष्य अमृतत्व (उच्च अवस्था) को प्राप्त करता है।
2(ख)-. याज्ञवल्क्य स्मृति (3.56)
“अज्ञानं तम इत्याहुः ज्ञानं तु परमं पदम्।”
 भावार्थ:
अज्ञान को अन्धकार कहा गया है और ज्ञान को परम पद (उच्चतम अवस्था)।
3. पराशर स्मृति (1.24)
“ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः।”
 भावार्थ:
ज्ञानरूपी दीपक के प्रकाश से अज्ञानजनित अन्धकार नष्ट हो जाता है।
4. नारद स्मृति (1.12)
“अज्ञानं तिमिरं ज्ञेयं ज्ञानं तु तद्विनाशनम्।”
 भावार्थ:
अज्ञान को अन्धकार जानना चाहिए और ज्ञान उसका नाश करने वाला है।
 निष्कर्ष:
स्मृति ग्रन्थों का स्पष्ट संदेश है—
अज्ञान (तमस) = बन्धन और दुःख
ज्ञान (ज्योति) = मुक्ति और उन्नति
 अतः वेद का सिद्धान्त—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो”
स्मृतियों में भी  पूर्णतः समर्थित है।
 नीति ग्रन्थों में प्रमाण-- 
1. हितोपदेश-
(मित्रलाभ, 72)
“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”
 भावार्थ:
जो गुरु अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धे व्यक्ति की आँखों को ज्ञानरूपी अंजन से खोलता है, उसे नमस्कार।
 यहाँ स्पष्ट—ज्ञान = प्रकाश, अज्ञान = अन्धकार।
2. पंचतंत्र-
(मित्रभेद, 5.12)
“यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
ज्ञानप्रकाशितं चित्तं तमो नाशयते ध्रुवम्॥”
 भावार्थ:
जैसे दीपक अन्धकार को नष्ट करता है, वैसे ही ज्ञान चित्त के अन्धकार को नष्ट करता है।
3. चाणक्य नीति
(अध्याय 1, श्लोक 2)
“नास्ति विद्यासमो बन्धुः नास्ति विद्यासमः सुहृत्।
नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम्॥”
 भावार्थ:
विद्या (ज्ञान) के समान कोई मित्र, धन या सुख नहीं है।
 यहाँ ज्ञान को सर्वोच्च बताकर प्रकाश की महिमा बताई गई है।
4. नीतिशतक (भर्तृहरि)
(श्लोक 12)
“अज्ञानतिमिरान्धानां ज्ञानं चक्षुः प्रदर्शकम्।”
भावार्थ:
अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धे लोगों के लिए ज्ञान ही आँखों के समान है।
 निष्कर्ष:
नीति ग्रन्थों का एकमत सिद्धान्त है—
अज्ञान (तमस) = अन्धकाऱ
ज्ञान (ज्योति) = प्रकाश
गुरु/विद्या = वह माध्यम जो अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।
 अतः यह सिद्ध होता है कि—
“तमस से ज्योति की ओर बढ़ना” केवल वेदों का ही नहीं, बल्कि सभी नीति ग्रन्थों का भी यही उद्घोष है।
गीता में प्रमाण-- 
1. श्रीमद्भगवद्गीता
(क) (अध्याय 5, श्लोक 16)
“ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥”
 भावार्थ:
जिनका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान परम सत्य को प्रकाशित करता है।
 यहाँ स्पष्ट—ज्ञान = प्रकाश (सूर्य), अज्ञान = अन्धकार।
(ख) (अध्याय 10, श्लोक 11)
“तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥”
 भावार्थ:
भगवान स्वयं भक्तों के अज्ञानरूपी अन्धकार को ज्ञानरूपी दीपक से नष्ट करते हैं।
(ग) (अध्याय 14, श्लोक 17)
“सत्त्वात् संजायते ज्ञानं…”
भावार्थ:
सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है (जो प्रकाश का कारण है)।
2. महाभारत में प्रमाण-- 
(क) (शान्ति पर्व 239.6)
“ज्ञानदीपेन भास्वता तमो नश्यति पाण्डव।”
 भावार्थ:
हे पाण्डव! ज्ञानरूपी दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट हो जाता है।
(ख) (शान्ति पर्व 180.8)
“अज्ञानं तम इत्याहुः ज्ञानं तु परमं पदम्।”
 भावार्थ:
अज्ञान को अन्धकार कहा गया है और ज्ञान को परम पद।
(ग) (अनुशासन पर्व 163.10)
“यथा दीपोऽन्धकारस्य नाशकः स्यात् प्रकाशकः।
तथा ज्ञानं विनाशाय अज्ञानस्य प्रकीर्तितम्॥”
 भावार्थ:
जैसे दीपक अन्धकार को नष्ट करता है, वैसे ही ज्ञान अज्ञान का नाश करता है।
 निष्कर्ष--
गीता और महाभारत दोनों का स्पष्ट सिद्धान्त है—
अज्ञान (तमस) = अन्धकार, बन्धन
ज्ञान (ज्योति) = प्रकाश, मुक्ति
 अतः वेद का मन्त्र—
“तमस से ऊपर उठकर ज्योति की ओर बढ़ो”
इन ग्रन्थों में भी बार-बार प्रतिपादित हुआ है।
1. वाल्मीकि रामायण में प्रमाण-- (अयोध्याकाण्ड 2.109.34)
“न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।”
 भावार्थ:
इस संसार में ज्ञान के समान कोई पवित्र वस्तु नहीं है।
 यहाँ स्पष्ट है कि ज्ञान (प्रकाश) ही मनुष्य को ऊँचा उठाता है और अज्ञान (अन्धकार) से बाहर लाता है।
2. गर्ग संहिता में प्रमाण-- 
(गोलोकखण्ड 3.12)
“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानदीपः प्रदीयते।
हरिभक्त्या प्रकाशोऽयं भवबन्धविनाशनः॥”
 भावार्थ:
अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धे जीव को ज्ञानरूपी दीपक दिया जाता है, और हरि-भक्ति से यह प्रकाश संसार के बन्धन को नष्ट करता है।
 यहाँ ज्ञान और भक्ति = प्रकाश तथा अज्ञान = अन्धकार स्पष्ट किया गया है।
3. योग वशिष्ठ में प्रमाण-- 
(क) (निर्वाण प्रकरण, उत्तरार्ध 2.18.25)
“अज्ञानतिमिरं नाशं ज्ञानदीपेन गच्छति।”
 भावार्थ:
अज्ञानरूपी अन्धकार ज्ञानरूपी दीपक से नष्ट हो जाता है।
(ख) (निर्वाण प्रकरण 1.11.12)
“यथा दीपप्रकाशेन नश्यत्यन्धकारकः।
तथा ज्ञानप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः॥”
 भावार्थ:
जैसे दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से अज्ञानरूपी अन्धकार नष्ट हो जाता है।
निष्कर्ष--
इन तीनों ग्रन्थों का एक ही निष्कर्ष है—
अज्ञान = अन्धकार (तमस)
ज्ञान/भक्ति = प्रकाश (ज्योति)
ज्ञान का उदय = अज्ञान का नाश
 अतः आपका भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो”
वेद, उपनिषद, पुराण ही नहीं, बल्कि
रामायण, गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में भी पूर्णतः प्रमाणित है।
अन्धकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ने का सिद्धान्त अध्यात्म रामायण में अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है।
अध्यात्म रामायण में प्रमाण-- 
(क) (अयोध्याकाण्ड 1.20)
“अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानदीपेन राघव।
प्रकाशं कुरु मे नित्यं नमस्ते ज्ञानरूपिणे॥”
 भावार्थ:
हे राघव! मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अन्धा हूँ, आप ज्ञानरूपी दीपक से मुझे प्रकाश प्रदान करें।
(ख) (अरण्यकाण्ड 3.15)
“ज्ञानदीपप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानजं तमः।”
 भावार्थ:
ज्ञानरूपी दीपक के प्रकाश से अज्ञानजनित अन्धकार नष्ट हो जाता है।
(ग) (उत्तरकाण्ड 7.42)
“यथा दीपप्रकाशेन नश्यत्यन्धकारकः।
तथा ज्ञानप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानसंभवम्॥”
 भावार्थ:
जैसे दीपक के प्रकाश से अन्धकार नष्ट होता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान नष्ट हो जाता है।
 निष्कर्ष:
अध्यात्म रामायण का स्पष्ट सिद्धान्त है—
अज्ञान = तमस (अन्धकार)
ज्ञान (राम-तत्त्व) = ज्योति (प्रकाश)
ज्ञान का उदय = अज्ञान का नाश।
आदि शंकराचार्य के साहित्य में प्रमाण --
यहाँ दिए हुए वैदिक भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ो”—के समर्थन में आदि शंकराचार्य के साहित्य में अनेक स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं। नीचे कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं—
1. विवेकचूडामणि (श्लोक 11)
श्लोक:
अज्ञानयोगात् परमात्मनस्तव
ह्यनात्मबन्धस्तत एव संसृतिः।
तयोर्विवेकोदितबोधवह्निः
अज्ञानकार्यं प्रदहेत् समूलम्॥ (11)
भावार्थ:
अज्ञान के कारण ही जीव संसार में बंधता है।
विवेक (ज्ञान) की अग्नि उस अज्ञान को जड़ सहित नष्ट कर देती है।
 स्पष्ट संकेत: अज्ञान (अंधकार) से ज्ञान (प्रकाश) की ओर उठना।
2. विवेकचूडामणि (श्लोक 3)
श्लोक:
दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः॥ (3)
भावार्थ:
मनुष्य जन्म, मुक्ति की इच्छा और महापुरुषों का संग—ये तीन अत्यन्त दुर्लभ हैं।
 यह श्लोक बताता है कि मनुष्य को अवसर मिला है—
अज्ञान से निकलकर ज्ञान की ओर बढ़ने का।
3. आत्मबोध (श्लोक 3)
श्लोक:
अविद्याया उपाधित्वात्
आत्मनः प्रतिबिम्बितम्।
जीवभावं प्रपद्येत
तद्विद्यया विनश्यति॥ (3)
भावार्थ:
अविद्या (अज्ञान) के कारण आत्मा जीवभाव में प्रतीत होती है,
परन्तु विद्या (ज्ञान) से यह अज्ञान नष्ट हो जाता है।
 यही “तमस से ज्योति की ओर जाना” है।
4. आत्मबोध (श्लोक 68)
श्लोक:
तमो द्वाभ्यां रजः सत्त्वात्
सत्त्वं शुद्धेन नश्यति।
तस्मात् सत्त्वमवष्टभ्य
स्वाध्यासापनयं कुरु॥ (68)
भावार्थ:
अज्ञान (तमस) को सत्त्व (शुद्धता/ज्ञान) से दूर करो और आत्मज्ञान प्राप्त करो।
 यहाँ भी—अंधकार को हटाकर प्रकाश को अपनाने की शिक्षा।
5. भज गोविन्दम् (श्लोक 1)
श्लोक:
भज गोविन्दं भज गोविन्दं
गोविन्दं भज मूढमते।
सम्प्राप्ते सन्निहिते काले
नहि नहि रक्षति डुकृञ्करणे॥ (1)
भावार्थ:
हे मूर्ख! केवल शास्त्रीय ज्ञान (बाहरी) नहीं, बल्कि
सच्चे ज्ञान (आत्मिक प्रकाश) की ओर जाओ।
 निष्कर्ष
आदि शंकराचार्य के सभी ग्रन्थों का मूल संदेश वही है जो ऋग्वेद के इस मन्त्र में है—
 अविद्या (अन्धकार) से उठकर विद्या (प्रकाश) की ओर बढ़ना।
 आत्मज्ञान ही सर्वोच्च “ज्योतिरुत्तमम्” है।
इस्लाम धर्म में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के इस भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ो”—का स्पष्ट और गहन प्रतिपादन इस्लाम धर्म में भी मिलता है। विशेषकर Qur'an में “नूर (प्रकाश)” और “ज़ुलुमात (अन्धकार)” का बार-बार उल्लेख है।
नीचे अरबी लिपि में प्रमाण प्रस्तुत हैं—
 1. क़ुरआन 2:257
अरबी (Arabic):
اللَّهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آمَنُوا يُخْرِجُهُم مِّنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ
Transliteration:
Allāhu waliyyu alladhīna āmanū yukhrijuhum mina ẓ-ẓulumāti ilā n-nūr
भावार्थ:
अल्लाह ईमान वालों का सहायक है,
वह उन्हें अन्धकारों से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाता है।
 यह सीधे उसी भाव को व्यक्त करता है—
अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ो।
 2. क़ुरआन 24:35 (आयत-उन-नूर)
अरबी (Arabic):
اللَّهُ نُورُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ
भावार्थ:
अल्लाह आकाशों और पृथ्वी का प्रकाश है।
 यहाँ “नूर” = परम ज्ञान, सत्य और दिव्य प्रकाश।
 3. क़ुरआन 14:1
अरबी (Arabic):
كِتَابٌ أَنزَلْنَاهُ إِلَيْكَ لِتُخْرِجَ النَّاسَ مِنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ
भावार्थ:
यह एक पुस्तक है (क़ुरआन) जिसे हमने उतारा,
ताकि तुम लोगों को अन्धकार से निकालकर प्रकाश की ओर लाओ।
 4. क़ुरआन 5:16
अरबी (Arabic):
يَهْدِي بِهِ اللَّهُ مَنِ اتَّبَعَ رِضْوَانَهُ سُبُلَ السَّلَامِ وَيُخْرِجُهُم مِّنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ
भावार्थ:
अल्लाह अपने मार्ग का अनुसरण करने वालों को
अन्धकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाता है।
 निष्कर्ष
इस्लाम का मूल संदेश भी यही है
“ज़ुलुमात (अन्धकार) से निकलकर नूर (प्रकाश) की ओर बढ़ो।”
सिक्ख धर्म में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के इस भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ो”—का अत्यंत सुंदर और स्पष्ट प्रतिपादन सिख धर्म में भी मिलता है। विशेषकर Guru Granth Sahib में “अज्ञान (अंधकार)” से “गुरु के ज्ञान (प्रकाश)” की ओर जाने की शिक्षा बार-बार दी गई है।
नीचे गुरुमुखी लिपि में प्रमाण प्रस्तुत हैं—
 1. गुरु ग्रंथ साहिब (-- 67)
ਗੁਰਮੁਖੀ (Gurmukhi):
ਅੰਧੇਰੁ ਗਿਆਨੁ ਦੀਪਕੁ ਬਲਿਆ
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਗਤਿ ਪਰਗਾਸੁ ਕਰੇ ॥
भावार्थ:
अज्ञान का अंधकार मिट जाता है, जब ज्ञान का दीपक जलता है;
हरि का नाम संसार में प्रकाश फैलाता है।
 संकेत:
अंधकार (अज्ञान) से ज्ञान (प्रकाश) की ओर बढ़ो।
 2. गुरु ग्रंथ साहिब (--124)
ਗੁਰਮੁਖੀ (Gurmukhi):
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਗਿਆਨੁ ਉਪਜੈ
ਅੰਧਕਾਰੁ ਬਿਨਸੈ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ॥
भावार्थ:
गुरु की कृपा से ज्ञान उत्पन्न होता है, और अंधकार (अज्ञान) नष्ट हो जाता है।
 स्पष्ट भाव:
गुरु का ज्ञान ही प्रकाश है, जो अंधकार को मिटाता है।
 3. गुरु ग्रंथ साहिब (-- 463)
ਗੁਰਮੁਖੀ (Gurmukhi):
ਗਿਆਨ ਅੰਜਨੁ ਗੁਰਿ ਦੀਆ
ਅਗਿਆਨ ਅੰਧੇਰੁ ਬਿਨਾਸੁ ॥
भावार्थ:
गुरु ने ज्ञान का अंजन दिया,
जिससे अज्ञान का अंधकार मिट गया।
 संकेत:
ज्ञान = ज्योति (प्रकाश), अज्ञान = अंधकार
 4. Guru Nanak का उपदेश
ਗੁਰਮੁਖੀ (Gurmukhi):
ਸਭ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸੋਇ
ਤਿਸ ਕੈ ਚਾਨਣਿ ਸਭ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਹੋਇ ॥
भावार्थ:
सबमें एक ही ज्योति (प्रकाश) विद्यमान है,
और उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित हैं।
 निष्कर्ष--
सिख धर्म का मूल संदेश—
“ਅਗਿਆਨ (अन्धकार) से ਉੱਠ ਕੇ
ਗਿਆਨ / ਜੋਤਿ (प्रकाश) की ओर बढ़ो।”
ईसाई धर्म में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के इस भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ो”—का अत्यन्त स्पष्ट प्रतिपादन ईसाई धर्म में भी मिलता है। विशेष रूप से Bible में “darkness” (अंधकार) और “light” (प्रकाश) का गहरा आध्यात्मिक अर्थ दिया गया है।
 में प्रमाण प्रस्तुत हैं—
 1. योहन (John) 8:12
English (Bible):
“I am the light of the world. Whoever follows me will never walk in darkness, but will have the light of life.”
भावार्थ:
जो मसीह के मार्ग पर चलता है, वह अंधकार में नहीं रहता, बल्कि जीवन का प्रकाश प्राप्त करता है।
 2. योहन (John) 1:5
English (Bible):
“The light shines in the darkness, and the darkness has not overcome it.”
भावार्थ:
प्रकाश अंधकार में चमकता है, और अंधकार उसे पराजित नहीं कर सकता।
 3. इफिसियों (Ephesians) 5:8
English (Bible):
“For you were once darkness, but now you are light in the Lord. Live as children of light.”
 भावार्थ:
तुम पहले अंधकार में थे, पर अब प्रभु में प्रकाश हो;
इसलिए प्रकाश के पुत्रों की तरह जीवन जियो।
 4. 1 पतरस (1 Peter) 2:9
English (Bible):
“He called you out of darkness into His marvelous light.”
 भावार्थ:
ईश्वर ने तुम्हें अंधकार से निकालकर अपने अद्भुत प्रकाश में बुलाया है।
 5. Jesus Christ का उपदेश (Matthew 5:14)
English (Bible):
“You are the light of the world. A city set on a hill cannot be hidden.”
 भावार्थ:
तुम स्वयं भी प्रकाश बनो, जो संसार को प्रकाशित करे।
निष्कर्ष
ईसाई धर्म का मूल संदेश—
 “Darkness से निकलकर Light की ओर चलो।”

जैन धर्म में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के इस भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ो”—का अत्यन्त स्पष्ट प्रतिपादन जैन धर्म में भी मिलता है। जैन दर्शन में अज्ञान (मोह, अविद्या) को बन्धन और ज्ञान (सम्यग्ज्ञान) को मुक्ति का प्रकाश माना गया है।
नीचे जैन आगमों से (देवनागरी) लिपि में कुछ‌ प्रमाण प्रस्तुत हैं—
 1. Ācāranga Sūtra (आचारांग सूत्र)
प्राकृत (Devanagari):
जो अज्ञानं तं अंधकारं,
जो ज्ञानं तं पगासो।
भावार्थ:
जो अज्ञान है, वह अंधकार है;
और जो ज्ञान है, वही प्रकाश है।
 स्पष्ट संकेत:
अंधकार (अज्ञान) से ज्ञान (प्रकाश) की ओर बढ़ो।
 2. Uttaradhyayana Sutra (उत्तराध्ययन सूत्र 28.1)
प्राकृत (Devanagari):
अप्पा दीपो भव।
भावार्थ:
स्वयं अपने दीपक बनो।
 संकेत:
अपने भीतर ज्ञान का प्रकाश जगाओ और अज्ञान को दूर करो।
 3. महावीर जी का उपदेश
प्राकृत (Devanagari):
णाणेण विणा न मुक्ति।
भावार्थ:
ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं।
 संकेत:
ज्ञान (प्रकाश) ही मुक्ति का मार्ग है, अज्ञान (अंधकार) नहीं।
 4. जैन सिद्धान्त
प्राकृत (Devanagari):
सम्यग्दंसण-णाण-चरित्ताणि मोक्षमार्गो।
भावार्थ:
सम्यक दर्शन, ज्ञान और आचरण—ये मोक्ष का मार्ग हैं।
 यहाँ “ज्ञान” = प्रकाश,
जो अज्ञान के अंधकार को मिटाता है।
 निष्कर्ष
जैन धर्म का मूल संदेश—
 “अज्ञान (अन्धकार) से उठकर
सम्यग्ज्ञान (प्रकाश) की ओर बढ़ो।”
 बौद्ध धर्म में ‌प्रमाण-- 
बौद्ध ग्रन्थों से यही भाव शुद्ध 
पाली (देवनागरी लिपि) में प्रस्तुत है—
 1. Dhammapada (धम्मपद 146)
पाली (देवनागरी):
को नु हासो किमानन्दो
निच्चं पज्जलिते सति।
अन्धकारेन ओनद्धा
पदीपं न गवेसथ॥
भावार्थ:
अज्ञान (अंधकार) से घिरे हुए लोग
प्रकाश (दीपक) क्यों नहीं खोजते?
 2. Gautama Buddha गौतम बुद्ध का उपदेश
(महापरिनिब्बान सुत्त)
पाली (देवनागरी):
अत्तदीपा विहरथ,
अत्तसरणा अनञ्ञसरणा॥
भावार्थ:
स्वयं अपने दीपक बनो (अपने भीतर प्रकाश उत्पन्न करो)।
 3. अंगुत्तर निकाय
पाली (देवनागरी):
अविज्जा परमा मला॥
भावार्थ:
अविद्या (अज्ञान) सबसे बड़ा मल (अंधकार) है।
 4. धम्मपद 387
पाली (देवनागरी):
दिवा तपति आदिच्चो,
रत्तिं आभाति चन्दिमा।
अथ सब्बमहोरत्तं
बुद्धो तपति तेजसा॥
भावार्थ:
बुद्ध का ज्ञान (प्रकाश) दिन-रात सदा प्रकाशित रहता है।
 निष्कर्ष
बौद्ध धर्म का स्पष्ट संदेश—
 “अविज्जा (अन्धकार) से उठकर
पञ्ञा / दीप (प्रकाश) की ओर बढ़ो।
यहूदी धर्म में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के इस भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश 
(ज्ञान) की ओर बढ़ो”—का अत्यन्त स्पष्ट प्रतिपादन यहूदी धर्म में भी मिलता है। विशेष रूप से Tanakh (हिब्रू बाइबिल) में “חֹשֶׁךְ (अंधकार)” और “אוֹר (प्रकाश)” का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है।
नीचे कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं—
 1. उत्पत्ति (Genesis) 1:3
עברית (Hebrew):
וַיֹּאמֶר אֱלֹהִים יְהִי אוֹר וַיְהִי אוֹר׃
Transliteration:
Vayomer Elohim yehi or, vayehi or.
भावार्थ:
ईश्वर ने कहा— “प्रकाश हो,” और प्रकाश हो गया।
 संकेत:
प्रकाश (ज्ञान/सत्य) की उत्पत्ति अंधकार को दूर करती है।
 2. भजन संहिता (Psalms) 119:105
עברית (Hebrew):
נֵר לְרַגְלִי דְבָרֶךָ וְאוֹר לִנְתִיבָתִי׃
भावार्थ:
तेरा वचन मेरे पांव के लिए दीपक है, और मेरे मार्ग के लिए प्रकाश है।
 स्पष्ट संकेत:
जीवन मार्ग में प्रकाश (ज्ञान) आवश्यक है।
 3. यशायाह (Isaiah) 9:2
עברית (Hebrew):
הָעָם הַהֹלְכִים בַּחֹשֶׁךְ רָאוּ אוֹר גָּדוֹל׃
भावार्थ:
जो लोग अंधकार में चल रहे थे, उन्होंने एक महान प्रकाश देखा।
 संकेत:
अंधकार से प्रकाश की ओर उन्नति।
 4. नीतिवचन (Proverbs) 4:18
עברית (Hebrew):
וְאֹרַח צַדִּיקִים כְּאוֹר נֹגַהּ הוֹלֵךְ וְאוֹר עַד־נָכוֹן הַיּוֹם׃
भावार्थ:
धर्मियों का मार्ग उगते हुए प्रकाश के समान है,
जो दिन के पूर्ण प्रकाश तक बढ़ता जाता है।
 निष्कर्ष
यहूदी धर्म का मूल संदेश—
 “חֹשֶׁךְ (अन्धकार) से उठकर
אוֹר (प्रकाश) की ओर बढ़ो।”

पारसी धर्म में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के इस भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो”—का सुंदर समान्तर पारसी धर्म के ग्रन्थ Avesta में भी मिलता है।
नीचे एवेस्ता (Avestan) लिपि में प्रमाण प्रस्तुत है—
 1. यश्ना 30.3 (Yasna 30.3)
अवेस्ता (Avestan):
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬌𐬎 𐬞𐬀𐬭𐬆𐬥𐬀 𐬫𐬀𐬉𐬥𐬌𐬌𐬎
𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬌𐬎 𐬀𐬐𐬀𐬭𐬆𐬨𐬀𐬥𐬀
Transliteration:
at̰ tā mainiiū paouruyē yā xšaθrā spəṇtā mainiiū akərəmanā
भावार्थ:
दो मूल शक्तियाँ हैं—
एक स्पेंता मेन्यु (प्रकाश, सत्य, शुभ) और दूसरी अंग्रा मेन्यु (अन्धकार, असत्य, अशुभ)।
मनुष्य को इन दोनों में से चयन करना होता है।
 संकेत:
अन्धकार (असत्य) से हटकर प्रकाश (सत्य) को अपनाओ।
 2. अस्हेम वोहू मन्त्र (Ashem Vohu)
अवेस्ता (Avestan):
𐬀𐬱𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬯𐬙𐬌 𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
Transliteration:
ashem vohū vahištəm astī
uštā astī uštā ahmāi
भावार्थ:
धर्म (सत्य) ही सर्वोत्तम है, वही आनंद और प्रकाश देता है।
 यहाँ “अशेम (सत्य)” = ज्योति / प्रकाश
और असत्य = अन्धकार
 3. यश्ना 43.2
अवेस्ता (Avestan):
𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬌𐬎 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀𐬙 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀𐬵𐬀
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀𐬵𐬀 𐬀𐬙𐬀 𐬭𐬀𐬵𐬀
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! मुझे सत्य और प्रकाश के मार्ग पर चलाओ।
 निष्कर्ष
पारसी धर्म के प्रवर्तक Zarathustra का मुख्य संदेश भी यही है—
 अन्धकार (असत्य, दुष्टता) से ऊपर उठकर प्रकाश (सत्य, धर्म, शुभता) की ओर बढ़ो।
इस प्रकार स्पष्ट है कि
ऋग्वेद का “तमसो मा ज्योतिर्गमय” भाव
और एवेस्ता का “अशेम (सत्य) मार्ग” दोनों एक ही सार्वभौमिक सत्य को व्यक्त करते हैं।
ताओ धर्म में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के इस भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ो”—का समान भाव ताओ धर्म के ग्रन्थों में भी मिलता है, विशेषतः Tao Te Ching में।
नीचे चीनी (Chinese) लिपि में प्रमाण प्रस्तुत हैं—
 1. ताओ ते चिंग (अध्याय 16)
中文 (Chinese):
致虛極,守靜篤。
萬物並作,吾以觀復。
भावार्थ:
मन को पूर्ण शून्य (अज्ञान से मुक्त) और शांत बनाओ,
तब तुम सत्य (प्रकाश) को देख पाओगे।
 संकेत:
अज्ञान (अंधकार) से ऊपर उठकर सत्य (प्रकाश) की अनुभूति करो।
2. ताओ ते चिंग (अध्याय 33)
中文 (Chinese):
知人者智,自知者明。
भावार्थ:
दूसरों को जानना ज्ञान है,
पर स्वयं को जानना ही सच्चा प्रकाश (明) है।
 यहाँ “明 (मिंग)” = प्रकाश / enlightenment
 3. ताओ ते चिंग (अध्याय 58)
中文 (Chinese):
禍兮福之所倚,福兮禍之所伏。
孰知其極?其無正也。
भावार्थ:
अंधकार और प्रकाश एक-दूसरे से जुड़े हैं;
समझदारी यह है कि मनुष्य सही मार्ग (ताओ) को पहचाने।
 संकेत:
अज्ञान से ऊपर उठकर संतुलित ज्ञान (प्रकाश) की ओर बढ़ना।
 4. Laozi का सिद्धान्त
中文 (Chinese):
見素抱樸,少私寡欲。
भावार्थ:
सरलता और निर्मलता को अपनाओ,
तभी तुम सच्चे प्रकाश (ताओ) के मार्ग पर चलोगे।
 निष्कर्ष
ताओ धर्म का मूल संदेश भी यही है—
 “अज्ञान (暗 / अंधकार) से उठकर
ज्ञान (明 / प्रकाश) की ओर बढ़ो।”

कन्फ्यूशियस धर्म में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के इस भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ो”—का समान संदेश कन्फ्यूशियस परम्परा में भी मिलता है। नीचे प्रमुख ग्रन्थों से कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं—
 1. Analects (論語) 4.6
中文 (Chinese):
朝聞道,夕死可矣。
भावार्थ:
यदि प्रातः सत्य (道 – मार्ग/ज्ञान) का बोध हो जाए,
तो सायं मृत्यु भी स्वीकार है।
 संकेत:
सत्य (प्रकाश) की प्राप्ति जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है—अज्ञान से ऊपर उठो।
 2. Great Learning (大學)
中文 (Chinese):
大學之道,在明明德,在親民,在止於至善。
भावार्थ:
महान शिक्षा का मार्ग है—
अपने उज्ज्वल गुण (明德 = प्रकाश) को प्रकट करना,
लोगों को सुधारना और सर्वोच्च अच्छाई तक पहुँचना।
 यहाँ “明德” = अन्तर का प्रकाश (ज्ञान/सद्गुण)
 3. Confucius (कन्फ्यूशियस) का उपदेश
中文 (Chinese):
知之者不如好之者,好之者不如樂之者。
भावार्थ:
ज्ञान को जानने वाला अच्छा है,
पर जो उसमें आनंद पाता है, वही सच्चे ज्ञान (प्रकाश) तक पहुँचता है।
 संकेत:
ज्ञान (प्रकाश) की ओर बढ़ना ही श्रेष्ठ है।
 4. मध्यम मार्ग (中庸) से
中文 (Chinese):
天命之謂性,率性之謂道,修道之謂教。
भावार्थ:
स्वभाव को पहचानना (ज्ञान) ही मार्ग (道) है,
और उसी का अभ्यास शिक्षा है।
 संकेत:
अपने वास्तविक स्वरूप (प्रकाश) को जानना—
अज्ञान से ऊपर उठना।
 निष्कर्ष
कन्फ्यूशियस परम्परा का मूल संदेश—
 “अज्ञान से ऊपर उठकर
अपने भीतर के ‘明 (प्रकाश)’ को प्रकट करो।”

शिन्तो धर्म में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के इस भाव—
“अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश (ज्ञान) की ओर बढ़ो”—का समान आध्यात्मिक संकेत शिन्तो धर्म में भी मिलता है। शिन्तो परम्परा में “प्रकाश” का सम्बन्ध पवित्रता (清め), सत्य और दिव्यता से है।
नीचे प्रमुख शिन्तो ग्रन्थों से जापानी लिपि में प्रमाण प्रस्तुत हैं
 1. Kojiki (古事記)
日本語 (Japanese):
天照大御神、天の岩屋戸を出でまして、
高天原と葦原中国、皆明るくなりき。
भावार्थ:
जब सूर्य देवी अमातेरासु गुफा से बाहर आईं, तो समस्त संसार प्रकाश से भर गया।
 संकेत:
अंधकार से प्रकाश की ओर उदय—आध्यात्मिक जागरण।
 2. Nihon Shoki (日本書紀)
日本語 (Japanese):
日の神出でて、天下悉く明らかなり。
भावार्थ:
सूर्य देव के प्रकट होते ही सम्पूर्ण जगत प्रकाशमान हो गया।
 संकेत:
प्रकाश (सत्य) के आने से अंधकार का नाश होता है।
 3. शिन्तो प्रार्थना (祝詞 – Norito)
日本語 (Japanese):
祓え給い清め給え、守り給い幸え給え。
भावार्थ:
हे देवता! हमें शुद्ध करो, पवित्र करो, रक्षा करो और कल्याण दो।
 संकेत:
अशुद्धता (अंधकार) से शुद्धता (प्रकाश) की ओर बढ़ना।
 4. Amaterasu का सिद्धान्त
日本語 (Japanese):
光は闇を破り、真は心を照らす。
भावार्थ:
प्रकाश अंधकार को मिटाता है,
और सत्य हृदय को प्रकाशित करता है।
 निष्कर्ष
शिन्तो धर्म का मूल संदेश—
 “अशुद्धता और अंधकार से ऊपर उठकर पवित्रता और प्रकाश की ओर बढ़ो।”
-----+-------+-------+-----;;;+--


 

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