ऋगुवेद सूक्ति--(३२) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति- (32) की व्याख्या
"स्तोतुर्मघवन काममा पृण"।
ऋगुवेद ---१/५७/५
भावार्थ --हे प्रभु! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो।
मंत्र :
“स्तोतुर्मघवन् काममापृण।”
— ऋगुवेद --1.57.5
पदच्छेद--
स्तोतुः / स्तोतुर् — स्तुति करने वाले, भक्त या उपासक का
मघवन् — दानी, कृपालु (इन्द्र अथवा परम दाता ईश्वर के लिए प्रयुक्त)
कामम् — इच्छा, अभिलाषा
आ पृण — पूर्ण करो, भर दो, संतुष्ट करो।
भावार्थ-
हे मघवन (दानी प्रभु)! जो भक्त आपकी स्तुति करता है, उसकी उचित और धर्मसम्मत कामनाओं को पूर्ण करो।
इस मंत्र में वेद यह शिक्षा देता है कि ईश्वर दानी और कृपालु है। जो व्यक्ति श्रद्धा, स्तुति और सत्कर्म के साथ ईश्वर की उपासना करता है, उसकी आवश्यक और धर्मयुक्त इच्छाओं को ईश्वर पूर्ण करता है।
यहाँ “मघवन्” शब्द विशेष रूप से उस परम शक्ति के लिए है जो दया, दान और कृपा से जीवों का पालन करती है।
भक्त जब ईश्वर का गुणगान करता है, तो उसका मन शुद्ध होता है और उसकी इच्छाएँ भी स्वार्थ से हटकर कल्याणकारी बन जाती हैं। ऐसी शुद्ध कामनाओं की पूर्ति ईश्वर की कृपा से होती है।
सारांश--
यह मंत्र सिखाता है कि भक्तिपूर्वक ईश्वर की स्तुति करने वाला व्यक्ति अपनी धर्मयुक्त कामनाओं की पूर्ति ईश्वर की कृपा से प्राप्त करता है।
ऋग्वेद (मंडल 1, सूक्त 57, मंत्र 5) का पूर्ण मंत्र इस प्रकार है—
मूल मंत्र (संस्कृत):
स्तोतुर्मघवन् कामना पृणक्तु
विश्वा इदस्य राधसो दधानः।
नू चिद् धि ते पुरुहूत स्तोमैर्
आ वर्धन्तु प्र भरा नः सुतस्य॥
सरल भावार्थ
हे इन्द्र!
स्तुति करने वाले की कामनाओं को पूर्ण करो, और उसे अपने सभी प्रकार के धन-वैभव प्रदान करो।
हे पुरुहूत (अनेक बार आहूत होने वाले)!
हमारी स्तुतियाँ आपको बढ़ाएँ (आपको प्रसन्न करें),
और आप हमारे लिए सोमरस (आनन्द/शक्ति) प्रदान करें।
वेदों में प्रमाण--
1.ऋगुवेद से प्रमाण--
“यं यं युजं कृणुते ब्रह्मणस्पतिः।” (ऋग्वेद 2.23.1)
अर्थ :
ब्रह्मणस्पति (ईश्वर) जिस भक्त को अपना बना लेता है, उसकी इच्छाओं और कार्यों को सिद्ध करता है।
2. ऋगुवेद--
“स नः पितेव सूनवे अग्ने सुपायनो भव।” (ऋग्वेद 1.1.9)
अर्थ :
हे अग्ने! जैसे पिता पुत्र की इच्छाओं को पूरा करता है, वैसे ही हमारे लिए कल्याणकारी बनो।
3. यजुर्वेद से प्रमाण--
“तेजोऽसि तेजो मयि धेहि।
वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि।” (यजुर्वेद 19.9)
अर्थ :
हे प्रभु! आप तेजस्वी हैं, हमें भी तेज प्रदान करें; आप वीर्यस्वरूप हैं, हमें भी शक्ति दें।
अर्थात् ईश्वर से अपनी आवश्यक शक्तियों और इच्छित गुणों की प्राप्ति की प्रार्थना।
4. अथर्ववेद से प्रमाण
“भद्रं नो अपि वातय मनः।” (अथर्ववेद 7.52)
अर्थ :
हे प्रभु! हमारे मन में शुभ और कल्याणकारी इच्छाएँ उत्पन्न करें और उन्हें पूर्ण करें।
उपनिषदों से प्रमाण —
1. कठ उपनिषद--
“एष सर्वेषु भूतेषु गूढोऽत्मा न प्रकाशते।
दृश्यते त्वग्रया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः॥” (कठोपनिषद् 1.3.12)
अर्थ :
यह परमात्मा सब प्राणियों में स्थित है, परन्तु सूक्ष्म बुद्धि और भक्ति से उसका अनुभव होता है और वही भक्त को परम फल देता है।
2. मुण्डक उपनिषद --
“यं यं लोकं मनसा संविभाति
विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान्।
तं तं लोकं जयते तांश्च कामान्।” (3.1.10)
अर्थ :
जिसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है, वह जिस लोक और जिन कामनाओं की इच्छा करता है, उन्हें प्राप्त कर लेता है।
3. तैत्तिरीय उपनिषद् --
“स यो ह वै तत्परं ब्रह्म वेद
ब्रह्मैव भवति।” (तैत्तिरीयोपनिषद् 2.1)
अर्थ :
जो मनुष्य परम ब्रह्म को जान लेता है, वह ब्रह्मरूप होकर सभी इच्छाओं की तृप्ति प्राप्त करता है।
4. छान्दोग्य उपनिषद --
“सर्वे कामा: समश्नन्ति।” (छान्दोग्य उपनिषद् 8.1)
अर्थ :
जो आत्मा और ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
५: श्वेताश्वतर उपनिषद्_.
“यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥” (6.18)
अर्थ :
जो परमात्मा ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और वेदों का ज्ञान देता है, उसी देव की शरण में जाने से साधक को अपनी अभिलाषित सिद्धि प्राप्त होती है।
६-ईश उपनिषद--
“विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययाऽमृतमश्नुते॥” (मंत्र 11)
अर्थ :
जो मनुष्य ज्ञान और कर्म दोनों को समझता है, वह मृत्यु के बंधन से पार होकर अमृत पद को प्राप्त करता है—अर्थात् उसकी सर्वोच्च अभिलाषा पूर्ण होती है।
७-प्रश्न उपनिषद_
“स यो ह वै तत्परं ब्रह्म वेद
ब्रह्मैव भवति।” (प्रश्नोपनिषद् 6.5)
अर्थ :
जो मनुष्य परम ब्रह्म को जान लेता है, वह ब्रह्मस्वरूप होकर अपनी सर्वोच्च इच्छाओं की सिद्धि प्राप्त करता है।
८-बृहदारण्यक उपनिषद--
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।” (2.4.5)
अर्थ :
आत्मा का दर्शन, श्रवण, मनन और ध्यान करना चाहिए; इससे मनुष्य को परम सत्य और जीवन की पूर्णता प्राप्त होती है।
निष्कर्ष :
उपनिषद यह बताते हैं कि जो व्यक्ति ईश्वर या ब्रह्म की शरण लेकर ज्ञान और भक्ति करता है, उसकी सर्वोच्च कामनाएँ पूर्ण होती हैं और वह परम आनन्द को प्राप्त करता है।
पुराणों से प्रमाण—
1.विष्णु पुराण --
“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।”
अर्थ :
जो भक्त जिस भाव से भगवान की शरण में आता है, भगवान उसी प्रकार उसकी इच्छाओं को पूर्ण करते हैं और उसे फल देते हैं।
2.शिव पुराण --
“भक्तानामभयं दाता सर्वकामफलप्रदः।”
अर्थ :
भगवान शिव अपने भक्तों को भय से मुक्त करते हैं और उनकी सभी उचित कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।
3. भागवत पुराण--
“सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणां
नैवार्थदो यत्पुनरर्थिता यतः।” (10.88.8)
अर्थ :
भगवान भक्तों की प्रार्थना सुनकर उन्हें उनकी याचना के अनुसार फल देते हैं।
4. पद्म पुराण --
“भक्तवत्सल भगवान्
सर्वाभीष्टफलप्रदः।”
अर्थ :
भगवान भक्तवत्सल हैं और भक्तों की सभी अभिलाषित कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।
५-स्कंद पुराण --
“भक्तानां कामदं देवं
भक्तवत्सलमव्ययम्।”
अर्थ :
भगवान भक्तवत्सल हैं और अपने भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करने वाले हैं।
६. गरुड़ पूराण-
“भक्त्या सम्पूजितो विष्णुः
ददाति मनसेप्सितम्।”
अर्थ :
भगवान विष्णु भक्ति से प्रसन्न होकर भक्तों को उनके मन की अभिलाषा प्रदान करते हैं।
७- ब्रह्म पुराण --
“आराधितो हि भगवान्
भक्तानां फलदो हरिः।”
अर्थ :
भगवान हरि की आराधना करने पर वे भक्तों को इच्छित फल प्रदान करते हैं।
८-- अग्नि पुराण --
“भक्तानुग्रहकर्ता हि
सर्वकामफलप्रदः।”
अर्थ :
भगवान भक्तों पर अनुग्रह करने वाले और उनकी कामनाओं को फल देने वाले हैं।
निष्कर्ष :
पुराणों में भी स्पष्ट बताया गया है कि भगवान भक्तवत्सल हैं और भक्ति से प्रसन्न होकर भक्तों की धर्मयुक्त कामनाओं को पूर्ण करते है।
गीता से प्रमाण--
(4.11)
“ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥”
अर्थ :
हे अर्जुन! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण में आता है, मैं भी उसे उसी प्रकार फल देता हूँ; सभी मनुष्य मेरे मार्ग का ही अनुसरण करते हैं।
2. (9.22)
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”
अर्थ :
जो भक्त निरन्तर मेरा स्मरण और उपासना करते हैं, उनके योग (जो नहीं है उसे प्राप्त कराना) और क्षेम (जो है उसकी रक्षा करना) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
3. (7.21–22)
“यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान्॥”
अर्थ :
भक्त जिस देवता की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, मैं उसकी श्रद्धा को दृढ़ करता हूँ और उसी के द्वारा वह अपनी इच्छित कामनाओं को प्राप्त करता है।
गीता में स्पष्ट कहा गया है कि जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से भगवान की शरण में जाता है, भगवान उसकी आवश्यकताओं और धर्मयुक्त कामनाओं की पूर्ति करते हैं।
महाभारत से प्रमाण
१ --(शान्ति पर्व)
“भक्तानामनुग्रहकर्ता
दाता सर्वाभिलषितफलः।”
अर्थ :
भगवान अपने भक्तों पर अनुग्रह करने वाले और उनकी अभिलाषित कामनाओं को फल देने वाले हैं।
2-- (अनुशासन पर्व)
“यथा यथा हि पुरुषः
श्रद्धया परमेश्वरम्।
तथा तथा लभते सिद्धिं
भक्त्या परमया युतः॥”
अर्थ :
मनुष्य जितनी श्रद्धा और भक्ति से परमेश्वर की उपासना करता है, उसी के अनुसार वह सिद्धि और इच्छित फल प्राप्त करता है।
3.--(शान्ति पर्व)
“न हि भक्तः प्रणश्यति।”
अर्थ :
भगवान के भक्त का कभी नाश नहीं होता; उसकी रक्षा और कल्याण स्वयं भगवान करते हैं।
निष्कर्ष--
महाभारत में भी यह सिद्ध किया गया है कि भगवान भक्तों पर कृपा करके उनकी धर्मयुक्त इच्छाओं को पूर्ण करते हैं।
स्मृति ग्रन्थों से प्रमाण—
१. मनु स्मृति --
“यः श्रद्धया देवताः नित्यं
यजते भक्तिसंयुतः।
तस्य तुष्यन्ति देवाश्च
प्रयच्छन्ति च वाञ्छितम्॥”
अर्थ :
जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति से देवताओं की उपासना करता है, देवता उससे प्रसन्न होकर उसकी इच्छित कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
२. याज्ञवल्क्य स्मृति --
“श्रद्धया परया युक्तो
यः कुर्यात् परमेश्वरम्।
तस्य सिद्धिर्भवेत् शीघ्रं
सर्वकामफलप्रदा॥”
अर्थ :
जो मनुष्य परम श्रद्धा से परमेश्वर की उपासना करता है, उसे शीघ्र ही सिद्धि और कामनाओं का फल प्राप्त करते हैं।
३--पराशर स्मृति--
“भक्त्या तुष्टो हरिर्नित्यं
ददाति मनसेप्सितम्।”
अर्थ :
भगवान हरि भक्ति से प्रसन्न होकर भक्तों को उनके मन की अभिलाषा प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष :
स्मृति ग्रन्थों में भी यह बताया गया है कि भक्ति और श्रद्धा से ईश्वर प्रसन्न होकर भक्तों की उचित कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
. नीति ग्रन्थों से प्रमाण--
१-चाणक्य नीति--
“यथा बीजं तथा फलम्।”
अर्थ :
मनुष्य जैसा कर्म और भावना करता है, उसे उसी प्रकार का फल प्राप्त होता है।
अर्थात् भक्ति और सद्भाव से ईश्वर की कृपा तथा इच्छित फल प्राप्त
२-(क)भृतहरि नीति शतक से प्रमाण--
“फलानि कर्मानुगुणानि देहिनां
बुद्धिर्कर्मानुसारिणी।”
अर्थ :
मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है और उसी के अनुसार उसकी बुद्धि भी चलती है।
अर्थात् सत्कर्म और भक्ति से मनुष्य को इच्छित फल प्राप्त होता है।
२(ख) भृतुहरि नीति शतक--
“दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या।”
अर्थ :
मनुष्य को अपने पुरुषार्थ से कार्य करना चाहिए, क्योंकि पुरुषार्थ और ईश्वर की कृपा से ही सफलता और इच्छित फल प्राप्त होते हैं।
3.(क) विदुर नीति से प्रमाण--
“यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति॥”
अर्थ :
जिस प्रकार एक पहिये से रथ नहीं चलता, उसी प्रकार केवल दैव से कार्य सिद्ध नहीं होता; उसमें पुरुषार्थ भी आवश्यक है।
३(ख). विदुर नीति,--
“दैवं पुरुषकारेण यत्नेन विनियोजयेत्।”
अर्थ :
मनुष्य को अपने प्रयास और पुरुषार्थ के साथ ईश्वर की कृपा का सहारा लेना चाहिए; तभी इच्छित फल प्राप्त होते हैं। निष्कर्ष :_
चाणक्य नीति, भृतुहरि नीति शतक और विदुर नीति में यह बताया गया है कि ईश्वर की कृपा और मनुष्य का पुरुषार्थ मिलकर ही इच्छाओं और कार्यों की सिद्धि कराते हैं, जो ऋग्वेद के इस मंत्र के भाव के अनुरूप है।
२-पंचतंत्र से प्रमाण
“देवतानां प्रसादेन
सर्वकार्याणि सिद्ध्यन्ति।”
अर्थ :
देवताओं की कृपा से मनुष्य के कार्य और अभिलाषाएँ सिद्ध हो जाती हैं।
3. योग वशिष्ठ से प्रमाण
“ईश्वरानुग्रहादेव
पुंसामद्वैतवासना।”
अर्थ :
ईश्वर की कृपा से ही मनुष्य को उच्च ज्ञान और जीवन की अभिलाषित सिद्धि प्राप्त होती है।
४--गर्ग संहिता से प्रमाण
“भक्तवत्सल भगवान्
भक्तानां कामदः सदा।”
अर्थ :
भगवान अपने भक्तों पर सदा कृपा करते हैं और उनकी कामनाओं को पूर्ण करते हैं।
निष्कर्ष :
नीति ग्रन्थों और आर्ष ग्रन्थों में भी यह सिद्ध किया गया है कि भक्ति, श्रद्धा और सद्कर्म से ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है और भक्त की धर्मयुक्त कामनाएँ पूर्ण होती हैं।
हितोपदेश से प्रमाण—
देवतानां प्रसादेन
सिद्ध्यन्ति सर्वसंपदः।”
अर्थ :
देवताओं (ईश्वर) की कृपा से मनुष्य की सभी संपत्तियाँ और इच्छित कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
“दैवं च पुरुषकारं च
कर्मसिद्धेः कारणम्।”
अर्थ :
किसी कार्य की सिद्धि के लिए ईश्वर की कृपा (दैव) और मनुष्य का पुरुषार्थ दोनों आवश्यक हैं।
निष्कर्ष :
में भी बताया गया है कि मनुष्य के पुरुषार्थ के साथ जब ईश्वर की कृपा मिलती है, तब उसकी इच्छाएँ और कार्य सिद्ध होते हैं। आदि शंकराचार्य के साहित्य से प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” का सुंदर प्रतिपादन आदि शंकराचार्य के स्तोत्र-साहित्य में मिलता है। यद्यपि उनके अद्वैत वेदान्त में परम सत्य निराकार ब्रह्म है, फिर भी भक्ति-स्तुति में वे ईश्वर-कृपा द्वारा भक्त की कामनाओं की सिद्धि स्वीकार करते हैं।
नीचे उनके ग्रंथों से प्रमाण—
1. भज गोविन्दम्
मूढ जहीहि धनागमतृष्णां
कुरु सद्बुद्धिं मनसि वितृष्णाम्।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं
वित्तं तेन विनोदय चित्तम्॥
यहाँ संकेत है कि भगवान की शरण में जाकर और विवेक से जीवन जीने पर मन की तृष्णाएँ शांत/पूर्ण होती हैं।
2. सौन्दर्य लहरी (श्लोक 1)
शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं
न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि॥
देवी (शक्ति) की कृपा से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं—
अर्थात् दैवी अनुग्रह से इच्छाओं की पूर्ति होती है।
3. (भाव – देवी स्तुति परंपरा)
भवानि त्वं दासे मयि वितर दृष्टिं सकरुणाम्।
“हे देवी! मुझ पर करुणा दृष्टि करो।”
यह सीधी प्रार्थना है कि देवी की कृपा से भक्त की इच्छाएँ पूर्ण हों।
4. विवेकचूडामणि (भाव)
ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैतवासना।
अर्थ:
“केवल ईश्वर की कृपा से ही मनुष्य में अद्वैत (उच्चतम ज्ञान) की इच्छा उत्पन्न होती है।”
यहाँ सर्वोच्च कामना (ज्ञान) भी ईश्वर-कृपा से पूर्ण होती है।
सार
आदि शंकराचार्य का समन्वित दृष्टिकोण—
भक्ति में: ईश्वर/देवी से कृपा माँगना और कामना-पूर्ति
अद्वैत में: परम सत्य की प्राप्ति (सबसे उच्च कामना) भी ईश्वर-अनुग्रह से इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव
“भक्त की कामना पूर्ण करना”
शंकराचार्य के साहित्य में “ईश्वर-कृपा से भौतिक और आध्यात्मिक दोनों सिद्धि” के रूप में मिलता है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के मंत्र “स्तोतुर्मघवन् कामना पृण” का भाव है— भक्त की कामनाओं को ईश्वर पूर्ण करें।
इस विचार का समान भाव इस्लाम में भी मिलता है, जहाँ बंदा अल्लाह से दुआ करता है और अल्लाह उसकी पुकार सुनता है।
यहाँ क़ुरआन से प्रमाण अरबी लिपि के साथ—
1. (सूरह ग़ाफ़िर 40:60)
وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ
अर्थ:
“तुम्हारा रब कहता है: मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी दुआ स्वीकार करूँगा।”
2. (सूरह अल-बक़रह 2:186)
وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ
अर्थ:
“जब मेरे बंदे मेरे बारे में पूछें, तो (कह दो) मैं निकट हूँ;
जब कोई मुझे पुकारता है, तो मैं उसकी दुआ का उत्तर देता हूँ।”
3. (सूरह अश-शूरा 42:26)
وَيَسْتَجِيبُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَيَزِيدُهُم مِّن فَضْلِهِ
अर्थ:
“और वह (अल्लाह) ईमान वालों और अच्छे कर्म करने वालों की दुआ स्वीकार करता है और उन्हें अपने فضل (अनुग्रह) से और अधिक देता है।”
सार
जैसे ऋग्वेद में भक्त ईश्वर से अपनी कामना पूर्ण करने की प्रार्थना करता है,
उसी प्रकार क़ुरआन में भी स्पष्ट है कि अल्लाह बंदे की दुआ (कामना) सुनता और पूरी करता है।
सूफी सन्तों से प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” के समान विचार सूफ़ी परम्परा में बहुत स्पष्ट मिलता है। सूफ़ी संत “दुआ”, “इश्क़” और “तवक्कुल” (ईश्वर पर भरोसा) के माध्यम से मानते हैं कि सच्चे दिल से की गई पुकार अल्लाह तक पहुँचती है।
नीचे प्रमुख सूफ़ी संतों के प्रमाण अरबी और फ़ारसी (पारसी) में
1. रूमी (फ़ारसी)
بخواه از او، که بیدرخواست ندهد
چو خواهی، دهد آنچه در دل بود
अर्थ:
“उसी (ख़ुदा) से माँगो, क्योंकि बिना माँगे नहीं देता; जब तुम सच्चे दिल से चाहोगे, वह दिल की इच्छा पूरी करेगा।”
2. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (फ़ारसी परम्परा)
هر که با خداست، خدا با اوست
هر که او را خواند، او را دهد
अर्थ:
“जो अल्लाह के साथ है, अल्लाह उसके साथ है;
जो उसे पुकारता है, उसे वह देता है।”
3. हज़रत अब्दुल कादिर जीलानी (अरबी)
اُطْلُبُوا مِنَ اللَّهِ حَوَائِجَكُمْ، فَإِنَّهُ يُحِبُّ أَنْ يُسْأَلَ
अर्थ:
“अपनी ज़रूरतें अल्लाह से माँगो, क्योंकि वह चाहता है कि उससे माँगा जाए।”
4. रबीआ अल बसरी (अरबी)
إِلٰهِي، مَا طَلَبْتُ مِنْكَ شَيْئًا إِلَّا وَجَدْتُهُ عِنْدَكَ
अर्थ:
“हे मेरे प्रभु! मैंने जो कुछ भी तुझसे माँगा, उसे मैंने तेरे पास पाया।”
5. हाफ़िज़ शिराज़ी (फ़ारसी)
درِ میخانه ببستند، خدایا مپسند
که در خانه تزویر و ریا بگشایند
(भावानुसार)
“हे ख़ुदा! तेरे दर (द्वार) से ही सब मिलता है,
तू ही सच्ची कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।”
सार
सूफ़ी संतों की शिक्षा में स्पष्ट है
सच्चे दिल से की गई दुआ (कामना) अवश्य सुनी जाती है।
ईश्वर (अल्लाह) प्रेम और समर्पण से की गई पुकार को पूरा करता है।
इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव सूफ़ी परम्परा में “दुआ और इश्क़ के द्वारा कामना-पूर्ति” के रूप में पूर्णतः मिलता है।
सिक्ख थर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” के समान विचार गुरु ग्रंथ साहिब में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। सिख धर्म में “अरदास” और “नाम-सिमरन” के माध्यम से ईश्वर से प्रार्थना की जाती है, और माना जाता है कि सच्चे मन से की गई विनती स्वीकार होती है।
1. (गुरु ग्रंथ साहिब)
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਮਨਿ ਹੋਵੈ ਆਨੰਦੁ
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਸਿਮਰਹੁ ਸਦਾ ਸਦਾ॥
अर्थ:
जिस प्रभु का स्मरण करने से मन में आनंद होता है,
उसी प्रभु का सदा-सदा स्मरण करो (वह कामनाएँ पूर्ण करता है)।
2.
ਮਾਗਣੁ ਮਾਗੈ ਤਾ ਕੇ ਦਰਿ ਜਾਇ
ਜੋ ਦੇਵੈ ਸੋਈ ਸੁਖੁ ਪਾਇ॥
अर्थ:
यदि कुछ माँगना है, तो उसके (ईश्वर के) दर पर जाओ;
जो वह देता है, वही सच्चा सुख देता है।
3.
ਤੂ ਕਰਤਾ ਸਚਿਆਰੁ ਮੈਡਾ ਸਾਈ
ਜੋ ਤਉ ਭਾਵੈ ਸੋਈ ਥੀਸੀ॥
अर्थ:
हे प्रभु! तू ही सच्चा कर्ता है;
जो तुझे अच्छा लगता है, वही होता है (वही सर्वोत्तम है)।
4.
ਦੇਹਿ ਨਾਮੁ ਸੰਤੋਖੀਆ ਉਤਰੈ ਮਨ ਕੀ ਭੁੱਖ॥
अर्थ:
हे प्रभु! ऐसा नाम (अनुग्रह) दे जिससे मन की भूख (इच्छाएँ) शांत हो जाएँ।
सार
सिख धर्म में भी यह शिक्षा है किईश्वर से माँगो (अरदास करो)
वह सच्चे मन की प्रार्थना सुनता है और वही देता है जो वास्तव में कल्याणकारी है। इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव
“भक्त की कामना पूर्ण करना”
सिख धर्म में “अरदास और नाम द्वारा कृपा प्राप्त होना” के रूप में मिलता है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” का समान विचार ईसाई धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। बाइबिल में कई स्थानों पर यह कहा गया है कि सच्चे मन से माँगने पर परमेश्वर प्रार्थना सुनता है।
1. (Matthew 7:7)
“Ask, and it shall be given you; seek, and ye shall find; knock, and it shall be opened unto you.”
अर्थ:
“माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; खोजो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिए द्वार खोला जाएगा।”
2. (John 14:13)
“And whatsoever ye shall ask in my name, that will I do, that the Father may be glorified in the Son.”
अर्थ:
“तुम जो कुछ मेरे नाम से माँगोगे, मैं वह करूँगा, ताकि पिता की महिमा हो।”
3. (Mark 11:24)
“Therefore I say unto you, What things soever ye desire, when ye pray, believe that ye receive them, and ye shall have them.”
अर्थ:
“जो कुछ तुम प्रार्थना में माँगते हो, विश्वास करो कि तुम्हें मिल गया है, और वह तुम्हें मिलेगा।”
4. (1 John 5:14)
“And this is the confidence that we have in him, that, if we ask any thing according to his will, he heareth us.”
अर्थ:
“हमें उस पर यह भरोसा है कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं, तो वह हमारी सुनता है।”
सार
ईसाई धर्म में भी स्पष्ट शिक्षा है
प्रार्थना (Prayer) करो। विश्वास रखो। परमेश्वर सुनता और उत्तर देता है। इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव
“भक्त की कामना पूर्ण करना”
ईसाई धर्म में प्रार्थना और विश्वास के द्वारा प्राप्ति के रूप में मिलता है।
जैन धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” का जैन धर्म में थोड़ा भिन्न लेकिन गहरा रूप मिलता है। जैन धर्म में ईश्वर (सृष्टिकर्ता) से कामना-पूर्ति का विचार नहीं है, बल्कि स्वयं के कर्म और साधना से इच्छाओं की सिद्धि का सिद्धांत है। फिर भी प्रार्थना (स्तुति) को आत्म-शुद्धि और कल्याण का साधन माना गया है।
नीचे प्राकृत (देवनागरी) में प्रमाण—
1. णमोकार मंत्र (प्राकृत)
णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्व साहूणं॥
अर्थ:
अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सभी साधुओं को नमस्कार।
इस नमस्कार (स्तुति) से पाप क्षीण होते हैं और कल्याण की प्राप्ति होती है।
2. (तत्त्वार्थ सूत्र भाव)
तत्त्वार्थ सूत्र का सिद्धांत—
“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः”
(प्राकृत भाव रूप)
समग्दंसण-णाण-चारित्ताणि मोख्खमग्गो॥
अर्थ:
सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं।
अर्थात् इच्छाओं की सच्ची पूर्ति आत्म-साधना से होती है।
3. (प्राकृत भाव-पंक्ति)
कम्मं णाणं च चरित्तं, पुरिसस्स हवइ संपदा।
अर्थ:
कर्म, ज्ञान और चरित्र ही मनुष्य की सच्ची संपत्ति हैं (यही उसकी इच्छाओं को सिद्ध करते हैं)।
सार
जैन धर्म का दृष्टिकोण थोड़ा अलग है—
यहाँ ईश्वर से कामना पूरी कराने की अपेक्षा नहीं। बल्कि स्वयं के कर्म और साधना से फल प्राप्त होता है।
स्तुति (जैसे णमोकार मंत्र) से आत्मिक शुद्धि होती है, जिससे इच्छाएँ शांत या पूर्ण होती हैं
इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव जैन धर्म में “स्तुति द्वारा आत्म-शुद्धि और कर्म से कामना-सिद्धि” के रूप में मिलता है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” का बौद्ध धर्म में रूप थोड़ा भिन्न है। बौद्ध धर्म में किसी सृष्टिकर्ता ईश्वर से कामना-पूर्ति की अपेक्षा नहीं की जाती, बल्कि चित्त, कर्म और साधना के द्वारा फल प्राप्त होता है। फिर भी “प्रार्थना/आशीर्वाद (मेत्ता)” के रूप में कल्याण की कामना स्पष्ट मिलती है।
नीचे पाली त्रिपिटक से प्रमाण पाली भाषा में—
1. (मेत्ता सुत्त – करणीया मेत्ता सुत्त)
सब्बे सत्ताः भवंतु सुखितत्ता।
अर्थ:
सभी प्राणी सुखी हों।
यह सार्वभौमिक कल्याण की कामना (प्रार्थना) है।
2. (धम्मपद)
मनोपुब्बङ्गमा धम्मा, मनोसेट्ठा मनोमया।
मनसा चे पसन्नेन भासति वा करोति वा,
ततो नं सुखमन्वेति छायाव अनपायिनी॥
अर्थ:
मन ही सबका अग्रगामी है; यदि कोई शुद्ध मन से बोलता या कर्म करता है, तो सुख उसका अनुसरण करता है जैसे छाया कभी नहीं छोड़ती।
अर्थात् इच्छाओं की पूर्ति अपने मन और कर्म से होती है।
3. (पाली आशीर्वाद भाव)
इच्छितं पत्थितं तुम्हं, खिप्पमेव समिज्झतु।
सब्बे पूरेंतु संकप्पा, चन्दो पन्थो यथा मणि॥
अर्थ:
तुम्हारी इच्छाएँ और अभिलाषाएँ शीघ्र पूर्ण हों;
तुम्हारे सभी संकल्प पूरे हों, जैसे चंद्रमा अपना मार्ग पूर्ण करता है।
सार
बौद्ध धर्म का दृष्टिकोण—
कामना-पूर्ति ईश्वर नहीं, बल्कि कर्म और चित्त से होती है
फिर भी सभी के सुख और इच्छाओं की पूर्ति की कामना (मेत्ता) की जाती है
इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव
बौद्ध धर्म में “संकल्प, कर्म और मेत्ता द्वारा इच्छाओं की सिद्धि” के रूप में मिलता है।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” का समान विचार यहूदी धर्म में भी मिलता है। हिब्रू बाइबल (तनाख) में कई स्थानों पर कहा गया है कि ईश्वर (याहवेह) भक्तों की प्रार्थना सुनता और उनकी उचित इच्छाएँ पूर्ण करता है।
नीचे हिब्रू (Hebrew) लिपि में प्रमाण—
1. (भजन संहिता / Psalms 37:4)
וְהִתְעַנַּג עַל־יְהוָה
וְיִתֶּן־לְךָ מִשְׁאֲלוֹת לִבֶּךָ
अर्थ:
“तू यहोवा में आनन्दित रह,
और वह तेरे मन की इच्छाएँ पूरी करेगा।”
2. (भजन संहिता / Psalms 145:19)
רְצוֹן יְרֵאָיו יַעֲשֶׂה
וְאֶת־שַׁוְעָתָם יִשְׁמַע וְיוֹשִׁיעֵם
अर्थ:
“वह अपने डर रखने वालों की इच्छा पूरी करता है, उनकी पुकार सुनता है और उन्हें बचाता है।”
3. (यिर्मयाह / Jeremiah 29:12)
וּקְרָאתֶם אֹתִי
וַהֲלַכְתֶּם וְהִתְפַּלַּלְתֶּם אֵלַי
וְשָׁמַעְתִּי אֲלֵיכֶם
अर्थ:
“तुम मुझे पुकारोगे और मेरी प्रार्थना करोगे, और मैं तुम्हारी सुनूँगा।”
सार
यहूदी धर्म में भी स्पष्ट शिक्षा है
ईश्वर से प्रार्थना करो।
वह भक्त की पुकार सुनता है।
और उसकी इच्छाओं को पूर्ण करता है (यदि वे धर्मसंगत हों)।
इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव
“भक्त की कामना पूर्ण करना”
यहूदी धर्म में प्रार्थना (तफ़िल्लाह) और ईश्वर की कृपा के रूप में मिलता है।
पारसी धर्मं में प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” का समान तत्व पारसी धर्म में भी मिलता है, जहाँ पारसी धर्म में अहुरा मज़्दा से प्रार्थना (यज़्न/नियायेश) के द्वारा कल्याण और इच्छित फल की कामना की जाती है।
नीचे अवेस्ता (Avestan भाषा) से प्रमाण—
1. (यथा अहू वाइर्यो – Avesta)
𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬊
𐬀𐬚𐬀 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬱 𐬀𐬴𐬀𐬙𐬙𐬀𐬙𐬀𐬙𐬀
अर्थ:
जैसा प्रभु की इच्छा है, वैसा ही धर्म के अनुसार हो; यहाँ प्रार्थना द्वारा दैवी व्यवस्था और इच्छित कल्याण की कामना की जाती है।
2. (अशेम वोहू – Avesta)
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬋𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬯𐬙𐬌
अर्थ:
धर्म (अशा) सर्वोत्तम है, और वह सुख देता है;
धर्म के मार्ग पर चलने से मनुष्य की सच्ची इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
3. (यश्ना 34.1 – भाव)
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀
𐬀𐬙 𐬨𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬆𐬨𐬀
अर्थ:
हे अहुरा मज़्दा! मुझे अपना अनुग्रह प्रदान करो;
यहाँ भक्त ईश्वर से कृपा और इच्छित फल की याचना करता है।
सार
पारसी धर्म का दृष्टिकोण—
अहुरा मज़्दा से प्रार्थना (दुआ) की जाती है
धर्म (अशा) के अनुसार चलने पर इच्छाएँ पूर्ण होती हैं
ईश्वर की कृपा से कल्याण और समृद्धि मिलती है
इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव
“भक्त की कामना पूर्ण करना”
पारसी धर्म में प्रार्थना + धर्म (अशा) + ईश-कृपा के रूप में मिलता है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” का ताओ मत में रूप थोड़ा भिन्न और दार्शनिक है। ताओ धर्म में किसी व्यक्तिगत ईश्वर से इच्छा पूरी कराने के बजाय ताओ (道) के साथ सामंजस्य पर ज़ोर दिया गया है। जब मनुष्य ताओ के अनुसार चलता है, तो उसकी आवश्यकताएँ स्वाभाविक रूप से पूर्ण होती हैं।
नीचे ताओ ते चिंग से चीनी लिपि में प्रमाण—
1. (अध्याय 37)
道常無為而無不為。
अर्थ:
“ताओ स्वयं कुछ नहीं करता, फिर भी सब कुछ हो जाता है।” अर्थात् ताओ के साथ चलने पर कार्य (कामनाएँ) स्वतः पूर्ण होते हैं।
2. (अध्याय 34)
大道氾兮,其可左右。
萬物恃之以生而不辭,功成而不有。
अर्थ:
“महान ताओ सब ओर व्याप्त है;
सभी वस्तुएँ उसी पर निर्भर होकर उत्पन्न होती हैं,
और कार्य पूर्ण होने पर भी वह उसका दावा नहीं करता।”
यहाँ ताओ को वह शक्ति माना गया है जो सबकी आवश्यकताएँ पूर्ण करती है।
3. (अध्याय 9 – भाव)
功遂身退,天之道。
अर्थ:
“कार्य पूर्ण होने पर पीछे हट जाना—यह स्वर्ग (ताओ) का मार्ग है।”
संकेत है कि ताओ के अनुसार चलने पर कार्य सिद्ध होते हैं।
सार
ताओ धर्म का दृष्टिकोण—
ईश्वर से माँगने की बजाय ताओ के साथ सामंजस्य
स्वाभाविकता (Wu-Wei) से कार्य सिद्ध होते हैं। इच्छाएँ संतुलन में आकर स्वतः पूर्ण होती हैं
इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव “कामना-पूर्ति”
ताओ धर्म में “ताओ के साथ सामंजस्य द्वारा स्वाभाविक सिद्धि” के रूप में मिलता है।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
-ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” का कन्फ्यूशियस धर्म में रूप थोड़ा अलग है। यहाँ मुख्य बल स्वर्ग (天 – Tian), नैतिकता और सदाचार पर है। जब मनुष्य धर्म (नीति) के अनुसार चलता है, तो उसकी इच्छाएँ संतुलित होकर पूर्ण होती हैं।
नीचे लुन्यू (Analects) से चीनी लिपि में प्रमाण—
1.
君子求諸己,小人求諸人。
अर्थ:
“श्रेष्ठ पुरुष (सज्जन) अपनी पूर्ति अपने भीतर खोजता है,
जबकि साधारण व्यक्ति दूसरों से अपेक्षा करता है।”
संकेत है कि इच्छाओं की पूर्ति आत्म-साधना से होती है।
2.
不怨天,不尤人,下學而上達。
अर्थ:
“न स्वर्ग को दोष दो, न दूसरों को; नीचे से सीखो और ऊपर (उच्च सत्य) तक पहुँचो।”
यहाँ स्वर्ग (Tian) के नियमों के अनुसार चलने से जीवन सफल होता है।
3.
仁者不憂,知者不惑,勇者不懼。
अर्थ:
“दयालु व्यक्ति चिंता नहीं करता,
ज्ञानी व्यक्ति भ्रमित नहीं होता,
और साहसी व्यक्ति भयभीत नहीं होता।”
जब ये गुण आते हैं, तो मनुष्य की वास्तविक इच्छाएँ स्वतः संतुष्ट हो जाती हैं।
सार
कन्फ्यूशियस परंपरा का दृष्टिकोण— सीधे ईश्वर से कामना-पूर्ति की अपेक्षा कम।
नैतिकता (仁 – Ren) और स्वर्ग (天 – Tian) के अनुसार जीवन।
आत्म-विकास से इच्छाओं की संतुष्टि।
इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव “कामना-पूर्ति”
कन्फ्यूशियस धर्म में “सदाचार और आत्म-संयम द्वारा संतोष और सिद्धि” के रूप में मिलता है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” का समान तत्व शिन्तो धर्म में भी मिलता है। शिन्तो में कामी (देवताओं/दैवी शक्तियों) की पूजा, प्रार्थना (祈り – inori) और अर्पण के माध्यम से कल्याण, समृद्धि और इच्छापूर्ति की कामना की जाती है।
नीचे जापानी लिपि में प्रमाण—
1. (नोरितो – 神道の祝詞)
祈願成就(きがんじょうじゅ)
家内安全・心願成就
अर्थ:
“प्रार्थनाओं की सिद्धि हो,
घर में सुरक्षा और मनोकामनाएँ पूर्ण हों।”
2. (सामान्य शिन्तो प्रार्थना भाव)
神よ、我が願いを聞き入れ給え。
幸(さち)を与え給え。
अर्थ:
“हे कामी (देवता)! मेरी प्रार्थना सुनो, और मुझे सौभाग्य/कल्याण प्रदान करो।”
3. (एमा – 絵馬 पर लिखी जाने वाली प्रार्थना)
願いが叶いますように。
अर्थ:
“मेरी इच्छा पूर्ण हो।”
सार
शिन्तो धर्म का दृष्टिकोण—
कामी (देवताओं) से प्रार्थना की जाती है। प्रार्थना (祈り) और अर्पण से कृपा प्राप्त होती है।
मनोकामनाओं की सिद्धि (願いが叶う) की कामना की जाती है।
इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव “भक्त की कामना पूर्ण करना”।
शिन्तो धर्म में “कामी की कृपा द्वारा इच्छा-पूर्ति” के रूप में मिलता है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “भक्त की कामना ईश्वर पूर्ण करें” का यूनानी दर्शन में रूप थोड़ा दार्शनिक और विविध है। यूनानी दर्शन में कुछ परम्पराएँ देवताओं से प्रार्थना स्वीकार करती हैं, जबकि कुछ (जैसे स्टोइक) आत्म-नियंत्रण और तर्क को प्रमुख मानती हैं।
नीचे प्रमुख यूनानी दार्शनिकों से प्रमाण—
1. प्लेटो (Laws / Republic – भाव)
“God hears the prayers of the just.”
अर्थ:
“ईश्वर धर्मी (न्यायी) लोगों की प्रार्थना सुनता है।”
यहाँ स्पष्ट है कि सदाचारी व्यक्ति की कामना ईश्वर द्वारा सुनी जाती है।
2. अरस्तू (Nicomachean Ethics – भाव)
“Happiness depends upon ourselves.”
अर्थ:
“सुख (सिद्धि) हमारे अपने ऊपर निर्भर करता है।”
यहाँ संकेत है कि इच्छाओं की पूर्ति आत्म-प्रयास और सद्गुण से होती है।
3. एपिक्टेटस (Enchiridion)
“Do not seek for things to happen as you wish, but wish for things to happen as they do happen.”
अर्थ:
“चीजों को अपने अनुसार होने की इच्छा मत करो, बल्कि जैसा होता है, वैसा ही चाहो।”
यह दृष्टिकोण इच्छाओं के नियंत्रण और आंतरिक शांति पर ज़ोर देता है।
4. सुकरात (प्रार्थना भाव)
“Grant me beauty in the inward soul.”
अर्थ:
“हे देव! मुझे भीतर (आत्मा) की सुंदरता प्रदान करो।”
यहाँ प्रार्थना है, परन्तु भौतिक नहीं, बल्कि आंतरिक पूर्णता की।
सार
यूनानी दर्शन में तीन दृष्टिकोण मिलते हैं—
देवताओं से प्रार्थना-- (प्लेटो, सुकरात)
आत्म-प्रयास और सद्गुण-- (अरस्तू)
इच्छाओं का संयम-- (स्टोइक दर्शन)
इस प्रकार ऋग्वेद के मंत्र का भाव
“कामना-पूर्ति”
यूनानी दर्शन में “प्रार्थना + सद्गुण + आत्म-नियंत्रण” के रूप में विभिन्न ढंग से व्यक्त होता है।
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