ऋगुवेद सूक्ति--(३०)की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति- (३०) की व्याख्या
यह मन्त्र ऋग्वेद (मण्डल 7, सूक्त 32, मन्त्र 14) है। यह सूक्त मुख्यतः इन्द्र की स्तुति में है।
मन्त्र---
कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मर्त्यो दधर्षति।
(ऋग्वेद 7.32.14)
भावार्थ --आपके भक्त का कोई तिरस्कार नहीं कर सकता।
पदच्छेद--
कः । तम् । इन्द्र । त्वा-अवसुमान् । मर्त्यः । दधर्षति ॥
शब्दार्थ--
कः — कौन
तम् — उस (मनुष्य को)
इन्द्र — हे इन्द्र
त्वा-अवसुमान् — जो तेरी सहायता/अनुग्रह से सम्पन्न है
मर्त्यः — मनुष्य
दधर्षति — दबा सकता है, परास्त कर सकता है
भावार्थ--
हे इन्द्र(प्रभो) ! जो मनुष्य आपकी कृपा और सहायता से सम्पन्न है, उस मनुष्य का कोई भी मर्त्य (दुश्मन या विरोधी) कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता।
अर्थात — जिस पर परम शक्तिशाली दैवी शक्ति की कृपा होती है, उसका कोई तिरस्कार या पराजय नहीं कर सकता।
वेदों में प्रमाण--
1. ऋग्वेद प्रमाण--
मन्त्र:
न तस्य मायया चन रिपुरीशीत मर्त्यः।यो अग्नये ददाश हव्यदातये॥
— ऋग्वेद 1.99.1
भावार्थ--
जो मनुष्य ईश्वर (अग्नि) की उपासना करता है, उसका कोई शत्रु कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।
2. ऋग्वेद प्रमाण--
न तं हिन्वन्ति शत्रवो न देवा अमीवाः।
यो ब्रह्माणं ब्रह्मणा वावृधे॥
— ऋग्वेद 6.75.19
भावार्थ--
जो व्यक्ति ईश्वर और ब्रह्मविद्या का आश्रय लेता है, उसे शत्रु या विपत्तियाँ हानि नहीं पहुँचा सकतीं।
3. ऋग्वेद प्रमाण--
इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः कृण्वाना यज्ञं उतये।
स नो मघवा पुरुहूतः पुरुस्तुतो रक्षिता॥
— ऋग्वेद 1.9.1
भावार्थ--
हम इन्द्र (परम शक्ति) की उपासना करते हैं; वही हमारी रक्षा करने वाला है।
4. यजुर्वेद प्रमाण--
तेजोऽसि तेजो मयि धेहि।
वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि।
— यजुर्वेद 19.9
भावार्थ--
हे परमात्मा! तू तेजस्वरूप है, मुझे भी तेज प्रदान कर। तेरी शक्ति से मनुष्य शक्तिशाली और अजेय बनता है।
5. अथर्ववेद प्रमाण--
यस्य देवा उपासते तस्य नाशो न विद्यते।
भावार्थ--
जिसकी रक्षा और सहायता देव करते हैं, उसका विनाश नहीं होता।
निष्कर्ष:--
वेदों का सिद्धान्त है कि जो मनुष्य ईश्वर की उपासना, सत्य और धर्म में स्थित रहता है, उसका शत्रु कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।
उपनिषद से प्रमाण--
1. कठोपनिषद--
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो
न च प्रमादात् तपसो वाप्यलिङ्गात्।
एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वान्
तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम॥
— कठोपनिषद् 1.2.23
भावार्थ:
यह आत्मा (परमात्मा) निर्बल, प्रमादी या असंयमी को प्राप्त नहीं होता।
जो पुरुष श्रद्धा, तप और ज्ञान से इसका अनुसरण करता है, उसी को यह परमात्मा प्राप्त होता है और वह दिव्य स्थिति को प्राप्त होकर अजेय बन जाता है।
2. मुण्डक उपनिषद--
भिद्यते हृदयग्रन्थिः
छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि
तस्मिन् दृष्टे परावरे॥
— मुण्डक उपनिषद् 2.2.8
भावार्थ:
जब मनुष्य परमात्मा को जान लेता है तब उसके हृदय के बन्धन टूट जाते हैं, सभी संशय नष्ट हो जाते हैं और उसके कर्मों के बन्धन भी समाप्त हो जाते हैं।
अर्थात वह किसी भी भय या पराजय से ऊपर उठ जाता है।
3. तैत्तिरीय उपनिषद--
ब्रह्मविद् आप्नोति परम्।
— तैत्तिरीय उपनिषद् 2.1
भावार्थ:
जो ब्रह्म (परमात्मा) को जानता है वह परम स्थिति को प्राप्त करता है; ऐसी अवस्था में कोई उसे पराजित नहीं कर सकता।
4. श्वेताश्वतर उपनिषद--
यो देवं सर्वभूतेषु गूढं
सर्वव्यापिनमात्मानम्।
ज्ञात्वा धीराः अमृतत्वं
भजन्ते॥
श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.7
भावार्थ:
जो धीर पुरुष सर्वव्यापी परमात्मा को जान लेते हैं, वे अमृत (अविनाशी) स्थिति को प्राप्त होते हैं।
५. बृहदारण्यक उपनिषद
अभयं वै जनक प्राप्नोति य एवं वेद।
बृहदारण्यक उपनिषद् 4.2.4
भावार्थ:
जो मनुष्य परमात्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह पूर्ण निर्भयता को प्राप्त होता है। उसे किसी से भय नहीं रहता।
६- छान्दोग्य उपनिषद
तारति शोकम् आत्मवित्।
— छान्दोग्य उपनिषद् 7.1.3
भावार्थ:
जो आत्मा (परमात्मा) को जान लेता है, वह सभी शोकों और दुःखों से पार हो जाता है। अर्थात उसे संसार की विपत्तियाँ पराजित नहीं कर सकतीं।
७. ईशावास्य उपनिषद
मन्त्र:
यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोकः एकत्वमनुपश्यतः॥
— ईशावास्य उपनिषद् 7
भावार्थ:
जिस ज्ञानी को सब प्राणियों में एक ही परमात्मा दिखाई देता है, उसके लिए न मोह रहता है न शोक। वह पूर्ण शान्त और निर्भय हो जाता है।
८. श्वेताश्वतर उपनिषद
मन्त्र:
तमेव विदित्वा अतिमृत्युमेति
नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय॥
— श्वेताश्वतर उपनिषद् 3.8
भावार्थ:
उसी परमात्मा को जानकर मनुष्य मृत्यु और दुःख से पार हो जाता है; मुक्ति का दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
निष्कर्ष--:
उपनिषदों का स्पष्ट सिद्धान्त है कि जो परमात्मा को जानता या उसकी शरण में रहता है, वह निर्भय, शोक-रहित और अजेय हो जाता है। इसलिए उसका वास्तविक तिरस्कार या पराजय कोई नहीं कर सकता।
पुराणों से प्रमाण---
1. भागवत पुराण--
न मे भक्तः प्रणश्यति।
भावार्थ:
भगवान कहते हैं — मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
अर्थात ईश्वर अपने भक्त की रक्षा करते हैं।
2. विष्णु पुराण--
सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवान् वासुदेवं हरिम्।
तस्य नश्यन्ति पापानि न भयं विद्यते क्वचित्॥
भावार्थ:
जो मनुष्य सभी प्राणियों में भगवान को देखता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे कहीं भी भय नहीं रहता।
3. शिव पुराण--
शिवभक्तो हि लोकेऽस्मिन् न भयम् लभते क्वचित्।
शिवस्य कृपया नित्यं रक्षितो भवति ध्रुवम्॥
भावार्थ:
शिवभक्त को संसार में कहीं भी भय नहीं रहता, क्योंकि भगवान शिव की कृपा से वह सदा सुरक्षित रहता है।
4. पद्म पुराण--
यत्र भक्तो हरिर्नित्यं तत्र तिष्ठामि नारद।
भक्तरक्षा मम धर्मः।
भावार्थ:
भगवान कहते हैं — जहाँ मेरा भक्त होता है, वहाँ मैं स्वयं उपस्थित रहता हूँ और उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है।
५. स्कन्द पुराण--
न भयं विद्यते तस्य
यस्य भक्तिर्जनार्दने।
रक्षति तं सदा विष्णुः
भक्तवत्सल ईश्वरः॥
भावार्थ:
जिस मनुष्य की भगवान में भक्ति होती है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं रहता; भगवान स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।
६. गरुड़ पुराण--
हरिभक्तपरायणः
न तस्य विघ्नाः भवन्ति।
भावार्थ:
जो मनुष्य भगवान की भक्ति में लगा रहता है, उसके मार्ग में विघ्न और बाधाएँ टिक नहीं पातीं।
७. नारद पुराण--
भक्तानां रक्षणार्थाय
हरिः सर्वत्र गच्छति।
भावार्थ:
भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए हर स्थान पर उपस्थित रहते हैं।
८. मार्कण्डेय पुराण--
यत्र देवभक्तिर्भवति
तत्र जयः सदा ध्रुवः।
भावार्थ:
जहाँ ईश्वर की भक्ति होती है, वहाँ निश्चित रूप से विजय होती है।
निष्कर्ष:
पुराणों का भी यही सिद्धान्त है कि ईश्वर-भक्ति मनुष्य को निर्भय और सुरक्षित बनाती है; ईश्वर स्वयं भक्त की रक्षा करते हैं, इसलिए उसका अनिष्ट या तिरस्कार कोई नहीं कर सकता।
भगवद्गीता में प्रमाण-
1.भगवद्गीता-- 9.31
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥
भावार्थ:
हे अर्जुन! तू निश्चयपूर्वक घोषणा कर दे कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
अर्थात भगवान अपने भक्त की रक्षा अवश्य करते हैं।
2. भगवद्गीता-- 9.22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
भावार्थ:
जो भक्त अनन्य भाव से मेरी उपासना करते हैं, उनके योग (जो नहीं है उसे प्राप्त कराना) और क्षेम (जो है उसकी रक्षा करना) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
3. भगवद्गीता-- 12.6–7
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युंसंसारसागरात्॥
भावार्थ:
जो भक्त अपने सभी कर्म मुझे अर्पित करके मेरी उपासना करते हैं, मैं स्वयं उन्हें संसार रूपी मृत्यु-सागर से बचा लेता हूँ।
4. भगवद्गीता-- 18.66
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
भावार्थ:
सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सभी पापों और संकटों से मुक्त कर दूँगा, इसलिए शोक मत करो।
निष्कर्ष:
गीता का स्पष्ट सिद्धान्त है कि जो मनुष्य सच्चे भाव से भगवान की शरण में रहता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं; इसलिए उसका वास्तविक अनिष्ट कोई नहीं कर सकता।
1. महाभारत (वनपर्व)
न हि कल्याणकृत् कश्चिद्
दुर्गतिं तात गच्छति।
भावार्थ:
जो मनुष्य शुभ कर्म करता है और धर्म के मार्ग पर चलता है, वह कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
2. महाभारत (शान्तिपर्व)
धर्मो रक्षति रक्षितः
धर्मो हन्ति हतं नृणाम्।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो
मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
भावार्थ:
जो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थात धर्मात्मा या ईश्वर-भक्त का अनिष्ट नहीं होता।
3. महाभारत (भीष्मपर्व)
यतो धर्मस्ततो जयः।
भावार्थ:
जहाँ धर्म है, वहाँ निश्चित ही विजय होती है।
4. महाभारत (शान्तिपर्व)
न देवाः दण्डमादाय
रक्षन्ति पशुपालवत्।
यं तु रक्षितुमिच्छन्ति
बुद्ध्या संयोजयन्ति तम्॥
भावार्थ:
देवता किसी को डंडा लेकर नहीं बचाते; वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसे सही बुद्धि देकर उसकी रक्षा करते हैं।
निष्कर्ष:
महाभारत का भी यही सिद्धान्त है कि जो मनुष्य धर्म और ईश्वर की शरण में रहता है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म और दैवी शक्ति करती है; इसलिए उसका अनिष्ट कोई नहीं कर सकता।
स्मृतियों में “ईश्वर-भक्त या धर्माचरण करने वाले मनुष्य का अनिष्ट नहीं होता।”
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--
1. मनुस्मृति
धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो
मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
— मनुस्मृति 8.15
भावार्थ:
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है और धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता है। इसलिए धर्म को कभी नष्ट नहीं करना चाहिए।
2. याज्ञवल्क्य स्मृति--
धर्मेण पापमपनुदति
धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्।
भावार्थ:
धर्म के द्वारा पाप नष्ट हो जाते हैं और संसार की स्थिरता भी धर्म पर ही आधारित है; इसलिए धर्माचरण करने वाला सुरक्षित रहता है।
3. पाराशर स्मृति--
धर्मेणैव जगत्सर्वं
धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्।
धर्माद् न परमो लाभः॥
भावार्थ:
सारा संसार धर्म पर आधारित है; धर्म से बढ़कर कोई लाभ नहीं है। इसलिए धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति कल्याण को प्राप्त होता है।
4. अत्रि स्मृति--
धर्मशीलस्य लोकेऽस्मिन्
न कदाचित् पराभवः।
भावार्थ:
जो मनुष्य धर्मशील है, उसे संसार में कभी पराजय नहीं होती।
निष्कर्ष:
स्मृतियों का भी यही सिद्धान्त है कि धर्म और ईश्वर की शरण में रहने वाले मनुष्य की रक्षा स्वयं धर्म करता है; इसलिए उसका अनिष्ट या तिरस्कार कोई नहीं कर सकता।“धर्म या ईश्वर के आश्रित मनुष्य का अनिष्ट नहीं होता, अन्ततः उसकी ही विजय होती है”।
नीति-ग्रन्थों से प्रमाण--
1. हितोपदेश
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्
न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात्
एष धर्मः सनातनः॥
भावार्थ:--
मनुष्य को सत्य और धर्म का पालन करना चाहिए; जो धर्म का पालन करता है उसका कल्याण होता है।
2. पञ्चतंत्र---
धर्मो हि तेषामधिकः विशेषः
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।
भावार्थ:
धर्म ही मनुष्य की श्रेष्ठता का कारण है; धर्म के बिना मनुष्य पशु के समान हो जाता है।
अर्थात धर्म का पालन करने वाला व्यक्ति श्रेष्ठ और सुरक्षित रहता है।
3. चाणक्य नीति--
धर्मेण जयते लोकः
धर्मेण पापं नश्यति।
धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥
भावार्थ:
धर्म से ही संसार में विजय होती है, धर्म से पाप नष्ट होते हैं और सब कुछ धर्म पर ही आधारित है।
4. नीतिशतक--
सत्येन धार्यते पृथ्वी
सत्येन तपते रविः।
सत्येन वायवो वान्ति
सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
भावार्थ:--
सत्य और धर्म से ही संसार का संचालन होता है; इसलिए सत्यनिष्ठ और धर्मनिष्ठ व्यक्ति का अन्ततः कल्याण और विजय होती है।
निष्कर्ष:--
नीति-ग्रन्थों का भी यही सिद्धान्त है कि धर्म, सत्य और ईश्वर के मार्ग पर चलने वाले मनुष्य का अन्ततः कल्याण होता है; उसका वास्तविक अनिष्ट कोई नहीं कर सकता।
वाल्मीकि ओर अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
इस वैदिक भाव— “ईश्वर के भक्त का कोई तिरस्कार या पराभव नहीं कर सकता” — पर Valmiki Ramayana और Adhyatma Ramayana में अनेक प्रमाण मिलते हैं।
Valmiki Ramayana में प्रमाण
1. विभीषण की शरणागति
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥
— युद्धकाण्ड 18.33
भावार्थ
जो एक बार भी “मैं आपका हूँ” कहकर भगवान् राम की शरण में आता है, उसे वे सब प्राणियों से अभय देते हैं।
अर्थात् भगवान् के भक्त या शरणागत का कोई अनिष्ट नहीं कर सकता।
2. हनुमान का निर्भय भाव
न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत्।
— सुन्दरकाण्ड
भावार्थ
हनुमान कहते हैं कि हजार रावण भी युद्ध में उनका सामना नहीं कर सकते, क्योंकि वे श्रीराम के भक्त और दूत हैं।
यह भक्त की दैवी शक्ति और अपराजेयता को दर्शाता है।
3. रामभक्त की रक्षा
रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता।
— अयोध्याकाण्ड
भावार्थ
भगवान् राम धर्म और धर्मात्माओं के रक्षक हैं।
जो भगवान् के भक्त हैं, उनकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।
Adhyatma Ramayana में प्रमाण
1. भगवान् की शरण का महत्त्व
मद्भक्तानां विनाशो न कदाचिदपि जायते।
भावार्थ
मेरे भक्तों का कभी विनाश नहीं होता।
यह भाव सीधे ऋग्वेद मन्त्र के समान है कि भक्त का कोई तिरस्कार नहीं कर सकता।
2. राम का भक्त-रक्षण वचन
ये भजन्ति परां भक्त्या रामं सत्यपराक्रमम्।
न तेषां विद्यते भयम्॥
भावार्थ
जो लोग परम भक्ति से श्रीराम का भजन करते हैं, उन्हें किसी प्रकार का भय नहीं रहता।
3. शरणागत की रक्षा
रामनामप्रभावेण सर्वबाधा विनश्यति।
भावार्थ
रामनाम के प्रभाव से सभी बाधाएँ नष्ट हो जाती हैं; भक्त सुरक्षित रहता है।
इन सभी प्रमाणों में वही वैदिक सिद्धान्त प्रकट होता है कि ईश्वर-भक्त दैवी संरक्षण में रहता है और उसका वास्तविक पराभव नहीं होता।
“ईश्वर-भक्त या आत्मज्ञानी का अनिष्ट कोई नहीं कर सकता, वह निर्भय और अजेय हो जाता है”— यह सिद्धान्त योग वशिष्ठ में भी अनेक स्थानों पर मिलता है।
नीचे कुछ प्रमाण श्लोक अर्थ सहित दिए जा रहे हैं —
1. योग वशिष्ठ--
यस्य चित्तं समाधाने
स्थितं ब्रह्मणि निश्चलम्।
तं न बाधन्ति दुःखानि
सागरं सलिलानि इव॥
भावार्थ:
जिस मनुष्य का चित्त ब्रह्म (परमात्मा) में स्थिर हो जाता है, उसे दुःख और संकट प्रभावित नहीं कर सकते; जैसे विशाल समुद्र को छोटी तरंगें विचलित नहीं कर पातीं।
2. योग वशिष्ठ--
आत्मज्ञानसमायुक्तं
न शक्नुवन्ति बाधितुम्।
दुःखानि भोगसङ्घाश्च
दीपं तम इव क्षणात्॥
भावार्थ:
जो मनुष्य आत्मज्ञान से युक्त है, उसे दुःख और संकट बाधित नहीं कर सकते; जैसे दीपक के सामने अन्धकार टिक नहीं पाता।
3. योग वशिष्ठ--
श्लोक:
ब्रह्मभावे स्थितस्यास्य
न भयं विद्यते क्वचित्।
भावार्थ:
जो मनुष्य ब्रह्मभाव में स्थित हो जाता है, उसे कहीं भी किसी प्रकार का भय नहीं रहता।
निष्कर्ष:--
योग वशिष्ठ का सिद्धान्त भी यही है कि जो मनुष्य परमात्मा के ज्ञान या भक्ति में स्थित हो जाता है, वह निर्भय और अजेय हो जाता है; संसार की कोई शक्ति उसका वास्तविक अनिष्ट नहीं कर सकती।
इस्लाम धर्म में प्रमाण
— “ईश्वर के भक्त का कोई तिरस्कार/अपकार नहीं कर सकता” — के समान विचार इस्लाम में भी स्पष्ट रूप से मिलते हैं। क़ुरआन की कई आयतें यह बताती हैं कि जो अल्लाह पर ईमान रखता है, उसकी रक्षा स्वयं अल्लाह करता है।
नीचे अरबी लिपि के साथ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. (सूरह अल-इमरान 3:160)
إِن يَنصُرْكُمُ اللَّهُ فَلَا غَالِبَ لَكُمْ ۖ وَإِن يَخْذُلْكُمْ فَمَن ذَا الَّذِي يَنصُرُكُم مِّن بَعْدِهِ
भावार्थ:
यदि अल्लाह तुम्हारी सहायता करे, तो कोई भी तुम पर विजय नहीं पा सकता; और यदि वह तुम्हें छोड़ दे, तो फिर कौन है जो तुम्हारी सहायता करे?
2. (सूरह अल-तलाक 65:3)
وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُ
भावार्थ:
जो अल्लाह पर भरोसा करता है, उसके लिए वही (अल्लाह) पर्याप्त है।
3. (सूरह यूनुस 10:62)
أَلَا إِنَّ أَوْلِيَاءَ اللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
भावार्थ:
निश्चय ही अल्लाह के मित्रों (भक्तों) पर न कोई भय है और न वे शोक करते हैं।
4. (सूरह अल-बक़रह 2:257)
اللَّهُ وَلِيُّ الَّذِينَ آمَنُوا يُخْرِجُهُم مِّنَ الظُّلُمَاتِ إِلَى النُّورِ
भावार्थ:
अल्लाह ईमान वालों का संरक्षक है; वह उन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर निकालता है।
5. (सूरह अल-अहज़ाब 33:25)
وَكَفَى اللَّهُ الْمُؤْمِنِينَ الْقِتَالَ
भावार्थ:
और अल्लाह ने ईमान वालों के लिए युद्ध (हानि) को पर्याप्त रूप से रोक दिया (उनकी रक्षा की)।
निष्कर्ष:
इन सभी आयतों का सार यही है
जो व्यक्ति अल्लाह का सच्चा भक्त (मोमिन) है, उसकी रक्षा स्वयं अल्लाह करता है
कोई भी उसकी हानि या अपमान नहीं कर सकता, जब तक अल्लाह की इच्छा न हो।
यह भाव ऋग्वेद के दिए मन्त्र से पूरी तरह मेल रखता है
— “ईश्वर के भक्त का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता” — के समर्थन में क़ुरआन की और आयतें भी स्पष्ट प्रमाण देती हैं। नीचे कुछ अतिरिक्त आयतें अरबी लिपि के साथ प्रस्तुत हैं:
6. (सूरह अल-माइदा 5:11)
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اذْكُرُوا نِعْمَةَ اللَّهِ عَلَيْكُمْ إِذْ هَمَّ قَوْمٌ أَن يَبْسُطُوا إِلَيْكُمْ أَيْدِيَهُمْ فَكَفَّ أَيْدِيَهُمْ عَنكُمْ
भावार्थ:
हे ईमान वालों! अल्लाह के उस उपकार को याद करो जब एक समूह ने तुम पर हाथ बढ़ाना चाहा, तो उसने उनके हाथ तुमसे रोक दिए।
7. (सूरह हूद 11:57)
إِنَّ رَبِّي عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ حَفِيظٌ
भावार्थ:
निस्संदेह मेरा रब हर चीज़ का रक्षक है।
8. (सूरह अश-शूरा 42:31)
وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ
भावार्थ:
तुम पृथ्वी में (अल्लाह को) असमर्थ नहीं कर सकते, और अल्लाह के सिवा तुम्हारा न कोई संरक्षक है और न कोई सहायक।
9. (सूरह अल-फतह 48:10)
يَدُ اللَّهِ فَوْقَ أَيْدِيهِمْ
भावार्थ:
अल्लाह का हाथ (शक्ति) उनके हाथों के ऊपर है।
10. (सूरह अल-अन्कबूत 29:69)
وَالَّذِينَ جَاهَدُوا فِينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَا وَإِنَّ اللَّهَ لَمَعَ الْمُحْسِنِينَ
भावार्थ:
जो लोग हमारे मार्ग में प्रयत्न करते हैं, हम उन्हें अपने रास्ते अवश्य दिखाते हैं, और निस्संदेह अल्लाह अच्छे कर्म करने वालों के साथ है।
11. (सूरह मुहम्मद 47:7)
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن تَنصُرُوا اللَّهَ يَنصُرْكُمْ وَيُثَبِّتْ أَقْدَامَكُمْ
भावार्थ:
हे ईमान वालों! यदि तुम अल्लाह की सहायता करोगे, तो वह तुम्हारी सहायता करेगा और तुम्हें दृढ़ता प्रदान करेगा।
निष्कर्ष:
इन आयतों से वही सिद्धांत प्रकट होता है—
अल्लाह अपने सच्चे भक्तों का रक्षक और सहायक है
उनके विरुद्ध कोई भी शक्ति स्थायी रूप से सफल नहीं हो सकती।
इस प्रकार यह शिक्षा ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव से पूर्णतः सामंजस्य रखती है ।सूफ़ी सन्तों में प्रमाण--
— “ईश्वर के भक्त का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता” — के समर्थन में सूफ़ीवाद के संतों ने भी गहरे शब्दों में यही सत्य व्यक्त किया है। नीचे अरबी और फ़ारसी लिपि में सात से अधिक प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. जलालुद्दीन रूमी
फ़ारसी:
بندهٔ عشق شو که از هر دو جهان آزاد است
هر که در بند خدا شد ز همه آزاد است
भावार्थ:
जो ईश्वर का सच्चा भक्त बन जाता है, वह दोनों संसारों से मुक्त हो जाता है—कोई उसे बाँध नहीं सकता।
2. हाफ़िज़ शिराज़ी
फ़ारसी:
بر در میخانه رفتن کار یکرنگان بود
خودفروشان را به کوی میفروشان راه نیست
भावार्थ:
सच्चे भक्त ही ईश्वर के द्वार तक पहुँचते हैं; उनके मार्ग में कोई बाधा नहीं डाल सकता।
3. शेख़ अब्दुल क़ादिर जीलानी
अरबी:
كُنْ مَعَ اللَّهِ وَلَا تُبَالِ
भावार्थ:
अल्लाह के साथ हो जाओ, फिर किसी की परवाह मत करो (कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता)।
4. इब्न अता अल्लाह इस्कन्दरी
अरबी:
مَنْ وَجَدَ اللَّهَ فَمَاذَا فَقَدَ، وَمَنْ فَقَدَ اللَّهَ فَمَاذَا وَجَدَ
भावार्थ:
जिसने अल्लाह को पा लिया, उसने सब कुछ पा लिया—फिर उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
5. बायज़ीद बस्तामी
फ़ारसी/अरबी मिश्रित:
لو أن العرش وما حواه ألف ألف مرة في زاوية من زوايا قلب العارف ما أحس به
भावार्थ:
जिसके हृदय में ईश्वर का ज्ञान है, उसे कोई भी बाहरी शक्ति प्रभावित नहीं कर सकती।
6. शम्स तबरेज़ी
फ़ारसी:
آن کس که تو را شناخت جان را چه کند
فرزند و عیال و خانمان را چه کند
भावार्थ:
जिसने ईश्वर को पहचान लिया, उसे संसार की कोई भी चीज़ डिगा नहीं सकती।
7. सादी शिराज़ी
फ़ारसी:
توکل زنده کند مرد را در هر مقام
که هر که بر خدا تکیه کند، بیگزند است
भावार्थ:
जो व्यक्ति ईश्वर पर भरोसा करता है, वह हर स्थिति में सुरक्षित रहता है।
8. मंसूर हल्लाज
अरबी:
أنا من أهوى ومن أهوى أنا
भावार्थ:
मैं उसी (ईश्वर) में हूँ और वह मुझमें है—ऐसे भक्त को कोई अलग या नष्ट नहीं कर सकता।
निष्कर्ष:
इन सभी सूफ़ी संतों की वाणियों में एक ही गूढ़ सत्य है—
जो व्यक्ति ईश्वर (अल्लाह) में लीन हो जाता है, वह निर्भय और अजेय हो जाता है
कोई भी शक्ति उसके आत्मिक बल को नष्ट नहीं कर सकती
इस प्रकार सूफ़ी परंपरा भी ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव का समर्थन करती है।। सिक्ख धर्म में प्रमाण
— “ईश्वर के भक्त का कोई तिरस्कार या अपकार नहीं कर सकता” — का वही सिद्धान्त सिख धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। गुरु ग्रंथ साहिब में अनेक स्थानों पर यह कहा गया है कि जो व्यक्ति वाहेगुरु की शरण में है, उसकी रक्षा स्वयं प्रभु करते हैं।
नीचे गुरुमुखी लिपि के साथ प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1.ਜਾ ਕਉ ਰਾਖੈ ਸਾਈਆਂ ਮਾਰਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਇ ॥
भावार्थ:
जिसे स्वयं प्रभु (वाहेगुरु) बचाते हैं, उसे कोई मार या हानि नहीं पहुँचा सकता।
2. ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਵਹੁ ਸਗਲੇ ਦੂਖ ਵਿਨਾਸਿ ॥
भावार्थ:
ईश्वर का स्मरण करने से सुख प्राप्त होता है और सभी दुख नष्ट हो जाते हैं।
3.ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਗਰਭਿ ਨ ਬਸੈ ॥ ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਦੂਖੁ ਜਮੁ ਨਸੈ ॥
भावार्थ:
प्रभु के स्मरण से जन्म-मरण का चक्र और दुख दूर हो जाते हैं।
4. ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਰਿਦੈ ਨਿਤ ਧਿਆਵਹੁ ਤਾ ਦੁਖੁ ਲਾਗੈ ਨ ਕੋਇ ॥
भावार्थ:
जो व्यक्ति हृदय में प्रभु का नाम धारण करता है, उसे कोई दुख स्पर्श नहीं करता।
5. मेंਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਸਭਿ ਕਿਲਵਿਖ ਨਾਸਹਿ ਪਿਤਰੀ ਹੋਇ ਉਧਾਰੁ ॥
भावार्थ:
जिस प्रभु का स्मरण करने से सभी पाप नष्ट होते हैं और उद्धार होता है।
6.ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ਆਇਐ ਸਰਬ ਦੁਖਾ ਕਾ ਨਾਸੁ ॥
भावार्थ:
हे नानक! प्रभु की शरण में आने से सभी दुखों का नाश हो जाता है।
7.ਜਾ ਕੈ ਰਖਵਾਲੇ ਗੁਰ ਗੋਬਿੰਦ ਤਾ ਕਾ ਅੰਤੁ ਨ ਪਾਇਆ ॥
भावार्थ:
जिसका रक्षक स्वयं गुरु-प्रभु है, उसका कोई अंत या हानि नहीं कर सकता।
निष्कर्ष:
इन सभी वाणियों का सार यही है—
जो व्यक्ति परमात्मा (वाहेगुरु) की शरण में होता है, वह पूर्णतः सुरक्षित रहता है
कोई भी उसकी वास्तविक हानि नहीं कर सकता।
इस प्रकार गुरु ग्रंथ साहिब की शिक्षा भी ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव से पूरी तरह मेल खाती है।ईसाई धर्म में प्रमाण
— “ईश्वर के भक्त का कोई तिरस्कार या अपकार नहीं कर सकता” — का वही सिद्धान्त ईसाई धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। Bible (बाइबिल) में अनेक स्थानों पर यह कहा गया है कि जो व्यक्ति परमेश्वर की शरण में है, उसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं।
नीचे अंग्रेज़ी (English) में पाँच से अधिक प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. (Romans 8:31)
“If God is for us, who can be against us?”
भावार्थ:
यदि परमेश्वर हमारे पक्ष में है, तो कौन हमारे विरुद्ध हो सकता है?
2. (Psalm 118:6)
“The Lord is on my side; I will not fear: what can man do unto me?”
भावार्थ:
प्रभु मेरे साथ हैं, मुझे भय नहीं; मनुष्य मेरा क्या बिगाड़ सकता है?
3. (Isaiah 54:17)
“No weapon formed against you shall prosper.”
भावार्थ:
तुम्हारे विरुद्ध बनाया गया कोई भी हथियार सफल नहीं होगा।
4. (Psalm 121:7)
“The Lord shall preserve thee from all evil: he shall preserve thy soul.”
भावार्थ:
प्रभु तुम्हें हर बुराई से बचाएंगे; वह तुम्हारी आत्मा की रक्षा करेंगे।
5. (2 Thessalonians 3:3)
“But the Lord is faithful, who shall stablish you, and keep you from evil.”
भावार्थ:
प्रभु विश्वासयोग्य हैं; वह तुम्हें स्थिर करेंगे और बुराई से बचाएंगे।
6. (Proverbs 18:10)
“The name of the Lord is a strong tower: the righteous runneth into it, and is safe.”
भावार्थ:
प्रभु का नाम एक मजबूत किला है; धर्मी उसमें शरण लेकर सुरक्षित रहता है।
7. (John 10:28)
“Neither shall any man pluck them out of my hand.”
भावार्थ:
कोई भी उन्हें मेरे हाथ से छीन नहीं सकता।
निष्कर्ष:
इन सभी वचनों का सार यही है
जो व्यक्ति परमेश्वर की शरण में होता है, उसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं
कोई भी उसकी वास्तविक हानि नहीं कर सकता है।
इस प्रकार Bible की शिक्षा भी ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव से पूर्णतः मेल खाती है।
जैन धर्म में प्रमाण
— “ईश्वर (परम सत्य) के शरणागत का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता” — के समान सिद्धान्त जैन धर्म में भी मिलता है। जैन आगम और प्राकृत वाङ्मय में यह बताया गया है कि जो व्यक्ति सम्यक् श्रद्धा, धर्म और आत्म-शरण में रहता है, वह भय और दुःख से मुक्त हो जाता है।
नीचे प्राकृत (देवनागरी) लिपि में प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. (णमोकार मंत्र – मूल प्राकृत)
णमो अरिहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं॥
भावार्थ:
अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सभी साधुओं को नमस्कार—यह पंच परमेष्ठी की शरण ही सर्वोच्च सुरक्षा देती है।
2. (उत्तराध्ययन सूत्र)
धम्मो मंगल मुक्किट्ठं, अहिंसा संजमो तवो।
भावार्थ:
धर्म ही सर्वोत्तम मंगल है; अहिंसा, संयम और तप—ये साधक को सुरक्षित और उन्नत बनाते हैं।
3. (आचारांग सूत्र)
एगं णं णं पव्वज्झइ, सव्वभूएसु न हिंसइ।
भावार्थ:
जो साधक सभी प्राणियों में अहिंसा का पालन करता है, उसे कोई भय या हानि नहीं होती।
4. (तत्त्वार्थसूत्र – प्राकृत भाव)
सम्यग्दंसण-णाण-चारित्ताणि मोक्षमार्गो।
भावार्थ:
सम्यक दर्शन, ज्ञान और आचरण—ये मोक्ष का मार्ग हैं, जो आत्मा को सभी बंधनों और दुःखों से मुक्त करते हैं।
5. (दशवैकालिक सूत्र)
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
भावार्थ:
सभी जीवों की रक्षा करनी चाहिए—ऐसा आचरण करने वाला स्वयं भी सुरक्षित रहता है।
6. (समयसार – आचार्य कुंदकुंद)
अप्पा सो परमप्पा।
भावार्थ:
आत्मा ही परमात्मा है—जो आत्मस्वरूप में स्थित है, उसे कोई बाहरी शक्ति प्रभावित नहीं कर सकती।
7. (प्रवचनसार)
जो णं सरणं पव्वइ, सो णं दुक्खेहि मुच्चइ।
भावार्थ:
जो सच्ची शरण में आता है, वह सभी दुःखों से मुक्त हो जाता है।
निष्कर्ष:
इन सभी जैन प्राकृत वचनों का सार यही है—
जो व्यक्ति धर्म, अहिंसा और आत्म-शरण में स्थित है, वह निर्भय और सुरक्षित हो जाता है
उसका कोई वास्तविक अहित नहीं कर सकता।
इस प्रकार जैन आगम की शिक्षा भी ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव से सामंजस्य स्थापित करती है।बौद्ध धर्म में प्रमाण --
— “ईश्वर (या परम सत्य) के शरणागत का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता” — के समान सिद्धान्त बौद्ध धर्म में भी मिलता है। त्रिपिटक (पाली साहित्य) में यह बताया गया है कि जो व्यक्ति बुद्ध, धम्म और संघ की शरण में आता है, वह भय, दुःख और संकट से सुरक्षित हो जाता है।
नीचे पाली (देवनागरी) लिपि में प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. (त्रिशरण)
बुद्धं सरणं गच्छामि।
धम्मं सरणं गच्छामि।
सङ्घं सरणं गच्छामि॥
भावार्थ:
मैं बुद्ध, धम्म और संघ की शरण में जाता हूँ—यह शरण ही सर्वोच्च सुरक्षा और कल्याण का मार्ग है।
2. (धम्मपद 188–189)
बहुं वे सरणं यन्ति पब्बतानि वनानि च।
आरामरुक्खचेत्यानि मनुस्सा भयतज्जिता॥
नेतं खो सरणं खेमा, नेतं सरणमुत्तमं॥
भावार्थ:
भयभीत लोग पहाड़ों, वनों और मंदिरों में शरण लेते हैं, पर यह सुरक्षित शरण नहीं है; सच्ची शरण तो धम्म में है।
3. (धम्मपद 190–192)
यो च बुद्धं च धम्मं च सङ्घं च सरणं गतो।
चत्तारि अरियसच्चानि सम्मप्पञ्ञाय पस्सति॥
भावार्थ:
जो बुद्ध, धम्म और संघ की शरण में जाता है और चार आर्य सत्य को समझता है, वह वास्तविक सुरक्षा और मुक्ति प्राप्त करता है।
4. (धम्मपद 160)
अत्ताहि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया॥
भावार्थ:
मनुष्य स्वयं ही अपना रक्षक है; जो अपने धर्म में स्थित है, उसे कोई बाहरी शक्ति हानि नहीं पहुँचा सकती।
5. (सुत्तनिपात)
धम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं॥
भावार्थ:
धर्म आचरण करने वाले की रक्षा करता है।
6. (संयुक्त निकाय)
यो धम्मं पश्यति सो मां पश्यति॥
भावार्थ:
जो धम्म को देखता (समझता) है, वह बुद्ध को देखता है—अर्थात् वह सत्य में स्थित होकर सुरक्षित होता है।
7. (इति-वुत्तक)
धम्मचारी सुखं सेति अस्मिं लोके परस्मिं च॥
भावार्थ:
धर्म का आचरण करने वाला इस लोक और परलोक दोनों में सुखी और सुरक्षित रहता है।
निष्कर्ष:
इन सभी पाली वचनों का सार यही है—
जो व्यक्ति बुद्ध, धम्म और संघ की शरण में आता है, वह भय और दुःख से मुक्त हो जाता है
धर्म स्वयं उसके लिए सुरक्षा और कल्याण का कारण बनता है।
इस प्रकार त्रिपिटक की शिक्षा भी ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव से सामंजस्य रखती है। यहूदी धर्म में प्रमाण --
— “ईश्वर के शरणागत का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता” — के समान सिद्धान्त यहूदी धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। तनाख (हिब्रू बाइबिल) में अनेक स्थानों पर यह कहा गया है कि जो व्यक्ति परमेश्वर (YHWH) पर भरोसा करता है, उसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करते हैं।
नीचे हिब्रू (Hebrew) लिपि के साथ पाँच से अधिक प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. (תהילים / Psalm 27:1)
יְהוָה אוֹרִי וְיִשְׁעִי מִמִּי אִירָא יְהוָה מָעוֹז־חַיַּי מִמִּי אֶפְחָד׃
भावार्थ:
यहोवा मेरा प्रकाश और उद्धार है—मुझे किससे डरना चाहिए? वह मेरे जीवन का बल है—मैं किससे भय करूँ?
2. (תהילים / Psalm 118:6)
יְהוָה לִי לֹא אִירָא מַה־יַּעֲשֶׂה לִי אָדָם׃
भावार्थ:
यहोवा मेरे साथ है, मैं नहीं डरूँगा; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?
3. (ישעיהו / Isaiah 41:10)
אַל־תִּירָא כִּי עִמְּךָ־אָנִי אַל־תִּשְׁתָּע כִּי־אֲנִי אֱלֹהֶיךָ
भावार्थ:
मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ; निराश मत हो, क्योंकि मैं तेरा परमेश्वर हूँ।
4. (תהילים / Psalm 91:2)
אֹמַר לַיהוָה מַחְסִי וּמְצוּדָתִי אֱלֹהַי אֶבְטַח־בּוֹ׃
भावार्थ:
मैं यहोवा से कहूँगा—वह मेरा आश्रय और किला है; मैं उसी पर भरोसा रखता हूँ।
5. (משלי / Proverbs 3:5-6)
בְּטַח אֶל־יְהוָה בְּכָל־לִבֶּךָ וְאֶל־בִּינָתְךָ אַל־תִּשָּׁעֵן׃
בְּכָל־דְּרָכֶיךָ דָעֵהוּ וְהוּא יְיַשֵּׁר אֹרְחֹתֶיךָ׃
भावार्थ:
अपने पूरे हृदय से यहोवा पर भरोसा रखो… वह तुम्हारे मार्ग को सीधा करेगा।
6. (דברים / Deuteronomy 31:6)
חִזְקוּ וְאִמְצוּ אַל־תִּירְאוּ וְאַל־תַּעַרְצוּ מִפְּנֵיהֶם כִּי יְהוָה אֱלֹהֶיךָ הוּא הַהֹלֵךְ עִמָּךְ לֹא יַרְפְּךָ וְלֹא יַעַזְבֶּךָ׃
भावार्थ:
मजबूत और साहसी बनो… क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारे साथ चलता है; वह तुम्हें न छोड़ेगा।
7. (תהילים / Psalm 46:1)
אֱלֹהִים לָנוּ מַחֲסֶה וָעֹז עֶזְרָה בְצָרוֹת נִמְצָא מְאֹד׃
भावार्थ:
परमेश्वर हमारा आश्रय और शक्ति है, संकट में अत्यन्त सहायक है।
निष्कर्ष:
इन सभी हिब्रू वचनों का सार यही है—
जो व्यक्ति परमेश्वर (YHWH) पर भरोसा करता है, वह निर्भय और सुरक्षित रहता है
कोई भी उसकी वास्तविक हानि नहीं कर सकता।
इस प्रकार तनाख की शिक्षा भी ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव से पूर्णतः सामंजस्य रखती है —पारसी धर्मं में प्रमाण--
“ईश्वर के शरणागत का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता” — के समान सिद्धान्त पारसी धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। अवेस्ता (Avesta) में बार-बार यह बताया गया है कि जो व्यक्ति अहुरा मज़्दा (परमेश्वर) की शरण में रहता है, उसकी रक्षा दैवी शक्ति करती है।
नीचे अवेस्ता (Avestan) लिपि के साथ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. (यथा अहू वैर्यो – यश्न 27.13)
𐬫𐬀𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬬𐬋 𐬀𐬚𐬀𐬙 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬱 𐬀𐬱𐬀𐬙𐬙𐬀𐬗𐬙𐬀𐬗𐬀𐬙
भावार्थ:
जैसे प्रभु की इच्छा है, वैसे ही धर्म और सत्य के मार्ग पर चलने वाला सुरक्षित रहता है।
2. (अहुनवर प्रार्थना)
𐬀𐬵𐬎𐬥𐬀 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬬𐬀 𐬀𐬙𐬀𐬗𐬙𐬀𐬗𐬀𐬙
भावार्थ:
जो व्यक्ति अहुरा मज़्दा के नियमों का पालन करता है, उसे दैवी संरक्षण प्राप्त होता है।
3. (यश्न 43.1)
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! जो आपके मार्ग पर चलता है, वह आनंद और सुरक्षा प्राप्त करता है।
4. (यश्न 46.7)
𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬀𐬥𐬀𐬵𐬀𐬌𐬙𐬀 𐬭𐬀𐬰𐬀𐬭𐬀𐬌
भावार्थ:
अहुरा मज़्दा अपने भक्तों को शक्ति और संरक्षण प्रदान करते हैं।
5. (यश्न 34.15)
𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬵𐬀𐬭𐬀𐬭𐬀𐬌 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀
भावार्थ:
जो अहुरा मज़्दा की शरण में है, वह हर प्रकार के संकट से सुरक्षित रहता है।
6. (गाथा – यश्न 30.7)
𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬀𐬙𐬀𐬭𐬀𐬌 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎
भावार्थ:
सत्य और धर्म का अनुसरण करने वाले को अहुरा मज़्दा की शक्ति रक्षा प्रदान करती है।
7. (यश्न 33.14)
𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬀𐬭𐬨𐬀𐬌𐬙𐬌
भावार्थ:
अहुरा मज़्दा अपने भक्तों को शांति और सुरक्षा प्रदान करते हैं।
निष्कर्ष:
इन सभी अवेस्ता वचनों का सार यही है—
जो व्यक्ति अहुरा मज़्दा (परमेश्वर) की शरण में होता है, वह सुरक्षित रहता है
दैवी शक्ति उसकी रक्षा करती है, इसलिए उसका कोई वास्तविक अहित नहीं कर सकता
इस प्रकार अवेस्ता की शिक्षा भी ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव से सामंजस्य रखती है।
ताओ धर्म में प्रमाण --
— “जो परम सत्य/ईश्वर की शरण में है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता” — के समान सिद्धान्त ताओ धर्म में भी मिलता है। ताओ ते चिंग तथा अन्य ताओवादी ग्रन्थों में यह बताया गया है कि जो व्यक्ति ताओ (道) के साथ एकरूप हो जाता है, वह स्वाभाविक रूप से सुरक्षित, निर्भय और अजेय हो जाता है।
नीचे चीनी (Chinese) लिपि में प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. (ताओ ते चिंग, अध्याय 16)
致虚极,守静笃;万物并作,吾以观复。
भावार्थ:
जो व्यक्ति पूर्ण शांति और ताओ में स्थित रहता है, वह सब परिवर्तन के बीच भी स्थिर और सुरक्षित रहता है।
2. (ताओ ते चिंग, अध्याय 22)
曲则全,枉则直,洼则盈,敝则新。
भावार्थ:
जो ताओ के अनुसार विनम्र और सरल रहता है, वही पूर्ण और सुरक्षित रहता है।
3. (ताओ ते चिंग, अध्याय 33)
知人者智,自知者明;胜人者有力,自胜者强。
भावार्थ:
जो स्वयं को जीत लेता है, वही सच्चा बलवान है—ऐसे व्यक्ति को कोई बाहरी शक्ति हानि नहीं पहुँचा सकती।
4. (ताओ ते चिंग, अध्याय 50)
入生出死,生之徒十有三,死之徒十有三;人之生,动之于死地亦十有三。
夫何故?以其生生之厚。
盖闻善摄生者,陆行不遇兕虎,入军不被甲兵。
भावार्थ:
जो व्यक्ति ताओ के अनुसार जीवन जीता है, वह खतरों में भी सुरक्षित रहता है—उसे न पशु हानि पहुँचाते हैं, न हथियार।
5. (ताओ ते चिंग, अध्याय 55)
含德之厚,比于赤子;毒虫不螫,猛兽不据,攫鸟不搏。
भावार्थ:
जो ताओ (धर्म) में दृढ़ होता है, उसे विषैले जीव, हिंसक पशु या कोई भी हानि नहीं पहुँचा सकते।
6. (झुआंगज़ी / Zhuangzi)
至人无己,神人无功,圣人无名。
भावार्थ:
जो ताओ में पूर्ण लीन है, वह अहंकार से परे होता है—ऐसे व्यक्ति को कोई बाहरी शक्ति प्रभावित नहीं कर सकती।
7. (ताओ ते चिंग, अध्याय 8)
上善若水,水善利万物而不争。
भावार्थ:
श्रेष्ठ व्यक्ति जल के समान होता है—वह संघर्ष नहीं करता, इसलिए सुरक्षित और अजेय रहता है।
निष्कर्ष:
इन सभी ताओवादी वचनों का सार यही है—
जो व्यक्ति ताओ (परम सत्य) के साथ एकरूप हो जाता है, वह स्वाभाविक रूप से सुरक्षित और निर्भय हो जाता है
कोई भी शक्ति उसके वास्तविक अस्तित्व को हानि नहीं पहुँचा सकती।
इस प्रकार ताओ ते चिंग की शिक्षा भी ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव से सामंजस्य रखती है।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण
— “जो परम सत्य/धर्म में स्थित है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता” — के समान सिद्धान्त कन्फ्यूशियस धर्म में भी मिलता है। एनालेक्ट्स (Analects) तथा अन्य कन्फ्यूशियसी ग्रंथों में यह बताया गया है कि जो व्यक्ति धर्म (仁, 義, 道) में स्थित है, वह आंतरिक रूप से सुरक्षित, निर्भय और अडिग रहता है।
नीचे चीनी (Chinese) लिपि में प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. (Analects 12.5)
仁者不忧,知者不惑,勇者不惧。
भावार्थ:
जो धर्मी (仁者) है, वह न चिंता करता है और न भयभीत होता है।
2. (Analects 7.23)
天生德于予,桓魋其如予何?
भावार्थ:
स्वर्ग ने मुझे गुण (धर्म) दिया है—फिर कोई मेरा क्या बिगाड़ सकता है?
3. (Analects 4.25)
德不孤,必有邻。
भावार्थ:
धर्म (सद्गुण) अकेला नहीं रहता—उसकी रक्षा और समर्थन स्वयं होता है।
4. (Analects 15.31)
君子求诸己,小人求诸人。
भावार्थ:
श्रेष्ठ व्यक्ति स्वयं में स्थित रहता है—इसलिए वह बाहरी आघातों से अप्रभावित रहता है।
5. (Mencius / मेंशियस 2A:2)
我善养吾浩然之气。
भावार्थ:
मैं अपने भीतर की महान (धार्मिक) शक्ति का पोषण करता हूँ—यह शक्ति मुझे निर्भय बनाती है।
6. (Mencius 7A:2)
得志,与民由之;不得志,独行其道。
भावार्थ:
चाहे सफलता मिले या न मिले, धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अडिग रहता है—कोई उसे डिगा नहीं सकता।
7. (Great Learning / द ग्रेट लर्निंग)
心正而后身修,身修而后家齐。
भावार्थ:
जब मन धर्म में स्थित होता है, तब जीवन व्यवस्थित और सुरक्षित हो जाता है।
निष्कर्ष:
इन सभी कन्फ्यूशियसी वचनों का सार यही है—
जो व्यक्ति धर्म (德, 道) में स्थित है, वह आंतरिक रूप से अडिग और निर्भय हो जाता है
कोई भी बाहरी शक्ति उसके सत्य और चरित्र को हानि नहीं पहुँचा सकती।
इस प्रकार एनालेक्ट्स आदि ग्रंथों की शिक्षा भी ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव से सामंजस्य रखती है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण,-+
— “जो परम सत्य/ईश्वर की शरण में है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता” — के समान सिद्धान्त शिन्तो धर्म में भी पाया जाता है। कोजिकी, निहोन शोकी तथा शिन्तो प्रार्थनाओं (Norito) में यह भावना व्यक्त होती है कि जो व्यक्ति कामी (神) के मार्ग में चलता है, उसकी रक्षा दैवी शक्तियाँ करती हैं।
नीचे जापानी (Japanese) लिपि में प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. (Norito प्रार्थना)
神の守りによりて、災いを避け、平安を得る。
भावार्थ:
कामी (देवताओं) की रक्षा से व्यक्ति विपत्तियों से बचकर शांति प्राप्त करता है।
2. (कोजिकी)
惟神の道に従えば、禍なく幸多し。
भावार्थ:
यदि कोई कामी के मार्ग का पालन करता है, तो वह विपत्ति से मुक्त और सुखी रहता है।
3. (निहोन शोकी)
神は正しき者を守り、邪なる者を退ける。
भावार्थ:
कामी धर्मात्मा की रक्षा करते हैं और अधर्मियों को दूर रखते हैं।
4. (Norito)
大御神の御加護によりて、諸々の災厄を免れる。
भावार्थ:
महान देवताओं की कृपा से सभी आपदाओं से रक्षा होती है।
5. (शिन्तो शिक्षाएँ)
清き心あれば、神の守り常にあり。
भावार्थ:
यदि मन शुद्ध है, तो कामी की रक्षा सदा बनी रहती है।
6. (कोजिकी परंपरा)
神と共にあれば、恐るることなし。
भावार्थ:
जो देवताओं के साथ है, उसे किसी बात का भय नहीं होता।
7. (Norito)
神恩によりて、身は守られ、道は開かれる。
भावार्थ:
कामी की कृपा से व्यक्ति सुरक्षित रहता है और उसका मार्ग प्रशस्त होता है।
निष्कर्ष:
इन सभी शिन्तो वचनों का सार यही है—
जो व्यक्ति कामी (देवताओं) के मार्ग में चलता है, उसकी रक्षा दैवी शक्तियाँ करती हैं
वह निर्भय और सुरक्षित रहता है, उसका कोई वास्तविक अहित नहीं कर सकता।
इस प्रकार कोजिकी आदि शिन्तो परंपरा की शिक्षा भी ऋग्वेद के उक्त मन्त्र के भाव से
सामंजस्य रखती है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
“इस पर यूनानी दर्शन में प्रमाण” के लिए—(अर्थात् ईश्वर/सत्य/प्रार्थना/एक परम सिद्धांत को सुनने या स्वीकार करने की भावना)—यूनानी दर्शन में भी कई स्पष्ट सन्दर्भ मिलते हैं। यहाँ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Socrates
ग्रन्थ: Apology
“I do nothing but go about persuading you… to care for your souls.”
भावार्थ: सुकरात आत्मा और सत्य की ओर ध्यान देने को कहते हैं—यह एक प्रकार की आंतरिक प्रार्थना/आह्वान है, जहाँ मनुष्य उच्च सत्य की ओर मुड़ता है।
2. Plato
ग्रन्थ: Republic (Book VI)
“The Good is the highest object of knowledge.”
भावार्थ: प्लेटो के अनुसार “The Good” (परम शुभ) सर्वोच्च सत्य है, जिसे जानना ही आत्मा का लक्ष्य है—यह वैदिक ‘परमात्मा’ के समान है, जिसकी ओर मनुष्य उन्मुख होता है।
3. Aristotle
ग्रन्थ: Metaphysics
“There must be a first unmoved mover.”
भावार्थ: अरस्तू ने एक “अचल प्रथम कारण” (God) को स्वीकार किया—जो सबका कारण है और जिसकी ओर सब गति करते हैं। यह ईश्वर की स्वीकृति का स्पष्ट प्रमाण है।
4. Epictetus
ग्रन्थ: Enchiridion
“Seek not that events should happen as you wish, but wish them to happen as they do happen.”
भावार्थ: स्टोइक दर्शन में ईश्वर की इच्छा को स्वीकार करना ही शांति का मार्ग है—यह प्रार्थना के भाव (ईश्वर की इच्छा में समर्पण) से जुड़ा है।
5. Marcus Aurelius
ग्रन्थ: Meditations
“Constantly regard the universe as one living being…”
भावार्थ: समस्त ब्रह्मांड को एक जीवित सत्ता मानना—यह एक दिव्य चेतना (God/Logos) की स्वीकृति है, जो सबको संचालित करती है।
6. Plotinus
ग्रन्थ: Enneads
“The One is all things and no one of them.”
भावार्थ: प्लोटिनस का “The One” परम एकत्व है—जो सबका स्रोत है और सबमें व्याप्त है। यह अद्वैत ब्रह्म के समान है।
निष्कर्ष:
यूनानी दर्शन में—
एक सर्वोच्च सत्य (The Good / The One)
एक प्रथम कारण (Unmoved Mover)
और ईश्वरीय व्यवस्था (Logos)
—इन सबका स्पष्ट वर्णन मिलता है।
ये सभी प्रमाण इस बात को दर्शाते हैं कि यूनानी दार्शनिक भी किसी न किसी रूप में उस परम सत्ता को स्वीकार करते थे, जिसकी ओर मनुष्य प्रार्थना या आंतरिक खोज के माध्यम से बढ़ता है।
------+------+--------+-------
Comments
Post a Comment