---वेद की सूक्तियाँ--
------वेद की सूक्तियाँ---
ऋगुवेद की सूक्तियाँ--
(१) न स सखा यो न ददाति सख्ये।
ऋगुवेद--१०/११७/४
भाव-- जो मित्र सहायता नहीं करता, वह मित्र नहीं है।
(२) केवलाघो भवति केवलादी।
ऋगुवेद---१०/११७/६
भाव--जो मनुष्य अकेले खाता है, वह
अकेले पाप का भागी होता है।)
(३) न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवा:।
ऋगुवेद--४/३३/११
भाव--देवता श्रम करने वाले के अतिरिक्त किसी और से मित्रता नहीं करते।
(४) सं गच्छध्वम् सं वद्ध्वम्। सं वो मनांसि जानिताम।
ऋगुवेद----१०/१८१/२
भाव :- साथ चलें, साथ बोलें। तुम्हारा मन एक सा समझे।
(५) यो जागारतमृच: कामयन्ते।
ऋगुवेद--५/४४/१४
भाव--जो जागृत रहता है, उसे ऋचाएँ चाहती हैं।
(६) अग्ने नय सुपथा राए अस्मान्।
ऋगुवेद--१/१८९/१
भाव-- हे अग्निदेव ! हमें धन के लिए सन्मार्ग से ले चलें।
(७) न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन।
ऋगुवेद--१०/१५२/१
भाव-- ईश्वर के भक्त को न कोई नष्ट कर सकता है, न जीत सकता है।
(८) न विन्धेस्य सुष्टितम्।
ऋगुवेद--१/७/७
भाव--मैं परमात्मा की स्तुति का पार नहीं पाता।
(९) महे च न त्वामद्रिवः परा शुक्लाय देयाम्।
ऋगुवेद-८/१/५
भाव--हे महान और अद्वितीय ईश्वर ! हम आपको अपने हृदय से शुद्ध भावों के साथ समर्पित करते हैं जिससे हमारा जीवन पवित्र उज्ज्वल और तेजस्वी मार्ग की ओर अग्रसर हो।
(१०) न रिष्यते त्वावतः सखा।
ऋगुवेद--१/९१/८
भाव--हे ईश्वर ! आपका मित्र कभी नष्ट नहीं होता।
(११) एको विश्वस्य भुवनस्य राजा।
ऋगुवेद--६/३६/४
भाव--वह सब लोकों का एक ही स्वामी है।
(१२) त्वमस्माकं तव स्मसि।
ऋगुवेद--८/९२/३२
भाव-- प्रभु ! तू हमारा है, हम तेरे हैं।
(१३) अधाम इन्द्र श्रणवो हवेमा।
ऋगुवेद--७/२९/३
भाव--हे प्रभु ! अब तो मेरी इन प्रार्थनाओं को सुन लो।
(१४) यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति।
ऋगुवेद--१/१६४/३९
भाव--जो उस ब्रह्म को नहीं जानता, वह वेद से क्या करेगा।
(१५) तवेद्धि सख्यम् स्तृतम।
ऋगुवेद--१/१५/५
भाव--प्रभो ! तेरी ही मैत्री सच्ची है।
(१६) मान्तः स्थुर्नो अरातयः।
ऋगुवेद--१०/५७/१
भाव--हमारे अन्दर कंजूसी न हो।
(१७) उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति।
ऋगुवेद--१०/११७/१
भाव-- दानी का दान घटता नहीं।
(१८) अक्षैर्मा दीव्यः।
ऋगुवेद-- १०/३४/१३
भाव-- जुआ मत खेलो।
(१९) जाया तप्यते कितवस्य हीना।
ऋगुवेद--१०/३४/१०
भाव--जुएबाज की स्त्री दीन-हीन होकर दुख पाती है।
(२०) क्रत्वा चेतिष्ठो विषामुषर्भुत।
ऋगुवेद--१/६५/५
भाव--प्रातः जागनेवाला प्रबुद्ध होता है,
उसे सब स्नेह करते हैं।
(२१) न ऋष्यत्त्वावतः सखा।
ऋगुवेद--१/११/८
भाव-- हे प्रभु ! आपका सखा कभी दुखी नहीं होता।
(२२) त्वं ज्योतिषा वितमोववर्थ। ऋगुवेद-- १/११/२२
भाव-- हे प्रभु ! अपने ज्ञान के प्रकाश से हमारे अज्ञान को नष्ट करो।
(२३) पितेव नः श्रृणुहि हूयमानः।
ऋगुवेद--१/१०४/९
पिता की भाँति मेरी पुकार सुनो।
(२४) अघृणे न ते सख्यम पह्युवे।
ऋगुवेद--१/१३८/४
भाव--हे प्रभु ! तेरी मित्रता से इनकार नहीं करता।
(२५) दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः।
ऋगुवेद--१/१४७/३
भाव-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।
(२६) अपृणन्तमभि सं यन्तु शोकाः।
ऋगुवेद--१/१२५/७
भाव--,उपकार हीन कृपण को शोक घेर लेता है।
(२७) मा प्रगाम पथोवयम्।
ऋगुवेद--१०/५७/१
भाव-- हम वैदिक मार्ग से पृथक न हों।
(२८) उतदेवा अवहित देवा उन्नयथा पुन:।
ऋगुवेद--१०/१३७/१
भाव--हे विद्वानों ! गिरे हुओं को पुनः उठाओ।
(२९) बहुप्रजा निऋर्तिमा विवेश।
ऋगुवेद--१/१६४/३२
भाव-- बहुत सन्तान वाले बहुत कष्ट उठाते हैं।
(३०) कस्तमिन्द्र त्वावसुमा मतर्यो दधर्षति।
ऋगुवेद--७/३२/१४
भाव--ईश्वर भक्त का तिरस्कार कोई नहीं कर सकता।
(३१) इमं नः श्रणवद्धवम्।
ऋगुवेद--१०/२६/९
भाव-- वह ईश्वर मेरी प्रार्थना को सुने।
(३२) स्तोतुर्मघवनकाममा पृण।
ऋगुवेद--१/५७/५
भाव--हे प्रभु ! भक्त की कामनाओं को पूर्ण करो।
(३३) विश्वेषा मिज्जनिता ब्रह्मणामसि।
ऋगुवेद---२/२३/२
भाव--हे प्रभु ! सम्पूर्ण विद्याओं का आदि मूल तू ही है।
(३४) देवो देवनामसि।
ऋगुवेद--१/१४/१३
भाव-- हे प्रभु ! तू देवों का देव है।
(३५) स नः पर्षदति द्विषः।
ऋगुवेद--१०/१८७/५
भाव-- वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।
(३६) मा नः प्रजा रीरिषः।
ऋगुवेद--१०/१८/१
भाव--हे प्रभु ! तू हमारी सन्तान को नष्ट न कर ।
(३७) सत्या मनसो मेअस्तु।
ऋगुवेद--१०/१२८/४
भाव--मेरे मन के भाव सच्चे हों।
(३८) भियं दधाना हृदयेषु शत्रुणाम्।
ऋगुवेद--१०/८४/७
भाव-- शत्रु के हृदय में भय उत्पन्न कर दो।
(३९) निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु।
ऋगुवेद--५/२/६
भाव--निन्दक सबसे निन्दित होते हैं।
(४०) न त्वदन्यो मघवन्नस्य मदिर्ता।
ऋगुवेद--१/८४/१९
भाव-- हे प्रभो ! आपके सिवा सुख देने वाला दूसरा कोई नहीं है।
(४१) आर्य ज्योतिरग्राः।
ऋगुवेद-- ७/३३/७
भाव--आर्य ज्योति (ज्ञान) को प्राप्त करने वाला होता है।
(४२) करो यत्र वरिवो बाधिताय।
ऋगुवेद--६/१८/१४
भाव--पीड़ितों की सहायता करने वाले हाथ ही उत्तम हैं।
(४३) प्राता रत्नं प्रातरिश्वा दधाति।
ऋगुवेद--१/१२५/१
भाव--प्रातः जागनेवाला प्रात काल में ऐश्वर्य पाता है।
(४४) अधः पश्यस्व मोपरि।
ऋगुवेद--८/३३/१९
भाव--हे नारि ! नीचे देख, ऊपर मत देखा।
(45) उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्त उत्तरे।
ऋगुवेद -1/115/1
भाव --अन्धकार से ऊपर उठकर प्रकाश की ओर बढ़ो।
(46) कृण्वन्तो विश्व मार्यम्।
ऋग्वेद- 5/51/15
भाव --पूरे विश्व को आर्य (श्रेष्ठ) बनाओ।
(47) उदुत्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतव:।
ऋग्वेद- 1/50/10
भाव --सूर्य की किरणें ज्ञान का
प्रकाश फैलाती हैं।
(48) अभि वीरान् जयत।
ऋग्वेद- 6/75/14
भाव--वीर बनकर आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।
(49) उषा जागर्ति प्रथमा।
ऋग्वेद- 1/92/6
भाव--उषा (देवि) सबसे पहले जागती हैं।
(50) चरैवेति चरैवेति।
ऋगुवेद -9/63/5
भाव--चलते रहो बढ़ते रहो।
(51) नव्यो नव्यो भवति।
ऋग्वेद- 1/31/8
भाव--सदैव नवीन बनये रहो।
(52) समानी व आकूति:।
ऋग्वेद-10/191/3
भाव-- समान विचार रखो।
(53) उद वयं गमेम।
ऋग्वेद- 1/10/1
भाव--हम उठें और आगे बढ़ें।
(54) स भूमिं विश्वतो वृत्वा।
ऋग्वेद- 10/90/1
भाव--वह पृथ्वी पर चारों ओर व्याप्त है।
(55) धियो यो न: प्रचोदयात।
ऋग्वेद- 3/62/10
भाव--वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।
(56) ऋतं च सत्यं च।
ऋग्वेद- 10/190/1
भाव--नियम और सत्य ही
(जगत का) आधार है।
(57) भद्रं कर्णेभि: श्रणुयाम् देव:।
ऋग्वेद- 1/89/8
भाव--हे ईश्वर ! हम अपने कानों से शुभ सुनें।
(58) आ नो भद्र: कृतवो यन्तु विश्वत:।
ऋग्वेद- 1/89/1
भाव--हमारे पास सभी दिशाओं से शुभ विचार आएँ।
(59) एकं सदविप्र: बहुधा वदन्ति।
ऋग्वेद- 1/164/46
भाव--ईश्वर एक है। ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
(60) प्रियं वद।
ऋग्वेद- 8/89/3
भाव--प्रिय बोलो।
(61) अभित्वा जागृवांस:।
ऋग्वेद- 3/39/5
भाव--जागरूक बनो और सही रहो।
(62) श्रेष्ठ यश:।
ऋग्वेद- 4/33/11
भाव-- श्रेष्ठ यश प्राप्त करो।
(63) बलं धेहि।
ऋग्वेद- 4/9/6
भाव--शक्ति धारण करो।
(64) न मृष्यसे।
ऋग्वेद- 1/116)2
भाव--हार मत मानो। निराश मत हो।
(65) धियं धारय।
ऋग्वेद- 8/1/5
भाव --अपने मन को स्थिर रखो।
(68) विश्वासं धैहि।
ऋग्वेद- 10/4८/5
भाव --अपने ऊपर विश्वास रखो।
(69) उत्सं दुहन्ति।
ऋग्वेद- 9/112/1
भाव--उत्साह उत्पन्न करो।
(70) विद्याम् वर्धय।
ऋग्वेद- 1/71/2
भाव--ज्ञान को बढ़ाते रहो।
(71) उत्तिष्ठत वीरा:।
ऋग्वेद- 1/10/2
भाव--वीरों की तरह उठो और आगे बढ़ो।
(72) देवानां सख्यमुप सेदिम।
ऋग्वेद- 1/89/3
भाव--श्रेष्ठ लोगों की संगति प्राप्त करो।
(73) न धृष्णुं त्यजेत्।
ऋग्वेद- 9/97/7
भाव--साहस को मत छोड़ो।
(78) अलस्यं त्यज।
ऋग्वेद- 7/45/1
भाव--आलस्य को छोड़ो।
(79) उच्चा धिय:।
ऋग्वेद- 10/14/7
भाव--ऊँचे विचाश्र रखो।
(80) इन्द्रियाणि रक्ष।
ऋग्वेद- 8/2/19
भाव--इन्द्रियों पर नियंत्रण रखो।
(81) कालं पश्य।
ऋग्वेद- 1/95/8
भाव--समय की क़द्र करो।
(82) ज्योति:भव।
ऋग्वेद- 5/1/1
भाव--प्रकाश (ज्ञानी) बनो।
(83) प्रयत्नं कुरु।
ऋग्वेद- 1/44/10
भाव--प्रयास करते रहो।
(84) कृणुष्व पाज:।
ऋग्वेद- 1/31/4
भाव-अपने पराक्रम को बढ़ाओ।
(85) बृहस्पते अति यदर्यो अराति:।
ऋग्वेद- 2/23/1
भाव--हे ईश्वर(बृहस्पति) ! हमें श्रेष्ठ बुद्धि पर्धान करो।
(86) वीर्यं दधातु।
ऋग्वेद- 6/47/8
भाव--हमें वीरता और शक्ति प्राप्त हो।
(87) सुपथा गच्छ।
ऋग्वेद- 5/82/5
भाव--अच्छे मार्ग पर चलो।
(88)श्रेष्ठं नो धेहि।
ऋग्वेद- 1/18/7
भाव--हमें श्रेष्ठता प्रदान करो।
(89) बलं नो धेहि।
ऋग्वेद- 3/32/1
भाव--हमें शक्ति प्रदान करो।
(90) वर्धताम्।
ऋग्वेद- 1/43/9
भाव--निरंतर वृद्धि होती रहे।
(91) बोधि न:।
ऋग्वेद-4/31/1
भाव--हमें जागरूक करो।
(92) सुपथा नय।
ऋग्वेद- 8/23/10
भाव--हमें अच्छे मार्ग पर ले चलो।
(93) प्रेरय न:।
ऋग्वेद- 9/65/4
भाव--हमें प्रेरित करो।
(94) विवर्धस्व।
ऋग्वेद- 1/91/1
भाव-स्वयं को विकसित करो।
(95) चरामसि।
ऋग्वेद- 5/52/15
भाव-- हम चलते(कर्म करते) रहें।
(96) जयमसि।
ऋग्वेद- 6/25/5
भाव--हम विजय प्राप्त करें।
(97) कर्माणि कुरु।
ऋग्वेद- 3/8/4
भाव--कर्म करो।
(98) सुमतिं धेहि।
ऋग्वेद- 8/19/5
भाव--हमेँ सुमति(अच्छे विचार) दो।
(99) अभीत:भव।
ऋग्वेद- 1/11/2
भाव--निर्भय बनो।
(100) सुपथं इच्छ।
ऋग्वेद- 10/31/2
भाव--अच्छे मार्ग की खोज करो।
(101) हर्ष वर्थय।
ऋग्वेद- 9/66/20
भाव--अपने उत्साह को बढ़ाओ।
(102) प्रयतस्व।
ऋग्वेद- 1/81/2
भाव--प्रयास करते रहो।
(103) ज्योतिर्गमय।
ऋग्वेद- 7/45/4
भाव--प्रकाश की ओर जाओ।
(104) उन्नय न:।
ऋग्वेद- 8/6/10
भाव--हमें ऊपर उठाओ।
(105) भद्रं भवतु।
ऋग्वेद- 1/97/1
भाव--हमारा भविष्य शुभ
हो।
(106) जागृहि।
ऋग्वेद- 7/60/5
भाव--जागते रहो।
(107) श्रेयो धेहि।
ऋग्वेद- 4/25/6
भाव--हमें श्रेय(श्रेष्ठ जीवन) प्रदान करो।
(108) जयं धेहि।
ऋग्वेद- 6/47/12
भाव- हमें विजय दो।
(109) धृतिं धेहि।
ऋग्वेद-2/28/5
भाव-- हमें धैर्य प्रदान करो।
(110) सुकृतं कुर्म:।
ऋग्वेद- 3/3/1
भाव-- हम अच्छे कर्म करें।
(111) तेज:धेहि।
ऋग्वेद- 1/31/6
भाव--हमें तेज प्रदान करो।
(112) प्रत राम।
ऋग्वेद- 7/32/9
भाव-- आगे बढ़ते रहो।
यजुर्वेद की सूक्तियाँ--
(१) कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं
समाः।
यजुर्वेद--४०/२
भाव--इस लोक में कर्मशील रहते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करें।
(२) ओइम क्रतो स्मर ।
यजुर्वेद--४०/१५
भाव--हे कर्म शील मनुष्य ! तू ओइम का स्मरण कर।
(३) ईशा वास्यमिदं सर्वम्।
यजुर्वेद--४०/१
भाव--इस सारे जगत में ईश्वर व्याप्त है।
(४) वयं स्याम पतयो रयीणाम्।
यजुर्वेद--१९/४४
भाव-- हम सम्पूर्ण सम्पत्तियों के स्वामी हों।
(५) मा भेर्मा संविक्थाअउर्जं धत्स्व।
यजुर्वेद--६/३५
भाव-- मत डर। मत घबरा। धैर्य धारण कर।
(६) ओइम खं ब्रह्म।
यजुर्वेद--४०/१७
भाव--ओइम् ब्रह्म सर्वव्यापक है।
(७) आरे बाधवस्य दुच्छुनाम्।
यजुर्वेद--१९/३८
भाव--दुष्ट पुरुषों को दूर भगाओ।
(८) लोकं कृणोतु साधुया ।
यजुर्वेद--२३/४३
भाव--जनता को सद्चरित्र बनाएँ।
(९) तनूपाअग्निः पातु दुरितादलद्यात।
यजुर्वेद--४/१५
भाव--ईश्वर हमें निन्दनीय दुराचरण से बचाए।
(१०) गोस्तु मात्रा न विद्यते।
यजुर्वेद--२३/४८
भाव-- गौ का मूल्य नहीं है।
(११) प्रमृणीहि शत्रून।
यजुर्वेद १३/१३
भाव--शत्रुओं को कुचल डालो।
(१२) परिमाग्ने दुश्चरिताद बाधस्व।
यजुर्वेद--४/२८
भाव-- हे ईश्वर ! आप हमें दुष्ट आचरण से हटाएँ।
(१३) शन्नो अस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे।
यजुर्वेद--३६/८
भाव--ईश्वर दो पाँव वाले मनुष्य और चार पाँव वाले पशुओं के लिए कल्याणकारी हो।
(१४) सहोअसि सो मयि धेहि।
यजुर्वेद--१९/९
भाव--हे प्रभु ! आप सहनशील हैं। मुझमें सहनशीलता लाइए।
(१५) नेनद्दवा आप्नुवन पूर्वमषत।
यजुर्वेद--४०/४
भाव-- परमात्मा भौतिक इन्द्रियों और अविद्वानों का विषय नहीं है।
(१) अतिथिं स्तुषे मित्रमिव प्रियम।
सामवेद--५
भाव--मित्र की तरह अतिथि का स्वागत करते हैं।
(२) आ ते वत्सो मनो यमत्।
सामवेद--८
भाव-- आपका शुद्ध मन संयमित हो।
(३) स्तुहि सत्यधर्माणम।
सामवेद--३२
भाव-- सत्यनिष्ठ की प्रशंसा करें।
(४) मित्रं न शंसिषम्।
सामवेद--३५
भाव--मित्र की भाँति वार्तालाप करें।
(५) प्र देव्येतु सूनृता।
सामवेद--५६
भाव--प्रिय एवं सत्यवाणी हमें प्राप्त हो।
(६) सं महेमा मनीषया।
सामवेद--६६
भाव-- हम प्रजा के द्वारा श्रेष्ठ कार्य करें।
(७) भद्रा हि नः प्रमतिः।
सामवेद--६६
भाव-- हमारी बुद्धि कल्याणकारिणी हो।
(८) सख्ये मा रिषाम।
सामवेद--६६
भाव-- मित्रता में हम कम न रहें।
(९) हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम्।
सामवेद--७२
(१०) श्रद्धा माता
सामवेद -९०
भाव-- श्रद्धा ही जननी है।
(११) मनुः कविः।
सामवेद--९०
भाव--भविष्य को ध्यान में रखकर चलने वाला ही मनुष्य है।
(१२) न रिपुरीशीत मर्त्यः।
सामवेद--१०४
भाव--असहयोगी व्यक्ति उन्नत शील नहीं होता।
(१३) त्वं सख्यमाविथ।
सामवेद--१०८
भाव--आप मित्रता का चयन करें।
(१४) भद्रा उत प्रशस्तयः।
सामवेद--१११
भाव-- सुन्दर वाणियाँ कल्याणकारी होती हैं।
(१५) सनिं मेधामयासिषम्।
सामवेद--१७१
भाव-- अर्जन शील बुद्धि को प्राप्त करें।
(१६) पावका नः सरस्वती।
सामवेद--१८९
भाव--विद्या ही हमें पवित्र करने
वाली है।
(१७)समानमु प्रशंसिषम्।
सामवेद--२०४
भावार्थ --सहयोगियों की संवर्धना करें।
(१८) मित्रास्यान्त्यदुह:।
सामवेद --२०६
भाव--स्नेही मित्र ही संरक्षक होते हैं।
(१९) तवेदन सख्यमस्तृतम्।
सामवेद --२२९
भावार्थ --आपकी यह मित्रता निरंतर विद्यमान रहे।
(२०) अस्माअवन्तु ते धिय:।
सामवेद --२३९
भावार्थ --आपकी कुशलता हमारी रक्षा करे।
अथर्ववेद की सूक्तियांँ--- (१) कृतं मे दक्षिणे हस्ते जयो मे सव्य आहितः।
अथर्ववेद--७/५०/८
भाव--मेरे दाहिने हाथ में कर्म है और बाएँ हाथ पर सफलता रखी है।
(२) सर्वा आशा मम मित्रं भवन्तु।
अथर्ववेद--१९/१५/६
भाव--सभी दिशाएँ हमारे लिए मित्र हों।
(३) ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति।
अथर्ववेद--१९/५/१७
भाव-- ब्रह्मचर्य और तप से ही राजा विविध प्रकार से राष्ट्र की रक्षा करता है।
(४) शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर।
अथर्ववेद--३/२४/५
भाव--सौ हाथों से संग्रह करो तथा हज़ार हाथों से दान दो।
(५) तस्य ते भक्तवांसः स्याम।
अथर्ववेद--६/७९/३
भाव--हे प्रभो ! हम तुम्हारे भक्त हों।
(६) स नः पर्षद् अतिद्विषः।
अथर्ववेद--६/३४/१
भाव--ईश्वर हमें द्वेषों से अलग कर दे।
(७) यत्र सोमः सदमित् तत्र भद्रम्।
अथर्ववेद--७/१८/२
भाव--जहाँ परमेश्वर है, वहाँ कल्याण ही कल्याण है।
(८) स एष एक वृदेक एव।
अथर्ववेद--१३/४/२०
भाव--वह ईश्वर एक और केवल एक ही
है।
(९) तमेव विद्वान न बिभाय मृत्योः।
अथर्ववेद--१०/८/४४
भाव--आत्मा को जानने पर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता।
(१०) स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरुषेभ्यः।
अथर्ववेद--१/३१/४
भाव--सब पशु-पक्षी और प्राणि मात्र का भला हो।
(११) स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु।
अथर्ववेद--१/३१/४
भाव-- हमारे माता और पिता सुखी रहें।
(१२) रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्याः पापीस्ता अनीनशम्।
अथर्ववेद--७/११५/४
भाव--पुण्य की कमाई मेरे घर की शोभा बढ़ाए और पाप की कमाई को मैं नष्ट कर देता हूँ।
(१३) मा जीवेभ्यः प्रमदः।
अथर्ववेद--८/१/७
भाव--प्राणियो की ओर से बेपरवाह मत हो।
(१४) मा प्रगाम पथो वयम्।
अथर्ववेद--१३/१/५९
भाव--सन्मार्ग से हम विचलित न हों।
(१५) प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये।
अथर्ववेद--१९/६२/१
भाव--सबका कल्याण सोचो चाहे शूद्र हो चाहे आर्य।
(१६) अनागोहत्या वै भीमा।
अथरंववेद--१०/१/२९
भाव--निरअपराध की हिंसा करना भयंकर है।
(१७) मा श्रुतेन वि राधिषि।
अथर्ववेद--१/१/४
भाव--हम सुने हुए वेदोपदेश के विरुद्ध आचरण न करें।
(१८) मात्र तिष्ठः परांमनाः।
अथर्ववेद---८/१/९
भाव--इस संसार में उदासीन मन से मत रहो।
(१९) अघमस्त्वघकृते।
अथर्ववेद--१०/१/५
भाव--पापी को दुख ही मिलता है।
(२०) नस्तेयमद्मि।
अथर्ववेद--१४/१/५७
भाव--मै चोरी का माल न खाऊँ।
(२६) असन्तापं में हृदयम्।
अथर्ववेद--१६/३/६
भाव-- मेरा हृदय सन्ताप से रहित हो।
(२७) ततः परं नाति पश्यामि किंचन।
अथर्ववेद--१८/२/३२
भाव--प्रभु से बढ़कर मुझे कुछ नहीं दिखता।
(२८) इन्द्रस्य कर्म सुकृता पुरुणि।
अथर्ववेद--२०/११/६
भाव--प्रभु के सब कर्म शोभा के होते हैं।
(२९) हत्वी दस्यून् प्रार्यं वर्णमावत्।
अथर्ववेद--२०/११/९
भाव-- प्रभु दुष्टों का विनाश करके आर्यों की रक्षा करता है।
(३०) प्रत्यं नः सुमना भव।
अथर्ववेद--३/२०/२
भाव--हे प्रभु ! हमारे प्रति शुभ मन रखें।
(३१) मा नो हिंसीः पितरं मातरं च।
अथर्ववेद--११/२/२९
भाव--हे प्रभु ! हमारे माता पिता को कष्ट मत दे।
(३२) वि द्विषो वि मृधो जहि।
अथर्ववेद--१९/१५/१
भाव--हे प्रभु ! हमारी द्वेषवृत्तियों और हिंसकवृत्तियों को नष्ट कर दे।
(३३) अग्नि सख्ये मा रिषामा वयं तव।
अथर्ववेद--२०/१३/३
भाव--हे प्रभु ! तेरी मैत्री पाकर हम विनाश से बच जाएँ।
(३४) मा त्वायतो जरितुः काममूनयोः।
अथर्ववेद--२०/२१/३
भाव--हे प्रभु! अपनी चाह वाले मुझ भक्त की चाहत को अपूर्ण मत रख।
(३५) न स्तोतारं निदे करः।
अथर्ववेद--२०/२३/६
भाव--मुझ स्तुति करने वाले को निन्दा का पात्र मत कर।
(३६) मा ते रिषन्नुपसत्तारोअग्ने।
अथर्ववेद--२/६/२
भाव--हे प्रभु ! आपके उपासक दुखी न हों।
(३७) मा त्वचा वोचन्नत्रराधसं जनासः।
अथर्ववेद-५/११/७
भाव--हे प्रभु ! लोग मुझे कंजूस न कहें।
(३८) यस्तन्नवेद किमृचा करिष्यति।
अथर्ववेद--९/१०/१८
भाव--जो उस प्रभु को नहीं जानता, उसका वेद क्या करेगा।
(३९) दस्यूनव धूनुष्व।
अथर्ववेद--१९/४६/२
भाव--दस्युओं को धुन डालो।
(४०) आ वीरो अत्र जायताम।
अथर्ववेद--३/२३/२
भाव--वीर सन्तान उत्पन्न कर।
(४१) सखा सखिभ्यो वरीयः कृणोतु।
अथर्ववेद--७/५१/१
भाव--मित्र को मित्र की भलाई करनी चाहिए।
(४२) दूर ऊनेन हीयते।
अथर्ववेद--१०/८/१५
भाव--बुरी संगत से मनुष्य गिरता है।
(४३) विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि।
अथर्ववेद--२/१६/५
भाव--हे प्रभु ! अपनी शक्ति से मेरी रक्षा करो।
(४४) मिथो विघ्नाना उपयन्तु मृत्युम्।
अथर्ववेद ६/३२/३
भाव--परस्पर लड़ने वाले मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।
(४५) मा पुरा जरसो मृथाः।
अथर्ववेद---५/३०/१७
भाव-- हे मनुष्य ! तू बुढ़ापे से पहले मत मर।
-------+----------+-----:--+-----
Comments
Post a Comment