ऋगुवेद सूक्ति--(४६)की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति-- (४६) की व्याख्या-
"कृण्वन्तो विश्वमार्यम्"
ऋग्वेद-5/51/15
भाव--पूरे विश्व को आर्य(श्रेष्ठ) बनाओ।
मंत्र —
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्”
ऋग्वेद (5/51/15)
शाब्दिक अर्थ--
कृण्वन्तः = बनाओ / करो
विश्वम् = सम्पूर्ण संसार
आर्यम् = आर्य (श्रेष्ठ, सदाचारी)
भावार्थ:
“सम्पूर्ण विश्व को आर्य (श्रेष्ठ, सज्जन, संस्कारित) बनाओ।”
इसे गहराई से समझें--
यहाँ “आर्य” शब्द का अर्थ किसी जाति या नस्ल से नहीं है, बल्कि
श्रेष्ठ आचरण वाला,सत्यनिष्ठ
संस्कारित और उदार व्यक्ति।
इस मंत्र का संदेश है:
पूरी मानवता को नैतिक, सभ्य और उच्च जीवन मूल्यों वाला बनाना।
वैदिक दृष्टि--
यह मंत्र हमें सिखाता है कि—
केवल स्वयं के सुधार तक सीमित न रहें बल्कि समाज और विश्व के उत्थान के लिए कार्य करें। ज्ञान, संस्कार और सदाचार का प्रसार करें।
यही भावना आगे चलकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” (सारा विश्व एक परिवार है) को साकार करती है।
वेदों में प्रमाण--
1. ऋग्वेद-- 10.191.2
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
भावार्थ:
मिलकर चलो, मिलकर बोलो, तुम्हारे मन एक समान हों।
अर्थ: सम्पूर्ण मानवता में एकता और समन्वय स्थापित करना — यही “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” है।
2. ऋग्वेद-- 1.89.1
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।
भावार्थ:
सभी दिशाओं से हमारे पास कल्याणकारी विचार आएँ।
अर्थ: पूरी दुनिया से अच्छे विचार ग्रहण करना और फैलाना।
3. यजुर्वेद-- 36.18
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
भावार्थ:
मैं सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूँ।
अर्थ: सबके प्रति मैत्री भाव — यही आर्यत्व (श्रेष्ठता) है।
4. अथर्ववेद-- 12.1.45
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।
भावार्थ:
यह पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।
अर्थ: समस्त पृथ्वी को अपना परिवार मानना।
5. अथर्ववेद-- 3.30.1
समानो मन्त्रः समिति: समानी...
भावार्थ:
तुम्हारे विचार, उद्देश्य और भाव एक समान हों।
अर्थ: समाज में सामंजस्य और एकता स्थापित करना।
निष्कर्ष--
इन सभी वैदिक मंत्रों का सार यही है कि—
सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार समझो। सभी के लिए कल्याणकारी सोच रखो।
मानवता में एकता, मैत्री और सदाचार स्थापित करो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का वास्तविक विस्तार है—
उपनिषदो में प्रमाण--
1. ईशोपनिषद् --1
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
भावार्थ:
इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से व्याप्त है।
अर्थ: जब सबमें एक ही परमात्मा है, तो सबके प्रति श्रेष्ठ भाव रखना ही “विश्व को आर्य बनाना” है।
2. मुण्डक उपनिषद्-- 3.1.6
सत्येन पन्था विततो देवयानः।
भावार्थ:
सत्य के द्वारा ही देवयान (उच्च मार्ग) प्रशस्त होता है।
अर्थ: सत्य के मार्ग पर चलकर ही मनुष्य श्रेष्ठ बनता है और दूसरों को भी बनाता है।
3. कठोपनिषद्-- 1.3.14
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
भावार्थ:
उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करो।
अर्थ: स्वयं जागरूक बनो और दूसरों को भी ज्ञान देकर श्रेष्ठ बनाओ।
4. छान्दोग्य उपनिषद-- 6.8.7
तत्त्वमसि (श्वेतकेतु)।
भावार्थ:
तू वही (ब्रह्म) है।
अर्थ: हर व्यक्ति में दिव्यता है—उसे पहचानकर जीवन को श्रेष्ठ बनाना ही आर्यत्व है।
5. बृहदारण्यक उपनिषद्- ---1.4.14
अहं ब्रह्मास्मि।
भावार्थ:
मैं ब्रह्म हूँ।
अर्थ: आत्मा की महानता को समझकर जीवन को उच्च बनाना।
6. तैत्तिरीय उपनिषद्-- 1.11.1
सत्यं वद, धर्मं चर।
भावार्थ:
सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो।
अर्थ: यही श्रेष्ठ (आर्य) जीवन का मूल आधार है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों का संदेश यही है कि
आत्मज्ञान प्राप्त करो, सत्य और धर्म का पालन करो, सबमें एक ही ब्रह्म को देखो,और इस ज्ञान से सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाओ
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्" का संदेश है।
पुराणों में प्रमाण--
1. विष्णु पुराण-- 1.19.41
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्।
विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्त्वोषकारणम्॥
भावार्थ:
वर्णाश्रम धर्म का आचरण करने वाला मनुष्य भगवान विष्णु की आराधना करता है; यही श्रेष्ठ मार्ग है।
अर्थ: सदाचार और धर्मपालन से समाज को श्रेष्ठ बनाना।
2. भागवत पुराण-- 1.2.6
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥
भावार्थ:
वह धर्म श्रेष्ठ है जिससे निष्काम भक्ति उत्पन्न हो और आत्मा प्रसन्न हो।
अर्थ: ऐसा धर्म अपनाना जो सबके कल्याण का कारण बने।
3. पद्म पुराण (सृष्टि खण्ड)
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।
भावार्थ:
दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप।
अर्थ: परोपकार से ही विश्व श्रेष्ठ बनता है।
4. गरुड़ पुराण-- 1.113.10 (सामान्य संदर्भ)
अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च।
भावार्थ:
अहिंसा परम धर्म है।
अर्थ: सभी प्राणियों के प्रति करुणा और अहिंसा — यही आर्यत्व है।
5. अग्नि पुराण (अध्याय 372 के आसपास)
सर्वभूतहिते रतः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
अर्थ: सबके कल्याण की भावना रखना।
6. नारद पुराण (पूर्व भाग)
धर्मः सर्वेषां भूतानां हितः।
भावार्थ:
सभी प्राणियों का हित ही धर्म है।
अर्थ: धर्म का उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व का कल्याण है।
निष्कर्ष--
पुराणों का सार स्पष्ट है—
परोपकार, अहिंसा, और सर्वहित ही सच्चा धर्म है।
मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए जिससे समाज और विश्व का उत्थान हो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का पुराणों में व्यावहारिक रूप है—
दूसरों का भला करो और पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाओ।
गीता में प्रमाण--
1.(क) गीता-- 3.20 और 21
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥ (3.20)
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (3.21)
भावार्थ:
श्रेष्ठ पुरुष अपने आचरण से लोक का मार्गदर्शन करता है; इसलिए उसे लोकसंग्रह (विश्व के कल्याण) के लिए कर्म करना चाहिए।
अर्थ: स्वयं श्रेष्ठ बनकर पूरे समाज को श्रेष्ठ बनाना।
(ख). गीता-- 12.4
सर्वभूतहिते रताः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं।
अर्थ: सबके कल्याण में लगे रहना — यही “विश्व को आर्य बनाना” है।
(ग). गीता-- 5.25
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे परम शांति को प्राप्त करते हैं।
अर्थ: सर्वहित ही श्रेष्ठता का मार्ग है।
(घ) गीता-- 6.29
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
भावार्थ:
योगी सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने में सभी को देखता है।
अर्थ: सबमें एकता का दर्शन — यही उच्च (आर्य) दृष्टि है।
(च). गीता-- 18.46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
भावार्थ:
जिससे सबकी उत्पत्ति हुई है, उसी की अपने कर्मों से पूजा करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।
अर्थ: अपने कर्तव्य से विश्व-व्यवस्था को श्रेष्ठ बनाना।
निष्कर्ष
गीता का स्पष्ट संदेश है—
लोकसंग्रह (विश्व कल्याण) के लिए कर्म करो, सर्वभूतहित में लगे रहो, अपने आचरण से दूसरों को प्रेरित करो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का गीता में व्यावहारिक रूप है—
स्वयं श्रेष्ठ बनो और पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाओ।
महाभारत में प्रमाण--
1(क) महाभारत, शान्ति पर्व-- 262.5
अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च।
भावार्थ:
अहिंसा परम धर्म है।
अर्थ: सभी प्राणियों के प्रति करुणा और अहिंसा — यही विश्व को श्रेष्ठ बनाने का आधार है।
(ख). महाभारत, शान्ति पर्व --109.11
सर्वभूतहिते रतः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
अर्थ: सर्वहित की भावना ही आर्यत्व (श्रेष्ठता) है।
(ग). महाभारत, अनुशासन पर्व --113.8
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
भावार्थ:
जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल है, वह दूसरों के साथ न करो।
अर्थ: नैतिक आचरण द्वारा समाज को श्रेष्ठ बनाना।
(घ). महाभारत, शान्ति पर्व-- 90.24
धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ:
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थ: धर्म पालन से ही समाज और विश्व सुरक्षित व श्रेष्ठ बनता है।
(च)०. महाभारत, शान्ति पर्व 167.9
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
भावार्थ:
ज्ञान के समान कोई पवित्र वस्तु नहीं है।
अर्थ: ज्ञान का प्रसार ही विश्व को श्रेष्ठ बनाता है।
(छ). महाभारत, वन पर्व --313.117
परोपकाराय सतां विभूतयः।
भावार्थ:
सज्जनों की सम्पत्ति परोपकार के लिए होती है।
अर्थ: दूसरों का भला करना ही सच्ची श्रेष्ठता है।
निष्कर्ष--
महाभारत का स्पष्ट संदेश है—
अहिंसा, परोपकार और धर्म का पालन करो
सर्वभूतहित में लगे रहो
ज्ञान और सदाचार का प्रसार करो
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का महाभारत में व्यावहारिक रूप है
स्वयं श्रेष्ठ बनकर समाज और विश्व को श्रेष्ठ बनाना।
1(क). मनुस्मृति-- 6.92
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
भावार्थ:
धैर्य, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह, सत्य आदि धर्म के दस लक्षण हैं।
अर्थ: इन गुणों को अपनाकर मनुष्य स्वयं तथा समाज को श्रेष्ठ बनाता है।
(ख). मनुस्मृति-- 10.63
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥
भावार्थ:
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियनिग्रह — यह सबके लिए समान धर्म है।
अर्थ: सार्वभौमिक नैतिकता से सम्पूर्ण विश्व का उत्थान।
२- याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.122
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
भावार्थ:
अहिंसा, सत्य, दान, स्वाध्याय, तप आदि धर्म के अंग हैं।
अर्थ: इनका पालन समाज को श्रेष्ठ बनाता है।
3- याज्ञवल्क्य स्मृति 1.156 (सामान्य संदर्भ)
सर्वभूतहिते रतः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
अर्थ: सर्वहित ही सच्चा धर्म है।
4-. पाराशर स्मृति-- 1.24 (सामान्य संदर्भ)
अहिंसा परमोधर्मः।
भावार्थ:
अहिंसा ही परम धर्म है।
अर्थ: करुणा और अहिंसा से ही विश्व श्रेष्ठ बनता है।
5-. नारद स्मृति (प्रारम्भिक अध्याय)
धर्मो हि सर्वभूतानां हितः।
भावार्थ:
सभी प्राणियों का हित ही धर्म है।
अर्थ: धर्म का उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व का कल्याण है।
निष्कर्ष--
स्मृतियों का सार यही है—
अहिंसा, सत्य, दया, दान को अपनाओ।
सर्वभूतहित में लगे रहो।
ऐसा आचरण करो जिससे सम्पूर्ण समाज और विश्व का उत्थान हो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का स्मृतियों में व्यावहारिक रूप है—
स्वयं श्रेष्ठ बनो और पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाइए।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
1. हितोपदेश
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
हितोपदेश, मित्रलाभ, श्लोक 71
अर्थ: उदार लोगों के लिए पूरी पृथ्वी परिवार है — यही “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” की भावना है।
2. पंचतंत्र--
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”
भावार्थ --यह बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध मंत्र है। इसमें सभी के लिए सुख और मंगल की कामना की गयी है।
3. चाणक्य नीति
“परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥”
चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 13
अर्थ: प्रकृति की हर वस्तु परोपकार के लिए है — मनुष्य भी ऐसा ही बने।
4. विदुर नीति (महाभारत से)
“सर्वभूतहिते रतः”
महाभारत, उद्योग पर्व, अध्याय 33 (विदुर नीति)
जो सब प्राणियों के हित में लगा रहता है वही श्रेष्ठ है।
5. चाणक्य नीति
“त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥”
चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 17
यह श्लोक बताता है कि बड़े हित (समष्टि) को प्राथमिकता देना चाहिए — जो “विश्व हित” की ओर संकेत है।
निष्कर्ष-
इन सभी नीति ग्रन्थों यह स्पष्ट करते हैं कि परोपकार, विश्व-कल्याण, समस्त मानवता को एक परिवार मानना।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (ऋग्वेद) का वास्तविक अर्थ और उद्देश्य है।:
1. वाल्मीकि रामायण में प्रमाण--
(1)
“सर्वभूतहिते रतः”
स्थान: अयोध्याकाण्ड- 2.1.31 (कुछ संस्करणों में भिन्नता)
श्रीराम के गुण बताते हुए कहा गया है कि वे सभी प्राणियों के हित में लगे रहते थे।
यह “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” का प्रत्यक्ष रूप है।
(2)“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”
स्थान: युद्धकाण्ड --6.124.17 (लोकप्रिय पाठ)
अर्थ:
माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।
यहाँ अपने कर्तव्य और धर्म पालन से समाज को श्रेष्ठ बनाने का संदेश है।
2. गर्ग संहिता में प्रमाण--
(1)
“लोकानां हितकारिणौ”
स्थान: गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड (अध्याय भिन्न संस्करणों में बदलता है)
श्रीकृष्ण और बलराम को
संपूर्ण लोकों के हित करने वाले कहा गया है।
(2)“भवाय सर्वभूतानाम्”
संदर्भ: विभिन्न अध्यायों में भगवान के अवतार का उद्देश्य
अर्थ:
“सभी प्राणियों के कल्याण के लिए”
यह स्पष्ट करता है कि दिव्य कार्य का उद्देश्य विश्व का कल्याण और उत्थान है।
3- योग वशिष्ठ में प्रमाण-
(1) “सर्वभूतहिते रतः”
स्थान: योग वशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण (अध्याय भिन्न)
ज्ञानी पुरुष का लक्षण बताया गया है कि वह सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
(2)“यथा सर्वाणि भूतानि आत्मन्येव पश्यति”
स्थान: योग वशिष्ठ, उपशम प्रकरण
अर्थ:
जब मनुष्य सभी प्राणियों को अपने समान देखता है—
तब वह किसी का अहित नहीं करता और विश्व को श्रेष्ठ बनाने की दिशा में कार्य करता है।
पारसी धर्म में प्रमाण--
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (सम्पूर्ण
विश्व को श्रेष्ठ बनाओ) का भाव पारसी (ज़ोराष्ट्रियन) धर्म में भी स्पष्ट रूप से मिलता है—जहाँ सत्य (अशा), अच्छे विचार, अच्छे वचन, और अच्छे कर्म द्वारा संसार को बेहतर बनाने की शिक्षा दी गई है।
नीचे जरथुस्त्र के उपदेश (अवेस्ता) से प्रमाण—अवेस्ता लिपि के साथ—
1. अहुनवैर्य (यथा अहु वयर्यो) — यज्ञ 27.13
𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬊
𐬀𐬚𐬀 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬱 𐬀𐬴𐬀𐬙𐬙𐬌𐬙𐬀𐬙𐬀𐬙𐬀𐬙𐬀
(संक्षिप्त रूप में)
भावार्थ:
जैसे ईश्वर का शासन है, वैसे ही मनुष्य को भी धर्म और सत्य के अनुसार चलकर संसार में न्याय और भलाई स्थापित करनी चाहिए।
यह विश्व को श्रेष्ठ बनाने का मूल सिद्धांत है।
2. अशेम वहु — यज्ञ 27.14
𐬀𐬱𐬆𐬨 𐬬𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬯𐬙𐬌 𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
भावार्थ:
“धर्म (अशा) ही सर्वोत्तम है, और जो धर्म के लिए जीता है, वही सच्चा सुख पाता है।”
धर्म और सत्य के पालन से ही समाज और विश्व का उत्थान होता है।
3. गाथा (यज्ञ 30.2)
𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬀𐬙 𐬀𐬭𐬀𐬙𐬀 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀
𐬨𐬀𐬥𐬀𐬥𐬙𐬆𐬨 𐬎𐬙𐬀 𐬯𐬀𐬎𐬗𐬀𐬨𐬀
(भावानुसार अंश)
भावार्थ:
सुनो, समझो, और फिर अपने विवेक से सही मार्ग चुनो—
अर्थात् हर व्यक्ति को सत्य और श्रेष्ठता का मार्ग अपनाकर संसार को बेहतर बनाना चाहिए।
4. मूल सिद्धांत (ज़ोराष्ट्रियन धर्म)
अवेस्ता सूत्र:
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬬𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
उच्चारण: Humata, Hukhta, Hvarshta
भावार्थ:
“अच्छे विचार, अच्छे वचन, और अच्छे कर्म”
यही सिद्धांत पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाने का व्यावहारिक मार्ग है।
निष्कर्ष
पारसी धर्म सिखाता है—
सत्य (अशा) का पालन करो।
अच्छे विचार, वचन और कर्म अपनाओ।
दूसरों के लिए भी भलाई करो।
इस प्रकार, अवेस्ता का संदेश भी “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” की ही तरह पूरे विश्व को श्रेष्ठ, धर्ममय और कल्याणकारी बनाने की प्रेरणा देता है।
आदि शंकराचार्य जी के साहित्य से प्रमाण --
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (विश्व को
श्रेष्ठ बनाओ) के भाव को आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में सीधे-सीधे तो यही वाक्य नहीं मिलता, परंतु उनके ग्रंथों में सर्वजन-कल्याण, आत्म-उत्थान और विश्व-एकता का वही भाव स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। नीचे उनके साहित्य से प्रमाण—श्लोक और श्लोक संख्या सहित
1. भज गोविन्दम् (मोहमुद्गर) — श्लोक 1
“भज गोविन्दं भज गोविन्दं
गोविन्दं भज मूढमते।
सम्प्राप्ते सन्निहिते काले
न हि न हि रक्षति डुकृञ्करणे॥”
भावार्थ:
हे मनुष्य! केवल बौद्धिक ज्ञान नहीं, बल्कि ईश्वर-भक्ति और सदाचार अपनाओ—यही सच्चा उत्थान है।
यह “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” के लिए पहले स्वयं को श्रेष्ठ बनाने का संदेश देता है।
2. विवेकचूडामणि — श्लोक 11
“वेदो नित्यमधीयतां तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयताम्।
तेनेशस्य विधीयतामपचितिः काम्ये मतिस्त्यज्यताम्॥”
भावार्थ:
वेदों का अध्ययन करो, उनके अनुसार आचरण करो, और ईश्वर की सेवा करो।
यह समाज में धर्म, अनुशासन और श्रेष्ठ आचरण स्थापित करने की प्रेरणा देता है।
3. विवेकचूडामणि — श्लोक 37
“शान्ता महान्तो निवसन्ति सन्तो
वसन्तवल्लोकहितं चरन्तः।
तीर्णाः स्वयं भीमभवार्णवं जनान्
अहेतुनान्यानपि तारयन्तः॥”
भावार्थ:
महापुरुष स्वयं संसार-सागर से पार होकर, वसन्त ऋतु की तरह निःस्वार्थ भाव से लोक-कल्याण करते हैं और दूसरों को भी पार कराते हैं।
यह सीधे “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” की भावना का दार्शनिक आधार है।
4. निर्वाण षट्कम् — श्लोक 1
“मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं
न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥”
भावार्थ:
मैं शुद्ध चैतन्य हूँ—सबमें वही एक आत्मा है।
जब सबमें एक ही आत्मा है, तो सभी का उत्थान ही अपना उत्थान है — यही “विश्व को आर्य बनाओ” का मूल दर्शन है।
निष्कर्ष
आदि शंकराचार्य के अनुसार—
पहले स्व-उत्थान (आत्मज्ञान)
फिर लोक-कल्याण (सेवा और करुणा)।
और अंततः सर्वत्र एकत्व की भावना।
यही तीनों मिलकर “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” के आदर्श को पूर्ण करते हैं।
इस्लाम धर्म में प्रमाण--
(क़ुरआन और हदीस से)
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाओ / सबका उत्थान करो) का जो भाव है—सर्वजन हित, नैतिकता और मानवता—वह इस्लामिक धर्मग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। नीचे क़ुरआन और हदीस से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. क़ुरआन से प्रमाण
(क)
“इन्नल्लाह यअमुरु बिल-अद्लि वल-इह्सान…”
(إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالإِحْسَانِ)
सूरह अन-नहल (16:90)
अर्थ:
अल्लाह आदेश देता है न्याय (अद्ल) और भलाई (एहसान) का।
यह समाज को श्रेष्ठ बनाने का मूल सिद्धांत है।
(2)
“मन क़तल नफ़्सन… फका-अन्नमा क़तलन्नास जमीयन,
व मन अह्याहा फका-अन्नमा अह्यन्नास जमीयन”
सूरह अल-माइदा (5:32)
अर्थ:
जिसने एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या की, उसने मानो पूरी मानवता को मारा;
और जिसने एक को बचाया, उसने पूरी मानवता को बचाया।
यह विश्व-कल्याण और मानवता की रक्षा का सर्वोच्च भाव है।
(3)
“व मा अरसल्नाक इल्ला रहमतन लिल-आलमीन”
सूरह अल-अंबिया (21:107)
अर्थ:
(हे मुहम्मद) हमने आपको सारे संसार के लिए दया (रहमत) बनाकर भेजा।
यहाँ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की बात है।
(4)
“ला इकराह फिद्दीन”
सूरह अल-बक़रा (2:256)
अर्थ:
धर्म में कोई जबरदस्ती नहीं है।
यह सहिष्णुता और नैतिक श्रेष्ठता का सिद्धांत है।
2. हदीस से प्रमाण--
(सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)
(1)
“खैरुन्नास मन यनफ़अुन्नास”
(मुस्नद अहमद / अन्य संग्रहों में)
अर्थ:
सबसे अच्छा इंसान वह है जो दूसरों के लिए सबसे अधिक लाभदायक हो।
यह “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” का सीधा रूप है।
(2)
“ला युमिनु अहदुकुम हत्ता युहिब्ब लि-अखीहि मा युहिब्बु लिनफ़्सिहि”
सहीह बुखारी 13 / सहीह मुस्लिम 45
अर्थ:
तुम में से कोई सच्चा ईमान वाला नहीं हो सकता जब तक वह अपने भाई के लिए वही पसंद न करे जो अपने लिए करता है।
यह सर्वहित और समानता की भावना है।
निष्कर्ष
इस्लामिक ग्रन्थों में भी वही मूल भावना मिलती है जो
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” में है:
न्याय और भलाई (अद्ल, इ
जहसान)
संपूर्ण मानवता की रक्षा
विश्व के लिए दया (रहमत)
दूसरों के लिए उपयोगी बनना
अर्थात् —
सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के उत्थान और कल्याण के लिए कार्य करना।
सिक्ख ग्रन्थों में प्रमाण--
गुरु ग्रन्थ साहिब से प्रमाण--
(1)
“ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ” (सरबत दा भला)
अर्थ/स्रोत:
यह पंक्ति सिख अरदास का मुख्य भाग है (गुरु परम्परा से)
अर्थ:
सभी का भला हो, सबका कल्याण हो।
यह सीधे “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” का भाव है।
(2)
“ਨ ਕੋ ਬੈਰੀ ਨਹੀ ਬਿਗਾਨਾ, ਸਗਲ ਸੰਗ ਹਮ ਕਉ ਬਨਿ ਆਈ”
गुरु ग्रन्थ साहेब- 1299
अर्थ:
न कोई मेरा शत्रु है, न कोई पराया;
मैं सबके साथ प्रेमपूर्वक रहता हूँ।
यह विश्व-बंधुत्व और श्रेष्ठ आचरण का संदेश है।
(3)
“ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ, ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ”
गुरु ग्रन्थ साहेब- 425
अर्थ:
सभी जीवों का दाता एक ही परमात्मा है।
इससे सभी में एकता और समानता का भाव आता है।
दशम ग्रन्थ में प्रमाण--
(1)
“ਮਾਨਸ ਕੀ ਜਾਤ ਸਭੈ ਏਕੈ ਪਹਿਚਾਨਬੋ”
(गुरु गोबिन्द सिंह)
स्रोत: दशम ग्रंथ
अर्थ:
पूरी मानव जाति को एक ही समझो।
यह सम्पूर्ण मानवता को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देता है।
(2)
“ਜਿਨ ਪ੍ਰੇਮ ਕੀਓ ਤਿਨ ਹੀ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਓ”
(गुरु गोबिन्द सिंह)
स्रोत: दशम ग्रंथ
अर्थ:
जिसने प्रेम किया, उसी ने परमात्मा को पाया।
प्रेम और करुणा से ही विश्व का उत्थान संभव है।
निष्कर्ष--
सिक्ख धर्म का मूल संदेश ही है:
सरबत दा भला → सबका कल्याण
कोई पराया नहीं → विश्व-बंधुत्व
सबमें एक ही परमात्मा → समानता
प्रेम और सेवा → श्रेष्ठ समाज का निर्माण
इसलिए सिक्ख धर्म भी पूरी तरह से“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” के भाव को पुष्ट करता है—
“सभी का भला करो, सभी को श्रेष्ठ बनाओ।”
ईसाई धर्म में प्रमाण--
1. बाइबल से प्रमाण
(1)
“Love your neighbour as yourself.”
(अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो)
मत्ती- 22:39 (Matthew 22:39)
यह सार्वभौमिक प्रेम और मानवता का मूल सिद्धांत है।
(2)
“Blessed are the peacemakers: for they shall be called the children of God.”
मत्ती- 5:9 (Matthew 5:9)
अर्थ:
धन्य हैं वे जो शांति स्थापित करते हैं।
यह समाज और विश्व को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा है।
(3)
“Do to others as you would have them do to you.”
लूका- 6:31 (Luke 6:31)
अर्थ:
दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम अपने लिए चाहते हो।
यह नैतिक श्रेष्ठता और समानता का सिद्धांत है।
(4)
“Love your enemies and pray for those who persecute you.”
मत्ती 5:44 (Matthew 5:44)
अर्थ:
अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो और जो तुम्हें सताते हैं उनके लिए प्रार्थना करो।
यह उच्चतम स्तर की करुणा और श्रेष्ठता दर्शाता है।
(5)
“Let your light shine before others, that they may see your good deeds.”
मत्ती 5:16 (Matthew 5:16)
अर्थ:
अपने अच्छे कर्मों से दूसरों के सामने प्रकाश फैलाओ।
यह पूरे समाज को प्रेरित कर श्रेष्ठ बनाने का संदेश है।
(6)
“Go into all the world and preach the gospel to all creation.”
मरकुस 16:15 (Mark 16:15)
अर्थ:
पूरे संसार में जाओ और शुभ संदेश फैलाओ।
यह विश्व-स्तर पर नैतिकता और धर्म का प्रसार है।
निष्कर्ष-
ईसाई धर्मग्रन्थों में भी वही मूल भाव मिलता है:
सबसे प्रेम करो (Universal Love)
शांति स्थापित करो (Peace)
समानता और नैतिकता (Golden Rule)
अच्छे कर्मों से समाज को प्रेरित करो
अर्थात् —
पूरा विश्व नैतिक, प्रेमपूर्ण और श्रेष्ठ बने।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का सार्वभौमिक रूप है।
जैन धर्म में प्रमाण--
1. तत्त्वार्थ सूत्र
(1)
“परस्परोपग्रहो जीवानाम्”
अध्याय 5, सूत्र 21
अर्थ:
“सभी जीव एक-दूसरे के उपकार (सहयोग) के लिए हैं।”
वो यह स्पष्ट रूप से बताता है कि
सभी का हित करना ही धर्म है — यही “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” है।
2. आचारांग सूत्र
“सव्वे पाणा न हन्तव्वा”
प्रथम श्रुतस्कंध, अध्याय 4 (भावार्थ)
अर्थ:
“सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।”
अहिंसा के माध्यम से ही विश्व का कल्याण संभव है।
3. उत्तराध्ययन सूत्र
(3)
“खम्मामि सव्व जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ति मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झ न केणइ॥”
अध्याय 4, श्लोक 62
अर्थ:
मैं सभी जीवों से क्षमा चाहता हूँ, सभी मुझे क्षमा करें;
मेरा सभी से मित्रभाव है, किसी से वैर नहीं।
यह विश्व-बंधुत्व और शुद्ध आचरण का सर्वोच्च आदर्श है।
4. दशवैकालिक सूत्र
(4)
“अहिंसा परमॊ धर्मः” (भावार्थ रूप में जैन परम्परा में अत्यंत प्रसिद्ध)
संदर्भ: दशवैकालिक सूत्र (भावार्थ आधारित परम्परा)
अर्थ:
अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है।
अहिंसा से ही सभी जीवों का कल्याण और श्रेष्ठता संभव है।
5. महावीर स्वामी के उपदेश
(5)
“जीओ और जीने दो” (परम्परागत उपदेश)
अर्थ:
स्वयं भी जीओ और दूसरों को भी जीने दो।
यह सम्पूर्ण विश्व के प्रति करुणा और सह-अस्तित्व का सिद्धांत है।
निष्कर्ष--
जैन धर्म का मूल ही है:
अहिंसा (Non-violence)
सर्वजीव कल्याण (Universal welfare)
मित्रभाव और क्षमा (Friendship & Forgiveness)
परस्पर सहयोग (Mutual support)
इसलिए जैन धर्म भी पूरी तरह से यह सिखाता है कि—
“संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाओ, सबका भला करो”
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का मूल रूप है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
त्रिपिटक से प्रमाण-- पिटक–ग्रन्थ–श्लोक/सूत्र संख्या सहित दिए जा रहे हैं:
1. सुत्त पिटक – करणीय मेत्ता सुत्त
(1)
“सुखिनो वा खेमिनो होंतु, सब्बे सत्ताः”
सुत्त निपात-- 1.8 (Karaniya Metta Sutta)
अर्थ:
“सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित हों।”
यह सार्वभौमिक कल्याण (Universal welfare) का सीधा संदेश है।
(2)
“माता यथा निअं पुत्रं आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे…”
सुत्त निपात-- 1.8
अर्थ:
जैसे माता अपने इकलौते पुत्र की रक्षा करती है,
वैसे ही सभी प्राणियों के प्रति प्रेम रखो।
यह सर्वोच्च करुणा और विश्व-हित का आदर्श है।
2. धम्मपद
(3)
“सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा;
सचित्तपरियोदपनं — एतं बुद्धानं सासनं॥”
धम्मपद, श्लोक 183
अर्थ:
पाप न करना, पुण्य करना और मन को शुद्ध रखना—
यही बुद्ध का उपदेश है।
यह मनुष्य को श्रेष्ठ बनाकर समाज को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग है।
(4)
“न हि वेरेन वेरानि सम्मन्ति ध कुदाचनं;
अवेरेन च सम्मन्ति…”
धम्मपद, श्लोक 5
अर्थ:
द्वेष से द्वेष कभी समाप्त नहीं होता,
केवल प्रेम (अद्वेष) से ही समाप्त होता है।
यह विश्व-शांति और श्रेष्ठता का मूल सिद्धांत है।
3. अंगुत्तर निकाय
(5)
“बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय”
अंगुत्तर निकाय (AN 4.95 आदि संदर्भ)
अर्थ:
“अनेक लोगों के हित और सुख के लिए”
बुद्ध के उपदेशों का उद्देश्य ही
संपूर्ण समाज और विश्व का कल्याण है।
4. गौतम बुद्ध के उपदेश
(6)
“मेत्ता (मैत्री), करुणा, मुदिता, उपेक्षा” (चार ब्रह्मविहार)
अर्थ:
सभी प्राणियों के प्रति
प्रेम (मैत्री),दया (करुणा)
आनंद (मुदिता) समभाव (उपेक्षा)
यह विश्व को श्रेष्ठ बनाने का मानसिक और आध्यात्मिक आधार है।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म का मूल संदेश है:
सब प्राणी सुखी हों (Metta)
करुणा और प्रेम से द्वेष समाप्त करो
बहुजन हित और सुख के लिए कार्य करो
स्वयं को सुधारो, विश्व सुधरेगा
अर्थात् —संपूर्ण विश्व का उत्थान और कल्याण
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का मूल रूप है।
(यहूदी धर्मग्रन्थ,तनाख) में प्रमाण--
1. तनाख से प्रमाण
(1)
“Love your neighbor as yourself.”
लैव्यव्यवस्था 19:18 (Leviticus 19:18)
अर्थ:
अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो।
यह सार्वभौमिक प्रेम और नैतिक श्रेष्ठता का मूल सिद्धांत है।
(2)
“Seek peace and pursue it.”
भजन संहिता 34:14 (Psalms 34:14)
अर्थ:
शांति की खोज करो और उसका अनुसरण करो।
यह समाज और विश्व में शांति स्थापित करने का संदेश है।
(3)
“What does the Lord require of you? To act justly, love mercy, and walk humbly with your God.”
मीका 6:8 (Micah 6:8)
अर्थ:
ईश्वर तुमसे क्या चाहता है? — न्याय करो, दया से प्रेम करो, और विनम्रता से चलो।
यह नैतिक जीवन द्वारा विश्व को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग है।
(4)
“Justice, justice shall you pursue.”
व्यवस्थाविवरण 16:20 (Deuteronomy 16:20)
अर्थ:
न्याय का ही अनुसरण करो।
यह समाज को धर्मपूर्ण और श्रेष्ठ बनाने का आधार है।
(5)
“He has told you, O man, what is good…”
मीका 6:8 (Micah 6:8) (ऊपर का ही विस्तृत भाग)
यह बताता है कि अच्छा जीवन जीकर समाज का उत्थान करना ही धर्म है।
2. यहूदी परम्परा (Talmud)
(6)
“What is hateful to you, do not do to your fellow.”
(जो तुम्हें अपने लिए बुरा लगे, वह दूसरों के साथ मत करो)
तलमूद – Shabbat 31a
यह प्रसिद्ध उपदेश हिलेल का है।
यह “Golden Rule” का नकारात्मक रूप है,
जो सार्वभौमिक नैतिकता सिखाता है।
निष्कर्ष--
यहूदी धर्म में मुख्य सिद्धांत हैं:
पड़ोसी से प्रेम (Love)
न्याय और धर्म (Justice)
दया और विनम्रता (Mercy & Humility)
शांति का अनुसरण (Peace)
अर्थात् —
समाज और विश्व को नैतिक, न्यायपूर्ण और श्रेष्ठ बनाना
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का मूल रूप है।
सूफ़ी सन्तों से प्रमाण
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (संपूर्ण ।
विश्व को श्रेष्ठ बनाओ) का भाव सूफ़ी परंपरा में इंसानियत, प्रेम, और सार्वभौमिक भलाई के रूप में मिलता है। नीचे प्रमुख सूफ़ी संतों के प्रमाण—अरबी और फ़ारसी लिपि के साथ—
1. जलालुद्दीन रूमी (फ़ारसी)
“بیا تا گل برافشانیم و می در ساغر اندازیم
فلک را سقف بشکافیم و طرحی نو دراندازیم”
भावार्थ:
आओ हम मिलकर नई दुनिया बनाएं, पुराने ढाँचे तोड़कर एक नया, श्रेष्ठ संसार रचें।
यह पूरे विश्व को बेहतर बनाने की प्रेरणा देता है।
2. सादी शीराज़ी (फ़ारसी)
“بنیآدم اعضای یکدیگرند
که در آفرینش ز یک گوهرند”
भावार्थ:
सभी मनुष्य एक ही शरीर के अंग हैं, क्योंकि सब एक ही स्रोत से बने हैं।
जब सब एक हैं, तो सबका उत्थान ही “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” है।
3. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (फ़ारसी/हिंदी परंपरा)
“ہر کہ او را دل است، در دل او خداست”
भावार्थ:
जिसके पास दिल है, उसके दिल में खुदा है।
हर इंसान में ईश्वर है—इसलिए सभी के साथ प्रेम और भलाई करो।
4. इब्न अरबी (अरबी)
“قلبي صار قابلاً كل صورة
فمرعى لغزلان ودير لرهبان”
भावार्थ:
मेरा हृदय हर रूप को स्वीकार करता है—वह हर धर्म और हर प्राणी के लिए स्थान है।
यह सार्वभौमिकता और विश्व-एकता का सर्वोच्च भाव है।
5. मंसूर अल-हल्लाज (अरबी)
“أنا الحق”
भावार्थ:
“मैं सत्य हूँ” — अर्थात् ईश्वर हर प्राणी में विद्यमान है।
जब सबमें वही सत्य है, तो सभी को ऊँचा उठाना ही सच्ची साधना है।
निष्कर्ष
सूफ़ी संतों के अनुसार—
इंसानियत = ईश्वर की सेवा
सभी एक हैं = सबका उत्थान आवश्यक है
प्रेम और करुणा = विश्व को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग
इस प्रकार सूफ़ी विचार भी “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” के समान ही संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ, प्रेममय और एकता से युक्त बनाने का संदेश देता है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (सम्पूर्ण
विश्व को श्रेष्ठ बनाओ) का भाव ताओ धर्म में भी मिलता है, जहाँ संतुलन, करुणा, सरलता और प्रकृति के साथ सामंजस्य द्वारा संसार को बेहतर बनाने की शिक्षा दी गई है।
नीचे लाओत्से (Laozi) के ग्रंथ ताओ ते चिंग से प्रमाण—चीनी लिपि (हंज़ी) के साथ—
1. ताओ ते चिंग — अध्याय 49
“圣人无常心,以百姓心为心。”
भावार्थ:
संत का अपना अलग स्वार्थ नहीं होता, वह लोगों के हृदय को ही अपना हृदय बना लेता है।
अर्थात् सबके हित में सोचकर कार्य करना—यही विश्व को श्रेष्ठ बनाना है।
2. ताओ ते चिंग — अध्याय 8
“上善若水。水善利万物而不争。”
भावार्थ:
सबसे उत्तम गुण जल के समान है—जो सबका हित करता है और किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं करता।
बिना स्वार्थ के सबका भला करना—यही श्रेष्ठता है।
3. ताओ ते चिंग — अध्याय 67
“我有三宝,持而保之:一曰慈,二曰俭,三曰不敢为天下先。”
भावार्थ:
मेरे तीन रत्न हैं—करुणा, सादगी, और विनम्रता (आगे बढ़ने की लालसा न रखना)।
ये गुण अपनाकर मनुष्य स्वयं और समाज—दोनों को श्रेष्ठ बनाता है।
4. ताओ ते चिंग — अध्याय 77
“天之道,损有余而补不足。”
भावार्थ:
प्रकृति का नियम है—जहाँ अधिक है वहाँ से घटाकर जहाँ कमी है वहाँ पूरा करना।
अर्थात् संतुलन और न्याय स्थापित करना—यही विश्व-कल्याण है।
निष्कर्ष
ताओ धर्म के अनुसार—
करुणा (慈)
निस्वार्थ सेवा (利万物而不争)
संतुलन और न्याय
ये सभी मिलकर “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” के समान ही
पूरे विश्व को श्रेष्ठ, संतुलित और कल्याणकारी बनाने का मार्ग दिखाते हैं।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण--
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (सम्पूर्ण
विश्व को श्रेष्ठ बनाओ) का भाव कन्फ्यूशियस परंपरा में भी स्पष्ट रूप से मिलता है, जहाँ नैतिकता, सामाजिक समरसता और आत्म-संस्कार के माध्यम से पूरे समाज को श्रेष्ठ बनाने की शिक्षा दी गई है।
नीचे कन्फ्यूशियस के ग्रंथों से प्रमाण—चीनी लिपि (हंज़ी) के साथ—
1. लुन्यु (Analects) — अध्याय 12.2
“己所不欲,勿施于人。”
भावार्थ:
जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत थोपो।
यह सार्वभौमिक नैतिकता का सिद्धांत है—जिससे पूरा समाज श्रेष्ठ बनता है।
2. द ग्रेट लर्निंग (大学) — मुख्य सूत्र
“大学之道,在明明德,在亲民,在止于至善。”
भावार्थ:
महान शिक्षा का मार्ग है—अपने श्रेष्ठ गुणों को प्रकट करना, लोगों को सुधारना, और सर्वोच्च अच्छाई तक पहुँचना।
यह व्यक्ति से समाज और फिर विश्व को श्रेष्ठ बनाने की प्रक्रिया बताता है।
3. मेंगज़ी (孟子) — 7A:45
“老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。”
भावार्थ:
जैसे आप अपने बुजुर्गों और बच्चों का ध्यान रखते हैं, वैसे ही दूसरों के भी रखो।
यह करुणा और सार्वभौमिक सेवा का संदेश है।
4. लिजी (礼记) — “दातोंग” विचार
“大道之行也,天下为公。”
भावार्थ:
जब महान मार्ग चलता है, तब पूरा संसार सबका हो जाता है।
यह आदर्श समाज (विश्व-कल्याण) की परिकल्पना है।
निष्कर्ष
कन्फ्यूशियस परंपरा सिखाती है
आत्म-संस्कार (Self-cultivation)
नैतिक आचरण (Ethics)
सामाजिक समरसता (Harmony)
इन सिद्धांतों के माध्यम से
व्यक्ति → समाज → विश्व
सबको श्रेष्ठ बनाया जा सकता है।
इस प्रकार कन्फ्यूशियस धर्मग्रंथ भी “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” के समान ही। संपूर्ण विश्व को नैतिक, समरस और श्रेष्ठ बनाने का संदेश देते हैं।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (सम्पूर्ण
विश्व को श्रेष्ठ बनाओ) का भाव शिन्तो (Shintō) धर्म में भी मिलता है, जहाँ पवित्रता (清め), प्रकृति के प्रति सम्मान, और सामूहिक कल्याण पर बल दिया गया है।
नीचे शिन्तो परंपरा के ग्रंथों/प्रार्थनाओं से प्रमाण—जापानी लिपि (漢字・かな) के साथ
1. कोजिकी (古事記)
“八百万の神と共に、この国を清く安らかに治める。”
भावार्थ:
असंख्य देवताओं (कामी) के साथ मिलकर इस संसार को शुद्ध और शांतिपूर्ण बनाओ।
यह पूरे समाज और विश्व को पवित्र व श्रेष्ठ बनाने का आदर्श है।
2. निहोन शोकि (日本書紀)
“天下を平らけく安らけく治める。”
भावार्थ:
संपूर्ण संसार को शांति और संतुलन के साथ संचालित करो।
यह “विश्व-कल्याण” और “सामूहिक श्रेष्ठता” का संदेश देता है।
3. शिन्तो प्रार्थना (祝詞 — Norito)
“祓え給い清め給え、守り給い幸え給え。”
भावार्थ:
हे देवताओं! हमें शुद्ध करो, रक्षा करो, और कल्याण प्रदान करो।
शुद्धता और कल्याण—ये मिलकर समाज को श्रेष्ठ बनाते हैं।
4. शिन्तो सिद्धांत (कामी के प्रति भाव)
“和を以て貴しと為す。”
भावार्थ:
सामंजस्य (Harmony) को सर्वोच्च मानो।
जब समाज में सामंजस्य होगा, तब ही विश्व श्रेष्ठ बनेगा।
निष्कर्ष
शिन्तो धर्म सिखाता है—
शुद्धता (清め)
सामंजस्य (和)
प्रकृति और देवताओं के साथ संतुलन
ये सभी मिलकर “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” के समान ही
पूरे विश्व को पवित्र, संतुलित और कल्याणकारी बनाने का मार्ग दिखाते हैं।
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