ऋग्वेद सूक्ति--(52) की व्याख्या
ऋग्वेद सूक्ति--(52) की व्याख्या -"समानी व आकूति:"
ऋगुवेद -
10/191/3
भाव--समान विचार रखो।
यह दिया हुआ मन्त्र ऋग्वेद (10.191.3) का अंश है—
मन्त्र:
“समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥”
सरल भावार्थ_
आपका भाव बिल्कुल सही है—
“सभी लोगों के विचार (आकांक्षाएँ/उद्देश्य) समान हों।”
लेकिन इसका अर्थ थोड़ा और व्यापक है—
समानी व आकूतिः → सबकी इच्छाएँ और लक्ष्य एक जैसे हों।
समाना हृदयानि वः → सबके हृदय (भावनाएँ) समान हों।
समानमस्तु वो मनः → सबका मन एक जैसा हो।
यथा वः सुसहासति → जिससे आप सब मिलकर सुखपूर्वक रह सकें
विस्तृत भाव--
यह मन्त्र सामाजिक एकता, सामंजस्य और सहयोग की शिक्षा देता है।
ऋषि कहते हैं कि—
जब लोगों के विचार, भाव और उद्देश्य एक दिशा में होते हैं, तब समाज में शांति रहती है। सहयोग बढ़ता है। संघर्ष कम होता है
सार---
भाव—“समान विचार रखो”—सही है, लेकिन पूरा मन्त्र यह भी कहता है कि— केवल विचार ही नहीं, बल्कि मन और हृदय भी एकता में हों, तभी सच्चा सामंजस्य बनता है।
वेदों में प्रमाण--
1. ऋग्वेद-- 10.191.2
मन्त्र:
“सं गच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥”
अर्थ:
तुम सब मिलकर चलो, मिलकर बोलो और अपने मनों को एक करो।
जैसे प्राचीन देवता एक भाव से यज्ञ करते थे, वैसे ही तुम भी एकता से रहो।
2. ऋग्वेद-- 10.191.3
मन्त्र:
“समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥”
अर्थ:
तुम्हारी इच्छाएँ, हृदय और मन समान हों, जिससे तुम सब मिलकर सुखपूर्वक रह सको।
3. अथर्ववेद-- 3.30.1
मन्त्र:
“समानी प्रपा सह वोऽन्नभागाः
समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि।”
अर्थ:
तुम सबका जल और अन्न समान हो, और तुम सब एक ही बंधन (सम्बन्ध) में जुड़े रहो।
4. अथर्ववेद-- 3.30.4
मन्त्र:
“समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥”
अर्थ:
(ऋग्वेद के समान) — तुम्हारे विचार, हृदय और मन एक हों, जिससे आपसी सुख बना रहे।
5. यजुर्वेद --36.18
मन्त्र:
“मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।”
अर्थ:
मैं सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूँ।
(अर्थात् सबके प्रति समानता और सद्भाव रखें)
6. यजुर्वेद --40.1 (ईशावास्योपनिषद् मन्त्र)
मन्त्र:
“ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।”
अर्थ:
इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश्वर से आवृत है।
(अर्थात् सबमें एक ही तत्व है—इसलिए भेदभाव नहीं करना चाहिए)
निष्कर्ष---
वेदों का स्पष्ट संदेश है—
एकता, समानता, सामंजस्य और परस्पर सहयोग। साथ चलो (सं गच्छध्वं)।साथ सोचो (समानं मनः)।
सबको समान दृष्टि से देखो।
उपनिषदो में प्रमाण--
1. ईशावास्योपनिषद् ---6
यस्तु सर्वाणि भूतानि
आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥”
अर्थ:
जो व्यक्ति सभी प्राणियों को अपने आत्मा में और अपने आत्मा को सभी प्राणियों में देखता है,
वह किसी से घृणा नहीं करता।
2. ईशावास्योपनिषद् मन्त्र -7
मन्त्र:
“यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥”
अर्थ:
जो ज्ञानी सबमें एक ही आत्मा को देखता है, उसे न मोह होता है, न शोक—क्योंकि वह एकत्व को समझ चुका है।
3. छान्दोग्य उपनिषद्-- 6.8.7
“तत्त्वमसि”
अर्थ:
“वह (ब्रह्म) तू ही है।”
अर्थात् जीव और ब्रह्म में मूलतः एकता है
4. बृहदारण्यक उपनिषद् --1.4.10
“अहं ब्रह्मास्मि”
अर्थ:
“मैं ब्रह्म हूँ।”
(अर्थात् आत्मा और परमात्मा में भेद नहीं है)
5. माण्डूक्य उपनिषद् मन्त्र-- 2
“अयमात्मा ब्रह्म”
अर्थ:
यह आत्मा ही ब्रह्म है।
(सबमें एक ही चेतना का निवास है)
6. कठोपनिषद्-- 2.1.10
मन्त्र:
“यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह।
मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥”
अर्थ:
6-जो यहाँ (इस संसार में) अनेकता देखता है,
वह जन्म-मरण के चक्र में फँसा रहता है।
7. श्वेताश्वतर उपनिषद्-- 6.11
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।”
अर्थ:
एक ही परमात्मा सब प्राणियों में छिपा हुआ है, वह सबमें व्याप्त और सबका अंतरात्मा है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों का मूल सिद्धान्त है—
“सबमें एक ही आत्मा (ब्रह्म) है”
इसलिए—किसी से द्वेष नहीं।
सबके प्रति समान दृष्टि।
एकत्व का अनुभव ही ज्ञान है।
पुराणों में प्रमाण--
1. भागवत पुराण --11.29.15
“सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः॥”
अर्थ:
जो मनुष्य सभी प्राणियों में भगवान् को और भगवान् में सभी प्राणियों को देखता है,
वही श्रेष्ठ भक्त (भागवतोत्तम) है।
2. विष्णु पुराण- 1.19.85
“समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥”
अर्थ:
जो परमेश्वर को सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित देखता है,
और नश्वर शरीरों में भी उस अविनाशी तत्व को पहचानता है—वही वास्तव में देखता है।
. शिव पुराण --1.6.38
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।”
अर्थ:
एक ही परमात्मा सभी प्राणियों में छिपा हुआ है,
वह सबमें व्याप्त और सबका अंतरात्मा है।
4. गरुड़ पुराण-- 1.229.32
“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों में अपने समान (आत्मभाव) देखता है,
वही सच्चा ज्ञानी है।
5. नारद पुराण-- 1.41.62
“नास्ति तेषां पृथग्भावो येषां ब्रह्मणि चेतसि।”
अर्थ:
जिनका मन ब्रह्म में स्थित है, उनके लिए कोई भेदभाव नहीं रहता।
6. पद्म पुराण-- 2.71.38
“सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।”
अर्थ:
सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में सभी प्राणियों को देखो।
निष्कर्ष--
पुराणों का भी स्पष्ट संदेश है—
एक ही परमात्मा सबमें विद्यमान है, इसलिए सबके प्रति समान भाव रखें। सबमें भगवान् देखें।
भेदभाव त्यागें। आत्मभाव से व्यवहार करें।
भगवद्गीता में प्रमाण--
1. अध्याय 5, श्लोक 18
श्लोक:
“विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥”
अर्थ:
ज्ञानी पुरुष विद्या-विनययुक्त ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और चाण्डाल में भी
समान दृष्टि रखते हैं।
2. अध्याय 6, श्लोक 29
श्लोक:
“सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥”
अर्थ:
योगयुक्त व्यक्ति सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है।
3. अध्याय 6, श्लोक 30
श्लोक:
“यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥”
अर्थ:
जो मुझे (भगवान को) हर जगह देखता है और सबको मुझमें देखता है, वह मुझसे कभी अलग नहीं होता।
4. अध्याय 6, श्लोक 32
श्लोक:
“आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः॥”
अर्थ:
जो अपने समान सभी में समान भाव रखता है,
चाहे सुख हो या दुःख—वही श्रेष्ठ योगी है।
5. अध्याय 13, श्लोक 27
श्लोक:
“समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥”
अर्थ:
जो परमेश्वर को सभी प्राणियों में समान रूप से स्थित देखता है,
वही वास्तव में सत्य को देखता है।
6. अध्याय 13, श्लोक 28
श्लोक:
“समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्॥”
अर्थ:
जो हर जगह समान रूप से ईश्वर को देखता है,
वह किसी को हानि नहीं पहुँचाता और परम गति को प्राप्त करता है।
7. अध्याय 12, श्लोक 13–14
श्लोक:
“अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च…”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु है। वह भगवान को प्रिय है। निष्कर्ष--
गीता का स्पष्ट संदेश है—
समदृष्टि (Equality), सर्वात्मभाव (Oneness) और करुणा। सबमें ईश्वर देखें। सबको अपने समान समझें। किसी से द्वेष न करें।
महाभारत में प्रमाण--
1. शान्ति पर्व-- 262.5
श्लोक:
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”
अर्थ:
जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल (अप्रिय) हो,
वैसा दूसरों के साथ कभी न करो।
(अर्थात् सबको अपने समान समझो)
2. शान्ति पर्व-- 167.9
श्लोक:
“अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तथैव च।”
अर्थ:
अहिंसा ही परम धर्म है (और आवश्यकता पड़ने पर धर्मरक्षा भी)।
(अर्थात् सबके प्रति करुणा और समभाव रखें)
3. अनुशासन पर्व-- 113.8
श्लोक:
“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों में अपने समान भाव देखता है,
वही सच्चा ज्ञानी है।
4. शान्ति पर्व-- 188.8
श्लोक:
“सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।”
अर्थ:
सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में सभी प्राणियों को देखो।
5. वन पर्व-- 313.117
श्लोक:
“न हि मानुषात् श्रेष्ठतरं हि किञ्चित्।”
अर्थ:
मनुष्य से बढ़कर कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है।
अर्थात् सभी मनुष्यों का सम्मान समान रूप से होना चाहिए)
6. शान्ति पर्व-- 109.11
श्लोक:
“समं सर्वेषु भूतेषु वर्तयन्ति महात्मानः।”
अर्थ:
महात्मा लोग सभी प्राणियों के प्रति समान व्यवहार करते हैं।
निष्कर्ष--
महाभारत का भी यही संदेश है
दूसरों को अपने समान समझो, अहिंसा रखो और सबके प्रति समभाव अपनाओ।
जो अपने लिए अच्छा है, वही दूसरों के लिए भी करो।
किसी के साथ अन्याय न करो।
सबमें आत्मभाव रखें।
स्मृतियों में प्रमाण--
1. मनुस्मृति-- 6.92
श्लोक:
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”
अर्थ:
जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल (अप्रिय) हो,
वह दूसरों के साथ कभी न करो।
2. मनुस्मृति-- 5.18
श्लोक:
“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।”
अर्थ:
अहिंसा, सत्य, छचोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रिय-निग्रह—
ये सबके लिए समान धर्म हैं।
3. याज्ञवल्क्य स्मृति --1.122
श्लोक:
“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।”
अर्थ:
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच और इन्द्रिय-निग्रह—
ये सभी मनुष्यों के लिए समान आचरण हैं।
4. याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.145
श्लोक:
“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों में अपने समान भाव रखता है,
वही सच्चा ज्ञानी है।
5. पराशर स्मृति- 1.60
श्लोक:
“दया सर्वभूतेषु क्षान्तिः सर्वत्र साधुता।”
अर्थ:
सभी प्राणियों पर दया और सबके प्रति क्षमा—
यही श्रेष्ठ आचरण है।
6. नारद स्मृति- 1.15
श्लोक:
“धर्मो हि तेषां बलवान् समत्वेन व्यवस्थितः।”
अर्थ:
धर्म सबके लिए समान रूप से स्थापित है।
निष्कर्ष---
स्मृतियों का भी यही मूल संदेश है
आत्मवत् व्यवहार, अहिंसा, समता और दया दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा अपने लिए चाहते हों। सभी के प्रति समान धर्म लागू हो।
दया और क्षमा का पालन करो।
नीति-ग्रन्थों में प्रमाण--
1. चाणक्य नीति (अध्याय 1, श्लोक- 15)
श्लोक:
“मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥”
अर्थ: परायी स्त्री को माता के समान, पराये धन को मिट्टी के समान, और सभी प्राणियों को अपने समान देखने वाला ही सच्चा ज्ञानी है।
2. विदुर नीति (शान्ति/उद्योग पर्व संदर्भ)
श्लोक:
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।”
अर्थ:
जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल हो, वह दूसरों के साथ न करो।
3. हितोपदेश (मित्रलाभ)
श्लोक:
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
अर्थ:
“यह अपना है, यह पराया है”—ऐसा विचार छोटे मन वालों का है।
उदार हृदय वालों के लिए पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
4. पंचतंत्र
श्लोक:
“परहित सरिस धर्म नहि भाई, परपीड़ा सम नहि अधमाई।” (लोकप्रचलित भाव)
अर्थ:
दूसरों का भला करना सबसे बड़ा धर्म है,
और दूसरों को कष्ट देना सबसे बड़ा पाप है।
5. भर्तृहरि नीति शतक श्लोक-- 71
श्लोक:
“सन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगाः।”
अर्थ:
सज्जन लोग स्वयं ही दूसरों के हित में लगे रहते हैं।
6. सुभाषित संग्रह--
श्लोक:
“परोपकाराय सतां विभूतयः।”
अर्थ:
सज्जनों की सम्पत्ति (शक्ति/संसाधन) दूसरों के उपकार के लिए होती है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रन्थों का भी यही मूल संदेश है—
आत्मवत् व्यवहार, परोपकार, और समभाव सबको अपने समान समझो।
दूसरों का हित करो।
भेदभाव छोड़ो—“वसुधैव कुटुम्बकम्”
वाल्मीकि रामायण में प्रमाण--
1. अयोध्या काण्ड- 109.11
श्लोक:
“न हि परो धर्मोऽस्ति परोपकारात्।”
अर्थ:
परोपकार (दूसरों का भला करना) से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
2. अयोध्या काण्ड-- 2.30
श्लोक:
“सर्वभूतेषु हिते रतः।”
अर्थ:
(राम का वर्णन) — वे सभी प्राणियों के हित में लगे रहते थे।
3. अरण्य काण्ड- 37.12
श्लोक:
“दयालुः सर्वभूतेषु।”
अर्थ:
श्रीराम सभी प्राणियों पर दया करने वाले हैं।
अध्यात्म रामायण
4. अयोध्या काण्ड --3.15
श्लोक:
“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।”
अर्थ:
जो सभी प्राणियों में अपने समान भाव रखता है, वही ज्ञानी है।
5. अरण्य काण्ड-- 1.20
श्लोक:
“एक एव परो आत्मा सर्वभूतेषु गूढः।”
अर्थ:
एक ही परमात्मा सभी प्राणियों में छिपा हुआ है।
6. उत्तर काण्ड-- 5.22
श्लोक:
“निर्द्वन्द्वो हि महायोगी समदर्शी भवेत् सदा।”
अर्थ:
महान योगी सदा द्वन्द्व से रहित और समदर्शी होता है।
अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
1. अयोध्या काण्ड 3.16
श्लोक:
“सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा स सर्वत्र समदर्शी॥”
अर्थ:
जो साधक सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में सभी प्राणियों को देखता है,
वह सर्वत्र समदर्शी हो जाता है।
2. अरण्य काण्ड 1.19
श्लोक:
“एकोऽहं सर्वभूतेषु भूतात्मा अव्ययः स्थितः।”
अर्थ:
मैं (परमात्मा) एक ही होकर सभी प्राणियों में अविनाशी रूप से स्थित हूँ।
3. अरण्य काण्ड 1.20
श्लोक:
“एक एव परो ह्यात्मा सर्वभूतेषु गूढः।”
अर्थ:
एक ही परमात्मा सभी प्राणियों में छिपा हुआ है।
4. उत्तर काण्ड 5.21
श्लोक:
“निर्द्वन्द्वो हि महायोगी समदर्शी भवेत् सदा।”
अर्थ:
महान योगी सदा द्वन्द्व से रहित और समदर्शी होता है।
5. उत्तर काण्ड 7.24
श्लोक:
“यदा सर्वेषु भूतेषु समदृष्टिर्भविष्यति।
तदा मोक्षं अवाप्नोति नात्र कार्यविचारणम्॥”
अर्थ:
जब सभी प्राणियों में समान दृष्टि हो जाती है,
तब बिना किसी संदेह के मोक्ष प्राप्त होता है।
6. ब्रह्मज्ञान उपदेश (सार भाव)
श्लोक (भाव):
“अहमेवेदं सर्वं जगदात्मस्वरूपकम्।”
अर्थ:
यह सम्पूर्ण जगत मेरे ही आत्मस्वरूप का विस्तार है।
निष्कर्ष--
रामायण का मूल सिद्धान्त है—
अद्वैत (एकत्व), समभाव और ब्रह्मदृष्टि। सबमें एक ही आत्मा का निवास। समदृष्टि ही मुक्ति का मार्ग।भेदभाव अज्ञान है।
गर्ग संहिता में प्रमाण--
1. गोलोक खण्ड-- 12.45
श्लोक:
“सर्वभूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः।
भूतानि भगवत्यात्मन्येष भक्तः स उत्तमः॥
अर्थ:
जो सभी प्राणियों में भगवान् का भाव देखता है और सबको भगवान् में स्थित मानता है,
वही श्रेष्ठ भक्त है।
2. वृन्दावन खण्ड --5.18
श्लोक:
“एको देवः सर्वभूतेषु तिष्ठति हृदि सर्वदा।”
अर्थ:
एक ही परमात्मा सभी प्राणियों के हृदय में सदा स्थित है।
योग वशिष्ठ में प्रमाण-- --
3. निर्वाण प्रकरण-- 2.13.45
श्लोक:
“चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधनम्।”
अर्थ:
यह संसार मन (चित्त) ही है, इसलिए उसे शुद्ध करना चाहिए।
(जब चित्त शुद्ध होता है, तब समभाव उत्पन्न होता है)
4. उपशम प्रकरण- 6.12
श्लोक:
“सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।”
अर्थ:
सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में सभी प्राणियों को देखो।
5. वैराग्य प्रकरण --3.21
श्लोक:
“यदा सर्वत्र समदृष्टिः तदा मुक्तिः न संशयः।”
अर्थ:
जब सभी में समान दृष्टि हो जाती है, तब निःसंदेह मुक्ति प्राप्त होती है।
6. निर्वाण प्रकरण-- 1.28
श्लोक:
“एकोऽहमिदं सर्वं विश्वमित्यवधारय।”
अर्थ:
यह सम्पूर्ण विश्व मैं ही हूँ—ऐसा निश्चय करो।
(अर्थात् सबमें एक ही आत्मा है)
निष्कर्ष--
इन ग्रन्थों का भी यही एकमत सिद्धान्त है—
एक ही परमात्मा/आत्मा सबमें व्याप्त है, इसलिए समभाव और परोपकार आवश्यक है।
सबमें भगवान् देखें।
मन को शुद्ध करें।
समदृष्टि ही मुक्ति का मार्ग है।
आदि शंकराचार्य के साहित्य से प्रमाण--
ऋग्वेद का मंत्र “समानी वा
आकूति:” (अर्थ: तुम सबकी आकांक्षाएँ/विचार समान हों)—सामूहिक एकता, सामंजस्य और अभेद-दृष्टि की प्रेरणा देता है। यही भाव अद्वैत वेदान्त में आदि शंकराचार्य के साहित्य में गहराई से मिलता है—जहाँ भेद-भाव का त्याग और एक ही आत्मा का सबमें दर्शन सिखाया गया है।
नीचे शंकराचार्य के ग्रंथों से कुछ प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. विवेकचूडामणि (श्लोक 319)
ब्रह्मैवाहमिदं जगच्च सकलं चिन्मात्रविस्तारितम्।
सर्वं चैतदविद्यया त्रिगुणया अशेषं मया कल्पितम्॥
भावार्थ:
“मैं ही ब्रह्म हूँ, और यह सम्पूर्ण जगत चेतना का ही विस्तार है।”
जब सब एक ही चेतना हैं, तो विचारों की एकता (समानी आकूति) स्वाभाविक हो जाती है।
2. विवेकचूडामणि (श्लोक 320)
नान्यत्किञ्चिदस्ति विश्वं सत्यम्
ब्रह्मैवेदं सर्वमिति प्रतीयताम्।
भावार्थ:
“इस जगत में ब्रह्म के अलावा कुछ भी नहीं है।”
जब सब एक ही हैं, तो भेद-विचार समाप्त होकर समान दृष्टि उत्पन्न होती है।
3. आत्मबोध (श्लोक 30)
एक एव परोऽात्मा सर्वभूतेषु गूढः
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
भावार्थ:
एक ही परमात्मा सब प्राणियों में स्थित है।
इसलिए सबमें एकता का भाव—समानी आकूति—उचित है।
4. उपदेशसाहस्री (प्रकरण 1, श्लोक 3)
आत्मैकत्वविद्या सर्वभेदप्रशान्तये।
भावार्थ:
“आत्मा की एकता का ज्ञान सभी भेदों को शांत कर देता है।”
यही समान विचार और एकता का मूल आधार है।
5. भगवद्गीता भाष्य (6.29 पर टिप्पणी)
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
(गीता का श्लोक, पर शंकराचार्य का भाष्य इसे विशेष रूप से स्पष्ट करता है)
भावार्थ:
जो सब प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने आत्मा में सबको देखता है—
वही सच्ची एकता और समानता को अनुभव करता है।
समन्वय
ऋग्वेद: “समानी वा आकूति:” → समान विचार, एकता
शंकराचार्य:
“आत्मैकत्वविद्या…”
“एक एव परोऽात्मा…”
निष्कर्ष:
जब सबमें एक ही आत्मा का दर्शन होता है, तब विचार, भावना और उद्देश्य—सबमें स्वाभाविक एकता (समानी आकूति) उत्पन्न होती है।
इस्लामिक धर्म ग्रन्थों में प्रमाण-- 1. क़ुरआन-- 49:13 (सूरह अल-हुजुरात)
अरबी:
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ
وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا
إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ
हिन्दी अर्थ:
हे मनुष्यों! हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें विभिन्न जातियों और क़बीलों में बाँटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो।
निस्संदेह, अल्लाह के निकट तुममें सबसे श्रेष्ठ वह है जो सबसे अधिक धर्मपरायण (तक़वा वाला) है।
2. क़ुरआन-- 5:32
مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ
فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا
وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا
हिन्दी अर्थ:
जिसने एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या की, उसने मानो पूरी मानवता की हत्या की;
और जिसने एक व्यक्ति की जान बचाई, उसने पूरी मानवता को बचाया।
3. क़ुरआन- 2:177
لَّيْسَ الْبِرَّ أَن تُوَلُّوا وُجُوهَ
وَلَٰكِنَّ الْبِرَّ مَنْ آمَنَ بِاللَّهِ...
وَآتَى الْمَالَ عَلَىٰ حُبِّهِ ذَوِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينَ
हिन्दी अर्थ:
सच्चा धर्म केवल बाहरी कर्म नहीं है, बल्कि अल्लाह पर विश्वास करना और अपने प्रिय धन को रिश्तेदारों, अनाथों, गरीबों और जरूरतमंदों पर खर्च करना है।
4. हदीस — सहीह बुख़ारी --13
لَا يُؤْمِنُ أَحَدُكُمْ حَتَّىٰ يُحِبَّ لِأَخِيهِ
مَا يُحِبُّ لِنَفْسِهِ
हिन्दी अर्थ:
तुममें से कोई सच्चा ईमान वाला नहीं हो सकता,
जब तक वह अपने भाई के लिए वही न चाहे जो अपने लिए चाहता है।
5. हदीस — सहीह मुस्लिम --2564
الْمُسْلِمُ أَخُو الْمُسْلِمِ لَا يَظْلِمُهُ وَلَا يَخْذُلُهُ
وَلَا يَحْقِرُهُ
हिन्दी अर्थ:
मुसलमान, मुसलमान का भाई है
वह न उस पर अत्याचार करता है, न उसे छोड़ता है और न उसका अपमान करता है।
6. अंतिम उपदेश-- (ख़ुत्बा-ए-विदा) — हज़रत मुहम्मद:
لَا فَضْلَ لِعَرَبِيٍّ عَلَىٰ عَجَمِيٍّ
وَلَا لِعَجَمِيٍّ عَلَىٰ عَرَبِيٍّ
إِلَّا بِالتَّقْوَىٰ
हिन्दी अर्थ:
किसी अरबी को गैर-अरबी पर और न किसी गैर-अरबी को अरबी पर कोई श्रेष्ठता है—
सिवाय धर्मपरायणता (तक़वा) के।
निष्कर्ष-
इस्लाम का स्पष्ट संदेश है—
सभी मनुष्य एक हैं, समान हैं, और परस्पर भाई-भाई हैं।
जाति, रंग, भाषा से श्रेष्ठता नहीं
सबके प्रति न्याय और करुणा
अपने लिए जो चाहो, वही दूसरों के लिए भी चाहो।
सिक्ख धर्म में प्रमाण--
☬ 1. गुरु ग्रन्थ साहिब (--1349)
ਮਾਨਸ ਕੀ ਜਾਤ ਸਭੈ ਏਕੈ ਪਹਿਚਾਨਬੋ॥
हिन्दी अर्थ:
समस्त मानव जाति को एक ही मानो (सबको एक ही समझो)।
☬ 2. गुरु ग्रन्थ साहिब (--611)
ਏਕੁ ਪਿਤਾ ਏਕਸ ਕੇ ਹਮ ਬਾਰਿਕ ਤੂ ਮੇਰਾ ਗੁਰ ਹਾਈ॥
हिन्दी अर्थ:
एक ही परमात्मा (पिता) है, और हम सब उसके बच्चे हैं।
☬ 3. गुरु ग्रन्थ साहिब (-- 8)
गੁਰਮੁਖੀ:
ਸਭ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਜੋਤਿ ਹੈ ਸੋਇ॥
ਤਿਸ ਦੈ ਚਾਨਣਿ ਸਭ ਮਹਿ ਚਾਨਣੁ ਹੋਇ॥
हिन्दी अर्थ:
सभी में एक ही परमात्मा की ज्योति है,।
और उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित हैं।
☬ 4. गुरु ग्रन्थ साहिब (-- 349)
गੁਰਮੁਖੀ:
ਨ ਕੋ ਬੈਰੀ ਨਹੀ ਬਿਗਾਨਾ ਸਗਲ ਸੰਗ ਹਮ ਕਉ ਬਨਿ ਆਈ॥
हिन्दी अर्थ:
न कोई शत्रु है, न कोई पराया—
सभी के साथ मेरा प्रेमपूर्ण संबंध है।
☬5. गुरु ग्रन्थ साहिब (--1299)
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ॥
हिन्दी अर्थ:
सभी जीवों का दाता एक ही है,
उसे कभी नहीं भूलना चाहिए।
☬ 6. गुरु नानक देव जी (उक्ति)
ਨ ਕੋ ਹਿੰਦੂ ਨ ਮੁਸਲਮਾਨ॥
हिन्दी अर्थ:
न कोई हिन्दू है, न मुसलमान—
(अर्थात् सभी मनुष्य एक ही परमात्मा की सन्तान हैं)
☬ निष्कर्ष--
सिख धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
सभी मनुष्य एक हैं, सबमें एक ही परमात्मा की ज्योति है।
कोई पराया नहीं। सब भाई-बहन हैं। एक ही ईश्वर का वास सबमें है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
✝️ 1. Bible — Galatians --3:28
“There is neither Jew nor Greek, there is neither slave nor free,
there is neither male nor female: for ye are all one in Christ Jesus.”
हिन्दी अर्थ:
न कोई यहूदी है, न यूनानी; न दास है, न स्वतंत्र; न पुरुष, न स्त्री
क्योंकि तुम सब मसीह में एक हो।
✝️ 2. Bible — Matthew --22-39
“Thou shalt love thy neighbour as thyself.”
हिन्दी अर्थ:
अपने पड़ोसी से उसी प्रकार प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो।
✝️ 3. Bible — John 13:34
“A new commandment I give unto you, That ye love one another;
as I have loved you, that ye also love one another.”
हिन्दी अर्थ:
मैं तुम्हें एक नया आदेश देता हूँ—एक-दूसरे से प्रेम करो।
जैसा मैंने तुमसे प्रेम किया है।
✝️ 4. Bible — 1 John--- 4:20
“If a man say, I love God, and hateth his brother, he is a liar:
for he that loveth not his brother whom he hath seen,
how can he love God whom he hath not seen?”
हिन्दी अर्थ:
जो कहता है “मैं परमेश्वर से प्रेम करता हूँ” लेकिन अपने भाई से द्वेष रखता है,
वह झूठा है।
✝️ 5. Bible — Acts --17:26
“And hath made of one blood all nations of men
for to dwell on all the face of the earth.”
हिन्दी अर्थ:
परमेश्वर ने एक ही रक्त से सभी मनुष्यों की जातियाँ बनाई हैं,
जो पूरी पृथ्वी पर रहती हैं।
✝️ 6. Bible — 12:10
Roman English:
“Be kindly affectioned one to another with brotherly love.”
हिन्दी अर्थ:
एक-दूसरे के प्रति भाईचारे के प्रेम से स्नेह रखो।
✝️ निष्कर्ष--
ईसाई धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है— सब मनुष्य एक हैं, और प्रेम ही सर्वोच्च धर्म है। सब मसीह में एक हैं।अपने समान दूसरों से प्रेम करो।
द्वेष नहीं, प्रेम और करुणा अपनाओ।
जैन धर्म में प्रमाण--
🕉️ 1. आचारांग सूत्र --1.2.3
“सव्वे पाणा न हंतव्वा, सव्वे जीवा दयालुया।”
हिन्दी अर्थ:
सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए,
सभी जीव दया के योग्य हैं।
🕉️ 2. उत्तराध्ययन सूत्र 6.10
प्राकृत (देवनागरी):
“सव्वेसिं जीवानं पियं जीवियं।”
हिन्दी अर्थ:
सभी जीवों को अपना जीवन प्रिय होता है।
(अतः किसी को कष्ट न दो)
🕉️ 3. तत्त्वार्थ सूत्र 5.21
सूत्र (संस्कृत-प्राकृत परम्परा):
“परस्परोपग्रहो जीवानाम्।”
हिन्दी अर्थ:
सभी जीव एक-दूसरे के उपकार (सहयोग) के लिए हैं।
🕉️ 4. दशवैकालिक सूत्र-- 6.9
“जे णं जाणइ अप्पाणं, तं जाणइ परं पि।”
हिन्दी अर्थ:
जो अपने आत्मा को जानता है, वह दूसरों के आत्मा को भी समझता है।
🕉️ 5. समयसार-- 1.4
“एको अम्मि, नाणो अम्मि, सव्वे जीवा समा मया।”
हिन्दी अर्थ:
आत्मा एक है, ज्ञान स्वरूप है, और सभी जीव मेरे समान हैं।
🕉️ 6. मूलाचार-
“दया सव्वभूएसु, खंति च सव्वदा।”
हिन्दी अर्थ:
सभी प्राणियों पर दया करो और सदैव क्षमा रखो।
🕉️ निष्कर्ष--
जैन धर्म का भी यही मूल संदेश है
अहिंसा, समता और सर्वजीव करुणा, किसी भी जीव को कष्ट न दें।
सबको अपने समान समझें।
सभी जीव परस्पर जुड़े हैं।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
1. करणीय मेत्ता सुत्त (सुत्तनिपात --1.8
“सुखिनो वा खेमिनो होन्तु, सब्बे सत्ताः भवन्तु सुखितत्ता।”
हिन्दी अर्थ:
सभी प्राणी सुखी हों, सबका कल्याण हो,
सबके भीतर सुख की भावना हो।
2. धम्मपद --1.5
“न हि वेरेन वेरानि सम्मन्ति इध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एष धम्मो सनन्तनो॥”
हिन्दी अर्थ:
इस संसार में वैर से वैर कभी शांत नहीं होता,
केवल अवैर (प्रेम/क्षमा) से ही शांत होता है—यह सनातन सत्य है।
3. धम्मपद --5.18
“सब्बे तस्सन्ति दण्डस्स, सब्बेसं जीवितं पियं।
अत्तानं उपमं कत्वा, न हनेय्य न घातये॥”
हिन्दी अर्थ:
सभी प्राणी दण्ड (कष्ट) से डरते हैं, सभी को जीवन प्रिय है;
अपने समान समझकर न स्वयं हिंसा करो, न दूसरों से कराओ।
4. सुत्तनिपात (मेत्ता भाव)
“माता यथा निजं पुत्रं आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे।”
हिन्दी अर्थ:
जैसे माँ अपने इकलौते पुत्र की रक्षा करती है,
वैसे ही सब प्राणियों के प्रति प्रेम रखना चाहिए।
5. अंगुत्तर निकाय --4.67
“मेत्ता च सब्बलोकस्मिं, मनसं भावये अप्पमाणं।”
हिन्दी अर्थ:
पूरे संसार के प्रति असीमित मैत्री (प्रेम) का भाव विकसित करो।
6. गौतम बुद्ध (उपदेश सार)
“बहुजनहिताय बहुजनसुखाय।”
हिन्दी अर्थ:
अनेक लोगों के हित और सुख के लिए कार्य करो।
निष्कर्ष--
बौद्ध धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
मैत्री, करुणा, अहिंसा और समता।
सब प्राणियों के प्रति प्रेम।
किसी के प्रति द्वेष नहीं।
अपने समान सबको समझना।
सर्वजन-हित का भाव।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
1-तनाख -Leviticus--19:18
וְאָהַבְתָּ לְרֵעֲךָ כָּמוֹךָ
हिन्दी अर्थ:
अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम करो।
2. तनाख — Genesis-- 1:27
וַיִּבְרָא אֱלֹהִים אֶת־הָאָדָם בְּצַלְמוֹ
בְּצֶלֶם אֱלֹהִים בָּרָא אֹתוֹ
हिन्दी अर्थ:
परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाया।
(अर्थात् सभी मनुष्यों में दिव्यता है)
3. तनाख — Deuteronomy --10:19
וַאֲהַבְתֶּם אֶת־הַגֵּר
כִּי־גֵרִים הֱיִיתֶם בְּאֶרֶץ מִצְרָיִם
हिन्दी अर्थ:
परदेशी (अजनबी) से भी प्रेम करो।
क्योंकि तुम भी मिस्र में परदेशी थे।
4. तनाख — Micah 6:8
הִגִּיד לְךָ אָדָם מַה־טּוֹב
וּמָה־יְהוָה דּוֹרֵשׁ מִמְּךָ
כִּי אִם־עֲשׂוֹת מִשְׁפָּט
וְאַהֲבַת חֶסֶד
וְהַצְנֵעַ לֶכֶת עִם־אֱלֹהֶיךָ
हिन्दी अर्थ:
प्रभु तुमसे क्या चाहता है?
न्याय करना, दया से प्रेम करना और नम्रता से ईश्वर के साथ चलना।
5. तनाख — Proverbs-- 22:2
עָשִׁיר וָרָשׁ נִפְגָּשׁוּ
עֹשֵׂה כֻלָּם יְהוָה
हिन्दी अर्थ:
अमीर और गरीब दोनों मिलते हैं,
और दोनों को बनाने वाला एक ही परमेश्वर है।
6. तलमूद — तलमूद (Shabbat --31a)
דעלך סני לחברך לא תעב
हिन्दी अर्थ:
जो तुम्हें अप्रिय है, वह अपने साथी के साथ मत करो।
निष्कर्ष--
यहूदी धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
सब मनुष्य एक ही ईश्वर की सृष्टि हैं, इसलिए प्रेम, न्याय और समभाव रखें।
अपने समान दूसरों से प्रेम करो।
सभी में ईश्वर का स्वरूप है।
न्याय और दया का पालन करो।
पारसी धर्म में प्रमाण--
1. अवेस्ता — यश्ना- 30.2
Avestan (Romanized):
“šrəṇvantu vispā xšnaoθrā, yā vaēnā vīcithā ahūm.”
हिन्दी अर्थ:
सब लोग सत्य को सुनें और उसे समझकर अपने जीवन का मार्ग चुनें।
2. अवेस्ता — यश्ना-- 43.1
Avestan (Romanized):
“āat̰ yā ahū vairyo …” (अहुनवर प्रार्थना का अंश)
हिन्दी अर्थ:
सर्वोत्तम मार्ग वही है जो धर्म (सत्य) और न्याय पर आधारित हो।
3. अवेस्ता — यश्ना-- 34.1
“vahmāi ahmāi ushtā ahmāi, hyat̰ ashai vahishtāi.”
हिन्दी अर्थ:
जो सत्य और धर्म के मार्ग पर चलता है, वही वास्तविक सुख प्राप्त करता है।
4. अवेस्ता — वेंदिदाद 19.20
Avestan (Romanized):
“humata, hukhta, hvarshta”
हिन्दी अर्थ:
अच्छे विचार, अच्छे वचन, अच्छे कर्म — यही जीवन का मूल सिद्धान्त है।
5. अवेस्ता — यश्ना-- 47.1
Avestan (Romanized):
“asha vahishta ashem.”
हिन्दी अर्थ:
सत्य (Asha) ही सर्वोत्तम है।
6. जरथुस्त्र (उपदेश भाव)
Avestan (Romanized):
“āramaitiš ahurāi mazda
हिन्दी अर्थ:
नम्रता, शांति और भक्ति के साथ सत्य मार्ग पर चलो।
निष्कर्ष--
पारसी धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
सत्य, सद्भाव और परोपकार
अच्छे विचार, वचन और कर्म अपनाओ।
सत्य और धर्म के मार्ग पर चलो
सबके प्रति सद्भाव और न्याय रखो।
ताओ धर्म में प्रमाण--
1. ताओ ते चिंग — अध्याय -1
चीनी (汉字):
道可道,非常道;名可名,非常名。
हिन्दी अर्थ:
जिसे शब्दों में व्यक्त किया जा सके, वह शाश्वत ताओ नहीं है।
(अर्थात् सत्य एक है, पर शब्दों से परे है)
2. ताओ ते चिंग — अध्याय 8
चीनी (汉字):
上善若水。水善利万物而不争。
हिन्दी अर्थ:
सर्वोत्तम गुण जल के समान है
जो सबका हित करता है और किसी से विरोध नहीं करता।
3. ताओ ते चिंग — अध्याय 34
चीनी (汉字):
大道泛兮,其可左右。万物恃之以生而不辞。
हिन्दी अर्थ:
महान ताओ सर्वत्र फैला हुआ है;
सभी प्राणी उसी पर निर्भर हैं, और वह किसी का भेद नहीं करता।
4. ताओ ते चिंग — अध्याय 49
चीनी (汉字):
圣人无常心,以百姓心为心。
हिन्दी अर्थ:
संत का अपना अलग मन नहीं होता,
वह सभी लोगों के मन को ही अपना मन मानता है।
5. च्वांग-त्सु (齐物论)
चीनी (汉字):
天地与我并生,而万物与我为一。
हिन्दी अर्थ:
आकाश और पृथ्वी मेरे साथ ही उत्पन्न हुए हैं,
और सभी वस्तुएँ मेरे साथ एक हैं।
6. लाओत्से (उपदेश भाव)
चीनी (汉字):
知人者智,自知者明。
हिन्दी अर्थ:
जो दूसरों को जानता है वह बुद्धिमान है,
और जो स्वयं को जानता है वह वास्तव में ज्ञानी है।
निष्कर्ष--
ताओ धर्म का भी यही स्पष्ट संदेश है—
सभी में एक ही तत्त्व (ताओ) व्याप्त है, इसलिए समभाव और सहजता रखें।
प्रकृति के साथ सामंजस्य।
सबमें एकता का अनुभव।
बिना संघर्ष के सबका हित।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
1. लुन्यू (Analects)-- 12.2
चीनी (汉字):
己所不欲,勿施于人。
हिन्दी अर्थ:
जो तुम अपने लिए नहीं चाहते,
उसे दूसरों पर मत थोपो।
2. लुन्यू (Analects) 12.22
चीनी (汉字):
樊迟问仁。子曰:爱人。
हिन्दी अर्थ:
फान-ची ने “रेन (मानवता)” के बारे में पूछा।
कन्फ्यूशियस ने कहा—“लोगों से प्रेम करो।”
3. लुन्यू (Analects) 4.15
चीनी (汉字):
夫子之道,忠恕而已矣。
हिन्दी अर्थ:
आचार्य (कन्फ्यूशियस) का मार्ग केवल दो बातों पर आधारित है—
निष्ठा (忠) और सहानुभूति/क्षमा (恕)।
4. मेंसियस (Mencius) 2A:6
चीनी (汉字):
恻隐之心,人皆有之。
हिन्दी अर्थ:
करुणा का भाव हर मनुष्य में स्वाभाविक रूप से होता है।
5. मेंसियस (Mencius) 7A:45
चीनी (汉字):
老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。
हिन्दी अर्थ:
अपने बुज़ुर्गों का आदर करो और दूसरों के बुज़ुर्गों का भी;
अपने बच्चों से प्रेम करो और दूसरों के बच्चों से भी।
6. कन्फ्यूशियस (उपदेश भाव)
चीनी (汉字):
四海之内,皆兄弟也。
हिन्दी अर्थ:
चारों दिशाओं में (पूरी दुनिया में) सभी लोग भाई-भाई हैं।
निष्कर्ष--
कन्फ्यूशियस परम्परा का भी यही स्पष्ट संदेश है—
मानवता (Ren), करुणा, और आत्मवत् व्यवहार।
जो अपने लिए न चाहो, दूसरों पर न करो।
सबके प्रति प्रेम और सम्मान।
समभाव और सामाजिक सामंजस्य।
सूफी सन्तों से प्रमाण--
ऋग्वेद का मंत्र “समानी वा आकूति:” (अर्थ: समान विचार, एकता)—जिसमें मन, उद्देश्य और भावना की एकरूपता की बात है—उसी भाव को सूफी संतों ने इत्तिहाद (एकता) और वहदत (एकत्व) के रूप में व्यक्त किया है। नीचे कुछ प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. जलालुद्दीन रूमी (फ़ारसी)
همدلی از همزبانی بهتر است
(Hamdilī az hamzabānī behtar ast)
भावार्थ:
“दिलों की एकता (समविचार) भाषा की समानता से भी श्रेष्ठ है।”
👉
यह सीधे “समानी आकूति” — एक मन, एक भावना — को दर्शाता है।
2. सादी शिराज़ी (फ़ारसी)
بنیآدم اعضای یک پیکرند
که در آفرینش ز یک گوهرند
(Banī-Ādam a‘zā-ye yek peykarand,
ke dar āfarīnash ze yek goharand)
भावार्थ:
“समस्त मानव एक ही शरीर के अंग हैं, क्योंकि उनकी उत्पत्ति एक ही तत्व से है।”
इसलिए सबके विचार और भाव में एकता होनी चाहिए।
3. इब्न अरबी (अरबी)
قلوب العارفين واحدة في الحق
(Qulūb al-‘ārifīn wāḥidah fī al-ḥaqq)
भावार्थ:
“ज्ञानी लोगों के हृदय सत्य में एक हो जाते हैं।”
यानी सत्य का अनुभव होने पर सबके विचार एक हो जाते हैं।
4. क़ुरआन का सिद्धांत (अरबी)
وَاعْتَصِمُوا بِحَبْلِ اللّٰهِ جَمِيعًا وَلَا تَفَرَّقُوا
(Wa‘taṣimū bi-ḥabli-llāhi jamī‘an wa lā tafarraqū)
भावार्थ:
“सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ो और विभाजित मत हो।”
यह स्पष्ट रूप से एकता और समान उद्देश्य (समानी आकूति) का आदेश है।
5. बुल्ले शाह (फ़ारसी/पंजाबी प्रभाव)
इक नूर ते सब जग उपज्या
कौन भले कौन मंदे
(फ़ारसी-भाव परंपरा में भी प्रचलित)
भावार्थ:
“एक ही प्रकाश से सारा संसार उत्पन्न हुआ है।”
इसलिए सबमें एकता और समानता का भाव होना चाहिए।
निष्कर्ष
ऋग्वेद: “समानी वा आकूति:” → समान विचार, एकता
सूफी
“همدلی…” (दिलों की एकता)
“قلوب العارفين واحدة…”
“ولا تفرقوا”
सार:
जब हृदय, विचार और उद्देश्य एक हो जाते हैं—तभी सच्ची आध्यात्मिक एकता (Unity of Consciousness) प्रकट होती है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद का मंत्र “समानी वा
आकूति:” (अर्थ: समान विचार, एकता और सामंजस्य)—का समान भाव शिन्तो परंपरा में “सामूहिक सौहार्द (Harmony)” और “कामी के साथ तथा आपस में एकता” के रूप में मिलता है।
नीचे शिन्तो से जापानी लिपि के साथ प्रमाण प्रस्तुत हैं:
1. शिन्तो का मूल सिद्धांत — “和 (Wa)” (सामंजस्य)
和をもって貴しとなす
(Wa o motte tōtoshi to nasu)
भावार्थ:
“सामंजस्य (Harmony) को सर्वोच्च मानो।”
यह “समानी आकूति”—समान विचार और एकता—का ही रूप है।
2. कामी और मानव की एकता
人と神は調和して生きるべきである
(Hito to kami wa chōwa shite ikiru beki de aru)
भावार्थ:
“मनुष्य और कामी (दैवी शक्तियाँ) को सामंजस्य में जीना चाहिए।”
यानी सबके उद्देश्य और भाव एक दिशा में हों।
3. सामूहिक प्रार्थना (मात्सुरी परंपरा)
皆で心を一つにして祈る
(Minna de kokoro o hitotsu ni shite inoru)
भावार्थ:
“सब मिलकर एक मन होकर प्रार्थना करते हैं।”
यह सीधे “समानी आकूति”—एक मन, एक भावना—को दर्शाता है।
4. नोरितो (祝詞 — शिन्तो प्रार्थनाएँ)
心を合わせて神に仕える
(Kokoro o awasete kami ni tsukaeru)
भावार्थ:
“अपने हृदयों को एक करके कामी की सेवा करो।”
यह सामूहिक एकता और समान भावना का स्पष्ट निर्देश है।
निष्कर्ष
ऋग्वेद: “समानी वा आकूति:” → समान विचार, एकता
शिन्तो:
“和をもって貴しとなす”
“心を一つにして祈る”
सार:
जब मन, हृदय और उद्देश्य एक हो जाते हैं, तभी सच्चा सामंजस्य (Wa) और आध्यात्मिक एकता प्रकट होती है।
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