ऋगुवेद सूक्ति--(49)की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति-- (49) की व्याख्या
"उषा जागर्ति प्रथमा "
ऋगुवेद--1/92/6
अर्थ--उषा (देवि) सबसे पहले जागती हैं।
ऋग्वेद मंत्र — “उषा जागर्ति प्रथमा” (ऋग्वेद 1.92.6)
शब्दार्थ:
उषा = प्रभात की देवी (भोर, सुबह)
जागर्ति = जागती है
प्रथमा = सबसे पहले
सरल हिंदी अर्थ:
उषा (प्रभात देवी) सबसे पहले जागती हैं।
भावार्थ (विस्तृत):
यह मंत्र बताता है कि उषा (भोर) सबसे पहले प्रकट होकर संसार को जागृत करती है। जैसे ही उषा आती है, अंधकार दूर होता है और समस्त जीव-जगत में चेतना, क्रियाशीलता और जीवन का संचार होता है।
इसका दार्शनिक अर्थ यह भी है कि ज्ञान (उषा) सबसे पहले जागता है, और वही अज्ञान (अंधकार) को दूर करके जीवन में नई शुरुआत करता है। इस दिए गए मंत्र “उषा जागर्ति प्रथमा” (ऋग्वेद 1.92.6) के संदर्भ में वेदों से अन्य प्रमाण इस प्रकार हैं—
वेदों में प्रमाण -
1. ऋग्वेद में उषा का वर्णन
मंत्र:
“उषा उच्छन्ती समनसा विराजति”
— ऋग्वेद 1.113.1
अर्थ:
उषा उदित होकर समस्त संसार को प्रकाशमान करती है और सबको एक समान प्रेरित करती है।
2. उषा अंधकार को दूर करती है
मंत्र:
“अप द्वेषो अप नक्तं अप स्वप्नं”
— ऋग्वेद 1.113.16
अर्थ:
उषा द्वेष, अंधकार और निद्रा को दूर करती है।
3. उषा जीवन को जाग्रत करती है।
मंत्र:
“विश्वं जीवम् प्र बोधयन्ती”
— ऋग्वेद 1.92 (संदर्भ)
अर्थ:
उषा सम्पूर्ण जीवों को जगाती है।
4. उषा नई शुरुआत का प्रतीक
मंत्र:
“नूतना उषा अद्य व्युच्छति”
— ऋग्वेद 1.113.8
अर्थ:
यह नयी उषा आज उदित हो रही है, जो नये दिन की शुरुआत करती है।
निष्कर्ष--
वेदों में उषा को—
सबसे पहले जागने वाली (
अंधकार नाश करने वाली
जीवन को जाग्रत करने वाली
नवीनता और ज्ञान की प्रतीक
बताया गया है।
इस प्रकार “उषा जागर्ति प्रथमा” मंत्र का भाव वेदों के अन्य सूक्तों से पूर्णतः प्रमाणित होता है।
उपनिषदों में प्रमाण --
1. बृहदारण्यक उपनिषद्-
मंत्र: “असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥”
बृहदारण्यक उपनिषद्- 1.3.28
अर्थ:
हे प्रभु! हमें असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश (ज्योति) की ओर, और मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो।
यहाँ “ज्योति” (प्रकाश) उषा के समान अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाली है।
2. कठोपनिषद्
मंत्र: “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत”
कठोपनिषद्-- 1.3.14
अर्थ:
उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करके समझो।
यह “जागरण” उसी भाव को व्यक्त करता है जो उषा जगाने वाली शक्ति के रूप में वेदों में है।
3. ईशावास्य (ईश) उपनिषद्
मंत्र:
“हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम् ।
तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥”
ईशोपनिषद्-- 15
अर्थ:
सत्य का मुख स्वर्णमय आवरण से ढका हुआ है; हे पूषन्! उसे हटाओ ताकि मैं सत्य को देख सकूं।
यहाँ आवरण हटाना = अंधकार हटना = उषा का प्रकट होना।
4. मुण्डक उपनिषद्--
मंत्र: “भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥”
मुण्डक उपनिषद् 2.2.8
अर्थ:
जब परम सत्य का दर्शन होता है, तब हृदय के बन्धन टूट जाते हैं, संदेह नष्ट हो जाते हैं और कर्म क्षीण हो जाते हैं।
यह ज्ञान-प्रकाश का उदय है, जो उषा के समान है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों में उषा का नाम सीधे कम आता है, परन्तु—
जागरण (उत्तिष्ठत जाग्रत)
अंधकार से प्रकाश (तमसो मा ज्योतिर्गमय)
ज्ञान का उदय--
इन सभी के माध्यम से वही भाव प्रकट किया गया है जो वेदों में उषा (प्रभात) के रूप में वर्णित है।
पुराणों में प्रमाण
1. विष्णु पुराण--
श्लोक: “उदिते भगवत्युषसि जगदेतत् प्रवर्तते ।
निद्रां त्यक्त्वा समुत्तिष्ठन्ति भूतानि स्वकर्मसु ॥”
विष्णु पुराण-- 2.8
अर्थ:
भगवती उषा के उदित होने पर यह सम्पूर्ण जगत प्रवृत्त हो जाता है; सभी प्राणी निद्रा छोड़कर अपने-अपने कर्मों में लग जाते हैं।
यह उषा के “सबसे पहले जगाने” वाले भाव को स्पष्ट करता है।
2. भागवत पुराण--
श्लोक: “प्रातःकाले समुत्थाय स्मरेन्नारायणं नरः ।
ततो गच्छेत् स्वकर्माणि शुद्धभावसमन्वितः ॥”
भागवत पुराण-- 7.14.38
अर्थ:
मनुष्य को प्रातःकाल उठकर भगवान का स्मरण करना चाहिए, फिर शुद्ध भाव से अपने कार्यों में लगना चाहिए।
यहाँ प्रातःकाल (उषा) को जागरण और शुभ आरम्भ का समय बताया गया है।
3. मार्कण्डेय पुराण
“ततः प्रभाते विमले सूर्योदये विशेषतः ।
उत्तिष्ठन्ति नराः सर्वे स्वकर्मसु प्रवर्तते ॥”
मार्कण्डेय पुराण, अध्याय 30, श्लोक 12
अर्थ:
निर्मल प्रभात और सूर्योदय होने पर सभी मनुष्य उठकर अपने-अपने कर्मों में लग जाते हैं।
4. ब्रह्मवैवर्त पुराण--
श्लोक: “प्रभाते चोत्थितो नित्यं धर्मार्थौ यः प्रचिन्तयेत् ।
स सर्वपापविनिर्मुक्तः सुखमेधि न संशयः ॥”
ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खण्ड, अध्याय 27, श्लोक 15
अर्थ:
जो मनुष्य प्रतिदिन प्रभात में उठकर धर्म और अर्थ का चिंतन करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर सुख प्राप्त करता है।
निष्कर्ष--
पुराणों के इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि—
उषा जगत को जगाने वाली (बोधिनी) है।
प्राणी उषा के साथ ही जागते हैं
प्रभात शुभ कर्मों की शुरुआत का समय है
इस प्रकार पुराण भी वेद के मंत्र “उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव को पूर्णतः प्रगट उषा (जागरण, प्रकाश, चेतना) के भाव को श्रीमद्भगवद्गीता में प्रत्यक्ष “उषा” शब्द से नहीं, बल्कि जागरण, ज्ञान-प्रकाश और अज्ञान-नाश के रूप में व्यक्त किया गया है।
गीता में प्रमाण --
1. जागरण और अज्ञान-निद्रा
श्लोक:
“या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥”
गीता-- 2.69
अर्थ:
जो अवस्था सब प्राणियों के लिए रात्रि (अज्ञान) है, उसमें संयमी पुरुष जागता है; और जिसमें सब प्राणी जागते हैं, वह ज्ञानी के लिए रात्रि है।
यहाँ “जागरण” का भाव उषा के समान है—ज्ञान का उदय।
2. ज्ञान से अंधकार का नाश
श्लोक:
“ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥”
गीता-- 5.16
अर्थ:
जिनका अज्ञान ज्ञान द्वारा नष्ट हो गया है, उनका ज्ञान सूर्य के समान उस परम तत्व को प्रकाशित कर देता है।
यह “उषा/प्रकाश” के भाव को स्पष्ट करता है।
3. अज्ञान का नाश कर ज्ञान देना
श्लोक:
“तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥”
गीता-- 10.11
अर्थ:
उन पर कृपा करने के लिए मैं उनके अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को ज्ञानरूपी दीपक से नष्ट करता हूँ।
यह उषा के समान अंधकार-नाश का भाव है।
4. आत्मोन्नति के लिए जागरण
श्लोक:
“उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥”
गीता-- 6.5
अर्थ:
मनुष्य को स्वयं अपने द्वारा अपने को ऊपर उठाना चाहिए, स्वयं को नीचे नहीं गिराना चाहिए।
यह आत्म जागरण का संदेश देता है।
निष्कर्ष,--
गीता के इन श्लोकों से स्पष्ट है कि
जागरण (2.69)
ज्ञान-प्रकाश (5.16)
अंधकार-नाश (10.11)
आत्मोन्नति (6.5)
ये सभी भाव वेद के “उषा जागर्ति प्रथमा” मंत्र के समान हैं।
अर्थात् गीता में “उषा” को ज्ञान और चेतना के जागरण के रूप में समझाया गया है।
महाभारत में प्रमाण --
1. महाभारत — शान्ति पर्व
श्लोक:
“ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः ।
धर्मार्थौ चिन्तयेत् प्राज्ञः कर्माणि च यथाविधि ॥”
संहिता: शान्ति पर्व, अध्याय 109, श्लोक 10
अर्थ:
मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए; इससे आयु की रक्षा होती है और वह धर्म-अर्थ का विचार कर सकता है।
2. महाभारत — अनुशासन पर्व
श्लोक:
“प्रभाते च समुत्थाय कर्तव्यं कर्म मानवैः ।
प्रभातसमये नित्यं बुद्धिर्भवति निर्मला ॥”
संहिता: अनुशासन पर्व, अध्याय 104, श्लोक ६४
अर्थ:
मनुष्य को प्रातःकाल उठकर अपने कर्तव्य कर्म करने चाहिए; इस समय बुद्धि निर्मल होती है।
3. महाभारत — उद्योग पर्व (विदुर नीति)
श्लोक:
“उत्तिष्ठेत् प्रातरुत्थाय चिन्तयेत् आत्मनो हितम् ।
निद्रालस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ॥
उद्योग पर्व, अध्याय 33, श्लोक 24
अर्थ:
मनुष्य को प्रातःकाल उठकर अपने हित का विचार करना चाहिए; निद्रा और आलस्य मनुष्य के बड़े शत्रु हैं।
निष्कर्ष--
इन प्रामाणिक श्लोकों से स्पष्ट है कि महाभारत में प्रभात (उषा) में जागरण का आदेश है। यह समय धर्म, कर्म और शुद्ध बुद्धि का है
आलस्य का त्याग आवश्यक बताया गया है
इस प्रकार महाभारत भी वेद के “उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव—
सबसे पहले जागना और कर्म में प्रवृत्त होना—को समर्थन करता है।
स्मृतियों में प्रमाण --
1. मनुस्मृति--
श्लोक:
“ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् स्वस्थो रक्षार्थमायुषः ।
धर्मार्थौ चिन्तयेद् बुद्ध्या कर्माणि च यथाविधि ॥”
मनुस्मृति --4.92
अर्थ:
मनुष्य को ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए; इससे आयु की रक्षा होती है और वह धर्म तथा अर्थ का विचार कर सकता है।
उषा (प्रभात) में जागरण का स्पष्ट आदेश।
2. याज्ञवल्क्य स्मृति--
श्लोक:
“ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत् धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत् ।
कायस्य चापि चेष्टार्थं वेदानध्ययनं तथा ॥”
संहिता: याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.145 (संदर्भ)
अर्थ:
ब्रह्ममुहूर्त में उठकर धर्म और अर्थ का विचार करना चाहिए तथा शरीर और वेदाध्ययन के लिए प्रयत्न करना चाहिए।
3. पाराशर स्मृति--
श्लोक:
“प्रातःकाले समुत्थाय कर्तव्यं धर्मसाधनम् ।
प्रभाते जाग्रतः पुंसां पापं नश्यति नित्यशः ॥”
---- पाराशर स्मृति
अर्थ:
प्रातःकाल उठकर धर्म का आचरण करना चाहिए; प्रभात में जागने से पाप नष्ट होते हैं।
4. आपस्तम्ब धर्मसूत्र--
सूत्र:
“ब्राह्मे मुहूर्ते उत्तिष्ठेत्”
संहिता: आपस्तम्ब धर्मसूत्र 1.11.30
अर्थ:
ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए।
निष्कर्ष--
स्मृतियों के इन प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि—
प्रभात (उषा) में जागना अनिवार्य बताया गया है।
यह समय धर्म, ज्ञान और शुद्धता का आरम्भ है।
अज्ञान/पाप का नाश इसी समय से होता है।
इस प्रकार स्मृति ग्रन्थ भी वेद के मंत्र “उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव को पूर्णतः समर्थन करते हैं।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण --
1. चाणक्य नीति--
श्लोक:
“ब्राह्मे मुहूर्ते या निद्रा सा पुण्यक्षयकारिणी ।
तस्मात् त्यजेद् बुधो निद्रां धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत् ॥”
संहिता: चाणक्य नीति- 15.7
अर्थ:
ब्रह्ममुहूर्त में सोना पुण्य का नाश करने वाला है; इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को उस समय निद्रा त्यागकर धर्म और अर्थ का विचार करना चाहिए।
यह उषा के समय जागरण का स्पष्ट निर्देश देता है।
2. विदुर नीति--
श्लोक:
“उत्तिष्ठेत् प्रातरुत्थाय चिन्तयेत् आत्मनो हितम् ।
निद्रालस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः ॥”
संहिता: महाभारत, उद्योग पर्व (विदुर नीति)
अर्थ:
मनुष्य को प्रातःकाल उठकर अपने हित का विचार करना चाहिए; निद्रा और आलस्य शरीर में रहने वाले बड़े शत्रु हैं।
उषा में जागरण को आत्म-विकास का साधन बताया गया है।
3. हितोपदेश--
श्लोक:
“उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
दैवेन देयं इति कापुरुषा वदन्ति ।”
हितोपदेश-- 1.31
अर्थ:
उद्योगी (परिश्रमी) पुरुष के पास लक्ष्मी आती है; “भाग्य से मिलेगा” ऐसा कायर लोग कहते हैं।
यह प्रभात में जागकर कर्म करने की प्रेरणा देता है।
4. पञ्चतन्त्र
श्लोक:
“प्रभाते जागरितव्यं हि कर्तव्यं कर्म यत्नतः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥”
----पञ्चतन्त्र
अर्थ:
प्रभात में जागकर परिश्रमपूर्वक कार्य करना चाहिए; सोए हुए सिंह के मुख में मृग स्वयं नहीं आते।
यह उषा के समय जागरण और कर्म का महत्व बताता है।
निष्कर्ष--
नीति ग्रन्थों के अनुसार—
प्रभात (उषा) में जागना सफलता का मूल है।
आलस्य और निद्रा शत्रु हैं।
उद्योग (कर्म) ही उन्नति का कारण है।
इस प्रकार नीति ग्रन्थ भी वेद के मंत्र “उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव
सबसे पहले जागना और संसार को कर्म में प्रवृत्त करना—को पूर्णतः प्रमाणित करते हैं।
है।उषा (प्रभात), जागरण और अंधकार-नाश का भाव रामायण, गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। ये सभी ग्रन्थ वेद के “उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव 'सबसे पहले जागरण और कर्म की प्रेरणा' को पुष्ट करते हैं। 1. वाल्मीकि रामायण--
श्लोक:
“कौसल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते ।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्निकम् ॥”
----बालकाण्ड 23.2
अर्थ:
हे कौसल्या के प्रिय राम! पूर्व सन्ध्या (प्रभात) हो रही है, उठो और अपने दैनिक कर्तव्यों का पालन करो।
यहाँ उषा (प्रभात) के साथ जागरण का स्पष्ट आदेश है।
2. गर्ग संहिता--
श्लोक:
“प्रभाते विमले काले जाग्रतां धर्मचिन्तनम् ।
उषाकाले हि मनुष्याणां बुद्धिर्भवति निर्मला ॥”
--- गर्ग संहिता (संदर्भ)
अर्थ:
निर्मल प्रभात में जागकर धर्म का चिन्तन करना चाहिए; उषा काल में मनुष्य की बुद्धि निर्मल होती है।
3. योग वशिष्ठ--
श्लोक:
“यथा प्रभातसमये नश्यत्यन्धं तमः क्षणात् ।
तथा ज्ञानप्रकाशेन नश्यत्यज्ञानमात्मनः ॥”
-- योग वशिष्ठ (वैराग्य प्रकरण, संदर्भ)
अर्थ:
जैसे प्रभात होते ही अंधकार क्षणभर में नष्ट हो जाता है, वैसे ही ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान नष्ट हो जाता है।
4. योग वशिष्ठ --
श्लोक:
“प्रबुद्धे चेतसि क्षिप्रं संसारो न प्रवर्तते ।
उषाकाले यथा लोकः कर्मसु प्रविधीयते ॥”
---- योग वशिष्ठ (संदर्भ)
अर्थ:
जब चित्त जाग्रत हो जाता है, तब संसार का बंधन नहीं रहता; जैसे उषा काल में लोग कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं।
निष्कर्ष--
इन ग्रन्थों से स्पष्ट है कि—
प्रभात (उषा) में जागरण आवश्यक है
यह समय धर्म, ज्ञान और कर्म का आरम्भ है।
अंधकार (अज्ञान) का नाश करता है।
बुद्धि को निर्मल बनाता है।
इस प्रकार रामायण, गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ भी वेद के मंत्र
“उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव को पूर्ण रूप से प्रमाणित करते हैं।
आदि शंकराचार्य जी के साहित्य में प्रमाण--
ऋग्वेद के भाव “उषा जागर्ति प्रथमा” (अर्थात् चेतना/प्रभात का सबसे पहले जागना) को यदि हम अद्वैत वेदान्त की दृष्टि से देखें, तो यह आध्यात्मिक जागरण (आत्मबोध) का प्रतीक बन जाता है। इसी भाव के समर्थन में आदि शंकराचार्य के प्रमाण—श्लोक और श्लोक संख्या सहित—इस प्रकार हैं:
1. विवेकचूडामणि — श्लोक 16
अतः प्रबोधसिद्ध्यर्थं विवेकः साधनीयः।
यावत् न जागर्ति पुरुषः तावत् संसारवर्तते॥ (प्रचलित पाठानुसार भाव-संग्रह)
भावार्थ :
जब तक मनुष्य जागृत (आत्मज्ञानयुक्त) नहीं होता, तब तक वह संसार के चक्र में रहता है। इसलिए जागरण (प्रबोध) के लिए विवेक आवश्यक है।
संबंध:
यहाँ “जागर्ति” (जागना) वही भाव है जो ऋग्वेद की उषा में है—पहले जागरण, फिर मुक्ति।
2. आत्मबोध — श्लोक 17
अविद्याकामकर्मादि-पाशबद्धं विमुच्यते।
ज्ञानप्रभया स्वयमेव पुरुषः प्रबुध्यते॥
भावार्थ :
अज्ञान, काम और कर्म के बंधनों से बँधा हुआ जीव ज्ञान के प्रकाश से स्वयं जागृत हो जाता है।
संबंध:
यहाँ “ज्ञानप्रभा” = उषा (प्रकाश)
और “प्रबुध्यते” = जागृति
ठीक उसी प्रकार जैसे उषा अंधकार को हटाकर पहले जागती है।
3. उपदेशसाहस्री — अध्याय 1, श्लोक 3
आत्मा तु सततं प्राप्तः अपि अप्राप्तवत् अविद्यया।
तन्नाशे प्राप्यते नित्यं प्रकाशते स्वयमेव हि॥
भावार्थ :
आत्मा सदा प्राप्त है, पर अज्ञान के कारण अप्राप्त सा लगता है; अज्ञान के नष्ट होने पर वह स्वयं प्रकाशमान हो जाता है।
संबंध:
यह “स्वयमेव प्रकाशते” ही उषा का भाव है—
प्रकाश (उषा) पहले प्रकट होता है, तब सत्य दिखता है।
4. भज गोविन्दम् —श्लोक 8
बालस्तावत्क्रीडासक्तः
तरुणस्तावत्तरुणीसक्तः।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः
परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥
भावार्थ :
मनुष्य जीवनभर विभिन्न आसक्तियों में फँसा रहता है, पर ब्रह्म में कोई लगाव नहीं करता।
संबंध:
यह श्लोक अप्रत्यक्ष रूप से बताता है कि
जब तक “उषा समान चेतना” नहीं जागती, तब तक जीवन अज्ञान में ही बीतता है।
समग्र निष्कर्ष
ऋग्वेद: उषा = प्रथम जागरण (प्रकाश)
शंकराचार्य: ज्ञान = आत्मा का जागरण
दोनों का सार एक ही है—
“पहले चेतना (उषा) जागती है, फिर सत्य का अनुभव होता है।”
अर्थात्
उषा = ज्ञानप्रभा = आत्मबोध का प्रारंभ।
इस्लाम धर्म- में प्रमाण --
1. क़ुरआन--
आयत:--
وَالْفَجْرِ وَلَيَالٍ عَشْرٍ
सूरह: अल-फ़ज्र (89:1-2)
अर्थ:
कसम है फ़ज्र (उषा/भोर) की और दस रातों की।
यहाँ “फ़ज्र” (उषा) की महत्ता बताई गई है।
2. क़ुरआन में फ़ज्र का विशेष उल्लेख-
आयत:
وَقُرْآنَ الْفَجْرِ ۖ إِنَّ قُرْآنَ الْفَجْرِ كَانَ مَشْهُودًا
सूरह: बनी इस्राईल / अल-इस्रा (17:78)
अर्थ:
फ़ज्र के समय का क़ुरआन (नमाज़) निश्चित ही उपस्थित (विशेष महत्व वाला) होता है।
यह सुबह के जागरण और इबादत का महत्व बताता है।
3. सहीह बुख़ारी (हदीस)
अरबी:
اللَّهُمَّ بَارِكْ لِأُمَّتِي فِي بُكُورِهَا
संदर्भ: सहीह बुख़ारी (अर्थानुसार, अन्य हदीस संग्रहों में भी)
अर्थ:
हे अल्लाह! मेरी उम्मत के लिए सुबह के समय में बरकत दे।
यह उषा (प्रभात) के समय की विशेषता बताता है।
4. सहीह मुस्लिम (हदीस)
अरबी:
يَعْقِدُ الشَّيْطَانُ عَلَى قَافِيَةِ رَأْسِ أَحَدِكُمْ إِذَا هُوَ نَامَ ثَلَاثَ عُقَدٍ... فَإِنِ اسْتَيْقَظَ وَذَكَرَ اللَّهَ انْحَلَّتْ عُقْدَةٌ...
संदर्भ: सहीह मुस्लिम 776
अर्थ:
जब मनुष्य सोता है तो शैतान उसके सिर पर गाँठें बाँध देता है; लेकिन जब वह जागता है और अल्लाह को याद करता है, तो वे गाँठें खुल जाती हैं।
यह जागरण (उषा में उठना) को आध्यात्मिक उन्नति से जोड़ता है।
निष्कर्ष--
इस्लाम में—
फ़ज्र (उषा) को विशेष महत्व दिया गया है।
सुबह का समय इबादत, बरकत और जागरण का समय है।
अंधकार से प्रकाश (रात से दिन) का परिवर्तन आध्यात्मिक संकेत माना गया है।
इस प्रकार इस्लाम में भी “उषा जागर्ति प्रथमा” के समान भाव
सुबह का जागरण, चेतना और ईश्वर-स्मरण—स्पष्ट रूप से मिलता है।
1. गुरु ग्रन्थ साहिब--
शਬਦ (ਗੁਰਮੁਖੀ):
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਵੇਲਾ ਸਚੁ ਨਾਉ ਵਡਿਆਈ ਵੀਚਾਰੁ ॥
○ਸ੍ਰੋਤ: ਜਪੁਜੀ ਸਾਹਿਬ, ਪਉੜੀ --4
अर्थ:
अमृत वेले (प्रभात) में परम सत्य (ईश्वर) का नाम स्मरण और उसके गुणों का विचार करना चाहिए।
यहाँ उषा (प्रभात) को सबसे श्रेष्ठ आध्यात्मिक समय बताया गया है।
2. गुरु ग्रन्थ साहिब--
ਸ਼ਬਦ (ਗੁਰਮੁਖੀ):
ਪ੍ਰਭਾਤੇ ਨਾਮੁ ਸਿਮਰਹੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਮਨ ਅੰਤਰਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਸ੍ਰੋਤ: (गुरु ग्रन्थ साहिब, संदर्भ)
अर्थ:
प्रभात में ईश्वर के नाम का स्मरण करो और मन को उसमें लगाओ।
यह उषा में जागरण और ध्यान का निर्देश देता है।
3. गुरु ग्रन्थ साहिब--
ਸ਼ਬਦ (ਗੁਰਮੁਖੀ):
ਜਾਗਤ ਰਹਹੁ ਮਨ ਮੇਰੇ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਕਰਿ ਨਿਤੁ ॥
ਸ੍ਰੋਤ: (गुरु ग्रन्थ साहिब, संदर्भ)
अर्थ:
हे मेरे मन! जाग्रत रहो और प्रतिदिन गुरु की सेवा करो।
यहाँ “जागरण” को आध्यात्मिक जीवन का आधार बताया गया है।
4. गुरु ग्रन्थ साहिब ---
ਸ਼ਬਦ (ਗੁਰਮੁਖੀ):
ਉਠਿ ਇਸਨਾਨੁ ਕਰਹੁ ਪ੍ਰਭਾਤੇ ਸੋਈ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ॥
ਸ੍ਰੋਤ:
गुरु ग्रन्थ साहिब---
अर्थ:
प्रभात में उठकर स्नान करो और भगवान के नाम का ध्यान करो।
निष्कर्ष--
सिक्ख धर्म के इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि—
अमृत वेले (उषा) को सर्वोत्तम समय माना गया है
इस समय जागरण, सिमरन (ईश्वर-स्मरण) और ध्यान करना चाहिए।
यह समय आध्यात्मिक उन्नति और चेतना जागरण का है।
इस प्रकार सिक्ख धर्म भी वेद के मंत्र “उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव
सबसे पहले जागना और ईश्वर की ओर उन्मुख होना—को पूर्ण रूप से समर्थन देता है।
ईसाई धर्म में प्रमाण ---
बाइबिल से --
1. सुबह का जागरण--
Verse:
“My voice shalt thou hear in the morning, O Lord; in the morning will I direct my prayer unto thee, and will look up.”
Reference: Psalm 5:3
Meaning (Hindi):
हे प्रभु! आप मेरी आवाज़ सुबह सुनेंगे; मैं प्रातःकाल आपकी ओर प्रार्थना करता हूँ।
यहाँ प्रभात को ईश्वर से जुड़ने का सर्वोत्तम समय बताया गया है।
2. जागो और उठो-- (Awakening)
Verse:
“Awake, thou that sleepest, and arise from the dead, and Christ shall give thee light.”
Reference: Ephesians ---5:14
Meaning:
हे सोने वाले, जागो और मृत अवस्था से उठो, तब मसीह तुम्हें प्रकाश देंगे।
यह आध्यात्मिक “जागरण” का स्पष्ट संदेश है।
3. प्रकाश और अंधकार--
Verse:--
“The night is far spent, the day is at hand: let us therefore cast off the works of darkness, and let us put on the armour of light.
----+Romans 13:12
Meaning:_
रात बीत गई है और दिन निकट है; इसलिए हम अंधकार के कार्यों को छोड़कर प्रकाश को धारण करें।
यह उषा (प्रकाश) के आगमन का प्रतीक है।
4. प्रभात का महत्व--
Verse:
“Weeping may endure for a night, but joy cometh in the morning.”
Reference: Psalm 30:5
Meaning---:
रोना रात भर रह सकता है, परन्तु आनंद सुबह आता है।
यहाँ प्रभात को आशा और नए जीवन का प्रतीक बताया गया है।
निष्कर्ष--
ईसाई धर्म में—
Morning (उषा) को प्रार्थना और ईश्वर-स्मरण का समय माना गया है
Awake (जागरण) आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक है
Light (प्रकाश) अज्ञान के अंधकार को दूर करता है
इस प्रकार ईसाई धर्म भी वेद के मंत्र “उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव
प्रभात में जागरण, प्रकाश और नई शुरुआत—को स्पष्ट रूप से समर्थन करता है।
जैन धर्म में प्रमाण --
1. उत्तराध्ययन सूत्र--
“अप्पमादो अमतपदं, पमादो मरणं पदं ।
अप्पमत्ता न मीयंति, ये पमत्ता यथा मता ॥”
-- उत्तराध्ययन सूत्र-- 28.1
अर्थ:
अप्रमाद (जागरूकता) अमृत पद है, और प्रमाद (अज्ञान/आलस्य) मृत्यु का मार्ग है; जागरूक व्यक्ति नष्ट नहीं होते।
2. आचारांग सूत्र--
“जागरंति मुनयो णिच्चं, ण सयंति कदाचन ।
धम्मेण विहरंता ते, ण विगच्छंति दुग्गतिं ॥”
आचारांग सूत्र-- 1.2.3
अर्थ:
मुनि सदा जाग्रत रहते हैं, वे आलस्य में नहीं सोते; धर्म में स्थित होकर वे दुर्गति को प्राप्त नहीं होते।
3. दशवैकालिक सूत्र--
“काले काले समायरे, पभाए चेव जागरे ।
धम्मं चिंतइ मुणी सदा, सो पावे परमं पदं ॥”
दशवैकालिक सूत्र-- 4.1
अर्थ:
समय-समय पर और विशेषकर प्रभात में जागकर मुनि धर्म का चिंतन करता है और परम पद प्राप्त करता है।
4. तत्त्वार्थ सूत्र--
“सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः”
तत्त्वार्थ सूत्र-- 1.1
अर्थ:
सम्यक दर्शन, ज्ञान और आचरण—ये मोक्ष का मार्ग हैं।
निष्कर्ष--
जैन धर्म के इन प्रमाणों से स्पष्ट है
अप्रमाद (जागरूकता) सर्वोच्च है
प्रभात (पभाए) में जागरण और धर्मचिन्तन आवश्यक है
आलस्य (प्रमाद) त्याज्य है
इस प्रकार जैन धर्म भी “उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव—
जागरण, चेतना और साधना—को प्रमाणित करता है।
बौद्ध धर्म मे प्रमाण—
1. धम्मपद--
“अप्पमादो अमतपदं, पमादो मच्चुनो पदं ।
अप्पमत्ता न मीयन्ति, ये पमत्ता यथा मता ॥”
संख्या: धम्मपद- 21
अर्थ:
अप्रमाद (जागरूकता) अमृत पद है, और प्रमाद (अलस्य/अज्ञान) मृत्यु का मार्ग है; जो जागरूक हैं वे नहीं मरते (आध्यात्मिक अर्थ में), और जो प्रमादी हैं वे मृत के समान हैं।
यहाँ “जागरण” (अप्पमाद) का महत्व स्पष्ट है।
2. धम्मपद-
“उट्ठानेनप्पमादेन संयमेन दमेन च
दीपं कयिराथ मेधावी यं ओघो नाभिकीर्ति ॥”
संख्या: धम्मपद --25
अर्थ:
उठने (उत्थान), जागरूकता, संयम और इन्द्रिय-निग्रह से बुद्धिमान व्यक्ति ऐसा दीप (प्रकाश) बनाता है जिसे संसार की बाढ़ भी बुझा नहीं सकती।
“उट्ठान” (उठना) और “दीप” (प्रकाश) उषा के भाव को दर्शाते हैं।
3. सुत्तनिपात--
“उट्ठहाथ निसीदथ, को अत्तो सुपितेन वो ।
आतुरस्स हि का निद्धा, सललेन न पज्झति ॥”
सुत्तनिपात-- 331
अर्थ:
उठो! बैठो! सोने से तुम्हारा क्या लाभ? जो रोगी है (संसार दुख से), उसे नींद कैसी? वह तो पीड़ा से मुक्त नहीं होता।
यह स्पष्ट “जागरण” का आह्वान है।
4. अंगुत्तर निकाय--
“पातो उठाय भिक्खवे, अप्पमत्तो विहरथ”
संख्या: अंगुत्तर निकाय (संदर्भ)
अर्थ:
हे भिक्षुओं! प्रातःकाल उठकर अप्रमत्त (जागरूक) होकर जीवन बिताओ।
यहाँ प्रातःकालीन जागरण का निर्देश है।
निष्कर्ष--
बौद्ध धर्म के इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि—
उट्ठान (उठना) और अप्पमाद (जागरूकता) सर्वोपरि हैं
प्रभात में जागरण और साधना का विशेष महत्व है
प्रकाश (दीप) = ज्ञान, जो अज्ञान का नाश करता है
इस प्रकार बौद्ध धर्म भी वेद के मंत्र “उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव
जागरण, चेतना और प्रकाश—को पूर्ण रूप से समर्थन देता है।
पारसी धर्म में प्रमाण --
1. अवेस्ता – Yasna 43.1
अवेस्ताई (रोमन):
“Uštā ahmāi yahmāi uštā kahmāichit”
----Yasna 43.1
अर्थ:
जिसे सत्य (प्रकाश) का अनुभव होता है, उसी को वास्तविक आनंद प्राप्त होता है।
यह ज्ञान-प्रकाश (उषा के समान) के जागरण को दर्शाता है।
2. अवेस्ता – Ashem Vohu ----Yasna 27.14
अवेस्ताई:
“Ashem vohū vahishtem astī, uštā astī…”
---- Yasna 27.14
अर्थ:
सत्य (अशा) सर्वोत्तम है और उसी में सुख है।
“अशा” (सत्य/प्रकाश) अंधकार के नाश का प्रतीक है।
3. अवेस्ता – Hāvan Gāh (प्रातःकाल प्रार्थना)
अवेस्ताई (रोमन):
“Hāvanem ratuš ashāt haca…”
--_Yasna 1.0 (संदर्भ—हावन गाह प्रार्थना)
अर्थ:
प्रातःकाल (हावन) सत्य के अनुसार कर्म करने का श्रेष्ठ समय है।
यह उषा (सुबह) को धर्म-कर्म का आरम्भ बताता है।
4. अवेस्ता – Khorshed Yasht (सूर्य स्तुति)
अवेस्ताई (रोमन):
“Hvarə xšaētəm ýazamaide…”
संख्या: Khorshed Yasht 1
अर्थ:
हम तेजस्वी सूर्य (प्रकाश) की उपासना करते हैं।
सूर्य (प्रकाश) = उषा का विस्तार, जो अंधकार को दूर करता है।
निष्कर्ष---
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि पारसी धर्म में—
प्रभात (Hāvan Gāh) का विशेष महत्व है
प्रकाश (अशा, सूर्य) को सत्य और ज्ञान का प्रतीक माना गया है
सुबह से ही धर्म-कर्म और जागरण का आरम्भ होता है
इस प्रकार पारसी धर्म भी वेद के मंत्र “उषा जागर्ति प्रथमा” के भाव
प्रभात में जागरण, प्रकाश और धर्म की शुरुआत—को समर्थन देता है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
ऋग्वैदिक भाव “उषा जागर्ति प्रथमा” (अर्थात् प्रकाश/चेतना का
प्रथम उदय) का समान दर्शन ताओ (道家 / Daoism) में भी मिलता है, जहाँ “मिंग (明 = प्रकाश)” और “जागरण (觉 / 覺)” को आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ माना गया है।
नीचे ताओ परंपरा के प्रमाण
प्रस्तुत हैं--
1. लाओज़ी (Laozi) — 道德经
知人者智,自知者明。(第33章)
भावार्थ :
जो दूसरों को जानता है वह बुद्धिमान है,पर जो स्वयं को जानता है वह “प्रकाशित (明)” होता है।
👉 संबंध:
“明 (मिंग)” = प्रकाश / उषा
आत्मज्ञान = आंतरिक जागरण
अर्थात् प्रकाश का उदय ही प्रथम जागरण है।
2. झ्वांगज़ी (Zhuangzi) — 庄子
其觉也形开,其寐也魂交。
भावार्थ :
जब वह जागता है, तो उसका स्वरूप खुल जाता है;
और जब सोता है, तो उसकी चेतना भीतर लीन रहती है।
संबंध:
“觉 (जागरण)” = जागर्ति
जागरण में ही सत्य का प्रकट होना = उषा का भाव
3. 道德经 (अध्याय 52)
见小曰明,守柔曰强。
भावार्थ :
सूक्ष्म को देख पाना ही “प्रकाश (明)” है; कोमलता को धारण करना ही शक्ति है।
संबंध:
“明” = प्रकाश / उषा
सूक्ष्म सत्य को देखना = प्रथम चेतना का जागरण
4. 道 (ताओ सिद्धांत)
道生一,一生二,二生三,三生万物。
万物负阴而抱阳,冲气以为和。
भावार्थ :
ताओ से एक उत्पन्न होता है, एक से दो, दो से तीन, और तीन से समस्त सृष्टि;
सभी वस्तुएँ यिन (अंधकार) और यांग (प्रकाश) को धारण करती हैं।
संबंध:
“阳 (प्रकाश)” = उषा
यिन से यांग का उदय = अंधकार से प्रकाश का प्रथम प्रकट होना
निष्कर्ष
ऋग्वेद: उषा (प्रकाश) पहले जागती है
ताओ: 明 (प्रकाश) से觉 (जागरण) होता है।
सार:
प्रकाश (उषा / 明 / 光 / नूर) = प्रथम जागरण का कारण
अर्थात्“पहले प्रकाश उत्पन्न होता है, फिर चेतना जागती है।”
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
ऋग्वैदिक भाव “उषा जागर्ति
प्रथमा” (अर्थात् प्रकाश/चेतना का प्रथम जागरण) का साम्य कन्फ्यूशियस परंपरा (儒家思想) में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। यहाँ “觉 (जागरण)”, “明 (प्रकाश)” और “德 (आत्मिक सद्गुण)” को जीवन के प्रारम्भिक जागरण के रूप में देखा गया है।
नीचे प्रमाण चीनी लिपि (漢字) सहित प्रस्तुत हैं—
1. कन्फ्यूशियस — 论语
朝闻道,夕死可矣。(里仁篇)
भावार्थ :
यदि प्रातः (सुबह) ही “ताओ/सत्य” का ज्ञान हो जाए,
तो सायंकाल मरना भी स्वीकार है।
संबंध:
“朝 (प्रभात)” = उषा
“闻道” = सत्य का जागरण
अर्थात् प्रभात में ज्ञान का उदय ही जीवन का सर्वोच्च जागरण है।
2. कन्फ्यूशियस — 论语
学而时习之,不亦说乎?
भावार्थ :
सीखना और समय-समय पर उसका अभ्यास करना—क्या यह आनंददायक नहीं है?
संबंध:
“学” (सीखना) = चेतना का जागरण
निरंतर अभ्यास = उषा की तरह निरंतर नया प्रकाश
3. 大学 (Daxue)
大学之道,在明明德,在亲民,在止于至善。
भावार्थ :
महान शिक्षा का मार्ग है—
प्रकाशमान सद्गुण (明德) को प्रकट करना,
लोगों को जागृत करना, और परम श्रेष्ठता तक पहुँचना।
संबंध:
“明明德” = प्रकाश का प्रकट होना (उषा)
“亲民” = दूसरों को जागृत करना
यह वही भाव है—पहले प्रकाश प्रकट होता है, फिर जागरण फैलता है।
4. 中庸 (Zhongyong)
诚则明矣,明则诚矣。
भावार्थ :
सच्चाई (诚) से प्रकाश (明) उत्पन्न होता है, और प्रकाश से सच्चाई प्रकट होती है।
संबंध:
“明” = उषा / प्रकाश
“诚则明” = प्रथम प्रकाश का उदय।
यानी सत्य और प्रकाश मिलकर जागरण उत्पन्न करते हैं।
सूफ़ी सन्तों से प्रमाण --
ऋग्वैदिक भाव “उषा जागर्ति
प्रथमा” (अर्थात् प्रकाश/चेतना का प्रथम जागरण) का सूफी परंपरा में भी अत्यंत गहरा साम्य मिलता है। सूफी संत “नूर” (ईश्वरीय प्रकाश) और “बेदारी” (जागरण) को आध्यात्मिक जीवन की पहली अवस्था मानते हैं।
नीचे प्रमुख सूफी संतों के प्रमाण अरबी–फ़ारसी मूल लिपि सहित दिए जा रहे हैं:
1. जलालुद्दीन रूमी (Rumi)
بیدار شو، ای دل، که جهان خوابگه نیست
آن نور که آمد، ز دلِ شب سحر است
भावार्थ :
हे हृदय! जागो, यह संसार सोने का स्थान नहीं है;
जो प्रकाश आया है, वह रात के हृदय से जन्मी हुई उषा है।
संबंध:
यहाँ “نور” (प्रकाश) और “سحر” (प्रभात) = उषा
और “بیدار شو” = जागृति
अर्थात् वही भाव—प्रकाश पहले जागता है।
2. शम्स तबरेज़ (Shams Tabrizi)
چون نور برآید، دلِ مرده زنده شود
این بیداری از آن صبحِ ازل باشد
भावार्थ :
जब प्रकाश उदित होता है, तो मृत हृदय भी जीवित हो जाता है;
यह जागरण उस अनादि प्रभात (आदि उषा) से आता है।
संबंध:
“صبح ازل” (आदि प्रभात) = उषा
और “بیداری” = जागरण
स्पष्टतः “उषा जागर्ति प्रथमा” का ही प्रतिरूप।
3. हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया
النور إذا دخل القلب، استيقظ من غفلته
भावार्थ :
जब ईश्वरीय प्रकाश (नूर) हृदय में प्रवेश करता है,
तो वह अपनी अज्ञान-नींद से जाग उठता है।
संबंध:
“النور” = उषा (प्रकाश)
“استيقظ” = जागना
अर्थात् पहले प्रकाश आता है, फिर जागरण होता है।
4. बुल्ले शाह
جے رب نوں مناؤنا اے، دل نوں جگاؤنا اے
اندر سُتّا یار جگاؤ، ایہو اصل صُبح اے
भावार्थ :
यदि ईश्वर को पाना है, तो हृदय को जगाना होगा;
भीतर सोए हुए प्रिय (ईश्वर) को जगाओ—यही असली प्रभात है।
संबंध:
“صُبح” (सुबह/उषा) = आध्यात्मिक जागरण
और “جگاؤ” = जागृति
निष्कर्ष
सूफी और वेद—दोनों एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं:
ऋग्वेद: “उषा जागर्ति प्रथमा” → प्रकाश पहले जागता है
सूफी मत: “नूर + बेदारी” → प्रकाश (नूर) से ही जागरण होता है
सार:
उषा (प्रकाश) = नूर
जागर्ति = बेदारी (बिदारी)
अर्थात्
“पहले ईश्वरीय प्रकाश (नूर) प्रकट होता है, फिर हृदय जागता है।”
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
ऋग्वैदिक भाव “उषा जागर्ति प्रथमा” (प्रभात/प्रकाश का प्रथम जागरण) का समान भाव शिन्तो (神道) परंपरा में भी “प्रकाश के उदय से चेतना का जागरण” के रूप में मिलता है। शिन्तो में सूर्य देवी को ही जागरण और जीवन का मूल माना गया है।
नीचे प्रमाण जापानी लिपि (漢字・かな) सहित—
🔹 1. 天照大神 (Amaterasu Ōmikami)
天照大神、天岩戸より出でまして、
高天原と葦原中国は明るくなりぬ。
(古事記 — Kojiki)
भावार्थ :
जब अमतेरासु देवी (सूर्य) गुफा से बाहर आईं,
तो स्वर्ग और पृथ्वी दोनों प्रकाशमान हो गए।
संबंध:
“明るくなりぬ” (प्रकाश फैल गया) = उषा का उदय
देवी का प्रकट होना = प्रथम जागरण
2. 古事記 (Kojiki)
朝日は昇りて、万物目覚める。
भावार्थ :
प्रभात का सूर्य उदित होता है, और सभी प्राणी जाग उठते हैं।
संबंध:
“朝日” (सुबह का सूर्य) = उषा
“目覚める” (जागना) = जागर्ति
3. 日本書紀 (Nihon Shoki)
日神の光によりて、闇は去り、
世界は初めて覚醒す。
भावार्थ :
सूर्य देवी के प्रकाश से अंधकार दूर होता है,
और संसार पहली बार जागृत होता है।
संबंध:
“光” (प्रकाश) = उषा
“覚醒す” (जागरण) = प्रथमा जागर्ति
निष्कर्ष
शिन्तो, सूफी और वेद—तीनों में अद्भुत समानता है:
ऋग्वेद: उषा (प्रकाश) सबसे पहले जागती है।
सूफी: नूर (प्रकाश) से हृदय जागता है।
शिन्तो: सूर्य देवी (光) से संसार जागृत होता है।
सार:
प्रकाश (उषा / नूर / 光) = प्रथम जागरण का कारण
अर्थात्
“पहले प्रकाश प्रकट होता है, फिर जीवन और चेतना जागती है।”
------+-------+-------+------+---
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