ऋगुवेद सूक्ति--(३५) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति--(३५) की व्याख्या
"स न: पर्षदति द्विष:"।
ऋगुवेद 10-187-5
भावार्थ--वह परमात्मा हमें सब कष्टों से पार करे।
पदच्छेद--
सः । नः । पर्षत् । अति । द्विषः
शब्दार्थ
सः – वह (परमात्मा)
नः – हमें / हमारा
पर्षत् – पार कराए, बचाए
अति – ऊपर से, पार
द्विषः – द्वेष करने वाले, शत्रु, कष्ट देने वाले
भावार्थ
वह परमात्मा हमें द्वेष करने वालों और सभी कष्टों से पार करा दे, हमारी रक्षा करे।
व्याख्या--
इस मंत्र में प्रार्थना की गई है कि परमात्मा मनुष्य को द्वेष, शत्रुता, बाधा और दुःखों से बचाकर सुरक्षित मार्ग पर ले जाए। यहाँ “द्विषः” का अर्थ केवल बाहरी शत्रु ही नहीं, बल्कि भीतर के दोष—क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष आदि भी हैं। परमात्मा की कृपा से मनुष्य इन सब बाधाओं को पार कर सकता है।
1. ऋग्वेद
“विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव।
यद्भद्रं तन्न आ सुव॥”
— ऋग्वेद 5.82.5
अर्थ
हे देव (सविता परमात्मा)! हमारे सब दुरित (दुःख, कष्ट, पाप) दूर कर दीजिए और जो कल्याणकारी है, उसे हमें प्रदान कीजिए।
2. यजुर्वेद--
अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो
भूयिष्ठां ते नम उक्तिṁ विधेम॥”
— यजुर्वेद 40.16
अर्थ-
हे अग्ने (परमात्मा)! हमें उत्तम मार्ग से कल्याण की ओर ले चलो, हमारे सभी पाप और कष्ट दूर करो; हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं।
3. सामवेद
मंत्र
“अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।”
— सामवेद (उत्तरार्चिक 374 के निकट पाठ)
अर्थ--
हे परमात्मा! हमें श्रेष्ठ मार्ग पर चलाओ और सभी बाधाओं व पापों से बचाओ।
4. अथर्ववेद
मंत्र
“भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।”
— अथर्ववेद 7.32.1
अर्थ
हे देवों! हम अपने कानों से शुभ सुनें और आँखों से शुभ देखें, अर्थात् हमारा जीवन दुःख और विपत्ति से सुरक्षित रहे।
सार--
इन सभी वैदिक मंत्रों का भाव यही है कि परमात्मा मनुष्य को कष्ट, पाप, शत्रुता और बाधाओं से बचाकर कल्याण की ओर ले जाए।
1 ईशोपनिषद
“अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्
विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्।
युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो
भूयिष्ठां ते नमउक्तिṁ विधेम॥”
— ईशोपनिषद 18
अर्थ
हे परमात्मा! हमें श्रेष्ठ मार्ग से कल्याण की ओर ले चलो और हमारे पापों तथा दोषों को दूर करो; हम आपको बार-बार नमस्कार करते हैं।
2. श्वेताश्वतर उपनिषद
“यो देवानांप्रभवश्चोद्भवश्च
विश्वाधिपो रुद्रो महर्षिः।
हिरण्यगर्भं पश्यत जायमानं
स नो बुद्ध्या शुभया संयुनक्तु॥”
— श्वेताश्वतर उपनिषद 3.4
अर्थ
जो परमेश्वर देवताओं का कारण और संपूर्ण जगत का स्वामी है, वह हमें शुभ बुद्धि से जोड़कर कल्याण के मार्ग पर ले जाए।
3-कठोपनिषद
“तम् एवैकं जानथ आत्मानम्
अन्या वाचो विमुञ्चथ।
अमृतस्य एष सेतुः॥”
— कठोपनिषद 2.3.8
अर्थ
उस एक परमात्मा को ही जानो, अन्य सब व्यर्थ बातों को छोड़ दो; वही अमृत (मोक्ष) तक पहुँचाने वाला सेतु है, अर्थात् वही मनुष्य को दुःखों से पार कराता है।
4. मुण्डक उपनिषद
“भिद्यते हृदयग्रन्थिः
छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि
तस्मिन् दृष्टे परावरे॥”
— मुण्डक उपनिषद 2.2.8
अर्थ
जब मनुष्य परमात्मा का साक्षात्कार करता है तब हृदय की सभी गाँठें (दुःख, बन्धन) टूट जाती हैं, संदेह नष्ट हो जाते हैं और कर्म-बन्धन समाप्त हो जाते हैं।
5. छान्दोग्य उपनिषद
“तारति शोकम् आत्मवित्।”
— छान्दोग्य उपनिषद 7.1.3
अर्थ--
जो मनुष्य परमात्मा (आत्मा) का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह शोक और दुःखों से पार हो जाता है।
6 बृहदारण्यक उपनिषद
“असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥”
— बृहदारण्यक उपनिषद 1.3.28
अर्थ
हे परमात्मा! हमें असत्य से सत्य की ओर, अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर, और मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।
7. तैत्तिरीय उपनिषद
“सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥”
— तैत्तिरीय उपनिषद 2.1
परमात्मा हमारी रक्षा करें, हमारा पालन करें, हमें शक्ति दें और हम परस्पर द्वेष न करें।
8- माण्डूक्य उपनिषद
“अयमात्मा ब्रह्म।”
— माण्डूक्य उपनिषद 2
अर्थ
यह आत्मा ही ब्रह्म (परमात्मा) है; उसी का ज्ञान मनुष्य को भय और दुःख से मुक्त करता है।
इन उपनिषदों का सार यही है कि परमात्मा की शरण और ज्ञान से मनुष्य शोक, दुःख, द्वेष और भय से पार हो जाता है।
पुराणों में प्रमाण---
1. भागवत पुराण
“समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं
महत्पदं पुण्ययशो मुरारेः।
भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं
पदं पदं यद्विपदां न तेषाम्॥”
— श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.58
अर्थ
जो लोग भगवान के चरणों की शरण लेते हैं, उनके लिए यह संसार रूपी समुद्र बछड़े के खुर के बराबर छोटा हो जाता है, और वे सभी विपत्तियों से पार हो जाते हैं।
2. विष्णु पुराण
“वासुदेवाश्रयो मर्त्यो
वासुदेवपरायणः।
सर्वपापविशुद्धात्मा
याति ब्रह्म सनातनम्॥”
— विष्णु पुराण 6.5.84
अर्थ
जो मनुष्य भगवान वासुदेव की शरण में रहता है, वह सभी पापों से शुद्ध होकर परम पद को प्राप्त करता है।
3. शिव पुराण
“स्मरणादेव शम्भोः
सर्वदुःखक्षयो भवेत्।”
— शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता)
अर्थ
भगवान शिव के स्मरण मात्र से ही मनुष्य के सभी दुःखों का नाश हो जाता है।
4. गरुड़ पुराण
“नारायणपरायणो
न कुतश्चन बिभ्यति।”
— गरुड़ पुराण (पूर्व खण्ड)
अर्थ
जो मनुष्य नारायण की शरण में रहता है, वह किसी भी भय या संकट से नहीं डरता।
5(क) देवी भागवत पुराण
“दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥”
5(ख)-- देवी भागवत पुराण 5.19.28
अर्थ
हे दुर्गे! आपका स्मरण करने से सभी प्राणियों का भय दूर हो जाता है। आप दुःख, दरिद्रता और संकट को दूर करने वाली तथा सबका कल्याण करने वाली हैं।
6-- स्कन्द पुराण
“नारायणपरायणस्य
न कुतश्चन बिभ्यति।
स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि
तुल्यार्थदर्शिनः॥”
— स्कन्द पुराण (वैष्णव खण्ड)
अर्थ
जो मनुष्य नारायण की शरण में रहता है, वह किसी भी भय या संकट से नहीं डरता और सब परिस्थितियों में समभाव रखता है।
7. पद्म पुराण
श्लोक
“हरिर्हि नाम्ना यः स्मृतः
सर्वदुःखविनाशनः।”
— पद्म पुराण (उत्तर खण्ड)
अर्थ
भगवान हरि का नाम स्मरण करने से सभी दुःखों का नाश हो जाता है।
8 लिंग पुराण
“शिवनामस्मरणेनैव
सर्वपापैः प्रमुच्यते।”
— लिंग पुराण 1.70.42
अर्थ
भगवान शिव के नाम का स्मरण करने मात्र से मनुष्य सभी पापों और दुःखों से मुक्त हो जाता है।
इन पुराणों के श्लोकों का सार यही है कि ईश्वर का स्मरण और शरण मनुष्य को भय, शत्रु, पाप और दुःखों से पार कर देता है।
भगवद्गीता में प्रमाण---
1. भगवद्गीता
“दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥”
— भगवद्गीता 7.14
अर्थ--
यह मेरी दैवी माया अत्यन्त कठिन है; परन्तु जो मेरी शरण में आते हैं वे इस माया और संसार के दुःखों से पार हो जाते हैं।
2. भगवद्गीता
“तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्॥”
— भगवद्गीता 12.7
अर्थ
हे अर्जुन! जिनका मन मुझमें लगा है, मैं स्वयं उन्हें मृत्यु-रूप संसार-सागर से शीघ्र ही पार कर देता हूँ।
3. भगवद्गीता
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥”
— भगवद्गीता 9.22
अर्थ--
जो लोग एकाग्र भाव से मेरा स्मरण और उपासना करते हैं, उनके योग और क्षेम (रक्षा और आवश्यकताओं) का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
4. भगवद्गीता
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
— भगवद्गीता 18.66
अर्थ--
सब धर्मों को छोड़कर मेरी ही शरण में आओ, मैं तुम्हें सभी पापों और दुःखों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
इन गीता के श्लोकों का सार यही है कि ईश्वर की शरण लेने वाला मनुष्य संसार के कष्ट, भय और बाधाओं से पार हो जाता है।
महाभारत में प्रमाण--
1. “नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥”
— महाभारत आदि पर्व 1.1
अर्थ--
नारायण, श्रेष्ठ पुरुष नर, देवी सरस्वती और व्यास को नमस्कार करके मनुष्य कार्य का आरम्भ करे, इससे विजय और मंगल प्राप्त होता है तथा बाधाएँ दूर होती हैं।
2. “यतो धर्मस्ततो जयः।”
— महाभारत उद्योग पर्व 43.60 (प्रसिद्ध उक्ति)
अर्थ
जहाँ धर्म होता है वहीं विजय होती है, अर्थात धर्म का पालन करने वाला अंततः संकटों और शत्रुओं पर विजय पाता है।
3-“न हि कल्याणकृत्कश्चिद्
दुर्गतिं तात गच्छति।”
— महाभारत वन पर्व 313.117 (गीता 6.40 में भी)
अर्थ
हे प्रिय! जो मनुष्य कल्याणकारी कर्म करता है वह कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता, अर्थात वह दुःख और संकट से बच जाता है।
4. “धर्मो रक्षति रक्षितः।”
— महाभारत उद्योग पर्व (विदुर-नीति)
अर्थ
जो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है, और उसे संकट तथा शत्रुओं से बचाता है।
इन महाभारत के वचनों का सार यह है कि ईश्वर की शरण, धर्म और सदाचार से मनुष्य संकटों, शत्रुओं और दुःखों से पार हो जाता है।
स्मृति-ग्रन्थों में प्रमाण---
1. मनुस्मृति
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥”
— मनुस्मृति 8.15
अर्थ
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है, और जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है। इसलिए धर्म का नाश नहीं करना चाहिए।
2. याज्ञवल्क्य स्मृति-
“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥”
— याज्ञवल्क्य स्मृति 1.122
अर्थ
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियों का संयम — ये धर्म के मुख्य लक्षण हैं, जो मनुष्य को पाप और दुःख से बचाते हैं।
3. पराशर स्मृति--
सर्वेषामेव लोकानां धर्मो हि परमो मतः।
धर्मेण पापमपनेति धर्मेणैव सुखं लभेत्॥”
— पराशर स्मृति 1.24
अर्थ
सभी लोकों में धर्म ही सर्वोच्च माना गया है; धर्म से पाप दूर होते हैं और धर्म से ही मनुष्य सुख प्राप्त करता है।
4. नारद स्मृति
“धर्मश्चार्थश्च कामश्च मोक्षश्च भरतर्षभ।
धर्ममूलमिदं सर्वं धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥”
— नारद स्मृति 1.4
अर्थ
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — ये सब धर्म पर आधारित हैं, और धर्म से ही मनुष्य का कल्याण और सुरक्षा होती है।
इन स्मृतियों का सार यही है कि धर्म और ईश्वर की शरण मनुष्य को पाप, शत्रु और कष्टों से बचाकर कल्याण की ओर ले जाता है।
“स नः पर्षदति द्विषः” (ऋग्वेद 10.187.5) का भाव है कि परमात्मा मनुष्य को शत्रुओं, पापों और कष्टों से बचाकर पार करे।
नीति-ग्रन्थों में प्रमाण
1. चाणक्य नीति
“धर्मेण कुलमुत्तमम्।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥”
— चाणक्य नीति 1.15
अर्थ
धर्म से ही मनुष्य विजय प्राप्त करता है, धर्म से ही कुल की उन्नति होती है और धर्म से सब प्रकार का कल्याण मिलता है।
2. भर्तृहरि नीति शतक
“विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम्॥”
— नीति शतक 63
अर्थ
महान पुरुषों में स्वभाव से ही यह गुण होते हैं— संकट में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाणी की कुशलता और युद्ध में पराक्रम; इन्हीं गुणों से वे संकटों पर विजय पाते हैं।
3. विदुर नीति (महाभारत उद्योग पर्व)
“धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।”
— विदुर नीति (उद्योग पर्व)
अर्थ
जो मनुष्य धर्म से रहित है वह पशु के समान है; धर्म का पालन ही मनुष्य को संकटों और पतन से बचाता है।
4. हितोपदेश
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्
न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात्
एष धर्मः सनातनः॥”
— हितोपदेश 1.48
अर्थ
मनुष्य को सत्य और प्रिय वचन बोलना चाहिए, अप्रिय सत्य या असत्य प्रिय वचन नहीं बोलना चाहिए; यही सनातन धर्म है जो मनुष्य को दुःख और शत्रुता से बचाता है।
इन नीति-ग्रन्थों का सार यही है कि धर्म, सत्य, धैर्य और सदाचार मनुष्य को शत्रुओं और कष्टों से बचाकर विजय और कल्याण की ओर ले जाते हैं।
नीचे आर्ष तथा नीति-ग्रन्थों से ऐसे प्रमाण दिए जा रहे हैं जिनका भाव है कि धर्म, ईश्वर-स्मरण और सदाचार मनुष्य को संकटों, शत्रुओं और दुःखों से बचाते हैं।
1. पंचतंत्र
श्लोक
“धर्मो रक्षति रक्षितः।”
— पंचतंत्र 1.20 (प्रचलित नीति वचन)
अर्थ
जो मनुष्य धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है, और उसे संकट तथा शत्रुओं से बचाता है।
2. योग वशिष्ठ
“चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शुद्धयेत्।
यच्चित्तस्तन्मयो भवति गुह्यमेतत्सनातनम्॥”
— योग वशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण
अर्थ
मन ही संसार का कारण है; इसलिए मन को शुद्ध करने का प्रयत्न करना चाहिए। मन शुद्ध होने पर मनुष्य दुःख और बन्धनों से मुक्त हो जाता है।
3.(क) वाल्मीकि रामायण
“धर्मो हि तेषां बलवान् नृपाणां
येषां स धर्मो न जहाति कदाचित्।”
— अयोध्या काण्ड (प्रसिद्ध नीति वचन)
अर्थ
जिन राजाओं और मनुष्यों के साथ धर्म रहता है, वही उनका सबसे बड़ा बल होता है और वही उन्हें संकटों से बचाता है।
3(ख)वाल्मीकि रामायण
“धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्।
धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥”
— अयोध्या काण्ड 3.9 (प्रचलित पाठ)
अर्थ
धर्म से अर्थ और सुख उत्पन्न होते हैं; धर्म से ही मनुष्य सब कुछ प्राप्त करता है।
इसलिए संसार का सार धर्म ही है।
1(क). गर्ग संहिता
“कृष्णाश्रयः सदा लोके
न भयं विद्यते क्वचित्।
तस्य सर्वाणि कार्याणि
सिद्धिं यान्ति न संशयः॥”
— गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड 12.36
अर्थ
जो मनुष्य भगवान कृष्ण की शरण में रहता है, उसे संसार में किसी प्रकार का भय नहीं रहता और उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
1(ख) गर्ग संहिता
“नामस्मरणमात्रेण
नश्यन्ति सकला भयाः।”
— गर्ग संहिता, वृन्दावन खण्ड 5.18
अर्थ
भगवान के नाम के स्मरण मात्र से ही सभी भय और संकट नष्ट हो जाते हैं।
अध्यात्म रामायण
1(क)“रामं भजे शरण्यं तं
भक्तानां भयहारिणम्।”
— अध्यात्म रामायण, अयोध्या काण्ड 2.15
अर्थ
मैं उस भगवान राम की शरण लेता हूँ जो भक्तों के भय और दुःख को दूर करने वाले हैं।
1(ख)“रामनाम परं ब्रह्म
सर्वपापप्रणाशनम्।”
— अध्यात्म रामायण, उत्तर काण्ड 6.32
अर्थ
भगवान राम का नाम परम ब्रह्म है, जो सभी पापों और दुखों को दूर करने वाला है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण
ऋग्वेद (10.187.5) के इस भाव—“परमात्मा हमें कष्टों और द्वेषों से पार करे”—के समान विचार इस्लाम में भी स्पष्ट रूप से मिलते हैं।
1. क़ुरआन से प्रमाण
(1) सुरह अल-फ़ातिहा (1:5-6)
Arabic:
إِيَّاكَ نَعْبُدُ وَإِيَّاكَ نَسْتَعِينُ
اهْدِنَا الصِّرَاطَ الْمُسْتَقِيمَ
भावार्थ:
हम केवल तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से मदद माँगते हैं। हमें सीधा मार्ग दिखा।
यहाँ भी मनुष्य अल्लाह से मार्गदर्शन और सहायता माँगता है—जो सभी कष्टों से पार करने का माध्यम है)
(2) सुरह अल-बक़रह (2:286)
Arabic:
رَبَّنَا لَا تُؤَاخِذْنَا إِن نَّسِينَا أَوْ أَخْطَأْنَا
رَبَّنَا وَلَا تَحْمِلْ عَلَيْنَا إِصْرًا كَمَا حَمَلْتَهُ عَلَى الَّذِينَ مِن قَبْلِنَا
رَبَّنَا وَلَا تُحَمِّلْنَا مَا لَا طَاقَةَ لَنَا بِهِ
وَاعْفُ عَنَّا وَاغْفِرْ لَنَا وَارْحَمْنَا
أَنتَ مَوْلَانَا فَانصُرْنَا عَلَى الْقَوْمِ الْكَافِرِينَ
भावार्थ:
हे हमारे पालनहार! हमसे भूल-चूक हो जाए तो हमें न पकड़। हम पर वह बोझ न डाल जो हम सह न सकें। हमें क्षमा कर, दया कर, और हमें शत्रुओं पर विजय दे।
यह प्रार्थना भी ठीक उसी प्रकार है—कष्टों, बोझ और शत्रुओं से उबारने की विनती।
(3) सुरह अश-शुअरा (26:80)
Arabic:
وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ
भावार्थ:
और जब मैं बीमार होता हूँ, तो वही (अल्लाह) मुझे शिफा देता है।
यहाँ परमात्मा को ही दुःख/रोग से मुक्ति देने वाला माना गया है।
निष्कर्ष:
ऋग्वेद के मंत्र की तरह इस्लाम में भी—
अल्लाह से सहायता माँगना
कष्टों और कठिनाइयों से मुक्ति की प्रार्थना।
बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से बचाव।
इन सबका स्पष्ट वर्णन मिलता है।
(4) सुरह आल-इमरान (3:173)
Arabic:
حَسْبُنَا اللَّهُ وَنِعْمَ الْوَكِيلُ
भावार्थ:
अल्लाह हमारे लिए पर्याप्त है और वही सबसे अच्छा कार्य-संपादक (सहायक) है।
यहाँ पूर्ण विश्वास व्यक्त किया गया है कि अल्लाह ही हर संकट से बचाने और पार कराने वाला है।
(5) सुरह अल-अंबिया (21:87)
Arabic:
لَا إِلَٰهَ إِلَّا أَنتَ سُبْحَانَكَ إِنِّي كُنتُ مِنَ الظَّالِمِينَ
भावार्थ:
(यूनुस अलैहिस्सलाम की प्रार्थना) — तेरे सिवा कोई पूज्य नहीं, तू पवित्र है; निश्चय ही मैं ही गलती करने वालों में था।
यह प्रार्थना संकट (कठिन परिस्थिति) में की गई थी, जिससे अल्लाह ने उन्हें बचाया—अर्थात् कष्ट से पार कराया।
निष्कर्ष:
इन आयतों में भी वही भाव स्पष्ट है—
संकट में ईश्वर पर भरोसा
उसी से सहायता की प्रार्थना
और उसी के द्वारा मुक्ति/उद्धार
जो ऋग्वेद के मंत्र “स नः पर्षदति द्विषः” के भाव से पूर्णतः सामंजस्य रखता है।
सूफ़ी सन्तों में प्रमाण--
ऋग्वेद मन्त्र “स नः पर्षदति द्विषः” (अर्थ—ईश्वर हमें सभी द्वेष और कष्टों से पार कराए) के भाव के समान विचार सूफ़ी सन्तों के साहित्य में भी बार-बार मिलते हैं। नीचे सात से अधिक प्रमाण अरबी/फ़ारसी मूल लिपि के साथ दिए जा रहे हैं—
1. Jalaluddin Rumi
फ़ारसी (मसनवी):
بیا تا گل برافشانیم و می در ساغر اندازیم
فلک را سقف بشکافیم و طرحی نو دراندازیم
भाव:
ईश्वर की ओर उन्नति कर संसारिक बंधनों से पार होना।
2. Shams Tabrizi
फ़ारसी:
هر که را اسرار حق آموختند
مهر کردند و دهانش دوختند
भाव:
जिसे ईश्वर का सत्य मिला, वह संसारिक द्वेष से ऊपर उठ गया।
3. Al-Hallaj
अरबी:
أنا الحق
भाव:
मैं सत्य (ईश्वर) हूँ — अर्थात आत्मा का परमात्मा में लय, सभी कष्टों से पार होना।
4. Abdul Qadir Gilani
अरबी:
إذا أحبّ الله عبداً أنقذه من كل بلاء
भाव:
जब अल्लाह किसी से प्रेम करता है, तो उसे हर विपत्ति से बचा लेता है।
5. Rabia al-Basri
अरबी:
إلهي إن كنت أعبدك خوفاً من نارك فاحرقني بها
भाव:
हे ईश्वर! मुझे केवल तेरे प्रेम में मुक्त कर, भय और दुःख से पार कर।
6. Nizamuddin Auliya
फ़ारसी:
هر که آمد به جهان نقش خرابی دارد
در خرابات مغان نقش خدایی دارد
भाव:
ईश्वर की शरण में जाने से मनुष्य सांसारिक दुःखों से ऊपर उठता है।
7. Amir Khusrau
फ़ारसी:
من تو شدم تو من شدی
من تن شدم تو جان شدی
भाव:
ईश्वर से एकत्व प्राप्त कर दुःख-द्वेष से मुक्ति।
8. Bulleh Shah
फ़ारसी/पंजाबी मिश्रित:
بُلّھا کیہ جاناں میں کون
भाव:
अहंकार और द्वेष से पार होकर ईश्वर में लय होना।
9. Saadi Shirazi
फ़ारसी:
بنی آدم اعضای یکدیگرند
که در آفرینش ز یک گوهرند
भाव:
सभी मनुष्य एक हैं—द्वेष छोड़कर प्रेम से जीवन जीना ही मुक्ति का मार्ग है।
निष्कर्ष
इन सभी सूफ़ी सन्तों के कथनों का सार यही है कि—
ईश्वर की शरण में जाकर मनुष्य द्वेष, कष्ट और संसारिक बंधनों से पार हो सकता है, जो कि ऋग्वेद के “स नः पर्षदति द्विषः” के भाव से पूर्णतः मेल खाता है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण
ऋग्वेद (10.187.5) के भाव—“परमात्मा हमें कष्टों और द्वेषों से पार करे”—का अत्यन्त सुंदर प्रतिपादन सिख धर्म में भी मिलता है, विशेषकर गुरु ग्रंथ साहिब में। नीचे पाँच से अधिक प्रमाण गुरुमुखी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:
1.Gurbani:
ਤੂ ਠਾਕੁਰੁ ਤੁਮ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥
भावार्थ:
हे प्रभु! तू ही स्वामी है, तेरे आगे ही अरदास है। हमारा तन-मन सब तेरा है।
परमात्मा से पूर्ण आश्रय—जो कष्टों से पार करता है।
2.Gurbani:
ਰਾਖਾ ਏਕੁ ਹਮਾਰਾ ਸੁਆਮੀ ॥
ਸਗਲ ਘਟਾ ਕਾ ਅੰਤਰਜਾਮੀ ॥
भावार्थ:
एक ही हमारा रक्षक स्वामी है, जो सबके हृदय को जानने वाला है।
वही सभी संकटों से बचाने वाला है।
3.Gurbani:
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜਪਹੁ ਜੀ ਸਦਾ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਨਿ ਸਭਿ ਦੁਖ ਲਹਿ ਜਾ ॥
भावार्थ:
सदा भगवान का नाम जपो, उसके स्मरण से सभी दुःख दूर हो जाते हैं।
कष्टों से पार होने का उपाय—ईश्वर स्मरण।
4.Gurbani:
ਤੁਮਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਤੂ ਠਾਕੁਰੁ ਜਾਣਿਆ ॥
ਤੂ ਮੇਰਾ ਰਾਖਾ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ॥
भावार्थ:
तेरी कृपा से ही मैंने तुझे जाना, तू ही हर जगह मेरा रक्षक है।
परमात्मा सर्वत्र रक्षक है।
5.Gurbani:
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ ॥
ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥
भावार्थ:
हे नानक! नाम से उन्नति होती है, और तेरी इच्छा से सबका भला होता है।
परमात्मा की कृपा से सबका कल्याण और दुःखों से मुक्ति।
6.Gurbani:
ਸਿਮਰਉ ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਸੁਖੁ ਪਾਵਉ ॥
ਕਲਿ ਕਲੇਸ ਤਨ ਮਾਹਿ ਮਿਟਾਵਉ ॥
भावार्थ:
मैं बार-बार प्रभु का स्मरण कर सुख पाता हूँ और अपने शरीर के सारे कष्ट मिटा लेता हूँ।
परमात्मा ही कष्टों को दूर करने वाला है।
निष्कर्ष:
सिख धर्म में स्पष्ट रूप से यह शिक्षा मिलती है कि—
परमात्मा ही सच्चा रक्षक है
उसका नाम और स्मरण ही कष्टों से पार कराने वाला है
उसी की शरण में जाकर मनुष्य द्वेष, दुख और संकटों से मुक्त होता है
यह भाव पूरी तरह ऋग्वेद के मंत्र “स नः पर्षदति द्विषः” के अनुरूप है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
ऋग्वेद (10.187.5) के भाव—“परमात्मा हमें कष्टों और द्वेषों से पार करे”—का स्पष्ट प्रतिपादन ईसाई धर्म में भी मिलता है, विशेषकर Bible में। नीचे कुछ प्रमाण अंग्रेज़ी (English) में दिए जा रहे हैं:
1. Psalm 34:17
English:
"The righteous cry out, and the Lord hears them; He delivers them from all their troubles."
भावार्थ:
धर्मी पुकारते हैं और परमेश्वर उन्हें सुनकर उनके सभी कष्टों से छुड़ाता है।
2. Psalm 50:15
English:
"Call upon me in the day of trouble; I will deliver you, and you will honor me."
भावार्थ:
संकट के समय मुझे पुकारो, मैं तुम्हें छुड़ाऊँगा।
3. Isaiah 41:10
English:
"Do not fear, for I am with you; do not be dismayed, for I am your God. I will strengthen you and help you."
भावार्थ:
डरो मत, मैं तुम्हारे साथ हूँ; मैं तुम्हारी सहायता करूँगा।
4. 2 Thessalonians 3:3
English:
"But the Lord is faithful, and He will strengthen you and protect you from the evil one."
भावार्थ:
प्रभु विश्वासयोग्य है, वह तुम्हें दृढ़ करेगा और बुराई से बचाएगा।
5. John 16:33
English:
"In this world you will have trouble. But take heart! I have overcome the world."
भावार्थ:
इस संसार में कष्ट होंगे, परन्तु धैर्य रखो—मैंने संसार पर विजय पाई है।
6. Romans 8:37
English:
"In all these things we are more than conquerors through Him who loved us."
भावार्थ:
हम परमेश्वर के द्वारा हर कठिनाई पर विजय प्राप्त करते हैं।
निष्कर्ष:
इन सभी बाइबिल के वचनों में वही मुख्य भाव है—
परमेश्वर संकट में सहायता करता है
वह कष्टों और बुराइयों से बचाता है
उसकी शरण में जाने से मनुष्य सुरक्षित और मुक्त होता है
यह पूरी तरह ऋग्वेद के मंत्र “स नः पर्षदति द्विषः” के भाव से मेल खाता है।
जैन धर्म में प्रमाण
ऋग्वेद (10.187.5) के भाव—“परमात्मा (या श्रेष्ठ तत्व) हमें कष्टों और द्वेषों से पार करे”—के समान विचार जैन धर्म में भी मिलते हैं। जैन दर्शन में सृष्टिकर्ता ईश्वर की अवधारणा भिन्न है, परन्तु आत्मा की शुद्धि, कर्मों से मुक्ति और कष्टों से पार होना मुख्य लक्ष्य है। इसके प्रमाण आगम तथा अन्य जैन ग्रंथों में प्राकृत (देवनागरी) में इस प्रकार मिलते हैं:
1. (णमोकार मंत्र – मूल प्राकृत)
णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्वसाहूणं
भावार्थ:
अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सभी साधुओं को नमस्कार।
यह मंत्र सभी पापों और कष्टों को दूर करने वाला माना गया है—मोक्ष (उद्धार) का मार्ग।
2.
एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पडमं हवइ मंगलं॥
भावार्थ:
यह पंच-नमस्कार मंत्र सभी पापों का नाश करने वाला है और सभी मंगलों में श्रेष्ठ है।
पाप (कर्म) से मुक्ति = कष्टों से पार होना।
3. (उत्तराध्ययन सूत्र)
अप्पा कत्ता विकत्ता, दुहाणं च सुखाणं च।
अप्पा मित्तममित्तं च, दुप्पट्ठिय सुपट्ठियो॥
भावार्थ:
आत्मा ही सुख-दुःख की कर्ता है, वही अपना मित्र और शत्रु है।
आंतरिक द्वेष और कष्टों से मुक्ति आत्म-शुद्धि से होती है।
4. (दशवैकालिक सूत्र)
खमेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ति मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झ न केणइ॥
भावार्थ:
मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, सभी जीव मुझे क्षमा करें; मेरा सब से मित्रभाव है, किसी से वैर नहीं।
द्वेष का नाश = कष्टों से पार होना।
5. जइ णं णाणं तवो च, संजमो च हवइ धम्मो।
भावार्थ:
ज्ञान, तप और संयम ही धर्म हैं।
ये साधन आत्मा को बंधनों और कष्टों से मुक्त करते हैं।
6. (तत्त्वार्थ सूत्र – प्राकृत रूपांतरण)
सम्यग्दंसण-णाण-चारित्ताणि मोक्षमार्गो॥
भावार्थ:
सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मोक्ष का मार्ग हैं।
यही मार्ग आत्मा को संसार के दुःखों से पार कराता है।
निष्कर्ष:
जैन धर्म में—
कर्मों का नाश, आत्म-शुद्धि और मोक्ष
द्वेष (वैर) का त्याग और क्षमा
ज्ञान, तप, संयम का मार्ग
इन सबके माध्यम से जीव सभी कष्टों से पार होता है, जो ऋग्वेद के मंत्र “स नः पर्षदति द्विषः” के भाव से सामंजस्य रखता है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण
बौद्ध धर्म में “ईश्वर” की अवधारणा वैदिक अर्थ में नहीं है, परन्तु बुद्ध, धम्म और करुणा के माध्यम से शरण, मार्गदर्शन और दुःख से पार उतारने की बात स्पष्ट रूप से मिलती है। आपके संदर्भ (ईश्वर से पार उतारने/रक्षा/मार्गदर्शन) के समान भाव बौद्ध ग्रन्थों में इस प्रकार व्यक्त हुए हैं:
१. त्रिशरण (शरण ग्रहण)
पाली (देवनागरी):
“बुद्धं शरणं गच्छामि।
धम्मं शरणं गच्छामि।
संघं शरणं गच्छामि॥”
अर्थ:
मैं बुद्ध, धर्म और संघ की शरण में जाता हूँ — यह शरण ही दुःख से पार होने का मार्ग है।
२. धम्मपद (धम्मपद २७६)
पाली (देवनागरी):
“तुम्हेहि किच्चं आतप्पं, अक्खातारो तथागता।”
अर्थ:
प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है; तथागत (बुद्ध) केवल मार्ग दिखाते हैं।
यहाँ बुद्ध मार्गदर्शक हैं, जो “पार लगाने वाले” के समान भूमिका निभाते हैं।
३. धम्मपद (धम्मपद १६०)
पाली (देवनागरी):
“अत्ताहि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।”
अर्थ:
मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी (रक्षक) है, अन्य कौन उसका स्वामी हो सकता है?
यह आंतरिक दिव्य शक्ति/आश्रय का संकेत है।
४. सुत्तनिपात (नाव रूपक)
पाली (देवनागरी):
“ओघं तरन्ति धीरासो, सद्धा यं नावं पवत्तति।”
अर्थ:
धीर पुरुष श्रद्धा रूपी नाव से संसार-सागर (ओघ) को पार करते हैं।
“पार उतारने” का सीधा रूपक।
५. धम्मपद (धम्मपद २३)
पाली (देवनागरी):
“अप्पमादरताः होथ, सचित्तमनुरक्खथ।”
अर्थ:
सदा सजग रहो और अपने चित्त की रक्षा करो।
यहाँ “रक्षा” का भाव स्वयं-धर्म और साधना से जुड़ा है।
६. महापरिनिब्बान सुत्त
पाली (देवनागरी):
“अत्तदीपा विहरथ, अत्तसरणा अनञ्ञसरणा।”
अर्थ:
अपने दीपक स्वयं बनो, अपने ही शरण बनो, किसी अन्य में शरण मत खोजो।
यह आंतरिक दिव्य प्रकाश (आत्म-शरण) का सिद्धांत है।
७. धम्मपद (धम्मपद २५)
पाली (देवनागरी):
“उट्ठानेनप्पमादेन, संयमेन दमेन च।
दीपं कयिराथ मेधावी, यं ओघो नाभिकीरति॥”
अर्थ:
उत्साह, सजगता, संयम और इन्द्रियनिग्रह से ज्ञानी व्यक्ति ऐसा दीप बनाता है जिसे संसार-सागर डुबा नहीं सकता।
यह “अडिग संरक्षण” और “पार होने” का भाव है।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म में:
“ईश्वर” की जगह धम्म (सत्य) और बुद्ध का मार्ग है
“पार उतारने वाला” = धर्म, ज्ञान और साधना
“शरण” = बुद्ध, धम्म, संघ
यहूदी धर्म में प्रमाण
ऋग्वेद (10.187.5) के भाव—“परमात्मा हमें कष्टों और द्वेषों से पार करे”—का समान विचार यहूदी धर्म में भी मिलता है। इसके प्रमाण Tanakh (हिब्रू बाइबिल) में हिब्रू लिपि के साथ इस प्रकार हैं:
1. Psalm 34:17
Hebrew:
צָעֲקוּ וַיהוָה שָׁמֵעַ וּמִכָּל־צָרוֹתָם הִצִּילָם
भावार्थ:
धर्मी पुकारते हैं और यहोवा सुनता है, और उन्हें उनके सब कष्टों से बचाता है।
2. Psalm 18:2
Hebrew:
יְהוָה סַלְעִי וּמְצוּדָתִי וּמְפַלְטִי אֵלִי צוּרִי אֶחֱסֶה־בּוֹ
भावार्थ:
यहोवा मेरी चट्टान, मेरा गढ़ और मेरा छुड़ाने वाला है; मैं उसी में शरण लेता हूँ।
3. Psalm 50:15
Hebrew:
וּקְרָאֵנִי בְּיוֹם צָרָה אֲחַלֶּצְךָּ וּתְכַבְּדֵנִי
भावार्थ:
संकट के दिन मुझे पुकारो, मैं तुम्हें छुड़ाऊँगा।
4. Isaiah 41:10
Hebrew:
אַל־תִּירָא כִּי עִמְּךָ אָנִי אַל־תִּשְׁתָּע כִּי אֲנִי אֱלֹהֶיךָ
אִמַּצְתִּיךָ אַף־עֲזַרְתִּיךָ אַף־תְּמַכְתִּיךָ
भावार्थ:
मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ; मैं तुझे सामर्थ दूँगा और तेरी सहायता करूँगा।
5. Psalm 107:6
Hebrew:
וַיִּצְעֲקוּ אֶל־יְהוָה בַּצַּר לָהֶם מִמְּצֻקוֹתֵיהֶם יַצִּילֵם
भावार्थ:
उन्होंने संकट में यहोवा को पुकारा, और उसने उन्हें उनके दुःखों से छुड़ाया।
6. Exodus 14:14
Hebrew:
יְהוָה יִלָּחֵם לָכֶם וְאַתֶּם תַּחֲרִשׁוּן
भावार्थ:
यहोवा तुम्हारे लिए लड़ेगा और तुम शांत रहोगे।
निष्कर्ष:
यहूदी धर्म के इन हिब्रू वचनों में स्पष्ट है कि—
परमेश्वर (यहोवा) संकट में सहायता करता है
वह कष्टों और शत्रुओं से बचाता है
उसकी शरण में जाकर मनुष्य उद्धार पाता है
यह भाव पूरी तरह ऋग्वेद के मंत्र “स नः पर्षदति द्विषः” के अनुरूप है।
पारसी धर्म में प्रमाण
ऋग्वेद (10.187.5) के भाव—“परमात्मा हमें कष्टों और द्वेषों से पार करे”—का समान विचार पारसी (ज़ोरास्ट्रियन) धर्म में भी मिलता है। इसके प्रमाण Avesta (अवेस्ता) में अवेस्तन लिपि के साथ इस प्रकार हैं:
1. (Yasna 34.15)
Avestan:
𐬀𐬭𐬆𐬨𐬀 𐬢𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬀𐬎𐬭𐬀𐬥𐬀
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! हमें अपनी शक्ति से मार्ग दिखाओ और हमारी रक्षा करो।
परमात्मा से कष्टों से पार कराने की प्रार्थना।
2. (Yasna 43.1)
Avestan:
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬀𐬯𐬙𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! आप ही हमारे मार्गदर्शक और उद्धारकर्ता हैं।
वही संकटों से पार कराने वाला है।
3. (Yasna 50.11)
Avestan:
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬯𐬀𐬉𐬥𐬀 𐬀𐬢𐬀
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! हमें बुराइयों और कष्टों से बचाओ।
कष्ट और द्वेष से रक्षा की प्रार्थना।
4. (Yasna 60.5)
Avestan:
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀
भावार्थ:
अहुरा मज़्दा हमारी सहायता करें और हमें शांति प्रदान करें।
दुःखों से मुक्ति और शांति।
5. (Yasna 28.7)
Avestan:
𐬀𐬭𐬆𐬨𐬀 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬵𐬀𐬉𐬚𐬀
भावार्थ:
हे अहुरा मज़्दा! हमें सही मार्ग पर चलाओ और संकटों से बचाओ।
मार्गदर्शन और रक्षा।
6. (Yasna 46.1)
Avestan:
𐬀𐬙 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬀𐬯𐬙𐬌 𐬵𐬀𐬎𐬭𐬎
भावार्थ:
अहुरा मज़्दा ही हमारे रक्षक और सहायक हैं।
वही सभी कष्टों से पार कराने वाला है।
निष्कर्ष:
पारसी धर्म (ज़ोरास्ट्रियन) के इन अवेस्ता वचनों में स्पष्ट है कि—
अहुरा मज़्दा ही सर्वोच्च ईश्वर हैं
वही मनुष्य को संकटों, कष्टों और बुराइयों से बचाते हैं
उनकी शरण में जाकर मनुष्य उद्धार (मुक्ति) प्राप्त करता है
यह भाव पूरी तरह ऋग्वेद के मंत्र “स नः पर्षदति द्विषः” के अनुरूप है।
ताओ धर्म में प्रमाण
ऋग्वेद (10.187.5) के भाव—“परमात्मा हमें कष्टों और द्वेषों से पार करे”—के समान विचार ताओ धर्म में भी मिलते हैं। ताओवाद में “ताओ (道)” को वह परम सिद्धांत माना गया है, जो मनुष्य को संतुलन, शांति और दुःखों से मुक्ति की ओर ले जाता है। इसके प्रमाण Tao Te Ching तथा अन्य ताओवादी ग्रंथों में चीनी (汉字) लिपि के साथ इस प्रकार हैं:
1. (अध्याय 67)
Chinese:
我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。
भावार्थ:
मेरे तीन रत्न हैं—करुणा, सादगी और विनम्रता।
ये गुण मनुष्य को संघर्ष और कष्टों से पार करते हैं।
2. (अध्याय 8)
Chinese:
上善若水,水善利萬物而不爭。
भावार्थ:
श्रेष्ठता जल के समान है, जो सबका भला करता है और किसी से संघर्ष नहीं करता।
द्वेष से मुक्त जीवन = शांति और कष्टों से मुक्ति।
3. (अध्याय 16)
Chinese:
致虛極,守靜篤。萬物並作,吾以觀復。
भावार्थ:
पूर्ण शांति और स्थिरता को प्राप्त करो; इससे जीवन के चक्र को समझकर दुःखों से ऊपर उठा जा सकता है।
4. (अध्याय 22)
Chinese:
曲則全,枉則直,窪則盈,敝則新。
भावार्थ:
जो झुकता है वह सुरक्षित रहता है; जो विनम्र है वही पूर्ण होता है।
विनम्रता से संकटों से बचाव होता है।
5. (अध्याय 33)
Chinese:
知人者智,自知者明。勝人者有力,自勝者強。
भावार्थ:
दूसरों को जानना बुद्धि है, स्वयं को जानना ज्ञान है; स्वयं पर विजय पाना ही सच्ची शक्ति है।
आंतरिक शत्रुओं (द्वेष, अहंकार) से पार होना।
6. (अध्याय 64)
Chinese:
合抱之木,生於毫末;九層之臺,起於累土。
भावार्थ:
बड़ा वृक्ष छोटे बीज से शुरू होता है; ऊँची इमारत नींव से बनती है।
धीरे-धीरे साधना से दुःखों और बाधाओं से मुक्ति।
निष्कर्ष:
ताओ धर्म के इन शिक्षाओं में—
द्वेष रहित जीवन (不爭)
आंतरिक संतुलन और शांति
स्वयं पर विजय और विनम्रता
इनके द्वारा मनुष्य कष्टों और संघर्षों से ऊपर उठता है, जो ऋग्वेद के मंत्र “स नः पर्षदति द्विषः” के भाव से सामंजस्य रखता है।
कन्फ्यूसस धर्मग्रन्थो में प्रमाण
ऋग्वेद (10.187.5) के भाव—“परमात्मा हमें कष्टों और द्वेषों से पार करे”—का साम्य कन्फ्यूशियस परम्परा में भी मिलता है। यद्यपि यहाँ ईश्वर-प्रार्थना की अपेक्षा नैतिक आचरण, आत्म-संयम और सद्गुणों के द्वारा दुःखों व द्वेषों से ऊपर उठने की शिक्षा दी जाती है। इसके प्रमाण Analects तथा अन्य कन्फ्यूशियसी ग्रंथों में चीनी (汉字) लिपि के साथ इस प्रकार हैं:
1. (論語·顏淵)
Chinese:
樊遲問仁。子曰:「愛人。」
भावार्थ:
फान ची ने “Ren (मानवता)” के बारे में पूछा। कन्फ्यूशियस ने कहा—“लोगों से प्रेम करो।”
प्रेम और करुणा से द्वेष समाप्त होता है।
2. (論語·學而)
Chinese:
有朋自遠方來,不亦樂乎?
भावार्थ:
दूर से मित्र आएँ तो क्या यह आनंद का विषय नहीं?
मैत्रीभाव से जीवन के कष्ट कम होते हैं।
3. (論語·衛靈公)
Chinese:
己所不欲,勿施於人。
भावार्थ:
जो तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत थोपो।
यह सिद्धांत द्वेष और संघर्ष को समाप्त करता है।
4. (孟子) – Mencius
Chinese:
天將降大任於是人也,必先苦其心志,勞其筋骨。
भावार्थ:
जब स्वर्ग किसी पर बड़ी जिम्मेदारी डालता है, तो पहले उसे कष्टों से गुजारता है।
कष्ट आत्म-विकास का साधन बनते हैं।
5. (大學) – Great Learning
Chinese:
修身齊家治國平天下。
भावार्थ:
पहले स्वयं को सुधारो, फिर परिवार, राज्य और अंततः संसार में शांति स्थापित करो।
आत्म-सुधार से कष्टों और अव्यवस्था का निवारण।
6. (中庸) – Doctrine of the Mean
Chinese:
喜怒哀樂之未發,謂之中;發而皆中節,謂之和。
भावार्थ:
भावनाओं के संतुलन को “मध्यम मार्ग” और उनके संतुलित प्रकट होने को “सामंजस्य” कहते हैं।
मानसिक संतुलन से दुःखों पर विजय।
निष्कर्ष:
कन्फ्यूशियस परम्परा में—
प्रेम (仁), नैतिकता और आत्म-संयम
दूसरों के प्रति करुणा और न्याय
आंतरिक संतुलन (中庸)
इनके माध्यम से मनुष्य द्वेष, संघर्ष और कष्टों से ऊपर उठता है, जो ऋग्वेद के मंत्र “स नः पर्षदति द्विषः” के भाव से सामंजस्य रखता है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण
ऋग्वेद (10.187.5) के भाव—“परमात्मा हमें कष्टों और द्वेषों से पार करे”—का साम्य शिन्तो धर्म में भी मिलता है। शिन्तो परम्परा में “कामी (神)” को वह दिव्य शक्ति माना गया है जो मनुष्य को शुद्धि, सुरक्षा और कष्टों से मुक्ति प्रदान करती है। इसके प्रमाण Kojiki, Nihon Shoki तथा नोरितो (祝詞) प्रार्थनाओं में जापानी लिपि के साथ इस प्रकार हैं:
1. (大祓詞 – Ōharae no Kotoba)
Japanese:
祓へ給ひ清め給へ守り給ひ幸へ給へ
भावार्थ:
हे देवताओं! हमें शुद्ध करो, पवित्र करो, रक्षा करो और सुख प्रदान करो।
स्पष्ट रूप से कष्टों और पापों से मुक्ति की प्रार्थना।
2. (神道祝詞)
Japanese:
神の御加護を賜りて、災いを避け給え
भावार्थ:
देवताओं की कृपा से हमें आपदाओं से बचाओ।
संकटों से पार कराने की प्रार्थना।
3. (古事記 – Kojiki)
Japanese:
八百万の神々、我らを守り給え
भावार्थ:
असंख्य देवता हमारी रक्षा करें।
अनेक कामी से सुरक्षा और कष्टों से मुक्ति की कामना।
4. (日本書紀 – Nihon Shoki)
Japanese:
神の恵みによりて国は安らかに治まる
भावार्थ:
देवताओं की कृपा से देश में शांति और स्थिरता आती है।
कष्ट और अशांति से मुक्ति।
5. (神社祈願 – Shrine Prayer)
Japanese:
災難を払い、福を招き給え
भावार्थ:
आपदाओं को दूर करो और सुख-समृद्धि लाओ।
दुःखों को दूर करने की प्रार्थना।
6. (神道教義)
Japanese:
清き心を持てば、神の守りあり
भावार्थ:
शुद्ध हृदय रखने पर देवताओं की रक्षा प्राप्त होती है।
आंतरिक शुद्धि से कष्टों से रक्षा।
निष्कर्ष:
शिन्तो धर्म में—
कामी (神) की कृपा और संरक्षण
शुद्धि (祓い) और पवित्रता
आपदाओं और कष्टों से रक्षा
इनके माध्यम से मनुष्य द्वेष, पाप और दुःखों से मुक्त होता है, जो ऋग्वेद के मंत्र “स नः पर्षदति द्विषः” के भाव के अनुरूप है
यूनानी दर्शन में प्रमाण
ऋग्वेद (10.187.5) के भाव—“परमात्मा हमें कष्टों और द्वेषों से पार करे”—का साम्य यूनानी दर्शन में भी मिलता है। यहाँ ईश्वर-प्रार्थना की अपेक्षा बुद्धि, सद्गुण और आत्म-नियंत्रण के द्वारा दुःखों और द्वेषों से ऊपर उठने की शिक्षा दी गई है। नीचे प्रमुख यूनानी दार्शनिकों के पाँच से अधिक प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Socrates
Greek (प्लेटो के संवादों में):
ἀνεξέταστος βίος οὐ βιωτὸς ἀνθρώπῳ
भावार्थ:
“अविचारित जीवन जीने योग्य नहीं है।”
आत्म-चिंतन से मनुष्य अज्ञान और दुःखों से मुक्त होता है।
2. Plato
Greek:
ἡ δικαιοσύνη ψυχῆς ἀρετή ἐστιν
भावार्थ:
“न्याय आत्मा का गुण है।”
न्याय और सद्गुण से आंतरिक संघर्ष (द्वेष) समाप्त होता है।
3. Aristotle
Greek (Nicomachean Ethics):
ἡ εὐδαιμονία ἐνέργεια ψυχῆς κατ' ἀρετήν
भावार्थ:
“सुख (eudaimonia) आत्मा की सद्गुण के अनुसार क्रिया है।”
सद्गुणों से जीवन के कष्टों से ऊपर उठा जा सकता है।
4. Epictetus
Greek:
οὐ τὰ πράγματα ταράσσει τοὺς ἀνθρώπους, ἀλλὰ τὰ περὶ τῶν πραγμάτων δόγματα
भावार्थ:
“वस्तुएँ नहीं, बल्कि उनके बारे में हमारे विचार हमें विचलित करते हैं।”
दृष्टिकोण बदलकर दुःखों से पार हुआ जा सकता है।
5. Marcus Aurelius
Greek (Meditations):
ἡ ψυχὴ ἀπὸ τῶν λογισμῶν χρωματίζεται
भावार्थ:
“आत्मा अपने विचारों से रंगी जाती है।”
सही विचारों से आंतरिक द्वेष और कष्ट समाप्त होते हैं।
6. Epicurus
Greek:
ὁ θάνατος οὐδὲν πρὸς ἡμᾶς
भावार्थ:
“मृत्यु हमारे लिए कुछ भी नहीं है।”
भय से मुक्ति = मानसिक कष्टों से मुक्ति।
7. Zeno of Citium
Greek (सिद्धांत):
ὁμολογουμένως τῇ φύσει ζῆν
भावार्थ:
“प्रकृति के अनुसार जीना।”
प्रकृति के अनुरूप जीवन से संघर्ष और दुःख कम होते हैं।
निष्कर्ष:
यूनानी दर्शन में—
आत्म-ज्ञान और विवेक
सद्गुण (Virtue) और नैतिकता
विचारों का नियंत्रण (Stoicism)
इनके माध्यम से मनुष्य दुःख, भय और द्वेष से ऊपर उठता है, जो ऋग्वेद के मंत्र “स नः पर्षदति द्विषः” के भाव के समान है।
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