ऋगुवेद सूक्ति--(33) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति--(३३) की व्याख्या
"विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि"
भावार्थ --हे प्रभु ! सारी विद्याओं का आदि मूल तू ही है।
मंत्र —
विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि--2.23.2
पदच्छेद-
विश्वेषाम् + इत् + जनिता + ब्रह्मणाम् + असि
शब्दार्थ--
विश्वेषाम् — सबका, समस्त का
इद् — ही, निश्चय ही
जनिता — उत्पन्न करने वाला, जन्मदाता
ब्रह्मणाम् — ब्रह्म (ज्ञान, मन्त्र, विद्या) का
असि — तुम हो
भावार्थ--
हे प्रभु! आप ही समस्त ब्रह्म (ज्ञान, मन्त्र और विद्याओं) के उत्पन्न करने वाले हैं। संसार में जो भी विद्या, ज्ञान या सत्य का प्रकाश है, उसका मूल स्रोत आप ही हैं।
अर्थात् — सभी विद्याओं का आदि मूल परमात्मा ही है।
व्याख्या--
इस मंत्र में यह सिद्ध किया गया है कि ज्ञान स्वतः नहीं उत्पन्न होता, बल्कि उसका परम स्रोत परमात्मा है। वही परम चेतना ऋषियों के हृदय में ज्ञान का प्रकाश करती है, जिससे वेद, मंत्र और समस्त विद्याएँ प्रकट होती हैं।
इस प्रकार यह मंत्र बताता है कि परमात्मा ही समस्त ज्ञान का मूल कारण और प्रेरक है।
ऋग्वेद 2.23.2 का यह पूरा मन्त्र—
दे॒वाश्चि॑त्ते असुर्य॒ प्रचे॑तसो॒ बृह॑स्पते य॒ज्ञियं॑ भा॒गमा॑नशुः ।
उ॒स्रा इ॑व॒ सूर्यो॒ ज्योति॑षा म॒हो विश्वे॑षा॒मिज्ज॑नि॒ता ब्रह्म॑णामसि ॥
पदच्छेद:
देवाः चित् ते असुर्य प्रचेतसः बृहस्पते यज्ञियम् भागम् आनशुः
उस्राः इव सूर्यः ज्योतिषा महः विश्वेषाम् इत् जनिता ब्रह्मणाम् असि ॥
भावार्थ:
हे बृहस्पति ! प्रज्ञावान देवगण तुमसे यज्ञीय भाग प्राप्त करते हैं; जैसे सूर्य अपने प्रकाश से किरणों को प्रकट करता है, वैसे ही तुम समस्त ब्रह्मों (वेदों, मन्त्रों, विद्याओं) के जनक हो।
विशेष:
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — यही वह पद है जिसका भाव आपने कहा:
“हे प्रभु! सारी विद्याओं का आदि मूल तू ही है।”
वेदों में प्रमाण --
1. ऋग्वेद-- 10.71.1
बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं
यत्प्रैरत नामधेयं दधानाः।
अर्थ :
हे बृहस्पति (परमेश्वर)! आपने ही प्रारम्भ में वाणी और ज्ञान को प्रकट किया और वस्तुओं के नाम तथा विद्या का ज्ञान दिया।
भाव :
ज्ञान और वाणी का मूल स्रोत परमात्मा है।
2. यजुर्वेद-- 40.8
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणम्
अस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूः
याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः॥
अर्थ :
वह परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वव्यापक और स्वयम्भू है; वही यथार्थ रूप से सब पदार्थों का ज्ञान मनुष्यों को देता है।
भाव :
सभी ज्ञान का विधान और व्यवस्था परमात्मा ही करता है।
3. ऋग्वेद-- 10.129.6
यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्
सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद।
अर्थ :
इस सृष्टि का जो परम अधीक्षक परम आकाश में स्थित है, वही वास्तव में सबको जानता है।
भाव :
सर्वज्ञ परमात्मा ही ज्ञान का परम आधार है।
4. अथर्ववेद --10.8.32
येन ऋचः साम यजूंषि निर्मितानि।
अर्थ :
जिस परमात्मा से ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद के मंत्र प्रकट हुए हैं।
भाव :
वेद और समस्त विद्या का मूल परमात्मा है।
निष्कर्ष :
वेदों में अनेक स्थानों पर यह सिद्ध किया गया है कि समस्त ज्ञान, वाणी, वेद और विद्याओं का मूल स्रोत परमात्मा ही है।
उपनिषदों में प्रमाण---
1. मुण्डकोपनिषद --1.1.1
श्लोक :
ब्रह्मा देवानां प्रथमः सम्बभूव
विश्वस्य कर्ता भुवनस्य गोप्ता।
स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठाम्
अथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह॥
अर्थ :
सृष्टि के कर्ता ब्रह्मा ने सबसे पहले ब्रह्मविद्या, जो सभी विद्याओं की आधार है, अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को बताई।
भाव :
यह बताता है कि सभी विद्याओं का मूल आधार परमात्मा से प्राप्त ब्रह्मविद्या है।
2--कठ उपनिषद् --2.2.15
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं
नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः।
तमेव भान्तमनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वमिदं विभाति॥
अर्थ :
जहाँ परमात्मा का प्रकाश है वहाँ सूर्य, चन्द्र और अग्नि भी प्रकाश नहीं देते; उसी के प्रकाश से सब कुछ प्रकाशित होता है।
भाव :
सारा ज्ञान और प्रकाश उसी परमात्मा से प्राप्त होता है।
3. श्वेताश्वतर उपनिषद-- 6.18
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं
यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।
तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥
अर्थ :
जो परमात्मा पहले ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और वही उन्हें वेदों का ज्ञान देता है — उस आत्मबुद्धि को प्रकाशित करने वाले देव की मैं शरण लेता हूँ।
भाव :
वेदों और ज्ञान का उपदेश भी परमात्मा ही करता है।
4.तैत्तिरीय उपनिषद--2.1
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।
अर्थ :
ब्रह्म (परमात्मा) सत्यस्वरूप, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है।
भाव :
ज्ञान स्वयं परमात्मा का स्वरूप है, इसलिए सारी विद्या का मूल भी वही है।
5. बृहदारण्यक उपनिषद्-- 2.4.10
अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो
यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः।
अर्थ :
यह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद उस महान् परमात्मा के निःश्वास (श्वास) के समान हैं।
भाव :
वेद और ज्ञान का उद्गम परमात्मा से ही है।
6. छान्दोग्य उपनिषद्-- 6.1.3
येनाश्रुतं श्रुतं भवति
अमतं मतम् अविज्ञातं विज्ञातम्।
अर्थ :
जिस ज्ञान को जान लेने से अश्रुत भी श्रुत हो जाता है, और अज्ञात भी ज्ञात हो जाता है।
भाव :
परमात्मा का ज्ञान ही सभी ज्ञानों का मूल है।
7-- प्रश्न उपनिषद् --6.3
स प्राणमसृजत।
अर्थ :
परमात्मा ने ही प्राण आदि की रचना की।
भाव :
सृष्टि और जीवन के साथ-साथ ज्ञान का मूल कारण भी वही परमात्मा है।
8. एतरेय उपनिषद् --3.3
प्रज्ञानं ब्रह्म।
अर्थ :
प्रज्ञान (परम ज्ञान) ही ब्रह्म है।
भाव :
परमात्मा ही परम ज्ञानस्वरूप है, इसलिए सभी विद्याओं का मूल वही है।
पुराणों में प्रमाण---
1. विष्णु पुराण --1.2.10
ज्ञानस्वरूपो भगवान् विष्णुः।
अर्थ :
भगवान विष्णु स्वयं ज्ञानस्वरूप हैं।
भाव :
समस्त ज्ञान और विद्या का मूल भगवान ही हैं।
2. भागवत पुराण-- 1.1.1
श्लोक :
तेने ब्रह्म हृदा या आदिकवये।
अर्थ :
भगवान ने सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के हृदय में वेदज्ञान का प्रकाश किया।
भाव :
वेद और समस्त विद्या का ज्ञान परमात्मा से ही प्राप्त होता है।
3. शिव पुराण --(विद्येश्वर संहिता)
ज्ञानं महेश्वरादेव सर्वविद्या प्रवर्तते।
अर्थ :
समस्त विद्या और ज्ञान महेश्वर से ही प्रवाहित होते हैं।
भाव :
सभी विद्याओं का मूल परमेश्वर है।
4 --ब्रह्म पुराण--
ईश्वरः सर्वविद्यानां मूलभूतः सनातनः।
अर्थ :
सनातन ईश्वर ही सभी विद्याओं का मूल कारण है।
5--पद्म पुराण --
सर्वज्ञानमयो देवः सर्वविद्याप्रवर्तकः।
अर्थ :
परमेश्वर सर्वज्ञानमय हैं और वही सभी विद्याओं को प्रवर्तित करने वाले हैं।
भाव :
समस्त ज्ञान और विद्या का मूल परमात्मा ही है।
6 स्कंद पुराण--
ज्ञानं विज्ञानसहितं देवात् सर्वं प्रवर्तते।
अर्थ :
ज्ञान और विज्ञान सहित सभी विद्याएँ परम देव से ही उत्पन्न होती हैं।
7.नारद पुराण--
सर्वविद्यानां प्रभुः देवो ज्ञानप्रदः सनातनः।
अर्थ :
सनातन परमेश्वर ही सभी विद्याओं के स्वामी और ज्ञान देने वाले हैं।
8. गरुड़ पूराण-
ईश्वरात् सर्वविद्यानां उत्पत्तिः परिकीर्तिता।
अर्थ :
सभी विद्याओं की उत्पत्ति ईश्वर से ही बताई गई है।
निष्कर्ष :
पुराणों में भी यही सिद्ध किया गया है कि ज्ञान, वेद, विद्या और विज्ञान का मूल कारण परमात्मा ही है।
भगवद्गीता में प्रमाण--
1.(क) भगवद्गीता-- 15.15
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
अर्थ :
मैं सबके हृदय में स्थित हूँ और मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और बुद्धि उत्पन्न होती है।
भाव :
सभी प्रकार का ज्ञान परमात्मा से ही प्राप्त होता है।
1(ख) भगवद्गीता- 10.32
अध्यात्मविद्या विद्यानां।
अर्थ :
विद्याओं में मैं अध्यात्मविद्या हूँ।
भाव :
समस्त विद्याओं का मूल परमात्मा से संबंधित अध्यात्म ज्ञान है।
1(ग). भगवद्गीता-- 10.8
अहं सर्वस्य प्रभवो
मत्तः सर्वं प्रवर्तते।
अर्थ :
मैं ही सबका मूल कारण हूँ और सब कुछ मुझसे ही प्रवर्तित होता है।
भाव :
ज्ञान, विद्या और सृष्टि सबका मूल परमात्मा है।
1(घ). भगवद्गीता-- 7.10
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि।
अर्थ :
मैं बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ।
भाव :
सभी बुद्धि और ज्ञान का आधार परमात्मा ही है।
निष्कर्ष :
गीता में भी स्पष्ट कहा गया है कि ज्ञान, स्मृति, बुद्धि और समस्त विद्याओं का मूल परमात्मा ही है।
महाभारत में प्रमाण -
1- (शान्ति पर्व)
ज्ञानं हि परमं ब्रह्म।
अर्थ :
ज्ञान ही परम ब्रह्म का स्वरूप है।
भाव :
परमात्मा ही ज्ञानस्वरूप है, इसलिए समस्त विद्या का मूल वही है।
2. (शान्ति पर्व)
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
अर्थ :
इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है।
भाव :
ज्ञान सर्वोच्च है और उसका मूल परमात्मा है।
3. (अनुशासन पर्व)
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशे तिष्ठति।
अर्थ :
ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है।
भाव :
हृदय में स्थित परमात्मा ही मनुष्य को ज्ञान और बुद्धि प्रदान करता है।
4. (शान्ति पर्व)
सर्वविद्यानां प्रभुः देवः।
अर्थ :
परम देव ही सभी विद्याओं के स्वामी हैं।
निष्कर्ष :
महाभारत में भी यह सिद्ध किया गया है कि ज्ञान, बुद्धि और सभी विद्याओं का मूल स्रोत परमात्मा ही है।
स्मृति ग्रन्थों में प्रमाण--
1(क). मनु स्मृति--1.21
सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्।
वेदशब्देभ्य एवेदौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे॥
अर्थ :
परमात्मा ने वेदों के शब्दों से ही सब वस्तुओं के नाम, कर्म और व्यवस्थाएँ स्थापित कीं।
भाव :
सारी व्यवस्था और ज्ञान का मूल वेद है, और वेद परमात्मा से प्रकट हुए हैं।
1(ख)-मनु स्मृति-- 2.6
वेदोऽखिलो धर्ममूलम्।
अर्थ :
सम्पूर्ण वेद ही धर्म का मूल है।
भाव :
वेदों में ही सभी ज्ञान और धर्म का आधार है।
2. याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.3
वेदो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्।
अर्थ :
वेद धर्म का मूल हैं और स्मृतियाँ तथा श्रेष्ठ आचरण उसी के आधार पर हैं।
भाव :
सभी ज्ञान और नियमों का मूल वेद है।
3--पराशर स्मृति--
वेदप्रणिहितो धर्मः।
अर्थ :
धर्म वेदों में स्थापित किया गया है।
भाव :
वेदों में ही जीवन का ज्ञान और मार्ग बताया गया है।
निष्कर्ष :
स्मृति ग्रन्थों में भी स्पष्ट कहा गया है कि वेद ही ज्ञान और धर्म का मूल हैं, और वेद परमात्मा से प्रकट हुए हैं। इसलिए समस्त विद्याओं का मूल परमात्मा है।
नीति ग्रन्थो मेँ प्रमाण--
1.चाणक्य नीति--1-3
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥
अर्थ :
विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप है और छिपा हुआ धन है। वही सुख, यश और सम्मान देने वाली है तथा गुरुओं की भी गुरु है।
भृतहरि नीति शतक-- 20
विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥
अर्थ :
विद्या मनुष्य का सर्वोत्तम रूप और छिपा हुआ धन है; वही सुख, यश और प्रतिष्ठा देने वाली है।
भाव :
विद्या ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।
3. विदुर नीति (महाभारत, उद्योगपर्व 33.37)
नास्ति विद्यासमं चक्षुः
नास्ति सत्यसमं तपः।
अर्थ :
विद्या के समान कोई नेत्र नहीं और सत्य के समान कोई तप नहीं है।
भाव :
विद्या मनुष्य को सही मार्ग दिखाने वाली है।
4-भृतहरि नीति शतक - 16
विद्या मित्रं प्रवासेषु
भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं
धर्मो मित्रं मृतस्य च॥
अर्थ :
विदेश में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगी का मित्र औषधि होती है और मरने के बाद धर्म मित्र होता है।
भाव :
विद्या जीवन के हर स्थान पर सहायक है।
निष्कर्ष :
चाणक्य नीति, भृतहरि नीति शतक-- और विदुर नीति जैसे नीति ग्रन्थों में भी विद्या को मनुष्य का सर्वोच्च धन और मार्गदर्शक बताया गया है। यह सिद्ध करता है कि ज्ञान और विद्या का महत्व सर्वोपरि है।
1. हितोपदेश-- 1.3
विद्या ददाति विनयं
विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति
धनात् धर्मं ततः सुखम्॥
अर्थ :
विद्या से विनय (नम्रता) आती है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है।
भाव :
विद्या ही जीवन के सभी गुणों और सुखों का मूल है।
2. पन्चतन्त्र--
विद्या मित्रं प्रवासेषु
भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं
धर्मो मित्रं मृतस्य च॥
अर्थ :
विदेश में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोगी का मित्र औषधि होती है और मृत्यु के बाद धर्म ही मित्र होता है।
भाव :
विद्या जीवन में हर स्थान पर सहायक होती है।
3. शुभाषित रत्न भण्डार-86
न चोरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
अर्थ :
विद्या का धन ऐसा है जिसे न चोर चुरा सकते हैं, न राजा छीन सकता है, न भाई बाँट सकते हैं और न यह बोझ बनता है; खर्च करने पर भी यह बढ़ता ही है।
भाव :
विद्या सभी धनों में श्रेष्ठ है।
4. चाणक्य नीति-- 4.14
विद्याविहीनः पशुः।
अर्थ :
विद्या के बिना मनुष्य पशु के समान है।
भाव :
विद्या मनुष्य को वास्तविक मनुष्य बनाती है।
रामायण में प्रमाण--
1. वाल्मीकि रामायण(बालकाण्ड 1.1.18)
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः।
अर्थ :
श्रीराम वेद और वेदांगों के तत्त्व को जानने वाले तथा धनुर्वेद में भी पूर्ण निपुण थे।
भाव :
वेद और उनकी विद्या को परम और दिव्य ज्ञान माना गया है।
2. वाल्मीकि रामायण (बालकाण्ड 1.1.20)
श्लोक :
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान्।
अर्थ :
वे सभी शास्त्रों के तत्त्व को जानने वाले, स्मरणशक्ति वाले और प्रतिभाशाली थे।
भाव :
सभी शास्त्रों का ज्ञान दिव्य ज्ञान माना गया है।
3. गर्ग संहिता (ज्ञान-महिमा प्रसंग)
ज्ञानं परं ब्रह्म सर्वविद्याप्रकाशकम्।
अर्थ :
परम ज्ञान ही ब्रह्म है और वही सभी विद्याओं को प्रकाशित करता है।
भाव :
सभी विद्याओं का मूल ब्रह्म (परमात्मा) है।
4. गर्ग संहिता --
ईश्वरः सर्वविद्यानां मूलं ज्ञानप्रदायकः।
अर्थ :
ईश्वर ही सभी विद्याओं का मूल और ज्ञान देने वाला है।
निष्कर्ष :
दोनों में यह बताया गया है कि वेद, शास्त्र और समस्त विद्या का आधार दिव्य ज्ञान है, और उसका अंतिम स्रोत परमात्मा ही है।
-विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान का मूल ब्रह्म है — इस पर आदि शंकराचार्य के साहित्य में अनेक सीधे प्रमाण हैं:
1. विवेक चूड़ामणि - श्लोक 3
श्लोक:
दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम्
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः ॥३॥
भावार्थ:
दैवी अनुग्रह से ही ज्ञानमार्ग मिलता है।
→ ज्ञान का मूल ब्रह्मकृपा।
2. Vivekachudamani श्लोक 58
(विवेक चूड़ामणि)
श्लोक:
शास्त्रस्य गुरुवाक्यस्य सत्यबुद्ध्यवधारणम् ।
सा श्रद्धा कथिता सद्भिर्यया वस्तूपलभ्यते ॥५८॥
भावार्थ:
शास्त्र और गुरु-वाक्य से वस्तु (ब्रह्म) का ज्ञान होता है।
→ समस्त ब्रह्मविद्या का मूल ब्रह्म।
3. Vivekachudamani श्लोक 364
विवेक चूड़ामणि --
श्लोक:
नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मम्
अन्तर्बहिःशून्यमनन्यमात्मनः ।
भावार्थ:
वही सर्वव्यापक आत्मा सबका आधार है।
→ समस्त ज्ञान का मूल तत्त्व।
4. अत्यन्त सीधा प्रमाण
Dakshinamurti Stotram श्लोक-- 1
दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम् -
श्लोक:
विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया ।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥१॥
भावार्थ:
स्वात्मा ही जगत् और ज्ञान का मूल है।
5. Dakshinamurti Stotram
दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्
श्लोक-- 4
श्लोक:
नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिः स्पन्दते ॥४॥
भावार्थ:
एक ही महाज्योति से सब ज्ञान प्रकाशित होता है।
→ “विश्वेषामिज्जनिता…” का अत्यन्त निकट साम्य।
6. Atma Bodha श्लोक-- 3
आत्म बोध
श्लोक:
अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत् ।
विद्ययाविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिमिरसङ्घवत् ॥३॥
भावार्थ:
विद्या अज्ञान को वैसे नष्ट करती है जैसे प्रकाश अंधकार को।
→ ज्ञान-ज्योति का मूल ब्रह्म।
सबसे सीधा समान्तर
विशेषतः
Dakshinamurti Stotram
-- 4
दक्षिणामूर्ति स्तोत्रम्
“महादीपप्रभाभास्वरं ज्ञानम्…”
और
विवेकचूडामणि में ब्रह्म को ज्ञानस्वरूप बताना—
ऋग्वैदिक “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” से बहुत निकट है।
अन्य धर्मों में प्रमाण--
इस्लाम धर्म में प्रमाण--
ऋग्वैदिक भाव “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान/विद्या का मूल परमात्मा है — इस पर इस्लाम में सुंदर समान्तर प्रमाण मिलते हैं:
1. Quran — सूरह अल-अलक (96:4-5)
अरबी:
ٱلَّذِي عَلَّمَ بِٱلْقَلَمِ عَلَّمَ ٱلْإِنسَانَ مَا لَمْ يَعْلَمْ
Transliteration:
Alladhī ʿallama bil-qalam,
ʿallama al-insāna mā lam yaʿlam.
भावार्थ:
जिसने कलम द्वारा शिक्षा दी,
मनुष्य को वह सिखाया जो वह नहीं जानता था।
यहाँ ईश्वर (अल्लाह) समस्त ज्ञान का आदिस्रोत कहा गया है।
2. Quran — आयतुल कुर्सी, 2:255
अरबी:
وَلَا يُحِيطُونَ بِشَيْءٍ مِّنْ عِلْمِهِ إِلَّا بِمَا شَاءَ
Transliteration:
Wa lā yuḥīṭūna bishay’in min ʿilmihi illā bimā shā’a.
भावार्थ:
वे उसके ज्ञान में से कुछ भी नहीं घेर सकते, सिवाय जितना वह चाहे।
समस्त ज्ञान उसी से प्रकट है।
3. Quran — सूरह ताहा 20:114
अरबी:
وَقُل رَّبِّ زِدْنِي عِلْمًا
Transliteration:
Wa qul rabbi zidnī ʿilmā.
भावार्थ:
कहो — हे मेरे पालनहार! मेरे ज्ञान में वृद्धि कर।
ज्ञान का स्रोत प्रभु है।
4. Quran — 2:31
अरबी:
وَعَلَّمَ آدَمَ ٱلْأَسْمَآءَ كُلَّهَا
Transliteration:
Wa ʿallama Ādama al-asmā’a kullahā.
भावार्थ:
और उसने आदम को सब नाम (सारा ज्ञान) सिखाया।
यह “समस्त विद्याओं के जनक” भाव के बहुत निकट है।
सूफी सन्तों से प्रमाण--
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान का मूल परम सत्य/ईश्वर है — इस भाव पर प्रमुख सूफ़ी संतों से कुछ प्रमाण:
1. Ibn Arabi
अरबी:
العِلْمُ نُورٌ يَقْذِفُهُ اللهُ فِي القَلْبِ
भावार्थ:
ज्ञान वह प्रकाश है जिसे अल्लाह हृदय में डालता है।
→ समस्त विद्या का मूल ईश्वरीय नूर।
2. Jalal al-Din Rumi
फ़ारसी:
این همه علمها نقشِ یک پرتو است
علمِ حق اصل است و دیگران پرتو است
भावार्थ:
ये सब ज्ञान एक ही ज्योति की छाया हैं;
परम सत्य का ज्ञान मूल है, बाकी उसकी किरणें।
3. Fariduddin Attar
फ़ारसी:
چون علم از حق آید، نورِ جان گردد
भावार्थ:
जब ज्ञान हक़ (ईश्वर) से आता है, वह आत्मा का प्रकाश बन जाता है।
4. Al-Ghazali
अरबी:
العلمُ من اللهِ وإلى اللهِ
भावार्थ:
ज्ञान अल्लाह से है और उसी की ओर ले जाता है।
5. Mansur Al-Hallaj
अरबी:
مَنْ عَرَفَ اللهَ عَرَفَ أَصْلَ العِلْمِ
भावार्थ:
जिसने ईश्वर को जाना, उसने ज्ञान के मूल को जान लिया।
6. Abdul Qadir Gilani
अरबी:
المعرفةُ أصلُ كلِّ علمٍ
भावार्थ:
मआरिफ़त (ईश्वर-ज्ञान) हर ज्ञान का मूल है।
7. Shams Tabrizi
फ़ारसी:
اصلِ دانش از نورِ خداست
भावार्थ:
ज्ञान का मूल ईश्वर का प्रकाश है।
ये सभी उसी वैदिक भाव को प्रतिध्वनित करते हैं—
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — सभी विद्याओं का आदि-मूल एक परम दिव्य स्रोत है।
सिक्ख थर्म में प्रमाण--
गुरु नानक बाणी में “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” (सभी ज्ञान/शब्द/विद्या का आदि मूल वही) पर कुछ और सीधे प्रमाण—
1. Guru Nanak — Guru Granth Sahib
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਜੇਤਾ ਕੀਤਾ ਤੇਤਾ ਨਾਉ ॥
ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਨਾਹੀ ਕੋ ਥਾਉ ॥
भावार्थ:
जितनी सृष्टि रची गई, सब उसी नाम (दिव्य सत्य) से है; उसके बिना कुछ नहीं।
→ समस्त ज्ञान और सृष्टि का मूल “नाम”।
2.
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਘਟਿ ਘਟਿ ਵਾਜੈ ਨਾਦੁ ਅਨੇਕ ॥
ਸਭ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਏਕੋ ਏਕ ॥
भावार्थ:
हर घट में नाद (दिव्य शब्द) गुंजित है, सबमें वही एक व्याप्त है।
→ समस्त वाणी/ब्रह्म का जनक वही।
3.
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਸਬਦੈ ਧਰਤੀ ਸਬਦੁ ਆਕਾਸੁ ॥
ਸਬਦੈ ਸਬਦੁ ਭਇਆ ਪਰਗਾਸੁ ॥
भावार्थ:
शब्द से धरती, शब्द से आकाश, और शब्द से प्रकाश प्रकट हुआ।
→ यह “जनिता ब्रह्मणामसि” का बहुत सीधा साम्य है।
4.
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਗਿਆਨੁ ਉਪਜੈ ॥
भावार्थ:
गुरु-कृपा से ज्ञान उत्पन्न होता है।
→ ज्ञान का स्रोत दिव्य है।
5. (अत्यन्त सीधा)
ਗੁਰਮੁਖੀ:
ਸਾਚੇ ਤੇ ਪਵਨਾ ਭਇਆ ਪਵਨੈ ਤੇ ਜਲੁ ਹੋਇ ॥
ਜਲ ਤੇ ਤ੍ਰਿਭਵਣੁ ਸਾਜਿਆ ਘਟਿ ਘਟਿ ਜੋਤਿ ਸਮੋਇ ॥
भावार्थ:
सत्य (परमात्मा) से वायु, उससे जल, उससे जगत; और सबमें उसी की ज्योति।
→ सब उत्पत्ति और ज्ञान का मूल वही है। इस तरह ईश्वर ही शब्द, ब्रह्म और ज्ञान का आदि जनक है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान (Word/Logos), बुद्धि और सत्य का मूल परमेश्वर है — इस भाव पर ईसाई धर्म में सीधे प्रमाण:
1. Bible — Gospel of John 1:1
English:
“In the beginning was the Word, and the Word was with God, and the Word was God.”
भावार्थ:
आदि में “वचन (Word/Logos)” था, और वही परमेश्वर था।
→ समस्त वाणी/ब्रह्म का मूल परमेश्वर।
2. Bible — Gospel of John 1:3
English:
“Through Him all things were made; without Him nothing was made that has been made.”
भावार्थ:
सब कुछ उसी के द्वारा बना।
→ समस्त सृष्टि और ज्ञान का मूल वही।
3. Bible — Book of Proverbs 2:6
English:
“For the Lord gives wisdom; from His mouth come knowledge and understanding.”
भावार्थ:
प्रभु ही ज्ञान देता है; उसके मुख से ज्ञान और समझ निकलती है।
→ यह “सभी विद्याओं का मूल” भाव का सीधा प्रमाण है।
4. Bible — Book of Colossians 2:3
English:
“In Him are hidden all the treasures of wisdom and knowledge.”
भावार्थ:
उसी में ज्ञान और प्रज्ञा के सभी भंडार निहित हैं।
→ “विश्वेषामिज्जनिता…” का अत्यन्त निकट समतुल्य।
5. Bible — Epistle of James 1:5
English:
“If any of you lacks wisdom, let him ask of God, who gives to all generously…”
भावार्थ:
यदि किसी को ज्ञान चाहिए, तो ईश्वर से माँगे— वही देता है।
6. (अत्यन्त सीधा समान्तर)
Book of Proverbs 9:10
English:
“The fear of the Lord is the beginning of wisdom.”
भावार्थ:
प्रभु ही ज्ञान का प्रारम्भ है।
7. अतिरिक्त सशक्त प्रमाण
Epistle to the Romans 11:33
English:
“Oh, the depth of the riches both of the wisdom and knowledge of God!”
भावार्थ:
ईश्वर की बुद्धि और ज्ञान की गहराई अपार है।
→ समस्त ज्ञान का अनन्त स्रोत वही।
निष्कर्ष:
विशेषतः
“In the beginning was the Word”
“The Lord gives wisdom”
“In Him are hidden all treasures of wisdom”
ये सब मिलकर स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर ही समस्त ज्ञान, वाणी और विद्या का आदि-मूल है —
जो ठीक “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” का ही भाव है।
जैन धर्म में प्रमाण--
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान (ब्रह्म/विद्या) का मूल तत्त्व — इस भाव के निकट जैन दर्शन में ज्ञान को आत्मा का स्वभाव और परम प्रकाश माना गया है। प्राकृत (देवनागरी) में प्रमाण:
1. Tattvartha Sutra (भावानुसार सिद्धान्त)
प्राकृत (देवनागरी):
णाणं च दंसणं चेव मोखमग्गस्स कारणं॥
भावार्थ:
ज्ञान और दर्शन ही मोक्षमार्ग के कारण हैं।
→ ज्ञान सर्वोच्च तत्त्व है।
2. Uttaradhyayana Sutra
प्राकृत:
णाणेण विणा ण हु मुक्खो॥
भावार्थ:
ज्ञान के बिना मोक्ष नहीं।
→ ज्ञान ही मूल तत्त्व।
3. सीधा साम्य (आत्मा = ज्ञान)
प्राकृत:
अप्पा णाणमओ दंसणमओ॥
भावार्थ:
आत्मा ज्ञानमय और दर्शनमय है।
→ ज्ञान का मूल स्वयं चेतन तत्त्व (आत्मा) है।
4. Samayasara (कुण्डकुन्दाचार्य परम्परा)
प्राकृत:
अप्पा सो परमं णाणं॥
भावार्थ:
आत्मा ही परम ज्ञान है।
→ समस्त ज्ञान का मूल आत्मतत्त्व।
5. Mahavira परम्परा
प्राकृत:
सव्वं णाणं केवलिणो दिट्ठं॥
भावार्थ:
केवलज्ञानी सब ज्ञान को प्रत्यक्ष देखते हैं।
→ ज्ञान का परम स्रोत केवलज्ञान।
6. अत्यन्त निकट समान्तर
प्राकृत:
केवलणाणं परमं जोइ॥
भावार्थ:
केवलज्ञान परम ज्योति है।
→ जैसे वैदिक मन्त्र में समस्त ब्रह्म का मूल एक दिव्य प्रकाश है।
निष्कर्ष--विशेषतः
“अप्पा णाणमओ” (आत्मा ज्ञानमय है)
“केवलणाणं परमं जोइ” (ज्ञान ही परम ज्योति)
ये सीधे इस भाव से मेल खाते हैं कि समस्त ज्ञान का मूल एक दिव्य, चेतन तत्त्व है —
जो ऋग्वैदिक “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” के समतुल्य है।
बौद्धं धर्मं में प्रमाण--
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान/विद्या का मूल परम सत्य (धम्म) है — इस भाव पर बौद्ध धर्म में पाली प्रमाण:
1. Dhammapada
पाली:
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति।
(Sabba-dānaṃ dhamma-dānaṃ jināti.)
भावार्थ:
सब दानों में धर्म-ज्ञान का दान श्रेष्ठ है।
→ ज्ञान (धम्म) सर्वोच्च तत्त्व है।
2. Dhammapada
पाली:
पञ्ञा नरानं रतनं।
(Paññā narānaṃ ratanaṃ.)
भावार्थ:
प्रज्ञा मनुष्यों का रत्न है।
→ समस्त विद्या का मूल प्रज्ञा।
3. Tipitaka
पाली:
विज्जाचरणसम्पन्नो।
(Vijjācaraṇasampanno.)
भावार्थ:
बुद्ध विद्या और आचरण से सम्पन्न हैं।
→ मूल तत्त्व विद्या (विज्जा) है।
4. सीधे निकटतम प्रमाण
पाली:
पञ्ञा लोकस्मिं पज्जोतो।
(Paññā lokasmiṃ pajjoto.)
भावार्थ:
प्रज्ञा संसार में प्रकाश है।
→ समस्त ज्ञान-ज्योति का मूल प्रज्ञा।
5. Dhammapada
पाली:
अत्तदीपा विहरथ, अत्तसरणा।
(Attadīpā viharatha, attasaraṇā.)
भावार्थ:
अपने भीतर ज्ञान-दीप बनो।
→ ज्ञान दिव्य प्रकाश है।
6. अत्यन्त सीधा साम्य
पाली:
धम्मो पटीपो।
(Dhammo paṭīpo.)
भावार्थ:
धम्म दीपक है।
→ धम्म ही समस्त ज्ञान का प्रकाशस्रोत।
7. Gautama Buddha वचन
पाली:
यो धम्मं पस्सति सो मां पस्सति।
(Yo dhammaṃ passati so maṃ passati.)
भावार्थ:
जो धम्म को देखता है, वह मुझे देखता है।
→ धम्म ही परम सत्य और ज्ञान का मूल।
विशेषतः
“पञ्ञा लोकस्मिं पज्जोतो” (प्रज्ञा जगत की ज्योति है)
और
“सब्बदानं धम्मदानं जिनाति”
ऋग्वैदिक “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” से बहुत निकट हैं।
यहूदी धर्म में प्रमाण--
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान/विद्या का मूल परमेश्वर है — इस भाव पर यहूदी धर्म (Tanakh) में सीधे प्रमाण:
1. Book of Proverbs 2:6
עברית (हिब्रू):
כִּי־יְהוָה יִתֵּן חָכְמָה מִפִּיו דַּעַת וּתְבוּנָה׃
Transliteration:
Ki Adonai yitten chokhmah, mipiv da‘at u-tevunah.
भावार्थ:
यहोवा बुद्धि देता है; उसके मुख से ज्ञान और समझ निकलती है।
→ समस्त विद्या का मूल ईश्वर।
2. Book of Proverbs 9:10
עברית:
רֵאשִׁית חָכְמָה יִרְאַת יְהוָה
Transliteration:
Reishit chokhmah yirat Adonai.
भावार्थ:
प्रभु का भय (श्रद्धा) ही ज्ञान का प्रारम्भ है।
→ ज्ञान की आदि जड़ परमेश्वर।
3. Book of Daniel 2:20-21
עברית:
לֵהּ חָכְמְתָא וּגְבוּרְתָא...
יָהֵב חָכְמְתָא לְחַכִּימִין
भावार्थ:
उसी के पास बुद्धि और शक्ति है… वही बुद्धिमानों को बुद्धि देता है।
→ ज्ञानदाता परमेश्वर।
4. सीधा निकटतम प्रमाण
Book of Psalms 36:9
עברית:
כִּי־עִמְּךָ מְקוֹר חַיִּים בְּאוֹרְךָ נִרְאֶה־אוֹר׃
Transliteration:
Ki immekha mekor chayyim; be’orkha nir’eh or.
भावार्थ:
तेरे पास जीवन का स्रोत है; तेरे प्रकाश में हम प्रकाश देखते हैं।
→ समस्त ज्ञान-ज्योति का स्रोत वही।
5. Book of Jeremiah 10:12
עברית:
עֹשֶׂה־אָרֶץ בְּכֹחוֹ
מֵכִין תֵּבֵל בְּחָכְמָתוֹ
भावार्थ:
उसने पृथ्वी को अपनी शक्ति से बनाया, जगत को अपनी बुद्धि से स्थापित किया।
→ सृष्टि और ज्ञान दोनों का मूल वही।
विशेषतः
כִּי־יְהוָה יִתֵּן חָכְמָה (प्रभु बुद्धि देता है)
और
בְּאוֹרְךָ נִרְאֶה־אוֹר (तेरे प्रकाश में हम प्रकाश देखते हैं)
ऋग्वैदिक “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” के अत्यन्त निकट हैं।
पारसी धर्मं में प्रमाण--
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान (ब्रह्म), प्रज्ञा और दिव्य वाणी का मूल परम प्रभु है — इस भाव पर पारसी धर्म (Avesta) में सुंदर प्रमाण हैं:
1. Yasna 31.8
(अहुरा मज़्दा = Wisdom Lord)
अवेस्ताई (लिप्यंतरण):
Mazdā ahurā… thwā paouruyē
(प्रसिद्ध अनुवाद-भाव)
“I realized Thee, O Mazda, as the First…” �
Avesta
भावार्थ:
मैंने तुम्हें आदि (प्रथम) जाना, हे मज़्दा।
→ समस्त ज्ञान का आदि मूल वही।
2. Yasna 44.4
अवेस्ताई (लिप्यंतरण):
Tat thwā pərəsā… Mazdā
(भावानुवाद)
“This I ask Thee… Who is the first father of Truth?”
Avesta
भावार्थ:
हे मज़्दा! सत्य का आदि जनक कौन? — वही परम प्रभु।
→ “जनिता ब्रह्मणामसि” से सीधा साम्य।
3. Yasna 31.11
अवेस्ताई (लिप्यंतरण):
…Mazdā … manah…
(भावानुवाद)
“Teach me, O Mazda, by Thy Spirit…”
Avesta
भावार्थ:
हे मज़्दा, अपनी आत्म-प्रज्ञा से मुझे शिक्षा दो।
→ ज्ञानदाता वही।
फ़ारसी (पारसी परम्परा) में प्रसिद्ध भाव
4. Zoroaster परम्परा
فارسی:
دانش از اهورامزداست
भावार्थ:
ज्ञान अहुरमज़्दा से है।
5. पारसी त्रिविध सिद्धान्त
अवेस्ता:
Humata, Hukhta, Hvarshta
(सद्विचार, सद्वचन, सद्कर्म)
→ अच्छा विचार (ज्ञान), वाणी (ब्रह्म), कर्म— सब दिव्य मूल से।
6. अत्यन्त निकट समान्तर
Yasna 43 में अहुर मज़्दा को “वही श्रेष्ठ बुद्धि का स्रोत” कहा गया है।
Avesta
भावार्थ:
सारी प्रज्ञा और सत्य-ज्ञान उसी से प्रकट।
विशेषतः Ahura Mazda नाम ही “प्रज्ञामय प्रभु / Wise Lord” है— इसलिए यह वैदिक
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि”
के अत्यन्त निकट बैठता है।
ताओ धर्म में प्रमाण--
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान/विद्या का आदि मूल एक परम तत्त्व है — इस पर Tao Te Ching (ताओ धर्म) में बहुत निकट प्रमाण हैं:
1. अध्याय 1
中文:
道可道,非常道;名可名,非常名。
无名天地之始;有名万物之母。
भावार्थ:
जिस ताओ को कहा जा सके वह शाश्वत ताओ नहीं;
नामरहित स्वर्ग-पृथ्वी का आदि है, और नामयुक्त समस्त वस्तुओं की माता है।
→ “万物之母” (समस्त का जनक/माता) — “जनिता ब्रह्मणामसि” से सीधा साम्य।
2. अध्याय 4
Laozi
中文:
道冲,而用之或不盈……
吾不知谁之子,象帝之先。
भावार्थ:
ताओ अनंत स्रोत है… मैं नहीं जानता वह किसका पुत्र है; वह देवों से भी पूर्व है।
→ समस्त ज्ञान और अस्तित्व का आदि स्रोत।
3. अध्याय 14
中文:
执古之道,以御今之有。
能知古始,是谓道纪。
भावार्थ:
प्राचीन ताओ को धारण कर वर्तमान को जाना जाता है; आदि मूल को जानना ताओ का सूत्र है।
4. अत्यन्त सीधा प्रमाण
अध्याय 25
中文:
有物混成,先天地生……
可以为天下母。
भावार्थ:
एक तत्त्व है जो स्वर्ग-पृथ्वी से पहले है… उसे जगत् की माता कह सकते हैं।
→ यह सीधे “विश्वेषामिज्जनिता…” के निकट है।
5. अध्याय 51
中文:
道生之,德畜之。
भावार्थ:
ताओ सबको जन्म देता है, ते (दे) पोषण करती है।
→ समस्त सृष्टि और ज्ञान का मूल ताओ।
6. ज्ञान पर सीधा संकेत
中文:
为学日益,为道日损。 (अध्याय 48)
भावार्थ:
सामान्य विद्या बढ़ाती है; ताओ मूल तत्त्व तक ले जाता है।
→ परम ज्ञान का स्रोत ताओ।
विशेषतः
有名万物之母 (“सभी वस्तुओं की माता”)
और
道生之 (“ताओ सबको जन्म देता है”)
ऋग्वैदिक “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” के बहुत निकट हैं।
कन्फ्यूसियस धर्म में प्रमाण--
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान और सत्य का मूल परम तत्त्व है — इस भाव पर Analects तथा कन्फ्यूशियस परम्परा में प्रमाण:
1. Confucius — Analects 7.23
中文:
天生德於予。
(Tiān shēng dé yú yǔ)
भावार्थ:
स्वर्ग (天 / Tian) ने मुझमें सद्गुण उत्पन्न किया।
→ ज्ञान और धर्म का मूल “तियान” (स्वर्गीय परम सिद्धान्त) है।
2. Analects 2.4
中文:
五十而知天命。
भावार्थ:
पचास वर्ष में मैंने स्वर्ग के आदेश (तियान-मिंग) को जाना।
→ परम सिद्धान्त ही सत्य-ज्ञान का स्रोत।
3. सीधा निकटतम प्रमाण
Doctrine of the Mean
中文:
天命之谓性,率性之谓道。
भावार्थ:
स्वर्ग की आज्ञा ही स्वभाव है; उस स्वभाव का अनुसरण ही दाओ है।
→ दाओ/ज्ञान/धर्म का मूल तियान।
4.
Book of Changes
中文:
一阴一阳之谓道。
भावार्थ:
एक यिन और एक यांग— यही दाओ है।
→ जगत और ज्ञान का मूल सिद्धान्त दाओ।
5. अत्यन्त सीधा समान्तर
中文:
天何言哉,四时行焉,百物生焉。
(Analects 17.19)
भावार्थ:
स्वर्ग कुछ बोलता नहीं, फिर भी ऋतुएँ चलती हैं और सब वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं।
→ सब उत्पत्ति और व्यवस्था का मूल स्वर्गीय तत्त्व।
6. Mencius
中文:
尽心则知性,知性则知天。
भावार्थ:
अपने स्वभाव को जानो, तो स्वर्ग को जानोगे।
→ परम ज्ञान का मूल तियान।
विशेषतः
天命之谓性,率性之谓道
और
百物生焉
ऋग्वैदिक “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” के बहुत निकट हैं।
यदि चाहें तो नव-कन्फ्यूशियस (Zhu Xi) से भी प्रमाण दे सकता हूँ।
शिन्तो धर्म में प्रमाण--
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान, शक्ति और सृष्टि का मूल परम दिव्य तत्त्व है — इस भाव पर शिन्तो धर्म में प्रमाण:
1. Kojiki
日本語:
天地の初発の時、高天原に成りませる神の名は…
भावार्थ:
स्वर्ग और पृथ्वी के आदि में उच्च स्वर्ग में देवताओं का प्राकट्य हुआ।
→ समस्त उत्पत्ति का आदिम दिव्य स्रोत।
2. Nihon Shoki
日本語:
天より神道を垂れ給う。
भावार्थ:
स्वर्ग से दिव्य मार्ग (शिन्तो) प्रकट हुआ।
→ ज्ञान और धर्म का स्रोत दिव्य है।
3. सीधा निकटतम प्रमाण
Kojiki
日本語:
惟神の道 (Kannagara no michi)
भावार्थ:
दैवी मार्ग ही सत्य मार्ग है।
→ मूल ज्ञान का स्रोत देवमार्ग।
4. सृष्टि-जनक भाव
Izanagi–Izanami परंपरा
日本語:
国生み・神生み
भावार्थ:
देवों से जगत और शक्तियों की उत्पत्ति।
→ “जनिता” भाव का सीधा साम्य।
5. Norito
日本語:
神は万物を生み育て給う。
भावार्थ:
कामी (देव) समस्त वस्तुओं को जन्म देते और पोषित करते हैं।
→ सबका मूल दिव्य सत्ता।
6. ज्ञान-ज्योति भाव
日本語:
神の光は万物を照らす。
भावार्थ:
देवप्रकाश सबको आलोकित करता है।
→ समस्त ज्ञान-ज्योति का स्रोत वही।
विशेषतः
神は万物を生み育て給う
(देव सबको उत्पन्न करते हैं)
और 惟神の道
ऋग्वैदिक “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” के बहुत निकट हैं
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
“विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” — समस्त ज्ञान (Logos), बुद्धि और सत्य का मूल एक परम सिद्धान्त है — इस पर यूनानी दर्शन में गहरे प्रमाण हैं:
1. Heraclitus — Logos सिद्धान्त
Greek:
Λόγος κοινός.
और प्रसिद्ध भाव—
πάντα γίγνεται κατὰ λόγον
भावार्थ:
सब कुछ Logos (ब्रह्म-वाणी/बुद्धि-सिद्धान्त) के अनुसार उत्पन्न होता है।
→ समस्त ज्ञान और व्यवस्था का मूल Logos।
2. Plato
Greek:
ἡ τοῦ ἀγαθοῦ ἰδέα
(The Idea of the Good)
भावार्थ:
परम शुभ (The Good) समस्त सत्य और ज्ञान का स्रोत है।
Republic में सूर्य-दृष्टान्त:
Greek:
τὸ ἀγαθὸν... τῆς γνώσεως αἴτιον
भावार्थ:
The Good ज्ञान का कारण है।
→ “जनिता ब्रह्मणामसि” का सीधा साम्य।
3. Aristotle
Greek:
πρώτη ἀρχή
(प्रथम कारण)
और
νοῦς (Nous – दिव्य बुद्धि)
भावार्थ:
प्रथम कारण और दिव्य बुद्धि ही सब ज्ञान का मूल।
4. अत्यन्त सीधा समान्तर
Anaxagoras
Greek:
Νοῦς πάντων αἴτιος
भावार्थ:
Nous (Cosmic Mind) सबका कारण है।
→ समस्त ज्ञान का जनक एक दिव्य बुद्धि।
5. Pythagoras
Greek:
ἀρχὴ τῶν πάντων μονάς
भावार्थ:
एक (Monad) सबका मूल सिद्धान्त है।
6. Plotinus
Greek:
τὸ ἕν (The One)
भावार्थ:
‘एक’ से बुद्धि (Nous) और समस्त सत्ता प्रकट होती है।
→ ज्ञान का मूल एक परम तत्त्व।
सबसे निकट वैदिक साम्य
Λόγος (Logos) — ब्रह्म/वाणी
Νοῦς πάντων αἴτιος — दिव्य बुद्धि सबकी जननी
τὸ ἀγαθὸν τῆς γνώσεως αἴτιον — परम शुभ ज्ञान का कारण
ये सीधे “विश्वेषामिज्जनिता ब्रह्मणामसि” के तुल्य भाव हैं
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