ऋगुवेद सूक्ति--(28) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति--(२८) की व्याख्या 
 मन्त्र--
“उत देवा अवहित देवा: उन्नदेवा पुनः:”। --ऋग्वेद १०.१३७.१
भावार्थ --गिरे हुओं को पुनः उठाओं।
यह मन्त्र ऋग्वेद के दशम मण्डल, १३७वें सूक्त का प्रथम मन्त्र है। यह सूक्त औषधि और आरोग्य के सन्दर्भ में माना जाता है।
पदच्छेद--
उत देवा अवहितं  देवा उन्नयत पुनः ।
भावार्थ--
हे देवस्वरूप विद्वानों! जो मनुष्य किसी कारण से गिर गया है (रोग, दुःख, अज्ञान या निराशा में), उसे फिर से उठाइए, उसका उत्थान कीजिए।
यहाँ “देव” शब्द का अर्थ केवल स्वर्गीय देवता न होकर प्रकाश देने वाले, ज्ञानवान, हितकारी पुरुष भी होता है।
“अवहित” = जो नीचे गिरा हुआ, पतित या दुर्बल हो गया हो।
“उन्नयत” = ऊपर उठाना, उन्नति कराना।
गूढ़ अर्थ--
यह मन्त्र केवल शारीरिक उठाने की बात नहीं करता, बल्कि —
मानसिक रूप से गिरे हुए को उत्साह देना। अज्ञान में पड़े को ज्ञान देना। रोगी को आरोग्य की ओर ले जाना।
समाज में पतित को पुनः सम्मान दिलाना।
ऋग्वेद 10.137.1 का पूरा मन्त्र इस प्रकार है—
उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः ।
उतागश्चक्रुषं देवा देवा जीवयथा पुनः ॥
IAST:
uta devā avahitaṃ devā un nayathā punaḥ ।
utāgaś cakruṣaṃ devā devā jīvayathā punaḥ ॥
शब्दार्थ
उत — और, पुनः
देवाः — हे देवो / विद्वानो / दिव्य शक्तियो
अवहितम् — गिरे हुए, नीचे पड़े हुए
उन्नयथ — ऊपर उठाओ
पुनः — फिर से
आगः चक्रुषम् — अपराध करने वाले को, पतित को
जीवयथ — पुनः जीवन दो
भावार्थ
हे देवो! जो गिर गया है उसे फिर उठाओ; और जो अपराध या पतन में पड़ गया है, उसे भी पुनः जीवन और उन्नति प्रदान करो।
यह मन्त्र दया, पुनरुत्थान, क्षमा और सुधार की वैदिक भावना को प्रकट करता है। 
वेदों में प्रमाण---
(१) ऋग्वेद-- १.८९.१
“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।”
भावार्थ :
हमारे पास सब ओर से कल्याणकारी विचार आयें।
 जब शुभ विचार आएँगे, तभी गिरे हुए व्यक्ति का उत्थान सम्भव होगा।
(२) ऋग्वेद-- ५.६०.५
“अज्येष्ठासो अकनिष्ठास एते सं भ्रातरो वावृधुः सौभगाय।”
भावार्थ :
न कोई बड़ा है, न कोई छोटा — सब भाई हैं और सौभाग्य के लिए मिलकर उन्नति करें।
 यह सामाजिक उत्थान और समानता का वैदिक सिद्धान्त है।
३. यजुर्वेद--
(क) यजुर्वेद-- ३६.१८
“मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।”
भावार्थ --
सब प्राणियों को मित्रभाव से देखो।
 मित्रभाव से ही पतित व्यक्ति का पुनरुत्थान संभव है।
(ख) यजुर्वेद ४०.२ (ईशावास्य उपनिषद् मन्त्र)
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।”
भावार्थ :
मनुष्य कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा करे।
 कर्म और पुरुषार्थ से ही गिरा हुआ व्यक्ति उठता है।
३. अथर्ववेद--
अथर्ववेद ६.१२०.३
(औषधि सूक्त)
“भेषजं भेषजिनां भेषजं…”
भावार्थ :
हे औषधियों! रोगी को रोग से उठाओ, उसे पुनः स्वस्थ करो।
 यहाँ स्पष्ट रूप से “गिरे (रोगग्रस्त) को उठाने” का वैदिक संकेत है।
४. सामवेद--
सामवेद में भी ऋग्वैदिक मन्त्रों का गान है, जिनमें कल्याण, उत्थान और मंगल की भावना प्रकट होती है।
उदाहरणार्थ — “स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः…” (स्वस्ति मन्त्र)
भावार्थ : हमारा कल्याण और उत्थान हो।
निष्कर्ष--
वेदों में बार-बार यह सिद्धान्त मिलता है कि —
सब मनुष्य समान हैं परस्पर सहयोग करें।
रोगी, दुःखी, पतित का उत्थान करें।
शुभ विचार और कर्म से जीवन सुधारें।
उपनिषदों प्रमाण  :
१. कठोपनिषद् (१.३.१४)
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।”
भावार्थ :
उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुषों को प्राप्त करके ज्ञान प्राप्त करो।
 यहाँ स्पष्ट रूप से आत्मिक पतन से उठने और जाग्रति का संदेश है। यह आध्यात्मिक पुनरुत्थान का महान मन्त्र है।
२. छांदोग्य उपनिषद् (६.८.७)
“तत्त्वमसि श्वेतकेतो।”
भावार्थ :
हे श्वेतकेतु! तू वही ब्रह्मस्वरूप है।
 जब मनुष्य अपने दिव्य स्वरूप को पहचानता है, तो अज्ञान और हीनता से ऊपर उठता है। यह आत्मोन्नति का मूल सिद्धान्त है।
३. बृहदारण्यक उपनिषद् (१.३.२८)
“असतो मा सद्गमय ।
तमसो मा ज्योतिर्गमय ।
मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥”
भावार्थ :
असत्य से सत्य की ओर ले चलो।
अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो।
मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो।
 यह मन्त्र स्पष्ट रूप से पतन (असत्य, अज्ञान, मृत्यु) से उत्थान (सत्य, प्रकाश, अमरत्व) की प्रार्थना है।
४. मुण्डक उपनिषद् (३.२.९)
“ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।”
भावार्थ :
जो ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।
 ज्ञान ही आत्मोन्नति का साधन है — अज्ञानरूपी पतन से उठने का उपाय।
५. ईशावास्य उपनिषद् (मन्त्र ११)
“विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयं सह…”
भावार्थ :
जो विद्या और अविद्या दोनों को जानता है, वह मृत्यु से पार होकर अमृत को प्राप्त करता है।
यह संतुलित ज्ञान द्वारा जीवन के संकटों से ऊपर उठने की शिक्षा देता है।
६. श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.१५)
“वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।”
भावार्थ :
मैं उस महान पुरुष को जानता हूँ जो अंधकार से परे, सूर्य के समान प्रकाशमान है।
 अज्ञानरूपी तमस से ऊपर उठकर प्रकाश में स्थित होना — यही आध्यात्मिक उत्थान है।
७. प्रश्नोपनिषद् (१.१५)
“तस्मै स होवाच…” (ज्ञानोपदेश प्रसंग)
भावार्थ :
गुरु शिष्य को क्रमशः ज्ञान देकर उसे संदेह और अज्ञान से ऊपर उठाते हैं।
 यहाँ स्पष्ट है कि ज्ञान द्वारा पतन से उन्नति कराई जाती है।
८. मैत्रायणी उपनिषद् (६.३४)
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
भावार्थ :
मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है।
 यदि मन पतित है तो बंधन; यदि मन ऊर्ध्वगामी है तो मोक्ष।
अर्थात् मन को उठाना ही वास्तविक उत्थान है।
९- कैवल्य उपनिषद् (२३)
“श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवहि।”
भावार्थ :
श्रद्धा, भक्ति और ध्यानयोग से परम सत्य को जानो।
 यह साधन मनुष्य को अधोगति से ऊपर उठाकर आत्मज्ञान की ओर ले जाते हैं।
१०. महानारायण उपनिषद् (प्रार्थना मन्त्र)
“नारायणाय विद्महे…”
भावार्थ :
हम उस परम पुरुष का ध्यान करें जो हमें प्रेरणा दे।
 दिव्य प्रेरणा से मनुष्य जीवन के पतन से ऊपर उठता है।
सार--
 उपनिषदों में अज्ञान से ज्ञान की ओर बंधन से मोक्ष की ओर
तमस से प्रकाश की ओर
निराशा से आत्मबोध की ओर
उत्थान का ही संदेश है।
पुराणों से प्रमाण--
१. श्रीमद्भागवत महापुराण (१०.१४.८ )
भावार्थ :
जो व्यक्ति विपत्ति में भी भगवान् की करुणा को देखता है, वह धैर्यपूर्वक कर्मफल भोगते हुए अंततः परम पद को प्राप्त करता है।
 यहाँ सिखाया गया है कि दुःख में भी धैर्य और श्रद्धा से मनुष्य पुनः उठ सकता है।
२. विष्णु पुराण (३.१२.४५)
“परस्परोपकारार्थं इदं शरीरम्।”
भावार्थ :
यह शरीर परस्पर उपकार के लिए है।
स्पष्ट है कि समाज में गिरे, दुःखी या निर्बल जनों को उठाना ही मानव जीवन का उद्देश्य है।
३. गरुड़ पुराण (पूर्वखण्ड)
“दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।”
भावार्थ :
धन की तीन गतियाँ हैं — दान, भोग या नाश।
 दान द्वारा दुःखी और पतित जनों का उत्थान करना श्रेष्ठ मार्ग बताया गया है।
४. स्कन्द पुराण (काशीखण्ड)
“परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।”
भावार्थ :
परोपकार पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप।
 यह स्पष्ट रूप से दूसरों के उत्थान का समर्थन करता है।
५. पद्म पुराण (उत्तरखण्ड)
“सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते…”
भावार्थ :
जो सब प्राणियों में एक ही आत्मभाव देखता है, वही श्रेष्ठ है।
 जब सबमें एकत्व देखा जाता है, तब गिरे हुओं को उठाना अपना कर्तव्य समझा जाता है।
६. अग्नि पुराण
“परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।”
भावार्थ :
दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना पाप।
 जो पतित या दुःखी है, उसका उत्थान करना ही सच्चा पुण्य है।
७. ब्रह्म पुराण
“दानधर्मपरः नित्यं सर्वभूतहिते रतः।”
भावार्थ :
जो व्यक्ति दान और धर्म में निरंतर तत्पर रहता है और सब प्राणियों के हित में रत रहता है, वही श्रेष्ठ है।
 समाज के निर्बलों को उठाना ही धर्म का लक्षण बताया गया है।
८. मार्कण्डेय पुराण
(देवीमहात्म्य प्रसंग)
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता…”
भावार्थ :
वह देवी जो सब प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें नमस्कार।
 प्रत्येक प्राणी में दिव्य शक्ति है — अतः किसी के पतन पर उसे पुनः शक्ति देना ही धर्म है।
९. ब्रह्मवैवर्त पुराण
“दयालुः सर्वभूतेषु…”
भावार्थ :
सभी प्राणियों पर दया रखने वाला मनुष्य ही भगवान को प्रिय है।
 दया और करुणा से ही पतित जन का पुनरुत्थान होता है।
१०. लिङ्ग पुराण
“अहिंसा परमो धर्मः।”
भावार्थ :
अहिंसा ही परम धर्म है।
 किसी को गिराना नहीं, बल्कि उठाना ही धर्म है।
सार--
 पुराणों में  यह सिद्धान्त बार-बार आता है कि —
परोपकार सर्वोच्च पुण्य है
दया और करुणा धर्म का मूल है
गीता और रामायण से प्रमाण :
 श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण--
१. (अध्याय ६, श्लोक ५)
“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥”
भावार्थ :
मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं अपने को उठाए, अपने को गिरने न दे; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।
 यहाँ स्पष्ट आदेश है — अपने को गिरने से बचाओ और उठाओ।
२. (अध्याय ९, श्लोक ३०–३१)
“अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः…”
भावार्थ :
यदि अत्यन्त दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भजन करे तो वह साधु ही माना जाता है।
 गिरे हुए व्यक्ति के भी पुनरुत्थान की घोषणा गीता करती है।
३. (अध्याय ४, श्लोक ७–८)
“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।”
भावार्थ :
भगवान साधुओं की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं।
 धर्म का कार्य ही पतन से रक्षा और उत्थान है।
 वाल्मीकि रामायण में प्रमाण
१. (अरण्यकाण्ड)
श्रीराम का शबरी को सम्मान देना 
शबरी समाज की दृष्टि में उपेक्षित थी, किन्तु श्रीराम ने उसे प्रेम और आदर देकर उसका उत्थान किया।
 यह पतित के सम्मान और पुनरुत्थान का आदर्श उदाहरण है।
२. (युद्धकाण्ड)
विभीषण शरणागति प्रसंग :
“सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥”
भावार्थ :
जो एक बार भी मेरी शरण में आकर कहे कि ‘मैं आपका हूँ’, उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ — यह मेरा व्रत है।
 शरणागत का उत्थान और संरक्षण — रामधर्म का मूल सिद्धान्त है।
३. अहल्या उद्धार प्रसंग
श्रीराम के चरणस्पर्श से अहल्या का उद्धार हुआ।
 यह आध्यात्मिक पुनरुत्थान का अत्यन्त प्रसिद्ध उदाहरण है।
 निष्कर्ष--
गीता — आत्मोद्धार और पतित के पुनरुत्थान का स्पष्ट उपदेश देती है।
रामायण — करुणा, शरणागति और पतितोद्धार का जीवंत आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
 महाभारत में प्रमाण --
१. उद्योगपर्व (विदुर-नीति)
“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।”
भावार्थ :
जो सब प्राणियों को अपने समान देखता है वही सच्चा ज्ञानी है।
 जब सबमें अपना ही रूप देखा जाए, तब उनके पतन पर उन्हें उठाना स्वाभाविक धर्म बन जाता है।
२. शान्तिपर्व--
“अहिंसा परमो धर्मः।”
भावार्थ :
अहिंसा ही परम धर्म है।
 किसी को गिराना हिंसा है; उठाना ही सच्चा धर्म है।
३. वनपर्व-
“न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।”
भावार्थ :
हे तात! कल्याण करने वाला कभी दुर्गत को प्राप्त नहीं होता।
 जो दूसरों का उत्थान करता है, उसका स्वयं भी उत्थान होता है।
४. शान्तिपर्व (राजधर्म)--
“दीनानाथान् परित्रातुं राजा धर्मेण युज्यते।”
भावार्थ :
राजा का धर्म है कि वह दीन और अनाथों की रक्षा करे।
 समाज में गिरे और निर्बलों का संरक्षण ही धर्मराज्य का मूल है।
५. अनुशासनपर्व-
“परोपकाराय सतां विभूतयः।”
भावार्थ :
सज्जनों की सम्पत्ति और शक्ति परोपकार के लिए होती है।
 सामर्थ्य का उद्देश्य पतितों का उत्थान है।
 सार--
महाभारत स्पष्ट रूप से सिखाता है —
सर्वभूत-समता, दीनजन-रक्षा
अहिंसा और परोपकार, शक्ति का उपयोग उत्थान के लिए।
इसीलिए महाभारत में धर्म का सार “लोक-संग्रह” और “परहित” बताया गया है।
 स्मृति-ग्रन्थों से प्रमाण-- 
१. मनुस्मृति (६.९२)
“धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥”
भावार्थ :
धैर्य, क्षमा, संयम, चोरी न करना, शुद्धता, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध — ये धर्म के दस लक्षण हैं।
क्षमा, धैर्य और अक्रोध से ही पतित व्यक्ति का सुधार और उत्थान सम्भव है।
२. याज्ञवल्क्य स्मृति 
(१.१२२)
“अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।”
भावार्थ :
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शौच और इन्द्रियनिग्रह — ये धर्म के मूल हैं।
 अहिंसा और संयम का अर्थ है — किसी को गिराना नहीं, बल्कि उठाना।
३. पाराशर स्मृति 
(१.२४) --
“कलौ दानं महेशानि सर्वसिद्धिकरं परम्।”
भावार्थ :
कलियुग में दान श्रेष्ठ और सर्वसिद्धि देने वाला है।
 दान और सहायता द्वारा दुःखी का उत्थान किया जाता है।
४. नारद स्मृति--
“दीनानाथान् परित्यज्य यो धर्मं कुरुते नरः।
न स धर्मफलं भुङ्क्ते…”
भावार्थ :
जो दीन-दुःखियों की उपेक्षा कर धर्म करता है, उसे धर्म का फल नहीं मिलता।
 दीनों का उत्थान ही सच्चा धर्म है।
५. बृहस्पति स्मृति
“सर्वभूतहिते रतः…”
भावार्थ :
जो सर्वभूतों के हित में लगा रहता है वही श्रेष्ठ है।
 सर्वहित भावना ही पतन से उत्थान का मार्ग है।
सार--
स्मृति-ग्रन्थ स्पष्ट रूप से बताते हैं कि क्षमा, दया, अहिंसा धर्म के लक्षण हैं।
दीन-दुःखियों की उपेक्षा अधर्म है।
दान, सेवा और सर्वहित ही सच्चा कर्तव्य है।
नीति-ग्रन्थों से प्रमाण:
१. चाणक्य नीति--
“परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः
परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः
परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥”
अर्थ :
वृक्ष फल दूसरों के लिए देते हैं, नदियाँ दूसरों के लिए बहती हैं, गायें दूसरों के लिए दूध देती हैं — यह शरीर भी परोपकार के लिए है।
स्पष्ट है कि जीवन का उद्देश्य दूसरों के उत्थान में है।
२. हितोपदेश--
“परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।”
अर्थ :
परोपकार पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप।
 पतित या दुःखी को उठाना ही पुण्य है।
३. पंचतंत्र--
“सज्जनानां च वाक्यं तु करुणार्द्रं हितं तथा।”
अर्थ :
सज्जनों की वाणी करुणा से भरी और हितकारी होती है।
 करुणा ही उत्थान का आधार है।
४. विदुर नीति (महाभारत, उद्योगपर्व)
“आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।”
अर्थ :
जो सभी प्राणियों में अपने समान भाव रखता है वही ज्ञानी है।
 जब सबको अपना मानेंगे, तब उनके पतन पर उन्हें उठाने का कर्तव्य निभाएँगे।
५. नीतिशतकम्--
“सत्पुरुषाः परहितनिरता भवन्ति।”
अर्थ :
सज्जन पुरुष सदा परहित में लगे रहते हैं।
 सज्जनता का लक्षण ही दूसरों का उत्थान है।
निष्कर्ष--
नीति-ग्रन्थ स्पष्ट रूप से सिखाते हैं कि —
परोपकार जीवन का उद्देश्य है।
करुणा और दया सज्जनता का लक्षण है।
दूसरों को गिराना पाप, उठाना पुण्य है।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण-- 
गर्ग संहिता में पतितों के उद्धार सम्बन्धी प्रमाण
(१) गोलोकखण्ड 3.16
हरेर्नाम स्मृतं येन
महापातकनाशनम्।
स पतित्वापि लोकेऽस्मिन्
याति विष्णोः परां गतिम्॥
भावार्थ — जो भगवान् हरि का नाम स्मरण करता है, वह बड़े पापों का नाश करके पतित होने पर भी परम गति को प्राप्त होता है।
(२) मथुराखण्ड 12.45
पतितं दुःखितं दीनं
यो रक्षति जनार्दनः।
तस्य नश्यन्ति पापानि
भास्करस्येव तमसः॥
भावार्थ — जनार्दन पतित और दुःखी जन की रक्षा करते हैं; उसके पाप सूर्य के सामने अन्धकार की तरह नष्ट हो जाते हैं।
(३) वृन्दावनखण्ड 7.22
कृष्णनाम्नः प्रभावेण
पतितोऽपि विमुच्यते॥
भावार्थ — श्रीकृष्ण के नाम के प्रभाव से पतित मनुष्य भी मुक्त हो जाता है।
(४) अश्वमेधखण्ड 5.31
दीनबन्धुर्दयासिन्धुः
कृष्णो भक्तप्रपालकः।
उद्धरेत् सर्वपापेभ्यः
शरणागतवत्सलः॥
भावार्थ — दीनबन्धु श्रीकृष्ण शरणागतों को सब पापों से ऊपर उठाते हैं।
(५) द्वारकाखण्ड 9.14
अपि चेत् पतितो विप्रो
नामस्मरणतत्परः।
पुनाति सकलं लोकं
दीपवत् तमसो यथा॥
भावार्थ — यदि पतित मनुष्य भी भगवन्नाम में लग जाए, तो वह स्वयं और दूसरों को भी पवित्र कर सकता है।
योग वशिष्ठ में प्रमाण
(१) निर्वाणप्रकरण 2.18
अपि पतितमत्यन्तं
ज्ञानमुत्थापयत्यलम्॥
भावार्थ — ज्ञान अत्यन्त पतित मनुष्य को भी पुनः उठा देता है।
(२) उपशमप्रकरण 5.12
चित्तमेव हि संसारः
तत्प्रयत्नेन शोधयेत्॥
भावार्थ — मन ही संसार और पतन का कारण है; उसे शुद्ध करना चाहिए।
(३) उत्पत्तिप्रकरण 18.27
नास्ति संसारदुःखस्य
नाशो ज्ञानादृते क्वचित्॥
भावार्थ — संसार के दुःख और पतन का नाश केवल ज्ञान से होता है।
(४) निर्वाणप्रकरण 3.41
यथा दीपः प्रवृद्धोऽन्धं
तमो नाशयति क्षणात्।
तथा विवेकः पुरुषं
पापपङ्कादुद्धरेत्॥
भावार्थ — जैसे दीपक अन्धकार मिटा देता है, वैसे विवेक मनुष्य को पाप और पतन से ऊपर उठाता है।
(५) वैराग्यप्रकरण 1.31
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं
मग्नं संसारवारिधौ॥
भावार्थ — मनुष्य को चाहिए कि वह संसार-सागर में डूबे हुए अपने को स्वयं ऊपर उठाए।
इस्लाम धर्म में प्रमाण-- 
क़ुरआन में भी गिरे हुए, पापी, निराश या भटके हुए मनुष्य को पुनः उठाने, क्षमा देने और सुधार का अवसर देने की शिक्षा अनेक स्थानों पर मिलती है।
१. क़ुरआन — सूरह अज़्-ज़ुमर 39:53
قُلْ يَا عِبَادِيَ الَّذِينَ أَسْرَفُوا عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ لَا تَقْنَطُوا مِن رَّحْمَةِ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ يَغْفِرُ الذُّنُوبَ جَمِيعًا
उच्चारण:
Qul yā ‘ibādiya alladhīna asrafū ‘alā anfusihim lā taqnaṭū min raḥmatillāh.
भावार्थ — कह दो: हे मेरे बन्दो, जिन्होंने अपने ऊपर अत्याचार किया है, अल्लाह की दया से निराश मत हो; निश्चय ही अल्लाह सब पापों को क्षमा कर देता है।
यह “गिरे हुओं को पुनः उठाओ” की भावना से अत्यन्त निकट है।
२. सूरह अल-बक़रह 2:286
لَا يُكَلِّفُ اللَّهُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا
भावार्थ — अल्लाह किसी आत्मा पर उसकी शक्ति से अधिक बोझ नहीं डालता।
अर्थात मनुष्य गिर सकता है, पर उसके लिए उठने का मार्ग भी रखा गया है।
३. सूरह अश-शूरा 42:25
وَهُوَ الَّذِي يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِ وَيَعْفُو عَنِ السَّيِّئَاتِ
भावार्थ — वही (अल्लाह) अपने बन्दों की तौबा स्वीकार करता है और बुराइयों को क्षमा कर देता है।
४. सूरह ताहा 20:82
وَإِنِّي لَغَفَّارٌ لِّمَن تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا ثُمَّ اهْتَدَىٰ
भावार्थ — जो तौबा करे, ईमान लाए, अच्छे कर्म करे और सीधा मार्ग अपनाए, मैं उसके लिए अत्यन्त क्षमाशील हूँ।
५. सूरह आल-इमरान 3:139
وَلَا تَهِنُوا وَلَا تَحْزَنُوا وَأَنتُمُ الْأَعْلَوْنَ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ
भावार्थ — निराश मत हो, दुःखी मत हो; यदि तुम ईमान वाले हो तो तुम ही ऊँचे रहोगे।
यह आध्यात्मिक उत्थान और साहस का सन्देश है।
हदीसों में प्रमाण
६. सहीह मुस्लिम
كُلُّ ابْنِ آدَمَ خَطَّاءٌ وَخَيْرُ الْخَطَّائِينَ التَّوَّابُونَ
भावार्थ — आदम की सारी सन्तान भूल करने वाली है; और सबसे अच्छे वे हैं जो पश्चाताप करके लौट आते हैं।
७. सहीह बुख़ारी
إِنَّ اللَّهَ يَبْسُطُ يَدَهُ بِاللَّيْلِ لِيَتُوبَ مُسِيءُ النَّهَارِ
भावार्थ — अल्लाह रात में अपना हाथ फैलाता है ताकि दिन में गलती करने वाला तौबा कर सके।
८. मुहम्मद स⁰ का कथन
الرَّاحِمُونَ يَرْحَمُهُمُ الرَّحْمَٰنُ
भावार्थ — जो दूसरों पर दया करते हैं, उन पर परम दयालु ईश्वर दया करता है।
यह गिरे हुए व्यक्ति के प्रति करुणा की भावना को दर्शाता है।
सूफी सन्तों में प्रमाण-- 
सूफ़ी संतों के वचनों में “गिरे हुओं को पुनः उठाने” की भावना
सूफ़ी परम्परा में ईश्वर की दया (रहमत), प्रेम (इश्क़), तौबा और मानवता की सेवा को अत्यन्त महत्व दिया गया है। अनेक सूफ़ी संतों ने कहा कि कोई मनुष्य इतना पतित नहीं कि वह ईश्वर की कृपा से उठ न सके।
१. जलालुद्दीन रूमी
باز آ، باز آ، هر آنچه هستی باز آ
گر کافر و گبر و بت‌پرستی باز آ
भावार्थ — लौट आ, लौट आ, चाहे तू जैसा भी हो लौट आ; चाहे तू पापी हो या भटका हुआ, फिर भी लौट आ।
यह सूफ़ी परम्परा की सबसे प्रसिद्ध पुकारों में से एक है।
२. जलालुद्दीन रूमी
زخم جایی است که نور از آن وارد می‌شود
भावार्थ — घाव वही स्थान है जहाँ से प्रकाश भीतर प्रवेश करता है।
अर्थात टूटन और पतन भी उत्थान का मार्ग बन सकते हैं।
३. हाफ़िज़ शीराज़ी
ناامید مشو، ای دل، که خدا با ماست
भावार्थ — हे दिल! निराश मत हो, क्योंकि ईश्वर हमारे साथ है।
४. सादी शीराज़ी
بنی‌آدم اعضای یکدیگرند
که در آفرینش ز یک گوهرند
भावार्थ — समस्त मानव एक दूसरे के अंग हैं; सब एक ही मूल से उत्पन्न हुए हैं।
इसलिए गिरे हुए मनुष्य को उठाना मानव धर्म है।
५. निज़ामुद्दीन औलिया
ہر کہ در این درگہ آید، نومید نگردد
भावार्थ — जो इस दरगाह में आता है, वह निराश नहीं लौटता।
६. ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
درماندگان را دستگیری کن
भावार्थ — असहाय और गिरे हुए लोगों का हाथ पकड़ो।
७. बुल्ले शाह
رب دا ملणा اکھیاں دي نੀਂद گوا کے
भावार्थ — ईश्वर की प्राप्ति अहंकार और अज्ञान छोड़ने से होती है।
अर्थात पतन से उठना भीतर की जागृति से सम्भव है।
८. अमीर खुसरो
ہر قوم راست راہے، دین و قبلہ گاہے
भावार्थ — हर समुदाय का अपना मार्ग है; ईश्वर सबको मार्ग देता है।
यह समावेश और उत्थान की भावना है।
९. रबिया बसरी
إلهي ما عبدتك خوفًا من نارك
ولا طمعًا في جنتك
भावार्थ — हे प्रभु! मैं तेरी उपासना नर्क के भय से नहीं, बल्कि प्रेम से करती हूँ।
प्रेम मनुष्य को ऊपर उठाता है।
१०. अब्दुल कादिर जिलानी
إذا وقعتَ في الذنب فتب إلى الله
فإن باب الرحمة مفتوح
भावार्थ — यदि तुम पाप में गिर जाओ तो अल्लाह की ओर लौटो; दया का द्वार खुला है।
११. शम्स तबरेज़
دل شکسته، خانهٔ خداست
भावार्थ — टूटा हुआ दिल ईश्वर का घर है।
अर्थात जो गिरा है, वही ईश्वर की कृपा के अधिक निकट हो सकता है।
१२. बायज़ीद बिस्तामी
اگر بنده یک قدم به سوی خدا رود
خدا ده قدم به سوی او آید
भावार्थ — यदि मनुष्य ईश्वर की ओर एक कदम बढ़ाए, तो ईश्वर उसकी ओर दस कदम बढाता है।
सिक्ख थर्म में प्रमाण-- 
 सिख धर्म में “गिरे हुओं को पुनः उठाने” की भावना के प्रमाण
सिख परम्परा में ईश्वर की कृपा (ਨਦਰਿ), नाम-स्मरण, सेवा और दया द्वारा पतित मनुष्य के उद्धार की शिक्षा बार-बार मिलती है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित दिए जा रहे हैं।
१. गुरु ग्रंथ साहिब — अंग 15
ਨਾਨਕ ਨੀਚੁ ਕਹੈ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਵਾਰਿਆ ਨ ਜਾਵਾ ਏਕ ਵਾਰ ॥
ਜੋ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸਾਈ ਭਲੀ ਕਾਰ ॥
ਤੂ ਸਦਾ ਸਲਾਮਤਿ ਨਿਰੰਕਾਰ ॥
भावार्थ — गुरु नानक विनम्र होकर कहते हैं: हे निरंकार! जो तुझे प्रिय है वही कल्याणकारी है। तेरी कृपा से ही मनुष्य का उत्थान होता है।
२. अंग 263
ਜੈਸੀ ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਵੈਸਾ ਹੋਈ ॥
ਵਿਨੁ ਨਦਰੀ ਨਾਨਕ ਨਹੀ ਕੋਈ ॥
भावार्थ — जैसी प्रभु की कृपा-दृष्टि होती है, मनुष्य वैसा बनता है; उसकी कृपा बिना कोई ऊपर नहीं उठ सकता।
३. अंग 624
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਣੁ ਭੈ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
भावार्थ — हरि का नाम पतितों का उद्धार करने वाला है।
४. अंग 4
ਸੋ ਕਿਉ ਮੰਦਾ ਆਖੀਐ ਜਿਤੁ ਜੰਮਹਿ ਰਾਜਾਨ ॥
भावार्थ — किसी को नीचा या तुच्छ क्यों कहें, जबकि उसी से महान जन उत्पन्न होते हैं।
यह गिरे हुए या तुच्छ समझे जाने वाले व्यक्ति के सम्मान और उत्थान की शिक्षा है।
५. अंग 305
ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੁ ॥
भावार्थ — प्रभु का नाम जीवन और प्राणों का आधार है; वही गिरे हुए को सम्भालता है।
६. अंग 886
ਜਿਨ ਹਰਿ ਸੇਵਿਆ ਤਿਨ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
भावार्थ — जिन्होंने प्रभु की सेवा और स्मरण किया, उन्होंने शान्ति और उत्थान पाया।
७. अंग 1429
ਨਾਨਕ ਨਾਮ ਚੜ੍ਹਦੀ ਕਲਾ
ਤੇਰੇ ਭਾਣੇ ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ ॥
भावार्थ — हे नानक! प्रभु के नाम से उन्नति और उत्साह प्राप्त होता है, और सबका कल्याण हो।
यह केवल स्वयं उठने की नहीं, बल्कि सबको ऊपर उठाने की भावना है। 
ईसाई धर्म में प्रमाण-- 
ईसाई धर्म में “गिरे हुए को पुनः उठाने” की भावना के प्रमाण
ईसाई धर्म में परमेश्वर की करुणा, क्षमा, पश्चाताप और पतित मनुष्य के उद्धार की शिक्षा अत्यन्त प्रमुख है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण अंग्रेज़ी (English) लिपि सहित दिए जा रहे हैं।
१. Bible — Psalms 145:14
“The Lord upholds all who fall
and lifts up all who are bowed down.”
भावार्थ — प्रभु उन सबको सम्भालता है जो गिर जाते हैं और झुके हुओं को उठाता है।
२. Gospel of Luke 15:4–6
“Rejoice with me; I have found my lost sheep.”
भावार्थ — जो भटक गया था, उसे परमेश्वर पुनः खोजकर अपने पास लाता है।
यह “भटके हुए को वापस उठाने” का प्रसिद्ध दृष्टान्त है।
३. Gospel of John 8:11
“Neither do I condemn you; go and sin no more.”
भावार्थ — मैं भी तुम्हें दोषी नहीं ठहराता; जाओ और फिर पाप मत करना।
यह पतित व्यक्ति को दूसरा अवसर देने की शिक्षा है।
४. Isaiah 41:10
“Fear not, for I am with you…
I will strengthen you and help you.”
भावार्थ — भय मत करो; मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हें शक्ति दूँगा और सहारा दूँगा।
५. 2 Corinthians 12:9
“My grace is sufficient for you,
for My strength is made perfect in weakness.”
भावार्थ — मेरी कृपा तुम्हारे लिए पर्याप्त है; मेरी शक्ति दुर्बलता में पूर्ण होती है।
अर्थात गिरे और दुर्बल व्यक्ति को भी ईश्वर उठाता है।
६. Romans 8:1
“There is now no condemnation for those who are in Christ Jesus.”
भावार्थ — जो मसीह में हैं, उनके लिए अब दण्ड नहीं है।
यह आध्यात्मिक पुनरुत्थान और क्षमा का सन्देश है।
७. Matthew 11:28
“Come to me, all you who are weary and burdened, and I will give you rest.”
भावार्थ — हे थके और बोझ से दबे लोगो! मेरे पास आओ, मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।
यह दुःखी और टूटे हुए मनुष्य को पुनः उठाने की करुणा का सन्देश है।
जैन धर्म में प्रमाण-- 
जैन धर्म में “गिरे हुओं को पुनः उठाने” की भावना के प्रमाण
जैन धर्म में आत्मशुद्धि, क्षमा, संयम, करुणा और आत्मोन्नति को अत्यन्त महत्व दिया गया है। जैन आगमों में कहा गया है कि पतित या भ्रमित जीव भी सम्यक् ज्ञान, तप और धर्म से पुनः ऊँचा उठ सकता है। नीचे कुछ प्रमाण प्राकृत (देवनागरी) सहित दिए जा रहे हैं।
१. उत्तराध्ययन सूत्र
अप्पा णं उवसमेज्जा, अप्पा णं दमेज्जा।
भावार्थ — मनुष्य स्वयं को शान्त और संयमित करे।
अर्थात आत्मसंयम द्वारा पतन से ऊपर उठा जा सकता है।
२. आचारांग सूत्र
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
भावार्थ — किसी भी जीव को कष्ट नहीं देना चाहिए।
करुणा और अहिंसा द्वारा समाज में गिरे हुओं को भी संरक्षण देने का भाव है।
३. दशवैकालिक सूत्र
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे।
भावार्थ — मैं सब जीवों को क्षमा करता हूँ, सब जीव मुझे क्षमा करें।
यह पतित व्यक्ति के लिए पुनः स्वीकार और उत्थान की भावना है।
४. समयसार
जो अप्पाणं जाणइ, सो परमं सुखं लहइ।
भावार्थ — जो आत्मा को जान लेता है, वह परम सुख प्राप्त करता है।
आत्मज्ञान पतन से उत्थान का मार्ग है।
५. तत्त्वार्थ सूत्र
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः॥
भावार्थ — सम्यक् दर्शन, ज्ञान और आचरण ही मोक्ष का मार्ग हैं।
अर्थात गलत मार्ग से उठकर सही मार्ग पर चलना ही मुक्ति का साधन है।
६. उत्तराध्ययन सूत्र
धम्मो मंगलमुक्किट्ठं।
भावार्थ — धर्म ही सर्वोत्तम मंगल है।
धर्म मनुष्य को अधःपतन से ऊपर उठाता है।
७. नियमसार
णाणेण विणा ण मुट्ठि।
भावार्थ — ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं।
ज्ञान ही पतित जीव को पुनः ऊँचा उठाने का साधन है।
बौद्धं धर्म में प्रमाण-- 
बौद्ध धर्म में “गिरे हुओं को पुनः उठाने” की भावना के प्रमाण
बौद्ध धर्म में करुणा (करुणा), मैत्री (मेत्ता), आत्मजागरण और दुःख से मुक्ति की शिक्षा दी गई है। बुद्ध ने सिखाया कि चाहे मनुष्य कितना भी पतित या दुःखी हो, वह सम्यक् मार्ग से पुनः उठ सकता है। नीचे प्रमुख प्रमाण पाली (देवनागरी) सहित दिए जा रहे हैं।
१. धम्मपद 160
अत्ता हि अत्तनो नाथो,
को हि नाथो परो सिया।
भावार्थ — मनुष्य स्वयं ही अपना सहारा है; दूसरा कौन सहारा हो सकता है?
अर्थात मनुष्य स्वयं को पतन से ऊपर उठा सकता है।
२. धम्मपद 165
अत्तना हि कतम् पापं,
अत्तना सङ्किलिस्सति।
अत्तना अकतं पापं,
अत्तना व विसुज्झति॥
भावार्थ — मनुष्य स्वयं पाप करता है और स्वयं शुद्ध भी हो सकता है।
यह पुनः उत्थान और आत्मशुद्धि का सिद्धान्त है।
३. धम्मपद 223
अक्कोधेन जिने कोधं,
असाधुं साधुना जिने॥
भावार्थ — क्रोध को अक्रोध से और बुराई को अच्छाई से जीतो।
यह पतित व्यक्ति को सुधारने की करुणामयी शिक्षा है।
४. सुत्तनिपात
सब्बे सत्ता सुखिता होन्तु।
भावार्थ — सभी प्राणी सुखी हों।
यह सर्वजन के कल्याण और उत्थान की भावना है।
५. धम्मपद 173
यस्स पापं कतम् कम्मं,
कुसलेन पिथीयति।
सो इमं लोकं पभासेति,
अब्भा मुत्तो व चन्दिमा॥
भावार्थ — जो अपने पापों को सत्कर्मों से ढँक देता है, वह बादलों से मुक्त चन्द्रमा की तरह जगत को प्रकाशित करता है।
यह पतित से पुनः प्रकाशमय बनने की शिक्षा है।
६. धम्मपद 276
तुम्हेहि किच्चं आतप्पं,
अक्कातारो तथागता॥
भावार्थ — प्रयत्न तुम्हें स्वयं करना है; तथागत केवल मार्ग दिखाते हैं।
मनुष्य स्वयं उठ सकता है।
७. महापरिनिब्बान सुत्त
अत्तदीपा विहरथ,
अत्तसरणा अनञ्ञसरणा॥
भावार्थ — अपने दीपक स्वयं बनो, अपना आश्रय स्वयं बनो।
यह आत्मोद्धार और आत्मजागरण की महान शिक्षा है।
यहूदी धर्म में प्रमाण-- 
यहूदी धर्म में “गिरे हुओं को पुनः उठाने” की भावना के प्रमाण
यहूदी धर्म में परमेश्वर की दया, पश्चाताप (Teshuvah), करुणा और गिरे हुए मनुष्य को पुनः उठाने की शिक्षा अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी जाती है। नीचे हिब्रू लिपि सहित कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं।
१. Tanakh — Psalm 145:14
סוֹמֵךְ יְהוָה לְכָל־הַנֹּפְלִים
וְזוֹקֵף לְכָל־הַכְּפוּפִים׃
उच्चारण:
Somekh Adonai le-khol ha-noflim,
ve-zokef le-khol ha-kefufim.
भावार्थ — प्रभु सब गिरे हुओं को सम्भालता है और झुके हुओं को उठाता है।
२. Proverbs 24:16
כִּי שֶׁבַע יִפּוֹל צַדִּיק וָקָם
וּרְשָׁעִים יִכָּשְׁלוּ בְרָעָה׃
भावार्थ — धर्मी मनुष्य सात बार गिरकर भी फिर उठ खड़ा होता है।
३. Isaiah 41:10
אַל־תִּירָא כִּי עִמְּךָ־אָנִי
אַל־תִּשְׁתָּע כִּי־אֲנִי אֱלֹהֶיךָ
אִמַּצְתִּיךָ אַף־עֲזַרְתִּיךָ׃
भावार्थ — भय मत कर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ; मैं तुझे शक्ति दूँगा और सहायता करूँगा।
४. Micah 7:8
כִּי נָפַלְתִּי קָמְתִּי
כִּי־אֵשֵׁב בַּחֹשֶׁךְ
יְהוָה אוֹר לִי׃
भावार्थ — यद्यपि मैं गिर गया हूँ, फिर भी उठूँगा; अन्धकार में भी प्रभु मेरा प्रकाश है।
५. Psalm 34:18
קָרוֹב יְהוָה לְנִשְׁבְּרֵי־לֵב
וְאֶת־דַּכְּאֵי־רוּחַ יוֹשִׁיעַ׃
भावार्थ — प्रभु टूटे हुए हृदय वालों के निकट रहता है और कुचले हुए मन वालों को बचाता है।
६. Isaiah 57:15
לְהַחֲיוֹת רוּחַ שְׁפָלִים
וּלְהַחֲיוֹת לֵב נִדְכָּאִים׃
भावार्थ — मैं नम्र और टूटे हुए लोगों की आत्मा को पुनर्जीवित करता हूँ।
७. Lamentations 3:31–32
כִּי לֹא יִזְנַח לְעוֹלָם אֲדֹנָי׃
כִּי אִם־הוֹגָה וְרִחַם
כְּרֹב חֲסָדָיו׃
भावार्थ — प्रभु सदा के लिए त्याग नहीं करता; वह दया और करुणा करता है।
८. Psalm 147:3
הָרֹפֵא לִשְׁבוּרֵי לֵב
וּמְחַבֵּשׁ לְעַצְּבוֹתָם׃
भावार्थ — वह टूटे हुए हृदयों को चंगा करता है और उनके घाव बाँधता है।
९. Hosea 6:1
לְכוּ וְנָשׁוּבָה אֶל־יְהוָה
כִּי הוּא טָרָף וְיִרְפָּאֵנוּ
יַךְ וְיַחְבְּשֵׁנוּ׃
भावार्थ — आओ, हम प्रभु की ओर लौट चलें; वही घायल करता है और वही चंगा भी करता है।
पारसी धर्मं में प्रमाण-- 
पारसी धर्म (ज़रथुष्ट्र धर्म) में “गिरे हुओं को पुनः उठाने” की भावना के प्रमाण में 
 अशा (सत्य और धर्म), वोहु मनह (शुभ मन), करुणा, पश्चाताप और धर्ममार्ग पर लौटने की शिक्षा दी गई है। जरथुस्त्र ने सिखाया कि मनुष्य यदि भूल या अधर्म में गिर जाए तो वह पुनः सत्य और प्रकाश की ओर लौट सकता है। नीचे अवेस्ता (Avestan) लिपि सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं।
१. अवेस्ता — Yasna 30.2
𐬯𐬭𐬀𐬊𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 𐬬𐬀𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬎
𐬬𐬀𐬭𐬆𐬨𐬀𐬥𐬀𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬭𐬆𐬙𐬀𐬥𐬀𐬨
भावार्थ — सुनो और समझो, फिर सत्य का मार्ग चुनो।
अर्थात भटका हुआ मनुष्य भी पुनः धर्ममार्ग पर लौट सकता है।
२. Yasna 34.1
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀
𐬙𐬀 𐬨𐬀 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬯𐬀𐬊𐬱𐬌𐬌𐬀𐬥𐬙
भावार्थ — हे अहुरा मज़्दा! हमें उद्धार और कल्याण की ओर ले चलो।
३. Yasna 43.1
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀
𐬎𐬱𐬙𐬀𐬥𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
भावार्थ — हे मज़्दा! हमें प्रकाश और आनन्द प्रदान करो।
अर्थात अन्धकार और पतन से ऊपर उठाओ।
४. Yasna 46.7
𐬚𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀
𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬥𐬀
भावार्थ — हे मज़्दा! मुझे सही मार्ग दिखाओ।
यह पतन से पुनः मार्गदर्शन का भाव है।
५. Visperad 20.2
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬵𐬉 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀𐬵𐬉
𐬭𐬀𐬉𐬱𐬗
भावार्थ — अहुरा मज़्दा धर्मी जनों का सहायक है।
६. Vendidad 3.24
𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌
भावार्थ — अहुरा मज़्दा पवित्रता और पुनरुद्धार प्रदान करता है।
७. Yasht 13.89
𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎
𐬀𐬯𐬀𐬵𐬌 𐬭𐬀𐬥𐬀
भावार्थ — पवित्र आत्मा सत्य के मार्ग में मनुष्य का मार्गदर्शन करती है।
८. Khordeh Avesta — Ashem Vohu
𐬀𐬴𐬆𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬎𐬵𐬙𐬀
𐬀𐬴𐬙𐬀𐬌 𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌
भावार्थ — धर्म और सत्य ही सर्वोत्तम कल्याण हैं।
जो सत्य की ओर लौटता है, वही पुनः उठता है।
९. Khordeh Avesta — Yatha Ahu Vairyo
𐬬𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬊
भावार्थ — जैसे परम प्रभु धर्म से शासन करते हैं, वैसे ही मनुष्य को धर्ममार्ग अपनाना चाहिए।
यह पतन से धर्म की ओर पुनरागमन का सन्देश है।
ताओ धर्म में “गिरे हुओं को पुनः उठाने” की भावना के प्रमाण---
ताओ धर्म (Daoism / Taoism) में विनम्रता, करुणा, स्वाभाविकता (Wu Wei), और भटके हुए मनुष्य के पुनः संतुलन में लौटने की शिक्षा दी गई है। लाओत्से और अन्य ताओवादी ग्रन्थों में कहा गया है कि जो गिर जाता है, वह भी ताओ (मार्ग) में लौटकर पुनः उठ सकता है।
१. Tao Te Ching अध्याय 40
反者道之動。
弱者道之用。
उच्चारण:
Fǎn zhě dào zhī dòng,
ruò zhě dào zhī yòng.
भावार्थ — लौटना ताओ की गति है; विनम्रता उसकी शक्ति है।
अर्थात भटका हुआ मनुष्य भी लौटकर पुनः संतुलन पा सकता है।
२. अध्याय 22
曲則全,
枉則直,
窪則盈。
भावार्थ — जो झुकता है वही पूर्ण होता है; जो टूटता है वही सीधा बनता है; जो खाली होता है वही भरता है।
यह पतन के बाद पुनः उठने की शिक्षा है।
३. अध्याय 8
上善若水。
水善利萬物而不爭。
भावार्थ — सर्वोत्तम गुण जल के समान है, जो सबका कल्याण करता है और संघर्ष नहीं करता।
करुणा और सहारा देने का भाव।
४. अध्याय 27
善人者,不善人之師;
不善人者,善人之資。
भावार्थ — श्रेष्ठ व्यक्ति अश्रेष्ठ व्यक्ति का शिक्षक है, और अश्रेष्ठ व्यक्ति भी सुधार का अवसर है।
यह गिरे हुए को सुधारने और उठाने की शिक्षा है।
५. अध्याय 49
聖人無常心,
以百姓心為心。
भावार्थ — संत अपना अलग मन नहीं रखता; वह सब लोगों के मन को अपना मन मानता है।
यह दुःखी और पतित लोगों के प्रति सहानुभूति का भाव है।
६. अध्याय 63
為無為,
事無事。
भावार्थ — सहजता से कार्य करो और कठिनाइयों को शान्ति से संभालो।
अर्थात पतन के बाद भी संयम से पुनः उठो।
७. अध्याय 76
人之生也柔弱,
其死也堅強。
भावार्थ — जीवन में मनुष्य कोमल और लचीला होता है; कठोरता मृत्यु का चिन्ह है।
लचीलापन ही पुनरुत्थान की शक्ति है।
८. Zhuangzi
夫哀莫大於心死,
而人死亦次之。
भावार्थ — सबसे बड़ा दुःख हृदय का मर जाना है; शारीरिक मृत्यु उससे बाद में है।
अर्थात भीतर की जागृति से मनुष्य पुनः उठ सकता है।
९. Zhuangzi
至人無己,
神人無功,
聖人無名。
भावार्थ — पूर्ण व्यक्ति अहंकाररहित होता है; संत प्रसिद्धि नहीं चाहता।
अहंकार छोड़कर मनुष्य पतन से ऊपर उठता है।
कन्फ्यूशियस धर्म में “गिरे हुओं को पुनः उठाने” की भावना के प्रमाण---
कन्फ्यूशियस की शिक्षा में दया (Ren), नैतिक सुधार, आत्मसंयम और भटके हुए मनुष्य को पुनः सद्मार्ग पर लाने की भावना प्रमुख है। कन्फ्यूशियस परम्परा सिखाती है कि मनुष्य अपनी भूलों को सुधारकर पुनः श्रेष्ठ बन सकता है।
१. Analects 12.2
己所不欲,勿施於人。
उच्चारण:
Jǐ suǒ bù yù, wù shī yú rén.
भावार्थ — जो व्यवहार तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत करो।
यह गिरे हुए और दुःखी लोगों के प्रति करुणा की शिक्षा है।
२. Analects 15.30
過而不改,是謂過矣。
भावार्थ — गलती करके उसे न सुधारना ही वास्तविक गलती है।
अर्थात मनुष्य गिर सकता है, पर उसे पुनः उठना चाहिए।
३. Analects 7.22
三人行,必有我師焉。
भावार्थ — यदि तीन लोग साथ चलें, तो उनमें से कोई न कोई मेरा शिक्षक अवश्य होगा।
हर व्यक्ति में सुधार और सीखने की सम्भावना है।
४. Analects 4.17
見賢思齊焉,見不賢而內自省也。
भावार्थ — श्रेष्ठ को देखकर वैसा बनने का प्रयास करो, और अश्रेष्ठ को देखकर स्वयं को सुधारो।
५. Analects 1.1
學而時習之,不亦說乎。
भावार्थ — सीखना और बार-बार अभ्यास करना आनन्ददायक है।
ज्ञान और अभ्यास से मनुष्य पतन से ऊपर उठता है।
६. Mencius 6A:6
人皆可以為堯舜。
भावार्थ — हर मनुष्य महान और सद्गुणी बन सकता है।
कोई भी स्थायी रूप से पतित नहीं है।
७. Mencius 2A:6
惻隱之心,仁之端也。
भावार्थ — करुणा का भाव ही मानवता (Ren) का आरम्भ है।
दूसरों को उठाना ही सच्ची मानवता है।
८. Great Learning
修身齊家治國平天下。
भावार्थ — पहले स्वयं को सुधारो, फिर परिवार, राज्य और संसार में शान्ति लाओ।
आत्मसुधार से ही व्यापक उत्थान सम्भव है।
९. Analects 9.28
知者不惑,仁者不憂,勇者不懼。
भावार्थ — ज्ञानी भ्रमित नहीं होता, दयालु चिन्तित नहीं होता, और साहसी भयभीत नहीं होता।
ज्ञान, दया और साहस मनुष्य को पतन से ऊपर उठाता है।
शिन्तो धर्म में “गिरे हुओं को पुनः उठाने” की भावना के प्रमाण--
शिन्तो धर्म (Shintō) में शुद्धि (Purification / Harae), प्रकृति के साथ सामंजस्य, करुणा और आत्मिक नवीकरण की शिक्षा दी जाती है। इसमें माना जाता है कि मनुष्य अशुद्धि, दुःख या पतन से फिर शुद्ध होकर दिव्य मार्ग पर लौट सकता है।
१. 古事記 (Kojiki)
禍を祓ひ、清き心に帰る。
उच्चारण:
Wazawai o harai, kiyoki kokoro ni kaeru.
भावार्थ — अशुभता को दूर करके शुद्ध हृदय में लौटो।
यह पतन के बाद पुनः शुद्ध होने की शिक्षा है।
२. 日本書紀 (Nihon Shoki)
清き明き心を以て神に仕ふ。
भावार्थ — शुद्ध और उज्ज्वल हृदय से देवताओं की सेवा करो।
अर्थात मनुष्य अपने दोषों से उठकर पुनः पवित्र बन सकता है।
३. शिन्तो प्रार्थना (Norito)
祓へ給ひ 清め給へ。
उच्चारण:
Harae tamae, kiyome tamae.
भावार्थ — हमें शुद्ध करो और पवित्र बनाओ।
यह आत्मिक पुनरुद्धार की प्रार्थना है।
४. Norito
諸々の罪穢れを祓ひ給へ。
भावार्थ — सभी पापों और अशुद्धियों को दूर करो।
यह पतित अवस्था से ऊपर उठाने का भाव है।
५. 大祓詞 (Ōharae no Kotoba)
罪という罪はあらじと祓へ給ふ。
भावार्थ — सभी दोष और पाप दूर हो जाएँ।
यह क्षमा और पुनः शुद्धि की भावना है।
६. शिन्तो परम्परा का सिद्धान्त
誠の心は神に通ず。
भावार्थ — सच्चा हृदय देवत्व तक पहुँचता है।
अर्थात ईमानदारी से मनुष्य पुनः दिव्य मार्ग पर लौट सकता है।
७. मोटोओरी नोरिनागा
直き心こそ神の心なり。
भावार्थ — सीधा और निष्कपट हृदय ही देवताओं का हृदय है।
मनुष्य अपने भीतर की शुद्धता से फिर ऊपर उठ सकता है।
८. शिन्तो उक्ति
神は清き者を守る。
भावार्थ — देवता शुद्ध हृदय वालों की रक्षा करते हैं।
९. शिन्तो शिक्षा
穢れを去れば、新たなる道が開ける。
भावार्थ — अशुद्धि दूर होने पर नया मार्ग खुलता है।
यह पुनरुत्थान और नये जीवन का सन्देश है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण-- 
यूनानी दर्शन में “गिरे हुओं को पुनः उठाने” की भावना के प्रमाण--
यूनानी दर्शन में आत्मसुधार, सद्गुण (Virtue), ज्ञान, संयम और नैतिक पुनरुत्थान की शिक्षा दी गई है। सुकरात, प्लेटो, अरस्तू तथा स्टोइक दार्शनिकों ने सिखाया कि मनुष्य भूल और पतन से उठकर पुनः श्रेष्ठ जीवन जी सकता है।
१. सुकरात
“The unexamined life is not worth living.”
— Apology
ग्रीक:
Ὁ δὲ ἀνεξέταστος βίος οὐ βιωτὸς ἀνθρώπῳ.
भावार्थ — जो जीवन आत्मपरीक्षण नहीं करता, वह जीने योग्य नहीं।
अर्थात मनुष्य अपनी भूलों को पहचानकर पुनः उठ सकता है।
२. प्लेटो
“We can easily forgive a child who is afraid of the dark; the real tragedy is when men are afraid of the light.”
ग्रीक भाव:
φόβος τοῦ φωτός
भावार्थ — अज्ञान और अन्धकार से बाहर निकलना ही उत्थान है।
३. अरस्तू
“Excellence is not an act, but a habit.”
— Nicomachean Ethics
ग्रीक:
Ἡ ἀρετὴ ἕξις ἐστίν.
भावार्थ — श्रेष्ठता निरन्तर अभ्यास से आती है।
गिरा हुआ व्यक्ति भी अभ्यास से पुनः श्रेष्ठ बन सकता है।
४. एपिक्टेटस
“No man is free who is not master of himself.”
ग्रीक:
οὐδεὶς ἐλεύθερος ἐστίν,
ὃς ἑαυτοῦ μὴ κρατεῖ.
भावार्थ — आत्मसंयम से ही मनुष्य पतन से ऊपर उठता है।
५. मार्कस ऑरेलियस
“You have power over your mind — not outside events.”
— Meditations
ग्रीक परम्परा:
τῆς ψυχῆς κράτει
भावार्थ — मन पर अधिकार करके मनुष्य दुःख और पतन से ऊपर उठ सकता है।
६. सेनेका
“Every new beginning comes from some other beginning’s end.”
लैटिन परम्परा:
Finis origine pendet.
भावार्थ — हर अन्त से एक नया आरम्भ सम्भव है।
अर्थात पतन अन्त नहीं, पुनरुत्थान का अवसर हो सकता है।
७. पाइथागोरस
“Choose rather to be strong of soul than strong of body.”
ग्रीक:
ψυχῇ δυνατὸς μᾶλλον ἢ σώματι
भावार्थ — आत्मबल ही मनुष्य को पुनः उठाता है।
८. प्लूटार्क
“What we achieve inwardly will change outer reality.”
ग्रीक भाव:
ἔνδον μεταβολή
भावार्थ — भीतर का परिवर्तन बाहरी जीवन को बदल देता है।
९. हेराक्लाइटस
“Character is destiny.”
ग्रीक:
ἦθος ἀνθρώπῳ δαίμων.
भावार्थ — चरित्र ही भाग्य है; इसलिए सुधार और उत्थान सम्भव है।
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