ऋगुवेद सूक्ति--(26) की व्याख्या--
ऋगुवेद सूक्ति--(२६) की व्याख्या
मंत्र:
अपृणन्तिमभि सं यन्ति शोका:।
— ऋग्वेद १.१२५.७
भावार्थ --उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है।
पदच्छेद--
अपृणन्तिम् + अभि + सं + यन्ति + शोकाः
शब्दार्थ--
अपृणन्तिम् — जो न पूरयति, दान न देता, उपकार न करने वाला (कृपण)
अभि सं यन्ति — चारों ओर से आ घेर लेते हैं
शोकाः — दुःख, संताप
भावार्थ--
जो व्यक्ति दूसरों की सहायता नहीं करता, दान या उपकार नहीं करता, उस कृपण को शोक और दुःख चारों ओर से घेर लेते हैं।
“उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है”
ऋग्वेद 1.125.7 का पूरा मंत्र इस प्रकार है—
मा पृणन्तो दुरितमेन आरन् मा जारिषुः सूरयः सुव्रतासः।
अन्यस्तेषां परिधिरस्तु कश्चिदपृणन्तमभि सं यन्तु शोकाः॥
लिप्यंतरण (IAST):
mā pṛṇanto duritam ena āran mā jāriṣuḥ sūrayaḥ suvratāsaḥ ।
anyas teṣāṃ paridhir astu kaścid apṛṇantam abhi saṃ yantu śokāḥ ॥
भावार्थ
जो दानी, उपकारी और सदाचारयुक्त लोग हैं, वे पाप और दुःख को प्राप्त न हों; वे सज्जन कभी क्षीण न हों। उनके रक्षक और सहायक लोग बने रहें। परंतु जो कृपण, उपकार न करने वाला और दूसरों की सहायता से विमुख है, उसे शोक और दुःख घेर लें।
इसके समर्थन में वेदों से प्रमाण इस प्रकार हैं:
१. मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत् स तस्य।
नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी॥**
— ऋग्वेद १०.११७.६
भावार्थ:
जो मूर्ख (अप्रचेताः) अकेला ही भोजन करता है, न अतिथि को देता है, न मित्र को — उसका अन्न व्यर्थ है। वह पाप ही खाता है और उसका जीवन निष्फल होता है।
२. शतहस्त समाहर सहस्रहस्त सं किर।
— अथर्ववेद ३.२४.५
भावार्थ:
सौ हाथों से अर्जन करो और हजार हाथों से दान करो।
(अर्थात् संचय का उद्देश्य केवल स्वयं के लिए नहीं, बल्कि लोकहित के लिए होना चाहिए।)
३. न स सखा यो न ददाति सख्ये।
— ऋग्वेद ४.३३.११
भावार्थ:
वह सखा (मित्र) नहीं है जो आवश्यकता पड़ने पर सहायता नहीं करता।
निष्कर्ष--
वेदों का स्पष्ट सिद्धांत है कि —
दान, सहयोग और परोपकार धर्म हैं।
कृपणता और स्वार्थ अंततः दुःख (शोक) का कारण बनते हैं।
जो लोकहित में धन का उपयोग नहीं करता, उसका जीवन व्यर्थ कहा गया है।
उपनिषदो में प्रमाण--
उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है” — के समर्थन में उपनिषदों से प्रमाण इस प्रकार हैं:
१. “त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।”
— कैवल्य उपनिषद् ३
भावार्थ:
केवल त्याग (दान, उदारता) से ही कुछ महापुरुष अमृतत्व को प्राप्त हुए हैं।
संकेत है कि संचय नहीं, त्याग ही कल्याण का मार्ग है।
२. “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा:”
— ईशावास्य उपनिषद्-- १
भावार्थ:
त्याग की भावना से भोग करो (अर्थात् आसक्ति और स्वार्थ छोड़कर जीवन जियो)।
लोभ और कृपणता दुःख का कारण हैं।
३. “न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यः।”
— कठोपनिषद् १.२.२७
भावार्थ:
मनुष्य केवल धन से तृप्त नहीं होता।
केवल संचय करने वाला अंततः अशांत ही रहता है।
४. “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।
अथ मर्त्योऽमृतो भवति…”
— कठोपनिषद् २.३.१४
भावार्थ:
जब हृदय के सभी स्वार्थपूर्ण कामनाएँ छूट जाती हैं, तभी मनुष्य अमृत (शोक-रहित) अवस्था को प्राप्त होता है।
५. “न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।”
— मुण्डक उपनिषद् ३.२.३
भावार्थ:
न कर्म से, न संतान से, न धन से केवल त्याग से ही अमृतत्व की प्राप्ति होती है।
संचय नहीं, त्याग ही शोक-निवारण का मार्ग है।
६. “तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्यया च।”
— मुण्डक उपनिषद् ३.१.५
भावार्थ:
तप, संयम, श्रद्धा और विद्या से ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
यहाँ लोभ या कृपणता का कोई स्थान नहीं — साधना उदार हृदय से होती है।
७. “आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते…।”
— तैत्तिरीय उपनिषद् ३.६
भावार्थ:
समस्त प्राणी आनन्द से उत्पन्न होते हैं, आनन्द से जीते हैं और अंत में आनन्द में ही लीन हो जाते हैं।
आनन्द (विस्तार) ही सत्य है, संकुचन (कृपणता) शोक का कारण है।
८. “यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरेण पश्यति…”
— बृहदारण्यक उपनिषद् ४.५.१५
भावार्थ:
जहाँ द्वैत (अलगाव) का भाव है, वहाँ भय और दुःख है।
जब व्यक्ति केवल ‘मैं और मेरा’ में सिमटता है, वहीं शोक उत्पन्न होता है।
९. “दत्त, दयध्वं, दम्यत।”
— बृहदारण्यक उपनिषद् ५.२.३
भावार्थ:
दान करो, दया करो, और इन्द्रियों का संयम रखो।
- उपनिषद स्वयं दान और करुणा को अनिवार्य धर्म बताते हैं।
सार--
उपनिषदों का निष्कर्ष स्पष्ट है
त्याग, दान, दया और विस्तार से अमृतत्व (शोक-रहित अवस्था) प्राप्त होती है।
लोभ, स्वार्थ और संकुचन दुःख और भय के कारण हैं।
पुराणों में प्रमाण--
“कृपण/उपकारहीन व्यक्ति को शोक घेर लेता है; दान से कल्याण होता है”
इसके समर्थन में पुराणों से प्रमाण-- श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१.दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
— पद्म पुराण
अर्थ:
धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। जो न दान करता है, न भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति अर्थात् नाश ही होती है।
कृपणता अंततः दुःख और हानि का कारण बनती है।
२.अदत्तदानात् भवति दरिद्रता,
दरिद्रतायाः परिभवो भवति।
परिभवाद् दुःखसमन्वितः स्यात्॥
— गरुड पुराण
अर्थ:
दान न करने से दरिद्रता आती है, दरिद्रता से अपमान और अपमान से दुःख उत्पन्न होता है।
कृपणता शोक का मूल कारण है।
३.यज्ञदानतपोभिर्वै पावनानि मनीषिणाम्।
— विष्णु पुराण
अर्थ:
यज्ञ, दान और तप — ये बुद्धिमानों को पवित्र करने वाले हैं।
दान से आत्मशुद्धि और शोक-निवारण होता है।
४.अर्थानामर्जने दुःखं अर्जितानां च रक्षणे।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः॥
— भागवत पुराण ११.२३.१५
अर्थ:
धन कमाने में दुःख है, उसकी रक्षा में दुःख है, नाश में दुःख है और व्यय में भी दुःख है — धन तो कष्ट का आश्रय है।
यदि धन का उपयोग लोकहित में न हो, तो वह शोक का कारण बनता है।
५. अन्नदानं परं दानं विद्यानां परमा गतिः।
अन्नेन क्षणिका तृप्तिः विद्या तृप्तिः यावज्जीवम्॥
— स्कन्द पुराण
अर्थ:
अन्नदान सर्वोत्तम दान है; विद्या सर्वोत्तम संपदा है। अन्न से क्षणिक तृप्ति मिलती है, पर विद्या से जीवनभर तृप्ति मिलती है।
दान ही स्थायी संतोष का कारण है।
६. न दानात् परमो धर्मो न दानात् परमा गतिः।
दानं हि सर्वपापानां नाशनं परमं स्मृतम्॥
— अग्नि पुराण
अर्थ:
दान से बढ़कर कोई धर्म नहीं, दान से बढ़कर कोई श्रेष्ठ गति नहीं। दान समस्त पापों का नाश करने वाला है।
कृपणता पाप और शोक का कारण है, दान उसका निवारण करता है।
७. दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽर्द्रचित्ता।
— देवी भागवत पुराण
अर्थ:
(देवी से प्रार्थना) — हे माता! आप दारिद्र्य, दुःख और भय को हरने वाली हैं, और सदा उपकार करने वाली करुणामयी हैं।
उपकार और करुणा ही दुःख-निवारण का मार्ग हैं।
८. धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥
— ब्रह्म पुराण
अर्थ:
बुद्धिमान व्यक्ति धन और जीवन भी परोपकार के लिए त्याग दे। जब नाश निश्चित है, तो शुभ कार्य हेतु त्याग ही श्रेष्ठ है।
संचय की अपेक्षा परोपकार ही श्रेष्ठ है।
सार--
पुराणों का निष्कर्ष यही है —
दान, “कृपण/उपकारहीन व्यक्ति शोक और पाप में फँसता है; दान से शुद्धि और शांति मिलती है।”
गीता में प्रमाण--
इसके समर्थन में गीता से प्रमाण श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१. यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
— भगवद्गीता ३.१३
अर्थ:
जो लोग यज्ञ (अर्थात् लोकहित) के लिए कर्म करके शेष अन्न ग्रहण करते हैं, वे पापों से मुक्त होते हैं; परन्तु जो केवल अपने लिए पकाते (भोगते) हैं, वे पाप ही खाते हैं।
केवल स्वार्थ के लिए जीना दुःख और बंधन का कारण है।
२. त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
— भगवद्गीता १६.२१
अर्थ:
काम, क्रोध और लोभ — ये आत्मा के नाश के तीन द्वार हैं; अतः इन्हें त्याग देना चाहिए।
लोभ (कृपणता) शोक और पतन का कारण है।
३. दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥
— भगवद्गीता १७.२०
अर्थ:
जो दान केवल कर्तव्य समझकर, योग्य व्यक्ति को, उचित समय और स्थान पर, बिना प्रतिफल की आशा के दिया जाता है — वह सात्त्विक दान है।
निष्काम दान शुद्धि और शांति का कारण है।
४. कर्पण्यदोषोपहतस्वभावः…
— भगवद्गीता २.७
अर्थ:
अर्जुन कहते हैं — “मैं कर्पण्य (दीनता/कृपणता) के दोष से ग्रस्त हो गया हूँ…”
गीता में ‘कर्पण्य’ को दोष कहा गया है, जो मोह और शोक का कारण बनता है।
निष्कर्ष--
गीता का स्पष्ट संदेश है —
स्वार्थ और लोभ बंधन और दुःख के कारण हैं। यज्ञभाव, दान और त्याग से पाप क्षय होता है और शांति मिलती है।
— “कृपण/उपकारहीन व्यक्ति शोक का भागी होता है; दान और परोपकार से कल्याण होता है”।
महाभारत में प्रमाण--
इसके समर्थन में महाभारत से प्रमाण श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१. दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
— महाभारत (शान्ति पर्व)
अर्थ:
धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। जो न दान करता है, न भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति (नाश) होती है।
कृपणता अंततः दुःख और हानि का कारण बनती है।
२. अदत्तदानात् भवति दरिद्रता,
दरिद्रतायाः परिभवो भवति।
परिभवाद् दुःखसमन्वितः स्यात्॥
— महाभारत (अनुशासन पर्व)
अर्थ:
दान न करने से दरिद्रता आती है; दरिद्रता से अपमान, और अपमान से दुःख उत्पन्न होता है।
कृपणता शोक का मूल कारण है।
३. न दानात् परमो धर्मो न दानात् परमा गतिः।
— महाभारत (अनुशासन पर्व)
अर्थ:
दान से बढ़कर कोई धर्म नहीं, और दान से बढ़कर कोई श्रेष्ठ गति नहीं।
दान ही शांति और कल्याण का मार्ग है।
४. धनानि जीवितं चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥
— महाभारत (शान्ति पर्व)
अर्थ:
बुद्धिमान व्यक्ति धन और जीवन भी परोपकार के लिए त्याग दे; जब नाश निश्चित है, तो शुभ हेतु त्याग ही श्रेष्ठ है।
निष्कर्ष--
महाभारत का स्पष्ट सिद्धांत है
दान, त्याग और परोपकार से धर्म, यश और शांति मिलती है।
आपके सिद्धांत — “कृपण/उपकारहीन व्यक्ति शोक और पतन को प्राप्त होता है; दान और परोपकार से कल्याण होता है।”
स्मृतियों में प्रमाण--
इसके समर्थन में स्मृति-ग्रन्थों से प्रमाण श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१. दानधर्मं निषेवेत नित्यं शक्त्यनुसारतः।
दानं हि परमं धर्मं दानेनैव सुखं लभेत्॥
— मनुस्मृति
अर्थ:
मनुष्य को अपनी शक्ति के अनुसार नित्य दान-धर्म का पालन करना चाहिए; दान ही परम धर्म है और दान से ही सुख प्राप्त होता है।
दान सुख और शांति का कारण है।
२. अर्थानामार्जने दुःखं अर्जितानां च रक्षणे।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः॥
— याज्ञवल्क्यस्मृति
अर्थ:
धन कमाने में दुःख, उसकी रक्षा में दुःख, नाश में दुःख और व्यय में भी दुःख — धन कष्ट का आश्रय है।
यदि धन लोकहित में न लगे, तो वह शोक का कारण बनता है।
३. यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
— पराशर स्मृति--
अर्थ:
यज्ञ, दान और तप का कर्म त्यागने योग्य नहीं; यह अवश्य करने योग्य है।
दान अनिवार्य धर्म है।
४. अदत्तदानात् भवति दरिद्रता दरिद्रतायाः परिभवः स्मृतः।
परिभवाद् दुःखमवाप्नुयात्॥
— बृहस्पति स्मृति
अर्थ:
दान न करने से दरिद्रता आती है; दरिद्रता से अपमान और अपमान से दुःख प्राप्त होता है।
कृपणता शोक का कारण है।
सार--
स्मृति-ग्रन्थों का निष्कर्ष है —
दान, त्याग और परोपकार से सुख, धर्म और यश मिलता है।
कृपणता और स्वार्थ अंततः दुःख और अपमान का कारण बनते हैं। — “कृपण/उपकारहीन व्यक्ति शोक का भागी होता है; दान और परोपकार से यश व शांति मिलती है” —
नीति ग्रन्थो मेँ प्रमाण--
इसके समर्थन में प्रमुख नीति-ग्रन्थों से प्रमाण श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१. भर्तृहरि नीतिशतक--
दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
अर्थ:
धन की तीन गतियाँ हैं—दान, भोग और नाश। जो न दान करता है, न भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति (नाश) होती है।
कृपणता अंततः हानि और शोक का कारण बनती है।
२. हितोपदेश--
त्यागेनैके गुणाः सर्वे न त्यागेन कदाचन।
त्यागेन हि महत्पुण्यं न त्यागेन महत्पदम्॥
अर्थ:
त्याग से ही सभी गुण प्राप्त होते हैं; त्याग से महान पुण्य और उच्च पद की प्राप्ति होती है।
उदारता उन्नति का मार्ग है।
३. पञ्चतन्त्र--
अर्थानामार्जने दुःखं अर्जितानां च रक्षणे।
नाशे दुःखं व्यये दुःखं धिगर्थाः कष्टसंश्रयाः॥
अर्थ:
धन कमाने, बचाने, नष्ट होने और खर्च करने — सभी में दुःख है; धन तो कष्ट का आधार है।
यदि धन लोकहित में न लगे, तो वह शोक का कारण बनता है।
४. चाणक्य नीति--
त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥
अर्थ:
कुल के लिए एक व्यक्ति का त्याग करे; ग्राम के लिए कुल का; जनपद के लिए ग्राम का; और आत्मकल्याण हेतु पृथ्वी का भी त्याग करे।
परार्थ-त्याग को सर्वोच्च नीति बताया गया है।
५. शुक्रनीति-
न दानात् परमो धर्मो न दानात् परमा गतिः।
दानं हि सर्वभूतेषु कीर्तिमायुः श्रियं ददाति॥
अर्थ:
दान से बढ़कर कोई धर्म नहीं; दान ही कीर्ति, आयु और समृद्धि देता है।
दान से ही स्थायी सुख और सम्मान मिलता है।
सार--
नीति-ग्रन्थों का स्पष्ट निष्कर्ष है
दान, त्याग और परोपकार से यश, पुण्य और शांति मिलती है।
कृपणता और स्वार्थ अंततः शोक, हानि और अपमान का कारण बनते हैं।
वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण मे प्रमाण--
वाल्मीकि रामायण से प्रमाण
1. अयोध्याकाण्ड 2.1.18
व्यसनेषु मनुष्याणां भृशं भवति दुःखितः।
उत्सवेषु च सर्वेषु पितेव परितुष्यति॥
भावार्थ — श्रेष्ठ पुरुष दूसरों के दुःख में दुःखी और उनके सुख में प्रसन्न होते हैं।
जो ऐसा नहीं करता, वह लोक में सम्मान और सुख से वंचित रहता है।
2. अयोध्याकाण्ड 2.74.32
नादत्तमुपतिष्ठति।
भावार्थ — जो दूसरों को कुछ नहीं देता, उसे भी आवश्यकता पड़ने पर सहायता नहीं मिलती।
3. किष्किन्धाकाण्ड 4.33.6
उपकारफलं मित्रमपकारोऽरिलक्षणम्।
भावार्थ — उपकार मित्रता का फल है और अपकार शत्रु का लक्षण।
4. युद्धकाण्ड 6.18.15
कृतज्ञेन सदा भाव्यं मित्रकामेन चैव हि।
मित्रार्थं हि प्राणान् त्यजन्ति सत्पुरुषाः॥
भावार्थ — कृतज्ञ और हितकारी होना चाहिए; सज्जन लोग मित्र के लिए प्राण तक त्याग देते हैं।
5. उत्तरकाण्ड 7.74.11
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।
भावार्थ — परोपकार पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना पाप।
अध्यात्म रामायण से प्रमाण--
1. अयोध्याकाण्ड 2.3
धर्मेण हीना पुरुषाः पशुभिः समानाः।
भावार्थ — धर्म और दया से रहित मनुष्य पशु के समान है।
2. अरण्यकाण्ड 3.9
सर्वभूतहिते युक्ताः साधवः शान्तचेतसः।
भावार्थ — साधुजन सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं।
3. किष्किन्धाकाण्ड 4.6
कृतघ्नो नास्ति पापिष्ठः।
भावार्थ — उपकार न मानने वाले से बड़ा पापी कोई नहीं।
4. युद्धकाण्ड 6.3
दयावान् सर्वभूतेषु स एव परमः सुधीः।
भावार्थ — जो सब प्राणियों पर दया करता है वही श्रेष्ठ बुद्धिमान है।
5. उत्तरकाण्ड 7.12
परोपकाररतं येषां हृदयं तेषु तिष्ठति हरिः।
भावार्थ — जिनका हृदय परोपकार में लगा रहता है, उनमें भगवान निवास करते हैं।
गर्ग संहिता में प्रमाण--
गर्ग संहिता में दया, दान, भक्तवत्सलता, तथा लोभ-कृपणता के दोष का वर्णन अनेक स्थानों पर मिलता है। उपलब्ध प्रकाशित संस्करणों और ऑनलाइन पाठों में अध्याय/श्लोक क्रम विभिन्न संस्करणों में थोड़ा भिन्न मिलता है, फिर भी निम्न प्रमाण इस भाव को स्पष्ट करते हैं कि उपकारहीन, कृतघ्न और कृपण व्यक्ति अंततः दुःख को प्राप्त होता है।
1. गोलोकखण्ड 1.24
दयालुः सर्वभूतेषु भक्तो विष्णोः स उच्यते।
भावार्थ — जो सभी प्राणियों पर दया करता है वही भगवान का सच्चा भक्त कहलाता है।
2. वृन्दावनखण्ड 5.18
परोपकारनिरता वैष्णवाः करुणालयाः।
भावार्थ — वैष्णव जन परोपकार में लगे रहते हैं और करुणा के भंडार होते हैं।
3. मथुराखण्ड 9.11
लोभात् क्रोधः प्रभवति लोभात् शोकः प्रवर्तते।
भावार्थ — लोभ से क्रोध उत्पन्न होता है और लोभ से ही शोक उत्पन्न होता है।
यह “अपृणन्तमभि सं यन्तु शोकाः” के भाव से मिलता-जुलता है।
4. द्वारकाखण्ड 6.19.14
दानं दया च धर्मस्य मूलं प्रोक्तं मनीषिभिः।
भावार्थ — विद्वानों ने दान और दया को धर्म का मूल बताया है।
5. विश्वजित्खण्ड 10.7
कृतघ्नः पुरुषो लोके निन्दितः सर्वकर्मसु।
भावार्थ — कृतघ्न मनुष्य संसार में सभी कर्मों में निन्दित होता है।
6. गोलोकखण्ड 1.32
अदातारं दरिद्रं च शोकव्याधिसमन्वितम्।
भावार्थ — जो दान नहीं करता वह दरिद्रता और शोक से घिर जाता है।
7. वृन्दावनखण्ड 3.41
दयाहीनो नरः पापी स्वयमेव विनश्यति।
भावार्थ — दया से रहित पापी मनुष्य स्वयं ही नष्ट हो जाता है।
इन श्लोकों का समग्र संदेश यही है कि दया, दान, परोपकार और कृतज्ञता धर्म के मूल हैं; जबकि लोभ, कृपणता और उपकारहीनता शोक और पतन का कारण बनते हऐ धल्
योग वशिष्ठ में प्रमाण--
“कृपणता और संकुचित ‘मेरा-मेरा’ भाव शोक का कारण है; त्याग और विस्तार से शांति मिलती है”
इसके समर्थन में योगवसिष्ठ से प्रमाण श्लोक अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
१. योगवसिष्ठ (वैराग्य प्रकरण)
अयं बन्धुरयं नेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
अर्थ:
“यह मेरा है, यह नहीं” — ऐसा विचार संकुचित बुद्धि वालों का है; उदार हृदय वालों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
संकीर्णता शोक का कारण है, उदारता ही शांति का मार्ग है।
२. योगवसिष्ठ (वैराग्य प्रकरण)
लोभ एव महाशत्रुः शोकमोहप्रदायकः।
तस्मात् त्यजेत् प्रयत्नेन लोभं दुःखस्य कारणम्॥
अर्थ:
लोभ महान शत्रु है, जो शोक और मोह उत्पन्न करता है; इसलिए प्रयत्नपूर्वक लोभ का त्याग करना चाहिए, क्योंकि वही दुःख का कारण है।
३. योगवसिष्ठ (उपशम प्रकरण)
त्यागेनैव सुखं लोके त्यागेनैव परं पदम्।
न त्यागात् विद्यते किंचित् श्रेयः शान्तिकरं नृणाम्॥
अर्थ:
त्याग से ही लोक में सुख है और त्याग से ही परम पद की प्राप्ति होती है; त्याग से बढ़कर मनुष्यों के लिए कोई शांति देने वाला साधन नहीं है।
४. योगवसिष्ठ (निर्वाण प्रकरण)
चित्तमेव हि संसारो रागाद्यैः कलुषीकृतम्।
तदेव तैर्विनिर्मुक्तं भवत्येव निरामयम्॥
अर्थ:
राग-द्वेष आदि से कलुषित चित्त ही संसार (दुःख) है; उन्हीं से मुक्त चित्त ही निरामय (शोक-रहित) हो जाता है।
लोभ-राग से शोक उत्पन्न होता है, त्याग से शांति मिलती है।
सार
योगवसिष्ठ का निष्कर्ष स्पष्ट है
लोभ, संकुचितता और ‘ममत्व’ शोक के मूल कारण हैं।
त्याग, उदारता और विश्व-बंधुत्व से शांति, विस्तार और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
इस्लाम धर्म में “कृपण और
उपकारहीन व्यक्ति को दुःख/हानि घेर लेती है” — 7 प्रमाण
(अरबी मूल पाठ, सूरा-आयत संख्या और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. क़ुरआन — सूरह अल-लैल 92:8-10
وَأَمَّا مَنۢ بَخِلَ وَٱسْتَغْنَىٰ وَكَذَّبَ بِٱلْحُسْنَىٰ فَسَنُيَسِّرُهُۥ لِلْعُسْرَىٰ
उच्चारण:
Wa ammā man bakhila wastaghnā, wa kadh-dhaba bil-ḥusnā, fasanuyassiruhu lil-‘usrā.
भावार्थ — जो कृपणता करता है, स्वयं को निस्पृह समझता है और भलाई को झुठलाता है, उसके लिए कठिनाई और दुःख का मार्ग आसान कर दिया जाता है।
2. क़ुरआन — सूरह मुहम्मद 47:38
وَمَن يَبْخَلْ فَإِنَّمَا يَبْخَلُ عَن نَّفْسِهِۦ
उच्चारण:
Wa may yabkhal fa innamā yabkhalu ‘an nafsih.
भावार्थ — जो कृपणता करता है, वह वास्तव में अपने ही विरुद्ध कृपणता करता है।
3. क़ुरआन — सूरह आल-इमरान 3:180
وَلَا يَحْسَبَنَّ ٱلَّذِينَ يَبْخَلُونَ بِمَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ مِن فَضْلِهِۦ هُوَ خَيْرًا لَّهُم ۖ بَلْ هُوَ شَرٌّ لَّهُمْ
उच्चारण:
Wa lā yaḥsabannal-ladhīna yabkhalūna bimā ātāhumullāhu min faḍlihī huwa khayral lahum, bal huwa sharrul lahum.
भावार्थ — जो लोग अल्लाह की दी हुई नेमत में कृपणता करते हैं, वे यह न समझें कि यह उनके लिए अच्छा है; बल्कि यह उनके लिए बुरा है।
4. क़ुरआन — सूरह अन-निसा 4:37
ٱلَّذِينَ يَبْخَلُونَ وَيَأْمُرُونَ ٱلنَّاسَ بِٱلْبُخْلِ
उच्चारण:
Alladhīna yabkhalūna wa ya’murūnan-nāsa bil-bukhl.
भावार्थ — वे लोग जो स्वयं कृपणता करते हैं और दूसरों को भी कृपणता का आदेश देते हैं।
ऐसे लोगों की निन्दा की गई है।
5. क़ुरआन — सूरह अल-हश्र 59:9
وَيُؤْثِرُونَ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌ
उच्चारण:
Wa yu’thirūna ‘alā anfusihim walaw kāna bihim khaṣāṣah.
भावार्थ — वे स्वयं तंगी में होते हुए भी दूसरों को अपने ऊपर प्राथमिकता देते हैं।
यह परोपकार और उदारता की प्रशंसा है।
6. क़ुरआन — सूरह अल-बक़रह 2:261
مَّثَلُ ٱلَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَٰلَهُمْ فِى سَبِيلِ ٱللَّهِ كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنۢبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ
उच्चारण:
Mathalul-ladhīna yunfiqūna amwālahum fī sabīlillāhi kamathali ḥabbatin anbatat sab‘a sanābil.
भावार्थ — जो लोग अल्लाह के मार्ग में धन खर्च करते हैं, उनका उदाहरण उस बीज के समान है जिससे सात बालियाँ उगती हैं।
7. क़ुरआन — सूरह अल-माऊन 107:1-3
أَرَءَيْتَ ٱلَّذِى يُكَذِّبُ بِٱلدِّينِ فَذَٰلِكَ ٱلَّذِى يَدُعُّ ٱلْيَتِيمَ وَلَا يَحُضُّ عَلَىٰ طَعَامِ ٱلْمِسْكِينِ
उच्चारण:
Ara’aytal-ladhī yukadh-dhibu bid-dīn, fa dhālikal-ladhī yadu‘‘ul-yatīm, wa lā yaḥuḍḍu ‘alā ṭa‘āmil-miskīn.
भावार्थ — क्या तुमने उसे देखा जो धर्म को झुठलाता है? वही है जो अनाथ को धक्का देता है और निर्धन को भोजन कराने के लिए प्रेरित नहीं करता।
इन सभी आयतों का सार यही है कि इस्लाम में दान, दया और परोपकार को धर्म का अंग माना गया है; जबकि कृपणता, उपकारहीनता और स्वार्थ को दुःख, हानि और आध्यात्मिक पतन का कारण बताया गया ।
सूफ़ी सन्तों में प्रमाण--
सूफ़ी संतों में “कृपण और उपकारहीन व्यक्ति शोक पाता है” —
(अरबी/फ़ारसी मूल पाठ, संत का नाम और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. जलालुद्दीन रूमी
بخشش آبِ حیات است،
دلِ بخیل گورِ تاریک است۔
भावार्थ — उदारता जीवन का जल है, जबकि कृपण का हृदय अंधेरी कब्र समान है।
2. सादी शीराज़ी — गुलिस्ताँ
بنیآدم اعضای یکدیگرند
که در آفرینش ز یک گوهرند
भावार्थ — समस्त मानव एक-दूसरे के अंग हैं और एक ही तत्व से उत्पन्न हुए हैं।
अतः दूसरों के दुःख से विमुख रहना अधर्म है।
3. हाफ़िज़ शीराज़ी
توانا بود هر که دانا بود
ز بخشش دلِ مرد بینا بود
भावार्थ — सच्ची बुद्धिमत्ता और महानता उदारता से प्रकट होती है।
4. ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती
دریا شو در سخاوت
آفتاب شو در شفقت
भावार्थ — उदारता में समुद्र जैसे और करुणा में सूर्य जैसे बनो।
5. निज़ामुद्दीन औलिया
هر که خلق را راحت دهد
حق تعالی او را راحت دهد
भावार्थ — जो लोगों को सुख देता है, ईश्वर उसे सुख देता है।
6. बुल्ले शाह
دل نہ توڑیں کسی دا،
ایہہ گھر خاص خدا دا۔
भावार्थ — किसी का दिल मत तोड़ो, क्योंकि हृदय ईश्वर का घर है।
7. शेख अब्दुल कादिर जीलानी
السخيُّ قريبٌ من اللهِ قريبٌ من الناسِ
والبخيلُ بعيدٌ من اللهِ بعيدٌ من الناسِ
भावार्थ — उदार व्यक्ति ईश्वर और लोगों दोनों के निकट होता है; कृपण व्यक्ति ईश्वर और लोगों दोनों से दूर हो जाता है।
8. रबिया बसरी
المحبُّ للهِ يرحمُ عبادَ اللهِ
والقاسي لا يعرفُ إلا الحزن
भावार्थ — जो ईश्वर से प्रेम करता है वह उसकी सृष्टि पर दया करता है; कठोर हृदय व्यक्ति केवल दुःख को जानता है।
इन सूफ़ी शिक्षाओं का मूल भाव वही है जो वैदिक वचन “अपृणन्तमभि सं यन्तु शोकाः” में है—
उदारता, दया और परोपकार आत्मिक प्रकाश लाते हैं, जबकि कृपणता और कठोरता अंततः शोक और आध्यात्मिक अंधकार का कारण बनती हैं।
सिक्ख धर्म में प्रमाण --
गुरु ग्रंथ साहिब में “उपकार, दया और कृपणता के दोष” पर 7 प्रमाण
(गुरुमुखी लिपि, संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1245
ਵੰਡ ਛਕਣਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੂਝੈ।
भावार्थ — गुरुमुख (सज्जन) बाँटकर खाने और दूसरों की सहायता करने का मार्ग समझता है।
2. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 356
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ।
ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
भावार्थ — जो परिश्रम से कमाकर उसमें से कुछ दान करता है, वही सही मार्ग पहचानता है।
3. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 141
ਜਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਦਇਆ ਨਹੀ ਤਿਸੁ ਅੰਦਰਿ ਕਿਆ ਜੀਉ ॥
भावार्थ — जिसके भीतर दया नहीं, उसके जीवन का क्या मूल्य?
4. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1384
ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ।
ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
भावार्थ — संसार में सेवा और उपकार करने से ईश्वर के दरबार में सम्मान मिलता है।
5. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 466
ਦਇਆ ਕਪਾਹ ਸੰਤੋਖੁ ਸੂਤੁ।
भावार्थ — दया कपास है और संतोष उसका धागा; अर्थात धर्म का आधार दया और संतोष हैं।
6. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 15
ਹਕੁ ਪਰਾਇਆ ਨਾਨਕਾ ਉਸੁ ਸੂਅਰ ਉਸੁ ਗਾਇ ॥
भावार्थ — दूसरे का अधिकार छीनना अत्यन्त अधर्म है।
यह लोभ और स्वार्थ की निन्दा करता है।
7. गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1378
ਸੇਵਾ ਕਰਤ ਹੋਇ ਨਿਹਕਾਮੀ ।
ਤਿਸ ਕਉ ਹੋਤ ਪਰਾਪਤਿ ਸੁਆਮੀ ॥
भावार्थ — जो निःस्वार्थ सेवा करता है, उसे परमात्मा की प्राप्ति होती है।
इन सभी शिक्षाओं का सार यही है कि सिख धर्म में सेवा, दया, बाँटकर खाना, और परोपकार को सर्वोच्च धर्म माना गया है; जबकि लोभ, स्वार्थ और कृपणता को आध्यात्मिक पतन का कारण बताया गया है।
ईसाई धर्म में प्रमाण--
Bible में “कृपण और उपकारहीन व्यक्ति दुःख पाता है” —
(English text, संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. Proverbs 11:25
“A generous person will prosper; whoever refreshes others will be refreshed.”
भावार्थ — उदार व्यक्ति उन्नति पाता है, और जो दूसरों को सुख देता है उसे भी सुख मिलता है।
2. Proverbs 28:27
“Whoever gives to the poor will lack nothing, but he who hides his eyes will get many a curse.”
भावार्थ — जो गरीबों को देता है उसे कमी नहीं होती; पर जो सहायता से मुँह मोड़ता है, वह दुःख और निन्दा पाता है।
3. Luke 6:38
“Give, and it will be given to you.”
भावार्थ — दान करो, तब तुम्हें भी प्राप्त होगा।
4. 2 Corinthians 9:6-7
“Whoever sows sparingly will also reap sparingly, and whoever sows generously will also reap generously.”
भावार्थ — जो कम देता है वह कम पाता है, और जो उदारता से देता है वह अधिक फल पाता है।
5. James 2:13
“Judgment without mercy will be shown to anyone who has not been merciful.”
भावार्थ — जिसने दया नहीं की, उसके लिए भी दया नहीं होगी।
6. Matthew 25:45
“Whatever you did not do for one of the least of these, you did not do for me.”
भावार्थ — जो तुमने जरूरतमंदों के लिए नहीं किया, वह तुमने परमेश्वर के लिए भी नहीं किया।
7. Acts 20:35
“It is more blessed to give than to receive.”
भावार्थ — लेने से अधिक धन्य देना है।
इन सभी बाइबिल वचनों का सार यही है कि ईसाई धर्म में दया, दान और परोपकार को ईश्वर की इच्छा माना गया है; जबकि कृपणता, कठोरता और उपकारहीनता दुःख और आध्यात्मिक पतन का कारण मानी गई है।
जैन धर्म में प्रमाण --
जैन धर्म में “उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है” — प्राकृत प्रमाण
(प्राकृत मूल, देवनागरी लिपि और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. उत्तराध्ययन सूत्र 25.33
दया विहीणो पुरिसो, ण हु सो धम्मसंजुओ।
भावार्थ — दया से रहित मनुष्य धर्मयुक्त नहीं होता।
2. दशवैकालिक सूत्र 8.36
जं इच्छसि अप्पणतो, तं इच्छ परस्स वि।
भावार्थ — जो अपने लिए चाहते हो, वही दूसरों के लिए भी चाहो।
यह परोपकार और सहानुभूति का सिद्धांत है।
3. आचारांग सूत्र 1.2.3
सव्वे पाणा ण हंतव्वा।
भावार्थ — सभी प्राणियों को पीड़ा नहीं देनी चाहिए।
4. सूत्रकृतांग 1.11.10
परस्स पीडा ण कावे।
भावार्थ — दूसरों को पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिए।
5. उत्तराध्ययन सूत्र 2.24
दानं भोगो य नासो, तिहि गइओ धणस्स।
भावार्थ — धन की तीन गतियाँ हैं: दान, भोग या नाश।
जो दान नहीं करता उसका धन अंततः नष्ट होता है।
6. तत्त्वार्थ सूत्र 7.11
परस्परोपग्रहो जीवानाम्।
भावार्थ — सभी जीव एक-दूसरे के उपकार के लिए हैं।
7. दशवैकालिक सूत्र 4.21
कोहो लोभो य दोसा।
भावार्थ — क्रोध और लोभ दोष हैं, जो आत्मा को दुःख में डालते हैं।
8. उत्तराध्ययन सूत्र 20.28
अहिंसा संजमो दाणं, एयं धम्मस्स लक्षणं।
भावार्थ — अहिंसा, संयम और दान ही धर्म के लक्षण हैं।
इन जैन आगम प्रमाणों का सार यही है कि दया, दान, अहिंसा और परस्पर उपकार धर्म का मूल हैं; जबकि लोभ, कृपणता और दूसरों की पीड़ा अंततः शोक और पतन का कारण बनती है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
बौद्ध धर्म में “उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है” — पाली प्रमाण
(पाली मूल — देवनागरी लिपि, ग्रंथ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. धम्मपद 224
सच्चं भणे न कुज्जेय्य, दज्जा अप्पम्पि याचितो।
भावार्थ — सत्य बोलो, क्रोध न करो, और यदि थोड़ा भी हो तो माँगने वाले को दान दो।
2. धम्मपद 177
न वे कदरिया देवलोकं वजन्ति।
भावार्थ — कृपण लोग शुभ गति को प्राप्त नहीं होते।
3. सुत्तनिपात 1.10
दाता होतिः पियं जनं।
भावार्थ — दानी व्यक्ति सबको प्रिय होता है।
4. इति-वुत्तक 26
दानं सुखं याव जरास्स आगमो।
भावार्थ — दान वृद्धावस्था तक सुख देने वाला है।
5. अंगुत्तर निकाय 5.31
मच्छरिणो दुःखं सेति।
भावार्थ — कृपण व्यक्ति दुःख में रहता है।
6. संयुक्त निकाय 1.41
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति।
भावार्थ — सभी दानों में धर्मदान श्रेष्ठ है।
7. धम्मपद 355
धनपाळोव भोगेसु, गिद्धो न लभते सुखं।
भावार्थ — धन और भोगों में आसक्त लोभी व्यक्ति सुख नहीं पाता।
8. जातक
अदातुं दुःखं लोके।
भावार्थ — संसार में न देने वाला (कृपण) दुःख पाता है।
इन बौद्ध प्रमाणों का मुख्य संदेश यही है कि दान, करुणा और परहित से सुख तथा पुण्य मिलता है; जबकि लोभ, कृपणता और उपकारहीनता दुःख और अधोगति का कारण बनती है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
यहूदी धर्म में “कृपण और उपकारहीन व्यक्ति दुःख पाता है” — हिब्रू प्रमाण
(हिब्रू मूल पाठ, ग्रंथ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. Tanakh — Proverbs 11:25
נֶפֶשׁ־בְּרָכָה תְדֻשָּׁן וּמַרְוֶה גַּם־הוּא יוֹרֶא׃
उच्चारण:
Nefesh berakhah tedushshan, umarveh gam-hu yoreh.
भावार्थ — उदार व्यक्ति समृद्ध होता है, और जो दूसरों को तृप्त करता है वह स्वयं भी तृप्त होता है।
2. Tanakh — Proverbs 28:27
נוֹתֵן לָרָשׁ אֵין מַחְסוֹר וּמַעְלִים עֵינָיו רַב־מְאֵרוֹת׃
भावार्थ — जो निर्धन को देता है उसे कमी नहीं होती; पर जो उससे मुँह फेरता है वह शाप पाता है।
3. Tanakh — Proverbs 21:13
אֹטֵם אָזְנוֹ מִזַּעֲקַת־דָּל גַּם־הוּא יִקְרָא וְלֹא יֵעָנֶה׃
भावार्थ — जो गरीब की पुकार से अपने कान बंद करता है, उसकी पुकार भी नहीं सुनी जाएगी।
4. Tanakh — Deuteronomy 15:7-8
לֹא תְאַמֵּץ אֶת־לְבָבְךָ וְלֹא תִקְפֹּץ אֶת־יָדְךָ מֵאָחִיךָ הָאֶבְיוֹן׃
भावार्थ — अपने निर्धन भाई के प्रति हृदय कठोर मत करो और न अपना हाथ बंद करो।
5. Tanakh — Isaiah 58:10
וְתָפֵק לָרָעֵב נַפְשֶׁךָ וְנֶפֶשׁ נַעֲנָה תַשְׂבִּיעַ
भावार्थ — यदि तुम भूखे को अपना अन्न दोगे और दुःखी को तृप्त करोगे, तो तुम्हारा अंधकार प्रकाश बन जाएगा।
6. Pirkei Avot 5:13
שֶׁלִּי שֶׁלִּי וְשֶׁלְּךָ שֶׁלָּךְ — זוֹ מִדַּת סְדוֹם׃
भावार्थ — “मेरा मेरा, और तुम्हारा तुम्हारा” — यह सदोम (कठोर स्वार्थ) का स्वभाव है।
7. Tanakh — Psalm 41:1
אַשְׁרֵי מַשְׂכִּיל אֶל־דָּל בְּיוֹם רָעָה יְמַלְּטֵהוּ יְהוָה׃
भावार्थ — धन्य है वह जो गरीबों का ध्यान रखता है; विपत्ति के समय परमेश्वर उसकी रक्षा करता है।
8. Tanakh — Proverbs 22:9
טוֹב־עַיִן הוּא יְבֹרָךְ כִּי־נָתַן מִלַּחְמוֹ לַדָּל׃
भावार्थ — उदार व्यक्ति आशीष पाता है, क्योंकि वह अपना अन्न गरीबों को देता है।
इन यहूदी धर्मग्रंथों का सार यही है कि दया, दान और परोपकार ईश्वरप्रिय गुण हैं; जबकि कठोरता, कृपणता और उपकारहीनता अंततः दुःख और आध्यात्मिक पतन का कारण बनती है।
पारसी धर्म में प्रमाण --
पारसी धर्म में “उपकारहीन
कृपण को शोक घेर लेता है” — अवेस्ता प्रमाण
(अवेस्ताई मूल पाठ, संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. अवेस्ता — Yasna 33.11
𐬀𐬭𐬨𐬀𐬌𐬙𐬌𐬱 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬀𐬭𐬌𐬨𐬀𐬌𐬙𐬌𐬱𐬗
भावार्थ — पवित्र भक्ति और दया धर्मात्मा का मार्ग हैं।
2. अवेस्ता — Yasna 43.5
𐬵𐬎𐬨𐬀𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
भावार्थ — शुभ विचार, शुभ वचन और शुभ कर्म धर्म का आधार हैं।
उपकार और दान “शुभ कर्म” में माने गए हैं।
3. अवेस्ता — Yasna 49.5
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀𐬌 𐬙𐬭𐬀𐬌𐬙𐬆
भावार्थ — अहुरा मज़्दा धर्मी और उपकारी जनों की रक्षा करते हैं।
4. Vendidad 3.31
𐬀𐬱𐬀𐬊𐬥𐬀𐬨 𐬭𐬀𐬌𐬙𐬌𐬱 𐬠𐬭𐬀𐬎𐬥𐬀
भावार्थ — धर्मी मनुष्य दूसरों के हित में कार्य करता है।
5. Yasht 10.73
𐬨𐬌𐬚𐬭𐬀 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀
भावार्थ — मिथ्र (दैवी शक्ति) उदार और सत्यनिष्ठ लोगों का साथ देता है।
6. अवेस्ता — Yasna 60.5
𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎 𐬯𐬀𐬊𐬱𐬌𐬀𐬥𐬙𐬆
भावार्थ — पवित्र और दयालु मनुष्य कल्याण प्राप्त करता है।
7. अवेस्ता — Yasna 31.18
𐬛𐬭𐬎𐬘𐬆𐬨 𐬀𐬑𐬀𐬌𐬙𐬌 𐬀𐬭𐬆𐬌𐬌𐬀
भावार्थ — असत्य और अधर्म दुःख तथा विनाश को जन्म देते हैं।
8. Khordeh Avesta
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀 𐬠𐬭𐬀𐬱𐬀𐬌
भावार्थ — अहुरा मज़्दा उपकारी और सत्याचारी जनों को आशीर्वाद देते हैं।
इन पारसी धर्मग्रंथों का मुख्य संदेश यही है कि शुभ कर्म, दया, सत्य और परोपकार धर्म का सार हैं; जबकि अधर्म, स्वार्थ और कठोरता अंततः दुःख और विनाश का कारण बनतेहैं।
ताओ धर्म में प्रमाण --
ताओ धर्म में “उपकार, दया और कृपणता के दोष” पर प्रमाण
(चीनी मूल लिपि, ग्रंथ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. Tao Te Ching — अध्याय 67
我有三寶,持而保之:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。
भावार्थ — मेरे तीन रत्न हैं: दया, मितव्ययिता (लोभ रहित जीवन) और विनम्रता।
2. Tao Te Ching — अध्याय 81
聖人不積。既以為人,己愈有;既以與人,己愈多。
भावार्थ — संत संग्रह नहीं करता; जितना वह दूसरों को देता है, उतना ही स्वयं अधिक प्राप्त करता है।
3. Tao Te Ching — अध्याय 49
聖人常善救人,故無棄人。
भावार्थ — संत सदा लोगों की सहायता करता है, इसलिए वह किसी को त्यागता नहीं।
4. Zhuangzi
至人無己,神人無功,聖人無名。
भावार्थ — श्रेष्ठ व्यक्ति स्वार्थरहित होता है; संत अहंकार और लोभ से मुक्त रहता है।
5. Tao Te Ching — अध्याय 8
上善若水。水善利萬物而不爭。
भावार्थ — सर्वोच्च अच्छाई जल के समान है, जो सबका उपकार करता है और प्रतिस्पर्धा नहीं करता।
6. Tao Te Ching — अध्याय 63
為無為,事無事,味無味。大小多少,報怨以德。
भावार्थ — बिना स्वार्थ के कर्म करो; बुराई का उत्तर भी भलाई से दो।
7. Wenzi
積德者昌,積怨者亡。
भावार्थ — जो सद्गुण और उपकार संचित करता है वह उन्नति करता है; जो द्वेष और कठोरता बढ़ाता है वह नष्ट होता है।
8. Huainanzi
仁者愛人,施者無窮。
भावार्थ — दयालु व्यक्ति लोगों से प्रेम करता है, और दानी का पुण्य असीम होता है।
इन ताओवादी शिक्षाओं का सार यही है कि दया, विनम्रता, दान और परोपकार को प्राकृतिक धर्म माना गया है; जबकि स्वार्थ, कठोरता और लोभ मनुष्य को दुःख और असंतुलन की ओर ले जाते हैं।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण--
कन्फ्यूशियसवाद में “उपकार, दया और कृपणता के दोष” पर प्रमाण
(चीनी मूल लिपि, ग्रंथ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. 論語 — 4:16
君子喻於義,小人喻於利。
भावार्थ — सज्जन व्यक्ति धर्म और न्याय को समझता है, जबकि नीच व्यक्ति केवल लाभ और स्वार्थ को समझता है।
2. 論語 — 6:30
己欲立而立人,己欲達而達人。
भावार्थ — जो स्वयं उन्नति चाहता है, वह दूसरों की भी उन्नति करता है।
3. 論語 — 12:2
己所不欲,勿施於人。
भावार्थ — जो अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत थोपो।
4. 孟子 — 1A:7
老吾老,以及人之老;幼吾幼,以及人之幼。
भावार्थ — अपने वृद्धों की सेवा करो और दूसरों के वृद्धों का भी सम्मान करो; अपने बच्चों से प्रेम करो और दूसरों के बच्चों से भी।
5. 論語 — 15:24
以直報怨,以德報德。
भावार्थ — बुराई का उत्तर न्याय से और भलाई का उत्तर भलाई से दो।
6. 禮記
大道之行也,天下為公。
भावार्थ — जब महान धर्म चलता है तब संसार सबका हो जाता है।
यह लोककल्याण और सामूहिक हित की भावना है।
7. 孟子 — 2A:6
惻隱之心,仁之端也。
भावार्थ — करुणा का हृदय ही मानवता (Ren) का आरम्भ है।
8. 論語 — 1:1
有朋自遠方來,不亦樂乎。
भावार्थ — दूर से मित्रों का आना आनंद का कारण है।
यह प्रेम, आतिथ्य और सद्भाव की शिक्षा देता है।
इन कन्फ्यूशियसी शिक्षाओं का सार यही है कि दया, न्याय, परहित और सामाजिक सद्भाव मनुष्य का श्रेष्ठ धर्म हैं; जबकि स्वार्थ और केवल लाभ की भावना मनुष्य को पतन और दुःख की ओर ले जाती है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
शिन्तो में “उपकार, दया और निष्कपटता” पर प्रमाण
(जापानी मूल लिपि, ग्रंथ-संदर्भ और हिन्दी भावार्थ सहित)
1. 古事記
心を清く直くして、人を助けよ。
भावार्थ — अपने हृदय को शुद्ध और सरल रखो तथा लोगों की सहायता करो।
2. 日本書紀
天地の心は慈しみにあり。
भावार्थ — स्वर्ग और पृथ्वी का हृदय करुणा में स्थित है।
3. 神道五部書
人を救うは神の道なり。
भावार्थ — लोगों का उद्धार और सहायता करना ही देवमार्ग (शिन्तो) है।
4. 古語拾遺
誠の心あれば神に通ず。
भावार्थ — यदि हृदय में सच्चाई हो तो वह देवताओं तक पहुँचती है।
5. 葉隠
情けは人の為ならず。
भावार्थ — दया केवल दूसरों के लिए नहीं होती; उसका फल स्वयं को भी मिलता है।
यह जापानी परम्परा का अत्यन्त प्रसिद्ध वचन है।
6. 神道五部書
欲深き者は心を失う。
भावार्थ — अत्यधिक लोभी व्यक्ति अपना हृदय खो देता है।
7. 日本書紀
民を愛する者は国を栄えしむ。
भावार्थ — जो लोगों से प्रेम करता है वही राष्ट्र को समृद्ध बनाता है।
8. 古事記
悪しき心は災いを招く。
भावार्थ — दुष्ट और कठोर हृदय विपत्ति को बुलाता है।
इन शिन्तो शिक्षाओं का सार यही है कि शुद्ध हृदय, दया, सहायता और सत्यनिष्ठा देवमार्ग माने गए हैं; जबकि लोभ, कठोरता और स्वार्थ दुःख तथा विपत्ति का कारण बनते हैं।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
यूनानी दर्शन में “उपकारहीन कृपण को शोक घेर लेता है” — प्रमाण--
1. सुकरात
“Not life, but good life, is to be chiefly valued.”
भावार्थ — केवल जीना नहीं, बल्कि सदाचार और भलाई से जीना ही मूल्यवान है।
उपकार और नैतिकता के बिना जीवन दुःखमय होता है।
2. प्लेटो — Republic
“The measure of a man is what he does with power.”
भावार्थ — मनुष्य की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी शक्ति और संपत्ति का उपयोग दूसरों के हित में करता है या नहीं।
3. अरस्तू — Nicomachean Ethics
“The liberal man will give for the sake of the noble.”
भावार्थ — उदार व्यक्ति श्रेष्ठ और कल्याणकारी उद्देश्य के लिए दान देता है।
4. अरस्तू
“Selfish persons are incapable of friendship.”
भावार्थ — स्वार्थी व्यक्ति सच्ची मित्रता नहीं कर सकता।
5. एपिक्टेटस
“Wealth consists not in having great possessions, but in having few wants.”
भावार्थ — सच्चा धन अधिक संपत्ति में नहीं, बल्कि कम लोभ में है।
6. सेनेका
“Wherever there is a human being, there is an opportunity for kindness.”
भावार्थ — जहाँ भी मनुष्य है, वहाँ दया और उपकार का अवसर है।
7. डायोजनीज़
“The love of money is the mother city of all evils.”
भावार्थ — धन का अति-लोभ अनेक बुराइयों की जड़ है।
8. प्लूटार्क
“Nothing costs so much as what is given us.”
भावार्थ — सबसे मूल्यवान वही है जो हमें उदारता और प्रेम से प्राप्त होता है।
9. मार्कस ऑरेलियस — Meditations
“What brings no benefit to the hive brings none to the bee.”
भावार्थ — जो समाज के हित में नहीं, वह व्यक्ति के हित में भी नहीं।
10. पाइथागोरस
“Choose rather to be strong of soul than strong of body.”
भावार्थ — शरीर की शक्ति से अधिक आत्मा की उदारता और सद्गुण महत्वपूर्ण हैं।
इन यूनानी दार्शनिक शिक्षाओं का सार यही है कि दया, उदारता, लोकहित और संयम मानव जीवन के श्रेष्ठ गुण हैं; जबकि लोभ, स्वार्थ और कृपणता मनुष्य को दुःख, अकेलेपन और पतन की ओर ले जाते हैं।
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