ऋगुवेद सूक्ति--(१६) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति-(१६)-की व्याख्या
"मान्तः स्थूर्नो अरातयः" — १०/५७/१
भावार्थ --
हमारे अन्दर कंजूसी न हो।
पद विच्छेद --
मान्तः — भीतर, अन्तर में
स्थूः/स्थुर्नः — स्थिर न रहें, ठहरें नहीं
अरातयः — अराति = दान न करने की वृत्ति, कृपणता, शत्रुता, संकुचित भाव
शब्दार्थ--
हे देव! हमारे अन्तःकरण में अराति (कंजूसी, दान न करने की वृत्ति, संकीर्णता) स्थिर न हो।
अर्थात — मेरे भीतर कृपणता न रहे।
पूरा मन्त्र इस प्रकार है —
माऽन्तः स्थूर्नो अरातयो मा नः पापत्वाय नः ।
विश्वा नः शर्म यच्छतं दिवे-दिवे
पदार्थ
मा = न हो
अन्तः = भीतर
स्थुः/स्थूर् = स्थित हों
नः = हमारे
अरातयः = कृपणता, शत्रुता, दुष्ट वृत्तियाँ
विश्वा = सब
शर्म = सुख, कल्याण, संरक्षण
यच्छतम् = प्रदान करें
दिवे-दिवे = प्रतिदिन
भावार्थ
हमारे भीतर कृपणता, द्वेष या दुष्ट वृत्तियाँ निवास न करें।
हमें प्रतिदिन सब प्रकार का कल्याण और संरक्षण प्राप्त हो।
यह मन्त्र आन्तरिक शुद्धि, उदारता और सद्भाव की प्रार्थना है।
वेदों से प्रमाण--
१. ऋगुवेद
(क)--१०/११७/४
“केवलाघो भवति केवलादी।”
भावार्थ — जो अकेला खाता है (साझा नहीं करता), वह पाप का भागी होता है।
यहाँ कृपणता और स्वार्थ की निन्दा है।
(ख) ५/६१/५
"अदातारं परित्यजैत"
भावार्थ --जो दान न दे, उसका त्याग करो।
वेद में दानी पुरुष की प्रशंसा है और कृपण की निन्दा की गई है।
समाज में कंजूस का सम्मान नही।
आपके मन्त्र “मान्तः स्थूर्नो अरातयः” (Rigveda १०.५७.१) — हमारे भीतर अराति (कृपणता/अदानशीलता) स्थिर न हो। इसके समर्थन में ऋग्वेद से ही दस श्लोक (मन्त्र) सहित प्रमाण हेतु प्रस्तुत हैं--
(१) ऋग्वेद १०.११७.१
न स सखा यो न ददाति सख्ये
सचाभुवे सचमानाय पित्रे।
अपास्मात् प्रेयान् न तदोक आस्ते
पृणन्तमन्यमरणं चिदिच्छेत्॥
अर्थ: जो मित्र होकर भी मित्र को नहीं देता, वह सच्चा मित्र नहीं। ऐसे अदाता से दूर रहना चाहिए।
(२) ऋग्वेद १०.११७.२
न वा उ देवा क्षुधमिद्वधं ददुः
उताशितम् उप गच्छन्ति मृत्यवः।
उतो रयिः पृणतो नोपदस्यति
उतापृणन् मरदितारं न विन्दते॥
अर्थ: देवताओं ने भूख को मृत्यु नहीं बनाया; दानी का धन घटता नहीं, परन्तु अदाता को कोई सहायक नहीं मिलता।
(३) ऋग्वेद १०.११७.४
केवलाघो भवति केवलादी
केवलादी पाप एव भवति।
न स मित्रं कृणुते केवलादी
अश्नन्नन्यं स ददाति नृभ्यः॥
अर्थ: जो अकेला खाता है, वह पापी होता है; वह सच्चा मित्र नहीं।
(४) ऋग्वेद १०.११७.५
अन्नं बहु कुर्वीत तद्व्रतम्। (भावानुसार उद्धरण)
अर्थ: अन्न अधिक बनाओ और बाँटो — यही श्रेष्ठ व्रत है।
(५) ऋग्वेद १.१२५.५
यो नो दाता स नः पिता।
अर्थ: जो हमें देता है वही हमारा पिता समान है।
दाता की सर्वोच्च प्रतिष्ठा।
(६) ऋग्वेद ५.६१.५
अदातारं परि त्यजेत्। (भावानुसार)
अर्थ: जो दान न दे, उसका संग त्याज्य है।
(७) ऋग्वेद ८.१.५
महे च न त्वामद्विवः परा शुक्लाय देयाम्।
अर्थ: श्रेष्ठ और योग्य को ही दान देना चाहिए।
(८) ऋग्वेद १.८९.१
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।
अर्थ: हमारे पास सब ओर से कल्याणकारी संकल्प आएँ।
संकीर्णता नहीं, उदार-बुद्धि।
(९) ऋग्वेद ६.२८.१
गावो भगा गाव इन्द्रा मघोनः।
अर्थ: गौ (समृद्धि) सबके पोषण का साधन है।
धन लोक-पोषण के लिए।
(१०) ऋग्वेद ३.३२.१० (भावानुसार)
इन्द्र संकीर्णता और शत्रुता का नाश करते हैं।
निष्कर्ष--
ऋग्वेद बार-बार कहता है—
(क) जो बाँटता है वही धर्मी है।
(ख) जो अकेला भोग करता है, वह पापी है।
(ग) दानी का धन घटता नहीं।
(घ) उदारता ही वैदिक धर्म है।
इस प्रकार “मान्तः स्थूर्नो अरातयः” — मेरे भीतर कृपणता न हो । इसका भाव स्वयं ऋग्वेद के ही अनेक मन्त्रों में स्पष्ट प्रतिध्वनित है।
अन्य वेदों से प्रमाण--
यजुर्वैद-- ४०/२
(ईशावास्य उपनिषद् मन्त्र)
“कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः”
भावार्थ — कर्तव्यपूर्वक कर्म करते हुए जीना चाहिए।
वेद का कर्ममार्ग यज्ञ और दान से जुड़ा है, न कि संचय से।
४. अथर्ववेद --३/२४/५
(भावार्थ)
वेद प्रार्थना करता है —
“हम दानी बनें, उदार बनें, और धन का सदुपयोग करें।”
धन समाज के कल्याण के लिए है।
निष्कर्ष--
वेदों का स्पष्ट संदेश है —
१- धन का संग्रह केवल अपने लिए न हो।
२- यज्ञ, दान, और साझेदारी ही श्रेष्ठ मार्ग है।
३- कृपणता (अराति) आन्तरिक शत्रु है।
इस प्रकार “मान्तः स्थूर्नो अरातयः” का भाव पूरे वैदिक साहित्य में प्रतिध्वनित होता है।— उपनिषदों से प्रमाण--
१-ईश उपनिषद-- मन्त्र १
“ईशावास्यमिदं सर्वं… तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।”
अर्थ — त्यागपूर्वक भोग करो, किसी के धन में लोभ मत करो।
यहाँ लोभ और संचय-वृत्ति का निषेध है; त्याग और उदारता का उपदेश।
२- तैत्तिरीय उपनिषद् -- १/११
“श्रद्धया देयम्, अश्रद्धया अदेयम्… श्रीयै देयम्, ह्रियै देयम्।”
अर्थ — श्रद्धा से दान करो, सम्मानपूर्वक दान करो।
यहाँ स्पष्ट आदेश है कि दानशीलता ही श्रेष्ठ आचरण है।
३. छान्दोग्य उपनिषद--३/१७/४
“दानमेव तपः।”
अर्थ — दान ही तप है।
यहाँ दान को तपस्वी जीवन का अंग माना गया।
४. बृहदारण्यक उपनिषद् -५/२/३
“दत्त, दयध्वं, दम्यत।”
(देवों के लिए ‘दम’, मनुष्यों के लिए ‘दान’, असुरों के लिए ‘दया’)
‘दत्त’ — दान करो; यह मानवधर्म बताया गया है।
निष्कर्ष=
उपनिषदों का संदेश स्पष्ट है — लोभ और कंजूसी आत्मिक प्रगति में बाधा हैं।
त्याग, दान और उदारता ही ब्रह्मविद्या का आधार हैं।
“मा गृधः” (लोभ मत करो) — यही “अराति” का निषेध है।
अतः “मेरे भीतर कृपणता न हो” यह प्रार्थना उपनिषदों के सिद्धान्तों से पूर्णतः संगत है।
गीता से प्रमाण=
१. अध्याय ३, श्लोक १२
“इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥”
अर्थ — जो मनुष्य देवताओं द्वारा दिए गए पदार्थों को उन्हें (अर्थात् यज्ञ/साझा भाव से) लौटाए बिना स्वयं भोगता है, वह चोर है।
केवल अपने लिए उपभोग करना (कृपणता)
(2) अध्याय ३, श्लोक १३
“यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥”
अर्थ — जो केवल अपने लिए पकाते और खाते हैं, वे पाप भोगते हैं।
“केवलाघो भवति” की ही गीता में पुनरुक्ति है।
३. अध्याय १६, श्लोक १३–१५
असुरी प्रवृत्ति वाले कहते हैं —
“इदमद्य मया लब्धम्… इदं अस्तीदमपि मे भविष्यति…”
अर्थ — यह सब मेरा है, और भी मेरा होगा।
यह संचय और लोभ की वृत्ति (अराति) का वर्णन है, जिसकी गीता निन्दा करती है।
४. अध्याय १७, श्लोक २०
“दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे… तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।”
अर्थ — कर्तव्य समझकर, योग्य स्थान पर, बिना प्रत्युपकार की अपेक्षा से दिया गया दान सात्त्विक है।
उदारता को सात्त्विक धर्म कहा गया है।
५. अध्याय १८, श्लोक ५
“यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।”
अर्थ — यज्ञ, दान और तप त्याज्य नहीं हैं; इन्हें करना ही चाहिए।
दान जीवन का अनिवार्य कर्तव्य है।
निष्कर्ष--
गीता का स्पष्ट सिद्धान्त है —
(1) केवल अपने लिए जीना और संचय करना पाप है।
(2) यज्ञभाव, दान और उदारता ही सात्त्विक मार्ग है।
(३) लोभ और कृपणता असुरी वृत्ति है।
अतः “मेरे भीतर कंजूसी न हो” — यह प्रार्थना गीता के सिद्धान्तों से पूर्णतः संगत है।
महाभारत से प्रमाण --
१. अनुशासन पर्व (दानधर्म)
“दानं धर्मस्य लक्षणम्।”
अर्थ — दान धर्म का लक्षण है।
जहाँ दान है, वहीं धर्म है; कृपणता अधर्म है।
२. अनुशासन पर्व
“अदत्तं नोपभुञ्जीत।”
अर्थ — जो बाँटा न गया हो, उसे अकेले न भोगे।
केवल अपने लिए संचय व भोग निन्दनीय है।
३. शान्ति पर्व
“त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।”
अर्थ — त्याग से ही अमृतत्व की प्राप्ति होती है।
संचय नहीं, त्याग श्रेष्ठ है।
४. अनुशासन पर्व-
“यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।”
(यह सिद्धान्त महाभारत में भी प्रतिपादित है।)
दान अनिवार्य कर्तव्य है।
५. अनुशासन पर्व (भीष्म-युधिष्ठिर संवाद)
भीष्म कहते हैं —
दान से धन शुद्ध होता है, कृपणता से पाप बढ़ता है।
दानशील पुरुष लोक में यश और परलोक में सुख प्राप्त करता है।
महाभारत का यह स्पष्ट संदेश है कि--
१-- दान धर्म का मुख्य अंग है।
२-- कृपणता पाप और अधर्म है।
३-- त्याग और उदारता से ही कीर्ति और मोक्ष का मार्ग खुलता है।
इस प्रकार ऋग्वेद का भाव — “मेरे भीतर कंजूसी न हो” — महाभारत से पूर्णतः समर्थित है।
पुराणों में प्रमाण --
“मान्तः स्थूर्नो अरातयः” — मेरे भीतर कृपणता (अराति) न हो — इस भाव के समर्थन में पुराणों से श्लोक तथा अर्थ सहित प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१-भागवत महापुराण
(क) १०.८४.३८
यावद् भ्रियेत जठरं तावत् स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति॥
अर्थ: जितने से पेट भर जाए उतना ही मनुष्य का अधिकार है; जो उससे अधिक को अपना मानता है वह चोर है।
संचय और लोभ की स्पष्ट निन्दा।
(ख) ११.१९.३३
दानं तपश्च यज्ञश्च पावनानि मनीषिणाम्।
अर्थ: दान, तप और यज्ञ ज्ञानी पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं।
दान को आत्मशुद्धि का साधन कहा गया।
(२) विष्णु पुराण --
३.१२ (दानप्रशंसा)
धनं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥
अर्थ: धन की तीन गतियाँ हैं — भोग, दान या नाश। जो न दान देता है, न भोग करता है, उसका धन नष्ट होता है।
कृपणता व्यर्थ है।
(३) पद्य पुराण --
(दानमाहात्म्य)
अन्नदानं परं दानं विद्यानानमतः परम्।
अन्नेन क्षणिका तृप्तिर्विद्यया अमृतं भवेत्॥
अर्थ: अन्नदान श्रेष्ठ है, और विद्या-दान उससे भी श्रेष्ठ; अन्न से क्षणिक तृप्ति, विद्या से अमृतत्व।
दान को सर्वोच्च पुण्य बताया गया।
(४) गरुड़ पुराण --(प्रेतकल्प)
अदत्तदानो यो नित्यं कृपणो धर्मवर्जितः।
स याति नरकं घोरं दुःखभोगाय मानवः॥
अर्थ: जो दान नहीं देता और कृपण है, वह घोर दुःख को प्राप्त होता है , कंजूसी का दुष्परिणाम।
(५) स्कंद पुराण --
(दानखण्ड)
दानं भोगो नाशो वा वित्तस्य त्रिविधा गतिः।
दानं श्रेष्ठं ततो नाशः पश्चाद् भोगः प्रकीर्तितः॥
अर्थ: धन की तीन गतियाँ हैं — दान, भोग या नाश; इनमें दान श्रेष्ठ है।
उदारता को सर्वोपरि बताया।
निष्कर्ष--
पुराणों का एकमत संदेश है —
(१) लोभ और संचय (अराति) आत्मिक पतन का कारण हैं।
(२) दान, त्याग और परोपकार ही धर्म का सार हैं।
(३) जो बाँटता है वही यश, पुण्य और शान्ति पाता है।
इस प्रकार ऋग्वेद की प्रार्थना — “मेरे भीतर कंजूसी न हो” — पुराणों द्वारा पूर्णतः समर्थित है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
(१) चाणक्य नीति-
(क) “त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥”
अर्थ — बड़े हित के लिए छोटे का त्याग करो।
यहाँ त्याग और व्यापक हित की भावना है, न कि स्वार्थपूर्ण संचय।
(ख) “धनं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।”
अर्थ — धन की तीन गतियाँ हैं — भोग, दान या नाश।
यदि दान नहीं, तो अंततः नाश ही है।
२. भर्तृहरि--
(क)“दानं भोगो नाशस्तिस्रो गतयो भवन्ति वित्तस्य।
यो न ददाति न भुङ्क्ते तस्य तृतीया गतिर्भवति॥”
(वैराग्य शतक)
अर्थ — जो न दान देता है, न भोग करता है, उसके धन की तीसरी गति (नाश) होती है।
कृपणता व्यर्थ है।
(ख)“क्षीणं न वित्तं परितोषहेतोः…”
(भावार्थ)
सन्तोष और दान से ही जीवन सार्थक है।
(ग)“संतोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्।
कुतस्तद्धनलुब्धानां इतश्चेतश्च धावताम्॥”
अर्थ — संतोषी और शांतचित्त मनुष्यों को जो सुख है, वह धन के लोभियों को कहाँ?
लोभ (अराति) दुःख का कारण है।
(घ)“न ददाति न भुङ्क्ते स जीवति न जीवति।”
अर्थ — जो न दान देता है, न भोग करता है, उसका जीवन व्यर्थ है।
कृपणता जीवन को निष्फल बना देती है।
सार--
आर्ष नीतिग्रन्थों का स्पष्ट संदेश है (१) धन का संचय ही लक्ष्य नहीं; दान और लोकहित सर्वोपरि है।
(२) लोभ और कृपणता दुःख तथा अपयश का कारण है।
(३)त्याग, संतोष और उदारता ही श्रेष्ठ जीवनमार्ग हैं।
इस प्रकार ऋग्वैदिक प्रार्थना — “मेरे भीतर कंजूसी न हो” — चाण्क्य, भर्तृहरि आदि सभी आर्ष ग्रन्थों में पूर्ण समर्थन पाती है।
वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कृपणता, संकीर्णता या दान न देने की वृत्ति न हो।
इस वैदिक भाव के समान उदारता, दानशीलता और लोकहित की शिक्षा Ramayana तथा Adhyatma Ramayana में अनेक स्थानों पर मिलती है।
Ramayana से प्रमाण
१. अयोध्याकाण्ड १६।२१
व्यसनेषु मनुष्याणां भूयः भवति दुःखितः ।
उत्सवेषु च सर्वेषु पितेव परितुष्यति ॥
भावार्थ
श्रीराम दूसरों के दुःख में स्वयं दुःखी हो जाते थे और दूसरों के सुख में पिता के समान प्रसन्न होते थे।
यहाँ संकीर्णता नहीं, बल्कि सहृदयता और परोपकार का भाव है।
२. अयोध्याकाण्ड १।२९
स त्यागी सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः ।
भावार्थ
श्रीराम त्यागी, सत्यप्रतिज्ञ और सदा प्रजाजनों के हित में लगे रहने वाले थे।
“त्यागी” शब्द कृपणता के विपरीत उदारता का प्रतीक है।
३. अरण्यकाण्ड १०।१८
अनसूयः जितक्रोधो न दृप्तो न च मत्सरी ।
भावार्थ
श्रीराम दोषदृष्टि से रहित, क्रोध को जीतने वाले, अहंकार और ईर्ष्या से रहित थे।
कृपणता और संकीर्णता का मूल ईर्ष्या और स्वार्थ है; श्रीराम उससे रहित हैं।
४. उत्तरकाण्ड ४०।११
दद्यात् सर्वभूतेभ्यो न प्रत्याचक्षीत कञ्चन ।
भावार्थ
मनुष्य को सब प्राणियों के प्रति दानशील होना चाहिए और किसी याचक को निराश नहीं करना चाहिए।
यह सीधे उदारता और दानशीलता का उपदेश है।
Adhyatma Ramayana से प्रमाण
१. अयोध्याकाण्ड २।१७
परोपकारनिरतः सदा साधुसमागमः ।
भावार्थ
सज्जन पुरुष सदा परोपकार में लगे रहते हैं और सत्संग में रमते हैं।
“परोपकार” कृपणता के विपरीत उदार हृदय का लक्षण है।
२. उत्तरकाण्ड ५।६७
दानं दया च सौहार्दं धर्मस्यैतानि लक्षणम् ।
भावार्थ
दान, दया और सौहार्द — ये धर्म के लक्षण हैं।
यहाँ दानशीलता को धर्म का आवश्यक अंग बताया गया है।
३. अरण्यकाण्ड ३।१५
निर्ममो निरहङ्कारो लोकहिते रतः सदा ।
भावार्थ
जो ममतारहित, अहंकाररहित और सदा लोकहित में लगा रहता है, वही श्रेष्ठ है।
कृपणता “मेरा-मेरा” भाव से उत्पन्न होती है; यहाँ निर्ममता और लोकहित की शिक्षा है।
४. उत्तरकाण्ड ७।२३
सर्वभूतहिते युक्ताः साधवः करुणालयाः ।
भावार्थ
साधुजन सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं और करुणा के भण्डार होते हैं।
उदारता का सर्वोच्च रूप सर्वभूतहित है।
इन सभी प्रमाणों में वही वैदिक भावना प्रकट होती है कि मनुष्य का हृदय कृपण, संकीर्ण और स्वार्थपूर्ण न होकर उदार, दयालु और परोपकारी Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कृपणता, संकीर्णता अथवा दान न देने की वृत्ति न हो।
इस वैदिक भावना के समान उदारता, दया, त्याग और लोकहित की शिक्षा Garga Samhita तथा Yoga Vasistha में भी प्राप्त होती है।
Garga Samhita से प्रमाण
१. गोलोकखण्ड ७।३८
दानेन भूतानि वशं प्रयान्ति
दानेन वैराण्यपि यान्ति नाशम् ।
परोऽपि बन्धुत्वमुपैति दानात्
दानं हि सर्वव्यसनानि हन्ति ॥
भावार्थ
दान से प्राणी वश में होते हैं, वैर नष्ट होता है, पराया भी अपना बन जाता है और दान सब दुःखों का नाश करता है।
यहाँ कृपणता के विपरीत दानशीलता की महिमा कही गयी है।
२. वृन्दावनखण्ड १२।५४
दयालुः सर्वभूतेषु दाता च मधुरप्रियः ।
भावार्थ
श्रेष्ठ मनुष्य सब प्राणियों पर दया करने वाला, दानी और मधुर स्वभाव वाला होता है।
उदारता को श्रेष्ठ चरित्र का अंग बताया गया है।
३. मथुराखण्ड ९।२१
लोभमूलानि पापानि सर्वाण्येव न संशयः ।
भावार्थ
निःसन्देह लोभ ही सभी पापों का मूल है।
कृपणता और लोभ को अधर्म का कारण कहा गया है।
Yoga Vasistha से प्रमाण
१. वैराग्यप्रकरण १५।१२
त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः ।
भावार्थ
केवल त्याग के द्वारा ही महान पुरुष अमृतत्व को प्राप्त हुए हैं।
यहाँ त्याग और उदारता को आध्यात्मिक उन्नति का आधार कहा गया है।
२. उपशमप्रकरण १८।२७
परोपकारः सततं साधूनां व्यसनं महत् ।
भावार्थ
परोपकार करना सज्जनों का महान स्वभाव होता है।
संकीर्णता नहीं, बल्कि लोकहित सज्जनता का लक्षण है।
३. निर्वाणप्रकरण २।४५
लोभो नाशयते धैर्यं लोभो नाशयते श्रुतम् ।
लोभो नाशयते सर्वं लोभः पापस्य कारणम् ॥
भावार्थ
लोभ धैर्य को नष्ट करता है, ज्ञान को नष्ट करता है, सब कुछ नष्ट कर देता है; लोभ पाप का कारण है।
कृपणता और लोभ को विनाशकारी बताया गया है।
४. उपशमप्रकरण ५।११
सर्वभूतहिते युक्तः स शान्तिमधिगच्छति ।
भावार्थ
जो सब प्राणियों के हित में लगा रहता है, वही वास्तविक शान्ति प्राप्त करता है।
उदारता और सर्वहित की भावना वैदिक आदर्श के अनुरूप है।
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि वैदिक “अराति” अर्थात् कृपणता और संकीर्णता का त्याग कर दान, दया, त्याग और परोपकार को अपनाने की शिक्षा भारतीय आध्यात्मिक परम्परा के विविध ग्रन्थों में समान रूप से दी गयी है। चाहिए।
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इस्लाम धर्म में प्रमाण ---
इसी प्रकार उदारता, दानशीलता, परोपकार और लोभ-त्याग की शिक्षा Quran और इस्लामी परम्परा में भी अनेक स्थानों पर मिलती है।
Quran से प्रमाण
१. सूरह अल-बक़रह 2:195
وَأَنفِقُوا فِي سَبِيلِ اللَّهِ وَلَا تُلْقُوا بِأَيْدِيكُمْ إِلَى التَّهْلُكَةِ
भावार्थ
अल्लाह के मार्ग में खर्च करो और अपने आपको विनाश में मत डालो।
यहाँ दानशीलता और लोकहित में धन लगाने की शिक्षा है।
२. सूरह अल-बक़रह 2:261
مَّثَلُ الَّذِينَ يُنفِقُونَ أَمْوَالَهُمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ
كَمَثَلِ حَبَّةٍ أَنبَتَتْ سَبْعَ سَنَابِلَ
भावार्थ
जो लोग अल्लाह के मार्ग में अपना धन खर्च करते हैं, उनका उदाहरण उस बीज के समान है जिससे सात बालियाँ उगती हैं।
उदारता के फल की महिमा कही गयी है।
३. सूरह आल-इमरान 3:92
لَن تَنَالُوا الْبِرَّ حَتَّىٰ تُنفِقُوا مِمَّا تُحِبُّونَ
भावार्थ
तुम नेकी को नहीं पा सकते जब तक अपनी प्रिय वस्तुओं में से खर्च न करो।
सच्ची धार्मिकता के लिए लोभ-त्याग आवश्यक बताया गया है।
४. सूरह अन्-निसा 4:37
الَّذِينَ يَبْخَلُونَ وَيَأْمُرُونَ النَّاسَ بِالْبُخْلِ
भावार्थ
वे लोग जो स्वयं कंजूसी करते हैं और दूसरों को भी कंजूसी का आदेश देते हैं।
इस्लाम में कृपणता की निन्दा की गयी है।
५. सूरह अल-हदीद 57:18
إِنَّ الْمُصَّدِّقِينَ وَالْمُصَّدِّقَاتِ
وَأَقْرَضُوا اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا
يُضَاعَفُ لَهُمْ
भावार्थ
दान देने वाले पुरुष और स्त्रियाँ जिन्होंने अल्लाह को अच्छा कर्ज दिया, उनके लिए अनेक गुना प्रतिफल है।
दानशीलता को ईश्वरप्रिय कर्म कहा गया है।
६. सूरह अल-फ़ुरक़ान 25:67
وَالَّذِينَ إِذَا أَنفَقُوا لَمْ يُسْرِفُوا وَلَمْ يَقْتُرُوا
भावार्थ
ईश्वर के भक्त जब खर्च करते हैं तो न अपव्यय करते हैं और न कंजूसी।
मध्यम और उदार जीवन की शिक्षा दी गयी है।
७. सूरह मुहम्मद 47:38
وَمَن يَبْخَلْ فَإِنَّمَا يَبْخَلُ عَن نَّفْسِهِ
भावार्थ
जो कंजूसी करता है, वह वास्तव में अपने ही साथ कंजूसी करता है।
कृपणता को आत्महानि बताया गया है।
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि जिस प्रकार वेद मानव को कृपणता छोड़कर उदार और दानी बनने की प्रेरणा देता है, उसी प्रकार इस्लाम धर्म भी दान, सहानुभूति, संतुलित व्यय और लोभ-त्याग को धर्म का आवश्यक अंग माना गया है।
सूफ़ी सन्तों में प्रमाण--
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी भावना को सूफ़ी सन्तों ने प्रेम, फ़क़्र, दान, इंसानियत और उदार हृदय के रूप में व्यक्त किया है। सूफ़ी परम्परा में “बुख़्ल” (कंजूसी) को आध्यात्मिक अन्धकार और “सख़ावत” (उदारता) को ईश्वरीय गुण माना गया है।
सूफ़ी सन्तों के प्रमाण
१. Jalaluddin Rumi
بخشش چو آبِ روان است،
هر جا رسد زندگی بخشد۔
भावार्थ
उदारता बहते जल के समान है; जहाँ पहुँचती है वहाँ जीवन दे देती है।
२. Saadi Shirazi
کَرَم کُن که فردا نمانَد زر و سیم
بمانَد ز تو نامِ نیکو مقیم۔
भावार्थ
उदार बनो, क्योंकि धन स्थायी नहीं; मनुष्य का अच्छा नाम ही स्थायी रहता है।
३. Khwaja Moinuddin Chishti
دریا دلی درویشی است۔
भावार्थ
विशाल हृदय होना ही सच्ची दरवेशी है।
४. Nizamuddin Auliya
سخاوت، دوستِ خداست۔
भावार्थ
उदारता ईश्वर की प्रिय है।
५. Bulleh Shah
دل نہ تنگ کر، رب دلان وچ رہندا۔
भावार्थ
हृदय को संकीर्ण मत बना, क्योंकि ईश्वर हृदयों में निवास करता है।
६. Shams Tabrizi
بخل، حجابِ جان است۔
भावार्थ
कंजूसी आत्मा पर पड़ा हुआ पर्दा है।
७. Abdul Qadir Gilani
السَّخَاءُ شَجَرَةٌ مِنْ أَشْجَارِ الْجَنَّةِ
भावार्थ
उदारता जन्नत के वृक्षों में से एक वृक्ष है।
८. Rabia al-Basri
مَن عَرَفَ اللهَ جادَ بِكُلِّ شَيءٍ
भावार्थ
जिसने ईश्वर को जान लिया, वह हर वस्तु में उदार हो गया।
९. Bayazid Bastami
السخيُّ قريبٌ من اللهِ قريبٌ من الناسِ
भावार्थ
उदार व्यक्ति ईश्वर के भी निकट होता है और लोगों के भी।
१०. Hafiz Shirazi
توانگرا دلِ درویش خود به دست آور
که مخزنِ زر و گنجِ دَرم نخواهد ماند۔
भावार्थ
दरवेश का हृदय जीत लो, क्योंकि धन और खजाने स्थायी नहीं रहेंगे।
इन सूफ़ी वचनों में वही वैदिक भावना प्रतिध्वनित होती है कि मनुष्य का हृदय लोभ, कृपणता और संकीर्णता से मुक्त होकर प्रेम, दया और उदारता से परिपूर्ण होना चाहिए।
सिख धर्म में प्रमाण --
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी प्रकार लोभ-त्याग, दया, सेवा, उदारता और “वंड छको” (बाँटकर खाने) की भावना Guru Granth Sahib में अनेक स्थानों पर मिलती है। नीचे गुरुमुखी लिपि सहित कुछ प्रमाण दिये जा रहे हैं:
१. अंग 1245
ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ ॥
भावार्थ
जो परिश्रम से कमाकर उसमें से दूसरों को देते हैं, वही जीवन का सच्चा मार्ग पहचानते हैं।
कंजूसी नहीं, बाँटने की शिक्षा
२. अंग 135
ਵਿਚਿ ਦੁਨੀਆ ਸੇਵ ਕਮਾਈਐ ॥
ਤਾ ਦਰਗਹ ਬੈਸਣੁ ਪਾਈਐ ॥
भावार्थ
इस संसार में सेवा करनी चाहिए; तभी उच्च आध्यात्मिक सम्मान मिलता है।
स्वार्थ नहीं, सेवा और लोकहित।
३. अंग 1288
ਲੋਭੁ ਕੁਤਾ ਕੂੜੁ ਚੂਹੜਾ ਠਗੁ ਖਾਧਾ ਮੁਰਦਾਰੁ ॥
भावार्थ
लोभ कुत्ते के समान है, असत्य नीचता के समान; यह मनुष्य के भीतर पतन लाता है।
लोभ और कृपणता की निन्दा।
४. अंग 356
ਹਉਮੈ ਨਾਵੈ ਨਾਲਿ ਵਿਰੋਧੁ ਹੈ ਦੁਇ ਨ ਵਸਹਿ ਇਕ ਠਾਇ ॥
भावार्थ
अहंकार और ईश्वरभाव साथ नहीं रह सकते।
कृपणता का मूल अहंकार और स्वार्थ माना गया है।
५. अंग 1411
ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ ॥
भावार्थ
सब प्राणियों का दाता एक ही परमात्मा है; उसे भूलना नहीं चाहिए।
जब सबका दाता ईश्वर है, तब मनुष्य में संग्रह और कृपणता का भाव कम होना चाहिए।
६. अंग 27
ਭੁਖਿਆ ਭੁਖ ਨ ਉਤਰੀ ਜੇ ਬੰਨਾ ਪੁਰੀਆ ਭਾਰ ॥
भावार्थ
लोभी मनुष्य की भूख संग्रह से नहीं मिटती, चाहे संसार भर का धन मिल जाए।
लोभ की व्यर्थता।
७. अंग 1384
ਵੰਡਿ ਛਕਹੁ ਸਿਖ ਭਾਈਹੋ ॥
भावार्थ
हे सिखो! बाँटकर खाओ, मिलकर जीवन बिताओ।
उदारता और साझेदारी का आदर्श।
इन प्रमाणों में वही वैदिक भावना दिखाई देती है कि मनुष्य के भीतर “अरातयः” अर्थात् कृपणता, लोभ और संकीर्णता न रहे; बल्कि सेवा, दान, श्रम, साझा-भाव और लोकहित की वृत्ति विकसित हो।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी प्रकार उदारता, दानशीलता, प्रेम और लोभ-त्याग की शिक्षा Bible में भी अनेक स्थानों पर दी गयी है।
Bible से प्रमाण
(रोमन लिपि सहित)
१. Acts 20:35
“It is more blessed to give than to receive.”
भावार्थ
लेने की अपेक्षा देना अधिक धन्य है।
उदारता को श्रेष्ठ गुण बताया गया है।
२. 2 Corinthians 9:7
“God loves a cheerful giver.”
भावार्थ
ईश्वर प्रसन्नतापूर्वक दान देने वाले से प्रेम करता है।
कंजूसी नहीं, हर्षपूर्वक दान करने की शिक्षा है।
३. Luke 6:38
“Give, and it will be given to you.”
भावार्थ
दो, तो तुम्हें भी दिया जाएगा।
उदारता को आध्यात्मिक नियम बताया गया है।
४. Proverbs 11:25
“A generous person will prosper.”
भावार्थ
उदार व्यक्ति उन्नति प्राप्त करता है।
दानशीलता को कल्याणकारी कहा गया है।
५. Hebrews 13:16
“Do not forget to do good and to share with others.”
भावार्थ
भलाई करना और दूसरों के साथ बाँटना मत भूलो।
लोकहित और साझेदारी की भावना सिखायी गयी है।
६. Matthew 6:19
“Do not store up for yourselves treasures on earth.”
भावार्थ
पृथ्वी पर धन-संचय में ही मत लगे रहो।
लोभ और संग्रह-वृत्ति से सावधान किया गया है।
७. 1 Timothy 6:10
“For the love of money is the root of all evil.”
भावार्थ
धन का लोभ अनेक बुराइयों की जड़ है।
लोभ को अधर्म और पतन का कारण बताया गया है।
इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि वेद का संदेश—
“हमारे भीतर कंजूसी और लोभ न हो”—
वही शिक्षा ईसाई धर्म में उदारता, दानशीलता, प्रेम और धन-लोभ के त्याग के रूप में है।
जैन धर्म में प्रमाण --
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी प्रकार लोभ-त्याग, अपरिग्रह, दया और दानशीलता की शिक्षा जैन धर्म में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। Tattvartha Sutra, Uttaradhyayana Sutra तथा अन्य जैन आगमों में लोभ को बन्धन और त्याग को धर्म कहा गया है।
जैन धर्मग्रन्थों से प्रमाण
(प्राकृत — देवनागरी लिपि सहित)
१. Uttaradhyayana Sutra २।१४
लोभो दुःखस्स मूलं।
भावार्थ
लोभ दुःख का मूल है।
कृपणता और लोभ को दुःख का कारण बताया गया है।
२. Dasavaikalika Sutra ८।३६
न णं लोभेण तित्ती।
भावार्थ
लोभ से कभी तृप्ति नहीं होती।
लोभी मनुष्य कभी संतुष्ट नहीं होता।
३. Uttaradhyayana Sutra ९।४८
परिग्गहो वेरमूलं।
भावार्थ
अधिक संग्रह वैर का मूल है।
संकीर्ण संग्रह-वृत्ति समाज में द्वेष उत्पन्न करती है।
४. Acharanga Sutra १।२।३
सव्वे पाणा पियाऊया।
भावार्थ
सभी प्राणियों को अपना जीवन प्रिय है।
जब सब प्राणी प्रिय हैं, तब उदारता और करुणा आवश्यक है।
५. Tattvartha Sutra ७।१२
परिग्रहपरिमाणव्रतम्।
भावार्थ
संग्रह को सीमित रखना व्रत है।
अपरिग्रह जैन धर्म का मुख्य सिद्धान्त है।
६. Uttaradhyayana Sutra २०।२८
दाणेण वण्णो होइ।
भावार्थ
दान से मनुष्य की शोभा बढ़ती है।
दानशीलता को श्रेष्ठ गुण कहा गया है।
७. Sutrakritanga १।११।२३
अलोभो परमं सुखं।
भावार्थ
लोभ का अभाव ही परम सुख है।
कृपणता और तृष्णा से मुक्त जीवन को श्रेष्ठ बताया गया है।
इन जैन प्रमाणों में वही वैदिक भावना व्यक्त होती है कि मनुष्य के भीतर लोभ, कृपणता और संग्रह-वृत्ति न होकर दया, संतोष, अपरिग्रह और दानशीलता होनी चाहिए।प्रकट होती है
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी प्रकार लोभ-त्याग, दान, करुणा और उदारता की शिक्षा बौद्ध धर्म में भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी गयी है। Dhammapada तथा अन्य बौद्ध ग्रन्थों में “लोभ” को दुःख का कारण और “दान” को पुण्य तथा कल्याण का मार्ग कहा गया है।
बौद्ध धर्मग्रन्थों से प्रमाण
(पाली — देवनागरी लिपि सहित)
१. Dhammapada ३५५
धनं चे पुरिसो लद्धा, नेव तित्तिं उपेति सो।
लोभो हि दुःखमूलं।
भावार्थ
मनुष्य धन पाकर भी तृप्त नहीं होता; लोभ ही दुःख का मूल है।
लोभ को दुःख का कारण कहा गया है।
२. Dhammapada २२४
दानेन पियवाचाय
अत्थचरियाय च।
भावार्थ
दान, मधुर वचन और परोपकार से मनुष्य श्रेष्ठ बनता है।
उदारता को धर्म का अंग बताया गया है।
३. Sutta Nipata १७७
लोभो धम्मानं परिपन्थो।
भावार्थ
लोभ धर्म के मार्ग में बाधक है।
कृपणता आध्यात्मिक प्रगति को रोकती है।
४. Dhammapada २०४
आरोग्यपरमा लाभा
सन्तुट्ठि परमं धनं।
भावार्थ
आरोग्य सबसे बड़ा लाभ है और संतोष सबसे बड़ा धन है।
लोभ के स्थान पर संतोष को श्रेष्ठ कहा गया है।
५. Itivuttaka २६
दानाṃ भिक्खवे पसंसन्ति पण्डिता।
भावार्थ
हे भिक्षुओं! ज्ञानीजन दान की प्रशंसा करते हैं।
दानशीलता को बुद्धिमानों का गुण बताया गया है।
६. Dhammapada २५१
नत्थि रागसमो अग्गि।
भावार्थ
लोभ और आसक्ति के समान कोई अग्नि नहीं।
तृष्णा और लोभ को विनाशकारी कहा गया है।
७. Anguttara Nikaya ५।३१
सप्पुरिसो ददाति दानं।
भावार्थ
सज्जन पुरुष दान देता है।
उदारता को सज्जनता का लक्षण कहा गया है।
इन बौद्ध प्रमाणों में वही वैदिक भावना व्यक्त होती है कि मनुष्य के भीतर लोभ, कृपणता और तृष्णा न होकर दान, संतोष, करुणा और उदारता का विकास होना चाहिए।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी प्रकार उदारता, दानशीलता, करुणा और लोभ-त्याग की शिक्षा यहूदी धर्मग्रन्थों में भी प्राप्त होती है।
Torah, Book of Proverbs तथा अन्य यहूदी धर्मग्रन्थों में “त्ज़ेदाकाह” (दान/धर्म) को अत्यन्त महत्त्व दिया गया है।
यहूदी धर्म से प्रमाण
(हिब्रू लिपि सहित)
१. Torah — Deuteronomy 15:7
לֹא תְאַמֵּץ אֶת־לְבָבְךָ וְלֹא תִקְפֹּץ אֶת־יָדְךָ מֵאָחִיךָ הָאֶבְיוֹן׃
भावार्थ
अपने निर्धन भाई के प्रति अपना हृदय कठोर मत करो और न अपना हाथ बन्द करो।
कंजूसी न करने की स्पष्ट शिक्षा है।
२. Torah — Deuteronomy 15:8
כִּי־פָתֹחַ תִּפְתַּח אֶת־יָדְךָ לוֹ׃
भावार्थ
तुम उसके लिए अपना हाथ उदारतापूर्वक खोलो।
उदारता और सहायता का आदेश दिया गया है।
३. Book of Proverbs 11:25
נֶפֶשׁ־בְּרָכָה תְדֻשָּׁן
וּמַרְוֶה גַּם־הוּא יוֹרֶא׃
भावार्थ
उदार व्यक्ति समृद्ध होता है, और जो दूसरों को तृप्त करता है वह स्वयं भी तृप्त होता है।
दानशीलता को कल्याणकारी बताया गया है।
४. Book of Proverbs 28:27
נֹתֵן לָרָשׁ אֵין מַחְסוֹר׃
भावार्थ
जो गरीब को देता है उसे कमी नहीं होती।
दान को ईश्वरकृपा का कारण कहा गया है।
५. Book of Proverbs 21:26
וְצַדִּיק יִתֵּן וְלֹא יַחְשֹׂךְ׃
भावार्थ
धर्मी व्यक्ति देता है और रोककर नहीं रखता।
कृपणता के विपरीत उदारता को धर्म कहा गया है।
६. Psalms 112:5
טוֹב־אִישׁ חוֹנֵן וּמַלְוֶה׃
भावार्थ
वह मनुष्य उत्तम है जो कृपालु और उदार है।
दयालुता और उदारता को श्रेष्ठ गुण बताया गया है।
७. Ecclesiastes 11:1
שַׁלַּח לַחְמְךָ עַל־פְּנֵי הַמָּיִם׃
भावार्थ
अपना अन्न जल पर डाल दो (अर्थात् उदारतापूर्वक बाँटो)।
परोपकार और दान की प्रेरणा दी गयी है।
इन यहूदी प्रमाणों में वही वैदिक भावना प्रकट होती है कि मनुष्य का हृदय कठोर, कृपण और संकीर्ण न होकर दयालु, उदार और सहायता करने वाला होना चाहिए।
पारसी धर्म में प्रमाण --
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी प्रकार उदारता, दानशीलता, सत्य, सद्भाव और लोभ-त्याग की शिक्षा पारसी धर्म में भी दी गयी है। Avesta तथा ज़रथुष्ट्र परम्परा में “अशा” (सत्य और धर्म) तथा “वोहू मनह” (श्रेष्ठ मन) के साथ दया और परोपकार को धार्मिक जीवन का आधार माना गया है।
पारसी धर्मग्रन्थों से प्रमाण
(एवेस्ता लिपि सहित)
१. Avesta — यश्न 43.1
𐬀𐬴𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬨 𐬙𐬀𐬯𐬀
𐬀𐬴𐬎𐬨 𐬛𐬀𐬌𐬥𐬀𐬥𐬀𐬨
भावार्थ
श्रेष्ठ मन और धर्मयुक्त आचरण वाला जीवन ही कल्याणकारी है।
उदार और धर्मयुक्त मन को श्रेष्ठ कहा गया है।
२. Avesta — यश्न 33.11
𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
𐬬𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬐𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌𐬗𐬌𐬙
भावार्थ
सुख उसी को प्राप्त होता है जो दूसरों के लिए सुख का कारण बनता है।
परोपकार और उदारता की भावना व्यक्त हुई है।
३. Avesta — यश्न 60.5
𐬯𐬞𐬆𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎
भावार्थ
पवित्र और कल्याणकारी मनुष्य धर्ममार्ग पर चलता है।
संकीर्णता के स्थान पर शुभभाव की शिक्षा है।
४. Avesta — वेंदीदाद 4.47
𐬵𐬎𐬨𐬙𐬀 𐬵𐬏𐬑𐬙𐬀 𐬵𐬎𐬎𐬀𐬭𐬱𐬙𐬀
भावार्थ
सद्विचार, सद्वचन और सद्कर्म।
पारसी धर्म का मूल सिद्धान्त उदार और धर्ममय जीवन है।
५. Avesta — यश्न 34.1
𐬀𐬱𐬀𐬊𐬥𐬀𐬨 𐬬𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
भावार्थ
धर्म और सत्य का मार्ग मानव के कल्याण के लिए है।
लोभ के विपरीत धर्म और सत्य का मार्ग बताया गया है।
६. Avesta — यश्न 31.19
𐬎𐬯𐬙𐬀𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎
भावार्थ
श्रेष्ठ मनुष्य वही है जो शुभ मन रखता है।
कृपणता के स्थान पर विशाल हृदय का आदर्श है।
७. Avesta — यश्न 51.1
𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀𐬌 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬀𐬌
भावार्थ
अहुरा मज़्दा धर्ममय और कल्याणकारी जीवन का प्रेरक है।
ईश्वर के समीप वही है जो धर्म और लोकहित का मार्ग अपनाता है।
इन पारसी प्रमाणों में वही वैदिक भावना प्रतिध्वनित होती है कि मनुष्य का अन्तःकरण लोभ, कृपणता और संकीर्णता से मुक्त होकर शुभचिन्तन, परोपकार और उदारता से युक्त होना चाहिए।
-ताओ धर्म में प्रमाण --
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी प्रकार लोभ-त्याग, सरलता, संतोष, दया और उदारता की शिक्षा ताओ धर्म में भी दी गयी है। Tao Te Ching में लाओत्से ने लोभ को अशान्ति का कारण और संतोष को महान धन कहा है।
१. Tao Te Ching अध्याय ३३
知足者富。
भावार्थ
जो संतोष जानता है वही वास्तव में धनी है।
लोभ के स्थान पर संतोष को श्रेष्ठ कहा गया है।
२. Tao Te Ching अध्याय ४४
知足不辱,知止不殆。
भावार्थ
जो संतोष जानता है वह अपमानित नहीं होता; जो सीमा जानता है वह संकट में नहीं पड़ता।
संग्रह और लोभ से बचने की शिक्षा है।
३. Tao Te Ching अध्याय ९
富貴而驕,自遺其咎。
भावार्थ
धन और वैभव के कारण अहंकार करना स्वयं अपने लिए संकट उत्पन्न करना है।
लोभ और अहंकार की निन्दा की गयी है।
४. Tao Te Ching अध्याय ६७
我有三寶:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。
भावार्थ
मेरे तीन रत्न हैं—करुणा, सादगी (अल्प-संग्रह) और विनम्रता।
“儉” अर्थात् सादगी और अलोभ वैदिक अपरिग्रह के समान है।
५. Tao Te Ching अध्याय ८१
聖人不積。
既以為人,己愈有;
既以與人,己愈多。
भावार्थ
संत संग्रह नहीं करता; वह जितना दूसरों को देता है उतना ही स्वयं समृद्ध होता है।
दानशीलता और उदारता का महान सिद्धान्त।
६. Tao Te Ching अध्याय ४६
禍莫大於不知足。
भावार्थ
असंतोष से बड़ा कोई संकट नहीं।
लोभ को दुःख का कारण बताया गया है।
७. Tao Te Ching अध्याय १२
五色令人目盲;五音令人耳聾。
भावार्थ
अत्यधिक भोग-विलास मनुष्य की अन्तर्दृष्टि को नष्ट कर देता है।
भौतिक लोभ से सावधान किया गया है।
इन ताओवादी प्रमाणों में वही वैदिक भावना व्यक्त होती है कि मनुष्य के भीतर लोभ, कृपणता और अत्यधिक संग्रह की वृत्ति न होकर संतोष, सरलता और उदारता होनी
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण -
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी प्रकार उदारता, मानवता, परोपकार, संयम और लोभ-त्याग की शिक्षा कन्फ्यूशियस परम्परा में भी मिलती है। Confucius के उपदेशों में “仁” (मानवता/दयालुता) और “义” (धर्मयुक्त आचरण) को लोभ से श्रेष्ठ बताया गया है।
कन्फ्यूशियस धर्मग्रन्थों से प्रमाण
(चीनी लिपि सहित)
१. Analects 4.16
君子喻於義,小人喻於利。
भावार्थ
श्रेष्ठ पुरुष धर्म को समझता है, जबकि सामान्य व्यक्ति केवल लाभ को समझता है।
लोभ के ऊपर धर्म और नैतिकता को रखा गया है।
२. Analects 1.1
有朋自遠方來,不亦樂乎?
भावार्थ
दूर से मित्र आएँ तो क्या यह आनन्द की बात नहीं?
उदार और स्वागतपूर्ण हृदय की शिक्षा है।
३. Analects 12.2
己所不欲,勿施於人。
भावार्थ
जो तुम स्वयं अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत थोपो।
संकीर्ण स्वार्थ के स्थान पर सहानुभूति की शिक्षा।
४. Analects 6.30
己欲立而立人,己欲達而達人。
भावार्थ
जो स्वयं उन्नति चाहता है, वह दूसरों की भी उन्नति करे।
उदारता और लोकहित का आदर्श।
५. Mencius 1A:1
何必曰利?亦有仁義而已矣。
भावार्थ
लाभ की ही बात क्यों करते हो? मानवता और धर्म की बात करो।
लोभ की अपेक्षा सदाचार को श्रेष्ठ कहा गया है।
६. Analects 15.24
君子求諸己,小人求諸人。
भावार्थ
श्रेष्ठ पुरुष अपने भीतर सुधार खोजता है, सामान्य व्यक्ति दूसरों में दोष खोजता है।
संकीर्णता छोड़कर आत्मसुधार की शिक्षा है।
७. Doctrine of the Mean अध्याय 13
施諸己而不願,亦勿施於人。
भावार्थ
जो व्यवहार तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों के साथ भी मत करो।
करुणा और न्यायपूर्ण व्यवहार की प्रेरणा।
इन कन्फ्यूशियस प्रमाणों में वही वैदिक भावना प्रकट होती है कि मनुष्य का हृदय लोभ और संकीर्णता से मुक्त होकर धर्म, दया, सहानुभूति और लोकहित से युक्त होना चाहिए।
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी प्रकार शिन्तो परम्परा में भी शुद्ध हृदय, निष्कपटता, दया, सामंजस्य और स्वार्थत्याग की शिक्षा दी गयी है। शिन्तो मत में “मकतो” (真心 — सच्चा हृदय) तथा “वा” (和 — सामंजस्य) को अत्यन्त महत्त्व प्राप्त है।
१. Kojiki
清き明き心を以て事に当たれ。
भावार्थ
निर्मल और उज्ज्वल हृदय से कार्य करो।
संकीर्णता और स्वार्थ से मुक्त मन की शिक्षा।
२. Nihon Shoki
和を以て貴しとなす。
भावार्थ
सामंजस्य को सर्वोच्च मानो।
लोभ और स्वार्थ के स्थान पर सामाजिक सौहार्द की शिक्षा।
३. Shinto Teachings
真心は神の心なり。
भावार्थ
सच्चा और निष्कपट हृदय ही देवत्व का हृदय है।
उदार और निष्कपट अन्तःकरण का आदर्श।
४. Shinto Teachings
欲深ければ心濁る。
भावार्थ
अत्यधिक लोभ से हृदय मलिन हो जाता है।
लोभ को आध्यात्मिक अशुद्धि कहा गया है।
५. Kojiki
人を敬い、恵みを分かち合え。
भावार्थ
मनुष्यों का सम्मान करो और अपनी कृपा बाँटो।
दानशीलता और साझेदारी की शिक्षा।
६. Shinto Norito
大神の恵みを天下に施さん。
भावार्थ
देवकृपा को समस्त जगत में बाँटो।
उदारता और लोककल्याण की भावना।
७. Shinto Teachings
清く正しく直き心。
भावार्थ
हृदय को शुद्ध, सत्यनिष्ठ और सीधा रखो।
लोभ और कपट से मुक्त जीवन का आदर्श।
इन शिन्तो प्रमाणों में वही वैदिक भावना प्रकट होती है कि मनुष्य का अन्तःकरण लोभ, कृपणता और संकीर्णता से मुक्त होकर शुद्धता, सामंजस्य, उदारता और निष्कपटता से।
यूनानी दर्शन में प्रमाण--
Rigveda १०।५७।१
“मा अन्तः स्थूर्नो अरातयः”
भावार्थ — हमारे भीतर कंजूसी, लोभ और संकीर्णता न हो।
इसी प्रकार उदारता, संयम, संतोष और लोभ-त्याग की शिक्षा प्राचीन यूनानी दर्शन में भी दी गयी है। Socrates, Plato, Aristotle तथा स्टोइक दार्शनिकों ने लोभ को आत्मिक पतन और संयम को श्रेष्ठ जीवन का आधार माना है।
यूनानी दर्शन से प्रमाण
१. Socrates
“He who is not contented with what he has, would not be contented with what he would like to have.”
भावार्थ
जो अपने पास की वस्तुओं से संतुष्ट नहीं है, वह इच्छित वस्तुएँ मिलने पर भी संतुष्ट नहीं होगा।
लोभ के स्थान पर संतोष की शिक्षा।
२. Plato
“The greatest wealth is to live content with little.”
भावार्थ
थोड़े में संतुष्ट रहना ही सबसे बड़ा धन है।
कृपण संग्रह नहीं, संतोष को श्रेष्ठ कहा गया है।
३. Aristotle
“The liberal man gives rightly.”
भावार्थ
उदार मनुष्य उचित प्रकार से दान देता है।
उदारता को सद्गुण बताया गया है।
४. Diogenes
“The love of money is the mother city of all evils.”
भावार्थ
धन का लोभ अनेक बुराइयों की जननी है।
लोभ को अधर्म का मूल कहा गया है।
५. Epictetus
“Wealth consists not in having great possessions, but in having few wants.”
भावार्थ
सच्चा धन अधिक सम्पत्ति में नहीं, बल्कि कम इच्छाओं में है।
तृष्णा-त्याग की शिक्षा।
६. Seneca
“It is not the man who has too little, but the man who craves more, that is poor.”
भावार्थ
गरीब वह नहीं जिसके पास कम है, बल्कि वह है जो अधिक की लालसा करता रहता है।
लोभ को वास्तविक दरिद्रता कहा गया है।
७. Marcus Aurelius
“Very little is needed to make a happy life.”
भावार्थ
सुखी जीवन के लिए बहुत कम वस्तुओं की आवश्यकता होती है।
सादगी और अलोभ का आदर्श।
इन यूनानी दार्शनिक वचनों में वही वैदिक भावना प्रतिध्वनित होती है कि मनुष्य का जीवन लोभ, कृपणता और असीम इच्छाओं से मुक्त होकर संतोष, उदारता और संयम से युक्त होना चाहिए।
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