ऋगुवेद सूक्ति--(५) की व्याख्या

यह ऋग्वेद का बहुत सुंदर मंत्र है। आइए इसे शब्दार्थ, भावार्थ और तात्त्विक अर्थ—तीनों स्तरों पर समझते हैं।
मंत्र
यो जागार तमृचः कामयन्ते।
ऋग्वेद ५।४४।१४
शब्दार्थ
यः – जो
जागार – जागता है, सचेत रहता है, प्रमादरहित है।
तम्--उसे
ऋचः  – वैदिक ऋचाएँ, दिव्य ज्ञान-वाणी
कामयन्ते--चाहती हैं
👉 शब्दार्थ:
जो जाग्रत रहता है, उसे ऋचाएँ चाहती हैं।
भावार्थ--
जो मनुष्य आलस्य, प्रमाद, अज्ञान और असावधानी से मुक्त होकर जागरूक, अनुशासित और कर्तव्यनिष्ठ रहता है—
वैदिक ज्ञान, दिव्य प्रेरणा और सत्य की वाणी उसी की ओर आकर्षित होती हैं।
दूसरे शब्दों में—
📜 वेद उसी को प्रकट होते हैं जो भीतर से जागा हुआ है।
तात्त्विक अर्थ (गूढ़ भाव)
यहाँ जागरण केवल नींद से उठना नहीं है, बल्कि—
आत्मचेतना में स्थित होना है।
इन्द्रियों पर संयम धर्म और सत्य के प्रति सजगता साधना में निरंतरता होनी चाहिए । ऋचाएँ पुस्तक में बंद नहीं होती हैं, बल्कि वे साधक की चेतना में अवतरित होती हैं।
🔔 जो जागता है वही वेद को “सुन” पाता है।
उपनिषद से प्रमाण--
(१) कठोपनिषद् (१।३।१४)
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। 
उठो, जागो और श्रेष्ठ जनों से ज्ञान प्राप्त करो।
२) भगवद्गीता २।६९
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
अर्थ--
जिस समय सब सोते हैं, संयमी जागता है।
(२) मुण्डकोपनिषद् ३।१।५
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।
भावार्थ –
यह आत्मा सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य से प्राप्त होती है।
👉 जो सजग जीवन जीता है, वही आत्मज्ञान का अधिकारी बनता है।
३- बृहदारण्यकोपनिषद् ४।४।२३
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥
भावार्थ –
यह आत्मा केवल वाणी या बुद्धि से नहीं, बल्कि जाग्रत साधक को स्वयं प्रकट होती है।
👉 जैसे ऋचाएँ जाग्रत को चाहती हैं।
४-. कठोपनिषद् २।२।८
यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि
मनसा सह।
बुद्धिश्च न विचेष्टते
तामाहुः परमां गतिम्॥
भावार्थ –
जब इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि शांत होकर सचेत हो जाते हैं—
वही परम अवस्था है।
👉 यह पूर्ण जागरण की दशा है।
५-. ऐतरेयोपनिषद् १।३।१२
प्रज्ञानं ब्रह्म।
भावार्थ –
चेतना ही ब्रह्म है।
👉 जो प्रज्ञा में जाग्रत है, वही ब्रह्म को प्राप्त करता है।
६. माण्डूक्योपनिषद्-- 
नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं …
शान्तं शिवं अद्वैतं।
भावार्थ –
न बाह्य जागरण, न स्वप्न—
बल्कि उनसे परे साक्षी-जागृति ही सत्य है।
👉 यही वैदिक जागरण का चरम रूप है।
७. छान्दोग्योपनिषद् ६।१४।२
तत्त्वमसि श्वेतकेतो।
भावार्थ –
जब शिष्य जाग्रत होकर सत्य को पहचानता है—
वही ज्ञान फलित होता है।
समन्वय (ऋग्वेद मंत्र से संबंध)
यो जागार तमृचः कामयन्ते (ऋ. ५।४४।१४)
का तात्त्विक निष्कर्ष उपनिषदों में स्पष्ट है—
🔔 ज्ञान उसी को मिलता है जो भीतर से जागा हुआ है।
📜 वेद और उपनिषद—दोनों का स्वर एक ही है।
🌺 महाभारत से प्रमाण
1. महाभारत, उद्योगपर्व
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
भावार्थ –
आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
उद्यम और जागरूकता से किया गया कर्म कभी नष्ट नहीं होता।
👉 जो जाग्रत है, वही धर्म और ज्ञान का पात्र बनता है।
2. महाभारत, शांतिपर्व
प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि
सदा प्रमादं न प्रशंसन्ति सन्तः।
भावार्थ –
प्रमाद (असावधानी, अचेतन अवस्था) को मैं मृत्यु कहता हूँ।
सज्जन कभी प्रमाद की प्रशंसा नहीं करते।
👉 यह वही भाव है—“जो जागा है वही जीवित है”।
3. महाभारत, भीष्म-वचन
जाग्रतः सर्वधर्माणां लोपो नास्ति कदाचन।
भावार्थ –
जो जागरूक है, उसके धर्म का कभी नाश नहीं होता।
🌸 भागवत पुराण से प्रमाण
१- श्रीमद्भागवत 11।2।42
भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिर्
अन्यत्र चैतस्य न जायते यावत्।
भावार्थ –
जब तक चेतना जाग्रत नहीं होती,
तब तक परम अनुभव और ज्ञान प्रकट नहीं होता।
👉 ज्ञान जागरण का फल है।
२-. श्रीमद्भागवत 3।33।7
अहो बतश्वपचोऽतो गरीयान्
यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
भावार्थ –
जिसकी चेतना प्रभु-स्मरण में जाग्रत हो गई, वह सभी से श्रेष्ठ हो जाता है।
३-. श्रीमद्भागवत 1।2।18
नष्टप्रायेष्वभद्रेषु
नित्यं भागवतसेवया।
भगवत्युत्तमश्लोके
भक्तिर्भवति नैष्ठिकी॥
भावार्थ –
नित्य अभ्यास से जब अज्ञान नष्ट होता है, तब भक्ति और ज्ञान जाग्रत हो जाता है।
🌼 हितोपदेश से प्रमाण
1. हितोपदेश, मित्रलाभ
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
भावार्थ –
कार्य केवल इच्छा से नहीं, जाग्रत उद्यम से सिद्ध होते हैं।
जो सोया है, उसके मुख में शिकार स्वयं नहीं जाता है।
2. हितोपदेश--
अप्रमत्तश्च यः कार्ये स सफलो न संशयः।
भावार्थ –
जो अपने कार्य में अप्रमाद (सजग) रहता है, वही सफल होता है।
🌿 चाणक्य (चाणक्यनीति) से प्रमाण
१- चाणक्यनीति
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
भावार्थ –
आलस्य मनुष्य के भीतर बैठा सबसे बड़ा शत्रु है।
👉 आलस्य = अज्ञान, जागरण = ज्ञान।
२- चाणक्यनीति
कार्येषु मन्त्रिणः शूराः
कार्यमध्ये विचक्षणाः।
भावार्थ –
जो कार्य के आरंभ, मध्य और अंत—तीनों में सचेत रहता है,
वही बुद्धिमान कहलाता है।
३-. चाणक्यनीति
सुखार्थी वा त्यजेद्विद्यां
विद्यार्थी वा त्यजेत्सुखम्।
सुखार्थिनः कुतो विद्या
कुतो सुखं विद्यार्थिनः॥
भावार्थ –
विद्या त्याग और जागरण से मिलती है,
सुखासक्ति और प्रमाद से नहीं।
🌸 भर्तृहरि (नीतिशतकम्) से प्रमाण
१- नीतिशतकम्
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
(यह श्लोक भर्तृहरि में भी प्रसिद्ध है)
भावार्थ –
सपने नहीं, जाग्रत प्रयास कार्य सिद्ध करता है।
२-. नीतिशतकम्
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।
क्षणे नष्टे कुतो विद्या कणे नष्टे कुतो धनम्॥
भावार्थ –
क्षण-क्षण सजग रहकर ही विद्या और धन प्राप्त होते हैं।
👉 प्रमाद = क्षय, जागरण = वृद्धि।
३. वैराग्यशतकम् (संबद्ध भाव)
निद्रा तत्त्वविमोहिनी।
भावार्थ –
अज्ञानरूप निद्रा ही सत्य से विमुख करती है।

🌺 श्रीमद्भागवत पुराण से प्रमाण
1. श्रीमद्भागवत 11।9।29
प्रमत्तस्य हि संसारो
यथा स्वप्नोऽनुभूयते।
भावार्थ –
जो प्रमाद (अचेतन अवस्था) में है,
उसका संसार स्वप्न के समान है।
👉 अजागृति = बन्धन।
2. श्रीमद्भागवत 3।27।4
यदा मनः स्वं विरजं भवेत्
तदैव पुण्यं भजते महात्मा।
भावार्थ –
जब मन शुद्ध होकर सचेत हो जाता है,
तभी पुण्य और ज्ञान प्रकट होते हैं।
3. श्रीमद्भागवत 1।5।17
त्यक्त्वा स्वधर्मं चरणाम्बुजं हरेः
भजन्नपक्वोऽथ पतत्तो यदि।
यत्र क्व वा अभद्रमभूदमुष्य
किं को वाऽर्थ आप्तोऽभजतां स्वधर्मतः॥
भावार्थ –
ईश्वर-चेतना में जाग्रत व्यक्ति कभी नष्ट नहीं होता।
👉 जागरण ही रक्षक है।
🌼 विष्णु पुराण से प्रमाण
१-. विष्णु पुराण 2।13।6
अविद्यायां निबद्धानां
प्रमत्तानां विशेषतः।
जन्ममृत्युं न पश्यन्ति
पशुवद् व्यवहारिणः॥
भावार्थ –
अविद्या और प्रमाद में पड़े लोग
जन्म–मृत्यु को नहीं समझते,
वे पशु के समान आचरण करते हैं।
👉 जागरण = मनुष्यत्व।
२- विष्णु पुराण
ज्ञानमेव तु कैवल्यं
अज्ञानं बन्ध उच्यते।
भावार्थ –
ज्ञान ही मोक्ष है,
अज्ञान ही बन्धन है।
👉 ज्ञान = जाग्रति।
🌸 गरुड़ पुराण से प्रमाण
१-. गरुड़ पुराण
प्रमादो नरकद्वारं
ज्ञानं मोक्षस्य कारणम्।
भावार्थ –
प्रमाद नरक का द्वार है,
ज्ञान मोक्ष का कारण है।
👉 यह सीधा “जागो या गिरो” का संदेश है।
२. गरुड़ पुराण
अप्रमत्तः सदा भवेत्
धर्ममार्गे विशेषतः।
भावार्थ –
धर्ममार्ग में मनुष्य को
सदैव अप्रमाद (जाग्रत) रहना चाहिए।
🌷 पद्म पुराण से प्रमाण
 पद्म पुराण--
निद्रा तु मोहजननी
जागरणं ज्ञानलक्षणम्।
भावार्थ –
निद्रा (अज्ञान) मोह को जन्म देती है,
जागरण ज्ञान का लक्षण है।
🌼 मार्कण्डेय पुराण से प्रमाण
 मार्कण्डेय पुराण--
यः प्रमादे स्थितो नित्यं
स धर्मं नाधिगच्छति।
भावार्थ –
जो सदा प्रमाद में रहता है,
वह कभी धर्म को नहीं पाता।
🔔 समन्वय (वेद से पुराण तक)
वेद कहते हैं—ऋचाएँ जाग्रत को चाहती हैं।
पुराण कहते हैं—जागरण ही मनुष्य का धर्म है।
🌿 मनुस्मृति से प्रमाण
1. मनुस्मृति 2।100
प्रमादं वै मृत्युमहं ब्रवीमि
सदाऽप्रमादं प्रशंसन्ति सन्तः।
भावार्थ –
प्रमाद को मृत्यु कहा गया है,
और सज्जन सदा अप्रमाद (जागरण) की प्रशंसा करते हैं।
2. मनुस्मृति 4।240
अप्रमत्तः सदा धर्मं
सेवेत मनुजः सदा।
भावार्थ –
मनुष्य को सदा जाग्रत रहकर धर्म का आचरण करना चाहिए।
🌼 याज्ञवल्क्य स्मृति से प्रमाण
याज्ञवल्क्य स्मृति 1।122
प्रमादाद्धि मनुष्याणां
कार्याणि विनशन्ति वै।
भावार्थ –
प्रमाद से मनुष्य के कार्य नष्ट हो जाते हैं।
👉 जागरण = सिद्धि।
🌸 पतञ्जलि योगसूत्र से प्रमाण
(१) योगसूत्र-- 1।21
तीव्रसंवेगानामासन्नः।
भावार्थ –
जो साधक तीव्र जागरूकता और उत्कट साधना रखता है,
उसके लिए सिद्धि निकट होती है।
(२) योगसूत्र --1।22
मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः।
भावार्थ –
जितनी तीव्र सजगता,
उतनी शीघ्र सिद्धि।
(३). योगसूत्र-- 2।4
अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां
प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्।
भावार्थ –
अविद्या कभी सुप्त, कभी क्षीण, कभी सक्रिय रहती है।
👉 योग का उद्देश्य है जागरण।
🌷 सांख्यकारिका से प्रमाण--
सांख्यकारिका --64
तस्मादसक्तः सततं
कार्यं कुर्याद् बुद्धिमान्।
भावार्थ –
बुद्धिमान व्यक्ति सचेत रहकर कर्म करता है।
🌺 शतपथ ब्राह्मण से प्रमाण--
 शतपथ ब्राह्मण 10।5।2।9
जागरणं हि प्रज्ञानस्य द्वारम्।
भावार्थ –
जागरण ही प्रज्ञा का द्वार है।
🌼 तैत्तिरीय आरण्यक से प्रमाण--
 तैत्तिरीय आरण्यक 1।11
प्रज्ञया हि जीवनं भवति।
भावार्थ –
प्रज्ञा (जाग्रत चेतना) से ही जीवन सार्थक होता है।+-------+--------+---------+-------+

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