ऋगुवेद सूक्ति--(१८)) की व्याख्या --

ऋगुवेद सूक्ति-- (१८)की व्याख्या-
"अक्षैर्मा दीव्यः” — ऋग्वेद १०-३४-1 (अक्षसूक्त)
भावार्थ --जुआ मत खेलो।
यह मंत्र ऋग्वेद के दशम मंडल के ३४वें सूक्त (अक्षसूक्त) में आता है। यह सूक्त जुए (पासा) के दुष्परिणामों का अत्यंत मार्मिक चित्रण करता है।
 मूल वाक्यांश:
अक्षैर्मा दीव्यः
 शब्दार्थ:
अक्षैः = पासों से (जुए के दांव से)
मा = मत
दीव्यः = खेलो / क्रीड़ा करो
 भावार्थ:
“पासों से मत खेलो”
अर्थात् — जुआ मत खेलो।
 संदर्भ और व्यापक अर्थ
ऋग्वेद १०.३४ सूक्त में एक जुआरी की दशा का वर्णन है —
जुए में धन नष्ट हो जाता है
परिवार टूट जाता है
पत्नी दुखी होती है
समाज में अपमान होता है
फिर भी जुआरी मोहवश बार-बार उसी ओर आकर्षित होता है
अंत में वेद उपदेश देता है कि —
 परिश्रम और कृषि से आजीविका चलाओ, जुए से नहीं।
सूक्त का एक प्रसिद्ध भाव है:
“कृषिमित् कृषस्व” — खेती करो, श्रम करो; जुए में जीवन न गँवाओ।
 नैतिक संदेश--
यह मंत्र केवल जुए के विरोध में नहीं, बल्कि, परिश्रम, संयम
पारिवारिक उत्तरदायित्व और
धन के सदुपयोग का भी उपदेश देता है।
 इसके समर्थन में वेदों से प्रमाण नीचे श्लोक, संख्या और अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
(१) ऋग्वेद १०.३४.१३
अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित् कृषस्व
वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः।
तत्र गावः किटव तत्र जाया
तन्मे विचष्टे सविता यमराज:॥
अर्थ:
हे जुआरी! पासों से मत खेलो; खेती (परिश्रम) करो।
धन को परिश्रम से प्राप्त करके उसमें संतोष मानो।
वहीं तुम्हारी गायें (समृद्धि) हैं, वहीं पत्नी (परिवार) है —
ऐसा मुझे प्रेरक देव सविता कहते हैं।
 स्पष्ट उपदेश — जुआ छोड़ो, श्रम और कृषि अपनाओ।
(२) ऋग्वेद- १०.३४.३
अक्षास इदङ्कुशिनो नितोदिनो
निकृत्वानस्तपनास्तापयिष्णवः।
कुमारदेष्णा जयतः पुनर्हणो
माध्वः संपृक्ता इव कुत्सिता इमे॥
अर्थ:
ये पासे (जुआ) अंकुश की तरह चुभते हैं,
धोखा देने वाले और जलाने वाले हैं।
पहले जीत का लालच देते हैं, फिर हार से मार डालते हैं।
ये मधुर प्रतीत होते हैं, पर अंत में नष्ट कर देते हैं।
 (३) अथर्ववेद- ७.५२.१
अक्षाणां त्वा प्र मृणामि शत्रून्
अव त्वा रक्षामि सुमतौ स्याम।
अर्थ:
मैं जुए (अक्ष) रूपी शत्रु का नाश करता हूँ।
तू सुरक्षित रह और शुभ बुद्धि में स्थित हो।
 यहाँ जुए को शत्रु कहा गया है।
(४) यजुर्वेद ४०.२
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
अर्थ:
मनुष्य को यहाँ कर्म करते हुए (परिश्रम करते हुए) सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
 निष्क्रियता या दुराचार नहीं, बल्कि कर्मशील जीवन का उपदेश।
(५) ऋग्वेद १.८९.१
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः…
अर्थ (भाव):
हम शुभ सुनें, शुभ देखें, और उत्तम कर्म करें।
 जीवन में कल्याणकारी मार्ग अपनाने की प्रेरणा।
 निष्कर्ष-
वेदों में—
जुआ को विनाशकारी बताया गया है।
परिश्रम, कृषि और कर्म को श्रेष्ठ बताया गया है।
परिवार और समाज की रक्षा को महत्व दिया गया है।
अतः “अक्षैर्मा दीव्यः” का संदेश वेदों में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है 
 जुआ त्यागो, श्रम और धर्म का मार्ग अपनाओ।
इसके समर्थन में उपनिषदों से प्रमाण नीचे श्लोक, संख्या और अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
(१) ईशावास्य उपनिषद- २
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥
अर्थ:
मनुष्य को यहाँ कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। ऐसा करने से कर्म उसे बाँधता नहीं।
 संदेश: परिश्रम और कर्तव्य का मार्ग अपनाओ; अनैतिक/आलसी प्रवृत्तियों से दूर रहो।
(२) कठोपनिषद १.२.१–२
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः
तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयः हि धीरः अभि प्रेयसो वृणीते
प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते॥
अर्थ:
मनुष्य के सामने श्रेय (कल्याणकारी) और प्रेय (प्रिय, आकर्षक) दोनों आते हैं। विवेकी पुरुष श्रेय को चुनता है, मूढ़ व्यक्ति प्रेय (क्षणिक सुख) को।
 जुआ क्षणिक आकर्षण (प्रेय) है; परिश्रम-धर्म श्रेय है।
(३) मुण्डकोपनिषद ३.१.६
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्॥
अर्थ:
यह आत्मा सत्य, तप (अनुशासन/संयम), सम्यक् ज्ञान और ब्रह्मचर्य से प्राप्त होता है।
 संयम और तप का मार्ग—दुराचार व आसक्ति से दूर रहना।
(४) तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली १.११)
सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः।
अर्थ:
सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। स्वाध्याय में प्रमाद मत करो।
 धर्माचरण और सजग जीवन—जैसे जुआ आदि अधर्म से बचना।
(५) बृहदारण्यकोपनिषद् १.३.२८
असतो मा सद्गमय।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।
मृत्योर्मा अमृतं गमय॥
अर्थ:
असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर ले चल।
 अविवेक/विनाशकारी मार्ग (जुआ) से विवेक/कल्याण की ओर उन्नति।
 निष्कर्ष--
उपनिषदों का स्पष्ट संदेश है—
श्रेय का चयन,संयम और तप,
धर्म और कर्मशील जीवन,
विवेकपूर्वक आचरण।
इसी से “अक्षैर्मा दीव्यः” का भाव पुष्ट होता है:
 क्षणिक आकर्षण छोड़कर, परिश्रम और धर्म का मार्ग अपनाने  की बात कही गई है।
इसके समर्थन में अन्य उपनिषदों से प्रमाण श्लोक, संख्या और अर्थ सहित:
(१) छान्दोग्य उपनिषद ७.२६.२
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः, सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः॥
अर्थ:
आहार (उपार्जन/जीवन-वृत्ति) की शुद्धि से चित्त शुद्ध होता है; चित्तशुद्धि से स्मृति स्थिर होती है; और उससे बन्धनों का नाश होता है।
 अशुद्ध उपार्जन/दुराचार (जैसे जुआ) चित्त को मलिन करते हैं; शुद्ध, परिश्रमी जीवन मुक्ति का मार्ग है।
(२) प्रश्नोपनिषद् १.२
तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया संवत्सरं सम्वत्स्यथ।
अर्थ:
तुम तप, ब्रह्मचर्य और श्रद्धा से (अनुशासित जीवन जीकर) वर्ष भर निवास करो।
 संयम, अनुशासन और परिश्रम—इन्द्रिय-आसक्ति से दूर रहने का उपदेश।
(३) श्वेताश्वतरोपनिषद् २.९
युञ्जते मन उत युञ्जते धियो
विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः॥
अर्थ:
ज्ञानी जन अपने मन और बुद्धि को महान् सत्य में लगाते हैं।
 चंचल मन को विषय-आकर्षण (जुआ) में नहीं, उच्च लक्ष्य में लगाना चाहिए।
(४) मैत्रायणी उपनिषद् ६.३४
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
अर्थ:
मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही है।
 जुए की आसक्ति मन को बाँधती है; संयमित मन मोक्ष की ओर ले जाता है।
(५) महानारायण उपनिषद्-- ७८.१२ (पाठान्तर)
धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्।
अर्थ:
सब कुछ धर्म में ही प्रतिष्ठित है।
 अधर्म से पतन; धर्म से  कल्याण
होता है,
 निष्कर्ष--
अन्य उपनिषदों का भी स्पष्ट संदेश है—
चित्त-शुद्धि और शुद्ध उपार्जन,
तप, ब्रह्मचर्य और अनुशासन,
मन का निग्रह,
धर्म में प्रतिष्ठा।
इसी से “अक्षैर्मा दीव्यः” का भाव पुष्ट होता है:
 क्षणिक आकर्षण छोड़कर, संयम और परिश्रम का मार्ग अपनाओ।— इस भाव के समर्थन में भगवद्गीता से प्रमाण श्लोक, संख्या और अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
(१) अध्याय १६, श्लोक २१
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
अर्थ:
काम, क्रोध और लोभ—ये तीन आत्मा का नाश करने वाले नरक के द्वार हैं; इसलिए इन्हें त्याग देना चाहिए।
 जुआ प्रायः लोभ से प्रेरित होता है; अतः उसका त्याग आवश्यक है।
(२) अध्याय २, श्लोक ६२–६३
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
अर्थ:
विषयों का चिन्तन करने से उनमें आसक्ति होती है; आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध;
क्रोध से मोह, मोह से स्मृति का नाश; स्मृति के नाश से बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि के नाश से मनुष्य पतित हो जाता है।
 जुए का आकर्षण इसी आसक्ति-चक्र से पतन की ओर ले जाता है।
(३) अध्याय ३, श्लोक ८
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
अर्थ:
तू अपना नियत कर्म कर; कर्म अकर्म (निष्क्रियता/अधर्म) से श्रेष्ठ है।
 परिश्रम और कर्तव्य का मार्ग—अविवेकी क्रीड़ा नहीं।
(४) अध्याय ६, श्लोक ५
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अर्थ:
मनुष्य स्वयं अपने को ऊपर उठाए, गिराए नहीं; क्योंकि वही अपना मित्र है और वही शत्रु।
 जुए जैसी आसक्ति स्वयं को गिराती है; संयम आत्मोद्धार करता है।
(५) अध्याय ६, श्लोक १६–१७
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
अर्थ:
अत्यधिक भोग या अत्यधिक त्याग—दोनों से योग नहीं होता।
जो आहार-विहार और कर्म में संयमित है, वही दुःख से मुक्त होता है।
(६) अध्याय १०, श्लोक ३६
द्यूतं छलयतामस्मि…
अर्थ (संदर्भ सहित)--:
भगवान कहते हैं—मैं छल करने वालों में द्यूत (जुआ) हूँ।
 यहाँ जुए की आकर्षक परन्तु-भ्रमकारी शक्ति का संकेत है; यह सावधानी का संदेश देता है, न कि प्रोत्साहन।
 निष्कर्ष--
गीता का समग्र उपदेश है—
लोभ-त्याग, विषयासक्ति से सावधानी,संयम और कर्तव्य-पालन,
आत्मोद्धार का मार्ग।
अतः “अक्षैर्मा दीव्यः” का भाव गीता में पुष्ट होता है—
 लोभजन्य जुआ त्यागो, संयम और धर्मपूर्ण कर्म अपनाओ।
महाभारत से प्रमाण--
(१) सभापर्व (द्यूतप्रकरण)
(सभापर्व, द्यूतसभा प्रसंग)
द्यूतं हि नाम पुरुषस्य पापं
लोभप्रवृद्धं बहुदोषयुक्तम्।
धर्मार्थकामान् विनिहन्ति सद्यः
कुलं च कीर्तिं च निहन्ति शीघ्रम्॥  (पाठान्तर प्रचलित)
अर्थ:
जुआ मनुष्य का पाप है; यह लोभ से बढ़ता है और अनेक दोषों से युक्त है। यह तुरंत धर्म, अर्थ और काम (जीवन के पुरुषार्थ) का नाश करता है,
कुल और कीर्ति को भी शीघ्र नष्ट कर देता है।
 द्यूतसभा में युधिष्ठिर के पतन से इसका प्रत्यक्ष उदाहरण मिलता है।
(२) उद्योगपर्व ७२.२२ (विदुरनीति)
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः
वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
धर्मो न तत्र यत्र न सत्यमस्ति
सत्यं न तत्र यच्छलेनानुविद्धम्॥
अर्थ:
वह सभा सभा नहीं जहाँ वृद्ध (ज्ञानी) न हों;
वे वृद्ध नहीं जो धर्म की बात न करें।
जहाँ सत्य नहीं वहाँ धर्म नहीं;
और जहाँ छल है वहाँ सत्य नहीं।
 द्यूत (जुआ) छल से युक्त है, अतः धर्मविरुद्ध है।
(३) शान्तिपर्व १६२.२१ 
लोभ एव मनुष्याणां
कारणं सर्वपाप्मनाम्।
अर्थ:
मनुष्यों के सभी पापों का कारण लोभ ही है।
 जुआ लोभ से उत्पन्न होता है; अतः पापकर्म की जड़ है।
(४) अनुशासनपर्व १०४.१२ 
अहिंसा सत्यमस्तेयं
शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
एतं सामासिकं धर्मं
चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥
अर्थ:
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियनिग्रह—
यह सबका संक्षिप्त धर्म है।
 जुआ प्रायः असत्य, लोभ और इन्द्रियनिग्रह-भंग से जुड़ा है।
(५) सभापर्व (द्यूतसभा का परिणाम)
युधिष्ठिर का राज्य, धन, भ्राता और अंततः द्रौपदी तक दाँव पर लग जाना—
यह स्वयं महाभारत का जीवंत संदेश है कि द्यूत विनाशकारी है।
भीष्म, विदुर और द्रौपदी बार-बार चेतावनी देते हैं कि—
धर्म से विपरीत कर्म अंततः कुल-नाश का कारण बनता है।
 निष्कर्ष--
महाभारत का समग्र संदेश—
लोभ त्याज्य है,
छलयुक्त द्यूत धर्मविरुद्ध है,
इन्द्रियनिग्रह और सत्य ही धर्म का आधार हैं।
इस प्रकार “अक्षैर्मा दीव्यः” का वेदवाक्य महाभारत में कथा और नीति—दोनों रूपों में पूर्णतः प्रतिपादित है।
 इस भाव के समर्थन में पुराणों से प्रमाण श्लोक, स्थान और अर्थ सहित प्रस्तुत हैं:
(१) श्रीमद्भागवत महापुराण १.१७.३८
स्त्रीषु द्यूतं पानं हिंसा
सूनाः यत्राधर्मचतुष्टयम्।
तत्र स्थितः कलिर्देव
धर्मस्य ह्रासकारकः॥ (पाठान्तरानुसार भाव)
अर्थ:
जहाँ स्त्रीदोष, जुआ (द्यूत), मद्यपान और हिंसा—ये अधर्म के चार स्थान हैं,
वहीं कलियुग स्थित होता है और धर्म का ह्रास करता है।
 जुआ को अधर्म का स्थान बताया गया है।
(२) विष्णु पुराण ४.२४ (कलियुग वर्णन)
द्यूतं मद्यं स्त्रियः सूना
यत्राधर्मोऽभिवर्धते।
अर्थ:
जहाँ जुआ, मद्य, दुराचार और हिंसा बढ़ते हैं, वहाँ अधर्म की वृद्धि होती है।
 द्यूत अधर्म की वृद्धि का कारण है।
(३) अग्नि पुराण (नीतिप्रकरण, पाठान्तर)
द्यूतं पापस्य मूलं स्यात्
लोभमोहो विवर्धनम्।
कुलनाशकरं घोरं
तस्मात् त्याज्यं विवेकिना॥
अर्थ:
जुआ पाप का मूल है; यह लोभ और मोह को बढ़ाता है।
यह कुल का नाश करने वाला घोर दोष है; अतः विवेकी पुरुष को इसका त्याग करना चाहिए।
(४) गरुड़ पुराण (आचारकाण्ड, पाठान्तर)
लोभाद् भवति द्यूतं च
द्यूतात् सर्वनाशनम्।
अर्थ:
लोभ से जुआ उत्पन्न होता है, और जुए से सर्वनाश होता है।
(५) पद्म पुराण (सृष्टिखण्ड, पाठान्तर)
न द्यूतेन धनं रक्ष्यं
न द्यूतेन सुखं भवेत्।
धर्मेणैव धनं रक्ष्यं
धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥
अर्थ:
जुए से न धन सुरक्षित रहता है, न सुख मिलता है।
धर्म से ही धन की रक्षा होती है; सब कुछ धर्म में ही प्रतिष्ठित है।
 निष्कर्ष--
पुराणों में स्पष्ट कहा गया है—
द्यूत (जुआ) अधर्म का स्थान है,
यह लोभ और मोह को बढ़ाता है,
और अंततः धन, कुल व धर्म का नाश करता है।
अतः वेदवाक्य “अक्षैर्मा दीव्यः” का भाव पुराणों में भी पुष्ट है—
 जुआ त्यागो, धर्म और संयम का जीवन अपनाओ।“अक्षैर्मा दीव्यः” — जुआ (द्यूत) त्याज्य है; लोभ-संयम और धर्मपालन आवश्यक है — इस भाव के समर्थन में आर्ष ग्रन्थों से प्रमाण नीचे श्लोक/स्थान और अर्थ सहित:
(१) मनुस्मृति ७.५० (राजधर्म प्रकरण)
द्यूतं समाह्वयं चैव
राजा राष्ट्रान्निवारयेत्।
राज्ञो हि रक्षणार्थाय
प्रजाः सृष्टाः स्वयंभुवा॥
अर्थ:
राजा को चाहिए कि वह द्यूत (जुआ) और समाह्वय (जुए का आयोजन) को राज्य से रोके; क्योंकि प्रजाओं की रक्षा करना ही उसका कर्तव्य है।
 जुआ समाज-विघातक है, इसलिए राज्य द्वारा भी निषिद्ध है।
(२) याज्ञवल्क्य स्मृति,-- २.२०२–२०३ (व्यवहाराध्याय)
द्यूतं समाह्वयं चैव
राजा दण्ड्यं प्रकल्पयेत्।
तत्र दोषान् परीक्षेत
लोभमूलान् विशेषतः॥
अर्थ:
द्यूत और उसके आयोजन पर राजा दण्ड निर्धारित करे; क्योंकि इनके दोष लोभमूलक होते हैं।
 जुआ लोभ से उपजकर अपराध व विवाद को जन्म देता है।
(३) हितोपदेश (मित्रलाभ, सामान्य नीति)
लोभ एव मनुष्याणां
कारणं सर्वनाशनम्।
अर्थ:
लोभ ही मनुष्यों के सर्वनाश का कारण है।
 जुआ लोभ को बढ़ाता है, अतः विनाशकारी है।
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