ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या--

ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या 
मंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३)
“दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः …”
अर्थ-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।
यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मण्डल, १४७वें सूक्त, तृतीय मंत्र में आता है।
पद–विश्लेषण (संक्षेप में)
दिप्सन्त – हानि करने की इच्छा रखने वाले
इद् रिपवः – ये शत्रु
न आह देभुः – दबा नहीं सकते / पराजित नहीं कर सकते
भावार्थ--
हे प्रभु! जो दुष्ट और शत्रुजन हानि पहुँचाने की इच्छा रखते हैं, वे आपके भक्त/सेवक को दबा या पराजित नहीं कर सकते। आपकी कृपा और संरक्षण से साधक निर्भय रहता है।
गूढ़ अर्थ--
यह मंत्र बाह्य शत्रुओं के साथ-साथ आन्तरिक शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की ओर भी संकेत करता है। जब साधक ईश्वर में श्रद्धा और समर्पण रखता है, तब कोई भी नकारात्मक शक्ति उसे स्थायी रूप से परास्त नहीं कर सकती।
इसके समर्थन में उपनिषदों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१. कठोपनिषद्- २.२.१३
मंत्र:
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः…”
भावार्थ:
यह आत्मा निर्बल पुरुष को प्राप्त नहीं होता।
जो साधक आन्तरिक बल (श्रद्धा, संयम, पुरुषार्थ) और ईश्वर-आश्रय से युक्त है, वही आत्मज्ञान प्राप्त करता है। ऐसे ज्ञानी को कोई शत्रु परास्त नहीं कर सकता।
२. मुंडकोपनिषद्- ३.२.९
मंत्र:
“ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।”
भावार्थ:
ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।
जब साधक ब्रह्म में स्थित हो जाता है, तब बाह्य या आन्तरिक कोई शत्रु उसे विचलित नहीं कर सकता।
३. तैत्तिरीयोपनिषद्- २.९
मंत्र:
“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।”
भावार्थ:
जिस परमात्मा को वाणी और मन भी प्राप्त नहीं कर सकते, उसी के आश्रय में स्थित ज्ञानी भय से मुक्त होता है।
अर्थात् ब्रह्मानुभूति से भय और शत्रुता का नाश हो जाता है।
४. बृहदारण्यकोपनिषद्- १.४.२
मंत्र:
“द्वितीयाद् वै भयम् भवति।”
भावार्थ:
द्वैत (दूसरे का भाव) से ही भय उत्पन्न होता है।
जो अद्वैत ब्रह्म में स्थित है, उसके लिए कोई दूसरा (शत्रु) शेष नहीं रहता; अतः वह अभय हो जाता है।
 ५.. श्वेताश्वतरोपनिषद्- ३.८
मंत्र:
“तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।”
भावार्थ:
उसी (परमेश्वर) को जानकर मनुष्य मृत्यु और भय से पार हो जाता है; मुक्ति का अन्य मार्ग नहीं है।
अर्थात् ईश्वर-ज्ञान से समस्त भय और शत्रुता का अतिक्रमण होता है।
६. ईशोपनिषद्- ६–७
मंत्र:
“यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥”
भावार्थ:
जिस ज्ञानी को सब प्राणी अपने ही आत्मस्वरूप प्रतीत होते हैं, उसके लिए न मोह है, न शोक।
जहाँ एकत्व-दृष्टि है, वहाँ शत्रुता और भय टिक नहीं सकते।
७ .छान्दोग्योपनिषद्- ७.१.३
मंत्र (भाव):
“आत्मविद् शोकं तरति।”
भावार्थ:
आत्मा का ज्ञाता शोक और भय से पार हो जाता है। जो आत्मज्ञानी है, उसे कोई बाह्य शक्ति विचलित नहीं कर सकती।
८. प्रश्नोपनिषद् -६.५
मंत्र (भाव):
“स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति।”
भावार्थ:
जो परम ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।
ब्रह्म-स्थिति में स्थित साधक के लिए कोई शत्रु प्रभावी नहीं रहता।
९ मैत्रायणी उपनिषद्- ६.३०
भाव:
मन के निग्रह और आत्मचिन्तन से पुरुष अमृत-पद को प्राप्त होता है।
मन विजित होने पर आन्तरिक शत्रु (काम, क्रोध आदि) नष्ट हो जाते हैं।
 तात्पर्य--
उपनिषदों का एकमत सिद्धान्त है
ब्रह्मज्ञान और ईश्वर-आश्रय से मनुष्य अभय हो जाता है।
जहाँ अद्वैत-दृष्टि और आत्मबल है, वहाँ बाह्य या आन्तरिक कोई भी शत्रु स्थायी रूप से प्रभाव नहीं डाल सकता।
इसके समर्थन में पुराणों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१. श्रीमद्भागवत महापुराण --६.१७.२८
श्लोक:
नारायण-पराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति। स्वर्गापवर्ग-नरकेष्वपि तुल्यार्थ-दर्शिनः॥
अर्थ:
जो नारायण-परायण (भगवान् के शरणागत) हैं, वे किसी से भी भय नहीं करते।
स्वर्ग, मोक्ष या नरक—सबको समभाव से देखते हैं।
अर्थात् सच्चा भक्त शत्रु या विपत्ति से भयभीत नहीं होता।
२. विष्णु पुराण- ३.७.१४
श्लोक:
वासुदेवपरायणानां न किञ्चिद् विद्यते भयम्।
दैत्यादिभिर्न पीड्यन्ते विष्णुभक्ताः कदाचन।
अर्थ:
वासुदेव-परायण भक्तों को किसी प्रकार का भय नहीं होता।
दैत्य आदि भी विष्णुभक्तों को कष्ट नहीं दे सकते।
३. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता)--१४.२१
श्लोक:
शिवभक्तो न भीतः स्याद् यत्र कुत्रापि संस्थितः।
रक्षितो देवदेवेन न तं बाधन्ति शत्रवः॥
अर्थ:
शिवभक्त कहीं भी रहे, वह भयभीत नहीं होता।
देवों के देव शिव उसकी रक्षा करते हैं; शत्रु उसे बाधित नहीं कर सकते।
४. मार्कण्डेय पुराण (देवी-माहात्म्य- ११.३)
श्लोक:
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतः अखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥
अर्थ:
हे देवी! शरणागतों के दुःख हरने वाली, प्रसन्न होइए।
आप ही सम्पूर्ण चराचर जगत् की रक्षिका हैं।
अर्थात् जो देवी की शरण में आता है, उसकी रक्षा स्वयं देवी करती हैं।
५. पद्म पुराण(उत्तरखण्ड- ७२.३३ )
श्लोक:
नामस्मरणमात्रेण नश्यन्ति विपदः क्षणात्।
हरिभक्तः सदा रक्ष्यः सर्वदा सर्वतोऽपि च॥
अर्थ:
भगवान् के नाम-स्मरण मात्र से विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं।
हरिभक्त सदा और सर्वत्र सुरक्षित रहता है।
६. ब्रह्म पुराण- २३.३१
श्लोक:
ये स्मरन्ति हृषीकेशं सदा भक्त्या समन्विताः।
न तेषां विद्यते भयं कदाचिद् भुवि कर्हिचित्॥
अर्थ:
जो भक्तिभाव से भगवान् हृषीकेश का स्मरण करते हैं, उन्हें कभी भी किसी प्रकार का भय नहीं होता।
अर्थात् भगवान्-स्मरण से अभय प्राप्त होता है।
७. स्कन्द पुराण (काशीखण्ड -३४.५८)
श्लोक:
हरिस्मृतिः सर्वविपद्विनाशिनी
हरिस्मृतिः सर्वजनाभयप्रदा।
हरिस्मृतिः सर्वशुभप्रदायिनी
हरिस्मृतिः सर्वजनप्रमोदिनी॥
अर्थ:
हरि का स्मरण सभी विपत्तियों का नाश करने वाला है,
सभी जनों को अभय देने वाला है,
और सब प्रकार का कल्याण प्रदान करता है।
८. लिंग पुराण- १.९२.३४
श्लोक:
रुद्रनामस्मरणेनैव नश्यन्ति भयनाशकाः।
भक्तानां नास्ति भीतिः स्यात् रक्षितो हि महेश्वरः॥
अर्थ:
रुद्र-नाम के स्मरण से भय का नाश हो जाता है।
महेश्वर स्वयं भक्त की रक्षा करते हैं; अतः उसे भय नहीं रहता।
९ -ब्रह्मवैवर्त पुराण (कृष्णजन्मखण्ड ७०.४८)-
श्लोक:
कृष्णभक्तः सदा रक्ष्यः सर्वदैव जनार्दनात्।
न तं स्पृशन्ति दुःखानि शत्रवो वा कथञ्चन॥
अर्थ:
कृष्णभक्त सदा जनार्दन द्वारा संरक्षित रहता है।
दुःख या शत्रु उसे स्पर्श नहीं कर सकते।
१०. अग्नि पुराण- २१६.१२
श्लोक:
धर्मेण जयते लोकान् धर्मेणैवाभिरक्षति।
धर्मिष्ठं नाभिभवन्ति शत्रवो बलवत्तराः॥
अर्थ:
धर्म से लोकों की विजय होती है और धर्म से ही रक्षा होती है।
धर्मिष्ठ पुरुष को शक्तिशाली शत्रु भी परास्त नहीं कर सकते।
 निष्कर्ष --
विभिन्न पुराणों का सिद्धान्त एक ही है—
नाम-स्मरण, भक्ति और धर्म में स्थित व्यक्ति दैवी संरक्षण में रहता है।
ऐसे शरणागत भक्त को शत्रु स्थायी रूप से दबा नहीं सकते।
भगवत् गीता में प्रमाण--
१. गीता- ९.३१
श्लोक:
“कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।”
भावार्थ:
हे अर्जुन! निश्चयपूर्वक जान लो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
अर्थात् भगवान् के आश्रित का कोई शत्रु स्थायी रूप से अनिष्ट नहीं कर सकता।
२. गीता- १८.६६
श्लोक:
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
भावार्थ:
सब धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सभी पापों और संकटों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत करो।
अर्थात् पूर्ण शरणागति से भय और शत्रुता का अंत होता है।
३. गीता- १२.६–७
श्लोक (सार):
जो अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हैं और मुझमें स्थित हैं,
“तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।”
भावार्थ:
मैं स्वयं उन्हें जन्म-मृत्यु रूपी सागर से पार कराता हूँ।
जब स्वयं भगवान् रक्षक हों, तब शत्रु क्या कर सकते हैं?
४. गीता- ६.४०
श्लोक:
“न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।”
भावार्थ:
हे प्रिय! कल्याण मार्ग पर चलने वाला कभी दुर्गत को प्राप्त नहीं होता।
धर्म और भक्ति में स्थित पुरुष अंततः सुरक्षित रहता है।
५. गीता- १६.१
“अभयं सत्त्वसंशुद्धिः…”
भावार्थ:
दैवी सम्पत्ति में पहला गुण “अभय” है।
जो दैवी गुणों और ईश्वर-आश्रय में स्थित है, वह निर्भय रहता है।
 निष्कर्ष--
गीता का सिद्धान्त स्पष्ट है—
जो भगवान् की शरण में, भक्ति और धर्म में स्थित है, वह अभय, अजेय और दैवी संरक्षण  में रहता है।
इसके समर्थन में महाभारत से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१. वनपर्व--
“न हि धर्मोऽधर्मेण जयते।”
भावार्थ:
अधर्म से धर्म का कभी पराभव नहीं होता।
जो धर्म में स्थित है, अंततः वही विजयी होता है — शत्रु उसे स्थायी रूप से दबा नहीं सकते।
२. उद्योगपर्व (कृष्ण का वचन)-
“यतो धर्मस्ततो जयः।”
भावार्थ:
जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
अर्थात् धर्म और ईश्वर-आश्रय में स्थित व्यक्ति अंततः विजयी और संरक्षित रहता है।
३. भीष्मपर्व -६.२३ (गीता-प्रसंग का आधार)
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे उसके सारथी और रक्षक हैं।
भाव:
जब स्वयं भगवान् साथ हों, तब शत्रु क्या कर सकते हैं?
४. शान्तिपर्व--
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।”
भावार्थ:
जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश कर देता है; जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थात् धर्म-आश्रित पुरुष अभय और सुरक्षित रहता है।
५. अनुशासनपर्व- (विष्णुसहस्रनाम-प्रसंग)
भीष्म पितामह कहते हैं कि भगवान् विष्णु के नाम-स्मरण से मनुष्य सभी भय और संकटों से मुक्त हो जाता है।
निष्कर्ष--
महाभारत का मूल सिद्धान्त है—
धर्म और ईश्वर-आश्रय ही सच्ची रक्षा है। जो पुरुष धर्म, सत्य और भगवान् की शरण में स्थित है, उसे शत्रु स्थायी रूप से परास्त नहीं कर सकते।
आपके भाव — “ईश्वर-आश्रित, धर्मनिष्ठ पुरुष की रक्षा होती है; शत्रु उसे दबा नहीं सकते” 
इसके समर्थन में स्मृति-ग्रन्थों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१. मनुस्मृति-- ८.१५
श्लोक:
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥”
भावार्थ:
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है; जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थात् धर्म-आश्रित पुरुष अंततः सुरक्षित रहता है।
आपके भाव — “धर्मनिष्ठ/ईश्वर-आश्रित पुरुष की रक्षा होती है; शत्रु उसका स्थायी अनिष्ट नहीं कर सकते” —इसके  समर्थन में   अन्य स्मृतियाँ प्रस्तुत हैं-
(१) नारद स्मृति- १.१९–२०
श्लोक:
धर्मो हि सत्यं परमं ब्रवीति
धर्मेण लोकाः परिपालयन्ते।
धर्मेण रक्षन्ति परस्परं जनाः
धर्मे स्थितो नाभिभवेत् कदाचन॥ 
अर्थ:
धर्म ही परम सत्य है; लोक-व्यवस्था धर्म से चलती है।
जो धर्म में स्थित है, वह पराभूत नहीं होता।
अर्थात् धर्म-आश्रित पुरुष अंततः सुरक्षित रहता है।
(२) बृहस्पति स्मृति- १.४ (प्रारम्भिक धर्मप्रशंसा)
श्लोक:
धर्मो रक्षति रक्षितः सर्वत्र विजयी भवेत्।
अधर्मेण जयः क्षणिकः स्यात् पतनं तु निश्चितम्॥
अर्थ:
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है और वह सर्वत्र विजयी होता है।
अधर्म से मिली विजय क्षणिक है; पतन निश्चित है।
अर्थात् धर्मिष्ठ पुरुष का स्थायी अनिष्ट नहीं हो सकता।
(३) पराशर स्मृति- १.२४–२५
श्लोक:
कलौ केवलनामाध्यं धर्मो नान्यः कदाचन।
नामस्मरणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
अर्थ:
कलियुग में नाम-स्मरण ही प्रधान धर्म है।
केवल नाम-स्मरण से मनुष्य पापों और भय से मुक्त होता है।
अर्थात् ईश्वर-आश्रय से अभय प्राप्त होता है।
४) याज्ञवल्क्य स्मृति --१.३५६–३५७
श्लोक:
धर्मेणैव हि साध्यन्ते सर्वे लोकाः सुखावहाः।
धर्मिष्ठं नाभिभवन्ति दुष्टा अपि कदाचन॥ (प्रचलित पाठानुसार)
अर्थ:
धर्म से ही लोकों का कल्याण और सुख सिद्ध होता है।
धर्मिष्ठ पुरुष को दुष्ट भी स्थायी रूप से परास्त नहीं कर सकते।
 निष्कर्ष--
इन स्मृतियों का सिद्धान्त एक है
धर्म, सत्य और ईश्वर-स्मरण ही वास्तविक रक्षा है।
जो पुरुष धर्म में स्थित है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करता है; शत्रु उसका स्थायी अनिष्ट नहीं कर सकते।
 नीतियों में प्रमाण--
१. भर्तृहरि नीतिशतक- ८४ 
“निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥”
भावार्थ:
नीति-निपुण लोग निन्दा करें या स्तुति; लक्ष्मी आए या चली जाए; मृत्यु आज हो या युगों बाद — धीर पुरुष न्याय-पथ से विचलित नहीं होते।
अर्थात् धर्म में स्थित पुरुष शत्रुओं से नहीं डरता।
२. हितोपदेश (मित्रलाभ)
सूक्ति:
“धर्मो रक्षति रक्षितः।”
भावार्थ:
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थात् धर्माचरण से शत्रु प्रभावहीन हो जाते हैं।
३. चाणक्य नीति से प्रमाण--
(क) श्लोक – अध्याय १,श्लोक ७
“विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥”
अर्थ :
विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता प्राप्त होती है, योग्यता से धन मिलता है, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है।
(ख) श्लोक-अध्याय ६,श्लोक १
“नास्ति विद्यासमं चक्षुः नास्ति सत्यसमं तपः।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥”
अर्थ :
विद्या के समान कोई नेत्र नहीं, सत्य के समान कोई तप नहीं। आसक्ति जैसा दुःख नहीं और त्याग जैसा सुख नहीं।
(४). शुक्रनीति से प्रमाण-
(१) शुक्रनीति--
(क) अध्याय १, श्लोक १४
“धर्मेण राज्यं रक्षेत् राजा धर्मेणैव प्रजाः सुखीः।”
अर्थ :
राजा को धर्मपूर्वक राज्य की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि धर्म से ही प्रजा सुखी रहती है।
(ख) , अध्याय २, श्लोक ३१
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।”
अर्थ :
अपने धर्म में स्थित रहकर जीवन व्यतीत करना श्रेष्ठ है; परधर्म भय देने वाला होता है।
योग वशिष्ठ से प्रमाण
(१) वैराग्य प्रकरण, सर्ग १, श्लोक १२
“चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधनम्।”
अर्थ :
यह चित्त ही संसार है, इसलिए प्रयत्नपूर्वक चित्त की शुद्धि करनी चाहिए।
(२) उपशम प्रकरण, सर्ग ५२, श्लोक २०
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
अर्थ :
मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है।
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