ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या--
ऋगुवेद सूक्ति--(२५) की व्याख्या
मंत्र (ऋग्वेद १/१४७/३)
“दिप्सन्त इद्रिपवो नाहदेभुः …”
अर्थ-- हे प्रभु ! शत्रु आपके दास को नहीं दबा सकते।
यह मंत्र ऋग्वेद के प्रथम मण्डल, १४७वें सूक्त, तृतीय मंत्र में आता है।
पद–विश्लेषण (संक्षेप में)
दिप्सन्त – हानि करने की इच्छा रखने वाले
इद् रिपवः – ये शत्रु
न आह देभुः – दबा नहीं सकते / पराजित नहीं कर सकते
भावार्थ--
हे प्रभु! जो दुष्ट और शत्रुजन हानि पहुँचाने की इच्छा रखते हैं, वे आपके भक्त/सेवक को दबा या पराजित नहीं कर सकते। आपकी कृपा और संरक्षण से साधक निर्भय रहता है।
गूढ़ अर्थ--
यह मंत्र बाह्य शत्रुओं के साथ-साथ आन्तरिक शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि की ओर भी संकेत करता है। जब साधक ईश्वर में श्रद्धा और समर्पण रखता है, तब कोई भी नकारात्मक शक्ति उसे स्थायी रूप से परास्त नहीं कर सकती।
इसके समर्थन में उपनिषदों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१. कठोपनिषद्- २.२.१३
मंत्र:
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः…”
भावार्थ:
यह आत्मा निर्बल पुरुष को प्राप्त नहीं होता।
जो साधक आन्तरिक बल (श्रद्धा, संयम, पुरुषार्थ) और ईश्वर-आश्रय से युक्त है, वही आत्मज्ञान प्राप्त करता है। ऐसे ज्ञानी को कोई शत्रु परास्त नहीं कर सकता।
२. मुंडकोपनिषद्- ३.२.९
मंत्र:
“ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।”
भावार्थ:
ब्रह्म को जानने वाला स्वयं ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।
जब साधक ब्रह्म में स्थित हो जाता है, तब बाह्य या आन्तरिक कोई शत्रु उसे विचलित नहीं कर सकता।
३. तैत्तिरीयोपनिषद्- २.९
मंत्र:
“यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।”
भावार्थ:
जिस परमात्मा को वाणी और मन भी प्राप्त नहीं कर सकते, उसी के आश्रय में स्थित ज्ञानी भय से मुक्त होता है।
अर्थात् ब्रह्मानुभूति से भय और शत्रुता का नाश हो जाता है।
४. बृहदारण्यकोपनिषद्- १.४.२
मंत्र:
“द्वितीयाद् वै भयम् भवति।”
भावार्थ:
द्वैत (दूसरे का भाव) से ही भय उत्पन्न होता है।
जो अद्वैत ब्रह्म में स्थित है, उसके लिए कोई दूसरा (शत्रु) शेष नहीं रहता; अतः वह अभय हो जाता है।
५.. श्वेताश्वतरोपनिषद्- ३.८
मंत्र:
“तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।”
भावार्थ:
उसी (परमेश्वर) को जानकर मनुष्य मृत्यु और भय से पार हो जाता है; मुक्ति का अन्य मार्ग नहीं है।
अर्थात् ईश्वर-ज्ञान से समस्त भय और शत्रुता का अतिक्रमण होता है।
६. ईशोपनिषद्- ६–७
मंत्र:
“यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः।
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥”
भावार्थ:
जिस ज्ञानी को सब प्राणी अपने ही आत्मस्वरूप प्रतीत होते हैं, उसके लिए न मोह है, न शोक।
जहाँ एकत्व-दृष्टि है, वहाँ शत्रुता और भय टिक नहीं सकते।
७ .छान्दोग्योपनिषद्- ७.१.३
मंत्र (भाव):
“आत्मविद् शोकं तरति।”
भावार्थ:
आत्मा का ज्ञाता शोक और भय से पार हो जाता है। जो आत्मज्ञानी है, उसे कोई बाह्य शक्ति विचलित नहीं कर सकती।
८. प्रश्नोपनिषद् -६.५
मंत्र (भाव):
“स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति।”
भावार्थ:
जो परम ब्रह्म को जानता है, वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।
ब्रह्म-स्थिति में स्थित साधक के लिए कोई शत्रु प्रभावी नहीं रहता।
९ मैत्रायणी उपनिषद्- ६.३०
भाव:
मन के निग्रह और आत्मचिन्तन से पुरुष अमृत-पद को प्राप्त होता है।
मन विजित होने पर आन्तरिक शत्रु (काम, क्रोध आदि) नष्ट हो जाते हैं।
तात्पर्य--
उपनिषदों का एकमत सिद्धान्त है
ब्रह्मज्ञान और ईश्वर-आश्रय से मनुष्य अभय हो जाता है।
जहाँ अद्वैत-दृष्टि और आत्मबल है, वहाँ बाह्य या आन्तरिक कोई भी शत्रु स्थायी रूप से प्रभाव नहीं डाल सकता।
इसके समर्थन में पुराणों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१. श्रीमद्भागवत महापुराण --६.१७.२८
श्लोक:
नारायण-पराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति। स्वर्गापवर्ग-नरकेष्वपि तुल्यार्थ-दर्शिनः॥
अर्थ:
जो नारायण-परायण (भगवान् के शरणागत) हैं, वे किसी से भी भय नहीं करते।
स्वर्ग, मोक्ष या नरक—सबको समभाव से देखते हैं।
अर्थात् सच्चा भक्त शत्रु या विपत्ति से भयभीत नहीं होता।
२. विष्णु पुराण- ३.७.१४
श्लोक:
वासुदेवपरायणानां न किञ्चिद् विद्यते भयम्।
दैत्यादिभिर्न पीड्यन्ते विष्णुभक्ताः कदाचन।
अर्थ:
वासुदेव-परायण भक्तों को किसी प्रकार का भय नहीं होता।
दैत्य आदि भी विष्णुभक्तों को कष्ट नहीं दे सकते।
३. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता)--१४.२१
श्लोक:
शिवभक्तो न भीतः स्याद् यत्र कुत्रापि संस्थितः।
रक्षितो देवदेवेन न तं बाधन्ति शत्रवः॥
अर्थ:
शिवभक्त कहीं भी रहे, वह भयभीत नहीं होता।
देवों के देव शिव उसकी रक्षा करते हैं; शत्रु उसे बाधित नहीं कर सकते।
४. मार्कण्डेय पुराण (देवी-माहात्म्य- ११.३)
श्लोक:
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतः अखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥
अर्थ:
हे देवी! शरणागतों के दुःख हरने वाली, प्रसन्न होइए।
आप ही सम्पूर्ण चराचर जगत् की रक्षिका हैं।
अर्थात् जो देवी की शरण में आता है, उसकी रक्षा स्वयं देवी करती हैं।
५. पद्म पुराण(उत्तरखण्ड- ७२.३३ )
श्लोक:
नामस्मरणमात्रेण नश्यन्ति विपदः क्षणात्।
हरिभक्तः सदा रक्ष्यः सर्वदा सर्वतोऽपि च॥
अर्थ:
भगवान् के नाम-स्मरण मात्र से विपत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं।
हरिभक्त सदा और सर्वत्र सुरक्षित रहता है।
६. ब्रह्म पुराण- २३.३१
श्लोक:
ये स्मरन्ति हृषीकेशं सदा भक्त्या समन्विताः।
न तेषां विद्यते भयं कदाचिद् भुवि कर्हिचित्॥
अर्थ:
जो भक्तिभाव से भगवान् हृषीकेश का स्मरण करते हैं, उन्हें कभी भी किसी प्रकार का भय नहीं होता।
अर्थात् भगवान्-स्मरण से अभय प्राप्त होता है।
७. स्कन्द पुराण (काशीखण्ड -३४.५८)
श्लोक:
हरिस्मृतिः सर्वविपद्विनाशिनी
हरिस्मृतिः सर्वजनाभयप्रदा।
हरिस्मृतिः सर्वशुभप्रदायिनी
हरिस्मृतिः सर्वजनप्रमोदिनी॥
अर्थ:
हरि का स्मरण सभी विपत्तियों का नाश करने वाला है,
सभी जनों को अभय देने वाला है,
और सब प्रकार का कल्याण प्रदान करता है।
८. लिंग पुराण- १.९२.३४
श्लोक:
रुद्रनामस्मरणेनैव नश्यन्ति भयनाशकाः।
भक्तानां नास्ति भीतिः स्यात् रक्षितो हि महेश्वरः॥
अर्थ:
रुद्र-नाम के स्मरण से भय का नाश हो जाता है।
महेश्वर स्वयं भक्त की रक्षा करते हैं; अतः उसे भय नहीं रहता।
९ -ब्रह्मवैवर्त पुराण (कृष्णजन्मखण्ड ७०.४८)-
श्लोक:
कृष्णभक्तः सदा रक्ष्यः सर्वदैव जनार्दनात्।
न तं स्पृशन्ति दुःखानि शत्रवो वा कथञ्चन॥
अर्थ:
कृष्णभक्त सदा जनार्दन द्वारा संरक्षित रहता है।
दुःख या शत्रु उसे स्पर्श नहीं कर सकते।
१०. अग्नि पुराण- २१६.१२
श्लोक:
धर्मेण जयते लोकान् धर्मेणैवाभिरक्षति।
धर्मिष्ठं नाभिभवन्ति शत्रवो बलवत्तराः॥
अर्थ:
धर्म से लोकों की विजय होती है और धर्म से ही रक्षा होती है।
धर्मिष्ठ पुरुष को शक्तिशाली शत्रु भी परास्त नहीं कर सकते।
निष्कर्ष --
विभिन्न पुराणों का सिद्धान्त एक ही है—
नाम-स्मरण, भक्ति और धर्म में स्थित व्यक्ति दैवी संरक्षण में रहता है।
ऐसे शरणागत भक्त को शत्रु स्थायी रूप से दबा नहीं सकते।
भगवत् गीता में प्रमाण--
१. गीता- ९.३१
श्लोक:
“कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।”
भावार्थ:
हे अर्जुन! निश्चयपूर्वक जान लो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
अर्थात् भगवान् के आश्रित का कोई शत्रु स्थायी रूप से अनिष्ट नहीं कर सकता।
२. गीता- १८.६६
श्लोक:
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥”
भावार्थ:
सब धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सभी पापों और संकटों से मुक्त कर दूँगा — शोक मत करो।
अर्थात् पूर्ण शरणागति से भय और शत्रुता का अंत होता है।
३. गीता- १२.६–७
श्लोक (सार):
जो अनन्य भाव से मेरा चिन्तन करते हैं और मुझमें स्थित हैं,
“तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।”
भावार्थ:
मैं स्वयं उन्हें जन्म-मृत्यु रूपी सागर से पार कराता हूँ।
जब स्वयं भगवान् रक्षक हों, तब शत्रु क्या कर सकते हैं?
४. गीता- ६.४०
श्लोक:
“न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।”
भावार्थ:
हे प्रिय! कल्याण मार्ग पर चलने वाला कभी दुर्गत को प्राप्त नहीं होता।
धर्म और भक्ति में स्थित पुरुष अंततः सुरक्षित रहता है।
५. गीता- १६.१
“अभयं सत्त्वसंशुद्धिः…”
भावार्थ:
दैवी सम्पत्ति में पहला गुण “अभय” है।
जो दैवी गुणों और ईश्वर-आश्रय में स्थित है, वह निर्भय रहता है।
निष्कर्ष--
गीता का सिद्धान्त स्पष्ट है—
जो भगवान् की शरण में, भक्ति और धर्म में स्थित है, वह अभय, अजेय और दैवी संरक्षण में रहता है।
इसके समर्थन में महाभारत से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१. वनपर्व--
“न हि धर्मोऽधर्मेण जयते।”
भावार्थ:
अधर्म से धर्म का कभी पराभव नहीं होता।
जो धर्म में स्थित है, अंततः वही विजयी होता है — शत्रु उसे स्थायी रूप से दबा नहीं सकते।
२. उद्योगपर्व (कृष्ण का वचन)-
“यतो धर्मस्ततो जयः।”
भावार्थ:
जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
अर्थात् धर्म और ईश्वर-आश्रय में स्थित व्यक्ति अंततः विजयी और संरक्षित रहता है।
३. भीष्मपर्व -६.२३ (गीता-प्रसंग का आधार)
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे उसके सारथी और रक्षक हैं।
भाव:
जब स्वयं भगवान् साथ हों, तब शत्रु क्या कर सकते हैं?
४. शान्तिपर्व--
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।”
भावार्थ:
जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसका नाश कर देता है; जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थात् धर्म-आश्रित पुरुष अभय और सुरक्षित रहता है।
५. अनुशासनपर्व- (विष्णुसहस्रनाम-प्रसंग)
भीष्म पितामह कहते हैं कि भगवान् विष्णु के नाम-स्मरण से मनुष्य सभी भय और संकटों से मुक्त हो जाता है।
निष्कर्ष--
महाभारत का मूल सिद्धान्त है—
धर्म और ईश्वर-आश्रय ही सच्ची रक्षा है। जो पुरुष धर्म, सत्य और भगवान् की शरण में स्थित है, उसे शत्रु स्थायी रूप से परास्त नहीं कर सकते।
आपके भाव — “ईश्वर-आश्रित, धर्मनिष्ठ पुरुष की रक्षा होती है; शत्रु उसे दबा नहीं सकते”
इसके समर्थन में स्मृति-ग्रन्थों से प्रमाण प्रस्तुत हैं:
१. मनुस्मृति-- ८.१५
श्लोक:
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥”
भावार्थ:
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है; जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थात् धर्म-आश्रित पुरुष अंततः सुरक्षित रहता है।
आपके भाव — “धर्मनिष्ठ/ईश्वर-आश्रित पुरुष की रक्षा होती है; शत्रु उसका स्थायी अनिष्ट नहीं कर सकते” —इसके समर्थन में अन्य स्मृतियाँ प्रस्तुत हैं-
(१) नारद स्मृति- १.१९–२०
श्लोक:
धर्मो हि सत्यं परमं ब्रवीति
धर्मेण लोकाः परिपालयन्ते।
धर्मेण रक्षन्ति परस्परं जनाः
धर्मे स्थितो नाभिभवेत् कदाचन॥
अर्थ:
धर्म ही परम सत्य है; लोक-व्यवस्था धर्म से चलती है।
जो धर्म में स्थित है, वह पराभूत नहीं होता।
अर्थात् धर्म-आश्रित पुरुष अंततः सुरक्षित रहता है।
(२) बृहस्पति स्मृति- १.४ (प्रारम्भिक धर्मप्रशंसा)
श्लोक:
धर्मो रक्षति रक्षितः सर्वत्र विजयी भवेत्।
अधर्मेण जयः क्षणिकः स्यात् पतनं तु निश्चितम्॥
अर्थ:
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है और वह सर्वत्र विजयी होता है।
अधर्म से मिली विजय क्षणिक है; पतन निश्चित है।
अर्थात् धर्मिष्ठ पुरुष का स्थायी अनिष्ट नहीं हो सकता।
(३) पराशर स्मृति- १.२४–२५
श्लोक:
कलौ केवलनामाध्यं धर्मो नान्यः कदाचन।
नामस्मरणमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते॥
अर्थ:
कलियुग में नाम-स्मरण ही प्रधान धर्म है।
केवल नाम-स्मरण से मनुष्य पापों और भय से मुक्त होता है।
अर्थात् ईश्वर-आश्रय से अभय प्राप्त होता है।
४) याज्ञवल्क्य स्मृति --१.३५६–३५७
श्लोक:
धर्मेणैव हि साध्यन्ते सर्वे लोकाः सुखावहाः।
धर्मिष्ठं नाभिभवन्ति दुष्टा अपि कदाचन॥ (प्रचलित पाठानुसार)
अर्थ:
धर्म से ही लोकों का कल्याण और सुख सिद्ध होता है।
धर्मिष्ठ पुरुष को दुष्ट भी स्थायी रूप से परास्त नहीं कर सकते।
निष्कर्ष--
इन स्मृतियों का सिद्धान्त एक है
धर्म, सत्य और ईश्वर-स्मरण ही वास्तविक रक्षा है।
जो पुरुष धर्म में स्थित है, उसकी रक्षा स्वयं धर्म करता है; शत्रु उसका स्थायी अनिष्ट नहीं कर सकते।
नीतियों में प्रमाण--
१. भर्तृहरि नीतिशतक- ८४
“निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥”
भावार्थ:
नीति-निपुण लोग निन्दा करें या स्तुति; लक्ष्मी आए या चली जाए; मृत्यु आज हो या युगों बाद — धीर पुरुष न्याय-पथ से विचलित नहीं होते।
अर्थात् धर्म में स्थित पुरुष शत्रुओं से नहीं डरता।
२. हितोपदेश (मित्रलाभ)
सूक्ति:
“धर्मो रक्षति रक्षितः।”
भावार्थ:
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थात् धर्माचरण से शत्रु प्रभावहीन हो जाते हैं।
३. चाणक्य नीति से प्रमाण--
(क) श्लोक – अध्याय १,श्लोक ७
“विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥”
अर्थ :
विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता प्राप्त होती है, योग्यता से धन मिलता है, धन से धर्म और धर्म से सुख प्राप्त होता है।
(ख) श्लोक-अध्याय ६,श्लोक १
“नास्ति विद्यासमं चक्षुः नास्ति सत्यसमं तपः।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥”
अर्थ :
विद्या के समान कोई नेत्र नहीं, सत्य के समान कोई तप नहीं। आसक्ति जैसा दुःख नहीं और त्याग जैसा सुख नहीं।
(४). शुक्रनीति से प्रमाण-
(१) शुक्रनीति--
(क) अध्याय १, श्लोक १४
“धर्मेण राज्यं रक्षेत् राजा धर्मेणैव प्रजाः सुखीः।”
अर्थ :
राजा को धर्मपूर्वक राज्य की रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि धर्म से ही प्रजा सुखी रहती है।
(ख) , अध्याय २, श्लोक ३१
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।”
अर्थ :
अपने धर्म में स्थित रहकर जीवन व्यतीत करना श्रेष्ठ है; परधर्म भय देने वाला होता है।
वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण में प्रमाण--
Valmiki Ramayana — 5
प्रमाण (श्लोक संख्या सहित)
1. युद्धकाण्ड 6.18.33
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥
भाव: “जो एक बार भी मेरी शरण में आता है, उसे मैं सब भयों से अभय देता हूँ।”
2. युद्धकाण्ड 6.18.34
आनयैनं हरिश्रेष्ठ दत्तमस्याभयं मया ।
विभीषणो वा सुग्रीव यदि वा रावणः स्वयम् ॥
भाव: “उसे ले आओ; चाहे वह विभीषण हो या स्वयं रावण — मैंने उसे अभय दिया है।”
3. सुन्दरकाण्ड 5.51.43
न रावणसहस्रं मे युद्धे प्रतिबलं भवेत् ॥
भाव: “हजारों रावण भी युद्ध में मेरा सामना नहीं कर सकते।”
4. युद्धकाण्ड 6.59.127
धर्मात्मा सत्यसन्धश्च रामो दाशरथिर्यदि ।
पौरुषे चाप्रतिद्वन्द्वः शरेण जहि रावणिम् ॥
भाव: “यदि राम धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं, तो यह बाण रावण का नाश करे।”
5. युद्धकाण्ड 6.12.31
न हि धर्मादपक्रम्य जीवितुं शक्यमात्मना ॥
भाव: “धर्म से हटकर जीवन की रक्षा नहीं हो सकती।”
Adhyatma Ramayana में प्रमाण (श्लोक संख्या सहित)
1. युद्धकाण्ड 3.7
रामो विग्रहवान् धर्मः।
भाव: “श्रीराम स्वयं धर्म के साकार स्वरूप हैं।”
2. अरण्यकाण्ड 1.38
भक्तानामभयङ्कर्ता रामो राजीवलोचनः ॥
भाव: “कमलनयन राम भक्तों को अभय देने वाले हैं।”
3. युद्धकाण्ड 7.32
यत्र रामो महायोगी तत्र विजयिनी श्रियः ॥
भाव: “जहाँ श्रीराम हैं, वहाँ विजय और ऐश्वर्य है।”
4. उत्तरकाण्ड 5.45
रामनाम प्रभावेण सर्वशत्रुक्षयो भवेत् ॥
भाव: “रामनाम के प्रभाव से सभी शत्रुओं का नाश होता है।”
5. उत्तरकाण्ड 7.18
न भयं विद्यते तस्य रामं यस्य हृदि स्थितम् ॥
भाव: “जिसके हृदय में राम हैं, उसे कोई भय नहीं रहता।”
योग वशिष्ठ से प्रमाण
(१) वैराग्य प्रकरण, सर्ग १, श्लोक १२
“चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधनम्।”
अर्थ :
यह चित्त ही संसार है, इसलिए प्रयत्नपूर्वक चित्त की शुद्धि करनी चाहिए।
(२) उपशम प्रकरण, सर्ग ५२, श्लोक २०
“मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।”
अर्थ :
मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण मन ही है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
इस्लाम में यह विश्वास मिलता है कि जो व्यक्ति अल्लाह पर ईमान रखता है, सब्र करता है और उसकी राह पर चलता है, उसे अंततः अल्लाह की सहायता और सुरक्षा प्राप्त होती है। इसी भाव के समर्थन में क़ुरआन और हदीस से कुछ प्रमाण नीचे दिए गए हैं:
1. अल्लाह ही सबसे बड़ा रक्षक
وَاللَّهُ خَيْرُ الْحَافِظِينَ
“और अल्लाह सबसे बेहतर हिफ़ाज़त करने वाला है।”
— Quran 12:64
भाव: सच्चे बंदे की अंतिम रक्षा अल्लाह करता है।
2. अल्लाह के दोस्तों को भय नहीं
أَلَا إِنَّ أَوْلِيَاءَ اللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
“सुन लो! जो अल्लाह के मित्र हैं, उन्हें न कोई डर होगा और न वे दुःखी होंगे।”
— Quran 10:62
भाव: ईमान वालों को शत्रु स्थायी रूप से पराजित नहीं कर सकते।
3. अल्लाह काफी है
أَلَيْسَ اللَّهُ بِكَافٍ عَبْدَهُ
“क्या अल्लाह अपने बंदे के लिए काफी नहीं है?”
— Quran 39:36
भाव: जब अल्लाह सहायक हो तो विरोधी शक्तियाँ कमज़ोर पड़ जाती हैं।
4. जो अल्लाह पर भरोसा करे
وَمَن يَتَوَكَّلْ عَلَى اللَّهِ فَهُوَ حَسْبُهُ
“जो अल्लाह पर भरोसा करता है, वही उसके लिए काफी है।”
— Quran 65:3
भाव: ईश्वर पर भरोसा रखने वाला अंततः सुरक्षित रहता है।
5. अल्लाह की मदद निकट है
إِنَّ نَصْرَ اللَّهِ قَرِيبٌ
“निश्चय ही अल्लाह की सहायता निकट है।”
— Quran 2:214
भाव: कठिन समय में भी भक्त अकेला नहीं होता।
6. हदीस — अल्लाह शत्रु के विरुद्ध हो जाता है
مَنْ عَادَى لِي وَلِيًّا فَقَدْ آذَنْتُهُ بِالْحَرْبِ
“जो मेरे किसी वली (प्रिय बंदे) से दुश्मनी करता है, मैं उसके खिलाफ युद्ध की घोषणा कर देता हूँ।”
— Sahih al-Bukhari
भाव: अल्लाह अपने नेक बंदों की विशेष रक्षा करता है।
7. ईमान वाला शक्तिशाली है
الْمُؤْمِنُ الْقَوِيُّ خَيْرٌ وَأَحَبُّ إِلَى اللَّهِ مِنَ الْمُؤْمِنِ الضَّعِيفِ
“मज़बूत मोमिन अल्लाह को कमज़ोर मोमिन से अधिक प्रिय है।”
— Sahih Muslim
भाव: सच्चा मोमिन आत्मबल और ईश्वर-विश्वास से पराजित नहीं होता।
सूफ़ी सन्तों में प्रमाण--
सूफ़ी संतों की शिक्षाओं में यह विचार बार-बार मिलता है कि जो इंसान सच्चे दिल से ईश्वर (अल्लाह) का हो जाता है, उसे दुनिया की दुश्मनी अंततः दबा नहीं सकती। नीचे 9 प्रसिद्ध सूफ़ी कथन/उक्तियाँ अरबी-फ़ारसी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:
1. Jalaluddin Rumi
هر که با خدا باشد، از هیچکس نترسد
“जो ख़ुदा के साथ हो, वह किसी से नहीं डरता।”
भाव: ईश्वर-भक्त भय और शत्रुता से ऊपर उठ जाता है।
2. Abdul Qadir Jilani
إذا كان الله معك فمن تخاف؟
“जब अल्लाह तुम्हारे साथ है तो फिर किससे डर?”
भाव: अल्लाह की सहायता से विरोधी शक्तियाँ निर्बल हो जाती हैं।
3. Bayazid Bastami
المحبوب لا يُغلب
“जो अल्लाह का प्रिय हो, वह पराजित नहीं होता।”
भाव: ईश्वर का प्रेमी आत्मिक रूप से अजेय होता है।
4. Hasan al-Basri
مَن عرف الله هانَت عليه المصائب
“जिसने अल्लाह को पहचान लिया, उस पर मुसीबतें हल्की हो जाती हैं।”
भाव: भक्त कठिनाइयों और शत्रुओं से टूटता नहीं।
5. Rabia al-Basri
إلهي أنتَ حسبي وكفى
“ऐ मेरे पालनहार! तू ही मेरे लिए काफी है।”
भाव: जब ईश्वर सहारा हो तो बाहरी भय कम हो जाता है।
6. Shams Tabrizi
دلِ عاشق را هیچ دشمنی نشکند
“ईश्वर-प्रेमी का दिल कोई दुश्मन नहीं तोड़ सकता।”
भाव: प्रेम और ईमान से मनुष्य अडिग रहता है।
7. Nizamuddin Auliya
هر که در پناهِ حق است، ایمن است
“जो सत्य/ईश्वर की शरण में है, वह सुरक्षित है।”
भाव: आध्यात्मिक शरण सबसे बड़ी सुरक्षा मानी गई है।
8. Bulleh Shah
جِتھے رب دا نام، اُتھے خوف نہیں
“जहाँ रब का नाम है, वहाँ भय नहीं।”
भाव: ईश्वर-स्मरण से साहस और शांति मिलती है।
9. Khwaja Moinuddin Chishti
دوستِ خدا را دشمن زیان نرساند
“ख़ुदा के दोस्त को दुश्मन हानि नहीं पहुँचा सकता।”
भाव: सच्चे भक्त की रक्षा ईश्वर स्वयं करता है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण --
सिक्ख धर्म में भी यह शिक्षा दी गई है कि जो व्यक्ति वाहेगुरु पर विश्वास रखता है, नाम सिमरन करता है और धर्म के मार्ग पर चलता है, उसे कोई शत्रु वास्तव में दबा नहीं सकता। नीचे 7 प्रमाण गुरुमुखी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:
1. Guru Granth Sahib
ਜਾ ਕੈ ਰਾਖੈ ਸਿਰਜਣਹਾਰੁ ॥
ਤਿਸ ਨੋ ਮਾਰਿ ਨ ਸਕੈ ਕੋਇ ॥
भाव: “जिसकी रक्षा स्वयं सृष्टिकर्ता करता है, उसे कोई हानि नहीं पहुँचा सकता।”
2. Guru Granth Sahib
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ
ਤਾ ਕੋ ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ਕੋਇ ॥
भाव: “जिसके मन में प्रभु का नाम बसता है, उसे कोई विघ्न बाधा नहीं सताती।”
3. Guru Arjan
ਤੇਰਾ ਕੀਆ ਮੀਠਾ ਲਾਗੈ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਨਾਨਕੁ ਮਾਂਗੈ ॥
भाव: भक्त कठिनाइयों में भी प्रभु पर विश्वास नहीं छोड़ता।
4. Guru Gobind Singh
ਚਿੜੀਆਂ ਤੇ ਮੈਂ ਬਾਜ ਤੜਾਵਾਂ
ਗਿਦੜਾਂ ਤੋਂ ਮੈਂ ਸ਼ੇਰ ਬਣਾਵਾਂ ॥
भाव: गुरु की कृपा से निर्बल भी शक्तिशाली बन जाता है; शत्रु उसे दबा नहीं सकते।
5. Jaap Sahib
ਨਮਸਤ੍ਵੰ ਅਕਾਲੇ ॥
ਨਮਸਤ੍ਵੰ ਕ੍ਰਿਪਾਲੇ ॥
भाव: अकाल पुरुष दयालु और रक्षक है; उसकी शरण में भय नहीं रहता।
6. Guru Granth Sahib
ਭੈ ਕਾਹੂ ਕਉ ਦੇਤ ਨਹਿ
ਨਹਿ ਭੈ ਮਾਨਤ ਆਨ ॥
भाव: “सच्चा गुरसिख न किसी को डराता है और न किसी से डरता है।”
7. Guru Tegh Bahadur
ਜਉ ਤਉ ਪ੍ਰੇਮ ਖੇਲਣ ਕਾ ਚਾਉ ॥
ਸਿਰੁ ਧਰਿ ਤਲੀ ਗਲੀ ਮੇਰੀ ਆਉ ॥
भाव: जो प्रभु-मार्ग पर चलता है, वह भय और शत्रुता से ऊपर उठ जाता है।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
ईसाई धर्म में यह शिक्षा दी गई है कि जो व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास रखता है, उसे शत्रु अंततः पराजित नहीं कर सकते क्योंकि परमेश्वर उसकी रक्षा और सहायता करता है। नीचे 7 प्रमाण इंग्लिश लिपि (English script) के साथ दिए गए हैं:
1. Bible — Romans 8:31
“If God be for us, who can be against us?”
भाव: जब परमेश्वर साथ हो तो विरोधी शक्तियाँ टिक नहीं सकतीं।
2. Bible — Psalm 27:1
“The Lord is my light and my salvation; whom shall I fear?”
भाव: प्रभु भक्त का रक्षक है, इसलिए उसे भय नहीं रहता।
3. Bible — Isaiah 54:17
“No weapon formed against thee shall prosper.”
भाव: भक्त के विरुद्ध बनी बुरी योजनाएँ सफल नहीं होतीं।
4. Bible — Psalm 118:6
“The Lord is on my side; I will not fear.”
भाव: परमेश्वर का सहारा मनुष्य को निर्भय बनाता है।
5. Bible — Deuteronomy 31:6
“Be strong and courageous… for the Lord your God goes with you.”
भाव: ईश्वर अपने भक्त को कभी अकेला नहीं छोड़ता।
6. Bible — 2 Thessalonians 3:3
“But the Lord is faithful, and he will strengthen and protect you from the evil one.”
भाव: प्रभु बुराई और शत्रु से रक्षा करता है।
7. Bible — John 16:33
“In the world ye shall have tribulation: but be of good cheer; I have overcome the world.”
भाव: कठिनाइयाँ आएँगी, परन्तु परमेश्वर की शक्ति अंततः विजय दिलाती है।
जैन धर्म में प्रमाण---
जैन धर्म में यह शिक्षा दी गई है कि जो साधक सत्य, संयम, अहिंसा और आत्मबल में स्थित रहता है, उसे बाहरी शत्रु वास्तव में पराजित नहीं कर सकते। जैन आगम और प्राकृत वचनों में आत्मविजय को सबसे बड़ी विजय कहा गया है। नीचे कुछ प्रमाण प्राकृत (देवनागरी लिपि) के साथ दिए जा रहे हैं:
1. Uttaradhyayana Sutra
अप्पा चेव दमेयव्वो, अप्पा हु खलु दुद्दमो।
भाव: “मनुष्य को अपने आप को जीतना चाहिए, क्योंकि आत्मा को जीतना कठिन है।”
2. Acaranga Sutra
न किंचि भयस्स कारणं।
भाव: “सच्चे साधक के लिए भय का कोई कारण नहीं।”
3. Dasavaikalika Sutra
जो सहइ सो जिणइ।
भाव: “जो सहन करता है, वही विजय प्राप्त करता है।”
4. Uttaradhyayana Sutra
खमेण विज्जइ कोधं।
भाव: “क्षमा से क्रोध पर विजय प्राप्त होती है।”
5. Mahavira
न वेरें वेराणि सम्मन्ति।
भाव: “वैर से वैर शांत नहीं होता।”
6. Tattvartha Sutra
सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः।
भाव: “सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र ही मुक्ति का मार्ग हैं।”
अर्थात आत्मबल वाला साधक बाहरी भय से ऊपर उठता है।
7. Namokar Mantra
णमो अरिहंताणं।
णमो सिद्धाणं॥
भाव: अरिहंत और सिद्धों की वंदना से साधक में निर्भयता और आत्मशक्ति उत्पन्न होती है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
बौद्ध धर्म में यह शिक्षा दी गई है
कि जो व्यक्ति धम्म, करुणा, सत्य और आत्मसंयम में स्थित रहता है, उसे बाहरी शत्रु वास्तव में पराजित नहीं कर सकते। सबसे बड़ी विजय आत्मविजय मानी गई है। नीचे कुछ प्रमाण पाली (देवनागरी लिपि) के साथ दिए गए हैं:
1. Dhammapada
अत्तानं दमयंति पण्डिता।
भाव: “बुद्धिमान लोग स्वयं को वश में करते हैं।”
2. Dhammapada
नहि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति।
भाव: “वैर से वैर कभी शांत नहीं होता; अवैर (मैत्री) से शांत होता है।”
3. Dhammapada
यो सहस्सं सहस्सेन संगामे मानुसे जिने।
एकञ्च जेत्वा अत्तानं स वे संगामजुत्तमो॥
भाव: “जो हजारों लोगों को जीतता है उससे श्रेष्ठ वह है जो स्वयं को जीत लेता है।”
4. Gautama Buddha
धम्मो हवे रक्खति धम्मचारिं।
भाव: “धर्म आचरण करने वाले की रक्षा स्वयं धर्म करता है।”
5. Dhammapada
अप्पमादो अमतपदं।
भाव: “सजगता अमृत पद है।”
अर्थात जागरूक साधक भय और पतन से बचा रहता है।
6. Sutta Nipata
मेत्तञ्च सब्बलोकस्मिं मानसं भावये अपरिमाणं।
भाव: “संपूर्ण जगत के प्रति असीम मैत्रीभाव रखो।”
ऐसा व्यक्ति शत्रुता से ऊपर उठ जाता है।
7. Dhammapada
चित्तं दन्तं सुखावहं।
भाव: “संयमित चित्त सुख देने वाला होता है।”
आत्मिक रूप से दृढ़ व्यक्ति को बाहरी शत्रु दबा नहीं सकते।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
यहूदी धर्म में भी यह शिक्षा दी गई है कि जो व्यक्ति परमेश्वर (Adonai) पर विश्वास रखता है और उसके मार्ग पर चलता है, उसकी रक्षा ईश्वर करता है और शत्रु उसे अंततः दबा नहीं सकते। नीचे कुछ प्रमाण दिए जा रहे
हैं।
(हिब्रू लिपि के साथ)
1. Tanakh — Tehillim (Psalms) 27:1
יְהוָה אוֹרִי וְיִשְׁעִי מִמִּי אִירָא
भाव: “प्रभु मेरा प्रकाश और उद्धार है; मैं किससे डरूँ?”
2. Tanakh — Tehillim (Psalms) 118:6
יְהוָה לִי לֹא אִירָא מַה־יַּעֲשֶׂה לִי אָדָם
भाव: “प्रभु मेरे साथ है; मनुष्य मेरा क्या कर सकता है?”
3. Tanakh — Yeshayahu (Isaiah) 41:10
אַל־תִּירָא כִּי עִמְּךָ־אָנִי
भाव: “मत डर, क्योंकि मैं तेरे साथ हूँ।”
4. Tanakh — Devarim (Deuteronomy) 31:6
חִזְקוּ וְאִמְצוּ אַל־תִּירְאוּ
भाव: “मज़बूत और साहसी बनो; भय मत करो।”
5. Tanakh — Shemot (Exodus) 14:14
יְהוָה יִלָּחֵם לָכֶם וְאַתֶּם תַּחֲרִשׁוּן
भाव: “प्रभु तुम्हारे लिए युद्ध करेगा और तुम शांत रहोगे।”
6. Tanakh — Mishlei (Proverbs) 18:10
מִגְדַּל־עֹז שֵׁם יְהוָה בּוֹ־יָרוּץ צַדִּיק וְנִשְׂגָּב
भाव: “प्रभु का नाम दृढ़ गढ़ है; धर्मी उसमें शरण लेकर सुरक्षित रहता है।”
7. Tanakh — Yehoshua (Joshua) 1:9
אַל־תַּעֲרֹץ וְאַל־תֵּחָת כִּי עִמְּךָ יְהוָה אֱלֹהֶיךָ
भाव: “भयभीत मत हो, क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारे साथ है।”
पारसी धर्म में प्रमाण --
पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में भी यह शिक्षा मिलती है कि जो व्यक्ति अहुरा मज़्दा की सत्य-मार्ग (अशा) पर चलता है, उसे दुष्ट शक्तियाँ अंततः दबा नहीं सकतीं।
नीचे कुछ प्रमाण एवेस्ता परंपरा के वचनों के साथ दिए जा रहे हैं:
1. Avesta — Yasna 43.1
𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀
(At Mazda Ahura)
भाव: “अहुरा मज़्दा सत्यवान की रक्षा करता है।”
2. Zarathustra
𐬀𐬴𐬀 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬀
(Asha Vahishta)
भाव: “श्रेष्ठ सत्य ही सबसे बड़ी शक्ति है।”
3. Avesta — Yasna 30.8
𐬯𐬞𐬆𐬧𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎
(Spenta Mainyu)
भाव: “पवित्र आत्मिक शक्ति बुराई पर विजय पाती है।”
4. Avesta — Yasna 46.1
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌
(Mazda Paiti)
भाव: “अहुरा मज़्दा अपने भक्त का सहायक है।”
5. Khordeh Avesta
𐬀𐬯𐬆𐬨 𐬬𐬵𐬎
(Ashem Vohu)
भाव: “धर्म और सत्य सर्वोत्तम हैं; सत्यवान निर्भय रहता है।”
6. Avesta — Yasna 34.15
𐬭𐬀𐬱𐬥𐬀 𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀
(Rashna Ahura)
भाव: “दैवी न्याय अंततः धर्मात्मा की रक्षा करता है।”
7. Khordeh Avesta
𐬬𐬆𐬥𐬵𐬆 𐬵𐬁𐬙𐬁𐬨
(Yenghe Hatam)
भाव: “जो धर्म और भलाई के मार्ग पर हैं, वे अहुरा मज़्दा के प्रिय हैं।
ताओ धर्म में प्रमाण --
”ताओ (Dao) धर्म में यह शिक्षा दी गई है कि जो व्यक्ति ताओ (मार्ग) के अनुरूप जीवन जीता है, वह भीतर से इतना संतुलित और शांत हो जाता है कि बाहरी शत्रु उसे वास्तव में दबा नहीं सकते। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण चीनी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:
1. Tao Te Ching
天网恢恢,疏而不失。
(Tiān wǎng huī huī, shū ér bù shī.)
भाव: “स्वर्ग का जाल विशाल है; वह कुछ भी नहीं छोड़ता।”
अर्थात सत्य और धर्म की अंततः रक्षा होती है।
2. Laozi
柔弱胜刚强。
(Róuruò shèng gāngqiáng.)
भाव: “कोमलता कठोरता पर विजय प्राप्त करती है।”
3. Tao Te Ching
知人者智,自知者明;胜人者有力,自胜者强。
भाव: “जो स्वयं को जीत लेता है, वही वास्तव में शक्तिशाली है।”
4. Tao Te Ching
夫唯不争,故天下莫能与之争。
भाव: “जो संघर्ष नहीं करता, उससे संसार संघर्ष नहीं कर सकता।”
5. Zhuangzi
至人无己,神人无功,圣人无名。
भाव: “पूर्ण व्यक्ति अहंकार से मुक्त होता है; इसलिए वह अडिग रहता है।”
6. Tao Te Ching
祸莫大于轻敌。
(Huò mò dà yú qīng dí.)
भाव: “शत्रु को हल्का समझने से बड़ी विपत्ति नहीं।”
अर्थात सजग और संतुलित व्यक्ति सुरक्षित रहता है।
7. Tao Te Ching
道者万物之奥。
भाव: “ताओ सभी वस्तुओं का गहन आश्रय है।”
अर्थात जो ताओ में स्थित है, वह भीतर से सुरक्षित और स्थिर रहता है।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --
कन्फ्यूशियस (Confucian) परंपरा में यह शिक्षा दी गई है कि जो व्यक्ति धर्म, सत्य, नैतिकता और “Ren” (मानवता/करुणा) के मार्ग पर चलता है, उसे अन्यायपूर्ण शत्रु अंततः दबा नहीं सकते। नीचे कुछ प्रमाण चीनी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:
1. Confucius — Analects
仁者不忧,知者不惑,勇者不惧。
(Rén zhě bù yōu, zhì zhě bù huò, yǒng zhě bù jù.)
भाव: “दयालु व्यक्ति चिंतित नहीं होता, ज्ञानी भ्रमित नहीं होता, और साहसी भयभीत नहीं होता।”
2. Analects
君子坦荡荡,小人长戚戚。
भाव: “श्रेष्ठ पुरुष शांत और निडर रहता है; तुच्छ व्यक्ति सदा भयग्रस्त रहता है।”
3. Mencius — Mencius
得道者多助,失道者寡助。
भाव: “जो धर्म के मार्ग पर चलता है, उसे बहुत सहायता मिलती है।”
4. Doctrine of the Mean
诚者,天之道也。
भाव: “सत्यनिष्ठा स्वर्ग का मार्ग है।”
अर्थात सत्यवान अंततः सुरक्षित रहता है।
5. Analects
君子义以为上。
भाव: “श्रेष्ठ पुरुष धर्म और न्याय को सर्वोपरि मानता है।”
6. Confucius
内省不疚,夫何忧何惧?
भाव: “जिसका अंतःकरण शुद्ध है, उसे किस बात का भय?”
7. Great Learning
自天子以至于庶人,壹是皆以修身为本。
भाव: “राजा से लेकर सामान्य व्यक्ति तक, आत्म-संयम और चरित्र ही मूल आधार है।”
अर्थात आत्मबल वाला व्यक्ति बाहरी दबाव से नहीं शिन्तो धर्म में यह विश्वास है कि जो व्यक्ति “कामी” (दैवी शक्तियों) के साथ सामंजस्य, शुद्धता और सत्य के मार्ग पर चलता है, उसकी रक्षा दैवी शक्ति करती है और अशुभ शक्तियाँ उसे दबा नहीं सकतीं। नीचे 7 प्रमाण जापानी लिपि के साथ दिए जा रहे हैं:
1. Kojiki
惟神の道に従えば、災いなし。
(Kannagara no michi ni shitagaeba, wazawai nashi.)
भाव: “दैवी मार्ग पर चलने वाले पर विपत्ति नहीं आती।”
2. Nihon Shoki
神は正しき者を守る。
(Kami wa tadashiki mono o mamoru.)
भाव: “कामी धर्मी व्यक्ति की रक्षा करते हैं।”
3. Norito
祓へ給ひ清め給へ。
(Harae tamae kiyome tamae.)
भाव: “हे देवताओं! हमें शुद्ध और सुरक्षित करें।”
4. Kojiki
誠の心あれば神の加護あり。
(Makoto no kokoro areba kami no kago ari.)
भाव: “सच्चे हृदय वाले को देवताओं का संरक्षण मिलता है।”
5. Norito
神威は悪しきを退ける。
(Shin’i wa ashiki o shirizokeru.)
भाव: “दैवी शक्ति बुराई को दूर कर देती है।”
6. Nihon Shoki
正しき道に恐れなし。
(Tadashiki michi ni osore nashi.)
भाव: “सत्य के मार्ग पर भय नहीं होता।”
7. Kojiki
神と共にあれば力尽きず。
(Kami to tomo ni areba chikara tsukizu.)
भाव: “जो कामी के साथ है, उसकी शक्ति समाप्त नहीं होती।”।यूनानी दर्शन में भी यह विचार मिलता है कि जो व्यक्ति सत्य, सद्गुण, आत्मज्ञान और दिव्य व्यवस्था के अनुसार जीवन जीता है, उसे बाहरी शत्रु वास्तव में पराजित नहीं कर सकते। नीचे कुछ प्रसिद्ध प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. Socrates
“No evil can happen to a good man, either in life or after death.”
भाव: “एक सद्गुणी व्यक्ति का वास्तविक अहित नहीं हो सकता।”
2. Epictetus
“You may fetter my leg, but not even Zeus can overpower my will.”
भाव: “शरीर को बाँधा जा सकता है, पर आत्मबल को नहीं।”
3. Marcus Aurelius — Meditations
“The soul becomes dyed with the color of its thoughts.”
भाव: “जिसका मन दृढ़ और शुद्ध है, उसे बाहरी शत्रु नहीं तोड़ सकते।”
4. Plato
“The just man is happier than the unjust man.”
भाव: “धर्मी व्यक्ति अंततः विजयी और शांत रहता है।”
5. Aristotle
“He who has overcome his fears will truly be free.”
भाव: “जिसने भय पर विजय पा ली, उसे कोई दबा नहीं सकता।”
6. Zeno of Citium
“Man conquers the world by conquering himself.”
भाव: “आत्मविजय ही सबसे बड़ी विजय है।”
7. Heraclitus
“Character is destiny.”
भाव: “मज़बूत चरित्र वाला व्यक्ति परिस्थितियों और विरोधियों से नहीं टूटता।”
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