ऋगुवेद सूक्ति--(१९) की व्याख्या,--
ऋगुवेद सूक्ति-(१९) की व्याख्या-
“जाया तप्यते कितवस्य हीना” —
भावार्थ --जुआरी की पत्नी दीन हीन होकर दुख पाती है।
ऋग्वेद १०.३४ (अक्षसूक्त)
यह मंत्र ऋग्वेद १०.३४ के “अक्षसूक्त” (जुए/पासों पर सूक्त) का अंश है, जिसमें जुआ (कितव = जुआरी) की बुराइयों का अत्यंत मार्मिक वर्णन है।
पदच्छेद--
जाया = पत्नी
तप्यते = संतप्त होती है, दुःखी होती है
कितवस्य = जुआरी के
हीना = त्यागी हुई, उपेक्षित
भावार्थ--
“जुआरी द्वारा उपेक्षित पत्नी दुःख से संतप्त होती है।”
विस्तृत अर्थ,--
यह सूक्त बताता है कि जुआरी व्यक्ति:
अपना धन नष्ट करता है,
परिवार की उपेक्षा करता है,
पत्नी और माता-पिता को दुःख देता है,
समाज में अपमानित होता है।
इस पंक्ति में विशेष रूप से यह बताया गया है कि जुए की लत के कारण पत्नी असहाय और दुखी हो जाती है, क्योंकि उसका पति परिवार-धर्म से विमुख होकर केवल जुए में “जाया तप्यते कितवस्य हीना” (ऋग्वेद १०.३४) में जुए के कारण परिवार-विनाश का जो भाव है, उसके समर्थन में अन्य वैदिक प्रमाण इस प्रकार हैं
१. अथर्ववेद ७.५० (अक्षनाशन सूक्त)
मंत्र (सारांश)
अक्षान् मा दीव्याः कृषिमित् कृषस्व …
भावार्थ:
हे मनुष्य! जुआ मत खेलो, खेती-कर्म करो। परिश्रम से अर्जित धन ही स्थायी सुख देता है।
श यहाँ स्पष्ट निर्देश है कि जुए से दूर रहकर श्रम-धर्म अपनाओ।
२. यजुर्वेद ३०.१८
इस अध्याय में समाज के विभिन्न दुर्व्यसनों का उल्लेख है, जिनमें “कितव” (जुआरी) को भी निंदित वृत्तियों में गिना गया है।
भावार्थ:
राज्य और समाज को चाहिए कि जुआ आदि दोषों से रक्षा करे।
३. ऋग्वेद १०.११७.६
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः…
भावार्थ:
जो व्यक्ति स्वार्थी है और कर्तव्यहीन है, उसका धन व्यर्थ जाता है।
जुआरी भी कर्तव्यच्युत होकर धन का नाश करता है।
४. ऋग्वेद ४.३३.११
न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः
भावार्थ:
परिश्रम के बिना देवता भी मित्रता नहीं करते।
जुआ आलस्य और अनार्जित लाभ की प्रवृत्ति है, जबकि वेद परिश्रम का उपदेश देते हैं।
५. अथर्ववेद ६.११८
इस सूक्त में गृहस्थ के कल्याण, समृद्धि और पारिवारिक सौहार्द की कामना की गई है।
भावार्थ:
पति-पत्नी में प्रेम और स्थिरता हो, घर में शांति रहे।
यह आदर्श जुआ-दोष के विपरीत है, जहाँ पत्नी “तप्यते” (दुःखी) होती है।
निष्कर्ष--
वेदों में—
जुआ (अक्ष, कितव) की स्पष्ट निंदा है।
परिश्रम, कृषि, सत्य और गृहस्थ-धर्म का समर्थन है।
परिवार की शांति और पत्नी-सम्मान को सर्वोच्च मूल्य माना गया है।
इसके समर्थन में उपनिषदों से ये प्रमाण प्रस्तुत हैं—
१. ईशोपनिषद्-- १
ईशावास्यमिदं सर्वं… तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
भावार्थ:
त्यागभाव से भोग करो; किसी के धन के प्रति लोभ मत करो।
जुआ लोभ और अनार्जित धन की इच्छा पर आधारित है; उपनिषद त्याग और संतोष का उपदेश देते हैं।
२. कठोपनिषद् १.२.१–२
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतः…
भावार्थ:
मनुष्य के सामने ‘श्रेय’ (कल्याण) और ‘प्रेय’ (इन्द्रियसुख) दोनों मार्ग आते हैं। बुद्धिमान श्रेय को चुनता है।
जुआ ‘प्रेय’ है—क्षणिक आकर्षण; गृहस्थ-धर्म और संयम ‘श्रेय’ है।
३. तैत्तिरीयोपनिषद् (शिक्षावल्ली १.११)
सत्यं वद। धर्मं चर… मातृदेवो भव, पितृदेवो भव।
भावार्थ:
सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो; माता-पिता का आदर करो।
➡ जुआरी कर्तव्यच्युत होकर परिवार को दुःखी करता है; उपनिषद गृहस्थ-धर्म की प्रतिष्ठा करते हैं।
४. छान्दोग्योपनिषद् ७.२६.२
नाल्पे सुखमस्ति, भूमैव सुखम्।
भावार्थ:
अल्प (क्षणिक) वस्तु में सुख नहीं; व्यापक और स्थायी में ही सुख है।
जुए का सुख अल्प और क्षणभंगुर है; परिणाम दुःखद है।
५. बृहदारण्यकोपनिषद् ४.४.५
यथा कर्म यथा श्रुतम्…
भावार्थ:
मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है।
जुए जैसे अधर्म का फल परिवार-दुःख और पतन है।
निष्कर्ष--
उपनिषद प्रत्यक्ष “जुआ” शब्द भले कम प्रयोग करें, पर वे—
लोभ-त्याग, श्रेय-मार्ग का चयन,
गृहस्थ-धर्म और कर्तव्यपालन
की बात कही है।
इसके समर्थन में श्रीमद्भगवद्गीता से ये प्रमाण प्रस्तुत हैं—
१. गीता १६.२१
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभः तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥
भावार्थ:
काम, क्रोध और लोभ—ये आत्मा के नाश के तीन द्वार हैं; इन्हें त्याग देना चाहिए।
जुआ मुख्यतः लोभ पर आधारित है; परिणामस्वरूप व्यक्ति और परिवार दोनों का नाश होता है।
२. गीता २.६२–६३
ध्यायतो विषयान्पुंसः… बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥
भावार्थ:
विषयों के चिंतन से आसक्ति, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, और अंत में बुद्धिनाश होकर व्यक्ति का पतन हो जाता है।
जुए की लत भी इसी क्रम से बुद्धिनाश और पतन का कारण बनती है।
३. गीता ३.३७
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः… महाशनो महापाप्मा।
भावार्थ:
यह कामना ही महापापी और सबको भस्म करने वाली है।
जुआ अतृप्त कामना और तृष्णा को बढ़ाता है, जिससे गृहस्थ-धर्म नष्ट होता है।
४. गीता १.४०–४१
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः…
भावार्थ:
जब अधर्म बढ़ता है, तब कुल की स्त्रियाँ दुःखी और भ्रष्ट होती हैं; इससे कुल-नाश होता है।
जुए जैसे अधर्म से परिवार (कुल) में अशांति और स्त्री-दुःख उत्पन्न होता है—यह भाव “जाया तप्यते” से मेल खाता है।
५. गीता ६.१६–१७
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति… युक्ताहारविहारस्य…
भावार्थ:
अत्यधिक भोग या असंयम से योग (संतुलित जीवन) संभव नहीं; संयम ही सुख का मार्ग है।
जुआ असंयम का प्रतीक है; गीता संयम और संतुलन की शिक्षा देती है।
निष्कर्ष--
गीता में यद्यपि “जुआ” का प्रत्यक्ष निषेध कम मिलता है (अपवाद रूप में १०.३६ में भगवान कहते हैं—“द्यूतं छलयतामस्मि” अर्थात् छल करने वालों में मैं द्यूत हूँ—अर्थात् उसकी प्रबलता का संकेत), परंतु संपूर्ण उपदेश—
लोभ-त्याग, इन्द्रियनिग्रह,
कुल-रक्षा, संयमित जीवन पर आधारित है।
—इसी सिद्धान्त को पुष्ट करता है कि जुआ परिवार-विनाश और दुःख का कारण है।
इसका प्रत्यक्ष और विस्तृत उदाहरण महाभारत में मिलता है
१. सभापर्व – द्यूतक्रीड़ा प्रसंग
युधिष्ठिर जुए में राज्य, धन, भ्राताओं और अंत में द्रौपदी को भी हार जाते हैं।
“अक्षैर्मा दीव्य” (विदुर का उपदेश) —
विदुर बार-बार चेतावनी देते हैं कि जुआ विनाश का मार्ग है।
भावार्थ:
जुआ बुद्धि हर लेता है और कुल का नाश करता है।
परिणामस्वरूप द्रौपदी का अपमान होता है — यह “जाया तप्यते” का सजीव उदाहरण है।
२. वनपर्व ३.३४–३६ (नलोपाख्यान)
राजा नल जुए में राज्य और संपत्ति हार जाते हैं।
“द्यूतं हि पुरुषं नाशयति” (सारभाव)
भावार्थ:
द्यूत (जुआ) मनुष्य का सर्वनाश कर देता है।
दमयंती को वन में कष्ट सहना पड़ता है — पत्नी का दुःख स्पष्ट दिखता है।
३. उद्योगपर्व (विदुरनीति)
विदुर धृतराष्ट्र को उपदेश देते हैं—
“द्यूतं कलहकारणम्”
भावार्थ:
जुआ कलह और विनाश का कारण है।
यह नीति-वचन वेद के अक्षसूक्त के समान ही जुए की निंदा करता है।
४. शान्तिपर्व (राजधर्म)
राजा को चाहिए कि द्यूत और मद्य को राज्य से दूर रखे।
भावार्थ:
जुआ सामाजिक और पारिवारिक विघटन का कारण है; राज्य को इससे रक्षा करनी चाहिए।
निष्कर्ष--
महाभारत में—युधिष्ठिर का द्यूत,
द्रौपदी का दुःख, नल-दमयंती की कथा, विदुरनीति का उपदेश—
ये सब “जाया तप्यते कितवस्य हीना” (ऋग्वेद १०.३४) के भाव को प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध करते हैं कि जुआ परिवार और स्त्री के लिए अत्यंत दुखदायी है।
इसके समर्थन में पुराणों से ये प्रमाण मिलते हैं—
१. श्रीमद्भागवत महापुराण १.१७.३८–३९
कलियुग में अधर्म के स्थान बताते हुए—
“द्युतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः।”
भावार्थ:
जहाँ द्यूत (जुआ), मद्यपान, व्यभिचार और हिंसा हैं—वहीं अधर्म का निवास है।
जुआ अधर्म का प्रमुख स्थान है; इससे परिवार और स्त्री-सम्मान को हानि होती है।
२. विष्णु पुराण (कलियुग वर्णन)
कलियुग में धर्म की हानि और द्यूत-आसक्ति का उल्लेख—
सारभाव:
जुए, लोभ और दुराचार से समाज में कलह और परिवार-विघटन बढ़ता है।
यह “कितव” (जुआरी) के कारण कुल-दुःख की पुष्टि करता है।
३. गरुड पुराण (प्रेतकल्प)
यहाँ द्यूत और दुराचार को पापों में गिना गया है।
भावार्थ:
जो व्यक्ति द्यूतादि पापों में लिप्त रहता है, उसे दुःखद फल भोगना पड़ता है।
जुआ न केवल लोक में, बल्कि परलोक में भी दुःख का कारण है।
४. पद्म पुराण
धर्माचरण और गृहस्थ-धर्म की महिमा में—
सारभाव:
जो गृहस्थ धर्म से विचलित होकर दुराचार (द्यूत आदि) में प्रवृत्त होता है, उसका कुल क्लेश को प्राप्त होता है।
पत्नी और परिवार का संताप इसी से होता है।
निष्कर्ष--
पुराणों में—
द्यूत (जुआ) को अधर्म का स्थान कहा गया है।
इसे कलह, कुल-विघटन और स्त्री-दुःख का कारण बताया गया है।
गृहस्थ-धर्म, संयम और धर्मपालन को श्रेष्ठ माना गया है।
इस प्रकार पुराण भी उसी शिक्षा की पुष्टि करते हैं जो ऋग्वेद १०.३४ (अक्षसूक्त) में जुए की निंदा के रूप में व्यक्त है। मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, चाणक्य, भर्तृहरि आदि नीतिग्रन्थों से भी प्रमाण --
१. मनुस्मृति ७.५०
द्यूतं समाह्वयं चैव राजा राष्ट्रान्निवारयेत्।
भावार्थ:
राजा को चाहिए कि द्यूत (जुआ) और समाह्वय (मुकाबला/सट्टा) को राज्य से दूर रखे।
जुआ सामाजिक-पारिवारिक विघटन का कारण माना गया है।
२. याज्ञवल्क्य स्मृति-- २.१९९–२००
द्यूतं समाह्वयं चैव राज्ञा नित्यं निवारयेत्।
भावार्थ:
राजा को सदैव द्यूत और सट्टा रोकना चाहिए; क्योंकि यह कलह और हानि का कारण है।
३. चाणक्य नीति--
द्यूतं मद्यं स्त्रीसंगः… एते त्याज्या विवेकिना। (सारभाव)
भावार्थ:
द्यूत, मद्य आदि विवेकी पुरुष द्वारा त्याज्य हैं; ये धन-नाश और अपमान का कारण बनते हैं।
४. नीतिशतक (भर्तृहरि)
लोभ एव महापापम्… (सारभाव)
भावार्थ:
लोभ महान पाप है; यह मनुष्य की कीर्ति और शांति नष्ट करता है।
जुआ लोभ का ही रूप है; फलतः परिवार दुःखी होता है।
५. हितोपदेश--
कई कथाओं में दुराचरण और लोभ से उत्पन्न विनाश का वर्णन है।
सारभाव:
अविवेक और लालच से किया गया कर्म अंततः स्वयं और परिवार के लिए क्लेशकारक होता है।
निष्कर्ष--
स्मृतियाँ (मनु, याज्ञवल्क्य) — जुए को राज्य द्वारा प्रतिबंधित करने योग्य बताती हैं।
नीतिग्रन्थ (चाणक्य, भर्तृहरि, हितोपदेश) — लोभ और द्यूत को पतन का कारण बताते हैं।
इस प्रकार वैदिक, पुराण, स्मृति और नीति—सभी ग्रन्थ एक स्वर से कहते हैं कि द्यूत (जुआ) से परिवार, विशेषतः पत्नी, दुःखी होती है, जैसा कि ऋग्वेद १०.३४ में कहा गया है।
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