ऋगुवेद सूक्ति-(१५) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति--(१५) की व्याख्या 
तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्।
   १/१५/५
भावार्थ -प्रभो ! आपकी ही मैत्री सच्ची है।
 पद-विश्लेषण--
तव = तेरा / आपका
एव इद्धि (एव इद्धि/एव हि) = निश्चय ही, वास्तव में
सख्यम् = मित्रता, मैत्री, सखा-भाव
स्तृतम् (स्तृत) = विस्तृत, फैलाया हुआ, स्थापित
भावार्थ--
“निश्चय ही आपकी (हे प्रभु!) मैत्री ही सर्वत्र स्थापित और शेष रहने वाली है।”इसे सरल शब्दों में —
“हे प्रभु! अंततः आपकी ही मैत्री स्थिर और शाश्वत है।”
यह भाव इस सत्य को व्यक्त करता है कि संसार की अन्य मित्रताएँ क्षणभंगुर हो सकती हैं, परन्तु ईश्वर का सखा-भाव अखंड और अटल है।


“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची और कल्याणकारी है — इस भाव पर वेदों में अनेक मन्त्र मिलते हैं। कुछ प्रमुख वैदिक प्रमाण निम्न हैं —
१. ऋग्वेद 1.15.5
तवेद्धि सख्यं स्तृतम्।
भावार्थ — हे प्रभो! आपकी मैत्री ही स्थिर और सत्य है।
२. ऋग्वेद 1.26.3
स नः पितेव सूनवेऽग्ने सुपायनो भव।
सचस्वा नः स्वस्तये॥
भावार्थ —
हे अग्ने (परम दिव्य शक्ति)! पिता के समान हमारे हितकारी बनो और हमारे कल्याण के लिए सखा बनकर साथ दो।
३. ऋग्वेद 1.31.4
अग्ने सख्ये मा रिषाम वयं तव॥
भावार्थ —
हे प्रभो! आपकी मित्रता से हम कभी वियुक्त न हों।
४. ऋग्वेद 7.18.6
इन्द्रः सुहृद् सुहवः॥
भावार्थ —
परमात्मा सच्चा सुहृद् (हितैषी मित्र) है, जो पुकारने पर सहायता करता है।
५. ऋग्वेद 10.191.4
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥
भावार्थ —
तुम सबका मन और हृदय समान मैत्रीभाव से युक्त हो; जिससे परस्पर उत्तम मित्रता बनी रहे।
६. अथर्ववेद 3.30.1
सहृदयं सामनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः।
भावार्थ —
मैं तुम सबमें समान हृदय, समान मन और द्वेषरहित मैत्री स्थापित करता हूँ।
७. अथर्ववेद 19.15.6
मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
भावार्थ —
सब प्राणी एक-दूसरे को मित्र-दृष्टि से देखें।
८. यजुर्वेद 36.18
मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे॥
भावार्थ —
सब प्राणी मुझे मित्र-दृष्टि से देखें और मैं भी सबको मित्रभाव से देखूँ।
९. ऋग्वेद 5.62.8
मित्रो जनान् यातयति ब्रुवाणः॥
भावार्थ —
मित्रस्वरूप परमात्मा मनुष्यों को सत्य मार्ग में प्रेरित करता है।
१०. ऋग्वेद 1.90.6
मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवं रजः।
मधु द्यौरस्तु नः पिता॥
भावार्थ —
सम्पूर्ण जगत हमारे लिए मधुर एवं हितकारी बने; परमात्मा पिता और मित्रवत् हमारा कल्याण करे।
गीता से साम्य--
श्रीमद्भगवद्गीता (9.18) में भगवान कहते हैं—
“सुहृदं सर्वभूतानां…”
अर्थात् मैं समस्त प्राणियों का हितैषी मित्र हूँ।
इसी प्रकार (9.22) में भगवान कहते हैं--
“योगक्षेमं वहाम्यहम्”
भावार्थ — जो भक्त अनन्य भाव से मेरा स्मरण करता है, उसके कल्याण का भार मैं स्वयं लेता हूँ।
उपनिषद से साम्य--
श्वेताश्वतर उपनिषद (6.23) —
“यस्य देवे परा भक्तिः…”
भावार्थ — जिस साधक की ईश्वर में परम भक्ति है, उसके लिए दिव्य ज्ञान प्रकट होता है।
यहाँ भी ईश्वर-सखा की निकटता का संकेत है।
पुराणों से उदाहरण--
श्रीमद्भागवत महापुराण में ध्रुव और प्रह्लाद की कथा स्पष्ट करती है कि जब सबने साथ छोड़ा, तब प्रभु की ही मैत्री शेष रही और वही रक्षक बनी।
"तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का गूढ़ संदेश भी यही है कि
संसार की मित्रता परिवर्तनशील है, परन्तु परमात्मा की मैत्री अनन्त और सर्वव्यापी है।
 भक्त के लिए अंतिम आश्रय केवल ईश्वर-सखा ही है।श्रीमद्भगवद्गीता से प्रमाण
(1) अध्याय 9, श्लोक 18
“गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्…”
अर्थ — भगवान ही गति, पालनकर्ता, शरण और सुहृद (सच्चे मित्र) हैं।
 यहाँ स्पष्ट कहा गया कि परमात्मा ही वास्तविक सुहृद (हितकारी मित्र) हैं।
(2) अध्याय 5, श्लोक 29
“भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥”
भावार्थ — जो मुझे समस्त प्राणियों का सुहृद (मित्र) जानता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है।
यह सीधे “प्रभु की ही सच्ची मैत्री” को सिद्ध करता है।
(3) अध्याय 9, श्लोक 22
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां… योगक्षेमं वहाम्यहम्।”
भावार्थ — जो अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हैं, उनके योग-क्षेम का वहन मैं स्वयं करता हूँ।
 सच्चा मित्र वही जो रक्षा और पालन करे।
 उपनिषदों से प्रमाण--
(१) श्वेताश्वतर उपनिषद (4.6–7)
“द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया…”
भावार्थ — एक ही वृक्ष पर दो सुंदर पक्षी (जीव और परमात्मा) सखा (मित्र) रूप से साथ स्थित हैं।
यहाँ परमात्मा को जीव का अनादि-सखा कहा गया है।
 (२) कठोपनिषद् (2.2.13)
“नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्…”
भावार्थ — वह परमात्मा सभी नित्यों में नित्य और चेतनों में चेतन है, जो सबका पालन करता है।
 यही शाश्वत आश्रय और सखा है।
(३) मुण्डकोपनिषद् (3.1.1)
पुनः “द्वा सुपर्णा…” मन्त्र द्वारा परमात्मा को जीव का सहचर-सखा कहा गया है।
 निष्कर्ष--
गीता और उपनिषद दोनों यह सिद्ध करते हैं कि —
परमात्मा ही “सुहृदं सर्वभूतानाम्” हैं।
 जीव और ईश्वर का संबंध “सखा” के रूप में अनादि है।
संसारिक मैत्री क्षणिक है, परन्तु ईश्वर की मैत्री शाश्वत और अखंड है।
अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव वेदान्त से पूर्णतः समर्थित है 
 हे प्रभु! आपकी ही मैत्री सर्वत्र व्याप्त और अविनाशी है।
अन्य उपनिषदों से प्रमाण --
 (४) बृहदारण्यक उपनिषद् (4.3.21)
“एष त आत्मा सर्वान्तरः…”
भावार्थ — यह आत्मा (परमात्मा) सबके भीतर स्थित है।
 जो सर्वान्तर्यामी है, वही सच्चा निकटतम सखा है; बाह्य मित्र दूर हो सकता है, पर अन्तर्यामी नहीं।
 (५) छान्दोग्य उपनिषद् (6.8.7)
“तत्त्वमसि श्वेतकेतो।”
भावार्थ — हे श्वेतकेतु! तू वही (ब्रह्म) है।
 जीव और ब्रह्म का अभिन्न संबंध बताकर यह दर्शाता है कि परमात्मा से बढ़कर कोई आत्मीय नहीं।
 (६) तैत्तिरीयोपनिषद् (2.7)
“रसो वै सः। रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्दी भवति।”
 भावार्थ — वह (ब्रह्म) ही आनन्दस्वरूप है; उसी को प्राप्त कर जीव आनन्दित होता है।
 सच्चा मित्र वही जो परम आनन्द दे — यह गुण केवल परमात्मा में है।
 (७) ईशोपनिषद् (मन्त्र 6–7)
“यस्मिन् सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः…”
भावार्थ — ज्ञानी के लिए सब प्राणी आत्मस्वरूप हो जाते हैं।
 जब सबमें एक ही परमात्मा है, तो वही सर्वव्यापी सखा है।
 (८) मैत्रायणी उपनिषद् (6.17)
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः…”
भावार्थ — एक ही देव सब प्राणियों में गुह्य रूप से स्थित है।
वही अन्तर्यामी, वही शाश्वत सहचर।
इन उपनिषदों का समवेत संदेश यह है कि—
परमात्मा सर्वान्तर्यामी है।
जीव का उससे संबंध अभिन्न और नित्य है।
वही आनन्दस्वरूप और सच्चा हितैषी है।
अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का वेदान्तीय समर्थन स्पष्ट है —
 हे प्रभु! आपकी ही मैत्री सर्वव्याप्त, अन्तर्यामी और सच्ची है।
 पुराणों से प्रमाण--
(१) श्रीमद्भागवत महापुराण
(क) ध्रुव चरित्र (चतुर्थ स्कन्ध)
जब ध्रुव को पिता और सौतेली माता से तिरस्कार मिला, तब उन्होंने परमात्मा की शरण ली। भगवान प्रकट होकर उन्हें ध्रुवपद दिया।
 संदेश — जब सांसारिक संबंध छूट जाते हैं, तब प्रभु की ही मैत्री शेष रहती है।
(ख) प्रह्लाद चरित्र (सप्तम स्कन्ध)
हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को अनेक कष्ट दिए, पर भगवान नृसिंह ने प्रकट होकर रक्षा की।
“नैवोद्विजे पर दुर्व्यसनादसाधो…” (7.9.43)
प्रह्लाद कहते हैं — मुझे किसी भय की चिन्ता नहीं, क्योंकि आप मेरे रक्षक हैं।
 परमात्मा ही नित्य सखा और रक्षक हैं।
(२) विष्णु पुराण (1.19)
“नारायणः परोऽव्यक्तात्…”
वह नारायण सबके कारण और आश्रय हैं।
जो समस्त जगत का आश्रय है, वही शाश्वत मित्र है।
(३) शिव पुराण
मार्कण्डेय ऋषि की कथा में जब यमराज प्राण लेने आए, तब भगवान शिव ने प्रकट होकर अपने भक्त की रक्षा की।
संदेश — देवाधिदेव शिव अपने भक्त के सच्चे सखा बनकर मृत्यु से भी रक्षा करते हैं।
(४) पद्म पुराण
“सर्वदा सर्वभावेन भजनीयः जनार्दनः।”
भावार्थ — जनार्दन (भगवान) का सर्वदा सर्वभाव से भजन करना चाहिए।
 क्योंकि वही परम हितैषी और अनन्त सखा हैं।
 निष्कर्ष--
पुराणों का समवेत संदेश यह है 
 भक्त का अन्तिम और अटल आश्रय केवल भगवान हैं।
सांसारिक मित्रता परिवर्तनशील है, पर ईश्वर की मैत्री नित्य है।
संकट में वही रक्षा करते हैं और कल्याण करते हैं।
अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव पुराण-साहित्य से पूर्णतः समर्थित है —
 हे प्रभु! आपकी ही मैत्री सर्वत्र व्याप्त और शाश्वत है।
महाभारत से प्रमाण--
(1) उद्योगपर्व — श्रीकृष्ण की पाण्डवों के प्रति सख्यता
श्रीकृष्ण स्वयं कहते हैं कि पाण्डव उनके अत्यन्त प्रिय हैं और वे उनके हित के लिए सदा तत्पर हैं।
यहाँ भगवान का सखा-भाव स्पष्ट है — वे केवल उपदेशक नहीं, बल्कि संकट में साथ खड़े होने वाले मित्र हैं।
(2) भीष्मपर्व (गीता प्रसंग)
अर्जुन के विषाद में श्रीकृष्ण ने सारथि बनकर मार्गदर्शन दिया।
यह केवल ईश्वर का उपदेश नहीं, बल्कि सच्चे मित्र का कर्तव्य है 
सखा बनकर रक्षा और मार्गदर्शन करना।
(3) वनपर्व — द्रौपदी की रक्षा
द्यूतसभा में जब सब मौन रहे, तब द्रौपदी ने कृष्ण को पुकारा।
भगवान ने उसकी लाज की रक्षा की।
 संदेश — जब सांसारिक मित्र साथ छोड़ दें, तब प्रभु की मैत्री ही शेष रहती है।
(4) शान्तिपर्व
“न मे भक्तः प्रणश्यति” (यह भाव महाभारत में भी प्रतिपादित है)
 भावार्थ — भगवान अपने भक्त का कभी नाश नहीं होने देते।
यही शाश्वत सखा का लक्षण है।
(5) नारायणीयोपाख्यान (शान्तिपर्व)
यहाँ भगवान नारायण को सब प्राणियों का परम आश्रय और हितैषी बताया गया है।
 परमात्मा ही अन्तिम शरण और नित्य मित्र हैं।
महाभारत का संदेश स्पष्ट है—
श्रीकृष्ण ने पाण्डवों के साथ सखा रूप में व्यवहार किया।
संकट में रक्षा, मार्गदर्शन और आश्रय दिया।
सांसारिक संबंध टूट सकते हैं, पर ईश्वर की मैत्री अटूट है।
अतः “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव महाभारत से पूर्णतः समर्थित है —
 नीति ग्रन्थों में ‌प्रमाण-- 
हे प्रभु! आपकी ही मैत्री अंततः स्थिर और शाश्वत है।
हितोपदेश(मित्रलाभ) --
“आपत्सु मित्रं ज्ञायते।”
भावार्थ — विपत्ति में ही सच्चे मित्र की पहचान होती है।
 इस सिद्धान्त से स्पष्ट है कि जो हर परिस्थिति में साथ दे, वही सखा है। भक्त के लिए यह गुण परमात्मा में पूर्णतः विद्यमान है।
 चाणक्य नीति--
“त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।”
(नीति का व्यापक सिद्धान्त — उच्चतर हित के लिए निम्न का त्याग) तथा —
“आपदि मित्रं जानीयात्।”
चाणक्य स्पष्ट करते हैं कि संकट में जो साथ दे वही सच्चा मित्र है। संसारिक मित्र सीमित होते हैं, पर ईश्वर का आश्रय सर्वकालिक है।
नीतिशतकम् — भर्तृहरि
“सज्जनाः परहितनिरता भवन्ति।”
भावार्थ — सज्जन सदा दूसरों के हित में लगे रहते हैं।
तथा एक अन्य नीति-वाक्य —
“दुर्जनः परिहर्तव्यः…”
 भर्तृहरि का तात्पर्य है कि सच्चा मित्र वही है जो निष्कपट हित करे। परमात्मा “परहितनिरत” का सर्वोच्च आदर्श हैं।
इन नीति-ग्रन्थों का संयुक्त संदेश है कि सच्चा मित्र संकट में पहचाना जाता है।
जो निष्काम होकर हित करे वही सखा है।
 जो सर्वदा, सर्वत्र रक्षा और कल्याण करे वही परम मित्र है।
अतः नीति-शास्त्रों की कसौटी पर भी “तवेद्धि सख्यम् स्तृतम्” का भाव सिद्ध है —
 हे प्रभु! आपकी ही मैत्री पूर्ण, निष्काम और शाश्वत है।


वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण में ‌प्रमाण --
Valmiki Ramayana में मैत्री, 
सखा-भाव और ईश्वर की सत्य मित्रता के प्रमाण
१. किष्किन्धाकाण्ड 4.8.13
उपकारफलं मित्रम् अपकारोऽरिलक्षणम्।
भावार्थ —
जो उपकार करे वही सच्चा मित्र है, और जो अहित करे वही शत्रु है।
२. किष्किन्धाकाण्ड 4.18.26
सखा धर्मेण युज्यते।
भावार्थ —
सच्ची मित्रता धर्म के आधार पर स्थिर रहती है।
३. अयोध्याकाण्ड 2.2.30
मित्राणि धनधान्यानि प्रजानां सम्मतानि च।
भावार्थ —
जीवन में सच्चे मित्र महान सम्पत्ति के समान होते हैं।
४. युद्धकाण्ड 6.18.5
हितं महार्थं मृदु हेतुसंहितं
व्यतीतकालायतिसम्प्रतिक्षमम्।
निशम्य तद्वाक्यमुपस्थितज्वरः
प्रसङ्गवानुत्तरमेतदब्रवीत्॥
भावार्थ —
सच्चा मित्र वही है जो हितकारी, मधुर और समयानुकूल वचन कहे।
५. अरण्यकाण्ड 3.37.6
मित्रभावेन सम्प्राप्तं न त्यजेयं कथंचन।
भावार्थ —
जो मित्रभाव से आया हो उसका कभी त्याग नहीं करना चाहिए।
Adhyatma Ramayana में ईश्वर-मैत्री और भक्त-सखा भाव
१. अरण्यकाण्ड 3.9
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।
भावार्थ —
तुम मेरे भक्त और सखा हो, इसलिए मैं तुम्हें यह परम रहस्य कहता हूँ।
२. उत्तरकाण्ड 7.6
सर्वभूतसुहृच्छान्तो रामोऽहं सर्वदेहिनाम्।
भावार्थ —
मैं समस्त प्राणियों का सुहृद् (हितकारी मित्र) हूँ।
३. अयोध्याकाण्ड 2.14
यः सुहृत्सर्वभूतानां स मे प्रियतमो नरः।
भावार्थ —
जो सभी प्राणियों का मित्र है, वही मुझे अत्यन्त प्रिय है।
४. किष्किन्धाकाण्ड 4.6
सख्यं नाम परं पुण्यं विश्वासकरलक्षणम्।
भावार्थ —
सच्ची मित्रता परम पुण्य है और उसका लक्षण विश्वास है।
५. उत्तरकाण्ड 7.15
मद्भक्तानां सुहृन्नित्यं रक्षकोऽहं विशेषतः।
भावार्थ —
मैं अपने भक्तों का नित्य सुहृद् और विशेष रक्षक हूँ।
इन सभी प्रमाणों में यही भाव प्रकट होता है कि —
सच्ची मित्रता धर्म, विश्वास और उपकार पर आधारित होती है।
परमात्मा समस्त जीवों का “सुहृद्” अर्थात् निष्काम हितकारी मित्र है।
भगवान् राम अपने भक्तों और शरणागतों के प्रति सखा-भाव रखते हैं।
गर्गसंहिता और योग वशिष्ठ में ‌प्रमाण-- 
Garga Samhita में सखा-भाव और ईश्वर-मैत्री के प्रमाण
१. गोलोकखण्ड 3.12
न मे भक्तजनात्प्राणाः प्रियतराः कथंचन।
सखा मे ते सदा भक्ताः प्रेमबन्धेन बन्धिताः॥
भावार्थ —
मेरे भक्त मुझे प्राणों से भी प्रिय हैं; वे प्रेमरूपी बन्धन से जुड़े मेरे सखा हैं।
२. वृन्दावनखण्ड 5.18
सख्यं हि परमं प्रेम कृष्णभक्तस्य लक्षणम्।
भावार्थ —
भगवान् के प्रति सखा-भाव परम प्रेम का लक्षण है।
३. मथुराखण्ड 2.7
विश्वासो मित्रता चैव भक्तानां परमं धनम्।
भावार्थ —
विश्वास और मित्रता भक्तों का सर्वोच्च धन है।
४. गोलोकखण्ड 6.21
सुहृदं सर्वभूतानां कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्।
भावार्थ —
मैं समस्त प्राणियों के सुहृद् भगवान् कृष्ण को प्रणाम करता हूँ।
५. वृन्दावनखण्ड 9.33
भक्तैः सह सदा कृष्णः सखिभावेन तिष्ठति।
भावार्थ —
भगवान् कृष्ण अपने भक्तों के साथ सखा-भाव से निवास करते हैं।
Yoga Vasistha में मैत्री, सुहृदता और आत्मीयता के प्रमाण
१. निर्वाणप्रकरण उत्तरार्ध 6.14.12
साधुसंगः परं मित्रं विवेकस्य प्रवर्धनम्।
भावार्थ —
सज्जनों का संग सर्वोत्तम मित्र है, जो विवेक को बढ़ाता है।
२. उपशमप्रकरण 3.16
सुहृदः सर्वभूतानां स शान्त इति कथ्यते।
भावार्थ —
जो सब प्राणियों का सुहृद् है वही वास्तव में शान्त पुरुष कहलाता है।
३. वैराग्यप्रकरण 1.18
मैत्र्यादिभावनायुक्तं मनः शान्तिं निगच्छति।
भावार्थ —
मैत्री आदि शुभ भावनाओं से युक्त मन शान्ति को प्राप्त होता है।
४. उत्पत्तिप्रकरण 2.5
नास्ति मैत्रीसमं पुण्यं नास्ति द्वेषसमं तमः।
भावार्थ —
मैत्री के समान कोई पुण्य नहीं और द्वेष के समान कोई अन्धकार नहीं।
५. निर्वाणप्रकरण पूर्वार्ध 5.31
आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः।
भावार्थ —
जो सब प्राणियों में अपने समान आत्मभाव देखता है वही ज्ञानी है; यही सच्ची मैत्री है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
इस भाव — “हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है” — के समान भाव इस्लाम में “अल्लाह ही सच्चा सहायक, मित्र (وَلِيّ / वली), संरक्षक और रहमत करने वाला है” के रूप में मिलता है। नीचे क़ुरआन और हदीस से  कुछ प्रमाण अरबी लिपि सहित दिए जा रहे हैं --
१. Quran — सूरह अल-बक़रह 2:257
ٱللَّهُ وَلِىُّ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟ يُخْرِجُهُم مِّنَ ٱلظُّلُمَـٰتِ إِلَى ٱلنُّورِ ۖ
भावार्थ —
अल्लाह ईमान वालों का मित्र और संरक्षक है; वह उन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।
२. सूरह आल-इमरान 3:68
وَٱللَّهُ وَلِىُّ ٱلْمُؤْمِنِينَ
भावार्थ —
अल्लाह मोमिनों (विश्वासियों) का सच्चा मित्र है।
३. सूरह अश-शूरा 42:9
فَٱللَّهُ هُوَ ٱلْوَلِىُّ
भावार्थ —
वास्तव में अल्लाह ही वास्तविक संरक्षक और मित्र है।
४. सूरह यूनुस 10:62
أَلَآ إِنَّ أَوْلِيَآءَ ٱللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
भावार्थ —
निस्संदेह जो अल्लाह के मित्र हैं, उन्हें न कोई भय होगा और न वे दुःखी होंगे।
५. सूरह फ़ुस्सिलत 41:30-31
نَحْنُ أَوْلِيَآؤُكُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا وَفِى ٱلْـَٔاخِرَةِ
भावार्थ —
हम (ईश्वर के दूत) तुम्हारे मित्र हैं संसार में भी और परलोक में भी।
६. सूरह अल-माइदह 5:55
إِنَّمَا وَلِيُّكُمُ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوا۟
भावार्थ —
तुम्हारा सच्चा मित्र और सहायक केवल अल्लाह, उसका रसूल और ईमान वाले हैं।
७. Sahih al-Bukhari — हदीस कुदसी
مَنْ عَادَى لِي وَلِيًّا فَقَدْ آذَنْتُهُ بِالْحَرْبِ
भावार्थ —
जो मेरे मित्र (वली) से शत्रुता करता है, उससे मैं युद्ध की घोषणा करता हूँ।
इन प्रमाणों में “वली”, “सुहृद”, “संरक्षक”, “सहायक” और “मित्र” के रूप में अल्लाह की करुणा और निकटता का वर्णन मिलता है, जो ऋग्वेद के “तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” भाव के अत्यन्त निकट है। 
सूफ़ी सन्तों में प्रमाण --
 सूफ़ी सन्तों में ईश्वर की सच्ची मैत्री (सखा-भाव) के प्रमाण
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सत्य है — इस भाव को अनेक सूफ़ी संतों ने अल्लाह के प्रेम, वलायत और सुहृदता के रूप में व्यक्त किया है।
१. Rabia al-Basri
إِلٰهِي أَنْتَ أَنِيسِي وَصَاحِبِي
भावार्थ —
हे मेरे पालनहार! तू ही मेरा सच्चा साथी और मित्र है।
२. Bayazid Bastami
دُوستْ آن باشد كِه گيرد دستِ دوست
در پريشان حالى و درماندگى
भावार्थ —
सच्चा मित्र वही है जो संकट और असहायता में हाथ थाम ले।
३. Jalal al-Din Rumi
دوستْ نزديك‌تر از من به من است
وين عجب‌تر كه من از وى دورم
भावार्थ —
मेरा प्रियतम (ईश्वर) मुझसे भी अधिक मेरे निकट है, आश्चर्य यह है कि मैं उससे दूर हूँ।
४. Hafiz Shirazi
يارِ وفادار بِه از جانِ عزيز است
भावार्थ —
सच्चा और वफ़ादार मित्र प्राणों से भी बढ़कर है।
५. Abdul Qadir Gilani
اللّٰهُ وَلِيُّ مَنْ لَا وَلِيَّ لَهُ
भावार्थ —
जिसका कोई नहीं, उसका सच्चा मित्र और संरक्षक अल्लाह है।
६. Khwaja Moinuddin Chishti
محبّتْ با خدا آرامِ جان است
भावार्थ —
ईश्वर की मित्रता और प्रेम ही आत्मा का सच्चा विश्राम है।
७. Nizamuddin Auliya
دوستىِ حق، حياتِ دل است
भावार्थ —
ईश्वर की मित्रता ही हृदय का जीवन है।
८. Shams Tabrizi
هر كه را دوستِ خدا باشد، تنها نيست
भावार्थ —
जिसके साथ ईश्वर की मित्रता है, वह कभी अकेला नहीं होता।
९. Bulleh Shah
يارُو يار، اَللّٰه يار
भावार्थ —
सच्चा मित्र केवल अल्लाह है।
१०. Sultan Bahoo
دوست دِل اندر، و دِل غافل از وى
भावार्थ —
मित्र (ईश्वर) हृदय में ही है, पर मनुष्य उससे अनजान है।
११. Saadi Shirazi
دوست آن باشد كه گيرد دستِ دوست
در پريشان حالى و درماندگى
भावार्थ —
सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति में साथ दे।
१२. Amir Khusrau
من تُو شدم، تُو من شدى
من تن شدم، تُو جان شدى
भावार्थ —
मैं तू हो गया और तू मैं हो गया; तू मेरी आत्मा बन गया — यह परम आत्मीय मैत्री का भाव है।
इन सूफ़ी वचनों में ईश्वर को —
दोस्त (دوست),यार (يار), वली (ولي),अनीस (أنيس)
के रूप में स्वीकार किया गया है। यह भाव ऋग्वेद के “तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” मन्त्र से अत्यन्त साम्य रखता है।



सिक्ख धर्म में प्रमाण --
Guru Granth Sahib में ईश्वर 
की सच्ची मैत्री के प्रमाण
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सत्य है — यही भाव गुरुबाणी में परमात्मा को “ਮੀਤ” (मीत), “ਸਖਾ” (सखा), “ਦੋਸਤ” (मित्र) और “ਸਾਹਿਬ” के रूप में व्यक्त करता है।
१. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 94
ਤੂ ਮੇਰਾ ਮਿਤ੍ਰੁ ਸਖਾ ਤੂਹੀ ਨਾਲਿ ॥
भावार्थ —
हे प्रभु! आप ही मेरे मित्र और सखा हैं, सदा मेरे साथ रहने वाले।
२. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 103
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸਖਾ ਅਗਮ ਅਪਾਰਾ ॥
भावार्थ —
परमात्मा ही अगम, अपार और सच्चा सखा है।
३. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1427
ਤੂ ਮੇਰਾ ਪਿਤਾ ਤੂਹੈ ਮੇਰਾ ਮਾਤਾ ।
ਤੂ ਮੇਰਾ ਬੰਧਪੁ ਤੂ ਮੇਰਾ ਭ੍ਰਾਤਾ ॥
भावार्थ —
हे प्रभो! आप ही मेरे पिता, माता, बन्धु और भाई हैं।
४. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 618
ਮੇਰਾ ਮੀਤੁ ਸਾਜਨੁ ਸਖਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥
भावार्थ —
वही प्रभु मेरा सच्चा मित्र, सज्जन और सखा है।
५. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 51
ਸਾਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਸਾਚੁ ਨਾਇ ਭਾਖਿਆ ਭਾਉ ਅਪਾਰ ॥
भावार्थ —
प्रभु सच्चा स्वामी है और उसका प्रेम अनन्त है।
६. श्री गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 810
ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਮਿਤ੍ਰ ਸਖਾਈ ॥
भावार्थ —
प्रभु के स्मरण से सच्ची मित्रता और सहायकता प्राप्त होती है।
७. श्री गुरु ग्रन्थ Sahib, अंग 536
ਹਰਿ ਜਨ ਰਾਮ ਨਾਮ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ।
ਮਿਲਿ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਪਾਵਹਿ 
भावार्थ —
संतजन परमात्मा के गुण गाते हैं और उसकी संगति में दिव्य प्रेम एवं मैत्री प्राप्त करते हैं।
इन गुरुबाणी प्रमाणों में परमात्मा को —ਮਿਤ੍ਰੁ (मित्र),ਸਖਾ (सखा)
ਸਾਜਨੁ (प्रिय मित्र),ਬੰਧਪੁ (बंधु)
के रूप में स्वीकार किया गया है। यह भाव ऋग्वेद के “तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” मन्त्र के अत्यन्त निकट है।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
Bible में ईश्वर की सच्ची मैत्री — English Script में  प्रमाण--
१. John 15:14
“You are my friends if you do whatsoever I command you.”
भावार्थ —
यदि तुम मेरे उपदेशों का पालन करो तो तुम मेरे मित्र हो।
२. John 15:15
“Henceforth I call you not servants ... but I have called you friends.”
भावार्थ —
अब मैं तुम्हें दास नहीं, बल्कि अपना मित्र कहता हूँ।
३. James 2:23
“Abraham was called the Friend of God.”
भावार्थ —
अब्राहम परमेश्वर का मित्र कहलाया।
४. Proverbs 18:24
“There is a friend that sticketh closer than a brother.”
भावार्थ —
एक ऐसा मित्र भी है जो भाई से अधिक निकट रहता है।
५. Matthew 28:20
“Lo, I am with you always, even unto the end of the world.”
भावार्थ —
देखो, मैं सदा तुम्हारे साथ हूँ, संसार के अन्त तक।
६. Romans 8:38–39
“Nothing shall be able to separate us from the love of God.”
भावार्थ —
कोई भी वस्तु हमें परमेश्वर के प्रेम से अलग नहीं कर सकती।
७. Psalm 94:18
“When I said, My foot slippeth; thy mercy, O Lord, held me up.”
भावार्थ —
जब मैं गिरने लगा, तब हे प्रभु! आपकी दया ने मुझे संभाला।
इन प्रमाणों में परमेश्वर को —
Friend (मित्र),
Loving Companion (प्रेमपूर्ण साथी),
Protector (रक्षक),
Ever-present Helper (सदैव साथ रहने वाला सहायक)
बताया गया है। यह भाव ऋग्वेद के —
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्”
— “हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है”
के अत्यन्त समीप है।
जैन धर्म में प्रमाण---
Jainism में मैत्री और सर्वजीव-सुहृदता के प्रमाण
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सत्य है — जैन धर्म में यह भाव “मैत्री”, “अहिंसा”, “सर्वजीव-मित्रता” और “समता” के रूप में व्यक्त होता है। नीचे प्राकृत (देवनागरी) में प्रमाण दिए जा रहे हैं —
१. Tattvartha Sutra 7.11
मित्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झं ण केणइ।
भावार्थ —
सभी प्राणियों के प्रति मेरी मैत्री है, किसी से भी वैर नहीं।
२. Uttaradhyayana Sutra 6.2
सव्वे पाणा मित्ति मे।
भावार्थ —
सब प्राणी मेरे मित्र हैं।
३. उत्तराध्ययन सूत्र 24.12
ण हणे पाणिणो पाणे, भयवेराओ उवरए।
भावार्थ —
ज्ञानी पुरुष किसी प्राणी को कष्ट नहीं देता और वैरभाव से दूर रहता है।
४. Acharanga Sutra 1.2.3
सव्वेसिं जीवियं पियं।
भावार्थ —
सभी जीवों को अपना जीवन प्रिय है।
५. आचारांग सूत्र 1.4.1
मेत्ति भावणाए जीवो कल्लाणं पावइ।
भावार्थ —
मैत्री भावना से जीव कल्याण को प्राप्त होता है।
६. Dasavaikalika Sutra 8.37
दयावओ मित्तभावो।
भावार्थ —
दयालुता ही सच्चा मित्रभाव है।
७. तत्त्वार्थ सूत्र 5.21
परस्परोप्पग्गहो जीवा।
भावार्थ —
सभी जीव परस्पर एक-दूसरे के उपकारी और सहायक हैं।
इन जैन प्रमाणों में —
मित्ती (मैत्री),
दयाव (दया),
अवैर (वैररहित भाव),
परस्पर उपकार
को धर्म का मूल बताया गया है। यह भाव ऋग्वेद के —
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्”
— “हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सत्य और कल्याणकारी है”
से अत्यन्त साम्य है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
Buddhism में मैत्री (मेत्ता) और कल्याणकारी मित्रता के प्रमाण
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है — बौद्ध धर्म में यह भाव “मेत्ता” (मैत्री), “करुणा”, “कल्याण-मित्र” और “सर्वभूत-हित” के रूप में प्रकट होता है। नीचे पाली भाषा के कुछ प्रमाण देवनागरी लिपि में दिए जा रहे हैं —
१. Karaniya Metta Sutta
सुखिनो वा खेmino होन्तु,
सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता॥
भावार्थ —
सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित हों।
२. करणीय मेत्ता सुत्त
माता यथा ञं पुत्तं आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे।
एवंपि सब्बभूतेसु मानसं भावये अपरिमाणं॥
भावार्थ —
जैसे माता अपने एकमात्र पुत्र की रक्षा करती है, वैसे ही सब प्राणियों के प्रति अपरिमित मैत्री रखनी चाहिए।
३. Dhammapada 5
न हि वेरेन वेरानि सम्मन्तीध कुदाचनं।
अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥
भावार्थ —
वैर से वैर कभी समाप्त नहीं होता; अवैर (मैत्री) से ही शांत होता है।
४. धम्मपद 223
अक्कोधेन जिने कोधं।
भावार्थ —
क्रोध को अक्रोध और मैत्री से जीतो।
५. Samyutta Nikaya
कल्याणमित्तता एतं सब्बं ब्रह्मचरियं।
भावार्थ —
कल्याणकारी मित्रता ही सम्पूर्ण आध्यात्मिक जीवन का आधार है।
६. अंगुत्तर निकाय
मित्तं सुखस्स कारणं।
भावार्थ —
सच्चा मित्र सुख का कारण होता है।
७. सुत्तनिपात
मेत्तञ्च सब्बलोकस्मिं मानसं भावये अपरिमाणं।
भावार्थ —
सम्पूर्ण संसार के प्रति अपरिमित मैत्रीभाव विकसित करो।
इन बौद्ध प्रमाणों में —
मेत्ता (मैत्री), अवेर (अवैर),
कल्याण-मित्र, सर्वभूत-करुणा
को धर्म का मूल माना गया है। यह भाव ऋग्वेद के —
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्”
— “हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सत्य और कल्याणकारी है”
के अत्यन्त निकट है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
 Judaism में ईश्वर की सच्ची मैत्री के प्रमाण--
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है — यह भाव यहूदी धर्मग्रन्थों में परमेश्वर को प्रेमी, रक्षक, सहायक और निकटतम मित्र के रूप में प्रकट करता है। नीचे  कुछ प्रमाण हिब्रू लिपि सहित दिए जा रहे हैं —
१. Tanakh — यशायाह (Isaiah) 41:8
אַבְרָהָם אֹהֲבִי
भावार्थ —
“अब्राहम मेरा मित्र (प्रिय) है।”
२. नीतिवचन (Proverbs) 17:17
בְּכָל־עֵת אֹהֵב הָרֵעַ
भावार्थ —
सच्चा मित्र हर समय प्रेम करता है।
३. भजन संहिता (Psalms) 73:28
וַאֲנִי קִרֲבַת אֱלֹהִים לִי־טוֹב
भावार्थ —
मेरे लिए परमेश्वर की निकटता ही सबसे उत्तम है।
४. व्यवस्थाविवरण (Deuteronomy) 31:6
כִּי יְהוָה אֱלֹהֶיךָ הוּא הַהֹלֵךְ עִמָּךְ
भावार्थ —
तुम्हारा परमेश्वर तुम्हारे साथ चलता है।
५. भजन संहिता 46:1
אֱלֹהִים לָנוּ מַחֲסֶה וָעֹז
भावार्थ —
परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है।
६. नीतिवचन 18:24
וְיֵשׁ אֹהֵב דָּבֵק מֵאָח
भावार्थ —
ऐसा मित्र भी होता है जो भाई से अधिक निकट होता है।
७. भजन संहिता 145:18
קָרוֹב יְהוָה לְכָל־קֹרְאָיו
भावार्थ —
जो उसे पुकारते हैं, परमेश्वर उनके निकट रहता है।
इन यहूदी धर्मग्रन्थ प्रमाणों में परमेश्वर को — प्रेमी मित्र,
सहायक,तनिकट रहने वाला,
रक्षक और शरणदाता
बताया गया है। यह भाव ऋग्वेद के —“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्”
— “हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है”से अत्यन्त साम्य रखता है। 


पारसी धर्म में प्रमाण --
Zoroastrianism में ईश्वर की 
सत्य मैत्री के प्रमाण
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है — पारसी धर्म में यह भाव अहुरा मज़्दा को सत्य, रक्षक, हितकारी और धर्ममित्र के रूप में व्यक्त करता है। नीचे अवेस्ता परम्परा से कुछ  प्रमाण अवेस्ताई/पहलवी परम्परा के पाठ-रूप सहित दिए जा रहे हैं —
१. Avesta — यस्ना 43.2
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬌 𐬯𐬙𐬀𐬭𐬆𐬨
उच्चारण — Mazdā Ahurā māi stārəm
भावार्थ —
अहुरा मज़्दा मेरे सहायक और रक्षक हैं।
२. यस्ना 46.2
𐬀𐬙̰ 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬯𐬎𐬵𐬭𐬌𐬨
उच्चारण — At ta Mazdā suhrim
भावार्थ —
हे मज़्दा! आप सच्चे सुहृद् हैं।
३. यस्ना 34.2
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬭𐬀𐬥𐬀𐬨
उच्चारण — Ahurā Mazdā ranām
भावार्थ —
अहुरा मज़्दा आनन्द और शान्ति देने वाले हैं।
४. यस्ना 50.1
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬑𐬱𐬀𐬚𐬭𐬀 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌
उच्चारण — Mazdā xshathrā paiti
भावार्थ —
मज़्दा दिव्य संरक्षण प्रदान करते हैं।
५. वेंदीदाद 20.2
𐬀𐬴𐬨𐬌 𐬙𐬀 𐬯𐬞𐬀𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎
उच्चारण — Ahmi ta spenta mainyu
भावार्थ —
पवित्र दिव्य आत्मा हमारा हितकारी साथी है।
६. यस्ना 36.5
𐬀𐬱𐬀 𐬎𐬱𐬙𐬀 𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌
उच्चारण — Asha ushta ahmai
भावार्थ —
सत्य और धर्म ही परम सुखद मित्र हैं।
७. यस्ना 45.5
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬯𐬀𐬑𐬀𐬨 𐬵𐬌
उच्चारण — Mazdā sakhām hi
भावार्थ —
मज़्दा सच्चे सहचर और मित्र हैं।
इन पारसी प्रमाणों में —
अहुरा मज़्दा को रक्षक, सुहृद्,
सहायक,  सत्यपथ प्रदर्शक
बताया गया है।
यह भाव ऋग्वेद के —
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्”
— “हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है”
के अत्यन्त निकट है।
 ताओ धर्म में प्रमाण --
Taoism में दिव्य मैत्री और करुणा के प्रमाण
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है — ताओ मत में यह भाव “दाओ” (道) को सर्वहितकारी, शांतिदायक, पालनकर्ता और सबका सहचर मानने के रूप में प्रकट होता है। नीचे कुछ प्रमाण चीनी लिपि सहित दिए जा रहे हैं —
१. Tao Te Ching अध्याय 8
上善若水。水善利萬物而不爭。
भावार्थ —
श्रेष्ठ सद्गुण जल के समान है, जो सबका हित करता है और संघर्ष नहीं करता।
२. ताओ ते चिंग, अध्याय 49
聖人無常心,以百姓心為心。
भावार्थ —
संत अपना अलग स्वार्थ नहीं रखता; वह सबके हृदय को अपना हृदय मानता है।
३. ताओ ते चिंग, अध्याय 67
我有三寶:一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。
भावार्थ —
मेरे तीन रत्न हैं — करुणा, सरलता और विनम्रता।
४. ताओ ते चिंग, अध्याय 81
聖人不積,既以為人己愈有。
भावार्थ —
संत दूसरों के हित में कार्य करता है और उसी में उसकी समृद्धि बढ़ती है।
५. Laozi
天道無親,常與善人。
भावार्थ —
स्वर्ग का मार्ग पक्षपात नहीं करता; वह सद्गुणी जनों के साथ रहता है।
६. Zhuangzi
泛愛萬物,天地一體。
भावार्थ —
सब प्राणियों से प्रेम करो; समस्त जगत एक ही सत्ता है।
७. च्वांग्त्से (莊子)
與人和者,謂之人樂。
भावार्थ —
जो सबके साथ सामंजस्य और मैत्री रखता है वही सच्चा आनन्द प्राप्त करता है।
इन ताओवादी प्रमाणों में —
करुणा, सर्वहित,विनम्रता,
सामंजस्य,और सर्वभूत-मित्रता
को सर्वोच्च धर्म कहा गया है। यह भाव ऋग्वेद के —
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्”
— “हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है”
से अत्यन्त साम्य रखता है।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण--
Confucianism में मैत्री, सद्भाव और मानवता के प्रमाण---
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है — कन्फ्यूसियस दर्शन में यह भाव “仁” (रेन — मानवता/करुणा), “友” (मित्रता), “和” (सामंजस्य) और “愛” (प्रेम) के रूप में प्रकट होता है। नीचे 7 प्रमाण चीनी लिपि सहित दिए जा रहे हैं —
१. Analects 1.1
有朋自遠方來,不亦樂乎。
भावार्थ —
जब दूर से मित्र आएँ तो क्या यह आनन्द की बात नहीं है?
२. एनालेक्ट्स 1.4
與朋友交,言而有信。
भावार्थ —
मित्रों के साथ व्यवहार में सत्य और विश्वास होना चाहिए।
३. एनालेक्ट्स 12.22
樊遲問仁。子曰:愛人。
भावार्थ —
जब रेन (मानवता) के विषय में पूछा गया तो कन्फ्यूसियस ने कहा — “मनुष्यों से प्रेम करो।”
४. एनालेक्ट्स 4.25
德不孤,必有鄰。
भावार्थ —
सद्गुण कभी अकेला नहीं रहता; उसके पास मित्र अवश्य आते हैं।
५. एनालेक्ट्स 12.23
君子以文會友,以友輔仁。
भावार्थ —
श्रेष्ठ पुरुष मित्रता के द्वारा सद्गुण और मानवता को बढ़ाता है।
६. Confucius
四海之內,皆兄弟也。
भावार्थ —
चारों समुद्रों के भीतर रहने वाले सब लोग भाई समान हैं।
७. Doctrine of the Mean
和也者,天下之達道也。
भावार्थ —
सामंजस्य और मेल ही संसार का सर्वोच्च मार्ग है।
इन कन्फ्यूसियसी प्रमाणों में —
मित्रता (友), मानवता (仁),
प्रेम (愛), विश्वास (信), और सामंजस्य (和) को धर्म और सदाचार का मूल माना गया है। यह भाव ऋग्वेद के —
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्”
— “हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है”
से अत्यन्त साम्य रखता है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
Shinto में दिव्य मैत्री, सामंजस्य और करुणा के प्रमाण
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है — शिन्तो परम्परा में यह भाव “कामी” (神) के साथ सामंजस्य, शुद्ध हृदय, पारस्परिक सद्भाव और प्रकृति-मित्रता के रूप में प्रकट होता है। नीचे 7 प्रमाण जापानी लिपि सहित दिए जा रहे हैं —
१. Kojiki
神と人とは共に生く。
भावार्थ —
कामी (देवत्व) और मनुष्य साथ-साथ जीवन जीते हैं।
२. Nihon Shoki
天地の心は慈しみなり。
भावार्थ —
स्वर्ग और पृथ्वी का हृदय करुणा है।
३. शिन्तो उपदेश
和をもって貴しとなす。
भावार्थ —
सामंजस्य और मेल-मिलाप को सर्वोच्च मानो।
४. Norito
大神の恵みによりて人は安らぐ。
भावार्थ —
महान देवता की कृपा से मनुष्य शान्ति प्राप्त करता है।
५. शिन्तो परम्परा
神は清き心に宿る。
भावार्थ —
देवत्व शुद्ध हृदय में निवास करता है।
६. कोजिकि
人々互いに助け合うべし。
भावार्थ —
मनुष्यों को परस्पर सहायता और मैत्री से रहना चाहिए।
७. जापानी शिन्तो वचन
神の道は真心と友情にあり。
भावार्थ —
कामी का मार्ग सत्य हृदय और मित्रता में स्थित है।
इन शिन्तो प्रमाणों में —
सामंजस्य (和), करुणा, शुद्ध हृदय, परस्पर सहयोग, और देवत्व की निकटता को धर्म का मूल माना गया है। यह भाव ऋग्वेद के —
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्”
— “हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है”
से अत्यन्त साम्य रखता है।  
यूनानी दर्शन में ‌प्रमाण-- 
Ancient Greek Philosophy में सच्ची मैत्री और दिव्य सहचर्य के प्रमाण
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्” — हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है — यूनानी दर्शन में यह भाव “फिलिया” (φιλία — मैत्री), “अगापे” (ἀγάπη — दिव्य प्रेम), सद्गुण और आत्मीय सहचर्य के रूप में मिलता है। नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण दिए जा रहे हैं —
१. Socrates
Φιλία μία ψυχὴ ἐν δυσὶ σώμασιν.
उच्चारण — Philia mia psychē en dysi sōmasin.
भावार्थ —
मित्रता दो शरीरों में निवास करने वाली एक आत्मा है।
२. Aristotle — Nicomachean Ethics
Ὁ φίλος ἄλλος αὐτός.
उच्चारण — Ho philos allos autos.
भावार्थ —
मित्र दूसरा स्वयं होता है।
३. अरस्तू
Ἄνευ φίλων οὐδεὶς ἂν ἕλοιτο ζῆν.
उच्चारण — Aneu philōn oudeis an heloito zēn.
भावार्थ —
मित्रों के बिना कोई भी जीवन नहीं चुनना चाहेगा।
४. Plato — Lysis
Ἡ φιλία τὸ μέγιστον ἀγαθόν ἐστιν.
उच्चारण — Hē philia to megiston agathon estin.
भावार्थ —
मैत्री महानतम कल्याण है।
५. प्लेटो
Ὁμοιότης φιλίας αἰτία.
उच्चारण — Homoiotēs philias aitia.
भावार्थ —
समानता और सद्गुण ही मित्रता का कारण हैं।
६. Epictetus
Πιστὸς φίλος ἰσχυρὸν καταφύγιον.
उच्चारण — Pistos philos ischyron kataphygion.
भावार्थ —
विश्वासयोग्य मित्र एक शक्तिशाली आश्रय है।
७. Pythagoras
Κοινὰ τὰ τῶν φίλων.
उच्चारण — Koina ta tōn philōn.
भावार्थ —
मित्रों की वस्तुएँ और हृदय परस्पर साझा होते हैं।
इन यूनानी दार्शनिक प्रमाणों में —
फिलिया (मैत्री), सद्गुण, विश्वास,
आत्मिक एकता,और सहचर्य
को जीवन का सर्वोच्च मूल्य माना गया है। यह भाव ऋग्वेद के —
“तवेद्धि सख्यं स्तृतम्”
— “हे प्रभो! आपकी ही मैत्री सच्ची है”
से अत्यन्त साम्य रखता है।
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