ऋगुवेद सूक्ति--(१४) की व्याख्या
ऋगुवेद सूक्ति-- (१४) की व्याख्या ऋग्वेद के मंत्र “यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति""… (१.१६४.३९)
भावार्थ --
ब्रह्म-तत्त्व को जाने बिना वेद-मंत्रों का पाठ व्यर्थ है।
इसी आशय के प्रमाण गीता और उपनिषदों में भी मिलते हैं—
भगवत् गीता से प्रमाण_
(क) २.४२–४६
भगवान कहते हैं कि जो लोग केवल वेदों के कर्मकाण्ड में आसक्त हैं, वे उच्चतम तत्त्व को नहीं समझ पाते।
“त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन"
(ख) (२.४५)
भावार्थ र्थ: वेदों में त्रिगुणात्मक विषय हैं; हे अर्जुन! तू उनसे ऊपर उठ।
(ग)“यावानर्थ उदपाने…” (२.४६)
भावार्थ --
जैसे बड़े जलाशय मिलने पर छोटे कुएँ का प्रयोजन नहीं रहता, वैसे ही ब्रह्मज्ञानी के लिए वेदों का कर्मकाण्ड गौण हो जाता है।
(घ) १५.१५
“वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः…”
भावार्थ: समस्त वेदों द्वारा मैं (परमात्मा) ही जानने योग्य हूँ।
स्पष्ट है कि वेदों का लक्ष्य परमात्मा-ज्ञान है, केवल पाठ नहीं।
उपनिषदों से प्रमाण--
(१) मुण्डक उपनिषद --
(१.१.४–५)
“द्वे विद्ये वेदितव्ये… परा चापरा च।”
अपरा विद्या = ऋग्वेद आदि शास्त्रों का अध्ययन।
परा विद्या = वह जिससे अक्षर, ब्रह्म का ज्ञान हो।
केवल शास्त्र-अध्ययन (अपरा विद्या) अंतिम नहीं; ब्रह्मज्ञान (परा विद्या) श्रेष्ठ है।
(२) कठ उपनिषद--
(१.२.२३)
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो…”
अर्थ: यह आत्मा केवल प्रवचन, बुद्धि या बहुत श्रवण से नहीं मिलता; जिसे वह स्वयं चुनता है, उसी को प्राप्त होता है।
केवल वाक्चातुर्य या शास्त्र-पाठ पर्याप्त नहीं, अनुभव आवश्यक है।
(३) बृहदारण्यक उपनिषद्--
(२.४.५)
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।”
भावार्थ --: आत्मा को देखना (अनुभव करना), सुनना, मनन और ध्यान करना चाहिए।
लक्ष्य है आत्मसाक्षात्कार, न कि केवल शब्द-ज्ञान।
निष्कर्ष--
ऋग्वेद का मंत्र, गीता और उपनिषद—सभी एक ही सत्य की ओर संकेत करते हैं:
शास्त्रों का उद्देश्य तत्त्व-ज्ञान है।
यदि ब्रह्म को न जाना जाए, तो केवल मंत्र-पाठ अधूरा है।
पुराणों से प्रमाण:
(१) विष्णु पुराण --
“तत्कर्म यन्न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये।” (१.१९.४१)
भावार्थ: वही कर्म श्रेष्ठ है जो बन्धन न बढ़ाए, और वही विद्या सच्ची है जो मुक्ति दे।
केवल कर्मकाण्ड या शास्त्र-ज्ञान नहीं, बल्कि मुक्ति देने वाला तत्त्व-बोध लक्ष्य है।
(२) शिव पुराण --
शिवपुराण में बार-बार कहा गया है कि
“ज्ञानविहीनं कर्म निष्फलम्।”
अर्थ: ज्ञान के बिना कर्म फलदायी नहीं।
केवल विधि-विधान नहीं, बल्कि शिव-तत्त्व की अनुभूति आवश्यक है।
(३) नारद पुराण --
“वेदशास्त्रपुराणानि सर्वाण्येव न संशयः।
हरिं विना न मुक्तिः स्यात्…”
भावार्थ: वेद-शास्त्र-पुराण सब पढ़ लेने पर भी यदि भगवान की प्राप्ति न हो, तो मुक्ति नहीं।
लक्ष्य है-- ईश्वर-साक्षात्कार, न कि केवल ग्रन्थ-अध्ययन।
(४) पद्म पुराण --
“श्रुतिस्मृतिपुराणादि-पाञ्चरात्रविधिं विना।
भक्तिर्नैव हि सिद्ध्येत…”
भावार्थ --
यहाँ संकेत है कि विधि का उद्देश्य भक्ति और तत्त्व-ज्ञान है; केवल शाब्दिक अभ्यास पर्याप्त नहीं।
पुराण भी यही कहते हैं कि
कर्म और पाठ साधन हैं,
परमात्म-ज्ञान और भक्ति साध्य (लक्ष्य) हैं।
अतः वेद-मंत्रों का सार तभी पूर्ण होता है जब वह ब्रह्म-साक्षात्कार तक ले जाए।
मूल मन्त्र है--
ऋग्वेद १/१६४/३९
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति ।
य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ॥
शब्दार्थ--
यः — जो
तत् न वेद — उस (परम तत्त्व) को नहीं जानता
किम् ऋचा करिष्यति — वह ऋचाओं (वेद-मन्त्रों) से क्या करेगा?
यः इत्तत् विदुः — जो उस तत्त्व को जानते हैं
ते इमे समासते — वे उसी में स्थित हो जाते हैं
भावार्थ-+
जो परम तत्त्व (ब्रह्म/ईश्वर) को नहीं जानता, उसके लिए केवल मन्त्रपाठ निष्फल है; और जो उसे जान लेते हैं, वे उसी में स्थित हो जाते हैं।
(१) मार्कण्डेय (शिव पुराण)--
मार्कण्डेय ने केवल मन्त्र-पाठ नहीं किया, बल्कि पूर्ण समर्पण से भगवान शिव का आश्रय लिया।
उनकी प्रार्थना (महामृत्युंजय मन्त्र — ऋग्वेद ७/५९/१२) —
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
यहाँ केवल जप नहीं, बल्कि मृत्यु से मुक्ति की तत्त्वनिष्ठ याचना है।
फलस्वरूप शिव साक्षात् प्रकट हुए।
(२) ध्रुव(भागवत पुराण) ४/९/६)
योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां
संजीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना॥
ध्रुव ने पहले तप किया, फिर जब भगवान प्रकट हुए तो उन्हें तत्त्वतः पहचाना।
उनका लक्ष्य केवल राज्य नहीं, बल्कि परम पद बन गया।
(३) प्रह्लाद (भागवत पुराण) ७/५/२४
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्।
यहाँ भक्ति के अंग बताए गए हैं, परन्तु उनका लक्ष्य — भगवत्-तत्त्व का बोध।
निष्कर्ष--
“यस्तन्न वेद…” मन्त्र का लिङ्ग = परम तत्त्व का ज्ञान ही वेद का सार है।
केवल मन्त्र-पाठ (ऋचा) पर्याप्त नहीं।
मार्कण्डेय, ध्रुव, प्रह्लाद — सभी ने तत्त्वबोधयुक्त भक्ति से सिद्धि पाई।
(१) भर्तृहरि नीतिशतक
(क) विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनम्।
विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः॥
भावार्थ:
विद्या ही मनुष्य का श्रेष्ठ रूप और गुप्त धन है; वही यश और सुख देने वाली है।
संकेत: बाह्य आडम्बर नहीं, ज्ञान ही सार है।
(ख) येषां न विद्या न तपो न दानं
ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूता
मनुष्यरूपेण मृगाः चरन्ति॥
केवल मानव-रूप पर्याप्त नहीं; ज्ञान और धर्म ही मूल्यवान हैं।
(२) चाणक्य नीति--
(क) पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु यद्धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्॥
भावार्थ:
जो विद्या केवल पुस्तकों में है (अनुभव में नहीं), वह कार्यकाल में सहायक नहीं।
केवल पाठ नहीं, प्रत्यक्ष ज्ञान आवश्यक — यही “किमृचा करिष्यति” का भाव।
(ख) न चोरहार्यं न च राजहार्यं
न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
स्थायी धन ज्ञान है, बाह्य साधन नहीं।
(३) योगवासिष्ठ--
ज्ञानमेव मोक्षस्य कारणम्।
केवल कर्म नहीं, ज्ञान ही मुक्ति का कारण है।
निष्कर्ष+-
भर्तृहरि — विद्या (आत्मबोध) को ही वास्तविक धन बताते हैं।
चाणक्य — अनुप्रयुक्त (जीवित) ज्ञान को ही सार मानते हैं।
योगवासिष्ठ — ज्ञान को मोक्ष का कारण बताते हैं।
अतः ऋग्वेद का कथन —
“यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति”
का निष्कर्ष यह है कि तत्त्वज्ञान के बिना वेदपाठ भी निष्फल है; ज्ञान-सहित कर्म ही सार्थक है।
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