ऋगुवेद सूक्ति--(१३) की‌ व्याख्या-

ऋगुवेद सूक्ति-- (१३) की व्याख्या 
अधाम इन्द्र श्रणवो हवेमा — ऋग्वेद ७/२९/३
पदच्छेद--
अधाम । इन्द्र । श्रणवः । हवेमा ॥
शब्दार्थ
अधाम — हम नीचे (विनीत भाव से), या संकटग्रस्त अवस्था में
इन्द्र — परम शक्तिमान, ऐश्वर्ययुक्त प्रभु
श्रणवः — सुनें, श्रवण करें
हवेमा — हम आह्वान करें, पुकारें
भावार्थ--
हे इन्द्र! हम विनम्र भाव से आपका आह्वान करते हैं; आप हमारी पुकार सुनें।
कारुणिक भाव--
यह मंत्र उपासक की विनयपूर्ण प्रार्थना को व्यक्त करता है। जब साधक स्वयं को असहाय, दुर्बल या संकटग्रस्त अनुभव करता है, तब वह परम शक्तिशाली ईश्वर को पुकारता है। यहाँ “अधाम” से दीनता और समर्पण का भाव प्रकट होता है।
यहाँ इन्द्र शब्द परमात्मा के लिए प्रयोग किया गया है। अर्थात् जब मनुष्य नम्र होकर ईश्वर का स्मरण करता है, तब उसकी प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है।
ऋग्वैदिक भाव — “हे प्रभो! हमारी पुकार सुनो” — के समर्थन में उपनिषदों में भी अनेक स्थानों पर ईश्वर की शरणागति और प्रार्थना का आश्वासन मिलता है। उदाहरणार्थ —
१. कठोपनिषद (१/२/२३)
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो…
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः।
भावार्थ: यह आत्मा केवल वाक्चातुर्य या बुद्धि से नहीं मिलता; जिस पर वह (परमात्मा) कृपा करता है, उसी को प्राप्त होता है।
२. श्वेताश्वतरोपनिषद (६/१८)
यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं…
तं ह देवं आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये।
भावार्थ: जो ब्रह्मा आदि का भी नियंता है, उस आत्मप्रकाशक देव की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।
 यह स्पष्ट शरणागति है ।
३. मुण्डकोपनिषद (३/२/३)
भिद्यते हृदयग्रन्थिः…
तस्मिन् दृष्टे परावरे।
भावार्थ: जब परमात्मा का साक्षात्कार होता है, तब बंधन कट जाते हैं।
अर्थात् ईश्वर की ओर किया गया आह्वान अंततः मुक्ति का कारण बनता है।
४. तैत्तिरीयोपनिषद (शिक्षावल्ली १/११)
सत्यं वद, धर्मं चर…
आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः।
यहाँ प्रत्यक्ष प्रार्थना न होकर भी उपदेश है कि धर्माचरण द्वारा ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।
धर्ममय जीवन ही ईश्वर की सुनवाई का मार्ग है।
सारांश--
ऋग्वेद का “अधाम इन्द्र श्रणवो हवेमा” विनम्र पुकार है।
 भगवद्गीता से प्रमाण
१. (९/२२)
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां… योगक्षेमं वहाम्यहम्।
भावार्थ --
जो अनन्य भाव से मुझे स्मरण करते हैं, उनके योग-क्षेम का वहन मैं स्वयं करता हूँ।
भाव: भक्त की पुकार ईश्वर सुनते हैं और उसकी रक्षा करते हैं।
भगवत् गीता_ 
२. (१८/६६)
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
भावार्थ --
 मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा।
भाव: शरणागत की प्रार्थना निष्फल नहीं जाती।
भगवत् गीता-
३. (७/१६)
चतुर्विधा भजन्ते मां… आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च।
भावार्थ _
संकटग्रस्त (आर्त) भी मुझे पुकारता है।
भाव: दुःख में की गई पुकार भी भगवान स्वीकार करते हैं।
 महाभारत से प्रमाण
१. भीष्मपर्व (गीता का ही संदर्भ)
अर्जुन के विषाद में श्रीकृष्ण का उपदेश —
“क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ…” (२/३)
भावार्थ --
 जब शिष्य शरणागत होता है, तब ईश्वर मार्गदर्शन देते हैं।
३. शान्तिपर्व
“न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।”
भावार्थ --
 जो शुभ मार्ग पर चलता है, उसकी दुर्गति नहीं होती।
भाव: धर्मनिष्ठ की रक्षा ईश्वर करते हैं। 
निष्कर्ष--
ऋग्वेद का भाव — “हे प्रभो! हमारी पुकार सुनो” —
गीता में शरणागति और योगक्षेम,
महाभारत में संकट में स्मरण और दिव्य सहायता के रूप में प्रतिपादित है।
ऋग्वैदिक भाव — “हे प्रभो! हमारी पुकार सुनो” — के समर्थन में पुराणों में ध्रुव और मार्कण्डेय आदि की हृदयविदारक पुकार अत्यन्त प्रसिद्ध है।
ध्रुव की पुकार--
(भागवत पुराण, चतुर्थ स्कन्ध)
जब बालक ध्रुव वन में तप कर रहे थे, तब भगवान के प्रकट होने पर उन्होंने स्तुति की —
योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमां प्रसुप्तां
संजीवयत्यखिलशक्तिधरः स्वधाम्ना।
अन्यांश्च हस्तचरणश्रवणत्वगादीन्
प्राणान् नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम्॥
(भागवत ४.९.६)
भावार्थ:
हे प्रभो! आप ही मेरे भीतर प्रवेश करके मेरी सुप्त वाणी और समस्त इन्द्रियों को चेतना देते हैं। मैं उस पुरुषोत्तम भगवान को नमस्कार करता हूँ।
 ध्रुव की तपःपूर्ण पुकार सुनकर भगवान प्रकट हुए — यह शरणागतवत्सलता का प्रमाण है।
 मार्कण्डेय की पुकार--
(शिव पुराण तथा महाभारत में कथा)
जब यमराज ने सोलह वर्ष की आयु पूर्ण होने पर मार्कण्डेय को बाँधना चाहा, तब बालक ने शिवलिङ्ग का आश्रय लेकर प्रार्थना की। परम्परा में प्रचलित उनका स्तोत्र —
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
 ऋग्वेद ७/५९/१२)
भावार्थ:
हम तीन नेत्रों वाले भगवान की उपासना करते हैं; वे हमें मृत्यु के बन्धन से मुक्त करें।
 उनकी पुकार से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें अमरत्व प्रदान किया।
सारांश--
ध्रुव — विष्णु की अनन्य भक्ति से भगवान साक्षात् प्रकट हुए।
मार्कण्डेय — मृत्यु के भय में की गई शिव-शरणागति से अमरत्व प्राप्त हुआ।
गजेन्द्र की पुकार--
(भागवत पुराण, अष्टम स्कन्ध — गजेन्द्रमोक्ष)
जब गजेन्द्र को ग्राह (मगर) ने पकड़ लिया और वह असहाय हो गया, तब उसने भगवान को पुकारा —
नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुणधर्मिणे।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥
(भागवत ८.३)
और अत्यन्त प्रसिद्ध शरणागति श्लोक —
नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते॥
भावार्थ:
हे नारायण! आप समस्त जगत् के गुरु हैं; मैं आपको नमस्कार करता हूँ।
गजेन्द्र की निष्कपट पुकार सुनकर भगवान विष्णु गरुड़ पर आरूढ़ होकर तुरंत आए और उसे मुक्त किया।
 प्रह्लाद की पुकार--
(भागवत पुराण, सप्तम स्कन्ध)
हिरण्यकशिपु के अत्याचारों के बीच भी प्रह्लाद निरन्तर भगवान का स्मरण करते रहे —
नैवोद्विजे पर दुरत्यय-वैतरण्याः
त्वद्वीर्य-गायन-महामृत-मग्न-चित्तः॥
(भागवत ७.९.४३)
भावार्थ:
हे प्रभो! आपकी महिमा का गान करते हुए मेरा चित्त अमृत में डूबा है; मुझे संसारसागर से भय नहीं।
और उनकी स्तुति में —
ब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धाः
सत्त्वैकतानमतयो वचसां प्रवाहैः।
नाराधितुं पुरुगुणैरधुनापि पिप्रुः
किं तोष्टुमर्हति स मे हरिरुग्रजातिः॥
(७.९.८)
 प्रह्लाद की पुकार पर भगवान नृसिंह खम्भे से प्रकट हुए और भक्त की रक्षा की।
 निष्कर्ष--
गजेन्द्र — संकट में आर्त पुकार।
प्रह्लाद — अत्याचार के बीच अटल स्मरण।
दोनों घटनाएँ सिद्ध करती हैं कि निष्कपट शरणागति और आर्त प्रार्थना अवश्य सुनी जाती है — यही “श्रणवो हवेमा” का साक्षात् पुराण-प्रमाण है।
 द्रौपदी की पुकार--
(महाभारत, सभापर्व)
जब दुर्योधन की सभा में द्रौपदी असहाय हुई, तब उसने पूर्ण शरणागति से पुकारा —
“हे गोविन्द! हे केशव! हे द्वारकावासिन् कृष्ण!”
पूरा श्लोक-- 
गोविन्द द्वारकावासिन् कृष्ण गोपीजनप्रिय।
कौरवैः परिभूतां मां किं न जानासि केशव॥
भावार्थ:
हे गोविन्द! कौरवों द्वारा अपमानित मुझे क्या आप नहीं जानते?
 उसकी पुकार पर भगवान ने अनन्त चीर प्रदान कर उसकी रक्षा की।
अजामिल की पुकार--
(भागवत पुराण, षष्ठ स्कन्ध)
मृत्युशय्या पर अजामिल ने अपने पुत्र का नाम लेकर पुकारा —
नारायण इति व्याजहार विवशो नामोच्चारणमात्रतः।
(भाव — भागवत ६.२)
और शास्त्र में कहा —
एतावान् संख्ययोगाभ्यां स्वधर्मपरिनिष्ठया।
जन्मलाभः परः पुंसामन्ते नारायणस्मृतिः॥
(६.२.१२)
भावार्थ:
मनुष्य-जीवन की सर्वोच्च सिद्धि अन्त समय में “नारायण” का स्मरण है।
 नाम-स्मरण से ही विष्णुदूत आकर उसे यमदूतों से बचाते हैं।
 शबरी की पुकार--
(रामायण, अरण्यकाण्ड)
शबरी वर्षों तक प्रभु की प्रतीक्षा करती रहीं। उनका भाव —
आगमिष्यति मे रामो दाशरथिः प्रियदर्शनः।
जब भगवान श्रीराम उनके आश्रम आए, तब उन्होंने प्रेमपूर्वक कहा--
भक्तिर्भवति नैष्ठिकी।
 निष्कपट भक्ति और प्रतीक्षा की पुकार पर स्वयं भगवान श्रीराम पधारे।
 निष्कर्ष--
द्रौपदी — पूर्ण समर्पण की आर्त पुकार।
अजामिल — अन्तकाल का नाम-स्मरण।
शबरी — दीर्घ प्रतीक्षा और निष्कलुष भक्ति।
तीनों उदाहरण सिद्ध करते हैं कि सच्चे हृदय से की गई पुकार अवश्य सुनी जाती है — यही “श्रणवो हवेमा” का शास्त्रीय प्रत्यक्ष प्रमाण है।
 हितोपदेश--
आपदि स्मरणं विष्णोः सम्पदि स्मरणं हरिः।
यत्र यत्र स्मरेन्नित्यं तत्र तत्र सहायता॥  (प्रचलित पाठ)
भावार्थ:
संकट में विष्णु का स्मरण और समृद्धि में भी हरि का स्मरण—जहाँ-जहाँ स्मरण होता है, वहाँ-वहाँ सहायता मिलती है।
 निष्कर्ष: आर्त पुकार व्यर्थ नहीं जाती।
चाणक्य नीति--
आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद् धनैरपि।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि॥
भावार्थ:
आपत्ति के लिए धन बचाओ; धन से परिवार की रक्षा करो; परन्तु आत्मा (धर्म) की रक्षा सर्वोपरी है।
 संकेत: अंतिम आश्रय धर्म और परमसत्ता ही है—वहीं सच्ची सुरक्षा है।
एक अन्य नीति-वाक्य (प्रचलित) 
धर्मो रक्षति रक्षितः।
जो धर्म की शरण लेता है, उसकी रक्षा होती है।
 भर्तृहरि नीतिशतक-
दैवेनोद्धृतबुद्धयः परिभवन्त्येव साधवः।
दैवाधीनं जगत्सर्वं तस्माद् दैवं परं बलम्॥ (भावानुसार उद्धरण)
भावार्थ:
यह संसार दैवाधीन है; इसलिए दैव (ईश्वर) ही परम बल है।
 संकट में परम बल की ओर ही मनुष्य की पुकार जाती है।
और —
सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं…
निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वं…
 सत्संग और ईश्वराभिमुखता से ही बन्धन कटते हैं।
निष्कर्ष--
हितोपदेश — संकट में ईश्वर-स्मरण को सहायक बताता है।
चाणक्य — धर्म को परम आश्रय मानते हैं।
भर्तृहरि — दैव को परम बल स्वीकार करते हैं।
इस प्रकार आर्ष नीतिग्रन्थ भी यही प्रतिपादित करते हैं कि जब मनुष्य विनयपूर्वक उच्च शक्ति/धर्म की ओर उन्मुख होकर पुकारता है, तब वही उसका वास्तविक संरक्षण करती है — यही “श्रणवो हवेमा” का नीतिशास्त्रीय समर्थन है।
 मनुस्मृति--
(८/१५)
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥
भावार्थ:
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है; धर्म की रक्षा करने पर वही हमारी रक्षा करता है।
 संकेत: जो धर्म (ईश्वर-मार्ग) की शरण लेता है, उसकी रक्षा अवश्य होती है।
(४/१३८ – भावानुसार)
सततं धर्ममाश्रित्य शुचिः स्यात् प्रयतः नरः। 
भावार्थ --
मनुष्य को निरन्तर धर्म का आश्रय लेना चाहिए — यही स्थायी सुरक्षा है।
 योगवासिष्ठ-
(उपशमप्रकरण)
ईश्वरप्रणिधानाद्वा चित्तस्यैकाग्रता भवेत्।
भावार्थ:
ईश्वर-प्रणिधान (समर्पण) से चित्त की एकाग्रता और शान्ति प्राप्त होती है।
 संकट में ईश्वर-स्मरण ही स्थिरता देता है।
एक प्रसिद्ध उक्ति (भावानुसार)
यदा यदा मनो दुःखैः पीड्यते मानवस्य हि।
तदा तदा हरिं स्मृत्वा शान्तिमाप्नोति मानवः॥
 जब-जब मनुष्य दुःखी होता है, तब-तब ईश्वर-स्मरण से शान्ति पाता है।
 निष्कर्ष--
मनुस्मृति — धर्म-आश्रय को सुरक्षा का आधार बताती है।
योगवासिष्ठ — ईश्वर-प्रणिधान को चित्त-शान्ति और मुक्ति का मार्ग बताता है।
अर्थात् आर्ष परम्परा का समग्र मत यही है कि
विनयपूर्वक की गई पुकार, धर्माश्रय और ईश्वर-समर्पण व्यर्थ नहीं जाते।
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