ऋगुवेद सूक्ति--(१२) की व्याख्या --
ऋगुवेद सूक्ति-(१२) की व्याख्या-
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
ऋगुवेद --८/९२/३२
भावार्थ --
प्रभु ! तू हमारा है हम तेरे हैं।
यह आत्मसमर्पण, आश्रय और दिव्य–संबंध का उद्घोष है।
अब इसी भाव को अन्य उपनिषदों से प्रमाणित करते हैं —
१. श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.७)
“तम् ईश्वराणां परम् महेश्वरम्…”
भावार्थ --
वही परमेश्वर सबका स्वामी है।
जब वह हमारा परम स्वामी है, तो स्वाभाविक है — हम उसके हैं।
२. श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.२३)
“यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ…”
भावार्थ --
जिसको ईश्वर में पराभक्ति है, उसी के लिए सत्य प्रकट होता है।
यहाँ स्पष्ट है — भक्त और ईश्वर का आत्मीय संबंध।
३. कठोपनिषद् (२.२.१२)
“एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा…”
भावार्थ --
एक परमात्मा सब प्राणियों के भीतर स्थित है।
वह सबके भीतर है — इसलिए वह हमारा है; और हम उसी में स्थित हैं।
४. मुण्डकोपनिषद् (३.१.३)
“यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं… ईशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्।”
भावार्थ --
जब साधक उस ईश्वर को देखता है, तब पाप और बंधन से मुक्त होता है।
आश्रय का भाव — वही हमारा रक्षक है।
५. बृहदारण्यक उपनिषद् (१.४.१०)
“अहं ब्रह्मास्मि।"
भावार्थ --
मैं ब्रह्म हूँ।
अद्वैत दृष्टि में — अलगाव नहीं; वही परमात्मा मेरा स्वरूप है।
६. तैत्तिरीयोपनिषद् (२.१)
भावार्थ --
“सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।”
वही अनन्त ब्रह्म हमारा आधार है।
जो अनन्त है वही हमारा आश्रय है।
७. छान्दोग्य उपनिषद् (६.८.७)
“तत्त्वमसि ।"
भावार्थ --
तू वही है।
यहाँ संबंध की पराकाष्ठा है — जीव और ब्रह्म का अभिन्न सम्बन्ध।
समन्वित भाव--
ऋग्वेद का “त्वमस्माकं तव स्मसि”
उपनिषदों में तीन प्रकार से प्रकट होता है —
१-आश्रय भाव — हम उसके शरणागत हैं।
२-अन्तर्यामी भाव — वह हमारे भीतर है।
३-अद्वैत भाव — वही हमारा वास्तविक स्वरूप है।
प्रस्तुत ऋग्वेद मन्त्र “त्वमस्माकं तवस्मसि” (८/९२/३२) का भाव है —
“हे प्रभो! आप हमारे हैं और हम आपके हैं।”
यह परस्पर आत्मीयता, शरणागति और दिव्य-सम्बन्ध का उद्घोष है।
अब इसी भाव को अन्य पुराणों से प्रमाणित करते हैं —
१. विष्णु पुराण (३.७.१४)
“वासुदेवः परं ब्रह्म… सर्वभूताधिवासः।”
भावार्थ --
वासुदेव ही परम ब्रह्म हैं, जो सब प्राणियों में निवास करते हैं।
जब वे सबके अन्तर्यामी हैं, तब हम उन्हीं के हैं और वे हमारे आश्रय हैं।
२. पद्म पुराण
“नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद॥”
भावार्थ --
मैं न तो वैकुण्ठ में, न केवल योगियों के हृदय में, जहाँ मेरे भक्त प्रेम से गाते हैं, वहीं मैं रहता हूँ।
यहाँ स्पष्ट है — भगवान भक्त के हैं।
३. नारद पुराण
“भक्तो हि भगवान् प्रियः”
भावार्थ --
भक्त भगवान को प्रिय है।
प्रेम का द्विपक्षीय सम्बन्ध — भक्त भगवान का, और भगवान भक्त के।
४. शिव पुराण
“अहं भक्तपराधीनो "
यह भाव भागवत में भी मिलता है
— मैं भक्त के अधीन हूँ।
👉 यहाँ ‘तव स्मसि’ का चरम रूप है — भगवान स्वयं कहते हैं, मैं तुम्हारा हूँ।
५. स्कन्द पुराण
“ये भजन्ति महादेवं न तेषां विद्यते भयम्।”
भावार्थ --
जो महादेव का भजन करते हैं, उन्हें कोई भय नहीं।
जब हम उनके हैं, तो वे हमारे रक्षक हैं।
६. देवी भागवत पुराण
“त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च च सखा त्वमेव" (प्रार्थना भाव)
भावार्थ --
आप ही माता, पिता, बन्धु, सखा हैं।
यह पूर्ण समर्पण और अपनत्व की वाणी है।
समन्वित निष्कर्ष
पुराणों में यह भाव तीन रूपों में मिलता है —
शरणागति — “हम आपके हैं।”
अन्तरंगता — “भगवान भक्त के समीप रहते हैं।”
परस्पर प्रेम — “भगवान भक्त के वश में हो जाते हैं।”
अतः ऋग्वेद का यह सूक्ष्म वाक्य पुराणों में विकसित होकर भक्ति का महान सिद्धान्त बन जाता है।
भगवद्गीता, महाभारत, हितोपदेश, भर्तृहरि, चाणक्य आदि आर्ष ग्रन्थों से प्रमाण--
(१) भगवद्गीता ९.२२
“अनन्याश्चिन्तयन्तो मां… योगक्षेमं वहाम्यहम्।”
भावार्थ--
जो भक्त केवल मेरा चिंतन करते हैं, उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ।
यहाँ भगवान स्वयं कहते हैं — मैं तुम्हारा भार उठाता हूँ।
(२) भगवद्गीता ९.२९
“समोऽहं सर्वभूतेषु… ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।”
भावार्थ--
जो मुझे भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।
यह “त्वमस्माकं तव स्मसि” का सीधा प्रतिरूप है।
(३) गीता १२.६–७
“तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्।”
भावार्थ,--
मैं अपने भक्तों को संसार-सागर से पार उतारता हूँ।
हम उसके हैं — वह हमारा उद्धारक है।
२. हितोपदेश से प्रमाण
“आपदर्थे धनं रक्षेद्… आत्मानं सततं रक्षेत्।"
भावार्थ --
संकट में सच्चा मित्र ही सहायक होता है।
परम मित्र के रूप में ईश्वर का आश्रय — वही सच्चा “सखा” है।
३. भर्तृहरि (नीतिशतक) से
“सन्तः स्वयंपरहिते विहिताभियोगाः।”
भावार्थ --
सज्जन सदा दूसरों के हित में लगे रहते हैं।
परम सज्जन और परम हितकारी — ईश्वर।
भक्त कहता है — आप हमारे हितकारी हैं; हम आपके समर्पित हैं।
४. चाणक्य नीति से
“सुखे मित्राः बहवो भवन्ति, दुःखे तु ज्ञायते मित्रम्।”
भावार्थ --
सुख में अनेक मित्र मिलते हैं; दुःख में सच्चा मित्र पहचाना जाता है।
दुःख में जो कभी न छोड़े — वही परमात्मा।
इसलिए भक्त का उद्घोष — त्वमस्माकं।
५. रामायण (आर्ष परंपरा)
“सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥”
भावार्थ --
जो एक बार भी कह दे “मैं आपका हूँ”, उसे मैं अभय देता हूँ।
यहाँ “तवास्मि” (मैं आपका हूँ) और भगवान का उत्तर — “अभयं ददामि”।
यह ऋग्वैदिक मन्त्र का पूर्ण विकसित भक्ति-सिद्धान्त है।
निष्कर्ष--
आर्ष ग्रन्थों में यह भाव तीन स्तरों पर मिलता है —
१-सखा-भाव (मित्रता)
२-शरणागति-भाव (पूर्ण समर्पण)
३-अन्तर्यामी-भाव (भगवान हमारे भीतर)
अतः “त्वमस्माकं तव स्मसि” केवल वाक्य नहीं —
यह सनातन धर्म की भक्ति-परम्परा का मूल सूत्र है।
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