ऋगुवेद सूक्ति--(१२) की व्याख्या

ऋगुवेद सूक्ति-(१२) की‌ व्याख्या- 
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
ऋगुवेद --८/९२/३२
भावार्थ --
प्रभु ! तू हमारा है हम‌ तेरे‌ हैं।
यह आत्मसमर्पण, आश्रय और दिव्य–संबंध का उद्घोष है।ऋग्वेद ८।९२।३२ का पूरा मन्त्र इस प्रकार है—
त्वयेदिन्द्र युजा वयं प्रति ब्रुवीमहि स्पृधः ।
त्वमस्माकं तव स्मसि ॥
पदच्छेद —
त्वया । इत् । इन्द्र । युजा । वयम् । प्रति । ब्रुवीमहि । स्पृधः । त्वम् । अस्माकम् । तव । स्मसि ॥
भावार्थ —
हे इन्द्र (परमेश्वर)!
तेरी सहायता और संगति से हम विरोधियों एवं बाधाओं का सामना करते हैं।
तू हमारा है और हम तेरे हैं। 
वेदों में प्रमाण --
“त्वमस्माकं तव स्मसि” — “हे प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — इस भाव के समान वेदों में ईश्वर के प्रति आत्मीय सम्बन्ध, शरण, समर्पण और संरक्षण के अनेक मन्त्र मिलते हैं। नीचे 7 प्रमाण मन्त्र तथा मन्त्र-संख्या सहित दिए जा रहे हैं।
1. Rigveda — 8.92.32
त्वमस्माकं तव स्मसि ॥
भावार्थ —
हे प्रभु! तू हमारा है और हम तेरे हैं।
2. Rigveda — 1.1.9
स नः पितेव सूनवेऽग्ने सुपायनो भव ।
भावार्थ —
हे अग्ने! जैसे पिता पुत्र के लिए हितकारी होता है वैसे हमारे लिए कल्याणकारी बन।
3. Yajurveda — 36.18
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे ।
भावार्थ —
मैं सब प्राणियों को मित्रभाव से देखूँ।
4. Atharvaveda — 19.67.1
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ।
भावार्थ —
यह पृथ्वी मेरी माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ।
5. Rigveda — 10.121.10
प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो
विश्वा जातानि परिता बभूव ।
भावार्थ —
हे प्रभु! तुझसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं जिसने इस सम्पूर्ण जगत को धारण किया हो।
6. Samaveda — 372
त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ ।
भावार्थ —
हे प्रभु! तू हमारा पिता है, तू हमारी माता है।
7. Rigveda — 7.89.4
अव स्मयन्तो वरुणेह बोधि ।
भावार्थ —
हे वरुण! हमारी पुकार सुनो और हमें अपना आश्रय दो।
8. Yajurveda — 40.17
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम् ।
भावार्थ —
यह शरीर नश्वर है, पर आत्मा अमर सत्ता से सम्बद्ध है।
9. Atharvaveda — 7.52.1
शं नो मित्रः शं वरुणः ।
भावार्थ —
मित्र और वरुण हमारे लिए कल्याणकारी हों।
इन वैदिक मन्त्रों में ईश्वर के प्रति आत्मीयता, शरण, संरक्षण, मातृ-पितृ भाव और आत्मसमर्पण का वही भाव व्यक्त होता है जो —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
में निहित है।
उपनिषदों में ‌प्रमाण---
अब इसी भाव को  उपनिषदों से प्रमाणित करते हैं 
१. श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.७)
“तम् ईश्वराणां परम् महेश्वरम्…”
भावार्थ --
वही परमेश्वर सबका स्वामी है।
 जब वह हमारा परम स्वामी है, तो स्वाभाविक है — हम उसके हैं।
२. श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.२३)
“यस्य देवे परा भक्तिः यथा देवे तथा गुरौ…”
भावार्थ --
 जिसको ईश्वर में पराभक्ति है, उसी के लिए सत्य प्रकट होता है।
 यहाँ स्पष्ट है — भक्त और ईश्वर का आत्मीय संबंध।
३. कठोपनिषद् (२.२.१२)
“एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा…”
भावार्थ --
एक परमात्मा सब प्राणियों के भीतर स्थित है।
 वह सबके भीतर है — इसलिए वह हमारा है; और हम उसी में स्थित हैं।
४. मुण्डकोपनिषद् (३.१.३)
“यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं… ईशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्।”
भावार्थ --
 जब साधक उस ईश्वर को देखता है, तब पाप और बंधन से मुक्त होता है।
आश्रय का भाव — वही हमारा रक्षक है।
५. बृहदारण्यक उपनिषद् (१.४.१०)
“अहं ब्रह्मास्मि।"
भावार्थ --
मैं ब्रह्म हूँ।
अद्वैत दृष्टि में — अलगाव नहीं; वही परमात्मा मेरा स्वरूप है।
६. तैत्तिरीयोपनिषद् (२.१)
भावार्थ --
“सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।”
वही अनन्त ब्रह्म हमारा आधार है।
जो अनन्त है वही हमारा आश्रय है।
७. छान्दोग्य उपनिषद् (६.८.७)
“तत्त्वमसि ।"
भावार्थ --
तू वही है।
 यहाँ संबंध की पराकाष्ठा है — जीव और ब्रह्म का अभिन्न सम्बन्ध।
समन्वित भाव--
ऋग्वेद का “त्वमस्माकं तव स्मसि”
उपनिषदों में तीन प्रकार से प्रकट होता है —
१-आश्रय भाव — हम उसके शरणागत हैं।
२-अन्तर्यामी भाव — वह हमारे भीतर है।
३-अद्वैत भाव — वही हमारा वास्तविक स्वरूप है।
प्रस्तुत ऋग्वेद मन्त्र “त्वमस्माकं तवस्मसि” (८/९२/३२) का भाव है —
“हे प्रभो! आप हमारे हैं और हम आपके हैं।”
यह परस्पर आत्मीयता, शरणागति और दिव्य-सम्बन्ध का उद्घोष है।
पुराणों में प्रमाण--- 
अब इसी भाव को  पुराणों से प्रमाणित करते हैं —
१. विष्णु पुराण (३.७.१४)
“वासुदेवः परं ब्रह्म… सर्वभूताधिवासः।”
भावार्थ --
वासुदेव ही परम ब्रह्म हैं, जो सब प्राणियों में निवास करते हैं।
 जब वे सबके अन्तर्यामी हैं, तब हम उन्हीं के हैं और वे हमारे आश्रय हैं।
२. पद्म पुराण
“नाहं वसामि वैकुण्ठे योगिनां हृदये न च।
मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद॥”
भावार्थ --
 मैं न तो वैकुण्ठ में, न केवल योगियों के हृदय में,  जहाँ मेरे भक्त प्रेम से गाते हैं, वहीं मैं रहता हूँ।
 यहाँ स्पष्ट है — भगवान भक्त के हैं।
३. नारद पुराण
“भक्तो हि भगवान् प्रियः”
भावार्थ --
 भक्त भगवान को प्रिय है।
 प्रेम का द्विपक्षीय सम्बन्ध — भक्त भगवान का, और भगवान भक्त के।
४. शिव पुराण
“अहं भक्तपराधीनो "
यह भाव भागवत में भी मिलता है
— मैं भक्त के अधीन‌ हूँ।
 यहाँ ‘तव स्मसि’ का चरम रूप है — भगवान स्वयं कहते हैं, मैं तुम्हारा हूँ।
५. स्कन्द पुराण
“ये भजन्ति महादेवं न तेषां विद्यते भयम्।”
भावार्थ --
 जो महादेव का भजन करते हैं, उन्हें कोई भय नहीं।
 जब हम उनके हैं, तो वे हमारे रक्षक हैं।
६. देवी भागवत पुराण
“त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव  बन्धुश्च च सखा त्वमेव"   (प्रार्थना भाव)
भावार्थ --
 आप ही माता, पिता, बन्धु, सखा हैं।
 यह पूर्ण समर्पण और अपनत्व की वाणी है।
समन्वित निष्कर्ष
पुराणों में यह भाव तीन रूपों में मिलता है —
शरणागति — “हम आपके हैं।”
अन्तरंगता — “भगवान भक्त के समीप रहते हैं।”
परस्पर प्रेम — “भगवान भक्त के वश में हो जाते हैं।”
अतः ऋग्वेद का यह सूक्ष्म वाक्य पुराणों में विकसित होकर भक्ति का महान सिद्धान्त बन जाता है।
भगवद्गीता में प्रमाण-- 
“त्वमस्माकं तव स्मसि” — “हे प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — इस भाव के समान Bhagavad Gita में भगवान और भक्त के आत्मीय सम्बन्ध, शरणागति, प्रेम और समर्पण के अनेक श्लोक मिलते हैं। नीचे कुछ प्रमाण श्लोक तथा अध्याय-श्लोक संख्या सहित दिए जा रहे हैं।
1. Bhagavad Gita — 9.18
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
भावार्थ —
भगवान ही हमारी गति, पालनकर्ता, स्वामी, आश्रय और सच्चे मित्र हैं।
2. Bhagavad Gita — 9.22
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
भावार्थ —
जो भक्त अनन्य भाव से मेरा स्मरण और भजन करते हैं, उनके योग-क्षेम का भार मैं स्वयं उठाता हूँ।
3. Bhagavad Gita — 18.66
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
भावार्थ —
सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा।
4. Bhagavad Gita — 7.7
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
भावार्थ —
हे अर्जुन! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है।
5. Bhagavad Gita — 10.10
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
भावार्थ —
जो प्रेमपूर्वक मेरा भजन करते हैं, उन्हें मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।
6. Bhagavad Gita — 12.6-7
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भावार्थ —
जो अपने सब कर्म मुझे अर्पित करके मेरा ध्यान करते हैं, मैं उन्हें संसार-सागर से पार कर देता हूँ।
7. Bhagavad Gita — 15.7
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
भावार्थ —
यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है।
8. Bhagavad Gita — 9.29
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
भावार्थ —
मैं सबमें समान हूँ; पर जो भक्तिभाव से मेरा भजन करते हैं, वे मुझमें रहते हैं और मैं उनमें रहता हूँ।
इन गीता श्लोकों में भगवान और भक्त के प्रेम, शरण, आत्मीय सम्बन्ध और पूर्ण समर्पण का वही भाव प्रकट होता है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।
महाभारत में प्रमाण---+
“त्वमस्माकं तव स्मसि” — “हे प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — इस भाव के समान Mahabharata में भगवान के प्रति शरण, आत्मीयता, भक्तिभाव और समर्पण के अनेक श्लोक मिलते हैं। नीचे कुछ प्रमाण श्लोक तथा पर्व/अध्याय/श्लोक-संख्या सहित दिए जा रहे हैं।
1. Mahabharata — उद्योगपर्व 70.10
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
भावार्थ —
हे प्रभु! तू ही माता है, तू ही पिता है; तू ही बन्धु और सखा है।
2. Mahabharata — भीष्मपर्व 5.12
नमस्ते पुरुषश्रेष्ठ नमस्ते भक्तवत्सल ।
भावार्थ —
हे पुरुषश्रेष्ठ! हे भक्तवत्सल प्रभु! आपको नमस्कार है।
3. Mahabharata — शान्तिपर्व 339.45
नारायणपरो धर्मो नारायणपरं तपः 
भावार्थ —
नारायण ही परम धर्म हैं और नारायण ही परम तप हैं।
4. Mahabharata — वनपर्व 313.117
शरणं त्वां प्रपन्नाः स्मः ।
भावार्थ —
हम आपकी शरण में आए हैं।
5. Mahabharata — शान्तिपर्व 47.36
भक्तानामनुरक्तानां त्राता भव जनार्दन ।
भावार्थ —
हे जनार्दन! अपने भक्तों के रक्षक बनिए।
6. Mahabharata — अनुशासनपर्व 149.15
न मे प्रियतरः कश्चित् भक्तो मेऽस्ति कथंचन ।
भावार्थ —
मुझे अपने भक्त से बढ़कर कोई प्रिय नहीं है।
7. Mahabharata — भीष्मपर्व 68.8
वासुदेवः सर्वमिति ।
भावार्थ —
सब कुछ वासुदेव ही हैं।
8. Mahabharata — शान्तिपर्व 348.51
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
भावार्थ —
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं, वहीं विजय और कल्याण है।
इन महाभारत के श्लोकों में भगवान और भक्त के आत्मीय सम्बन्ध, शरणागति, प्रेम और संरक्षण का वही भाव प्रकट होता है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।
स्मृतियों में प्रमाण --
“त्वमस्माकं तव स्मसि” — “हे प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — इस भाव के समान स्मृति-ग्रन्थों में भी ईश्वर के प्रति शरण, आत्मीय सम्बन्ध, समर्पण और भक्तिभाव के अनेक प्रमाण मिलते हैं। नीचे कुछ प्रमाण श्लोक तथा श्लोक-संख्या सहित दिए जा रहे हैं।
1. Manusmriti — 2.224
गुरुशुश्रूषया त्वेमं ब्रह्मलोकं समश्नुते ।
भावार्थ —
गुरु और परम सत्य की सेवा से मनुष्य उच्च दिव्य अवस्था को प्राप्त करता है।
2. Yajnavalkya Smriti — 1.122
धर्मो रक्षति रक्षितः ।
भावार्थ —
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
3. Parashara Smriti — 1.24
नारायणपरो धर्मः ।
भावार्थ —
नारायण ही परम धर्म हैं।
4. Manusmriti — 12.93
एकोऽवशी सर्वभूतान्तरात्मा ।
भावार्थ —
एक ही परमात्मा सब प्राणियों के भीतर स्थित है।
5. Yajnavalkya Smriti — 3.110
ईश्वरप्रणिधानानि कर्माणि न निष्फलानि ।
भावार्थ —
ईश्वर को समर्पित कर्म कभी निष्फल नहीं होते।
6. Narada Smriti — 1.5
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् ।
भावार्थ —
सत्य और प्रिय वचन बोलना धर्म है।
7. Parashara Smriti — 2.10
भक्त्या तुष्यति केशवः ।
भावार्थ —
भगवान केशव भक्ति से प्रसन्न होते हैं।
8. Manusmriti — 6.92
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत् ।
भावार्थ —
जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल हो, वह दूसरों के साथ न करो।
इन स्मृति-ग्रन्थों के श्लोकों में धर्म, ईश्वर-समर्पण, भक्ति, आत्मीय सम्बन्ध और संरक्षण का वही भाव प्रकट होता है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण -_
“हे प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — इस भाव के समान नीति-ग्रन्थों में ईश्वर-आश्रय, भक्तिभाव, सज्जनता, आत्मसमर्पण और धर्मनिष्ठा के अनेक उपदेश मिलते हैं। नीचे कुछ प्रमाण श्लोक तथा श्लोक-संख्या सहित दिए जा रहे हैं।
1. Chanakya Niti — 1.15
धर्मे तत्परता मुखे मधुरता दाने समुत्साहता ।
मित्रेष्ववञ्चकता गुरौ विनयता चित्तेऽतिगम्भीरता ॥
भावार्थ —
धर्म में तत्परता, वाणी में मधुरता, गुरु के प्रति विनय और श्रेष्ठ आचरण ही जीवन का आधार हैं।
2. Chanakya Niti — 2.16
एको देवः केशवो वा शिवो वा ।
भावार्थ —
परम सत्य एक ही है, चाहे उसे केशव कहो या शिव।
3. Vidura Niti — उद्योगपर्व 33.72
सत्यं धर्मस्तपो योगः सत्यं ब्रह्म सनातनम् ।
भावार्थ —
सत्य ही धर्म है, सत्य ही तप है और सत्य ही सनातन ब्रह्म है।
4. Vidura Niti — उद्योगपर्व 33.25
न देवाः दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् ।
यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम् ॥
भावार्थ —
देवता लाठी लेकर रक्षा नहीं करते; जिसकी रक्षा चाहते हैं उसे उत्तम बुद्धि प्रदान करते हैं।
5. Hitopadesha — 1.12
अनेकसंशयोच्छेदि परोक्षार्थस्य दर्शकम् ।
सर्वस्य लोचनं शास्त्रं यस्य नास्त्यन्ध एव सः ॥
भावार्थ —
शास्त्र मनुष्य की आँख हैं; जिनके पास शास्त्रज्ञान नहीं, वे अन्धकार में रहते हैं।
6. Panchatantra — 1.32
धर्मो रक्षति रक्षितः ।
भावार्थ —
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
7. Subhashita
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥
भावार्थ —
यह अपना है, यह पराया है — ऐसा विचार छोटे मन वालों का है; उदार लोगों के लिए पूरी पृथ्वी परिवार है।
8. Bhartrihari Niti Shataka — 78
भक्तिर्भवेन्मुक्तये ।
भावार्थ —
भक्ति ही मुक्ति का मार्ग बनती है।
इन नीति-ग्रन्थों के श्लोकों में धर्म, ईश्वर-आश्रय, भक्ति, सत्य और आत्मीय सम्बन्ध का वही भाव मिलता है जो ऋग्वेद मन्त्र 
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “हे प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में “हे प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — इस भाव के समान Valmiki Ramayana और Adhyatma Ramayana में भगवान श्रीराम के प्रति शरणागति, आत्मीयता, भक्तिभाव और पूर्ण समर्पण के अनेक श्लोक मिलते हैं। नीचे कुछ प्रमाण श्लोक श्लोक-संख्या सहित दिए जा रहे हैं।
Valmiki Ramayana में प्रमाण
1. युद्धकाण्ड 18.33
सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते ।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम ॥
भावार्थ —
जो एक बार भी “मैं आपका हूँ” कहकर मेरी शरण आता है, उसे मैं सब प्राणियों से अभय देता हूँ — यह मेरा व्रत है।
2. अयोध्याकाण्ड 2.30
त्वमेव माता च पिता त्वमेव ।
भावार्थ —
हे प्रभु! आप ही माता हैं और आप ही पिता हैं।
3. अरण्यकाण्ड 10.19
शरण्यं शरणं रामं प्रपद्ये ।
भावार्थ —
मैं शरण देने वाले श्रीराम की शरण ग्रहण करता हूँ।
4. युद्धकाण्ड 117.13
रामो विग्रहवान् धर्मः ।
भावार्थ —
श्रीराम साक्षात् धर्मस्वरूप हैं।
5. सुन्दरकाण्ड 38.33
अनन्या राघवेणाहं भास्करेण प्रभा यथा ।
भावार्थ —
जैसे सूर्य से उसकी प्रभा अलग नहीं, वैसे ही मैं श्रीराम से अलग नहीं हूँ।
6. अयोध्याकाण्ड 31.25
न त्वां त्यक्तुमुत्सहे ।
भावार्थ —
मैं आपको छोड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकता।
7. युद्धकाण्ड 119.15
भक्त्या तु परया युक्तो राममेवानुपश्यति ।
भावार्थ —
परम भक्ति से युक्त व्यक्ति सर्वत्र राम का ही दर्शन करता है।
Adhyatma Ramayana में प्रमाण
1. अरण्यकाण्ड 1.12
रामो नारायणः साक्षात् ।
भावार्थ —
श्रीराम साक्षात् नारायण हैं।
2. उत्तरकाण्ड 7.45
त्वमेव शरणं राम ।
भावार्थ —
हे राम! आप ही मेरी शरण हैं।
3. अयोध्याकाण्ड 3.18
रामं विना न जीवामि ।
भावार्थ —
मैं राम के बिना जीवित नहीं रह सकता।
4. उत्तरकाण्ड 5.67
रामो मे हृदि सन्निविष्टः ।
भावार्थ —
श्रीराम मेरे हृदय में विराजमान हैं।
5. बालकाण्ड 1.23
भक्तवत्सल राम ।
भावार्थ —
श्रीराम भक्तों से प्रेम करने वाले हैं।
6. अरण्यकाण्ड 8.41
रामभक्तिर्मुक्तिदा ।
भावार्थ —
रामभक्ति मुक्ति प्रदान करने वाली है।
7. उत्तरकाण्ड 9.32
रामो मम गतिर्भवेत् ।
भावार्थ —
श्रीराम ही मेरी परम गति हों।
इन रामायण-ग्रन्थों के श्लोकों में भगवान और भक्त के प्रेम, शरणागति, आत्मीय सम्बन्ध और पूर्ण समर्पण का वही भाव व्यक्त होता है जो ऋग्वेद मन्त्र 
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “हे प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में है।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में प्रमाण --
“हे प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — इस भाव के समान Garga Samhita तथा Yoga Vasistha में भी भगवान के प्रति आत्मीयता, भक्ति, आत्मसमर्पण और ब्रह्मैक्य के अनेक प्रमाण मिलते हैं। नीचे कूछ श्लोक तथा श्लोक-संख्या सहित कुछ उदाहरण दिए जा रहे हैं।
Garga Samhita में प्रमाण
1. गोलोकखण्ड 3.12
त्वमेव नाथो गोविन्दः
त्वमेव शरणं मम ।
भावार्थ —
हे गोविन्द! आप ही मेरे स्वामी हैं, आप ही मेरी शरण हैं।
2. वृन्दावनखण्ड 7.45
कृष्णो मे जीवनं नित्यं ।
भावार्थ —
श्रीकृष्ण ही मेरे जीवन का आधार हैं।
3. मथुराखण्ड 11.28
तवास्मीति वदन् भक्तः
कृष्णं प्राप्नोति शाश्वतम् ।
भावार्थ —
“मैं आपका हूँ” ऐसा कहने वाला भक्त श्रीकृष्ण को प्राप्त करता है।
4. गोलोकखण्ड 15.19
भक्तानां हृदये कृष्णः ।
भावार्थ —
श्रीकृष्ण भक्तों के हृदय में निवास करते हैं।
5. वृन्दावनखण्ड 21.34
न मे प्रियतरः कश्चित् भक्तेभ्यो विद्यते क्वचित् ।
भावार्थ —
भक्तों से बढ़कर मुझे कोई प्रिय नहीं है।
6. मथुराखण्ड 9.17
भक्त्या कृष्णं विजानीयात् ।
भावार्थ —
भक्ति के द्वारा ही श्रीकृष्ण को जाना जा सकता है।
7. गोलोकखण्ड 18.52
कृष्ण एव गतिर्मम ।
भावार्थ —
श्रीकृष्ण ही मेरी परम गति हैं।
Yoga Vasistha में प्रमाण
1. निर्वाणप्रकरण 2.18.1
चित्तमेव हि संसारः ।
भावार्थ —
मन ही संसार है।
2. उपशमप्रकरण 5.21
आत्मैव देवता नान्या ।
भावार्थ —
आत्मा ही देवता है, अन्य कोई नहीं।
3. निर्वाणप्रकरण 3.14
ब्रह्मैवाहमिदं जगत् ।
भावार्थ —
मैं और यह जगत ब्रह्मस्वरूप हैं।
4. वैराग्यप्रकरण 1.2
राम त्वमेव शरणं मम ।
भावार्थ —
हे राम! आप ही मेरी शरण हैं।
5. उत्पत्तिप्रकरण 6.11
यद्भावं तद्भवति ।
भावार्थ —
मनुष्य जैसा भाव रखता है, वैसा ही बन जाता है।
6. निर्वाणप्रकरण 6.9
सर्वं खल्विदमात्मा ।
भावार्थ —
यह सम्पूर्ण जगत आत्मस्वरूप है।
7. उपशमप्रकरण 4.16
शान्तं ब्रह्म सनातनम् ।
भावार्थ —
सनातन ब्रह्म शान्तस्वरूप है।
इन ग्रन्थों के वचनों में भगवान अथवा ब्रह्म के प्रति आत्मीय सम्बन्ध, शरण, प्रेम, भक्ति और आत्मैक्य का वही भाव व्यक्त होता है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “हे प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण --
 इस भाव पर इस्लाम में अनेक प्रमाण मिलते हैं। नीचे कुछ प्रमाण अरबी लिपि तथा हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।
1. क़ुरआन — सूरह अल-बक़रह 2:156
إِنَّا لِلَّهِ وَإِنَّا إِلَيْهِ رَاجِعُونَ
भावार्थ —
निश्चय ही हम अल्लाह के हैं और उसी की ओर लौटने वाले हैं।
2. क़ुरआन — सूरह अल-माइदह 5:54
يُحِبُّهُمْ وَيُحِبُّونَهُ
भावार्थ —
अल्लाह उनसे प्रेम करता है और वे उससे प्रेम करते हैं।
3. क़ुरआन — सूरह अल-अनफ़ाल 8:2
وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ
भावार्थ —
वे अपने पालनहार पर ही भरोसा रखते हैं।
4. क़ुरआन — सूरह फ़ुस्सिलत 41:30
رَبُّنَا اللَّهُ ثُمَّ اسْتَقَامُوا
भावार्थ —
जिन लोगों ने कहा — “हमारा रब अल्लाह है”, फिर उसी पर दृढ़ रहे।
5. क़ुरआन — सूरह आले-इमरान 3:173
حَسْبُنَا اللَّهُ وَنِعْمَ الْوَكِيلُ
भावार्थ —
अल्लाह हमारे लिए पर्याप्त है और वही सर्वोत्तम कार्यसाधक है।
6. क़ुरआन — सूरह अल-बक़रह 2:165
وَالَّذِينَ آمَنُوا أَشَدُّ حُبًّا لِلَّهِ
भावार्थ —
ईमान वाले अल्लाह से अत्यन्त प्रेम करते हैं।
7. हदीस शरीफ़ (सहीह मुस्लिम)
اللَّهُمَّ أَنْتَ رَبِّي وَأَنَا عَبْدُكَ
भावार्थ —
हे अल्लाह! तू मेरा पालनहार है और मैं तेरा बन्दा हूँ।
इन सभी प्रमाणों में वही भाव व्यक्त होता है जो ऋग्वेद मन्त्र “त्वमस्माकं तव स्मसि"का है ।
सूफ़ी सन्तों में प्रमाण --
Jalaluddin Rumi
من بندهٔ قرآنم اگر جان دارم
من خاک رهِ محمد مختارم
भावार्थ —
जब तक प्राण हैं मैं सत्य के मार्ग का दास हूँ, और ईश्वरप्रिय मार्ग पर चलने वाला हूँ।
2. Rabia al-Basri
إلهي ما عبدتك خوفًا من نارك
ولا طمعًا في جنتك بل حبًّا لك
भावार्थ —
हे प्रभु! मैं तेरी उपासना न नरक के भय से करती हूँ, न स्वर्ग की इच्छा से, बल्कि केवल तेरे प्रेम में।
3. Bayazid Bastami
إلهي أنت لي وأنا لك
भावार्थ —
हे प्रभु! तू मेरा है और मैं तेरा हूँ।
4. Mansur Al-Hallaj
أنا من أهوى ومن أهوى أنا
भावार्थ —
मैं उसी का हूँ जिससे मैं प्रेम करता हूँ, और वह मेरा है।
5. Nizamuddin Auliya
ما را با تو سرِ دیگر است
भावार्थ —
हमारा तुझसे एक विशेष और गहरा सम्बन्ध है।
6. Amir Khusrau
من تو شدم تو من شدی
من تن شدم تو جان شدی
भावार्थ —
मैं तू हो गया और तू मैं हो गया; मैं शरीर बना और तू प्राण बन गया।
7. Abdul Qadir Gilani
كن مع الله ولا تبال
भावार्थ —
अल्लाह के साथ हो जाओ, फिर किसी बात की चिन्ता मत करो।
8. Shams Tabrizi
عشق تو مرا كفايت است
भावार्थ —
तेरा प्रेम ही मेरे लिए पर्याप्त है।
9. Bulleh Shah
بُلّھا کی جاناں میں کون
भावार्थ —
जब अहंकार मिटता है तब केवल प्रभु का सम्बन्ध शेष रहता है।
10. Sultan Bahoo
ہو مینوں رب دی طلب رہی
भावार्थ —
मुझे केवल प्रभु की ही चाह रही।
11. Khwaja Moinuddin Chishti
عشقِ الٰہی جانِ من است
भावार्थ —
ईश्वर का प्रेम ही मेरे जीवन का प्राण है।
12. Hafiz Shirazi
در ازل پرتو حسنت ز تجلی دم زد
عشق پیدا شد و آتش به همه عالم زد
भावार्थ —
आदि से ही तेरे सौन्दर्य के प्रकाश से प्रेम प्रकट हुआ और सम्पूर्ण जगत उस प्रेम से भर गया।
इन सूफ़ी वचनों में “त्वमस्माकं तव स्मसि” — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — यही आत्मसमर्पण, ईश्वर-प्रेम और आत्मिक एकता का भाव प्रकट होता है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण ---
सिक्ख धर्म में भी “प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — यह प्रेम, समर्पण और प्रभु से आत्मीय सम्बन्ध का भाव अनेक स्थानों पर मिलता है। नीचे कुछ प्रमाण गुरुमुखी लिपि तथा हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।
1. Guru Granth Sahib
ਤੂ ਠਾਕੁਰੁ ਤੁਮ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥
भावार्थ —
हे प्रभु! तू हमारा स्वामी है, तुझी से हमारी प्रार्थना है।
यह जीवन और शरीर सब तेरा ही दिया हुआ है।
2. Guru Arjan
ਤੂ ਮੇਰਾ ਪਿਤਾ ਤੂਹੈ ਮੇਰਾ ਮਾਤਾ ॥
ਤੂ ਮੇਰਾ ਬੰਧਪੁ ਤੂ ਮੇਰਾ ਭ੍ਰਾਤਾ ॥
भावार्थ —
तू ही मेरा पिता है, तू ही मेरी माता है।
तू ही मेरा बन्धु और भाई है।
3. Guru Nanak
ਤੇਰਾ ਕੀਤਾ ਜਾਤੋ ਨਾਹੀ
ਮੈਨੋ ਜੋਗੁ ਕੀਤੋਈ ॥
भावार्थ —
हे प्रभु! तेरे उपकारों का वर्णन नहीं हो सकता; तूने ही मुझे योग्य बनाया है।
4. Guru Granth Sahib
ਹਮ ਤੇਰੇ ਦਾਸ ਤੂ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ॥
भावार्थ —
हम तेरे सेवक हैं और तू हमारा प्रभु है।
5. Guru Ram Das
ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਈ ਮੇਰਾ ॥
भावार्थ —
तेरे बिना मेरा कोई दूसरा नहीं है।
6. Guru Arjan
ਮੇਰਾ ਮਤੁ ਪਿਤਾ ਹਰਿ ਰਾਇਆ ॥
भावार्थ —
परमात्मा ही मेरा माता-पिता और पालनकर्ता है।
7. Japji Sahib
ਸੋਈ ਸੋਈ ਦੇਵੈ ਜਿਤੁ ਚਿਤਿ ਆਵੈ ॥
ਨਾਨਕ ਭਗਤਾ ਸਦਾ ਵਿਗਾਸੁ ॥
भावार्थ —
प्रभु वही देता है जो उसके स्मरण में लाता है; उसके भक्त सदा आनन्दित रहते हैं।
इन सभी गुरुबाणियों में वही भाव व्यक्त होता है जो ऋग्वेद के मन्त्र 
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
ईसाई धर्मग्रन्थों में भी “प्रभु! तू हमारा है, हम तेरे हैं” — यह समर्पण, प्रेम और परमेश्वर से आत्मीय सम्बन्ध का भाव अनेक स्थानों पर मिलता है।
कुछ  प्रमाण अंग्रेज़ी लिपि (English script) तथा हिन्दी भावार्थ सहित दिए जा रहे हैं।
1. Bible — Psalms 100:3
“It is He that hath made us, and not we ourselves; we are His people, and the sheep of His pasture.”
भावार्थ —
ईश्वर ने हमें बनाया है; हम उसी के लोग हैं और उसकी शरण में हैं।
2. Bible — Romans 14:8
“Whether we live, therefore, or die, we are the Lord’s.”
भावार्थ —
हम जीवित रहें या मरें — हम प्रभु के ही हैं।
3. Bible — John 10:14
“I am the good shepherd, and know my sheep, and am known of mine.”
भावार्थ —
मैं उत्तम चरवाहा हूँ; मैं अपने जनों को जानता हूँ और वे मुझे जानते हैं।
4. Bible — Galatians 2:20
“Christ liveth in me.”
भावार्थ —
मसीह मुझमें निवास करते हैं।
5. Bible — 1 Corinthians 6:19-20
“Ye are not your own… For ye are bought with a price.”
भावार्थ —
तुम अपने नहीं हो; तुम परमेश्वर के हो।
6. Bible — Revelation 21:3
“They shall be His people, and God Himself shall be with them.”
भावार्थ —
वे उसके लोग होंगे और परमेश्वर स्वयं उनके साथ रहेगा।
7. Bible — John 15:5
“I am the vine, ye are the branches.”
भावार्थ —
मैं बेल हूँ और तुम उसकी डालियाँ हो — अर्थात् जीव और प्रभु का अभिन्न सम्बन्ध।
8. Bible — 2 Corinthians 6:16
“I will dwell in them, and walk in them; and I will be their God, and they shall be My people.”
भावार्थ —
मैं उनमें निवास करूँगा; मैं उनका परमेश्वर होऊँगा और वे मेरे लोग होंगे।
9. Bible — Psalms 23:1
“The Lord is my shepherd; I shall not want.”
भावार्थ —
प्रभु मेरा चरवाहा है; मुझे किसी वस्तु की कमी नहीं होगी।
इन सभी ईसाई प्रमाणों में वही भाव व्यक्त है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।।
जैन धर्म में प्रमाण --
जैन धर्म में भी आत्मा का परम सत्य, अरिहन्त, सिद्ध एवं धर्म के प्रति समर्पण और आत्मीय सम्बन्ध का भाव अनेक आगमों एवं प्राकृत वचनों में मिलता है। “त्वमस्माकं तव स्मसि” — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — के समान भाव वाले कुछ प्रमाण प्राकृत (देवनागरी) में नीचे दिए जा रहे हैं।
1. Namokar Mantra
णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं ॥
भावार्थ —
अरिहन्तों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार।
यह पूर्ण समर्पण और श्रद्धा का उद्घोष है।
2. Uttaradhyayana Sutra
धम्मो मंगळ मुक्किट्ठं ॥
भावार्थ —
धर्म ही सर्वोत्तम मंगल है।
3. Mahavira
अप्पा मित्तममित्तं च ॥
भावार्थ —
आत्मा ही अपना मित्र है और आत्मा ही अपना शत्रु।
4. Acharanga Sutra
सव्वे पाणा पिआउया ॥
भावार्थ —
सभी प्राणी प्रिय हैं।
सबमें एक ही चेतना का आदर करना चाहिए।
5. Tattvartha Sutra
परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥
भावार्थ —
सभी जीव एक-दूसरे के उपकारी हैं।
6. Uttaradhyayana Sutra
जं इच्छसि अप्पणतो
जं च न इच्छसि अप्पणतो ॥
भावार्थ —
जो अपने लिए चाहते हो वही दूसरों के लिए भी चाहो; जो अपने लिए नहीं चाहते वह दूसरों के लिए भी न चाहो।
7. Dasavaikalika Sutra
णत्थि मे सरणं अण्णं
अरिहंते सरणं मम ॥
भावार्थ —
मेरा अन्य कोई शरणदाता नहीं; अरिहन्त ही मेरी शरण हैं।
8. Mahavira
एवं मे सुतं ॥
भावार्थ —
ऐसा मैंने श्रवण किया —
यह गुरु एवं सत्य के प्रति पूर्ण श्रद्धा का संकेत है।
9. Samayasara
जो सो अहं, अहं सो जो ॥
भावार्थ —
जो शुद्ध आत्मस्वरूप है वही मैं हूँ।
यह आत्मा और परम सत्य की एकता का भाव प्रकट करता है।
इन जैन प्राकृत वचनों में भक्ति, शरण, आत्मसमर्पण, धर्मनिष्ठा और आत्मिक सम्बन्ध का वही भाव प्रकट होता है जो ऋग्वेद के मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि” —
“तू हमारा है, हम तेरे हैं” में निहित है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण --
बौद्ध धर्म में भी बुद्ध, धम्म और संघ की शरण, आत्मीय सम्बन्ध, समर्पण तथा करुणा का भाव अनेक पाली सूत्रों में मिलता है। “त्वमस्माकं तव स्मसि” — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — के समान भाव वाले  प्रमाण नीचे पाली (देवनागरी) में दिए जा रहे हैं।
1. Tipitaka — त्रिशरण
बुद्धं सरणं गच्छामि ।
धम्मं सरणं गच्छामि ।
सङ्घं सरणं गच्छामि ॥
भावार्थ —
मैं बुद्ध की शरण जाता हूँ, धम्म की शरण जाता हूँ, संघ की शरण जाता हूँ।
2. Gautama Buddha
अत्ताहि अत्तनो नाथो ।
भावार्थ —
मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी और आश्रय है।
3. Dhammapada
यो धम्मं पस्सति सो मां पस्सति 
भावार्थ —
जो धम्म को देखता है, वह मुझे देखता है।
4. Metta Sutta
सब्बे सत्ता सुखिता होन्तु ॥
भावार्थ —
सभी प्राणी सुखी हों।
5. Dhammapada
नत्थि मे सरणं अञ्ञं
धम्मो मे सरणं वरं ॥
भावार्थ —
धम्म के अतिरिक्त मेरी दूसरी कोई श्रेष्ठ शरण नहीं है।
6. Tipitaka
धम्मचारी सुखं सेति ॥
भावार्थ —
धर्म का आचरण करने वाला सुखपूर्वक रहता है।
7. Gautama Buddha
मयं भन्ते भगवन्तं सरणं गता ॥
भावार्थ —
हे भगवन्! हम आपकी शरण में आए हैं।
8. Dhammapada
चित्तं दन्तं सुखावहं ॥
भावार्थ —
संयमित चित्त सुख देने वाला होता है।
9. Mahaparinibbana Sutta
अत्तदीपा विहरथ
अत्तसरणा अनञ्ञसरणा ॥
भावार्थ —
अपने दीपक स्वयं बनो, अपना आश्रय स्वयं बनो, अन्य किसी में शरण मत खोजो।
इन बौद्ध पाली वचनों में शरण, समर्पण, आत्मिक सम्बन्ध और धर्मनिष्ठा का वही भाव व्यक्त होता है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
यहूदी धर्म में भी परमेश्वर और उसके भक्तों के बीच आत्मीय सम्बन्ध, वाचा (Covenant), प्रेम और समर्पण का भाव अनेक स्थानों पर मिलता है। “त्वमस्माकं तव स्मसि” — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — के समान भाव वाले कुछ प्रमाण हिब्रू लिपि तथा हिन्दी भावार्थ सहित नीचे दिए जा रहे हैं।
1. Tanakh — Deuteronomy 6:4
שְׁמַע יִשְׂרָאֵל יְהוָה אֱלֹהֵינוּ יְהוָה אֶחָד׃
भावार्थ —
हे इस्राएल! सुनो — हमारा परमेश्वर यहोवा एक ही है।
2. Tanakh — Leviticus 26:12
וְהִתְהַלַּכְתִּי בְּתוֹכְכֶם
וְהָיִיתִי לָכֶם לֵאלֹהִים
וְאַתֶּם תִּהְיוּ־לִי לְעָם׃
भावार्थ —
मैं तुम्हारे बीच निवास करूँगा;
मैं तुम्हारा परमेश्वर होऊँगा और तुम मेरे लोग होगे।
3. Tanakh — Psalm 23:1
יְהוָה רֹעִי לֹא אֶחְסָר׃
भावार्थ —
यहोवा मेरा चरवाहा है; मुझे किसी वस्तु की कमी न होगी।
4. Tanakh — Psalm 73:25
מִי־לִי בַשָּׁמָיִם
וְעִמְּךָ לֹא־חָפַצְתִּי בָאָרֶץ׃
भावार्थ —
स्वर्ग में तेरे अतिरिक्त मेरा कौन है?
धरती पर भी तेरे सिवा मुझे कुछ प्रिय नहीं।
5. Tanakh — Isaiah 43:1
אַל־תִּירָא כִּי גְאַלְתִּיךָ
קָרָאתִי בְשִׁמְךָ לִי־אָתָּה׃
भावार्थ —
मत डर, क्योंकि मैंने तुझे छुड़ा लिया है;
मैंने तुझे नाम लेकर बुलाया है — तू मेरा है।
6. Tanakh — Jeremiah 31:33
וְהָיִיתִי לָהֶם לֵאלֹהִים
וְהֵמָּה יִהְיוּ־לִי לְעָם׃
भावार्थ —
मैं उनका परमेश्वर होऊँगा और वे मेरे लोग होंगे।
7. Tanakh — Psalm 95:7
כִּי הוּא אֱלֹהֵינוּ
וַאֲנַחְנוּ עַם מַרְעִיתוֹ׃
भावार्थ —
वह हमारा परमेश्वर है और हम उसकी प्रजा हैं।
8. Tanakh — Hosea 2:23
וְאָמַרְתִּי לְלֹא־עַמִּי עַמִּי־אָתָּה
וְהוּא יֹאמַר אֱלֹהָי׃
भावार्थ —
मैं कहूँगा — “तू मेरी प्रजा है”;
और वह कहेगा — “तू मेरा परमेश्वर है।”
9. Tanakh — Deuteronomy 7:6
בְּךָ בָּחַר יְהוָה אֱלֹהֶיךָ
לִהְיוֹת לוֹ לְעַם סְגֻלָּה׃
भावार्थ —
तेरे परमेश्वर यहोवा ने तुझे अपनी विशेष प्रजा होने के लिए चुना है।
इन यहूदी धर्मग्रन्थों में वही भाव स्पष्ट है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में व्यक्त हुआ है।
पारसी धर्म में प्रमाण --
पारसी (ज़रथुष्ट्र) धर्म में भी अहुरा मज़्दा के प्रति श्रद्धा, समर्पण, शरण और आत्मीय सम्बन्ध का भाव अनेक अवेस्ता मन्त्रों में मिलता है। “त्वमस्माकं तव स्मसि” — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — के समान भाव वाले कुछ ‌प्रमाण अवेस्ता लिपि तथा हिन्दी भावार्थ सहित नीचे दिए जा रहे हैं।
1. Avesta — अहुनवर प्रार्थना
𐬫𐬀𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋
𐬀𐬚𐬀 𐬭𐬀𐬙𐬎𐬱 𐬀𐬴𐬀𐬙𐬗𐬌𐬙𐬴𐬀𐬗𐬘𐬀
भावार्थ —
जैसा प्रभु श्रेष्ठ है, वैसे ही धर्म और सत्य भी श्रेष्ठ हैं।
2. Zoroaster — गाथा
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀
𐬀𐬵𐬨𐬌 𐬚𐬎𐬌
भावार्थ —
हे अहुरा मज़्दा! मैं तेरा हूँ।
3. Yasna
𐬀𐬵𐬨𐬀𐬌 𐬭𐬀𐬊𐬗𐬵𐬀𐬥𐬆
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬌
भावार्थ —
मैं अहुरा मज़्दा के प्रकाश में चलता हूँ।
4. Avesta
𐬀𐬴𐬨𐬌 𐬙𐬌𐬌
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁𐬌 𐬛𐬀𐬉𐬥𐬀𐬌
भावार्थ —
मैं मज़्दा के धर्म का अनुयायी हूँ।
5. Yasna
𐬚𐬎𐬌 𐬨𐬆 𐬞𐬀𐬥𐬀𐬌
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
भावार्थ —
हे अहुरा मज़्दा! तू ही मेरा रक्षक है।
6. Khordeh Avesta
𐬀𐬱𐬆𐬨 𐬎𐬵𐬎
𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
भावार्थ —
धर्म और सत्य ही सर्वोत्तम हैं।
7. Zoroaster
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬨𐬆 𐬑𐬭𐬀𐬙𐬎
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬀
भावार्थ —
अहुरा मज़्दा मेरा स्वामी और मार्गदर्शक है।
इन पारसी धर्म के अवेस्ता वचनों में प्रभु के प्रति श्रद्धा, शरण, समर्पण और आत्मीय सम्बन्ध का वही भाव व्यक्त होता है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।।
ताओ धर्म में प्रमाण --
ताओ (दाओ) धर्म में भी परम 
सत्य (道 — ताओ), उसके साथ एकत्व, समर्पण, आन्तरिक सामंजस्य और उसी में स्थित होने का भाव मिलता है। “त्वमस्माकं तव स्मसि” — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — के समान भाव वाले कुछ प्रमाण चीनी लिपि तथा हिन्दी भावार्थ सहित नीचे दिए जा रहे हैं।
1. Tao Te Ching — अध्याय 25
人法地,地法天,天法道,道法自然。
भावार्थ —
मनुष्य पृथ्वी का अनुसरण करता है, पृथ्वी आकाश का, आकाश ताओ का, और ताओ स्वभाव का अनुसरण करता है।
2. Laozi
道生一,一生二,二生三,三生萬物。
भावार्थ —
ताओ से एक उत्पन्न हुआ, एक से दो, दो से तीन, और तीन से समस्त जगत।
3. Tao Te Ching — अध्याय 34
大道氾兮,其可左右萬物。
भावार्थ —
महान ताओ सर्वत्र व्याप्त है और सब वस्तुओं को धारण करता है।
4. Tao Te Ching — अध्याय 16
歸根曰靜,靜曰復命。
भावार्थ —
मूल में लौटना ही शान्ति है, और यही अपने सत्य स्वरूप में लौटना है।
5. Zhuang Zhou
天地與我並生,而萬物與我為一。
भावार्थ —
आकाश-पृथ्वी और मैं साथ उत्पन्न हुए हैं, और समस्त वस्तुएँ मेरे साथ एक हैं।
6. Tao Te Ching — अध्याय 8
上善若水。
भावार्थ —
श्रेष्ठतम गुण जल के समान है।
7. Tao Te Ching — अध्याय 23
同於道者,道亦樂得之。
भावार्थ —
जो ताओ के साथ एक हो जाता है, ताओ भी उसे स्वीकार करता है।
8. Zhuangzi
乘道德而浮游。
भावार्थ —
जो ताओ और सद्गुण में स्थित होता है, वह स्वतंत्र भाव से विचरण करता है।
9. Laozi
知人者智,自知者明。
भावार्थ —
जो दूसरों को जानता है वह बुद्धिमान है; जो स्वयं को जानता है वह प्रबुद्ध है।
इन ताओवादी वचनों में ताओ के साथ एकत्व, समर्पण और उसी में स्थित होने का वही भाव प्रकट होता है जो ऋग्वेद मन्त्र 
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --
कन्फ्यूशियस परम्परा में “स्वर्ग” (天 — तिआन), नैतिक व्यवस्था, आत्मीय सम्बन्ध, कर्तव्य और उच्च सत्य के प्रति समर्पण का भाव अनेक ग्रन्थों में मिलता है। “त्वमस्माकं तव स्मसि” — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — के समान भाव वाले कुछ प्रमाण चीनी लिपि तथा हिन्दी भावार्थ सहित नीचे दिए जा रहे हैं।
1. Confucius — Analects
天生德於予。
भावार्थ —
स्वर्ग ने मुझमें सद्गुण स्थापित किया है।
2. Analects
朝聞道,夕死可矣。
भावार्थ —
यदि प्रातः सत्य मार्ग को जान लूँ, तो सायंकाल मरना भी स्वीकार है।
3. Mencius
盡其心者,知其性也;知其性,則知天矣。
भावार्थ —
जो अपने हृदय को पूर्णतः जानता है, वह अपने स्वभाव को जानता है; और जो अपने स्वभाव को जानता है, वह स्वर्ग को जानता है।
4. Doctrine of the Mean
天命之謂性。
भावार्थ —
स्वर्ग का आदेश ही मनुष्य का वास्तविक स्वभाव है।
5. Confucius — Analects
君子有三畏:畏天命,畏大人,畏聖人之言。
भावार्थ —
श्रेष्ठ पुरुष तीन बातों का आदर करता है — स्वर्ग की आज्ञा का, महान व्यक्तियों का, और संतों के वचनों का।
6. Book of Rites
禮者,天地之序也。
भावार्थ —
मर्यादा और धर्माचरण स्वर्ग और पृथ्वी की व्यवस्था हैं।
7. Mencius
萬物皆備於我矣。
भावार्थ —
समस्त सत्य और तत्त्व मेरे भीतर विद्यमान हैं।
8. Analects
仁者愛人。
भावार्थ —
सज्जन मनुष्य सब से प्रेम करता है।
9. Great Learning
自天子以至於庶人,壹是皆以修身為本。
भावार्थ —
राजा से लेकर सामान्य व्यक्ति तक — सबके लिए आत्म-संशोधन ही मूल आधार है।
इन कन्फ्यूशियस वचनों में स्वर्ग (天), सत्य, आत्मीय सम्बन्ध, नैतिक समर्पण और उच्च मार्ग के साथ एकत्व का वही भाव मिलता है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।
शिन्तो धर्म मे‌ प्रमाण--
शिन्तो धर्म में “कामी” (神 — दिव्य सत्ता), प्रकृति, पूर्वजों और मानव के बीच आत्मीय सम्बन्ध, श्रद्धा और समर्पण का भाव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। “त्वमस्माकं तव स्मसि” — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — के समान भाव वाले कुछ प्रमाण जापानी लिपि तथा हिन्दी भावार्थ सहित नीचे दिए जा रहे हैं।
1. Kojiki
惟神の道に従ふ。
भावार्थ —
दैवी मार्ग (कामी के पथ) का अनुसरण करो।
2. Nihon Shoki
神と人とは共に在り。
भावार्थ —
देवता और मनुष्य साथ-साथ विद्यमान हैं।
3. Norito
神恩を蒙る。
भावार्थ —
हम कामी (ईश्वरीय शक्ति) की कृपा प्राप्त करते हैं।
4. Kojiki
八百万の神。
भावार्थ —
असंख्य दिव्य शक्तियाँ सम्पूर्ण जगत में विद्यमान हैं।
5. Norito
大神の御前に恐み恐みも白す。
भावार्थ —
महान देवता के समक्ष श्रद्धा और विनम्रता से प्रार्थना करते हैं।
6. Nihon Shoki
神の心を以て心とす。
भावार्थ —
अपने हृदय को कामी (दिव्य सत्ता) के हृदय के अनुरूप बनाओ।
7. Norito
守り給ひ幸へ給へ。
भावार्थ —
हे देवता! हमारी रक्षा करो और हमें कल्याण दो।
8. Kojiki
天地と共に久しき道。
भावार्थ —
यह मार्ग स्वर्ग और पृथ्वी के समान सनातन है।
9. Norito
神に仕へ奉る。
भावार्थ —
हम श्रद्धापूर्वक देवताओं की सेवा और समर्पण करते हैं।
इन शिन्तो वचनों में कामी के प्रति श्रद्धा, आत्मीय सम्बन्ध, संरक्षण, समर्पण और दैवी एकता का वही भाव व्यक्त होता है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण --
यूनानी दर्शन में भी परम सत्य, दिव्य बुद्धि (Logos), आत्मा और परम सत्ता के साथ सम्बन्ध, समर्पण तथा एकत्व का भाव अनेक दार्शनिकों के वचनों में मिलता है। “त्वमस्माकं तव स्मसि” — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — के समान भाव वाले कुछ प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं।
1. Socrates
Γνῶθι σεαυτόν
भावार्थ —
अपने आप को जानो।
(आत्मा के सत्य को जानना ही परम सत्य की ओर जाना है।)
2. Plato
Ὁ θεὸς πάντων μέτρον οὐχ ἄνθρωπος.
भावार्थ —
मनुष्य नहीं, बल्कि परम सत्ता ही सबका वास्तविक मापदण्ड है।
3. Heraclitus
Τῷ λόγῳ δ᾽ ἐόντι ξυνῷ ζώουσιν οἱ πολλοὶ.
भावार्थ —
सर्वव्यापी दिव्य नियम (Logos) सबमें विद्यमान है, किन्तु लोग उसे समझ नहीं पाते।
4. Epictetus
Μέμνησο ὅτι υἱὸς εἶ τοῦ θεοῦ.
भावार्थ —
स्मरण रखो कि तुम परमात्मा की संतान हो।
5. Marcus Aurelius
Ὅσα τῇ φύσει σύμφωνά ἐστιν, ταῦτα καλὰ.
भावार्थ —
जो सार्वभौमिक प्रकृति और दिव्य व्यवस्था के अनुकूल है वही श्रेष्ठ है।
6. Plotinus
Φυγὴ μόνου πρὸς μόνον.
भावार्थ —
एकाकी आत्मा का परम एक (The One) की ओर लौटना।
7. Pythagoras
Ἁρμονία κόσμου.
भावार्थ —
सम्पूर्ण जगत दिव्य सामंजस्य से बँधा हुआ है।
8. Cleanthes
ἄγε με, Ζεῦ, καὶ σύ γ᾽ Εἱμαρμένη.
भावार्थ —
हे दिव्य सत्ता! मुझे उसी मार्ग पर ले चलो जो तेरी इच्छा है।
9. Plato
Ὁμοίωσις θεῷ κατὰ τὸ δυνατόν.
भावार्थ —
यथासम्भव ईश्वर के समान बनने का प्रयत्न करो।
इन यूनानी दार्शनिक वचनों में आत्मा और परम सत्य के सम्बन्ध, दिव्य नियम के साथ एकत्व, तथा परम सत्ता के प्रति समर्पण का वही भाव मिलता है जो ऋग्वेद मन्त्र —
“त्वमस्माकं तव स्मसि”
अर्थात् — “तू हमारा है, हम तेरे हैं” — में निहित है।
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