ऋगुवेद सूक्ति--(७) की व्याख्या
न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन। ऋगुवेद--१०/१५२/१
भावार्थ-- ईश्वर के भक्त को न कोई नष्ट कर सकता है न जीत सकता है।
श्लोक और अर्थ को थोड़ा शुद्ध और स्पष्ट रूप में रखने पर—
ऋग्वेद १०/१५२/१
मन्त्र (प्रचलित पाठ):
न यस्य हन्यते सखाऽ न जीयते कदाचन।
(कुछ पाठों में स्वर-भेद मिलता है, आशय समान है)
शब्दार्थ
न — नहीं
यस्य — जिसका
हन्यते — मारा जाता है / नष्ट किया जाता है
सखा — मित्र (यहाँ ईश्वर का सखा = भक्त)
न जीयते — पराजित नहीं होता
कदाचन — कभी भी
भावार्थ
जिसका मित्र स्वयं ईश्वर है,
उसके भक्त/सखा को
न कोई नष्ट कर सकता है और न ही कोई कभी पराजित कर सकता है।
ऋग्वेद में “सखा” शब्द का प्रयोग बार-बार ईश्वर के संरक्षण और मैत्री के अर्थ में हुआ है।
समान भाव के अन्य वैदिक/आर्ष प्रमाण (संक्षेप में)
कठोपनिषद् — नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।
(ईश्वर-आश्रित आत्मा को कोई क्षति नहीं पहुँचा सकता)
गीता ९/३१ — न मे भक्तः प्रणश्यति।
भाव--मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
🔹 मुण्डकोपनिषद् ३/२/४
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो…
👉 जिसे ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त है, वही सुरक्षित और विजयी रहता है।
6️⃣ भगवद्गीता से प्रमाण
🔸 गीता ९/३१
न मे भक्तः प्रणश्यति।
👉 मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
(यह श्लोक ऋग्वैदिक मन्त्र का सीधा भावानुवाद है)
🔸 गीता १८/६६
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि।
👉 ईश्वर स्वयं भक्त की रक्षा का भार लेते हैं।
7️⃣ महाभारत से प्रमाण
🔹 वनपर्व
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥
👉 जहाँ ईश्वर सखा हैं, वहाँ पराजय असंभव है।
8️⃣ पुराण से प्रमाण--
🔸 भागवत पुराण ६/१७/२८
रक्षन्ति साधवो नित्यं भक्तानात्मप्रदायिनः।
👉 ईश्वर अपने भक्तों की स्वयं रक्षा करते हैं।
हितोपदेश, चाणक्य (नीतिशास्त्र) और भर्तृहरि आदि आर्ष-नीति ग्रन्थों से प्रमाण क्रमबद्ध रूप में प्रस्तुत हैं—
🔶 1️⃣ हितोपदेश से प्रमाण
हितोपदेश —
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयादेष धर्मः सनातनः॥
👉 जो सनातन धर्म में स्थित है, उसकी रक्षा धर्म स्वयं करता है।
भाव: धर्मरक्षितः = अजेय।
🔶 2️⃣ चाणक्य (कौटिल्य) से प्रमाण--
(क) चाणक्य नीति
धर्मस्य रक्षिता धर्मो हन्ति रक्षितः।
👉 जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
भावार्थ: ईश्वर-धर्माश्रित व्यक्ति का नाश असंभव।
(ख) चाणक्य नीति
यस्य धर्मो बलं तस्य सर्वं जगद्वशे।
👉 जिसके पास धर्म-बल है, वह सम्पूर्ण जगत में अजेय होता है।
भाव-साम्य: “न जीयते कदाचन।”
(ग) अर्थशास्त्रीय भाव
धर्ममूलौ अर्थकामौ।
👉 जहाँ धर्म है, वहाँ सुरक्षा और विजय निश्चित है।
🔶 3️⃣ भर्तृहरि से प्रमाण
(क) नीति-शतक 63
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः
स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः
सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति॥
👉 यहाँ “काञ्चन” का आशय केवल धन नहीं,
बल्कि धर्म-तेज से है—
धर्मयुक्त पुरुष सर्वगुणसम्पन्न और विजयी होता है।
(ख) नीति-शतक-- 84
न धर्मादधिकं किञ्चिदिह लोके परत्र च।
👉 धर्म से बढ़कर कोई रक्षक नहीं—
न इस लोक में, न परलोक में।
भाव: धर्माश्रित व्यक्ति का विनाश नहीं होता।
(ग) वैराग्य-शतक--
धैर्यं यस्य पिता क्षमा च जननी शान्तिश्चिरं गेहिनी।
👉 धैर्य-धर्म-शान्ति से युक्त पुरुष को कोई हरा नहीं सकता।
🔶 अन्य आर्ष-नीति परम्परा से
(क) महावाक्यात्मक नीति सूत्र
धर्मो रक्षति रक्षितः।
👉 यह सम्पूर्ण आर्ष परम्परा का निष्कर्ष है।
(ख) स्मृति-नीति भाव
अधर्मेणैधते तावद् धर्मेण तु सदा जयः।
👉 अधर्म से क्षणिक लाभ,
धर्म से सदा विजय।
🔸 निष्कर्ष--
🔱 वेद कहते हैं— ईश्वर सखा है।
उपनिषद् कहते हैं— अभय प्राप्त होता है।
पुराण कहते हैं— ईश्वर स्वयं रक्षा करता है।
नीति-ग्रन्थ कहते हैं— धर्म रक्षक बन जाता है।
अर्थात्—
“न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन”
यह केवल वैदिक वाक्य नहीं,
सम्पूर्ण भारतीय आर्ष परम्परा का सिद्धान्त है।
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