ऋगुवेद सूक्ति--(४) की व्याख्या

सं गच्छध्वम यह प्रसिद्ध वैदिक मंत्र है—सामूहिकता और एकता का घोष 🌿
मंत्र (ऋग्वेद 10.191.2)
सं गच्छध्वं सं वदध्वं
सं वो मनांसि जानताम्।
शब्दार्थ
सं — साथ-साथ, मिलकर
गच्छध्वम् — चलो
वदध्वम् — बोलो, परामर्श करो
मनांसि — मन
जानताम् — एक-दूसरे के अनुरूप हों / एक हों
सरल अर्थ:
“तुम सब साथ-साथ चलो, साथ-साथ बोलो, और तुम्हारे मन एक-दूसरे के साथ एकरूप हों।”
भावार्थ
यह मंत्र सामाजिक, आध्यात्मिक और राष्ट्रीय जीवन—तीनों में एकता, संवाद और सामंजस्य का आदर्श रखता है। केवल साथ रहने की नहीं, बल्कि मन-विचार की एकता की प्रेरणा देता है। जहाँ विचार एक हों, वहाँ संघर्ष नहीं, सहयोग होता है।

समान भाव के अन्य प्रमाण
यजुर्वेद (40.7)
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः
— जहाँ सब प्राणियों में आत्मभाव हो जाता है, वहाँ भेद नहीं रहता।
भगवद्गीता (6.32)
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन
— जो सबको अपने समान देखता है, वही श्रेष्ठ है।
उपनिषद (ईशावास्य)
ईशावास्यमिदं सर्वम्
— सब में एक ही सत्ता का वास है।
“सं गच्छध्वं सं वदध्वं” के भाव (एकता, सामंजस्य, सामूहिक चेतना) के अन्य उपनिषदों से प्रमाण क्रमबद्ध रूप में देखिए—
1. बृहदारण्यक उपनिषद् (1.4.10)
मंत्र:
अहं ब्रह्मास्मि।
भावार्थ:
जब सबमें एक ही ब्रह्म का बोध हो जाता है, तब भेद, विरोध और वैमनस्य नहीं रहता।
यही “सं गच्छध्वम्” का दार्शनिक आधार है—एक आत्मा का अनुभव।
2. छान्दोग्य उपनिषद् (6.8.7)
मंत्र:
तत्त्वमसि श्वेतकेतो।
भावार्थ:
तू वही ब्रह्म है जो सबमें व्याप्त है।
जब यह बोध होता है, तब मन स्वतः एक-दूसरे से जुड़ते हैं—
“सं वो मनांसि जानताम्”।
3. ईशोपनिषद् (6)
मंत्र:
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति।
सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते॥
भावार्थ:
जो सब प्राणियों को अपने ही आत्मा में देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता।
यह सामूहिक सद्भाव और अहिंसक सह-अस्तित्व का उपनिषदिक प्रमाण है।
4. कठोपनिषद् (2.1.1)
मंत्र:
पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूः।
भावार्थ--
:जब मन बाह्य भेदों से हटकर अंतर्मुख होता है, तब एकत्व का अनुभव होता है।
वहीं से सच्चा सामूहिक संवाद जन्म लेता है।
5. मुण्डकोपनिषद् (2.2.5)
मंत्र:
यस्मिन्सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः।
भावार्थ:
ज्ञानी के लिए सब प्राणी आत्मस्वरूप हो जाते हैं।
यह श्लोक सीधे बताता है कि एकता बोध ही सामाजिक समरसता का मूल है।
6. मैत्रायणी उपनिषद् (6.30)
मंत्र:
एकं ह्येव सद् बहुधा कल्पयन्ति।
भावार्थ:
सत्य एक है, उसे लोग अनेक रूपों में देखते हैं।
यह मंत्र विचारों की विविधता में भी मूल एकता को स्वीकार करता है—
यही “सं वदध्वम्” की आत्मा है।
“सं गच्छध्वं सं
वदध्वं”   (एकता–सामंजस्य–सहयोग) के भाव के महाभारत, हितोपदेश, भर्तृहरि और चाणक्य से प्रमाण क्रमशः प्रस्तुत हैं—
1. महाभारत से प्रमाण
(क) उद्योगपर्व
श्लोक:
सहयोगेन सर्वार्थाः सिद्ध्यन्ति न हि केवलम्।
भावार्थ:
सब कार्य सहयोग से ही सिद्ध होते हैं, अकेले प्रयत्न से नहीं।
→ यह सीधे “सं गच्छध्वम्” का व्यवहारिक रूप है।
(ख) शान्तिपर्व
श्लोक:
एकचक्रं न वर्तेत जातु लोकस्य संस्थितिः।
भावार्थ:
एक व्यक्ति या एक विचार से समाज नहीं चलता।
समाज की स्थिरता सामूहिक समन्वय से ही संभव है।
(ग) वनपर्व
श्लोक:
भेदो विनाशकारणम्।
भावार्थ:
फूट और वैमनस्य विनाश का कारण होते हैं।
→ यही कारण है कि वेद संयुक्त चलने और बोलने का उपदेश देता है।
2. हितोपदेश से प्रमाण
(क) मित्रलाभ प्रकरण
श्लोक:
सहायः साधनं कार्यं न तु केवलमात्मनः।
भावार्थ:
कार्य की सिद्धि के लिए सहायता आवश्यक है, अकेले से नहीं।
(ख) प्रसिद्ध सूत्र
श्लोक:
एकेनापि सुवृक्षेण दह्यमानेन वानराः।
दह्यन्ते सर्व एवात्र न गुणो वृक्षसंश्रयः॥
भावार्थ:
एक की भूल से सब संकट में पड़ जाते हैं—
इसलिए सामूहिक विवेक और संवाद आवश्यक है।
3. भर्तृहरि (नीतिशतकम्) से प्रमाण-
(क) सत्सङ्गत्वे निस्सङ्गत्वं निस्सङ्गत्वे निर्मोहत्वम्।
भावार्थ:
सज्जनों का संग मन को शुद्ध करता है।
जब मन शुद्ध और एकरूप हो, तभी सं वो मनांसि जानताम् साकार होता है।
(ख) परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।
(गीता में भी समान भाव)
भावार्थ:
परस्पर सहयोग से ही परम कल्याण प्राप्त होता है।
4. चाणक्य (चाणक्यनीति) से प्रमाण
(क) सुखस्य मूलं धर्मः धर्मस्य मूलं अर्थः।
अर्थस्य मूलं राज्यं राज्यस्य मूलं इन्द्रियजयः॥
भावार्थ:
राज्य और समाज की नींव नियंत्रित, संगठित और समन्वित जीवन है।
(ख) एकः शत्रुर्न हन्तव्यः सहस्रैः सह योद्धुकामः।
भावार्थ:
एक संगठित समूह अकेले शक्तिशाली व्यक्ति से भी बलवान होता है।
यह सामूहिक शक्ति का स्पष्ट प्रमाण है।
(ग) प्रसिद्ध नीति-वाक्य:
संघशक्तौ कलियुगे।
भावार्थ:
कलियुग में शक्ति का आधार संघ और एकता है।
समग्र निष्कर्ष
वेद → उपनिषद → महाभारत → नीति-ग्रंथ
सब एक स्वर में कहते हैं—
विचार में एकता,
वाणी में समन्वय,
और कर्म में सहयोग —
अब पुराणों से प्रमाण प्रस्तुत है, जो सीधे “सं गच्छध्वं सं वदध्वं” (एकता, सामूहिकता, परस्पर-सहयोग) के भाव को पुष्ट करते हैं।
1. भागवत पुराण से प्रमाण
(क) स्कन्ध -4
श्लोक:
परस्परानुभावेन भवत्यैक्यमनोरथः।
भावार्थ:
परस्पर सहयोग और समझ से ही मन की एकता उत्पन्न होती है।
→ यह स्पष्ट रूप से “सं वो मनांसि जानताम्” का पुराणीय प्रमाण है।
(ख) स्कन्ध- 11 (उद्धव गीता)
सङ्गो हि धर्मसम्पत्तेः कारणं परमं स्मृतम्।
भावार्थ:
सज्जनों का संग ही धर्म और उन्नति का मूल कारण है।
→ संग = साथ चलना, साथ बोलना।
2. विष्णु पुराण से प्रमाण
(क) समाजो हि महाबाहो धर्मस्यायतनं स्मृतम्।
भावार्थ: धर्म का वास्तविक आधार संगठित समाज है, अकेला व्यक्ति नहीं।
(ख) परस्परहितं कर्म लोकस्य स्थैर्यकारणम्।
भावार्थ:
परस्पर हित का आचरण ही समाज की स्थिरता का कारण है।
3. मार्कण्डेय पुराण से प्रमाण
एकभावसमायुक्ता जयन्ते सर्वकर्मसु।
भावार्थ:
जो लोग एक भाव से युक्त होते हैं, वे हर कार्य में विजय पाते हैं।
4. पद्म पुराण से प्रमाण:
नैकस्य तपसा सिद्धिर्नैकस्य ज्ञानतो जयः।
सङ्घेनैव महत्कर्म साध्यते नात्र संशयः॥
भावार्थ:
न केवल तप से, न केवल ज्ञान से
महान कार्य संघ (एकता) से ही सिद्ध होते हैं।
5. अग्नि पुराण से प्रमाण:
भेदो नाशाय विज्ञेयः सङ्घो रक्षाय कीर्तितः।
भावार्थ:
फूट विनाश का कारण है, और संघ रक्षा तथा उन्नति का।
6. ब्रह्म पुराण से प्रमाण
एकचित्ताः समायुक्ता लोकान् धारयन्ति ते।
भावार्थ:
एक चित्त से युक्त लोग ही लोक (समाज) को संभालते हैं।
निष्कर्ष (पुराणीय दृष्टि)
पुराण स्पष्ट कहते हैं—
संघ = शक्ति
भेद = विनाश
एकचित्तता = धर्म, विजय और लोक-कल्याण
यही वैदिक मंत्र “सं गच्छध्वं सं वदध्वं” का
पुराणों में विकसित सामाजिक रूप है।
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