ऋगुवेद सूक्ति (3) की व्याख्या--

न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः।
        ऋगुवेद--4/33/11
भावार्थ --देवता श्रम करने वाले के अतिरिक्त किसी और से मित्रता नहीं करते।
अर्थात देवता उसी का साथ देते हैं जो श्रमशील है।
अन्य ग्रन्थों से प्रमाण--
१-- श्रीमद्भगवद्गीता
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
(गीता 6/5)
भावार्थ –
मनुष्य को अपने प्रयास से अपना उद्धार करना चाहिए, अपने को पतन में नहीं डालना चाहिए।
 यहाँ ईश्वर मनुष्य को स्वयं उठने की प्रेरणा देता हैं। नीचे उपनिषदों से इसी भाव के स्पष्ट प्रमाण के श्लोक भावार्थ सहित प्रस्तुत हैं।
(२) उपनिषद से--
(क) कठोपनिषद्--
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
(कठोपनिषद् 1.3.14)
अर्थ –
उठो, जागो और श्रेष्ठ आचार्यों को प्राप्त कर तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करो।
 आत्मोद्धार के लिए स्वयं का प्रयास अनिवार्य है।
(क) मुण्डकोपनिषद्--
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो
न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः
तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूँ स्वाम्॥
(मुण्डक 3/2/3)
अर्थ –
यह आत्मा (परमात्मा) केवल उपदेश, बुद्धि या बहुत सुनने से नहीं मिलती; जिसे यह आत्मा (परमात्मा) चुनती है, उसी को प्राप्त होती है।
 चयन का अधिकारी वही है जो साधना करता है।
(ग). ईशोपनिषद्-
कुर्वन्नेवेह कर्माणि
जिजीविषेच्छतं समाः।
(ईशोपनिषद्-- 2)
अर्थ –
इस संसार में कर्म करते हुए ही
सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए।
 कर्म करते हुए ही मुक्ति का मार्ग बताया गया है।
(घ) बृहदारण्यक उपनिषद्--
आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः
श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।
(बृहदारण्यक 2.4.5)
अर्थ –
आत्मा को देखना, सुनना, मनन करना
और गहन ध्यान करना चाहिए।
 ज्ञान प्रयत्नसाध्य बताया गया है।
(च) छान्दोग्य उपनिषद्--
आचार्यात् पादमादत्ते
पादं शिष्यः स्वमेधया।
(छान्दोग्य 4.9.3)
अर्थ –
एक भाग ज्ञान आचार्य से ग्रहण करता है और एक भाग ज्ञान शिष्य अपने श्रम से अर्जित करता है।
३- महाभारत
न दैवमधिकं तेषां ये स्वकर्मरताः नराः।
(महाभारत, उद्योगपर्व)
अर्थ –
जो मनुष्य अपने कर्म में लगे रहते हैं, उनके लिए भाग्य से बढ़कर कुछ नहीं होता।
 कर्मशील व्यक्ति का भाग्य वही बन जाता है।
४- हितोपदेश
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
दैवं हि दैवमिति कापुरुषाः वदन्ति।
अर्थ –
लक्ष्मी (सफलता) उद्योगी पुरुष के पास जाती है;
“सब कुछ भाग्य है” — ऐसा कायर लोग कहते हैं।
५-- चाणक्य नीति
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।
अर्थ –
सोए हुए सिंह के मुख में हिरण स्वयं नहीं आते।
बिना प्रयास फल स्वयं नहीं मिलता।
६- भर्तृहरि (नीतिशतक)
उद्योगेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अर्थ –
कार्य उद्योग से सिद्ध होते हैं, केवल इच्छाओं से नहीं।
सोए सिंह के मुख में शिकार नहीं आता।
७- श्रीमद्भागवत महापुराण
तस्माद् भारत सर्वात्मा
भगवान् ईश्वरो हरिः।
श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च
स्मर्तव्यश्चेच्छता भयम्॥
(भागवत 2.1.5)
अर्थ –
जो भय से मुक्त होना चाहता है, उसे
सुनना, स्मरण करना और अभ्यास करना चाहिए।
अवश्य। नीचे अन्य पुराणों से उसी भाव के प्रमाण श्लोक अर्थ सहित दे रहा हूँ —
भाव यही है: “पुरुषार्थ के बिना केवल दैव (भाग्य/ईश्वर) पर आश्रय निष्फल है।”
८- अन्य पुराण से--
(क) विष्णु पुराण
न दैवमेकं पुरुषार्थहीनं
फलप्रदं लोकविदो वदन्ति।
अर्थ –
लोकज्ञ लोग कहते हैं कि
केवल दैव (भाग्य) अकेला फल देने वाला नहीं है,
यदि पुरुषार्थ न हो।
(ख)- मार्कण्डेय पुराण
पुरुषार्थविहीनस्य
दैवं नैवोपतिष्ठते।
अर्थ –
जो पुरुषार्थ से रहित है,
उसके पास दैव भी नहीं ठहरता।
(ग) -ब्रह्मपुराण
उद्योगेन हि सिद्ध्यन्ति
न कार्याणि मनोरथैः।
अर्थ –
कार्य उद्योग (प्रयास) से सिद्ध होते हैं,
केवल इच्छा से नहीं।
(घ)- वायु पुराण
दैवं पुरुषकारेण
लभ्यते नात्र संशयः।
अर्थ –
दैव पुरुषार्थ से ही प्राप्त होता है,
इसमें कोई संशय नहीं।
(च)-- पद्म पुराण
न हि दैवं विनोद्योगं
सिद्ध्यते कार्यसाधनम्।
अर्थ –
उद्योग के बिना
दैव भी कार्य की सिद्धि नहीं करता।
(च)-- गरुड़ पुराण
कर्मणा जायते सिद्धिः
कर्मणा जायते श्रियः।
अर्थ –
कर्म से सिद्धि उत्पन्न होती है,
कर्म से ही समृद्धि आती है।
(ज)-- स्कन्द पुराण
स्वकर्मणा हि पुरुषो
दैवं संप्राप्नुते ध्रुवम्।
अर्थ –
मनुष्य अपने कर्म के द्वारा
निश्चय ही दैव को प्राप्त करता है।
सार-वाक्य
पुराणों का निष्कर्ष स्पष्ट है —
दैव कर्म से जुड़कर ही फल देता है,
कर्महीन के लिए दैव भी निष्फल है।
 केवल विश्वास नहीं, साधना (कर्म) आवश्यक है।
 निष्कर्ष--
वेद–गीता–पुराण–नीति सभी का एक ही संदेश है —
कर्म के बिना कृपा नहीं,
श्रम के बिना सिद्धि नहीं।


 ऋग्वेद (4/33/11) का भाव है कि ईश्वर/देवता उसी का साथ देते हैं जो पुरुषार्थ (मेहनत) करता है।
अब इसी भाव—“मेहनत करने वाले का साथ ईश्वर देता है”—का इस्लामिक ग्रंथ क़ुरआन और हदीस में प्रमाण-- 
 1. प्रयास के अनुसार ही फल
सूरह अन-नज्म (53:39)
وَأَنْ لَيْسَ لِلْإِنْسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
 अर्थ: मनुष्य के लिए वही है जिसके लिए वह प्रयास (मेहनत) करता है।
 2. स्वयं प्रयास से परिवर्तन
सूरह अर-रعد 
(13:11)
إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتَّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْ
 अर्थ: अल्लाह किसी क़ौम की हालत नहीं बदलता, जब तक वे खुद अपनी हालत न बदलें।
 3. प्रयास करने वालों को मार्गदर्शन
सूरह अल-अनकबूत (29:69)
وَالَّذِينَ جَاهَدُوا فِينَا لَنَهْدِيَنَّهُمْ سُبُلَنَا
 अर्थ: जो लोग हमारी राह में प्रयास (संघर्ष) करते हैं, हम उन्हें अपने रास्ते दिखाते हैं।
 4. भरोसा + प्रयास (हदीस)
जामिअ तिर्मिज़ी
एक व्यक्ति ने पूछा:
"أَعْقِلُهَا وَأَتَوَكَّلُ أَمْ أُطْلِقُهَا وَأَتَوَكَّلُ؟"
(क्या मैं ऊँट को बाँधूँ और भरोसा करूँ, या खुला छोड़ दूँ?)
नबी ﷺ ने कहा:
"اعْقِلْهَا وَتَوَكَّلْ"
 अर्थ: पहले ऊँट को बाँधो (प्रयास करो), फिर अल्लाह पर भरोसा करो।
 निष्कर्ष--
कुरआन और हदीस का स्पष्ट संदेश है:
 मेहनत (سعي / جهاد) के बिना फल नहीं मिलता
 अल्लाह उसी की सहायता करता है जो स्वयं प्रयास करता है
 भरोसा (तवक्कुल) के साथ कर्म (उद्यम) आवश्यक है
इस प्रकार इस्लामिक शिक्षाएँ भी उसी सिद्धांत को स्थापित करती हैं जो ऋग्वेद में कहा गया है।
अब इसी सिद्धांत का प्रमाण गुरु ग्रंथ साहिब से देखें:
गुरु ग्रन्थ साहेब में प्रमाण-- 
 1. मेहनत (किरत) का महत्व
"ਘਾਲਿ ਖਾਇ ਕਿਛੁ ਹਥਹੁ ਦੇਇ। ਨਾਨਕ ਰਾਹੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸੇਇ॥"
(अंग 1245)
 अर्थ: जो व्यक्ति मेहनत करके कमाता है और उसमें से बांटता है, वही सही मार्ग को पहचानता है।
 यह स्पष्ट करता है कि ईश्वर की कृपा और सच्चा मार्ग मेहनती व्यक्ति को ही मिलता है।
 2. कर्म और प्रयास का सिद्धांत
"ਕਰਮੀ ਆਪੋ ਆਪਣੀ ਕੇ ਨੇੜੈ ਕੇ ਦੂਰਿ॥"
(जपुजी साहिब)
 अर्थ: हर व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार ही ईश्वर के निकट या दूर होता है।
यानी बिना कर्म/प्रयास के ईश्वर से निकटता संभव नहीं।
 3. नाम और कर्म का संबंध
"ਉਦਮੁ ਕਰੇਦਿਆ ਜੀਉ ਤੂੰ ਕਮਾਵਦਿਆ ਸੁਖ ਭੁੰਚੁ॥"
 अर्थ: हे जीव! उद्यम (मेहनत) कर, कर्म कर, तभी सुख प्राप्त होगा।
 यह सीधा संदेश है कि परिश्रम करने से ही फल और ईश्वर की कृपा मिलती है।
 निष्कर्ष
सिक्ख धर्म का मूल सिद्धांत भी यही है:
 “ਕਿਰਤ ਕਰੋ (Kirat Karo)” — यानी मेहनत करो
 ईश्वर (वाहेगुरु) उसी का साथ देता है जो कर्म और उद्यम करता है।
इस प्रकार गुरु ग्रंथ साहिब भी उसी सत्य को स्थापित करता है जो ऋग्वेद में कहा गया है।
आपके द्वारा उद्धृत ऋग्वेद (4/33/11) का भाव—“ईश्वर मेहनत करने वाले का साथ देता है”—का प्रमाण बाइबिल में भी स्पष्ट रूप से मिलता है।
बाइबिल में प्रमाण-- 
 1. परिश्रम का सिद्धांत
2 Thessalonians 3:10
"If anyone is not willing to work, let him not eat."
 अर्थ: जो काम (मेहनत) नहीं करता, वह खाने का अधिकारी नहीं है।
 2. जैसा कर्म, वैसा फल
Galatians 6:7
"Whatever a man sows, that he will also reap."
 अर्थ: मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है।
 3. मेहनत से ही लाभ
Proverbs 14:23
"All hard work brings a profit, but mere talk leads only to poverty."
 अर्थ: हर मेहनत लाभ देती है, केवल बातें करने से निर्धनता आती है।
 4. परिश्रमी बनाम आलसी
Proverbs 10:4
"Lazy hands make for poverty, but diligent hands bring wealth."
 अर्थ: आलस्य निर्धनता लाता है, परिश्रम समृद्धि देता है।
 5. कर्म के साथ विश्वास
James 2:17
"Faith by itself, if it is not accompanied by action, is dead."
 अर्थ: केवल विश्वास पर्याप्त नहीं, कर्म (मेहनत) भी आवश्यक है।
 निष्कर्ष
बाइबिल का स्पष्ट संदेश है:
ईश्वर उसी का साथ देता है जो परिश्रम और कर्म करता है
केवल विश्वास या इच्छा नहीं, बल्कि action (कार्य/मेहनत) जरूरी है
इस प्रकार बाइबिल भी वही सिद्धांत प्रस्तुत करती है जो ऋग्वेद में कहा गया है—
परिश्रम करने वाला ही सफलता और ईश्वर की कृपा प्राप्त करता है।
ऋग्वेद (4/33/11) के अनुसार “पुरुषार्थ (मेहनत) करने वाले का ही कल्याण होता है”—जैन धर्म में भी मिलता है।
जैन ग्रंथों से प्रमाण---
1. उत्तराध्ययन सूत्र
"अप्पा कत्ता विकत्ता य, दुहाणं सुखाणं च।"
 अर्थ:
मनुष्य स्वयं ही अपने सुख-दुःख का कर्ता है।
यानी अपने कर्म (प्रयास) से ही फल मिलता है।
2. आचारांग सूत्र
"अप्पा सो परम गुरु"
 अर्थ:
स्वयं (आत्मा) ही अपना सर्वोच्च गुरु है।
 अर्थात् व्यक्ति को अपने प्रयास से ही आगे बढ़ना होता है।
3. जैन सिद्धांत (सार)
 “कर्म सिद्धांत”
जैसा कर्म → वैसा फल
कोई बाहरी ईश्वर फल देने वाला नहीं।
स्वयं का पुरुषार्थ ही उद्धार का कारण है।
 निष्कर्ष--
जैन धर्म का स्पष्ट संदेश:
 स्वयं प्रयास (पुरुषार्थ) ही सब कुछ है।
मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु है।
 बिना मेहनत के कोई कल्याण नहीं।
 इस प्रकार जैन दर्शन भी वही सिद्धांत स्थापित करता है जो ऋग्वेद में कहा गया है—
परिश्रम करने वाला ही उन्नति और कल्याण प्राप्त करता है।
बौद्ध धर्म ग्रन्थों में प्रमाण-- 
1. धम्मपद (श्लोक 160)
अत्ता हि अत्तनो नाथो, को हि नाथो परो सिया।
अत्तना हि सुदन्तेन, नाथं लभति दुल्लभं॥
 अर्थ: मनुष्य स्वयं ही अपना सहारा है — अपने प्रयास से ही उन्नति होती है।
2. धम्मपद (श्लोक 165)
अत्तना हि कतम् पापं, अत्तना सङ्किलिस्सति।
अत्तना अकतं पापं, अत्तनाव विसुज्झति॥
अर्थ: मनुष्य अपने कर्मों से ही दूषित और शुद्ध होता है।
3. धम्मपद (श्लोक 276)
तुम्हेहि किच्चं आतप्पं, अक्खातारो तथागता।
पटिपन्ना पमोख्खन्ति, झायिनो मारबन्धना॥
 अर्थ: तुम्हें स्वयं प्रयास करना है; बुद्ध केवल मार्ग बताते हैं।
 निष्कर्ष--
 मूल पाली वचन स्पष्ट कहते हैं:
“स्वयं प्रयास (उद्यम) ही मुक्ति और सफलता का कारण है”
 इस प्रकार बौद्ध धर्म भी वही सिद्धांत स्थापित करता है—
परिश्रम करने वाला ही कल्याण प्राप्त करता है।
ऋग्वेद में कहा गया है।
 ऋग्वेद (4/33/11) का भाव—“ईश्वर परिश्रम करने वाले का साथ देता है”—का समर्थन यहूदी धर्मग्रंथों में भी मिलता है। 
तनाख (विशेषकर तोराह और नीतिवचन आदि से प्रमाण-- 
1. मेहनत का फल
Proverbs 14:23
"In all toil there is profit, but mere talk tends only to poverty."
 अर्थ: हर परिश्रम में लाभ है, केवल बातें करने से निर्धनता आती है।
 2. परिश्रमी बनाम आलसी
Proverbs 10:4
"A slack hand causes poverty, but the hand of the diligent makes rich."
 अर्थ: आलसी निर्धन होता है, परिश्रमी समृद्ध होता है।
 3. अपने श्रम का फल
Psalm 128:2
"You shall eat the fruit of the labor of your hands; you shall be blessed, and it shall be well with you."
 अर्थ: जो अपने हाथों के परिश्रम से कमाता है, वही सुख और आशीर्वाद पाता है।
 4. कर्म के साथ ईश्वर की सहायता
Proverbs 16:3
"Commit your work to the Lord, and your plans will be established."
 अर्थ: अपने कार्य (प्रयास) ईश्वर को समर्पित करो, तब सफलता मिलेगी।
 निष्कर्ष
तनाख का स्पष्ट संदेश है:
 परिश्रम (toil / labor) के बिना सफलता नहीं
 ईश्वर उसी के कार्य को स्थापित करता है जो स्वयं प्रयास करता है
 केवल इच्छा नहीं, बल्कि work (मेहनत) आवश्यक है।
इस प्रकार यहूदी धर्म भी वही सिद्धांत प्रस्तुत करता है जो ऋग्वेद में कहा गया है—
परिश्रम करने वाला ही ईश्वर की कृपा और सफलता का अधिकारी होता है।
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