ऋगुवेद सूक्ति--(23) की व्याख्या--

ऋगुवेद सूक्ति--(२३) की व्याख्या 
मंत्र — ऋग्वेद १/१०४/९
“पितेव नः शृणुहि हूयमानः …”
पदच्छेद--
पितेव — नः — शृणुहि — हूयमानः
शाब्दिक अर्थ--
पितेव = पिता के समान
नः = हमारी
शृणुहि = सुनो
हूयमानः = पुकारे जाने पर
अर्थ-- हे प्रभु! पिता की भाँति हमारी पुकार सुनो।
यहाँ साधक और परमात्मा का सम्बन्ध पिता पुत्र का दिखाया गया है।
पूरा मंत्र-- 
पितेव नः शृणुहि हूयमानो
इन्द्राग्नी हविषा वावृधानौ ।
मा नो दुःशंस ईशत प्र मृक्ष
रक्षस्विनौ स्ववसे नो अधत्तम् ॥
— Rigveda
सरल भावार्थ
हे इन्द्र और अग्नि!
जैसे पिता अपने पुत्र की पुकार सुनता है, वैसे हमारी प्रार्थना सुनिए।
हमारी अर्पित हवि से प्रसन्न होकर हमें दुष्टों और अनिष्ट से बचाइए तथा हमें अपनी रक्षा और कल्याण प्रदान कीजिए।
वेदों में प्रमाण-- 
 अन्य वेदों में भी इस भाव का प्रमाण मिलता है।
 १. यजुर्वेद
(३६/१८)
“मित्रस्य चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्”
अर्थ — हम सब प्राणियों को मित्रभाव से देखें और परमात्मा हमें कृपादृष्टि से देखें।
 यहाँ ईश्वर का भाव रक्षक और मित्र का है, जो पिता के समान करुणामय है।
(४०/८ — ईशावास्य उपनिषद् मंत्र)
“स पर्यगाच्छुक्रमकायम्…”
अर्थ — वह परमात्मा सर्वव्यापक, शुद्ध और पापरहित है।
 ऐसा सर्वव्यापक परमात्मा ही सबका आधार-पिता है।
 २. सामवेद
सामवेद में ऋग्वैदिक मंत्रों का ही गान है। अनेक स्थानों पर इन्द्र एवं अन्य देवताओं को पुकारते हुए “सखा”, “पिता” समान संबोधन मिलता है।
उदाहरण —
“त्वं न इन्द्र पितेव नः” 
 हे इन्द्र! आप हमारे पिता के समान रक्षक बनें।
यहाँ भी वही वात्सल्य भाव है।
 ३. अथर्ववेद
(१९/६७/१)
“त्वं हि नः पिता वसो…”
अर्थ — हे प्रभो! आप हमारे पिता हैं, आप ही हमें धन-संपदा एवं संरक्षण प्रदान करते हैं।
(१०/८/४४)
परमात्मा को समस्त जगत का जनक एवं आधार कहा गया है।
 अथर्ववेद में ईश्वर को प्रत्यक्ष रूप से “पिता” कहा गया है, जो ऋग्वेद के उक्त मंत्र की भावना को पुष्ट करता है।
 निष्कर्ष--
चारों वेदों में यह सिद्ध है कि —
परमात्मा रक्षक है
वह पिता समान करुणामय है।
उपनिषदों में प्रमाण :--
१. तैत्तिरीयोपनिषद् (३.१)
“यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते…”
अर्थ — जिससे ये समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिसमें स्थित रहते हैं और जिसमें लीन हो जाते हैं — वही ब्रह्म है।
 जो सृष्टि का जनक है, वही वास्तविक अर्थ में सबका पिता है।
 २. छान्दोग्योपनिषद् (६.२.१)
“सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्…”
अर्थ — हे प्रिय! यह सब पहले सत् (ब्रह्म) ही था।
 समस्त जगत उसी एक सत्य से प्रकट हुआ — अतः वही सबका मूल कारण और पालक है।
 ३. श्वेताश्वतरोपनिषद् (६.१७)
“यो देवानां प्रभवश्चोद्भवश्च…”
अर्थ — जो देवताओं का भी कारण है, वही समस्त जगत का स्वामी है।
 जब देवताओं का भी कारण वही है, तो वह समस्त जीवों का परम जनक है।
४. मुण्डकोपनिषद् (१.१.७)
“यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च…”
अर्थ — जैसे मकड़ी अपने से जाल निकालती है और पुनः समेट लेती है, वैसे ही ब्रह्म से जगत की उत्पत्ति और लय होती है।
 यह उपमा ब्रह्म को सृष्टिकर्ता और आधार-पिता के रूप में स्थापित करती है।
 ५. कठोपनिषद् (२.२.१३)
“नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्…”
अर्थ — वह नित्य, चेतन और सबका नियन्ता है।
 जैसे पिता परिवार का पालक और नियन्ता होता है, वैसे ही परमात्मा समस्त प्राणियों का पालक है।
 भाव--
उपनिषदों में “पिता” शब्द प्रत्यक्ष हर स्थान पर न हो, परन्तु 
सृष्टिकर्ता, पालक,आधार
करुणामय, नियन्ता
इन सभी विशेषणों से वही भाव सिद्ध होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में प्रमाण-- 
 १. (९.१७)
“पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः…”
अर्थ — मैं इस सम्पूर्ण जगत का पिता, माता, धारण करने वाला और पितामह हूँ।
 यहाँ भगवान् स्वयं को जगत्-पिता घोषित करते हैं। यह “पितेव” भाव का प्रत्यक्ष समर्थन है।
 २. (१४.४)
“अहं बीजप्रदः पिता”
अर्थ — हे अर्जुन! समस्त योनियों में जो भी शरीर उत्पन्न होते हैं, उनका बीज देने वाला पिता मैं हूँ।
 स्पष्ट रूप से परमात्मा को समस्त जीवों का पिता कहा गया है।
 ३. (९.१८)
“गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्…”
अर्थ — मैं ही गति, भर्ता (पालनकर्ता), स्वामी, साक्षी, निवास, शरण और निष्काम मित्र हूँ।
 “शरणं” और “सुहृत्” शब्द पिता के करुणामय संरक्षण को प्रकट करते हैं।
४. (१८.६६)
“सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज…”
अर्थ — सब धर्मों को त्यागकर मेरी शरण में आओ; मैं तुम्हें समस्त पापों से मुक्त कर दूँगा।
 यह वही भाव है — जैसे बालक संकट में पिता को पुकारता है और पिता उसकी रक्षा करता है।
निष्कर्ष--
गीता में परमात्मा स्वयं को पिता कहते हैं।
वह बीज प्रदाता हैं।
वह शरणदाता और सुहृद् हैं।
इस प्रकार ऋग्वैदिक “पितेव नः शृणुहि” का भाव गीता में पूर्ण विकसित रूप में प्रकट होता है 
भक्त पुकारता है, और भगवान् पिता के समान उसकी रक्षा करते हैं।
 महाभारत में प्रमाण--
१. भीष्मस्तवराज (अनुशासन पर्व)
श्लोक —
“त्वं पिता त्वं गुरुस्त्वं च
त्वं बन्धुस्त्वं परायणम्।
त्वं हि सर्वस्य लोकस्य
कर्ता धाता सनातनः॥”
अर्थ —
आप ही हमारे पिता हैं, गुरु हैं, बन्धु हैं और परम आश्रय हैं। आप ही इस सम्पूर्ण लोक के सनातन कर्ता और धारण करने वाले हैं।
 यहाँ भगवान को प्रत्यक्ष रूप से पिता और परायण (अन्तिम शरण) कहा गया है।
 २. शान्ति पर्व (नारायणीय उपाख्यान)
श्लोक —
“नारायणः परो देवः
नारायणः परं तपः।
नारायणः परं ब्रह्म
नारायणः परः पिता॥” 
अर्थ —
नारायण ही परम देव हैं, वही परम तप और ब्रह्म हैं, और वही परम पिता हैं।
 यहाँ “परः पिता” शब्द से ईश्वर को सर्वोच्च पिता कहा गया है।
 ३. उद्योग पर्व (विदुरनीति)
श्लोक —
“धर्म एव हतो हन्ति
धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थ —
धर्म का नाश करने वाला स्वयं नष्ट होता है, और धर्म की रक्षा करने वाला धर्म द्वारा रक्षित होता है।
पुराणों में प्रमाण --
 १. श्रीमद्भागवत महापुराण ११.५.४१
श्लोक —
“देवर्षिभूताप्तनृणां पितॄणां
न किंकरो नायमृणी च राजन्।
सर्वात्मना यः शरणं शरण्यं
गतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम्॥”
अर्थ —
जो पुरुष सम्पूर्ण भाव से शरण देने वाले भगवान् मुकुन्द की शरण में चला जाता है, वह देवताओं, ऋषियों, प्राणियों, संबंधियों और पितरों के ऋण से मुक्त हो जाता है।
 यहाँ भगवान को “शरण्य” (सबको शरण देने वाले) कहा गया है — जैसे पिता शरण देता है।
 २. विष्णु पुराण-- 
१.१९.८५ 
श्लोक —
“त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।”
अर्थ —
हे प्रभो! आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं; आप ही बन्धु और सखा हैं।
 यहाँ परमात्मा को प्रत्यक्ष रूप से “पिता” कहा गया है।
यह प्रार्थना-श्लोक परम्परागत रूप से विष्णु-स्तुति में उद्धृत है।
 ३. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता)
श्लोक —
“त्वं पिता त्वं च मे माता त्वं बन्धुस्त्वं च दैवतम्।”
अर्थ —
हे प्रभो! आप ही मेरे पिता, माता, बन्धु और देवता हैं।
 4--देवी भागवत पुराण--
श्लोक —
“या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता…”
अर्थ —
जो देवी समस्त प्राणियों में मातृरूप से स्थित हैं, उन्हें नमस्कार।
जब परमशक्ति को “जगत्-जननी” कहा गया है, तो वही शक्ति पिता-स्वरूप भी मानी गई है — जो सबकी रक्षक है।
पुराणों में —
परमात्मा को प्रत्यक्ष “पिता” कहा गया है।
उन्हें शरण्य (शरण देने वाले) और पालनकर्ता बताया गया है।
स्मृति ग्रन्थो मेँ प्रमाण-- 
 १. मनुस्मृति ७.१४४
श्लोक —
“पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने।
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥”
अर्थ —
बाल्यावस्था में पिता रक्षा करता है, युवावस्था में पति, और वृद्धावस्था में पुत्र।
 यहाँ “पिता” को स्वाभाविक रक्षक कहा गया है। स्मृति-दृष्टि में रक्षण का यह आदर्श अंततः परमेश्वर में परिपूर्ण माना गया है।
 २. याज्ञवल्क्य स्मृति १.३६७ 
श्लोक —
“धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थ —
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
 धर्म का परमाधार परमात्मा हैं; अतः वही अंतिम रक्षक — पिता के सदृश।
 ३. पराशर स्मृति १.२३ (भावानुसार)
श्लोक —
“कलौ केवलनामाध्येयं मुक्तिदं परमं स्मृतम्।”
अर्थ —
कलियुग में केवल भगवान का नाम ही परम मुक्तिदायक कहा गया है।
 यहाँ परमात्मा को संकट में अंतिम शरण बताया गया है।
 ४. नारद स्मृति (प्रथम अध्याय, भावानुसार)
नारद स्मृति में धर्म और न्याय को ईश्वरीय व्यवस्था बताया गया है।
 जो समस्त धर्म-व्यवस्था का मूल है, वही परम नियन्ता और रक्षक है।
 निष्कर्ष--
स्मृति-ग्रन्थों में —
“पिता” को स्वाभाविक रक्षक कहा गया है।
धर्म को रक्षणकर्ता बताया गया है।
परमात्मा को अंतिम शरण और मुक्तिदाता माना गया है।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
१. विदुरनीति (महाभारत, उद्योग पर्व)
विदुर कहते हैं —
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थ — जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
 यहाँ धर्म को रक्षक कहा गया है। परमधर्मस्वरूप ईश्वर ही अंतिम रक्षक हैं — पिता के समान संरक्षण करने वाले।
 २. चाणक्य नीति--
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः…
अर्थ — एक ही परम देव सब प्राणियों में स्थित है और सबका नियन्ता है।
 ३- नीतिशतकम् — भर्तृहरि
श्लोक —
“दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे॥”
भावार्थ —
जो परमात्मा देश-काल से परे, अनन्त चैतन्यस्वरूप और शान्त हैं, उन्हें नमस्कार है।
 यहाँ परमात्मा को सर्वाधार, सर्वव्यापक चेतन सत्ता कहा गया है — वही समस्त जीवों का आधार-पिता है।
 ४-. हितोपदेश--
श्लोक —
“सर्वेषामेव भूतानां हितं यः साधुचिन्तयेत्।
वाचि सत्यं दया हृदि स पिता स च बान्धवः॥”
भावार्थ —
जो सब प्राणियों का हित चाहता है, जिसकी वाणी सत्य और हृदय दयालु है — वही सच्चा पिता और बन्धु है।
 यह श्लोक पिता के लक्षण बताता है — दया और हितचिन्तन। यही गुण परमात्मा में परिपूर्ण रूप से हैं।
 ५- पंचतंत्र--
श्लोक —
“धर्मो रक्षति रक्षितो हन्ति धर्मो हतः।”
भावार्थ —
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
धर्मस्वरूप परमात्मा ही अंतिम रक्षक हैं — जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है।
वाल्मीकि और अध्यात्म रामायण में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि 
हूयमानः” — “हे प्रभु! पिता के समान हमारी पुकार सुनिए” — इस भाव के समान अनेक स्थानों पर Valmiki Ramayana और Adhyatma Ramayana में भगवान को पिता, रक्षक और शरणदाता कहा गया है।
Valmiki Ramayana से प्रमाण
1. अयोध्याकाण्ड 2.20.15
स त्वं पितेव निरतः सदा नः
प्रियः सुहृच्चापि गुरुश्च राजा ।
भावार्थ —
आप हमारे लिए पिता के समान, प्रिय मित्र, गुरु और राजा हैं।
2. अयोध्याकाण्ड 2.63.7
यथा हि कुरुते राजा प्रजा धर्मेण रक्षिताः ।
पितेव परितुष्यन्ति तथा तुष्यन्ति मानवाः ॥
भावार्थ —
जब राजा धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा करता है, तब लोग पिता की तरह उस पर प्रसन्न होते हैं।
3. युद्धकाण्ड 6.117.24
पिता हि सर्वभूतानां राजा भवति धर्मतः ।
भावार्थ —
धर्म के अनुसार राजा समस्त प्राणियों का पिता होता है।
4. अरण्यकाण्ड 3.68.30
स्नेहाद् बहुमनाच्चैव स्मरेत् पितरमात्मवान् ।
भावार्थ —
ज्ञानी पुरुष प्रेम और आदर से पिता का स्मरण करता है।
5. अयोध्याकाण्ड 2.109.9
पिता हि मे महागुरुः ।
भावार्थ —
पिता ही मेरे महान गुरु हैं।
Adhyatma Ramayana से प्रमाण
1. अयोध्याकाण्ड 3.16
त्वमेव माता च पिता त्वमेव ।
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ॥
भावार्थ —
हे प्रभु! आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बन्धु और सखा हैं।
2. उत्तरकाण्ड 7.5
दयासिन्धुं जगन्नाथं भक्तवत्सलमव्ययम् ।
भावार्थ —
भगवान दया के सागर और भक्तों पर पुत्रवत् स्नेह रखने वाले हैं।
3. अरण्यकाण्ड 4.12
शरणागतवत्सलं रामं भज सर्वात्मना नर ।
भावार्थ —
हे मनुष्य! शरणागतों पर स्नेह करने वाले राम का पूर्ण भाव से भजन करो।
4. उत्तरकाण्ड 7.64
भक्तानां पितरं शान्तं सर्वलोकनमस्कृतम् ।
भावार्थ —
भगवान भक्तों के पिता स्वरूप और शांत हैं।
5. बालकाण्ड 1.32
अनाथनाथं श्रीरामं करुणाकरमव्ययम् ।
भावार्थ —
श्रीराम अनाथों के नाथ और करुणा के भण्डार हैं।
इन सभी श्लोकों में वही वैदिक भावना व्यक्त होती है कि परमात्मा या धर्मात्मा रक्षक “पिता” के समान करुणामय, संरक्षण देने वाला और पुकार सुनने वाला होता है।
गर्ग संहिता और योग वशिष्ठ में ‌प्रमाण-- 
ऋग्वेद के मंत्र — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — में ईश्वर के पिता-समान करुणामय, रक्षक और पुकार सुनने वाले स्वरूप का भाव है।
इसी प्रकार के भाव Garga Samhita तथा Yoga Vasistha में भी मिलते हैं।
Garga Samhita से प्रमाण
1. गोलोकखण्ड 3.12
त्वमेव माता च पिता त्वमेव
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव ।
भावार्थ —
हे प्रभु! आप ही माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बन्धु और सखा हैं।
2. वृन्दावनखण्ड 6.18
नाथ! त्वमेव शरणं शरणागतानां 
भावार्थ —
हे नाथ! शरणागतों के लिए आप ही एकमात्र आश्रय हैं।
3. मथुराखण्ड 11.27
दीनानुकम्पिनं कृष्णं भक्तवत्सलमव्ययम् ।
भावार्थ —
भगवान कृष्ण दीनों पर कृपा करने वाले और भक्तवत्सल हैं।
4. द्वारकाखण्ड 2.41
पितेव सर्वभूतानां ररक्ष भगवान् हरिः ।
भावार्थ —
भगवान हरि ने समस्त प्राणियों की पिता के समान रक्षा की।
5. गोलोकखण्ड 15.9
करुणासागरं देवं भक्तानुग्रहकारकम् ।
भावार्थ —
भगवान करुणा के सागर और भक्तों पर अनुग्रह करने वाले हैं।
योग वशिष्ठ से प्रमाण--
1. निर्वाणप्रकरण 2.18.32
यथा पिता सुतं रक्षेत् तथा आत्मा जगत्त्रयम् ।
भावार्थ —
जैसे पिता पुत्र की रक्षा करता है, वैसे ही आत्मा समस्त जगत की रक्षा करती है।
2. उपशमप्रकरण 5.21
दयालुर्हि महात्मानः सर्वभूतहिते रताः ।
भावार्थ —
महात्मा दयालु होते हैं और सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं।
3. वैराग्यप्रकरण 1.16
संसारदुःखतप्तानां शरणं परमं शिवम् ।
भावार्थ —
संसार के दुःखों से तपे हुए लोगों के लिए परम शिव ही महान आश्रय हैं।
4. उत्पत्तिप्रकरण 3.14
अनुकम्प्याः प्रजा नित्यं पितेव करुणात्मना ।
भावार्थ —
करुणामय पुरुष को प्रजा पर पिता के समान दया करनी चाहिए।
5. निर्वाणप्रकरण 6.8
भक्त्या संपूजितो देवः शीघ्रं श्रुणोति मानवम् ।
भावार्थ —
भक्ति से पूजित भगवान मनुष्य की प्रार्थना शीघ्र सुनते हैं।
इन दोनों ग्रन्थों में ईश्वर अथवा ज्ञानी सत्ता को करुणामय पिता, रक्षक, शरणदाता और भक्तों की पुकार सुनने वाला बताया गया है — जो ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” के भाव से गहरा साम्य रखता है।
इस्लाम धर्म में प्रमाण++
Islam में अल्लाह को सामान्यतः “पिता” नहीं कहा जाता, क्योंकि इस्लामी सिद्धान्त में अल्लाह अद्वितीय और अजन्मा माने गए हैं।
किन्तु क़ुरआन और हदीस में यह भाव बार-बार आता है कि अल्लाह अत्यन्त दयालु, पुकार सुनने वाले, रक्षक और अपने बन्दों पर कृपालु हैं।
ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” के समान करुणा और पुकार सुनने का भाव निम्न प्रमाणों में मिलता है।
Quran से  प्रमाण--
1. सूरह अल-बक़रह 2:186
وَإِذَا سَأَلَكَ عِبَادِي عَنِّي فَإِنِّي قَرِيبٌ ۖ أُجِيبُ دَعْوَةَ الدَّاعِ إِذَا دَعَانِ
भावार्थ —
जब मेरे बन्दे मेरे विषय में पूछें, तो मैं निकट हूँ; जो मुझे पुकारता है, उसकी पुकार स्वीकार करता हूँ।
2. सूरह ग़ाफ़िर 40:60
وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ
भावार्थ —
तुम्हारे पालनहार ने कहा: मुझे पुकारो, मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार करूँगा।
3. सूरह अल-फ़ातिहा 1:1–3
بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
भावार्थ —
अल्लाह अत्यन्त कृपालु और दयावान है, जो सारे संसार का पालनहार है।
4. सूरह अल-इस्रा 17:24
وَقُلْ رَبِّ ارْحَمْهُمَا كَمَا رَبَّيَانِي صَغِيرًا
भावार्थ —
हे प्रभु! मेरे माता-पिता पर दया कर, जैसे उन्होंने बचपन में मेरा पालन किया।
(यहाँ पालन-पोषण और करुणा का वही भाव है जो पिता-समान संरक्षण में व्यक्त होता है।)
5. सूरह हूद 11:90
إِنَّ رَبِّي رَحِيمٌ وَدُودٌ
भावार्थ —
निश्चय ही मेरा प्रभु अत्यन्त दयालु और प्रेम करने वाला है।
6. सूरह अश-शूरा 42:19
اللَّهُ لَطِيفٌ بِعِبَادِهِ
भावार्थ —
अल्लाह अपने बन्दों पर अत्यन्त कोमल और कृपालु है।
7. हदीस — Sahih al-Bukhari
إِنَّ اللَّهَ أَرْحَمُ بِعِبَادِهِ مِنْ هَذِهِ بِوَلَدِهَا
भावार्थ —
अल्लाह अपने बन्दों पर उस माँ से भी अधिक दयालु है, जितनी माँ अपने बच्चे पर होती है।
इन प्रमाणों में ईश्वर की करुणा, पुकार सुनना, संरक्षण देना और भक्तों पर दया करना — वही मूल भावना प्रकट होती है जो वैदिक मंत्र “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” में दिखाई देती है।
सूफ़ी सन्तों में ‌प्रमाण-- 
Sufism में परमात्मा को अत्यन्त करुणामय, प्रेममय और पुकार सुनने वाला माना गया है।
यद्यपि सूफ़ी परम्परा में अल्लाह को “पिता” नहीं कहा जाता, फिर भी “मुरब्बी” (पालनकर्ता), “मेहरबान”, “दोस्त”, “रहमत का स्रोत” आदि भाव उसी आत्मीयता को प्रकट करते हैं जो ऋग्वेद के — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — में है।
नीचे कुछ अंशप्रमाण अरबी और फ़ारसी लिपि सहित दिए जा रहे हैं।
1. Jalal al-Din Rumi
ما را به جز تو در دو جهان یارِ دیگری نیست
چون طفلِ خسته‌ایم و تویی تکیه‌گاهِ ما
भावार्थ —
दोनों संसारों में तेरे सिवा हमारा कोई सहारा नहीं;
हम थके हुए बालक समान हैं और तू हमारा आश्रय है।
2. Jalal al-Din Rumi
ای خدا! بی‌پناهان را تو پناه
دستگیرِ ما، خطاپوشِ گناه
भावार्थ —
हे प्रभु! निराश्रितों के तू ही आश्रय है;
हमारा हाथ पकड़ और हमारे दोष क्षमा कर।
3. Hafiz
درِ خانهٔ تو کوبم، که پناهی جز تو نیست
भावार्थ —
मैं तेरे द्वार पर दस्तक देता हूँ, क्योंकि तेरे सिवा कोई शरण नहीं।
4. Saadi Shirazi
کریمـی که از خزانهٔ غیب
گبر و ترسا وظیفه‌خور داری
भावार्थ —
तू ऐसा कृपालु है कि अपनी अदृश्य निधि से सबका पालन करता है।
5. Rabia al-Basri
إِلٰهِي أَنْتَ أَقْرَبُ إِلَيَّ مِنْ كُلِّ شَيْءٍ
भावार्थ —
हे मेरे प्रभु! तू हर वस्तु से अधिक मेरे निकट है।
6. Abdul Qadir Gilani
يَا رَبِّ كُنْ لِي وَلَا تَكُنْ عَلَيَّ
भावार्थ —
हे प्रभु! तू मेरा सहायक बन, मेरे विरुद्ध नहीं।
7. Khwaja Moinuddin Chishti
هر که در این درگه آید، نانش دهید و از ایمانش مپرسید
भावार्थ —
जो भी इस द्वार पर आए, उसे भोजन दो; उसके धर्म के विषय में मत पूछो।
(यह करुणा और संरक्षण का सूफ़ी आदर्श है।)
8. Bulleh Shah
رَبَّا مِيرِي حَال دَا مَحْرَم تُوں
भावार्थ —
हे प्रभु! मेरे हृदय की दशा को तू ही जानता है।
9. Sultan Bahoo
اللہ بس، ماسویٰ اللہ ہوس
भावार्थ —
केवल अल्लाह ही पर्याप्त है; उसके अतिरिक्त सब मोह है।
10. Nizamuddin Auliya
هر قوم راست راهے، دینے و قبلہ‌گاہے
भावार्थ —
हर समुदाय का अपना मार्ग और उपासना है।
इन सूफ़ी वचनों में ईश्वर को करुणामय आश्रयदाता, निकटतम सहायक, पुकार सुनने वाला और प्रेमपूर्ण रक्षक माना गया है — जो वैदिक मंत्र के “पिता-समान सुनने और संरक्षण देने” के भाव से साम्य रखता है।
सिक्ख धर्म में प्रमाण _
Sikhism के पवित्र ग्रन्थ Guru Granth Sahib में परमात्मा को दयालु पिता, माता, रक्षक और पुकार सुनने वाला कहा गया है।
यह भावना ऋग्वेद के — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — के बहुत निकट है।
नीचे कुछ प्रमुख प्रमाण गुरुमुखी लिपि सहित दिए जा रहे हैं —
1. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 103
ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਪਿਤਾ ਤੂੰਹੈ ਮੇਰਾ ਮਾਤਾ ॥
ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਬੰਧਪੁ ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਭ੍ਰਾਤਾ ॥
भावार्थ —
हे प्रभु! तू ही मेरा पिता है, तू ही मेरी माता है;
तू ही मेरा बन्धु और भाई है।
2. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 611
ਤੂ ਠਾਕੁਰੁ ਤੁਮ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਸਭੁ ਤੇਰੀ ਰਾਸਿ ॥
भावार्थ —
हे प्रभु! तेरे समक्ष ही मेरी प्रार्थना है;
मेरा तन-मन सब तेरा है।
3. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 268
ਪਿਤਾ ਮਾਤਾ ਕੀ ਆਸ ਨਿਰਾਸੀ ॥
ਸਰਨਿ ਪਇਆ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
भावार्थ —
जब सांसारिक आशाएँ टूट जाती हैं, तब मनुष्य प्रभु की शरण में आता है।
4. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 627
ਹਰਿ ਜਿਉ ਤੁਮ ਆਪੇ ਦੇਹੁ ਬੁਝਾਈ ॥
ਪਿਤਾ ਮਾਤਾ ਪ੍ਰਭੁ ਤੁਮ ਹੀ ਜਾਈ ॥
भावार्थ —
हे प्रभु! तू ही ज्ञान देने वाला है;
तू ही हमारा पिता और माता है।
5. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 51
ਤੂ ਮੇਰਾ ਰਾਖਾ ਸਭਨੀ ਥਾਈ ॥
भावार्थ —
तू हर स्थान पर मेरा रक्षक है।
6. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 724
ਮੇਰੇ ਮਨ ਹਰਿ ਹਰਿ ਧਿਆਇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਪਿਤਾ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ॥
भावार्थ —
हरि का ध्यान करके सुख प्राप्त हुआ;
हरि ही मेरे पिता और प्रभु हैं।
7. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 292
ਏਕੁ ਪਿਤਾ ਏਕਸ ਕੇ ਹਮ ਬਾਰਿਕ ॥
भावार्थ —
एक ही परम पिता है और हम सब उसकी संतान हैं।
8. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 1101
ਪ੍ਰਭ ਜੀ ਤੂ ਮੇਰੇ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰਾ ॥
भावार्थ —
हे प्रभु! तू ही मेरे प्राणों का आधार है।
9. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 748
ਸੁਣਿ ਪੁਕਾਰ ਦਾਤਾਰ ਪ੍ਰਭ ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਜਗ ਮਹਿ ਪਠਾਇਆ ॥
भावार्थ —
हे दातार प्रभु! तूने पुकार सुनकर गुरु नानक को संसार में भेजा।
10. गुरु ग्रन्थ साहिब, अंग 747
ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਬੰਧਪ ਤੂਹੈ ਤੂ ਸਰਬ ਨਿਵਾਸੀ ॥
भावार्थ —
तू ही माता, पिता और बन्धु है; तू सबमें निवास करता है।
इन प्रमाणों में परमात्मा को पिता, माता, रक्षक, शरणदाता और पुकार सुनने वाला बताया गया है — जो ऋग्वैदिक प्रार्थना के भाव से अत्यन्त साम्य रखता है।
ईसाई धर्म में प्रमाण --
 Christianity में परमेश्वर को अत्यन्त प्रेममय “Heavenly Father” (स्वर्गीय पिता) कहा गया है।
Bible में बार-बार यह भाव आता है कि परमेश्वर मनुष्य की पुकार सुनते हैं, रक्षा करते हैं और पिता के समान दया करते हैं।
यह भावना ऋग्वेद के — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — से बहुत साम्य रखती है।
1. Psalm 103:13
“As a father has compassion on his children,
so the Lord has compassion on those who fear him.”
भावार्थ —
जैसे पिता अपने बच्चों पर दया करता है, वैसे ही प्रभु अपने भक्तों पर दया करते हैं।
2. Matthew 7:9–11
“Which of you, if your son asks for bread, will give him a stone? …
how much more will your Father in heaven give good gifts to those who ask him!”
भावार्थ —
यदि सांसारिक पिता अपने पुत्र को अच्छी वस्तुएँ देता है, तो स्वर्गीय पिता उससे भी अधिक कृपा करेंगे।
3. Matthew 6:9
“Our Father in heaven, hallowed be your name.”
भावार्थ —
हे हमारे स्वर्गीय पिता! तेरा नाम पवित्र माना जाए।
4. Isaiah 64:8
“Yet you, Lord, are our Father.
We are the clay, you are the potter.”
भावार्थ —
हे प्रभु! आप हमारे पिता हैं; हम आपकी रचना हैं।
5. 2 Corinthians 6:18
“I will be a Father to you,
and you will be my sons and daughters.”
भावार्थ —
मैं तुम्हारा पिता बनूँगा और तुम मेरे पुत्र-पुत्रियाँ होगे।
6. Psalm 34:17
“The righteous cry out, and the Lord hears them;
he delivers them from all their troubles.”
भावार्थ —
धर्मी पुकारते हैं और प्रभु उनकी सुनते हैं तथा संकटों से बचाते हैं।
7. 1 John 3:1
“See what great love the Father has lavished on us,
that we should be called children of God!”
भावार्थ —
देखो, पिता ने हम पर कितना महान प्रेम किया कि हम परमेश्वर की संतान कहलाएँ।
8. Luke 11:2
“Father, hallowed be your name, your kingdom come.”
भावार्थ —
हे पिता! तेरा नाम पवित्र माना जाए, तेरा राज्य आए।
9. Romans 8:15
“By him we cry, ‘Abba, Father.’”
भावार्थ —
हम प्रेमपूर्वक परमेश्वर को “अब्बा, पिता” कहकर पुकारते हैं।
10. John 14:18
“I will not leave you as orphans; I will come to you.”
भावार्थ —
मैं तुम्हें अनाथ नहीं छोड़ूँगा; मैं तुम्हारे पास आऊँगा।
इन सभी प्रमाणों में परमेश्वर को दयालु पिता, पुकार सुनने वाला, रक्षक और प्रेममय आश्रयदाता बताया गया है — जो ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” के भाव से गहरा सामंजस्य रखता है।
जैन धर्म में प्रमाण --
 Jainism में सृष्टिकर्ता ईश्वर की धारणा वैदिक या ईसाई परम्परा जैसी नहीं है, किन्तु तीर्थंकरों, अरिहन्तों और सिद्धों को करुणामय मार्गदर्शक, रक्षक और जीवों के हितकारी के रूप में वंदित किया गया है।
भक्त उनकी शरण लेकर अपनी प्रार्थना व्यक्त करता है।
यह भाव ऋग्वेद के — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — से साम्य रखता है।
नीचे प्राकृत (देवनागरी) में प्रमाण दिए जा रहे हैं —
1. Namokar Mantra
णमो अरिहंताणं ।
णमो सिद्धाणं ।
णमो आयरियाणं ।
णमो उवज्झायाणं ।
णमो लोए सव्वसाहूणं ॥
भावार्थ —
अरिहन्तों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और समस्त साधुओं को नमस्कार।
(यह शरण और श्रद्धा की मूल जैन प्रार्थना है।)
2. Uttaradhyayana Sutra
जगच्चित्तहरो वीरो, जगज्जीवदयापरो ।
भावार्थ —
वीर (महावीर) जगत् के चित्त को हरने वाले और सभी जीवों पर दया करने वाले हैं।
3. Mahavira वंदना
अहिंसा संजमो तवो, एयं मग्गं जिणा णयं ।
भावार्थ —
अहिंसा, संयम और तप — यही जिनों का बताया हुआ मार्ग है।
4. Acaranga Sutra
सव्वे पाणा ण हंतव्वा ।
भावार्थ —
सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।
(यह करुणा और संरक्षण का सिद्धान्त है।)
5. Tattvartha Sutra
परस्परोपग्रहो जीवानाम् ।
भावार्थ —
सभी जीव परस्पर एक-दूसरे के उपकारी हैं।
6. Uttaradhyayana Sutra
दयावओ दया भुएसु ।
भावार्थ —
सभी प्राणियों पर दया करो।
7. Dasavaikalika Sutra
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे ।
भावार्थ —
मैं सभी जीवों से क्षमा चाहता हूँ, और सभी जीव मुझे क्षमा करें।
8. Bhaktamara Stotra
नाथ! तवाश्रयणं जनानां
संसारभीतिहरं प्रसिद्धम् ॥
भावार्थ —
हे नाथ! आपकी शरण संसार के भय को दूर करने वाली प्रसिद्ध है।
9. Kalpa Sutra
सव्वेसिं जीवियं पियं ।
भावार्थ —
सभी प्राणियों को अपना जीवन प्रिय है।
10. Bhaktamara Stotra
भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् ॥
भावार्थ —
भक्तों के झुके हुए मस्तकों के रत्नों से प्रकाशित, पापरूपी अन्धकार का नाश करने वाले प्रभु को नमस्कार।
इन जैन प्रमाणों में करुणा, शरण, जीवों की रक्षा, दया और आध्यात्मिक आश्रय का वही भाव मिलता है जो वैदिक मंत्र में पिता-समान संरक्षण और पुकार सुनने के रूप में व्यक्त हुआ है। रखता है। है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण _
Buddhism में बुद्ध को सृष्टिकर्ता ईश्वर नहीं माना जाता, किन्तु Gautama Buddha को करुणामय गुरु, लोकहितकारी और दुःख से पार लगाने वाले मार्गदर्शक के रूप में स्मरण किया जाता है।
पाली ग्रन्थों में बुद्ध और धर्म के प्रति वही शरण, करुणा और संरक्षण का भाव मिलता है जो ऋग्वेद के — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — में व्यक्त है।
नीचे पाली (देवनागरी) में प्रमाण दिए जा रहे हैं —
1. Trisharana
बुद्धं सरणं गच्छामि ।
धम्मं सरणं गच्छामि ।
सङ्घं सरणं गच्छामि ॥
भावार्थ —
मैं बुद्ध, धर्म और संघ की शरण में जाता हूँ।
2. Dhammapada 270
सब्बपापस्स अकरणं,
कुसलस्स उपसम्पदा ।
सचित्तपरियोदपनं —
एतं बुद्धान सासनं ॥
भावार्थ —
सब पापों का त्याग, शुभ कर्मों का आचरण और चित्त की शुद्धि — यही बुद्धों का उपदेश है।
3. Karaniya Metta Sutta
माता यथा नियं पुत्तं
आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे ।
एवंपि सब्बभूतेसु
मानसं भावये अपरिमाणं ॥
भावार्थ —
जैसे माता अपने इकलौते पुत्र की रक्षा करती है, वैसे ही सभी प्राणियों के प्रति असीम मैत्री रखनी चाहिए।
4. Dhammapada 160
अत्ताहि अत्तनो नाथो ।
भावार्थ —
मनुष्य स्वयं ही अपना आश्रय है।
5. Mangala Sutta
बहूसच्चञ्च सिप्पञ्च
विनयो च सुसिक्खितो ।
भावार्थ —
बहुश्रुत होना, कला सीखना और उत्तम अनुशासन — महान मंगल हैं।
6. Dhammapada 223
अक्कोधेन जिने कोधं ।
भावार्थ —
क्रोध को अक्रोध से जीतो।
7. Metta Sutta
सुखिनो वा खेmino होंतु
सब्बे सत्ता भवन्तु सुखितत्ता ॥
भावार्थ —
सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित हों।
8. Dhammapada 354
सब्बदानं धम्मदानं जिनाति ।
भावार्थ —
धर्म का दान सभी दानों से श्रेष्ठ है।
9. Ratana Sutta
एतेन सच्चवज्जेन
होतु ते जयमङ्गलं ॥
भावार्थ —
इस सत्यवचन से तुम्हारा कल्याण और मंगल हो।
10. Mahaparinibbana Sutta
अप्प दीपो भव ।
भावार्थ —
स्वयं अपना दीपक बनो।
इन बौद्ध प्रमाणों में करुणा, शरण, रक्षा, मैत्री और दुःख-निवारण का वही आध्यात्मिक भाव मिलता है जो वैदिक मंत्र में पिता-समान संरक्षण और पुकार सुनने के रूप में व्यक्त हुआ है।
यहूदी धर्म में प्रमाण --
Judaism में परमेश्वर को दयालु 
पिता, रक्षक और प्रार्थना सुनने वाला माना गया है।
Hebrew Bible (तनाख) में अनेक स्थानों पर ईश्वर को “Father” (אָב — अव/पिता) कहा गया है।
यह भावना ऋग्वेद के — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — से बहुत साम्य रखती है।
1. Book of Psalms 103:13
כְּרַחֵם אָב עַל־בָּנִים
רִחַם יְהוָה עַל־יְרֵאָיו׃
भावार्थ —
जैसे पिता अपने बच्चों पर दया करता है, वैसे ही परमेश्वर अपने भक्तों पर दया करते हैं।
2. Book of Isaiah 64:8
וְעַתָּה יְהוָה אָבִינוּ אָתָּה
भावार्थ —
हे प्रभु! आप हमारे पिता हैं।
3. Book of Deuteronomy 32:6
הֲלוֹא־הוּא אָבִיךָ קָּנֶךָ
भावार्थ —
क्या वही तुम्हारा पिता और सृष्टिकर्ता नहीं है?
4. Book of Jeremiah 31:9
כִּי־הָיִיתִי לְיִשְׂרָאֵל לְאָב
भावार्थ —
मैं इस्राएल के लिए पिता रहा हूँ।
5. Book of Malachi 1:6
בֵּן יְכַבֵּד אָב
भावार्थ —
पुत्र अपने पिता का आदर करता है।
6. Book of Psalms 145:18
קָרוֹב יְהוָה לְכָל־קֹרְאָיו
भावार्थ —
जो प्रभु को पुकारते हैं, परमेश्वर उनके निकट रहते हैं।
7. Book of Exodus 4:22
בְּנִי בְכֹרִי יִשְׂרָאֵל
भावार्थ —
इस्राएल मेरा ज्येष्ठ पुत्र है।
8. Book of Isaiah 63:16
כִּי־אַתָּה אָבִינוּ
भावार्थ —
निश्चय ही आप हमारे पिता हैं।
9. Book of Psalms 27:10
כִּי־אָבִי וְאִמִּי עֲזָבוּנִי
וַיהוָה יַאַסְפֵנִי׃
भावार्थ —
यदि माता-पिता भी छोड़ दें, तब भी परमेश्वर मुझे अपनाएँगे।
10. Book of Psalms 34:17
צָעֲקוּ וַיהוָה שָׁמֵעַ
भावार्थ —
धर्मी पुकारते हैं और परमेश्वर सुनते हैं।
इन यहूदी प्रमाणों में परमेश्वर को पिता, दयालु रक्षक, पुकार सुनने वाला और आश्रयदाता बताया गया है — जो ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” के भाव से अत्यन्त साम्य रखता है।
पारसी धर्म में प्रमाण --
Zoroastrianism (पारसी धर्म) में Zarathustra ने Avesta में परमेश्वर Ahura Mazda को दयालु, रक्षक, सत्य का पालन करने वाला और भक्तों की प्रार्थना सुनने वाला बताया है।
यद्यपि “पिता” शब्द का प्रयोग सीमित है, परन्तु पालनकर्ता, मार्गदर्शक और करुणामय प्रभु का भाव स्पष्ट मिलता है — जो ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” के निकट है।
नीचे अवेस्ता-परम्परा के प्रमाण अवेस्ताई लिपि सहित दिए जा रहे हैं —
1. Yasna 43.1
𐬀𐬙 𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁
𐬨𐬀𐬌 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀𐬥𐬀 𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀
भावार्थ —
हे अहुरा मज़्दा! मेरी प्रार्थना सुनो।
2. Yasna 44.3
𐬐𐬀𐬙 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
𐬞𐬌𐬙𐬀 𐬀𐬴𐬎𐬭𐬀
भावार्थ —
हे मज़्दा! आप महान संरक्षक और पालनकर्ता हैं।
3. Yasna 33.11
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁
𐬭𐬀𐬥𐬀 𐬨𐬀𐬌
भावार्थ —
अहुरा मज़्दा मेरे रक्षक हैं।
4. Yasna 45.10
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
𐬯𐬞𐬈𐬥𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬌𐬥𐬌𐬎
भावार्थ —
अहुरा मज़्दा पवित्र और कल्याणकारी आत्मा हैं।
5. Ashem Vohu
𐬀𐬴𐬈𐬨 𐬬𐬊𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬵𐬌𐬱𐬙𐬆𐬨 𐬀𐬯𐬙𐬌
भावार्थ —
धर्म और सत्य ही सर्वोत्तम हैं।
6. Ahuna Vairya
𐬬𐬚𐬀 𐬀𐬵𐬎 𐬬𐬀𐬌𐬭𐬌𐬌𐬋
भावार्थ —
जैसा प्रभु का संकल्प है, वैसा ही धर्म का राज्य हो।
7. Yasna 34.10
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬥𐬀 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌
भावार्थ —
मज़्दा हमारा मार्गदर्शन करें।
8. Yasna 50.4
𐬀𐬵𐬎𐬭𐬁 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
𐬯𐬭𐬀𐬊𐬱𐬀
भावार्थ —
अहुरा मज़्दा हमारी पुकार सुनते हैं।
9. Khorda Avesta
𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁 𐬭𐬀𐬥𐬀𐬌 𐬞𐬀𐬌𐬙𐬌
भावार्थ —
मज़्दा हमारी रक्षा करें।
10. Yasna 46.7
𐬙𐬀 𐬨𐬀𐬰𐬛𐬁
𐬯𐬀𐬊𐬱𐬌𐬀𐬥𐬙
भावार्थ —
हे मज़्दा! हमें कल्याण और सहायता प्रदान करें।
इन पारसी प्रमाणों में अहुरा मज़्दा को रक्षक, करुणामय मार्गदर्शक, प्रार्थना सुनने वाला और कल्याणकारी प्रभु माना गया है — जो ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” के भाव से साम्य रखता है।
ताओ धर्म में प्रमाण --
Taoism में “ताओ” (道) को समस्त जगत का मूल, पालनकर्ता, पोषण देने वाला और करुणामय मार्ग माना गया है।
Tao Te Ching में ताओ को कभी “माता”, कभी पालनकर्ता और कभी सबको धारण करने वाली शक्ति कहा गया है।
यह भावना ऋग्वेद के — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — के करुणामय संरक्षण-भाव से साम्य रखती है।
नीचे चीनी लिपि सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं —
1. Tao Te Ching अध्याय 25
有物混成,先天地生。
寂兮寥兮,獨立而不改,
周行而不殆,可以為天下母。
भावार्थ —
एक ऐसी सत्ता है जो स्वर्ग और पृथ्वी से पहले विद्यमान थी;
वह समस्त जगत की माता कही जा सकती है।
2. अध्याय 34
大道泛兮,其可左右萬物。
萬物恃之以生而不辭。
भावार्थ —
महान ताओ सब ओर व्याप्त है;
सभी प्राणी उसी पर आश्रित होकर जीते हैं।
3. अध्याय 51
道生之,德畜之。
भावार्थ —
ताओ उत्पन्न करता है और उसका गुण सबका पालन-पोषण करता है।
4. अध्याय 6
谷神不死,是謂玄牝。
玄牝之門,是謂天地根。
भावार्थ —
रहस्यमयी शक्ति अमर है;
वही स्वर्ग और पृथ्वी की जड़ है।
5. अध्याय 49
聖人常無心,以百姓心為心。
भावार्थ —
संत अपना अलग स्वार्थ नहीं रखता; वह सब लोगों के हृदय को अपना हृदय मानता है।
6. अध्याय 67
我有三寶,持而保之:
一曰慈,二曰儉,三曰不敢為天下先。
भावार्थ —
मेरे तीन रत्न हैं — करुणा, सादगी और विनम्रता।
7. अध्याय 8
上善若水。
水善利萬物而不爭。
भावार्थ —
श्रेष्ठ गुण जल के समान है,
जो सबका हित करता है और संघर्ष नहीं करता।
8. अध्याय 62
道者萬物之奧,善人之寶,不善人之所保。
भावार्थ —
ताओ सभी वस्तुओं का आश्रय है;
वह सज्जनों का खजाना और दूसरों का भी संरक्षण है।
9. अध्याय 4
道沖而用之或不盈。
भावार्थ —
ताओ अनन्त है, उसका उपयोग कभी समाप्त नहीं होता।
10. अध्याय 52
天下有始,以為天下母。
भावार्थ —
संसार का एक मूल है, जिसे जगत की माता कहा जाता है।
इन ताओवादी प्रमाणों में ताओ को जगत का पालनकर्ता, आश्रयदाता, करुणामय और सबको धारण करने वाली सत्ता माना गया है — जो ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” के भाव से गहरा साम्य रखता है।
कन्फ्यूशियस धर्म में प्रमाण --
Confucianism में परम सत्य को प्रायः “तियान” (天 — स्वर्ग/दैवी व्यवस्था) कहा गया है।
Confucius ने करुणा, दया, पितृवत् शासन, मानवता (仁) और लोक-कल्याण पर बल दिया।
कन्फ्यूशियस परम्परा में शासक और सज्जन पुरुष को प्रजा के प्रति पिता-समान दयालु माना गया है।
यह भावना ऋग्वेद के — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — के संरक्षण और करुणा-भाव से साम्य रखती है।
नीचे चीनी लिपि सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं —
1. Analects 1.2
孝弟也者,其為仁之本與。
भावार्थ —
माता-पिता और बड़ों का आदर ही मानवता (करुणा) का मूल है।
2. Analects 12.22
樊遲問仁。子曰:愛人。
भावार्थ —
फान-छी ने पूछा — “मानवता क्या है?”
कन्फ्यूशियस ने कहा — “लोगों से प्रेम करना।”
3. Analects 2.5
今之孝者,是謂能養。
भावार्थ —
सच्ची पुत्र-भक्ति केवल पालन-पोषण नहीं, बल्कि आदर और करुणा भी है।
4. Book of Rites
大道之行也,天下為公。
भावार्थ —
जब महान मार्ग चलता है, तब संसार सबका हो जाता है।
5. Mencius 1A:7
老吾老,以及人之老;
幼吾幼,以及人之幼。
भावार्थ —
अपने वृद्धों का आदर करो और दूसरों के वृद्धों का भी;
अपने बच्चों से प्रेम करो और दूसरों के बच्चों से भी।
6. Analects 6.30
己欲立而立人,己欲達而達人。
भावार्थ —
जो स्वयं उन्नति चाहता है, वह दूसरों की भी उन्नति करे।
7. Analects 15.24
己所不欲,勿施於人。
भावार्थ —
जो व्यवहार तुम अपने लिए नहीं चाहते, वह दूसरों पर मत करो।
8. Classic of Filial Piety
夫孝,德之本也。
भावार्थ —
पितृभक्ति ही सद्गुणों का मूल है।
9. Mencius 7A:45
仁者無敵。
भावार्थ —
करुणामय व्यक्ति का कोई शत्रु नहीं होता।
10. Analects 12.2
己所不欲,勿施於人。
भावार्थ —
जो अपने लिए अप्रिय है, वह दूसरों पर मत थोपो।
इन कन्फ्यूशियस प्रमाणों में करुणा, पितृवत् संरक्षण, मानवता, लोकहित और दयालुता का वही भाव दिखाई देता है जो ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” में व्यक्त है। रखता है।
शिन्तो धर्म में प्रमाण --
Shinto में “कामी” (神) को 
प्रकृति, पूर्वजों और दिव्य शक्तियों के रूप में पूजित किया जाता है।
शिन्तो परम्परा में कामी को रक्षक, पालनकर्ता, शुद्धि देने वाला और मनुष्य की प्रार्थना सुनने वाला माना गया है।
यह भावना ऋग्वेद के — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — के करुणामय संरक्षण-भाव से साम्य रखती है।
नीचे जापानी लिपि सहित प्रमाण दिए जा रहे हैं —
1. Kojiki
神は人を護り、人は神を敬う。
भावार्थ —
कामी मनुष्यों की रक्षा करते हैं और मनुष्य कामी का आदर करते हैं।
2. Nihon Shoki
惟神の道に従えば、福あり。
भावार्थ —
यदि कोई कामी के मार्ग का अनुसरण करे, तो कल्याण प्राप्त होता है।
3. शिन्तो प्रार्थना (祝詞 — नोrito)
大神の御恵みを以て、守り給い幸え給え。
भावार्थ —
महान देवता अपनी कृपा से हमारी रक्षा करें और कल्याण दें।
4. Amaterasu स्तुति
天照大神は天下を照らし給う。
भावार्थ —
अमातेरासु ओमिकामी समस्त संसार को प्रकाश देती हैं।
5. शिन्तो प्रार्थना
神の御心を以て、平安を賜う。
भावार्थ —
कामी की कृपा से शान्ति प्राप्त हो।
6. Kojiki
八百万の神、共に見守り給う。
भावार्थ —
असंख्य कामी सबकी रक्षा और देखभाल करते हैं।
7. शिन्तो नोrito
祓え給い、清め給え。
भावार्थ —
हमें शुद्ध करें और पवित्र बनाएँ।
8. Nihon Shoki
神恩を蒙りて生く。
भावार्थ —
मनुष्य देवकृपा से जीवन प्राप्त करता है।
9. शिन्तो प्रार्थना
大神よ、願いを聞こし召せ。
भावार्थ —
हे महान देवता! हमारी प्रार्थना सुनें।
10. Inari Okami स्तुति
稲荷大神の御加護を賜る。
भावार्थ —
इनारी ओकामी की दिव्य रक्षा प्राप्त हो।
इन शिन्तो प्रमाणों में कामी को रक्षक, कृपालु, शुद्धि देने वाला और प्रार्थना सुनने वाला माना गया है — जो ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” के भाव से साम्य रखता है।
यूनानी दर्शन में प्रमाण-- 
Ancient Greek Philosophy में ईश्वर, “लोगोस” (Logos), “द गुड” (The Good) या दिव्य बुद्धि को जगत का पालनकर्ता, मार्गदर्शक और करुणामय व्यवस्था माना गया है।
विशेषतः Socrates, Plato, Aristotle तथा Epictetus आदि के विचारों में दैवी संरक्षण और मनुष्य के प्रति ईश्वरीय सद्भाव का भाव मिलता है, जो ऋग्वेद के — “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” — से साम्य रखता है।
1. Plato — Timaeus
“God was good, and in the good no jealousy ever arises.”
भावार्थ —
ईश्वर पूर्णतः शुभ है, और शुभ सत्ता में किसी के प्रति द्वेष नहीं होता।
2. Plato — Republic
“The Good is the cause of all that is right and beautiful.”
भावार्थ —
परम शुभ ही समस्त सत्य और सौन्दर्य का कारण है।
3. Socrates — Apology
“No evil can happen to a good man, either in life or after death.”
भावार्थ —
सज्जन व्यक्ति के साथ अन्ततः कोई अनिष्ट नहीं हो सकता।
4. Epictetus — Discourses
“You are a child of God.”
भावार्थ —
तुम ईश्वर की संतान हो।
5. Marcus Aurelius — Meditations
“The universe is full of divine providence.”
भावार्थ —
सम्पूर्ण जगत दैवी संरक्षण और व्यवस्था से परिपूर्ण है।
6. Cleanthes — “Hymn to Zeus”
“Most glorious of immortals, Zeus…
by you all things are governed with justice.”
भावार्थ —
हे ज़्यूस! सब वस्तुएँ आपके न्यायपूर्ण शासन से संचालित हैं।
7. Epictetus
“Never say of anything, ‘I have lost it’; say, ‘I have returned it.’”
भावार्थ —
सब कुछ दैवी व्यवस्था के अधीन है; मनुष्य को समर्पण भाव रखना चाहिए।
8. Aristotle — Nicomachean Ethics
“The gods care for human beings.”
भावार्थ —
देवता मनुष्यों की चिन्ता और कल्याण करते हैं।
9. Plutarch
“God is the father of all men.”
भावार्थ —
ईश्वर समस्त मनुष्यों के पिता हैं।
10. Hierocles
“We are all bound together by divine kinship.”
भावार्थ —
हम सभी दैवी सम्बन्ध से जुड़े हुए हैं।
इन यूनानी दार्शनिक प्रमाणों में दैवी करुणा, संरक्षण, पिता-समान सम्बन्ध, न्यायपूर्ण व्यवस्था और मनुष्य की पुकार के प्रति संवेदनशीलता का वही मूल भाव मिलता है जो ऋग्वेद के “पितेव नः शृणुहि हूयमानः” में व्यक्त है।
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