ऋगुवेद सूक्ति--(10) की व्याख्या--
ऋगुवेद सूक्ति-- (१०) की व्याख्या
“न रिष्यते त्वावतः सखा” — (जो ईश्वर का सखा/भक्त है वह नष्ट नहीं होता) —
इस भाव की पुष्टि अनेक उपनिषदों में मिलती है। प्रस्तुत हैं प्रमुख प्रमाण —
(१) कठोपनिषद् (१.२.२३)
“नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥”
भावार्थ — आत्मा उसी को प्राप्त होता है जिसे वह स्वयं (ईश्वर) स्वीकार करता है।
अर्थात् जो ईश्वर का प्रिय होता है, वही सुरक्षित और सफल होता है।
(२️) श्वेताश्वतर उपनिषद् (६.१८)
“यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं…
तं ह देवम् आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये॥”
भावार्थ — मैं उस परमदेव की शरण ग्रहण करता हूँ जो आत्मबुद्धि को प्रकाशित करता है।
शरणागत की रक्षा का भाव यहाँ स्पष्ट है।
(३️) मुण्डकोपनिषद् (३.२.३)
“ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।”
भावार्थ --
जो ब्रह्म को जान लेता है, वह स्वयं ब्रह्मरूप हो जाता है।
ऐसे ज्ञानी का नाश नहीं — क्योंकि वह अमृतत्व को प्राप्त है।
(४️) छान्दोग्य उपनिषद् (७.१.३)
“तारति शोकम् आत्मवित्।”
भावार्थ -+
आत्मज्ञानी शोक से तर जाता है।
जो शोक और भय से पार हो गया, उसका आध्यात्मिक नाश कैसे संभव?
(५) तैत्तिरीयोपनिषद् (२.७)
“भयादस्याग्निस्तपति"
भावार्थ --
संसार में सब कुछ परमात्मा के भय (आज्ञा) से स्थित है।
जो उसी परम सत्ता का आश्रित है, वह भय से परे हो जाता है।
(६) बृहदारण्यक उपनिषद् (४.४.२५)
“अथ यो वेद ‘अहं ब्रह्मास्मि’… स इदं सर्वं भवति।”
भावार्थ --
जो ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करता है, वह सर्वात्मभाव को प्राप्त होता है
ऐसे आत्मज्ञानी का विनाश नहीं होता।
निष्कर्ष--
वेद का वचन —
ईश्वराश्रित पुरुष का आध्यात्मिक पतन नहीं होता।
(१️) श्रीमद्भागवत महापुराण
९.४.६८
“साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम्।
मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥”
भावार्थ — साधु मेरे हृदय में रहते हैं और मैं उनके हृदय में रहता हूँ।
अर्थात् जो भगवान का भक्त है, उसका नाश संभव नहीं।
(२) श्रीमद् भागवत महापुराण
१०.१४.८
“तत्तेऽनुकम्पां सु-समीक्षमाणो…
भावार्थ--”
जो पुरुष ईश्वर की कृपा मानकर जीवन स्वीकार करता है, वह अन्ततः मोक्ष का अधिकारी होता है।
भक्त का अन्तिम पतन नहीं होता।
पौराणिक प्रमाण--
(१) विष्णु पुराण (३.७.१४)
“हरिर्हि नाम यत्र गीयते
तत्र तिष्ठति माधवः।”
भावार्थ --
जहाँ भगवान का स्मरण होता है, वहाँ स्वयं भगवान स्थित होते हैं।
अतः भक्त ईश्वर-संरक्षित होता है।
(३️) पद्म पुराण
“न हि कल्याणकृत् कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति।”
भावार्थ --
जो शुभ कर्म और भक्ति करता है, वह कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
(४) नारद पुराण
“भक्तानां अनुग्रहकर्ता भगवान् स्वयं।”
भावार्थ--
भगवान स्वयं अपने भक्तों के अनुग्रहकर्ता (रक्षक) हैं।
अतः भक्त की रक्षा निश्चित है।
(५️) स्कन्द पुराण--
“यत्र धर्मः तत्र जयः।”
भावार्थ--
जहाँ धर्म है, वहाँ विजय है।
जो धर्मरूप भगवान का आश्रित है, उसका नाश नहीं।
निष्कर्ष _
पुराण कहते हैं —
भगवान भक्त के हृदय में रहते हैं।
भक्त दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
ईश्वर स्वयं रक्षक हैं।
👉 अतः सिद्ध हुआ — ईश्वर-सखा (भक्त) का आध्यात्मिक नाश नहीं होता।
प्रह्लाद, ध्रुव, गजेन्द्र, अम्बरीष आदि पौराणिक चरित्रों के उदाहरण सहित व्याख्या--
प्रमुख उदाहरण —
(१️) प्रह्लाद श्रीमद्भागवत, सप्तम स्कन्ध)--
हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को
विष दिलवाया, सर्पों में डसवाया,
पर्वत से गिरवाया और अग्नि में बैठाया, किन्तु —
“नैवोद्विजे पर दुरत्यय-वैतरण्याः…” (भागवत 7.9.43)
भगवान नरसिंह ने स्वयं प्रकट होकर प्रह्लाद की रक्षा की।
(२️) ध्रुव (भागवत, चतुर्थ स्कन्ध)
बालक ध्रुव को राज्य से अपमानित किया गया। वन में कठोर तप किया।
भगवान विष्णु प्रकट हुए और ध्रुव को ध्रुवपद (ध्रुवतारा) दिया —
अमर स्थान।
जो ईश्वर का आश्रित हुआ, वह अक्षय पद को प्राप्त हुआ।
(३️) गजेन्द्र मोक्ष (भागवत, अष्टम स्कन्ध)
गजराज ग्राह के मुख में फँस गया। जब सभी उपाय असफल हुए, तब उसने पुकारा —
“नारायणाखिलगुरो भगवन् नमस्ते।”
भगवान सुदर्शन लेकर आए और गजेन्द्र को मुक्त किया।
संकट में भी भक्त नहीं नष्ट होता।
( ४️) अम्बरीष राजा (भागवत, नवम स्कन्ध)
दुर्वासा ऋषि ने क्रोध में कृत्या उत्पन्न की। भगवान के सुदर्शन चक्र ने दुर्वासा का पीछा किया।
अन्ततः दुर्वासा ने स्वयं अम्बरीष से क्षमा माँगी।
“अहं भक्तपराधीनो…” (भागवत 9.4.63)
भगवान स्वयं कहते हैं —
मैं अपने भक्त के अधीन हूँ।
(५️) मार्कण्डेय (शिवपुराण)
अल्पायु होने पर भी मार्कण्डेय ने शिवभक्ति की।
यमराज आए, पर शिवजी प्रकट हुए और यम को रोक दिया।
भक्ति ने मृत्यु तक को पराजित किया।
निष्कर्ष--
पुराणों के उदाहरणों से सिद्ध हुआ कि ईश्वर का सखा नष्ट नहीं होता।
या तो वह सांसारिक संकट से बचाया जाता है,या उसे अमर आध्यात्मिक पद प्राप्त होता है।
(१️) महाभारत--
(क) उद्योगपर्व
“धर्मो रक्षति रक्षितः।”
भावार्थ--
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
ईश्वर-सखा (धर्मनिष्ठ) का नाश नहीं।
(ख) वनपर्व--
“न हि सत्यवतां नाशः।
भावार्थ -
सत्यपरायण पुरुष का विनाश नहीं होता।
(२️) रामायण
युद्धकाण्ड (विभीषण-शरणागति)
“सकृदेव प्रपन्नाय तवास्मीति च याचते।
अभयं सर्वभूतेभ्यो ददाम्येतद् व्रतं मम॥”
भावार्थ _
श्रीराम का वचन — जो एक बार भी मेरी शरण आता है, उसे मैं अभय देता हूँ।
शरणागत का नाश नहीं।
(३️) मनुस्मृति
“धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।” (मनु ८.१५)
भावार्थ --
धर्म का त्याग करने वाला नष्ट होता है; धर्म की रक्षा करने वाला सुरक्षित रहता है।
(४️) योगवाशिष्ठ
“नास्ति भक्तस्य नाशः कदाचन।”
भावार्थ--
भक्त का नाश कभी नहीं होता
(५️ भर्तृहरि नीति शतक
“सज्जनानां पदे पदे विपदः।”
भावाऐ--
सज्जनों को पग-पग पर विपत्तियाँ आती हैं परन्तु उनका अन्तिम पतन नहीं होता)
भर्तृहरि का आशय — सज्जन अंततः विजयी होते हैं।
(६) चाणक्य नीति
“धर्मेण जयते लोकः।”
भावार्थ,_
धर्म से ही लोक में विजय होती है।
( धर्माश्रित व्यक्ति पराजित नहीं होता)
(७️) हितोपदेश
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्"
भावार्थ--
सत्य और प्रिय बोलने वाला अंततः सम्मान और सुरक्षा पाता है।
निष्कर्ष--
आर्ष ग्रन्थों का सामूहिक संदेश —
धर्मरक्षक सुरक्षित रहता है।
शरणागत को अभय मिलता है।
सत्यवादी का नाश नहीं होता।
भक्त पर ईश्वर की विशेष कृपा रहती है।
निष्कर्ष: ईश्वराश्रित, धर्मनिष्ठ और भक्त पुरुष का आध्यात्मिक विनाश नहीं होता।
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