----उपनिषद(7)---
-----पैंगल्य उपनिषद--
यह शुक्ल यजुर्वेदीय उपनिषद-- है। इसमें कुल चार अध्याय हैं।ऋषि पैंगल और महर्षि याज्ञवल्क्य के प्रश्नोत्तर के माध्यम से परम कैवल्य(ब्रह्म) का रहस्य इसमें वर्णित है।
पैंगल्य उपनिषद के प्रमुख श्लोक--
(1) स होवाच याज्ञवल्क्यं तत्त्वमसि त्वं तदसि त्वं ब्रह्मास्यहं ब्रह्मास्मीत्यनुसंधानं
कुर्यात। श्लोक--3/2
भावार्थ ---
याज्ञवल्क्य बोले 'वह तुम हो', 'तुम वह हो' 'तुम ब्रह्म हो', 'मैं ब्रह्म हूं'। ये महावाक्य हैं। जिन पर विचार करना चाहिए।
(2) तत्त्वमसीत्यहं ब्रह्मास्मीति वाक्यार्थविचार: श्रवणं भवति। एकान्तेनश्रवणार्थानुसन्धानं मननं भवति। श्रवणमनननिर्विचीकित्सेअर्थे वस्तुन्येकतानवत्तया चेतास्थापनं निदिध्यासनं भवति। ध्यातृध्याने
विहाय निवातस्थितदीपवद्ध्येयै कगोचरं चित्तं समाधिर्भवति।
श्लोक-- 3/4
भावार्थ --
तत्त्वमसि और अहं ब्रह्मास्मि इन महावाक्यों के अर्थ
पर विचार करना श्रवण कहलाता है। श्रवण किए हुए विषय के अर्थों का एकान्त में अनुसंधान करना मनन कहलाता है। श्रवण और मनन द्वारा निर्णीत अर्थ रूप वस्तु में
एकाग्रतापूर्वक चित्त का स्थापन
निदिध्यासन कहलाता है। जब ध्याता और ध्यान के भाव को
छोड़कर चित्तवृत्ति वायु रहित स्थान में रखे दीपक की ज्योति के सदृश केवल ध्येय में स्थिर हो
जाती है। तब उस अवस्था को समाधि कहते हैं।
(3) यथा जले जलं क्षिप्तं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम्। अविशेषो भवेत्त्द्वज्जिवात्मपरमात्नो:।
श्लोक--4/15
भावार्थ--
जिस प्रकार जल में जल, दुग्ध में दुग्ध और घृत में घृत डाल देने से वे एक रूप हो जाते हैं उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा दोनो मिलकर अविशेष अर्थात् अभिन्न(एक) हो जाते हैं।
(4) यत्रयत्र मृतो ज्ञानी येन वा केन मृत्युना। यथा सर्वगतं व्योम
तत्र तत्र लयं गत:।।
श्लोक--4/19
भावार्थ--
ज्ञानी कहीं भी और कैसे भी मृत्यु को प्राप्त करे, वह हर स्थिति में ब्रह्म में ही लय हो जाता है। क्योंकि आकाश के समान ब्रह्म भी सर्वव्यापी है।
(5) ममेति बध्यते जन्तुर्निरममेति विमुच्यते। मनसो हयुन्मनी भावे द्वैतं नैवोपलभ्यते।
श्लोक-- 4/26
भावार्थ --
मेरा है यह भाव बन्धन में डालता है और मेरा नहीं है यह भाव मोक्ष प्रदान करता है। जब मन उन्मनी अवस्था अवस्था को प्राप्त हो जाता है तब द्वैत भाव समाप्त हो जाता है।
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