वेद और उपनिषद(५ख)
(13) --हंस उपनिषद--
शुक्ल यजुर्वेद से सम्बन्धित इस उपनिषद में कुल इक्कीस मन्त्र हैं। इसमे ऋषि गौतम और सनत्कुमार के प्रश्नोत्तर द्वारा ब्रह्मविद्या के बारे में बताया गया है। एक बार महादेव जी ने पार्वती से कहा कि हंस,(जीवात्मा) सभी शरीरों में विद्यमान है जैसे काष्ठ में अग्नि और तिल में तेल। उसकी प्राप्ति के लिए योग द्वारा 'षट चक्र भेदन'की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। ये छः चक्र प्रत्येक मनुष्य के शरीर में विद्यमान है। सर्वप्रथम व्यक्ति गुदा को खींचकर आधार चक्र से वायु को ऊपर की ओर उठाएँ और स्वाधीष्ठान चक्र की तीन प्रदिक्षणाएँ करके मणिपूरक चक्र में प्रवेश करें। फिर अनाहतचक्र का अतिक्रमण करके विशद्ध चक्र में प्राणों को निरुद्ध करके आज्ञाचक्र का ध्यान करें। तदुपरान्त ब्रह्मरन्ध्र का ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार त्रिमात्र आत्मा से एकाकार करके योगी ब्रह्म में लीन हो जाता है। इसके ध्यान से नाद की उत्पत्ति कही गयी है। जिसकी अनेक ध्वनियों में अवुभूति होती है। इस गुह्य ज्ञान को गुरु भक्त शिष्य को ही देना चाहिए। हंसरूप परमात्मा में एकाकार होने पर संकल्प-विकल्प नष्ट हो जाते हैं।
हंस उपनिषद के प्रमुख श्लोक-
(१) पार्वत्या कथितं तत्त्वं शृणु गौतम तन्मम।
हंसोपनिषद--२
भाव--सनत्कुमारों ने गौतम से कहा, हे गौतम ! महादेव जी ने समस्त धर्मो(उपनिषदों) के मतों को विचार कर
श्री पार्वती जी से जो कहा उसे तुम मुझसे सुनो।
(२) सर्वेषु देहेषु व्याप्तो वर्तते। यथा
ह्यग्निः काष्ठेषु तिलेषु तैलमिव तं विदित्वा मृत्युमत्येति।
हंसोपनिषद--५
भाव--जिस प्रकार तिल में तिल और काष्ठ में अग्नि संव्याप्त रहती है। उसी प्रकार समस्त शरीरों में व्याप्त होकर यह जीव हंस हंस(सोऽहं सोऽहं) जपता रहता है। इसे जानने के पश्चात जीव (जन्म-मृत्यु) से परे हो जाता है।
(३) गुदमवष्टभ्याधाराद्वायुमुत्थाप्य
स्वाधिष्ठानं त्रिः प्रदिक्षणी कृत्य मणिपूरकं गत्वा अनाहत मतिक्रम्य विशुद्धौ प्राराणान्निरुध्याज्ञामनुध्यायन्ब्रह्मरन्ध्रं ध्यायन् त्रिमात्रोअहमित्येव सर्वदा पश्यत्यनाकारश्च भवति।
हंसोपनिषद--६
भाव-- (सोऽहं का ज्ञान)
सर्वप्रथम गुदा को खींचकर मूलाधारचक्र से वायु को ऊपर उठाकर स्वा्धिष्ठान चक्र की तीन परिक्रमा करें। तदुउपरान्त मणिपुर चक्र में प्रवेश करके अनाहत चक्र का अतिक्रमण करें। इसके पश्चात् विशुद्ध चक्र में प्राणों को निरुद्ध करके आज्ञा चक्र का ध्यान करें, फिर सहस्रार चक्र का ध्यान करना चाहिए। इस प्रकार ध्यान करते हुए कि मैं त्रिमात्र आत्मा हूँ। योगी सदा अनाकार ब्रह्म को देखता हुआ अनाकारवत हो जाता है अर्थात् तुरीयावस्था को प्राप्त हो जाता है।
(४) अथो नाद आधाराद्ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तमं
शुद्ध स्फटिकसंकाशः। स वै ब्रह्म
परमात्मेत्युच्यते।
हंसोपनिषद--९
भाव--इस प्रकार मूलाधार से लेकर ब्रह्मरन्ध्र(सहस्रार) तक जो नाद विद्यमान रहता है वह शुद्ध स्फटिकमणि सदृश ब्रह्म है उसी को परमात्मा कहते हैं।
(५) अहोरात्रयोरेकविंशति सहस्राणि
षटशतान्यधिकानि भवन्ति।
हंसोपनिषद--११
भाव--एक अहोरात्र(२४ घण्टे) में इक्कीस हज़ार छः सौ श्वास लिए जाते हैं।
(६) अस्यैव जपकोट्यां नादमनुभवति एवं सर्वं हंसवशान्नादो दशविधौ जायते।
चिणीति प्रथमः। चिञ्चिणीति द्वितीयः।
घण्टानादस्तृतीयः। शंखनादश्चतुर्थम्।
पञ्चमस्तन्वीनादः। षष्ठस्ताल नादः।
सप्तमो वेणुनादः। अष्टमो मृदंगनादः।
नवमो भेरीनादः। दशमो मेघनादः।
हंसोपनिषद--१६
नवमं परित्यज्य दशमेवाभ्यसेत्।
हंसोपनिषद--१७
भाव--इसके(सोऽहं मन्त्र के) दस कोटि जप कर लेने पर साधक को नाद का अनुभव होता है। वह नाद दस प्रकार का होता है।प्रथम-चिणी, द्वितीय-चिञ्चिणी, तृतीय-घण्टनाद, चतुर्थ-शंखनाद, पंचम-तंत्री, षष्ठ--तालनाद, सप्तम-वेणुनाद,अष्टम-मृदंगनाद, नवम-भेरीनाद, दशम-मेघनाद है।।
इसमें से नवम् का परित्याग करके दसवें नाद का अभ्यास करना चाहिए।
(७) प्रथमे चिञ्चिणी गात्रं द्वितीये गात्र भञ्जनम्। तृतीये खेदनं याति चतुर्थे कम्पते शिरः। पञ्चमे स्त्रवते तालु षष्ठेऽमृतनिषेवणम्। सप्तमे गूढ़विज्ञानं परावाचा तथाऽष्टमे।।
हंसोपनिषद--१९
(८) अदृश्यं नवमे देहं दिव्यं चक्षुस्तथाऽमलम्।
दशमं परमं ब्रह्म भवेद्ब्रह्मात्मसंनिधौ।
हंसोपनिषद--२०
भाव--इन नादों के प्रभाव से शरीर में विभिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं। प्रथम नाद के प्रभाव से शरीर में चिनचिनी होती है। द्वितीय से अंगों में अकड़न(गात्र भंजन) होती है। तृतीय से शरीर में पसीना आता है। चतु्र्थ से सिर में कम्पन होती है। पाँचवे से तालु में सन्नाव उत्पन्न होता है। छठे से अमृतवर्षा होती है। सातवें से गूढ़ज्ञान-विज्ञान का लाभ होता है। आठवें से परावाणी प्राप्त होती है। नौवें से शरीर को अदृश्य (अन्तर्धान होने की) करने तथा निर्मल दिव्यदृष्टि की विद्या प्राप्त होती है। और दसवें से परब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करके साधक ब्रह्म का साक्षात्कार प्राप्त कर लेता है।
(९) तस्मिन्मनो विलीयते मनसि संकल्प विकल्पे दग्धं पुण्यपापे सदाशिवः शक्त्यात्मा सर्वत्रावस्थितः स्वयंज्योति
शुद्धो बुद्धो नित्यो निरञ्जनः शान्तः
प्रकाशत इति वेदानुवचनम्।
हंसोपनिषद--२१
भाव--जब मन उस हंस रूप परमात्मा में विलीन हो जाता है। उस स्थिति में संकल्प-विकल्प मन में विलीन हो जाते हैं। तथा पाप और पुण्य भी दग्ध हो जाते हैं। तब वह हंस सदा शिवरूप शक्ति(चैतन्य स्वरूप) आत्मा सर्वत्र विराजमान, स्वयं प्रकाशित, शुद्ध-बुद्ध, नित्य निरञ्जन, शान्त स्वरूप होकर प्रकाशमान होता है, ऐसा वेद का वचन है।
हंस उपनिषद के प्रमुख सुक्तियाँ-
(१) सर्वेषु देहेषु व्याप्तो वर्तते।
हंस उपनिषद--५
भाव--समस्त शरीरों में जीव व्यापत
रहता है।
(२) अहोरात्रयोरेकविंशति सहस्राणि
षटशतान्यधिकानि भवन्ति।
हंसोपनिषद--११
भाव--एक अहोरात्र(२४ घण्टे) में इक्कीस हज़ार छः सौ श्वास लिए जाते हैं।
(३) अस्यैव जपकोट्यां नादमनुभवति एवं
सर्वं हंसवशान्नादो दशविधौ जायते।
हंस उपनिषद--१६
भाव--सोऽहं मन्त्र का दस कोटि का जाप कर लेने पर साधक को नाद का अनुभव होता है।
(४) चिणीति प्रथम।
हंस उपननिषद--१६
भाव-पहले शरीर में चुनचुनाहट होती है।
(५) चिञ्चिणीति द्वितीयः।
हंस उपनिषद--१६
भाव--दूसरे में बढ़ी हुयी चुनचनाहट होती है।
(६) घण्टानादस्तृतीयः।
हंस उपनिषद--१६
भाव--तीसरे में घण्टा बजने की आवाज़ आती है।
(७) शंखनादश्चतुर्थम्।
हंस उपनिषद--१६
भाव--चौथे मे शंख बजने की आवाज़ आती है।
(८) पञ्चमस्तन्वीनादः।
हंस उपनिषद--१६
भाव-- पाँचवे में तन्त्री बजने की आवाज़ आती है।
(९) षष्ठस्ताल नादः।
हंस उपनंषद--१६
भाव--छठे में ताल बजने की आवाज़ आती है।
(१०) सप्तमो वेणुनादः।
हंस उपनिषद--१६
भाव--सातवें में बाँसुरी की आवाज़ आती है।
(११) अष्टमो मृदंगनादः।
हंस उपनिषद--१६
भाव--आठवें में मृदंग बजने की आवाज़ आती है।
(१२)) नवमो भेरीनादः।
हंस उपनिषद--१६
भाव-- नवें में भेरी बजने की आवाज़ आती है।
(१३) दशमो मेघनादः।
हंसोपनिषद--१६
भाव-दसवें मे मेघ गर्जना होती है
(१४) नवमं परित्यज्य दसमेवाभ्यसेत्।
हंसोपनिषद--१७
भाव-- नवें को छोड़कर दसवें का आभ्यास करना चाहिए।
इसमें से नवम् का परित्याग करके दसवें नाद का अभ्यास करना चाहिए।
(१५) प्रथमे चिञ्चिणी गात्रं
हंस उपनिषद--१९
भाव--पहले शरीर में चिनचिनी होती है।
(१६) द्वितीये गात्र भञ्जनम्।
हंस उपवनिषद--१९
भाव--दूसरे शरीर अकड़न होती है।में
(१७)तृतीये खेदनं याति।
हंस उपनिषद--१९
भाव--तीसरा शरीर में पसीना होता है।
(१८) चतुर्थे कम्पते शिरः।
हंस उपनिषद--१९
भाव--चौथे सिर में कम्पन होती है।
(१९) पञ्चमे स्त्रवते तालु।
हंस उपनिषद--१९
भाव--पाँचवे तालू में सन्नाव उत्पन्न होता है।
(२०) षष्ठेऽमृतनिषेवणम्।
हंस उपनिषद--१९
भाव--छठे से अमृतवर्षा हेती है।
(२१) सप्तमे गूढ़विज्ञानं।
हंस उरनिषद--१९
भाव--सातवें से गूढ ज्ञान-विज्ञान का लाभ होता है।
(२२) परावाचा तथाऽष्टमे।।
हंसोपनिषद--१९
भाव--आठवें से परावाणी प्राप्त होती है। (२३) अदृश्यं नवमे देहं दिव्यं चक्षुस्तथाऽमलम्।
हंस उपनिषद--
भाव--नौवें से शरीर दिव्य होता है। इससे शरीर को अदृश्य करने(अन्तर्धान होने) की
तथा निर्मल दिव्यदृष्टि की विद्या प्राप्त होती है।
(२४) दशमं परमं ब्रह्म भवेद्ब्रह्मात्मसंनिधौ।
हंसोपनिषद--२०
भाव-दसवें में साधक पारब्रह्म का ज्ञान प्राप्त करके ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।
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