वेद और उपनिषद 3(ग)
(६)-----मुण्डकोपनिषद-----
मुण्डक शब्द का अर्थ है मुड़ा हुआ सिर।इस उपनिषद के उपदेश मुण्डा किए हुए सिर के समान आत्मा के ऊपर पड़े अज्ञानता के पर्दे को हटा देते हैं। यह दो-दो खण्डों के तीन मुण्डकों में, अथर्व वेद के मंत्र भाग के अन्तर्गत आता है। इसमें पदार्थ और ब्रह्मविद्या का विवेचन है।आत्मा परमात्मा की तुलना और समता का भी वर्णन है। सत्यमेव जयते जो भारत के राष्ट्र चिह्न का भाग है इसी उपनिषद से लिया गया है। इस उपनिषद में परमात्मा द्वारा अपने अन्दर से विश्व के निर्माण (मकड़ी के जाले का उदाहरण) और दो पक्षियों द्वारा जगत के साथ व्यवहार को आत्मा परमात्मा के भेद को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह अद्वैत वादियों और द्वैत वादियों दोनो के रुचि का ग्रन्थ है। इस उपनिषद में ऋषि अंगिरा के शिष्य शौनक और ऋषि के संवाद के रूप में दिखाया गया है। इसमें ६४ मंत्र हैं। पहले मुण्डक में २१, दूसरे मुण्डक में २१ और तीसरे मुण्डक में २२ मंत्र है।प्रथम मुण्डक में परा और अपरा दो विद्याओं का वर्णन है। व्याकरण, ज्योतिष, छंद आदि लौकिक विद्याएँ अपराविद्या तथा आत्मा और ब्रह्म की जानकारी जिससे मोक्ष प्राप्त होती है , पराविद्या है। सृष्टि की उत्पत्ति ब्रह्म से होती है। ब्रह्म से ही ब्रह्माण्ड, प्राण, इन्द्रियाँ और जीवों का जन्म होता है।दूसरे मुण्डक मेंं ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन किया है। ब्रह्म अजर अमर और कारण रूप है। इसे इन्द्रियों से नहीं जाना जा सकता है। केवल अनुभव किया जा सकता है। जो सत्य, तप और श्रद्धा के मार्ग पर चलता है वही ब्रह्म को जान सकता है। एकाग्रता और ध्यान के माध्यम से आत्मा को ब्रह्म में लीन किया किया जा सकता है। तृतीय मुण्डक में ब्रह्म और आत्मा के सम्बन्ध को बारे में बताया गया है कि वस्तुतः इन दोनो में कोई अन्तर नहीं है। इन दोनों में आग और चिन्गारी जैसा सम्बन्ध है। जो व्यक्ति ब्रह्म को जान लेता है उसे और कुछ पाने की आवश्यकता नहीं रह जाती है। वह मुक्त हो जाता है। सत्य, ब्रह्मचर्य और ध्यान से परमात्मा को प्राप्त किया जा सकता है।मुण्डकोपनिषद के प्रमुख श्लोक--
(१) शौनको ह वै महाशालो अंगिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ। कस्मिन्नु भगवोविज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति।मुण्डकोपनिषद--१/१/३
भाव-यह विख्यात है कि शौनक नाम से प्रसिद्ध मुनि जो अति बृहत विद्यावय-ऋषिकुल के अधिष्ठाता थे, उन्होंने विधिवत शास्त्र विधि के अनुसार महर्षि अंगिरा की शरण ली और उनसे विनयपूर्वक पूछा, भगवन् ! किसको जान लेने पर सब कुछ जाना हुआ हो जाता है। यह मेरा प्रश्न है।
(२) तस्मै स होवाच। द्वे विद्ये वेदितव्ये
इति ह स्मयद्वह्मविदो वदन्ति परा चैवापराच।
मुण्डकोपनिषद--१/१/४
भाव--उन मुनि शौनक से महर्षि अंगिरा बोले, ब्रह्म को जानने वाले, इस प्रकार निश्चयपूर्वक कहते आए हैं कि दो विद्याएँ मनुष्य के लिए जानने योग्य है। एक परा और दूसरी अपरा।
(३) तत्रापरा ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदो अथर्ववेदः शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुक्तं छन्दो ज्योतिषमिति। अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते।
मुण्डकोपनिषद--१/१/५
भाव--उनमे से ऋगुवेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष, यह सभी अपरा विद्या के अन्तर्गत हैं। तथा जिससे वह अविनाशी परब्रह्म तत्व से जाना जाता है, वह परा विद्या है।
(४) यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथापृथिव्यामोषधयः सम्भवन्ति। यथा सतःपुरुसात् केशलोमानि तथाक्षरात सम्भवतीहविश्वम्।
मुण्डकोपनिषद--१/१/७
भाव--जिस प्रकार मकड़ी जाले को बनाती है और निगल जाती है तथा जिस प्रकार पृथ्वी में अनेको प्रकार की औषधियाँ उत्पन्न होती हैं और जिस प्रकार जीवित मनुष्य से केश और रोएँ उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अविनाशी परब्रह्म से यहाँ इस सृष्टि में सबकुछ उत्पन्न होता है।
(५) काली कराली च मनोजवा च सुलोहिता या च सुधूम्रवर्णा। स्फुलिंगिनीविश्वरुची च देवी लेलायमाना इति सप्तजिह्वाः।
मुण्डकोपनिषद--१/२/४
भाव--काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिंगिनी तथा विश्वरुची देवी यह सात अग्निदेव की लपलपाती हुयी जिह्वाएँ हैं।
(६) तपः श्रद्धे ये हयुपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वांसो भेक्ष्यचर्यां चरन्तः। सूर्य द्वारेण ते विरजाः प्रयान्ति यत्रामृतः स पुरुषो ह्याव्ययात्मा।
मुण्डकोपनिषद--१/२/११
भाव--वह जो वन में रहने वाले शांत स्वभाव वाले, विद्वान तथा भिक्षा के लिए विचरने वाले मयमरूप तप तथा श्रद्धा का सेवन करते हैं। वह रजोगुण रहित सूर्य के मार्ग से वहाँ चले जाते हैं , जहाँ पर वह जन्म मृत्यु से रहित नित्य, अविनाशी परम पुरुष परमात्मा रहता है।
(७) तदेतत सत्यं यथा सुदीप्तात् पावकाद्विस्फुलिंगाः सहस्रशः प्रभवन्ते सरूपाः। तथाक्षराद्विविधाः सोम्यभावाःप्रजायन्ते तत्र चैवापि यन्ति।मण्डकोपनिषद--२/१/१
भाव--हे प्रिय ! वह सत्य यह है। जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि में से उसी के समान रूप वाली हज़ारों चिनगारियाँ अनेक प्रकार से प्रकट होती हैं। तथा उसी प्रकार अविनाशी ब्रह्म से अनेकों प्रकार के भाव उत्पन्न होते हैं और उसी में विलीन हो जाते हैं।
(8) पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म
परामृतम्। एतद्यो वेद निहितं गुहायां
सोअविद्याग्रन्थिं विकिरतीह सोम्य।
मुण्डकोपनिषद -२/१/१०
भाव--तप, कर्म और परम अमृतरूप ब्रह्म यह सब कुछ परमपुरुष पुरुषोत्तम ही है। हे प्रिय ! इस हृ़दयरूप गुफा में स्थित अन्तर्यामी परमपुरुष को जो जानता है, वह यहाँ इस मनुंष्य शरीर में ही अविद्या जनित गाँठ को खोल डालता है अर्थात् सभी प्रकार के संशय और भ्रम से रहित होकर परब्रह्म पुरुषोत्तम को प्राप्त हो जाता। है।
(९) आविःसंनिहितं गुहाचरं नाम
महत्पदंत्रैतत् समर्पितम्। एजत्प्राणन्निमिषश्च यदेतज्जानथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम्।
मुुण्डकोपनिषद--२/२/१
भाव--जो प्रकाश स्वरूप, अत्यन्त समीपस्थ, हृदयरूप गुफा में स्थित होने के कारण गुहाचर नाम से प्रसिद्ध और महान पद है। जितने भी चेष्टा करने वाले, श्वास लेने वाला और आँखों को खोलने बंद करने वाला प्राणी हैं। यह सभी इसी में समर्पित, इसी में प्रतिष्ठित हैं। इस परमेश्वर को तुम लोग जानो जो सत और असत है। सबके द्वारा वरण करने योग्य और अतिशय श्रेष्ठ हैं तथा समस्त प्राणियों की बुद्धि से परे अर्थात् जानने में न आने वाला है।
(१०) धनुर्गृहीत्वौपनिषदं महास्त्रं शरं हयुपासा निशितं सन्धयीत। आयम्य तद्भागवतेन चेतसा लक्ष्यं तदेवाक्षरं सोम्यविद्धि।
मुण्डकोपनिषद--२/२/३
भाव--उपनिषद में वर्णित प्रणव रूप महान धनुष को लेकर, उस पर निश्चय ही उपासना द्वारा तीक्ष्ण किया हुआ, बाण चढ़ाकर फिर चित्त के द्वारा उस बाण को खींचकर हे प्रिय ! उस परम अक्षर पुरुषोत्तम को ही लक्ष्य मानकर बेधें।
(११) प्रणवो धनुः शारो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत् तन्मयो भवेत्।
मुण्डकोनिषद--२/२/४
भाव--यहाँ ओंकार ही धनुष है। आत्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही उसका लक्ष्य कहा जाता है। वह प्रमाद रहित मनुष्य द्वारा ही बेधे जाने योग्य है। अतः उसे बेधकर बाण की तरह उस लक्ष्य में तन्मय हो जाना चाहिए।
(१२) न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोअयमअग्निः। तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भाषा सर्वमिदं विभाति।
मुण्डकोपनिषद--२/२/१०
भाव--वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है। न चन्द्रमा न तारागण ही और न बिजलीयाँ ही वहाँ कौंधती है। फिर इस अग्नि के लिए तो कहना ही क्या है ? क्योंकि उसके प्रकाशित होने पर ही उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित होते है। उसी के प्रकाश से यह सम्पूर्ण जगत प्रकाशित होता है।
(१३) ब्रह्मैै वेदममृतं पुरस्ताद ब्रह्म पश्चाद ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण। अधश्चोर्ध्वं च प्रसृतं ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।
मुण्डकोपनिषद--२/२/११
भाव--यह अमृतस्वरूप परब्रह्म ही सामने है। परब्रह्म ही पीछे है। पर ब्रह्म ही दायीं ओर तथा बायीं ओर, नीचे की ओर तथा ऊपर की ओर भी फैला हुआ है। यह जो सम्पूर्ण जगत है, यह सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है।
(१४) द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षे परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं
स्वाद्वत्तयनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति।
मुण्डकोपनिषद--३/१/१
भाव-- एक साथ रहने वाले तथा आपस में समभाव रखने वाले दो पक्षी जीवात्मा और परमात्मा एक ही वृक्ष (शरीर) का आश्रय लेकर रहते हैं। उन दोनों में से एक तो पीपल का गोदी खाता है और दूसरा साक्षीभाव से देखता रहता है।
(१५) समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोअनिशया शोचतिमुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति
वीतशोकः।
मुण्डकोपनिषद--३/१/२
भाव--शरीर रूपी समान वृक्ष पर रहने वाला जीवात्मा शरीर की गहरी आसक्ति में डूबा हुआ है। असमर्थता रूप दीनता का अनुभव करता हुआ मोहित होकर शोक करता है।जब कभी वह भगवान अहैतुकी कृपा से भक्तों द्वारा नित्य सेवित तथा अपने से भिन्न परमेश्वर और उसकी महिमा को यह प्रत्यक्ष कर लेता है तब सर्वथा शोकरहित हो जाता है।
(१६) सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः। येनाअक्रममन्त्यृषयो ह्याप्तकामा यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ।
मुण्डकोपनिषद--३/१/६
भाव-- सत्य ही विजयी होता है, झूठ नहीं क्योंकि वह देवयान नामक मार्ग सत्य से परिपूर्ण है जिसमें पूर्णकाम ऋषि लोग वहाँ गमन करते हैं जहाँ वह सत्य स्वरूप परब्रह्म परमात्मा का उत्कृष्ट धाम है।
(१७) यं यं लोकं मनसा संविभाति
विशुद्धसत्त्वः कामयते यांश्च कामान् ।
तं तं लोकं जयते तांश्च
कामांस्तस्मादात्मज्ञं ह्यर्चयेत् भूतिकामः।
मुण्डकोपनिषद--३/१/१०
भाव--विशुद्ध अंतःकरण वाला मनुष्य
जिस जिस लोक को मन से चिन्तन करता है तथा जिन-जिन भाोगों की कामना करता है, उन-उन लोकों को जीत लेता है, और उन इच्छित भोगों को भी प्राप्त कर लेता है। इसलिए ऐश्वर्य की कामना वाला मनुष्य शरीर से भिन्न आत्मा को जानने वाले महात्मा का सत्कार करे।
(१८) नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैषवृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।
मुण्डकोपनिषद--३/२/३
भाव--यह परब्रह्म परमात्मा न तो प्रवचन से, न बुद्धि से और न बहुत सुनने से ही प्राप्त हो सकता है। यह जिसको स्वीकार कर लेता है उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है क्योंकि यह आत्मा परमात्मा उसके लिए अपने यथार्थ स्वरूप को प्रकट कर देता है।
(१९) नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च
प्रमादात् तपसो वाप्यलिंगात्। एतैरूपायैर्यतते यस्तु विद्वांस्तस्यैष आत्मा विशते ब्रह्मधाम।।
मुण्डकोपनिषद--३/२/४
भाव--यह परमात्मा बलहीन मनुष्य द्वारा
नहीं प्राप्त किया जा सकता तथा प्रमाद से अथवा लक्षण रहित तप से भी नहीं प्राप्त किया जा सकता है। किन्तु जो बुद्धिमान साधक इन उपायों द्वारा प्रयत्न करता है उसका यह आत्मा ब्रह्मधाम में प्रविष्ट हो जाता है।
(२०) यथा नद्यःस्यन्दमानाः समुद्रेस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय। तथा विद्वान
नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति
दिव्यम्।
मुण्डकोनिषद--३/२/८
भाव-- जिस प्रकार बहती हुयी नदियाँ
नाम-रूप को छोड़कर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महात्मा नाम-रूप से विमुक्त होकर उत्तम से उत्तम दिव्य परम पुरुष परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
(२१) स यो ह वै तत् परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्या ब्रह्म वित्कुले भतति। तरति शोकं तरति पापमानं गुहा ग्रन्थिभ्यो विमुक्तो अमृतो भवति।
मुण्कोनिषद--३/२/९
भाव--निश्चय ही जो कोई भी उस परम ब्रह्म परमात्मा को जान लेता है वह महात्मा ब्रह्म ही हो जाता है उसके कुल में ब्रह्म को न जानने वाला नहीं होता। वह शोक से पार हो जाता है। पाप समुदाय से तर जाता है और हृदय की गाँठों से सर्वथा छूटकर अमर हो जाता है।
मुण्डकोपनिषद की सूक्तियाँ--
(१) परायया तदक्षरमधिगम्यते।
मुण्डकोपनिषद--१/१/५
भाव--जिससे वह अविनाशी परब्रह्म जाना जाता है, वह पराविद्या है।
(२) तथा अक्षरात सम्भवतीह विश्वम्।
मुण्डकोपनिषद--१/१/७
भाव--अविनाशी परब्रह्म से यहाँ इस सृष्टि में सब कुछ उत्पन्न होता है।
(३) कर्मसु चामृतम्।
मुण्डकोपनिषद--१/१/८
भाव-- कर्म से कर्म के फल सुख-दुख मिलते हैं।
(४) अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः।
मुण्डकोपनिषद--१/२/८
भाव-- अन्धों का समूह किसी अन्य अन्धे के नेतृत्व में चलता है। (और भटकता रहता है।)
(५) आविःसंनिहितं गुहाचरं नाम।
मुण्डकोपनिषद--२/२/१
भाव--वह प्रकाशमान ब्रह्म (हृदयमें) अत्यन्त समीप होने के कारण गुहाचर
नाम से जाना जाता है ।
(६) प्रणवो धनुः शारो ह्यात्मा ब्रह्म
तल्लक्ष्य मुच्यते।
मुण्डकोपनिषद-२/२/४
भाव--यहाँ ओमकार ही धनुष है। आत्मा ही बाण है और परब्रह्म परमेश्वर ही वह लक्ष्य कहा जाता है।
(७) हिरण्मये परे कोशे विरजं ब्रह्म निष्कलम्।
मुण्डकोपनिषद--२/२/९
भाव--वह परम हिरण्मय कोश में निष्कलंक, निरवयव ब्रह्म निवास करता है।
(८) न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं।
मुण्डकोपनिषदि--२/२/१०
भाव-- वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्र तारे।
(९) तस्यभासा सर्वमिदं विभाति।
मुण्डकोपनिषद--२/२/१०
भाव--उसी के प्रकाश से सब प्रकाशित है।
(१०) ब्रह्मैवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम्।
मुण्डकोपनिषद--२/२/११
भाव--यह जो सम्पूर्ण जगत है, यह सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है।
(११) द्वा सुपर्णा सयुजा सखायासमानं
वृक्षं परिषस्वजाते।
मुण्डकोपनिषद--३/१/१
भाव--दो सुन्दर पर वाले एक साथ सखा भाव से रहने वाले एक ही वृक्ष पर आश्रय लेकर रहते हैं।(जीवात्मा और परमात्मा एक ही शरीर में)
(१२) अन्तः शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो यं
पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः।
मुण्डकोपनिषद--३/१/५
भाव-- शरीर के अन्दर प्रकाशस्वरूप विशुद्ध परमात्मा को सभी प्रकार के दोषों से रहित साधक ही देख पाता है।
(१३) सत्यमेव जयते नानृतम्।
मुण्डकोपनिषद--३/१/६
भाव-- सत्य ही विजयी होता है झूठ नहीं।
(१४) सत्येन पन्था विततो देवयानः।
मुण्डकोपनिषद--३/१/६
भाव--देवयान नामक मार्ग सत्य से युक्त है।
(१५) पश्यन्त्विहैव निहितं गुहायाम्।
मुण्डकोपनिषद--३/१/७
भाव--बाहर देखने वाले के हृदय में वह स्थित है।
(१६) न चक्षुसा गृह्यते नापि वाचा।
मुण्कोपनिषद--३/१/८
भाव-न वह आँख से देखा जा सकता है और न वाणी से बताया जा सकता है।
(१७) नायनात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुधा श्रुतेन।
मुण्डकोपनिषद--३/२/३
भाव--यह ब्रह्म न प्रवचन से, न बुद्धि से और न बहुत सुनने से प्राप्त होता है।
(१८) नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो।
मुण्डकोपनिषद--३/२/४
भाव--यह ब्रह्म बलहीन द्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता हयह उपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है। इसमें आत्मा या चेतना के चार अवस्थाओं का वर्णन मिलता है।
-----,माण्डूक्योपनिषद ---+
यह केवल १२ मन्त्रों का आकार में सबसे छोटा है परन्तु महत्व के विचार से ऊँचा है।
इस उपनिषद में कहा गया है कि विश्व में एवं भूत, भविष्य और वर्तमान कालों में तथा इनके परे भी जो नित्य तत्व सर्वत्र
व्याप्त है, वह ॐ है। यह सब ब्रह्म हैऔर यह आत्मा भी ब्रह्म है। यह उपनिषद अथर्ववेद के ब्राह्मण भाग से लिया गया है।
इस पर आचार्य शंकर ने भाष्य और गौड़ पादाचार्य ने कारिकाएँ लिखी हैं।
आत्मा चतुष्पाद है अर्थात् उसकी अभिव्यक्ति की चार अवस्थाएँ हैं--जाग्रत,
स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय।
(१) जाग्रत अवस्था की आत्मा को वैश्वानर कहते हैं इसलिए कि इस रूप में सब नर एक योनि से दूसरी योनि में जाते रहते हैं। इस अवस्था का जीवात्मा बहिर्मुखी होकर
सप्तांगों तथा इन्द्रियादि १९ मुखों से स्थूल अर्थात् इन्द्रिय ग्राह्य विषयों का रस लेता है। अतः वह बहिष्प्रज्ञ है।
(२) दूसरी तेजस नामक स्वप्नावस्था है।। इसमें जीव अन्तःप्रज्ञ होकर सप्तांगों और १९ मुखों से जाग्रत अवस्था की अनुभूतियों को मन के स्फुरण द्वारा बुद्धि पर पड़े हुए विभिन्न संस्कारों का शरीर के भीतर भोग करता है।
(३) तीसरी अवस्था सुषुप्ति अर्थात् प्रगाढ़
निद्रा का लय हो जाता है और जीवाक्मा की स्थिति आनन्दमय ज्ञानस्वरूप हो जाती है। इस कारण इस स्थिति में वह सर्वेश्वर, सर्वज्ञ और अन्तर्यामी एवं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति एवं लय का कारण है।
(४) परन्तु इन तीनो अवस्थाओं के परे आत्मा का चतुर्थपाद अर्थात् तुरीय अवस्था ही उसका सच्चा और अन्तिम स्वरूप है। जिसमें वह न अन्तःप्रज्ञ है, न बहिष्प्रज्ञ है और न इन दोनों का संघात है, न प्रज्ञानघन है, न प्रज्ञ और न अप्रज्ञ बल्कि अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचिन्त्य, अव्यपिदेश्य,एकात्मप्रत्ययसार, शान्त, शिव और अद्वैत है जहाँ जगत जीव और ब्रह के
भेदरूपी प्रपञ्च का अस्तित्व नहीं है।
ॐकार रूपी आत्मा का जो स्वरूप उसके चतुष्पाद की दृष्टि से इस प्रकार निष्पन्न होता है, उसे ही ॐकार की मात्राओं के विचार से इस प्रकार व्यक्त किया गया है कि ॐ की अकार मात्रा से वाणी का आरम्भ होता है और अकार वाणी में व्याप्त भी है। सुषुप्ति स्थानीय प्राज्ञ ॐकार की
मकार मात्रा है, जिसमें विश्व और तेजस के प्राज्ञ में लय होने की तरह अकार और उकार का लय होता है एनं ॐ का उच्चारण दुहराते समय मकार के अकार उकार निकलते से प्रतीत होते हैं। तात्पर्य यह है कि ॐकार जगत की उत्पत्ति और लयका कारण है।
वैश्वानर, तेजस और प्राज्ञ अवस्थाओं के सदृश त्रैमात्रिक ॐकार प्रपञ्च तथा पुनर्जन्म से आबद्ध है किन्तु तुरीय की तरह
अ मात्र ॐ अव्यवहार्य आत्मा है जहाँ जीव जगत और आत्मा(ब्रह्म) के भेद का प्रपञ्च नहीं है और केवल अद्वैत शिव ही शिव रह जाता है।
मांडूक्योपनिषद के प्रमुख श्लोक--
(१) ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति
सर्वंॐकार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं
तदप्योंकार एव।
माण्डुक्योपनिषद--१
भाव--ॐ- यह अक्षर ही सर्व है। सब उसकी ही व्याख्या है। भूत, भविष्य, वर्तमान सब ॐकार ही है तथा अन्य जो त्रिकालातीत है, वह भी ॐकार ही है।
(२) सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोअयमात्मा चतुष्पात्।
माण्डूक्योपनिषद--२
भाव--यह सब कुछ ब्रह्म ही है। यह आत्मा भी ब्रह्म ही है। ऐसा यह आत्मा चार पादों वाला है।
(३) जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्तांग
एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः
पादः।
माण्डूक्योपनिषद--३
भाव--जाग्रत जिसका स्थान है। बाहर की ओर जिसकी प्रज्ञा है। सात अंगों वाला, उन्नीस मुखों वाला, स्थूल विषय का भोक्ता,
वैश्वानर ही प्रथम पाद है।
(४) स्वप्नस्थानोअन्तःप्रज्ञः सप्तांग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो
द्वितीयः पादः।
माण्डूक्योपनिषद--४
भाव--स्वप्न जिसका स्थान है। अन्दर की ओर जिसकी प्रज्ञा है। सात अंगो वाला, उन्नीस मुखों वाला, सूक्ष्म विषय का भोक्ता,
तेजस ही दूसरा पाद है।
(५) यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते
न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम्।
सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतोमुखः
प्राज्ञस्तृतीयः पादः।
माण्डूक्योपनिषद--५
भाव--सोया हुआ जब किसी काम की कामना नहीं करता, न कोई स्वप्न देखता है, वह सुसुप्ति की अवस्था है। सुसुप्ति जिसका स्थान है। एकीभूत और प्रज्ञा से घनीभूत, आनन्दमय, चेतनारूपी मुखवाला, आनन्द का भोक्ता, प्राज्ञ ही तीसरा पाद है।
(६) एष सर्वेश्वरः एष सर्वज्ञ एषोअन्तर्याम्येष योनिःसर्वस्य प्रभवाप्यौ हि भूतानाम्।
माण्डूक्योपनिषद--६
भाव--यह सबका ईश्वर है, यह सर्वज्ञ है।
यह अन्तः आयामी है, यही योनि है, समस्त भूतों की उत्पत्ति-प्रलय स्थान है।
(७) नान्तं प्रज्ञं न बहिष्प्रज्ञं नोभयतः प्रज्ञं
न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम्। अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणं अचिन्त्यम
व्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं प्रपञ्चोपशमं
शान्तं शिवमद्वैतम चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा
स अज्ञेयः।
माण्डूक्योपनिषद--७
भाव--जो न अन्दर की ओर प्रज्ञा वाला है,
न बाहर ओर की ओर प्रज्ञा वाला है, न दोनो ओर प्रज्ञा वाला है, न प्रज्ञा से घनीभूत
ही है, न जानने वाला है, न नहीं जानने वाला है, न देखा जा सकता है, न व्यवहार में आ सकता है, न ग्रहण किया जा सकता है, लक्षण से रहित है, न चिन्तन में आ सकता है, न उपदेश किया जा सकता है, एक मात्र आत्म की प्रतीति ही जिसका सार है, प्रपञ्च से रहित, शान्त, शिव अद्वैत ही
चौथा पाद कहा जाता है, वही आत्मा है , वही जाने योग्य है।
(८) सोअयमात्माध्यक्षरं ॐकारोअधिमात्रं
पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।
माण्डूक्योपनिषद--८
भाव-- ऐसा वह आत्मा अक्षर दृष्टि से, मात्राओं का आश्रयरूप, ॐकार ही है।
पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है जो कि अकार, उकार और मकार है।
माण्डूक्योपनिषद की प्रमुख सूक्तियाँ--
(१) ॐ इत्येतदक्षरमिदं सर्वं।
माण्डूक्योपनिषद--१
भाव--ॐ- यह अक्षर ही सर्व है।
(२) भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वं ॐकार एव।
माण्डूक्योपनिषद--१
भाव--भूत, भविष्य, वर्तमान सब ओंकार ही है।
(३) सोअयमात्मा चतुष्पात्।
माण्डूक्योपनिषद--२
भाव--ऐसा यह आत्मा(ब्रह्म) चार पादों वाला है।
(४) स्थूलभुग्वैश्ववानरः प्रथमः पादः।
माण्डूक्योपनिषद--३
भाव--स्थूल विषय का भोक्ता वैश्वानर ही
प्रथम पाद है।
(५) प्रविविक्त भुक्तैजसो द्वितीयः पादः।
माण्डुक्योपनिषद--४
भाव--सूक्ष्म विषय का भोक्ता तैजस ही
दूसरा पाद है।
(६) ह्यानन्दभुक् प्राज्ञस्यतृतीयः पादः।
माण्डूक्योपनिषद--५
भाव--आनन्द का भोक्ता प्राज्ञ ही तीसरा पाद है।
(७) प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवं अद्वैतं चतुर्थं
मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः।
मण्डूक्योपनिषद--६
भाव--प्रमञ्च से रहित, शान्त, शिव अद्वैत ही चौथा पाद कहा जाता है। वही आत्मा है,वही जानने योग्य है।
(८) सोअयमात्माध्यक्षरंॐकारो अधिमात्रम्।
माण्डूक्योपनिषद--८
भाव--ऐसा वह आत्मा अक्षर दृष्टि से
मात्राओं का आश्रयरूप ॐकार ही है।
(९) पादामात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।
माण्डूक्योपनिषद--८
भाव--पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है है, जो कि अकार, उकार और मकार है।
(१०) जागरित स्थानो वैश्वानरो अकारः।
माण्डूक्योपनिषद--९
भाव--जाग्रत स्थान वाला वैश्वानर ही अकार है।
(१०) स्वप्नस्थानस्तैजस उकारो।
माण्डूक्योपनिषद--१०
भाव-- स्वप्न स्थानवाला तैजस ही उकार है।
(११) सुषुप्त स्थानः प्राज्ञो मकारः।
माण्डुक्योपनिषद --११
भाव--सुषुप्ति स्थान वाला प्राज्ञ ही मकार है।
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