वेद और उपनिषद ३(ख)

    (४) प्रश्नोपनिषद के श्लोक--
महर्षि पिप्लाद दधीचि एवं उनकी पत्नी सुवर्चस के पुत्र थे। दधीचि की मृत्यु के बाद‌ जब सुवर्चस अपनी पति के साथ सती होने वाली थीं, तभी आकाशवाणी हुयी कि सुवर्चस गर्भवती हैं, इसलिए पति के साथ सती नहीं हो सकतीं। सुवर्चस ने एक पत्थर से भ्रूण को निकाला और इसे एक पीपल के खोण्डर में रख दिया और वह अपने पति के साथ‌ सती हो गयीं। पीपल के खोण्डर में जो पीपल का गोदा गिरता था, उसे खाकर बच्चा बड़ा हुआ।
इसलिए बच्चे का नाम पिप्लाद पड़ा।
बड़े हुए तो उन्हें ज्ञात‌ हुआ कि शनि के साढ़े साती के कारण कम आयु में उनके माता-पिता ने उनका साथ छोड़ दिया था।
(देवताओं ने इनके पिता के अस्थियों से बज्र बनाया और वृत्तासुर का संहार किया था)। पिप्लाद शनि को दण्ड देने हेतु भगवान् शिव की तपस्या की। आप भगवान शिव के अवतार हैं। तपस्या के बाद आपको  भगवान शिव से दिव्य शक्ति
प्राप्त हुयी। आपने शनि को आकाश से
नीचे उतार लिया और शनि को भस्म करने वाले ही थे कि शनि देव ने भगवान शिव से रक्षा करने हेतु पुकारा भगवान शिव ने पिप्लाद ‌को बताया कि जन्म और मृत्यु पर मानव का अधिकार नहीं है। शनि देव पिप्लाद के क्रोधाग्नि से जलकर काले पड़ चुके थे। वह पिप्लाद के सामने हाथ  जोड़कर खड़े थे। भगवान शिव के कहने पर आपने शनिदेव को क्षमा कर दिया ।और‌ यह कहा कि आज से तुम्हारे साढ़े साती का प्रभाव बालक पर नहीं पड़ सकता। प्रश्नोपनिषद के प्रवक्ता आप ही हैं। यह उपनिषद अथर्ववेदीय शाखा के अन्तर्गत एक उपनिषद है। इस उपनिषद में छः खण्ड हैं। इन्हें छः प्रश्न भी कहते हैं‌। प्रत्येक खण्ड में एक-एक प्रश्न छः जिज्ञासुओं द्वारा महर्षि पिप्लाद से पूछा गया है और आचार्य द्वारा उसका उत्तर दिया गया है। प्रारम्भ में सुकेशा आदि छः ऋषि कुमार  महर्षि पिप्लाद के पास  अपने-अपने प्रश्न पूछने आते हैं। महर्षि ने एक वर्ष आश्रम में संयम पूर्वक रहने का आदेश दिया और कहा, इसके बाद ही आप अपना प्रश्न पूछ सकते हैं। हो सकता है ऐसा इसलिए कहा गया हो जिससे शिष्य की पात्रता की परख हो सके।
पहला प्रश्न--कबन्धी ने पूछा कि भगवन् ! बताएँ कि किस कारण विशेष से यह सम्पूर्ण प्रजा अनेक रूपों में उत्पन्न होती है ?
दूसरा प्रश्न--भार्गव ने पूछा, भगवन् ! मुझे बताएँ कुल कितने देवता प्रजा को धारण करते हैं ?
उनमें से कौन- कौन इसे प्रकाशित करता है ?और‌ यह भी बताएँ कि इनमें कौन सर्वश्रेष्ठ है ?
तीसरा प्रश्न--तीसरा प्रश्न आश्वलायन ने पूछा, भगवन !
(क) यह प्राण किससे उत्पन्न होता है ?
(ख) इस शरीर में कैसे आता है ?
(ग) यह अपने को विभाजित करके किस प्रकार स्थापित करता है ?
(घ) यह इस‌ शरीर‌से कैसे बाहर‌ जाता‌ है ?
(च) यह‌ किस प्रकार वाह्य जगत को धारण करता है ?
प्रश्नोपनिषद के प्रमुख श्लोक--
(१) स्वस्ति वाचन-- प्रश्नोपनिषद
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।
भाव--जिनका सुयश चारो ओर फैला हुआ है, वह इन्द्र देव हमारा कल्याण करें।
सम्पूर्ण विश्व का  ज्ञान रखने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें। अरिष्टों को मिटाने वाले चक्र सदृश्य शक्तिशाली  गरुड़ देव हमारा कल्याण करें। बुद्धि के स्वामी बृहस्पति ‌देव हमारा कल्याण करें।
----(२) अथ कबन्धी कात्यायन उपेत्य पप्रच्छ। भगवन कुते ह व इमाः प्रजायन्त इति।
       प्रश्नोपनिषद--१/३
भाव--कत्य ऋषि के प्रपौत्र कबन्धी ने पिप्लाद ऋषि के पास जाकर पूछा, भगवन् ! किस कारण विशेष से यह सम्पूर्ण प्रजा अनेक रूपों में उत्पन्न होती है ?
(३) अन्नं वै प्रजापतिस्ततो ह वै तद्रेततस्तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति।
        प्रश्नोपनिषद--१!१४
भाव--अन्न ही प्रजापति है। क्योंकि उसी से वीर्य बल उत्पन्न होता है। उस वीर्य से ही सम्पूर्ण चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं।
(४) तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु
 जिह्ममनृतं न माया चेति।
    प्रश्नोपनिषद--१/१६
भाव--जिनमें न तो कुटिलता और झूठ है तथा न माया अर्थात् कपट ही है। उन्हीं को वह विशुद्ध विकार रहित ब्रह्मलोक प्राप्त होता है। (दूसरों को नहीं।
(५) अथ हैनं भार्गवो वैदर्भिःपप्रच्छ।
भगवन्  ! कत्येव देवा: प्रजां ‌विधारयन्ते कतर एतत प्रकाशयन्ते कः पुनरेषां वरिष्ठ इति।
  प्रश्नोपनिषद--२/१
भाव इसके पश्चात् वैदर्भ देश के भार्गव ने  पिप्लाद ऋषि से पूछा,  भगवन् ! कुल कितने देवता प्रजा को धारण करते हैं  ?
उनमे से कौन-कौन इसे प्रकाशित करते हैं ? इसके बाद आप यह भी बताइए कि इन सबमे  कौन सर्वश्रेष्ठ है ?
(६) तस्मै स होवाचाकाशो ह वा एष देवो
वायुरग्नि रापःपृथिवीवांमनश्चक्षुः श्रोत्रं च।
ते प्रकाश्याभिवदन्ति वयमेतद्वाणम्वष्टभ्य
विधारयामः।
प्रश्नोपनिषद--२/२
भाव--उन प्रसिद्ध महर्षि पिप्लाद ने उन भार्गव से कहा, निश्चय ही वह प्रसिद्ध आकाश देवता है। तथा वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, वाणी, कर्मेन्द्रियाँ, नेत्र और श्रोत्र
ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन अंतःकरण भी देवता हैं। वे सब अपनी-अपनी शक्ति प्रकट करके अभिमान पूर्वक कहने लगे हमने इस शरीर को आश्रय देकर धारण कर रखा है।
(७) तान् वरिष्ठः प्राण उवाच। मा 
मोहमापद्यथ अहमेवैततपञ्चधा आत्मानं 
प्रविभज्यैतद्वाणमवष्टभ्य विधारयामीति
तेअश्चद्दधाना वभूवुः।
प्रश्नोपनिषद--२/३
भाव--उनसे सर्वश्रेष्ठ प्राण बोला,  तुम लोग मोह में न पड़ो, मैं ही अपने इस स्वरूप को पाँच भागों में विभक्त‌करके, इस शरीर को आश्रय देकर धारण करता हूँ। यह सुनकर भी उन देवताओं ने विश्वास नहीं किया। वे अविश्वासी ही बने रहे।
(८) सोअभिमानादूर्ध्वमुत्क्रामत इव तस्मिन्न
उत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिंश्च
प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रतिष्ठन्ते। तद्यथा
मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्व 
एवोत्क्रमन्ते तस्मिंश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव
प्रातिष्टन्त एवं वांमनष्चक्षुः श्रोत्रं च ते प्रीताः
प्राणं स्तुवन्ति।
प्रश्नोपनिषद--२/४
भाव--तब वह प्राण अभिमानपूर्वक मानो उस शरीर से ऊपर की ओर जाने लगा, उसके बाहर निकलने पर उसी के साथ ही साथ अन्य सब भी बाहर निकलने लगेऔर शरीर में लौटकर ठहरने पर वह सब देवता भी ठहर गए। जैसे मधु के छत्ते से रानी के निकलने पर सारी मक्खयाँ भी बाहर निकल जाती हैं और उसके बैठ जाने पर सभी वापस उस छत्ते में बैठ जाती हैं। वैसे ही दशा उन सबकी भी हुयी।
(९) अथहैनं कौशल्यश्चाश्वलायनः पप्रच्छ।
भगवन् कुत एष प्राणो जायते कथमायात्यस्मिन्शरीर आत्मानं वा प्रविभज्य कथं प्रतिष्ठते केनोत्क्रमते कथं बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्ममिति।
प्रश्नोपनिषद--३/१
भाव--इसके बाद महर्षि पिप्लाद से 
कोशलदेशीय आश्वलायन ने पूछा, भगवन ! 
(क) यह प्राण किससे उत्पन्न होता है ?
(ख) इस शरीर में कैसे आता है ?
(ग) यह अपने को विभाजित करके किस प्रकार स्थापित होता है ? 
(घ) यह इस शरीर से कैसे उत्क्रमण अर्थात् बाहर जाता‌ है।
(च) यह किस प्रकार वाह्य जगत को भली भाँति धारण करता है ?
(छ) यह किस प्रकार मन और इन्द्रिय आदि शरीर‌ के आन्तरिक‌ जगत‌‌ को 
धारण करता है ?
(१०) आत्मन एष प्राणो जायते। यथैषा पुरुष छायैतस्मिन्नेतदाततं मनोकृतेनायात्यस्मिनशरीरे।
प्रश्नोपनिषद--३/३
भाव--ऋषि बोले, यह प्राण परमात्मा से उत्पन्न होता है। जिस प्रकार यह छाया पुरुष के होने पर ही होती है। उसी प्रकार यह प्राण परमात्मा पर ही आश्रित है और हम शरीर में मन के किए हुए संकल्प से आते हैं। भाव यह है कि प्राण के शरीर से निकलते 
समय प्राणी के मन में उसके कर्मानुसार जैसा उसका संकल्प होता है उसे वैसा ही शरीर प्राप्त होता है। अतः प्राणी का शरीर में प्रवेश मन के संकल्प से ही होता है।
(११) यथा सम्रादेवाधिकृतान विनियुंक्ते एतन् ग्रामानोतान ग्रामानधितिष्ठस्वेत्येवमेवैष प्राण इतरान् प्राणान् पृथक पृथगेव सन्निधत्ते।
प्रश्नोपनिषद--३/४
भाव--जिस प्रकार सम्राट इन गाँवो में तुम रहो, इन गाँवो में तुम रहो  इस प्रकार अधिकारियों को अलग-अलग नियुक्त करता है उसी प्रकार यह मुख्य प्राण दूसरे प्राणों (प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान) को अलग-अलग स्थापित करता है।
(१२) पायूपस्थेअपानं चक्षुः श्रोत्रेमुखनासिकाभ्यां प्राणः स्वयं प्रतिष्ठते मध्ये तु समानः। एष ह्येतद्धुतमन्नं समं नयति तस्मादेताः सप्तार्चिषो भवन्ति।
प्रश्नोपनिषद--३/५
भाव--यह प्राण गुदा और उपस्थ में अपान 
वायु को रखता है। स्वयं मुख और नासिका द्वारा विचरता हुआ नेत्र और श्रोत्र में स्थित रहता है। यह शरीर के माध्य भाग में समान वायु को रखता है जो प्राण -अग्नि में हवन किए हुए अग्नि को समस्त शरीर में
यथोचित समभाव से पहुँचाता है, उससे यह सात‌ ज्वालाएँ प्रकाशित करने वाले ऊपर के द्वार‌ अर्थात समस्त विषयों को 
प्रकाशित करने वाले दो नेत्र, दो नासिकाएँ और उसके एक मुख (रसना), ये सात द्वार उत्पन्न होते हैं। उस रस से पुष्ट होकर ही ये अपना कार्य करने में समर्थ होते हैं।
(१३) हृदि ह्येष आत्मा। अत्रैदेकशतं नाडीनां तासांशतंशतमेकैकस्या 
द्वासप्ततिर्द्वाःसप्तति प्रतिशाखानाडी
सहस्राणि भवन्त्यासु व्यानश्चरति।
प्रश्नोपनिषद--३/६
भाव--यह प्रसिद्ध जीवात्मा हृदयेश में निवास करता है। इस‌ हृदय में मूल रूप से 
१०० नाड़ियों का समुदाय है। इन नाड़ियों के हर नाड़ी की १००-१०० शाखाएँ हैं। प्रत्येक शाखा नाड़ी की ७२-७२ प्रति शाखा नाड़ी की १००० प्रति शाखा नाड़ियाँ होती हैं। इनमें यह व्या‌न वायु का विचरण कराता है।
(१४) अथैकयोर्ध्व उदानः पुण्येन पुण्यं लोकं नियति पापेन पापमुभाभ्यामेव 
मनुष्य लोकम्।
प्रश्नोपनिषद--३/७
भाव--और  एक अन्य नाड़ी में  यह उदान वायु विचरण कराता है जिससे यह वायु ऊपर की ओर विचरित करती है। यह पुण्य कर्मों के द्वारा मनुष्य को पुण्य लोकों (स्वर्ग आदि)में ले जाता है और पाप कर्मों के द्वारा यह पाप योनियों  (कूकर--शूकर आदि) में ले जाता है। पाप-पुण्य दोनों कर्मों के द्वारा यह जीव को मनुष्य शरीर में (पाप-पुण्य कर्मों के भोग के लिए) ले जाता है।
नोट-- जब मुख्य प्राण एक शरीर से निकल कर उदान को साथ लेकर इसके द्वारा दूसरे शरीर में जाता है तो समान आदि प्राणों को तथा मन और इन्द्रियों को अपने साथ जाता है साथ में जीवात्मा को भी ले जाता है।
(१५) यच्चित्तस्तेनेष प्राणमायाति।
प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना तथा‌संकल्पितं लोकंनयति।
प्रश्नोपनिषद--३/१०
भाव-- यह जीवात्मा जिस संकल्प वाला होता है , उस संकल्प के साथ मुख्य प्राण में स्थित हो जाता है। मुख्य प्राण तेज, उदान से युक्त हो मन इन्द्रियों से युक्त जीवात्मा को उसके संकल्प अनुसार
विभिन्न लोक अथवा योनि को ले जाता है।
(१६) अथ हैनं सौर्यायणि गार्ग्यःपप्रच्छ।
भगवन्ने तस्मिन पुरुषेकानि स्वपन्ति कान्यअस्मिञ्जाग्रति कतरएष देवः स्वप्नान् पश्यति कस्यैतत्सुखं भवति कस्मिन्नुसर्वे
सम्प्रतिष्ठिता भवन्तीति।
प्रश्नोपनिषद--४/१
भाव--तदनन्तर पिप्लादमुनि से गर्ग गोत्र से उत्पन्न सौर्यायणी ऋषि ने पूछा, हे भगवन् ! इस मनुष्य शरीर में कौन-कौन सोते है ? कौन-कौन जागते रहते हैं ? कौन देवता स्वप्नों को देखता है ? सुख किसको होता है ? और यह सबके सब‌ किसमें निश्चित रूप से सम्पूर्णतयः स्थित रहते हैं ? यह मेरा प्रश्न है ?
(१७) तस्मै स होवाच यथा गार्ग्य 
मरीचयोअर्कस्यास्तं गच्छतः सर्वा
एतस्मिंसंतेजोमण्डल एकीभवन्ति ताः पुनः
पुनरुदयतः प्रचरन्त्येव ह वै ततसर्वं परे देवे
मनस्येकीभवति तेन तर्ह्येष पुरुषो न
श्रणोति न पश्यति न जिघ्रति न रसयते न
स्पृशते नाभिवदते नादत्ते नानन्दयते न विसृजते नेयायते स्वपितीत्याचक्षते।
प्रश्नोपनिषद--४/२
 भाव--महर्षि बोले हे गार्ग्य ! जिस प्रकार अस्त‌ होते ही सूर्य की किरणें तेजो मण्डल में सब की सब एक हो जाती हैं फिर सूर्योदय होने पर वे सब पुनः सब ओर फैल जाती हैं, ठीक ऐसे ही निद्रा के समय  ये सभी इन्द्रियाँ भी परम देव मन में एक हो जाती हैं उस समय यह जीवात्मा न तो सुनता है, न देखता है, न सूँघता है, न स्वाद लेता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है ,न ग्रहण करता है, न मैथुन का आनंद लेता है ,न मल-मूत्र का त्याग करता है और न चलता ही है।, उस समय वह सो रहा है, ऐसा लोग कहते हैं। उसके जागने पर वह पुनः सभी इन्द्रियाः मन से पृथक‌ होकर अपना-अपना कार्य करने लगती हैं। ठीक वैसे ही जिस प्रकार सूर्य के उदय होने पर उसकी किरणें पुनः सब ओर फैल जाती हैं।
(१८) प्राणाग्नय एवैतस्मिनपुरे जाग्रति।
गार्हपत्यो़ ह वा एषोअपानो व्यानोअन्वाहार्यपचनो यद्गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीयः प्राणः।
प्रश्नोपनिषद--४/३
भाव--इस शरीर रूप नगर में पाँच प्राण रूप अग्नियाँ ही जागती रहती हैं। यह प्रसिद्ध अपान ही गार्हपत्य(गृह पति) अग्नि है। जैसे अग्निहोत्र करते समय 
गार्हपत्य से आह्वाणीय नामक दूसरी अग्नि प्राप्त होती है वैसे ही निद्रा में अपान से मानो आह्वाणीय अग्नि पैदा होती है ।
परन्तु हृदय के दक्षिण गुहा से निकलने वाली व्यान को अन्वाहार्य पचन कहते हैं।
और दक्षिण दिशा में सम्बन्ध होने के कारण दक्षिणाग्नि कहते हैं।
(१९) अत्रैषदेवः स्वप्ने महिमानमनुभवति।
यद्द्दृष्टं दृष्टमनुपश्यति श्रुतं श्रुतमेवार्थमनु
श्रृणोति देश दिगन्तरैश्च प्रत्यनुभूतं पुनः पुनः
प्रत्यनुभवतिदृष्टं चादृष्टं च श्रुतं चाश्रुतं
चानुभूतं चाननुभूतं च सच्चासच्च सर्वं पश्यति सर्वः पश्यति।
प्रश्नोपनिषद-४/५
भाव--और यह जीवात्मा स्वप्न में अपनी कल्पनाओं की महिमाओं में आनन्द अनुभव करता है। जो कुछ इसने देखा था मानो उसी को पुनः देखता है और जो कुछ उसने सुना था उसी‌के पुनः सुनता है।वय्तुतः भिन्न-भिन्न स्थानों में एवम् भिन्न भिन्न क्षेत्रों में इसने जो कुछ साक्षात अनुभव किया था, सोचा था जाना था उस सबको अपनी स्वप्नावस्था में यह पुनः जीता है। जो कुछ इसने देखा था तथा जो कुछ नहीं देखा था, जो कुछ इसने सुना था,और जो कुछ नहीं सुना था,जो कुछ इसने जाना था अथवा जो कुछ  इसने नहीं जाना था, जो है वह सब अथवा जो नहीं है वह सब कुछ देखता है तथा सब कुछ स्वयं बनकर देखता है।
(२०) स यदा तेजसाअभिभूतो भवति।
अत्रैसदेवःस्वप्नान्न पश्यत्यथ 
यदैतअस्मिन्शरीर एतत्सुखं भवति ।
प्रश्नोपनिषद--४/६
भाव--वह मन जब तेज उदान वायु से 
अभिभूत हो जाता हेै । इस‌ स्थिति में यह जीवात्मा रूपी देवता स्वप्नों को नहीं देखता। तथा उस समय इस मनुष्य शरीर में जीवात्मा को सुषुप्ति के सुख का अनुभव होता है। अर्थात् जब उदान वायु इस मन को जीवात्मा के निवास स्थान हृदय में पहुँचाकर मोहित कर देता है। उस‌ निद्रावस्था में यह जीवात्मा मन के द्वारा 
स्वप्न की घटनाओं को नहीं देता। उस समय निद्रा जनित सुख का अनुभव जीवात्मा को ही होता है।
(२१) स यथा सोभ्य वयांसि वसोवृक्षं
सम्प्रतिष्ठन्ते। ह वै तत् सर्वं पर आत्मनि
सम्प्रतिष्ठते।
प्रश्नोपनिषद--४/७
भाव--पाँचवी बात जो आपने पूछी थी उसको इस प्रकार समझना चाहिए--
प्रिय, जिस प्रकार बहुत से पंछी सायं काल में अपने निवास रूप वृक्ष पर आराम से ठहरते हैं। ठीक वैसे ही पृथ्वी आदि तत्वों से लेकर प्राण तक। सभी परब्रह्म परमात्मा मैं जो कि सबके आत्मा हैं, आश्रय लेते हैं क्योंकि वही सबका परम् आश्रय  है।
(२२) अथ हैनं शैब्यः सत्यकामः पप्रच्छ।
स यो ह वै तद्भगवन्मनुष्येषु 
प्रायणान्तमोंकारमभिध्यायीत। कतमं वाव
स तेन लोकं जयतीति। तस्मै स होवाच।
प्रश्नोपनिषद--५/१
भाव--महर्षि पिप्लाद से शिवि पुत्र 
सत्यकाम ने पूछा, हे भगवन् ! मनुष्यों में से वह जो कोई भी मृत्यु पर्यन्त ओंकार का भली-भाँति ध्यान करता है वह उस उपासना के द्वारा कौन से लोक को 
निःसन्देह जीत लेता है। यह मेरा प्रश्न है।
(२३) ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्
तत कवयो वेदयन्ते। तमोंकारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान 
यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परंचेति।
प्रश्नोपनिषद--५/७
भाव--एक मात्रा की उपासना से उपासक 
ऋगुवेद की ऋचाओं द्वारा इस मनुष्य लोक में पहुँचाया जाता है। दो मात्रा की उपासना करने वाला  यजुर्वेद की श्रुतियों द्वारा अन्तरिक्ष में चन्द्रलोक तक पहुँचाया जाता है। पूर्ण रूप (अ उ म) से ओंकार की उपासना करने वाला सामवेद की श्रुतियों द्वारा उस ब्रह्मलोक में पहुँचाया जाता है जिसको ज्ञानीजन जानते हैं। विद्वान विवेकशील साधक केवल ओंकार रूप अवलम्बव़न के द्वारा उस परब्रह्म परमेश्वर को प्राप्त कर लेता है जो परम शान्त, जरारहित, मृत्युरहित, भयरहित और सर्वश्रेष्ठ है।
(२४) अथ हैनं सुकेशा भारद्वाजः पप्रच्छ।
भगवन् हिरण्यनाभः कौशल्योराजपुत्रो 
मामुपेत्यैत प्रश्नमपृच्छत। षोडशकलं
भारद्वाज पुरुषं वेत्थ। तमहं कुमारमब्रुवं 
नाहमिमंवेद। यद्यहमिममवेदिषं कथं ते
नावक्ष्यमिति। समूलो वा एष परिशुष्यति
योअनृतमभिवदति तस्मान्नार्हम्यनृतं वक्तुम्।
स तूष्णीं रथमारुह्य प्रवव्राज। तं त्वा
पृच्छामि क्वासौपुरुष इति।
प्रश्नोपनिषद --६/१
भाव--महर्षि पिप्लाद से भरद्वाज पुत्र सुकेशा‌ ने कहा, भगवन् ! कोशल देशीय राजकुमार हिरण्यनाभ ने मेरे पास आकर पूछा, हे भारद्वाज ! क्या तुम सोलह कलाओं वाले पुरुष को जानते हो ? तब उस‌ राजकुमार से मैने कहा, मैं नहीं जानता। यदि मैं जानता होता तो तुम्हें नहीं बताया। वह मनुष्य अवश्य मूल रूप से सूख जाता है, नष्ट हो जाता है, जो झूठ बोलता है। इसलिए मैं झूठ बोलने में समर्थ नहीं हूँ। वह राजकुमार मेरा उत्तर सुनकर चुपचाप रथ पर सवार होकर चला गया। उसी को मैं आपसे पूछ रहा हूँ। कृपया मुझे बताइए कि वह कहाँ है और उसका स्वरूप क्या है ?
(२५) तस्मै स होवाचेहैवान्तःशरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नताः षोडशकलाः प्रभवन्तीति।
प्रश्नोपनिषद--६/२
महर्षि बोले हे प्रिय ! इस‌ शरीर‌ के भीतर ही वह पुरुष है जिसमें यह सोलह कलाएँ प्रकट होती हैं। अर्थात् जब मनुष्य के हृदय में परमात्मा को पाने के लिए उत्कट
अभिलाषा जाग्रत हो जाती है तब वे वहीं उसके हृदय में ही मिल जाते हैं।
(२६) स प्राणंसृजत प्राणाच्छ्रद्धां खं वायुर्ज्योतिरापः पृथिवीन्द्रियं मनः। 
अन्नमन्नाद्वीर्यं तपो मन्त्राःकर्म लोका लोकेषु
च नाम च।
प्रश्नोपनिषद--६/४
भाव--उसने यह‌ सोचकर पहले प्राण की रचना की। प्राण के बाद श्रद्धा की रचना की। इसके बाद क्मशः आकाश,वायु,तेज, जल, पृथ्वी इसके बाद इन्द्रियाँ, मन इसके बाद अन्न, अन्न से वीर्य की रचना हुयी। फिर तप,अनेक प्रकार के मंत्र, अनेक प्रकार के कर्म, विभिन्न प्रकार के लोक की रचना, फिर इन लोकों में नाम रूप की रचना हुयी। इस प्रकार इन सोलह कलाओं(प्राण, श्रद्धा,आकाश, वायु, तेज,
जल, पृथ्वी, इन्द्रियाँ, मन, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, कर्म, लोक, नाम) से युक्त ब्रह्माण्ड की रचना करके जीवात्मा के सहित परमेश्वर स्वयं इसमें प्रविष्ट हो गया। इसलिए वह सोलह कलाओं वाले पुरुष कहलाते हैं। हमारा यह शरीर भी ब्रह्माण्ड का एक सूक्ष्म रूप है। अतः परमेश्वर जिस प्रकार इस सारे ब्रह्माण्ड में है, उसी प्रकार 
हमारे इस शरीर में भी है और इस शरीर में भी वह सोलह कलाएँ विद्यमान हैं।
प्रश्नोपनिषद की सूक्तियाँ---(१) स्वस्ति नः इन्द्रो वृद्धश्रवः।
      प्रश्नोपनिषद---स्वस्ति वाचन
भाव--जिनका सुयश चारो ओर फैला हुआ है, वह इन्द्र देव हमारा कल्याण करें।
(२) स्वस्ति नः पूषा विश्व वेदाः।
      प्रश्नोपनिषद--स्वस्ति वाचन
भाव--सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान रखने वाले पूषा देव हमारा कल्याण करें।
(३) स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः।
     प्रश्नोपनिषद--स्वस्ति वाचन
भाव--अरिष्टों को मिटाने वाले चक्र सदृश
शक्तिशाली  गरुड़ देव हमारा कल्याण करें।
(४) स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु।
      प्रश्नोपनिषद--स्वस्ति वाचन
भाव--बुद्धि के स्वामी बृहस्पति देव हमारा कल्याण करें।
(५) आदित्यो ह वै प्राणो।
      प्रश्नोपनिषद-१/५
भाव-- सूर्य ही प्राण है।
(६) रयिरेव चन्द्रमा ।
       प्रश्नोपनिषद--१/५
भाव-- चन्द्रमा ही रयि ( समस्त स्थूल और सूक्ष्म वस्तुएँ, पंच तत्व) है।
नोट--समस्त प्राणियों के स्थूल शरीरों का पोषण  चन्द्रमा की शक्ति पाकर ही होता है।
(७) अन्नं वै प्रजापति।
  प्रश्नोपनिषद--१/१४
भाव-- अन्न ही प्रजापति है।
(८) आत्मन एष प्राणो जायते।
     प्रश्नोपनिषद--३/३
भाव--वह प्राण परमात्मा से उत्पन्न होता है।
(९) हृदि ह्येष आत्मा ।
प्रश्नोपनिषद--३/६
भाव-- आत्मा हृदय में स्थित है।
(१०) आदित्यो ह वै बाह्य प्राण ।
प्रश्नोपनिषद--३/८
भाव--निश्चय ही सूर्य बाह्य प्राण है।
नोट--सूर्य के प्रकाश से ही नेत्रों से बाह्य जगत दिखता है।
(११) संकल्पितं लोकं नयति।
प्रश्नोपनिषद--३/१०
भाव--संकल्प के अनुसार योनियाँ मिलती हैं।
(१२) प्राणाग्नय एवैतस्मिन पुरे जाग्रति ।
प्रश्नोपनिषद--४/३
भाव--(सोते समय) इस शरीर रूप नगर में पाँच प्राण अग्ननियाँ जागती रहती हैं।
(१३) स सर्वज्ञः सर्वो भवति।
प्रश्नोपनिषद--४/१०
भाव--वह(ईश्वर को प्राप्त करने वाला)
सर्वज्ञ और सर्वरूप होता है।
(१४) तदक्षरं वेदयते यस्तु सोम्य स सर्वज्ञः
सर्वमेवाविवेशेति।
प्रश्नोपनिषद--४/११
भाव--इस अविनाशी परमात्मा को जो कोई जान लेता है वह सर्वज्ञ है। वह सर्व स्वरूप परमेश्वर में प्रविष्ट हो जाता है।
(१५) परं चापरं च ब्रह्म यद ओंकारः।
प्रश्नोपनिषद--५/२
भाव--निश्चय ही यह जो ओंकार है , वही परब्रह्म और अपरब्रह्म भी है।-
निष्कर्ष--प्रश्नोपनिषद आत्मज्ञान, प्राण विद्या, कर्म और मोक्ष का गहन ज्ञान प्रदान करता है। इसका मुख्य संदेश यह है कि प्राण ही जीवन का मूल आधार है और ब्रह्म ज्ञान से ही मोक्ष संभव है।
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