वेद और उपनिषद (३क)
(१) ---ईशोपनिषद-----
ईश उपनिषद शुक्ल यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है। यह ज्ञानयोग द्वैताद्वैत सिद्धान्त पर आधारित है। इसमें कुल अट्ठारह छन्द हैं। कोई कथा-कहानी इस उपनिषद में नहीं है। केवल आत्मा और ब्रह्म का ज्ञान दिया हुआ है।
ईशोपनिषद के प्रमुख श्लोक--
(१) ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत। तेन त्यकतेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
ईशोपनिषद--१
भाव-- हे मनुष्यों ! यह सब जो कुछ संसार में चराचर वस्तु है। ईश्वर से ही व्याप्त है। उसी ईश्वर के दिए हुए पदार्थों का भोग करो। किसी के भी धन का लालच मत करो।
(२) असुर्या नाम ते लोका, अन्धेन तमसावृताः। तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के
चात्महनोजनः।
ईशोपनिषद--३
भाव--वे लोक असुर्या नाम के हैं, जो गहरे अन्धकार से ढके हैं। यहाँ से प्रयाण करने पर वे लोग वहाँ पहुँचते हैं, जो अपने आत्मा का हनन करते हैं।
(३) तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। तदन्तरस्य सर्वस्य तदुसर्वस्यस्य दृश्यः।
ईशोपनिषद--५
भाव--जो चलता है और नहीं भी चलता है। जो दूर है और वही पास है। जो इस सबके भीतर है और जो इस सबके बाहर भी है।
(४) यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते।
ईशोपनिषद--६
भाव-- जो सभी भूतों या सत्ताओं को परमत्मा में ही देखता है,और सभी भूतों या सत्ताओं में परमात्मा को देखता है। वह किसी से घृणा नहीं करता है।
(५) अन्धं तमः प्रविशन्ति येअविद्यामुपासते। ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायांरताः।
ईशोपनिषद--९
भाव--जो मनुष्य ज्ञान की उपेक्षा करके कर्म करते हैं, वे गहरे अन्धकार में प्रवेश करते हैं और जो कर्म की उपेक्षा करके केवल ज्ञान में रमण करते हैं, वे उससे भी अधिक अन्धकार में प्रवेश करते हैं। इसलिए उपासक को ज्ञानपूर्वक कर्म करना चाहिए।
(१०) हिरण्यमेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्। तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्य धर्माय दृष्टये।
ईशोपनिषद--१५
भाव--चमकीले सुवर्णादि के पात्र से सत्य का मुख ढका हुआ है। हे सबके पोषक परमात्मन(सूर्यदेव) ! आप उस सत्य स्वरूप के दर्शन के लिए आवरण हटा दो।
(११) वायुर्निलममृतमथेदं भस्मांतं शरीरम्। ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर
ईशोपनिषद--१७
भाव--अनेक शरीर में आने वाला जीव अमृत है,मरण रहित है अर्थात् नित्य है।
परन्तु यह शरीर केवल भस्म पर्यन्त है।
इसलिए अन्त समय में हे जीव ! ॐ का स्मरण कर। बल प्राप्ति के लिए परमात्मा का स्मरण कर। अपने किए हुए कर्मों का स्मरण कर।
ईशोपनिषद की प्रमुख सूक्तियाँ--
(१) ईशावास्य मिदं सर्वं।
ईशोपनिषद--१
भाव--यह सब कुछ जो संसार में चराचर वस्तु है वह ईश्वर से व्याप्त है।
(२) मा गृधःकस्यस्विद्धधनम्।
ईशोपनिषद--१
भाव-- किसी के धन की इच्छा मत कर।
(३) कुरर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतम् समाः।
ईशोपनिषद--२
भाव--इस लोक में कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे।
(४) तदन्तरस्य सर्वस्य।
ईशोपनिषद--४
भाव--वह (ईश्वर) सबके अन्दर है।
(५) तदेजति तन्नेजति।
ईशोपनिषद--५
भाव-- वह (ईश्वर) चलता है और नहीं भी चलता है।
(६) तद्दूरे तद्वन्तिके।
ईशोपनिषद--५
भाव-- वह (ईश्वर) दूर है और समीप भी है।
(७) को मोहः का शोकः एकत्वमनुपश्यतः।
ईशोपनिषद--७
भाव--एकत्व देखने वाले मनुष्य के लिए क्या मोह और क्या शोक ?
(८) अन्धं तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते।
ईशोपनिषद--९
भाव-- जो अविद्या (कर्म) की उपासना करते हैं, वे घोर अन्धकार में प्रवेश करते हैं।
(९) सोअहंस्मि।
ईशोपनिषद--१६
भाव-- वह (ईश्वर) मैं हूँ।
(१०) ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर, क्रतो स्मर कृतं स्मर।
ईशोपनिषद--१७
भाव-- हे जीव तू ॐ को स्मरण कर, बल प्राप्ति को लिए परमात्मा को स्मरण कर। अपने किए हुए कर्मों को स्मरण कर।
निष्कर्ष-- ईश उपनिषद हमें त्याग, संतुलित जीवन, कर्मयोग और
ब्रह्मज्ञान का मार्ग दिखाता है। यह जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक
पक्षों के संतुलन पर ज़ोर देता है और ईश्वर की सर्वव्यापकता को स्वीकार करने की प्रेरणा देता है।
२)--- केनोपनिषद---
यह उपनिषद सामवेद के
तलवगार शाखा से सम्बन्धित है। यह वेदान्त दर्शन के प्रमुख ग्रन्थों में से एक है, और अद्वैत वेदान्त की मूल शिक्षाओं को व्यक्त करता है। केन का अर्थ है किसके द्वारा। इस उपनिषद का आरम्भ केन शब्द से होता है 'केनेषितं पतति प्रेषित मनः'(किसके आदेश से मन कार्य करता है ?)। इस कारण से इस उपनिषद का नाम केन उपनिषद् पड़ा। यह उपनिषद आत्मा(ब्रह्म) और इन्द्रियों के सम्बन्ध को स्पष्ट करता है।
केन उपनिषद चार खण्डों में विभाजित है
पहला खण्ड--ब्रह्म और इन्द्रियों में सम्बन्ध का वर्णन है।
दूसरा खण्ड--ज्ञान और अज्ञान का भेद बताया गया है।
तीसरा खण्ड--एक आख्यान जिसमें अग्नि, वायु, इन्द्र और देवी उमा के माध्यम से ब्रह्म को समझाया गया है।
चौथा खण्ड--ब्रह्म के स्वरूप का वर्णन किया गया है।
केन उपनिषद के प्रमुख श्लोक--
(१) श्रोतष्य श्रोतं मनसो मनो यत्। वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः। चक्षुषश्च क्षुरतिमुच्य धीराः। प्रेत्यास्माल्लोका दमृता भवन्ति।
केनोपनिषद--१/२
भाव--वह जो हमारे कानो का कान है।
हमारे मन का जो मन है। हमारी वाणी का जो वाक् है। वही हमारे प्राण का प्राण है। तथा हमारे चक्षु का चक्षु है। ज्ञानी पुरुष ऐसा जानकर यहाँ से प्रयाण करके अमर हो जाते हैं।
(2) यच्चक्षुसा न पश्यति येन चक्षूंसि पश्यति। तदैव ब्रह्म त्वम् विद्धि नेदं यदिदमुपासते।
केनोपनिषद--१/६
भाव--जिस ब्रह्म को आँखों से नहीं देखा जा सकता, परन्तु जिस शक्ति से आँखें देखती हैं, उसी को तुम ब्रह्म जानो।
जिस साकार की उपासना की जाती है, वह ब्रह्म नहीं है।
(३) यच्छ्रोत्रेण न श्रणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्। तदैव ब्रह्म त्वम् विद्धि नेदं
यदिदमुपासते।
केनोपनिषद--१/७
भाव--जो कानों से सुनाई नहीं देता, परन्तु जिस शक्ति से हम सुनते हैं। उसी को तुम ब्रह्म जानो। शब्द से जिसकी उपासना की जाती है, वह ब्रह्म नहीं है।
(४) यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते। तदैव ब्रह्म त्वम् विद्धि नेदं यदिदमुपासते।
केनोपनिषद--१/८
भाव--जो श्वास लेकर नहीं जीता परन्तु जिस शक्ति से हम श्वास लेकर जीते हैं। उसी को तुम ब्रह्म जानो। प्राण के उपासक जिसकी उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है।
(५) यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेदसः। अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्।
केनोपनिषद--२/३
भाव--जो मनुष्य समझता है कि मैं ब्रह्म को नहीं जानता, वह उसको जानता है। जो मनुष्य यह समझता है कि मैं ब्रह्म को जानता हूँ ,वह उसे नहीं जानता हे। ज्ञानियों से वह अज्ञात है, और न जानने वाले उसे जानते हैं।
(६) प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते। आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दते अमृतम्।
केनोपनिषद--२/४
भाव--प्रतिबोध अर्थात् बार-बार जानने और मनन करने से वह ब्रह्म जाना जाता है, और ऐसा मनुष्य अमृत अर्थात् मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। मनुष्य अपनी आत्मा से बल प्राप्त करता है और ब्रह्म विद्या से ब्रह्म को प्राप्त करता है।
(७) इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः। भूतेषु भूतेषु
विचित्यधीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता
भवन्ति।
केनोपनिषद--२/५
भाव-- इसी जन्म में ब्रह्म को जान लिया तो सत्य अर्थात् जीवन सफल हो गया।
यदि न जाना तो बहुत बड़ी हानि हुयी।
(क्या पता मनुष्य का जीवन फिर मिले या न मिले। धीर पुरुष संसार के कण-कण में प्रभु की सत्ता को देखकर इस लोक से प्रयाण करने के बाद अक्षय सुख मोक्ष को प्राप्त करता है।
(8) तऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोअस्माकमेवायं महिमेति। तद्धेषां
विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्नव्यजानत
किमिदं यक्षमिति।
केनोपनिषद--३/२
भाव--उन देवों ने यह विचार किया कि यह विजय हमारी है और केवल हमारी ही महिमा से प्राप्त हुयी है। वह ब्रह्म इन देवों के अभिमान को जान गया और तब वह इन पर यक्ष रूप में प्रकट हुआ परन्तु देवता उसे न जान पाए कि यह यक्ष कौन है ?
(९) ते अग्निमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि
किमइदं यक्षमिति तथेति।
केनोपनिषद--३/३
भाव--उन देवताओं ने अग्नि से कहा, हे जातवेद ! यह पता करो कि यह यक्ष कौन है ? अग्नि ने कहा, बहुत अच्छा।
(१०) तदभ्य द्रवत्तमभ्यवदत्कोअसीत्यग्निर्वा।अहमस्मीत्य ब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मिति।
केनोपनिषद--३/४
भाव-- तब दौड़कर अग्नि यक्ष रूपी ब्रह्म के पास पहुँचे, यक्ष ने अग्नि से पूछा, कि तू कौन है ? अग्निदेव बोले, मैं अग्नि हूँ, मैं निश्चित ही जातवेदा हूँ।
(११) तस्मिंस्त्वयि किंवीर्यमित्यपीदं सर्वंदहेयं यदिदं पृथिव्यामिति।
केनोपनिषद--३/५
भाव--यक्ष ने पूछा, अच्छा ! यह बताओ, तुझमें क्या शक्ति है ? अग्निदेव ने कहा कि पृथ्वी की समस्त चीज़ों को मैं जला सकता हूँ, मेरे अन्दर यह शक्ति है।
(१२) तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स ततैव निववृतेनैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति।
केनोपनिषद--३!६
भाव--ऐसा समझकर यक्ष ने अग्निदेव के सामने एक तिनका रखा और कहा, इसे जलाओ। अग्निदेव पूरे वेग से उसके पास गए परन्तु अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उसको न जला सके, और वहीं से लौटकर देवताओं के समक्ष बोले कि मैं इसको न जान सका कि यह यक्ष कौन है ?
(१३) अथ वायुमब्रुवन्वाय वेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति।
केनोपनिषद--३/७
भाव-- देवता तब वायुदेव से बोले, हे वायो ! तुम जाकर देखो कि यह यक्ष कौन है ? वायुदेव ने कहा, बहुत अच्छा।
(१४) तदभ्य द्रवत्तमभ्यवदत्कोअसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा
अहमस्मीति।
केनोपनिषद--३/८
भाव-- वायुदेव दौड़कर यक्षरूपी ब्रह्म के पास पहुँचे, यक्ष ने उससे पूछा, तू कौन है ? मैं वायु हूँ। मैं निश्चय मातरिश्वा ही हूँ।
(१५) तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति।
केनेपनिषद--३/९
भाव- यक्ष ने पूछा, अच्छा यह बताओ !
तुझमे क्या शक्ति है ? जो कुछ पृथ्वी पर है, मै सबको उड़ा सकता हूँ।
(१६) तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं
स ततैव निववृते नैतदशकं विज्ञातु यदेतद्यक्षमिति।
केनोपनिषद--३/१०
भाव-- यक्ष ने उनके आगे वही एक तिनका रखा और कहा, इसको उड़ाकर दिखाओ। वायुदेव अपने पूरे वेग से उस तिनके के पास पहुँचे, परन्तु उस तिनके को उड़ा नहीं सके। तब वह वहीं से लौटकर देवताओं के समक्ष बोले कि मैं इसको न जान सका कि यह यक्ष कौन है ?
(१७) अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्वीय
जानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति
तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे।
केनोपनिषद--३/११
भाव--समस्त देवताओं ने तब इन्द्र से प्रार्थना की, हे मघवन् ! देखो तो सही, यह यक्ष कौन है ? इन्द्र ने कहा, बहुत अच्छा ! वे दौड़कर उस यक्षरूपी ब्रह्म के पास गए परन्तु वह इन्द्र के सामने से अन्तर्धान हो गया।
(१८) स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमां हैमवतीं तांहोवाच
किमेतद्यक्षमिति।
केनोपनिषद--३/१२
भाव-- वह इन्द्र उसी आकाश में अति शोभावली सुवर्ण से भूषिता उमा ( पार्वती रूपणी ब्रह्म विद्या) से मिले और इनसे पूछा कि यह यक्ष कौन है ?
(१९) सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ततो हैव विदाञ्चकार ब्रहेति।
केनोपनिषद--४/१
भाव--देवी उमा इन्द्र से बोलीं, यह ब्रह्म है और ब्रह्म की इस विजय में ही तुम महिमा युक्त बने हो। देवी उमा के इस कथन से ही इन्द्र ने जाना कि यह ब्रह्म है।
(२०) अथाध्यात्मं यद्देतद्गच्छतीव च मनोअनेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णं संकल्पः।
केनोपनिषद--४/५
भाव,--अध्यात्म पक्ष यह है कि यह मन जो चलता हुआ सा कहा जाता है, वही ब्रह्म है। इसलिए मन से बार-बार लगातार उसी ब्रह्म का स्मरण करना चाहिए और उसी का संकल्प करना चाहिए।
केन उपनिषद की प्रमुख सूक्तियाँ--
१) न तत्र चक्षुर्गच्छति नवाग्गच्छति नो मनः।
केन उपनिषद--१/३
भाव-- उस ईश्वर तक न आँख पहुँचती है, न वाणी पहुँचती है, न मन
(२) यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूँसि पश्यति।
केन उपनिषद--१/६
भाव-- जिसे आँखों से नहीं देखा जा सकता, किन्तु जिसकी शक्ति से आँखें देखती हैं, वह ब्रह्म है।
(३) यच्छोत्रेण न श्रणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्।
केनोपनिषद--१/७
भाव--जो कानों से सुनायी नहीं देता किन्तु जिसकी शक्ति से कान सुनते हैं, वह ब्रह्म है।
(४) यत्प्राणेन न प्राणिति, येन प्राणः प्रणीयते।
केनोपनिषद--१/८
भाव-- जो श्वास लेकर नहीं जीता है, बल्कि जिस शक्ति से श्वास आता जाता है, वह ब्रह्म है।
(५) यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः।
केनोपनिषद--२/३
भाव--जो मनुष्य समझता है कि मैं ब्रह्म को नहीं जानता हूँ, वह उसको जानता है।
जो मनुष्य यह समझता है कि मैं ब्रह्म को जानता हूँ, वह उसे नहीं जानता।
(६) प्रतिबोध विदितं मतममृतत्वं हि विन्दते।
केनोपनिषद--२/४
भाव--बार-बार मनन करने से वह ब्रह्म जाना जाता है।
(७) आत्मना विन्दते वीर्यँ।
केनोपनिषद--२/४
भाव-- मनुष्य अपने आत्मबल से ब्रह्म को प्राप्त करता है।
(8) इह चेद वेदीदथ सत्यमस्ति।
केनोपनिषद--२/५
भाव--
भाव-यदि मनुष्य ने इस जीवन में ब्रह्म को प्राप्त कर लिया, तो जीवन सार्थक है।
(९) न चेदिहा वेदीनमहती विनष्टि।
केनोपनिषद--२/५
भाव--यदि इस जन्म में ब्रह्म को नहीं जाना, तो बहुत भारी नुकसान होगा।
( फिर जाने कब मनुष्य का तन मिले।)
(१०) सर्वं दहेयं यदिदं पृथ्वीव्यामिति।
केनोपनिषद--३/५
भाव--अग्नि ने कहा, मैं पृथ्वी की सम्पूर्ण चीज़ों को जला सकता हूँ।
(११) सर्वमाददीय यदिदं पृथ्वीव्यामिति।
केनोपनिषद--३/९
भाव-- वायुदेव ने कहा, मैं पृथ्वी पर जो कुछ है, उस सब को उड़ा सकता हूँ।
(११) तद्ध तद्वनं नाम।
केनोपनिषद--४/६
भाव-- वह (ब्रह्म) भजनीय है।
निष्कर्ष--केन उपनिषद आत्मज्ञान और और वेदान्त के गूढ़ रहस्यों को स्पष्ट करता है। यह बताता है कि जो स्वयं को जानता है, वही ब्रह्म को जानता है और वही सच्चे आनन्द को प्राप्त. करता है।
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(3) कठोपनिषद----
कठ उपनिषद कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत आता है। कठ एक मुनि हुए हैं जो वेद की कठ शाखा के प्रवर्तक हैं।
पतंजलि के महाभाष्य के अनुसार मुनि कठ वैशंपायन के शिष्य हैं। यह ज्ञानयोग के द्वैताद्वैत सिद्धान्त पर आधारित है।
कठोपनिषद में दो अध्याय हैं, प्रत्येक अध्याय में तीन-तीन वल्लियाँ हैं। जिसमें वाजश्रवा के पुत्र नचिकेता और यम के बीच हुए संवाद का आख्यान है। वाजश्रवा ने यज्ञ की दक्षिणा में निरर्थक वस्तुओं को दान करके यज्ञ को पूरा करना
चाहा। उनके पुत्र नचिकेता ने पिता को यथार्थ का बोध कराने के लिए बार-बार पूछा कि आप मुझे किसे दान देंगे ? क्रोधित होकर पिता ने यम को दान करने की बात कही ।
नचिकेता यम से यमपुरी में मिलते हैं। नचिकेता से प्रभावित होकर यम तीन वरदान माँगने को कहते हैं। पहले वरदान में पिता को प्रसन्न होने तथा उनके यज्ञ के पूरा होने की बात कही। दूसरे वरदान में
स्वर्ग प्रदायिनी विद्या(अग्नि विद्या) को माँगा। तीसरे वरदान में आत्म विद्या माँगी। यम ने पहले दो वरदान तो दे दिए परन्तु तीसरे वरदान के बदले में कोई और वरदान माँगने के लिए कहा। कई प्रलोभन भी दिए। परन्तु नचिकेता अपने वरदान पर अडिग रहे। इतना सब कुछ प्रधम अध्याय के प्रथम वल्ली में दिया हुआ है।
द्वितीय एवं तृतीय वल्ली में यमदेव द्वारा
आत्मा और परमात्मा के विषय में चर्चा की है। दूसरे अध्याय में ईश्वर की प्राप्ति में मिलने वाली बाधाएँ, बाधाओं के निवारण एवं हृदय क्षेत्र में ईश्वर के निवास की चर्चा की गयी है।
कठेपनिषद के प्रमुख श्लोक--
कठोपनिषद के प्रमुख श्लोक--
(१) ॐ सहनाववतु। सहनौ
भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विशावहहि।
ॐ शान्ति: ॐशान्तिः ॐ. शान्तिः
कठोपनिषद--१/१/१९(शान्ति पाठ)
भाव-- परमात्मा हम दोनो का साथ-साथ
पालन करे। हमारी रक्षा करे। हम साथ- साथ विद्या बल का वर्धन करें। हमारा अध्ययन किया हुआ ज्ञान तेजस्वी हो। हम दोनो कभी परस्पर द्वेष न करें।
हमारे तीनों ताप( आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक)) शान्ति हों।
(२) उशन् हवै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ।
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस।
कठोपनिषद--१/१/१
भाव--यह एक इतिहास है कि मुक्ति की इच्छा रखने वाले वाजश्रवस ऋषि ने सब अपने धन को यज्ञ द्वारा दान में दे दिया। अर्थात् सर्वमेध यज्ञ किया (विधान है कि सन्यास ग्रहण करने वाला व्यक्ति सर्वमेध यज्ञ द्वारा अपना समस्त धन दान कर देता है )। उसका नचिकेता नाम का पुत्र था।
(३) सहोवाच पितर तत कस्मै मां दास्यसीति। द्वितीयं तृतीयं तंहोवाच मृत्युवे वा ददामीति।
कठोपनिषद--४
भाव--ऐसा विचार कर वह पिता से बोला कि हे सात ! मुझे किसको देंगे। यह बात उसने दूसरी, तीसरी बार कही तब पिता ने कहा कि मैं तुझे मृत्यु (यमराज) को देता हूँ।
(४) वैश्वानरः प्रविशत्यतिथि ब्रह्मणो गृहान्। तस्यैतां शान्ति कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम्।।
कठोपनिषद--१/१/७
भाव-- नचिकेता जिस समय यमदेव के घर पहुँचे। यमदेव वहाँ नहीं थे। उनके स्त्री आदि के कहने पर भी नचिकेता ने भोजन-पानी नहीं ग्रहण किया, और बिना भोजन-पानी तीन दिन वहीं पड़े रहे।
जब तीसरे दिन यमदेव आए तो उनकी भार्या ने यमदेव से कहा कि आपके घर में अग्नि के समान कान्तियुक्त ब्राह्मण अतिथि आया हुआ है। सज्जन लोग ऐसे अभ्यागत की शान्ति करते हैं। इसलिए आप जल आदि सत्कार की सामग्री लीजिए और उसकी पूजा कीजिए।
(५) शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्रीतमन्युगौर्तामो माभिमृत्यो। त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्यतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे।
कठोपनिषद--१/१/१०
भाव--यमराज के आदर को प्राप्त करके नचिकेता ने कहा, हे मृत्यो आचार्य !
मेरे पिता गौतम शान्त संकल्प और प्रसन्न मन जैसे हों, और मेरे प्रति क्रोध रहित हो जाएँ तथा आपके यहाँ से वापस जाने पर मुझको जानें और मुझसे वार्तालाप करें। यही तीनो वरों में से पहला वर मैंआपसे माँगता हूँ।
(६) सत्वमग्निं स्वग्र्य मध्येषि मृत्यो पब्रूहितं श्रद्दधानाय मह्यम्। स्वर्गलोका
अमृत त्वं भजन्तएतद्वितीयेन वृणे वरेण।
कठोपनिषद-१/१/१३
भाव-- नचिकेता ने फिर कहा--
हे मृत्यो ! हे यमदेव ! आप स्वर्ग प्राप्ति के साधन अग्निहोत्रादि रूप यज्ञ को जानते हैं, जिससे स्वर्ग लोक अर्थात् यज्ञ के अनुष्ठान करने वाले जन (अमृत) दीर्घ जीवनादि सुख को प्राप्त किया जाता है।
उसी को श्रद्धा रखते हुए मेरे लिए कहिए, यह मैं दूसरा वर माँगता हूँ।
(७) येयंप्रेतेविचिकित्सा मनुष्येपुस्तीत्येके
नायमस्तीति चैके। एतद्विद्यामनुशिष्टस्लयाहं वराणामेष
वरस्तृतीयः।
कठोपनिषद--१/१/२०
भाव--हे यमराज ! मनुष्य के मर जाने कुछ तो कहते हैं, शरीस्थ जीवआत्मा नित्य है, और कुछ कहते हैं आत्मा नहीं है। आपसे उपदेश प्राप्त करके मैं जिस प्रकार इस आत्म विद्या को जान सकूँ,
उसे दीजिए। वरों में मेरा तीसरा अभीष्ट वर यही है।
(८) श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्य मेतस्तौ सम्परीत्य
विविनक्ति धीरः। श्रेयो हि धीरोअभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते।
कठोपनिषद--१/२/२
भाव--हे नचिकेता ! श्रेय मार्ग और प्रेय मार्ग दोनो ही मनुष्य को प्राप्त होते हैं। धीर पुरुष उन दोनो का विवेचन करते हैं तथा उन दोनो के स्वरूप पर भलीभाँति विचार करके उनको पृथक-पृथक समझकर निश्चय ही प्रेय मार्ग को छोड़कर श्रेय मार्ग का ही आश्रय लेते हैं। किन्तु मन्द बुद्धि मनुष्य केवल धनादि पदार्थों को ही सुख समझकर प्रेय मार्ग को ही स्वीकार करते हैं।
(९) तं दुर्दर्शं गूढ़मनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं
पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा
धीरोहर्षशोकौ जहाति।
कठोपनिषद--१/२/१२
भाव--ध्यानशील विद्वान अध्यात्म योग की प्राप्ति से, कठिनता से दर्शनीय, अत्यन्त गुप्त, सर्वत्र व्याप्त, बुद्धि में स्थिर
सबके साक्षीभूत, सनातन ज्ञानस्वरूप देव को जानकर हर्ष और शोक को छोड़ देते हैं।
(१०) सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं
चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत्।
कठोपनिषद--१/२/१५
भाव--हे नचिकेता ! सारे वेद जिस पद की व्याख्या करते हैं और सारे तप जिसका वर्णन करते हैं तथा जिसकी इच्छा रखते हुए विद्वान ब्रह्मचर्य का सेवन करते हैं, उस पद का मैं संक्षेप में वर्णन करता हूँ।
वह ओइम् है।
(११) एतद्ध्येवाक्षरं ब्रह्म एतद्ध्येवाक्षरं
परम्। एतद्ध्येवावाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्।
कठोपनिषद--१/२/१६
भाव--निश्चय यही ॐ ब्रह्म है। यही सबसे उत्तम अक्षर है। इसी अविनाशी ब्रह्म को जानकर जो मनुष्य जो कुछ कहता है उसको वह अवश्य प्राप्त होता है।
(१२) एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदा लम्बनं प्रियम्। एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके
महीयते।
कठोपनिषद--१/२/१७
भाव--ब्रह्म ज्ञान के साधनो में इस ॐ का
आलम्बन ही श्रेष्ठ है। यही परम आलम्बन है। इस आलम्बन को जानकर ज्ञातव्य ब्रह्म के बीच महिमा को प्राप्त होता है।
(१३) न जायते म्रियते वा विपश्चिन नायं
कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोअयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे।
कठोपनिषद--१/२/१८
भाव--वह ज्ञान स्वरूप आत्मा न उत्पन्न होता है और न मरता है एवं न किसी से
उत्पन्न हुआ और न इससे कुछ उत्पन्न होता है। अतः यह आत्मा जन्म रहित, नित्य, अविनाशी और अनादि है। इसका शरीर के नाश होने पर नाश नहीं होता।
(१४) अणोरणीयान्महतो महीयानआत्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम । तमक्रतुःपश्यति वीतशोको
धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः।
कठोपनिषद--१/२/२०
भाव--सूक्ष्म से सूक्ष्मतम और महान से महानतम वह परमात्मा देह के भीतर हृदय में छिपा हुआ है। उस ईश्वर की महिमा को,भगवान की कृपा से, विषयों में न फँसने वाले, शोक रहित मनुष्य ही जान सकते हैं।
(१५) नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैषवृणुते तेन लभ्यः तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ।
कठोपनिषद--१/२/२३
भाव--वह परमात्मा उपदेश देने से नहीं मिल सकता, न वह बुद्धि से प्राप्त होता है और न उसे बहुत से शास्त्रोंको पढ़ कर प्राप्त किया जा सकता है, परन्तु जिसको वह स्वीकार कर लेता है, उसी से वह प्राप्त होता है। वह प्रभु उसी पर अपना स्वरूप प्रकाशित करता है।
(१६) आत्मानं रथितं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च।
कठोपनिषद--१/३/३
भाव--यम ने कहा, हे नचिकेता ! तुम इस जीवात्मा को रथ का स्वामी समझो और शरीर को रथ समझो, बुद्धि को सारथि और मन को लगाम की रस्सी समझो।
(१७) इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु
गोचरान्। आत्मेन्द्रिय मनोयुक्तं
भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः।
कठोपनिषद--१/३/४
भाव--इस शरीर के इन्द्रियों को घोड़े समझो, इन्द्रियों के विषयों को घोड़ों के मार्ग समझो। मन और इन्द्रियों से युक्त
आत्मा को विद्वान लोग भोक्ता बताते हैं।
(१८) एष सर्वेषु भूतेषु गूढोआत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्धया
सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।
कठोपनिषद--१/३/१२
भाव--वह सर्वनियन्ता परमात्मा जो समस्त प्राणियों के हृदय में छिपा हुआ है।
मलिन बुद्धि वाले मनुष्यों से वह नहीं जाना जाता। किन्तु तीव्र और सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा सूक्ष्मदर्शी लोग उसे देख सकते हैं।
(१९) उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति।
कठोपनिषद--१/३/१४
भाव--हे मनुष्यो ! उस परमात्मा को जानने के लिए अविद्या की नींद से उठ जाओ। जागो और श्रेष्ठ जनो के सत्संग से ईश्वर को समझो। हे मनुष्यों! यह रास्ता सुगम नहीं है। तत्वदर्शी विद्वान तलवार की तेज धार के समान, लांँघने में कठिन, इस मार्ग को भी दुर्गम बताते हैं।
(२०) अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाअरसं नित्यमगन्धवच्च यत्।
अनाद्यनन्तं महतःपरं ध्रुवं निचाय्य
तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते।
कठोपनिषद-१/३/१५
भाव-- ब्रह्म का कोई विषय नहीं है, वह स्पर्श रहित है, रूप और विकार से भी रहित है। अनादि, अनन्त है। प्रकति से भी सूक्ष्म है, निश्चल है। उसको जानकर मनुष्य मृत्यु के मुख से छूट जाता है और मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
(२१) पराञ्चि खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्त
स्मात्परांपश्यति नान्तरात्मन्। कश्चिद्धीरः
प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्व
मिच्छन्।।
कठोपनिषद--२/१/१
भाव--भगवान् ने इन्द्रियों को विषयों की तरफ जाने वाली बनाया है इसलिए मनुष्य बाहर के विषयों को तो देखता है किन्तु आत्मा को नहीं देख पाता, कोई एक विरला ध्यानी पुरुष ही मोक्ष की इच्छा से अन्तःकरण में रहने वाले परमात्मा को ध्यान द्वारा देखता है।
(२२) यथाआदर्शे तधा आत्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके। यथा अप्सुपरीव ददृशे तथा गन्धर्व लोके छायातपयोरिव
ब्रह्मलोके।
कठोपनिषद--२/३/५
भाव--जैसे स्वच्छ दर्पण में अपना दर्शन होता है, वैसे ही शुद्ध आत्मा में परमात्मा का दर्शन होता है। जैसे स्वप्न में अनेक पदार्थ अपने आप सन्मुख आ जाते हैं, वैसे ही पुण्यमय जन्म में प्रभु के दर्शन होते हैं। जैसे जल के अंदर सब साफ साफ दिखायी देता है, वैसे ही भजन के साथ ध्यान करने से भगवान दिखायी देता है। जैसे धूप और छाया का भेद स्पष्ट मालूम होता है वैसे ही मूर्द्धा के अन्दर
निर्बीज समाधि से पुरुष और प्रकृति का
भेद स्पष्ट दिखायी देने लगता है।
(२३) यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टते तामाहुः परमांगतिम्।
कठोपनिषद--२/३/१०
भाव-- जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ में आत्मा में स्थित हो जाए और बुद्धि भी चेष्टा न करे, उसी अवस्था को समाधि अथवा परमगति जीवन्मुक्त दशा कहते हैं।
(२४) यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येअस्य
हृदिश्रिताः। अथ मर्त्योअमृतो भवत्ययत्र
ब्रह्म समश्रुते।
कठोपनिषद--२/३/१४
भाव--जब मनुष्य के हृदय की समस्त कामनाएँ नष्ट हो जाती हैं। तब यह मरणधर्मा मनुष्य मुक्त हो जाता है और मुक्ति दशा में ब्रह्म को प्राप्त करता है।
(२५) शतं चैका च हृदयस्यनाड्यस्तासां
मूर्धानमभिनिःसृतैका।
तयोअर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वंन्या
उत्क्रमणेभवन्ति।
कठोपनिषद--२/३/१६
भाव--इस शरीर में हृदय के अन्दर एक सौ एक नाड़ियाँ हैं। उनमें से एक सुषुम्ना नाड़ी हृदय से चलकर मस्तक में जाती है।
उस नाड़ी के साथ ब्रह्माण्ड द्वारा जब जीवात्मा शरीर से निकलता है तब वह मुक्ति को प्राप्त करता है। उस नाड़ी के सिवाय अन्य नाड़ियों से जाने वाला जीवात्मा जन्म-मरण के प्रवाह को प्राप्त करता है।
(२६) अंगुष्ठमात्रः पुरुषोन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संंनिविष्टः। त्वं
स्वाच्छरीरात्प्रवहेन्मुञ्जादिवेषीकां
धैर्येण।तं विद्याच्छु क्रममृतं तं विद्याच्छु
क्रममृतमिति।
कठोपनिषद--२/३/१७
भाव-- उक्त प्रकार से हृदय के स्थान में
अंगुष्ठ मात्र रूप में रहने वाला जीवात्मा है। योगी को चाहिए कि प्रयाण काल में धैर्य के साथ उसे अपने शरीर से ऐसे निकाले जैसे सरकंडों की गठरी में से एक सींक खींची जाती है। इस आत्मा को शुद्ध पवित्र और अमृत स्वरूप समझें।
कठोपनिषद की सूक्तियाँ----
(१) न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो।
कठोपनिषद--१/१/२७
भा्व--नचिकेता ने यमराज से कहा, मनुष्य धन से तृप्त नहीं हो सकता।
(२) नायनात्मा प्रवचनेन लभ्योः।
कठेपनिषद--१/२/२३
भाव--परमात्मा उपदेश देने से नहीं मिल सकता ।
(३) न जायते म्रियते वा।
कठोपनिषद--१/२/१८
यह आत्मा न उत्पन्न होता हैऔर न मरता है।
(३ ) न हन्यते हन्यमाने शरीरे।
कठोपनिषद--१/२/१८
भाव-- शरीर के नाश होने पर आत्मा का नाश नहीं होता।
(४) नायं हन्ति न हन्यते।
कठोपनिषद--१/२/१९
गीता--२/१९
भाव-- आत्मा न मारता है , और न मारा है।
(५) अणोरणीयान् महतो महीयान्।
कठोपनिषद--१/२/२०
भाव-- परमात्मा छोटे से छोटा (अणु) है, और बड़े से बड़ा है।
(६) जन्तोर्निहितो गुह्ययाम्।
कठोपनिषद--१/२/२०
भाव-- परमात्मा मनुष्य के हृदय में स्थित है।
(७) पुरुषान्न परं किंचित्सा।
कठोपनिषद-- १/३/११
भाव---परमात्मा से परे कुछ भी नहीं।
(८) धीरो न शोचति।
कठोपनिषद-- २/१/४
भाव--धीर पुरुष कभी शोक नहीं करते।
(९) मनसैवेदमाप्तव्यम्।
कठोपनिषद--२/१/११
भाव-- परमात्मा को मन (सूक्ष्म बुद्धि) से जाना जा सकता है।
(११) पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः।
कठोपनिषद--२/२/१
भाव--अंतःकरणवाले अजन्मा आत्मा का यह शरीर ग्यारह द्वारों वाला है।
दो आँख, दो कान, दो नाक, एक मुख, एक गुदा, एक मुत्रेन्द्रिय, दो अन्तःकरण वाले द्वार--पहला--ब्रह्म रन्ध्र अथवा सहस्रार चक्र(प्राण यहीं से निकलता है) , दूसरा-मन(विचारों के आने -जाने का मार्ग)
(१२) योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः।
कठेपनिषद--२/२/७
भाव--कुछ मनुष्य शरीर धारण करने के लिए विभिन्न योनियों में जाते हैं।
(१३) न लिप्यते क दुखेन वाह्यः।
कठोपनिषद--२/२/११
भाव--वह बाहर सब जगह व्याप्य है फिर भी संसार के दोषों में भी लिप्त नहीं होता।
(१४) तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।
कठोपनिषद--२/२/१५
भाव--जो कुछ भी संसार में भासित है , सब उसी की (परमात्मा की) आभा से भासित है।
(१५) ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते।
कठोपनिषद--२/३/४
भाव--मुक्त न होने पर कल्प कल्पान्तरों तक इस जन्म-मरणशील संसार में विभिन्न योनियों में जन्म लेना पड़ता है।
निष्कर्ष--कठ उपनिषद हमें सिखाता है कि सच्ची विद्या आत्मज्ञान है। नश्वर सुखों की तुलना में मोक्ष की साधना अधिक महत्वपूर्ण है और मृत्यु का भय केवल अज्ञान का परिणाम है। नचिकेता का धैर्य, जिज्ञासा और सत्य की खोज सभी के लिए प्रेणादायक है।
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