(२) मायाधीन होने के कारण प्रमाद का दोष सदैव मनुष्य में बना रहता है---
मायाधीन होने के कारण मनुष्य में प्रमाद का दोष सदैव बना रहता है--
मनुष्य मायाधीन है, इसलिए माया मनुष्य को सत्य की राह पर चलने नहीं देती है। माया ने मनुष्य की ज्ञान इन्द्रियों की संतुष्टि के लिए नाना प्रकार की वस्तुएँ इस संसार में उपलब्ध करा रखी हैं, जिसके कारण मनुष्य प्रमादी हो गया है। मनुष्य ने केवल एक ध्येय बना रखा है कि धन कमाओ और इस धन से मनचाही वस्तुओं को खरीदकर इन्द्रियों को सन्तुष्ट करो। हम कौन हैं ? इस संसार में क्यों आए हैं ? ईश्वर क्या है ?इन प्रश्नों पर विचार करने से मनुष्य घबड़ाता है ? बिना मन से वह भगवान की एक मूर्ति खरीदकर लाता है और नित्य अगरबत्ती जलाकर लोगों से क़हता है, मैं नित्य पूजा करता हूँ ? कष्ट आता है तो पूजा- पाठ करने वालों को धन देकर पूजन करा देता है। अधिक धन हुआ तो मन्दिर बनवाकर लोगों से सम्मान पाता है। ईश्वर विषयक प्रश्नों पर विचार हेतु वह सोचता है कि कल इस पर विचार करेंगे। कल उसका कभी नहीं आता है। वह जवान होता है, बूढ़ा हो जाता है,परन्तु सांसारिक विषयों से सन्तुष्ट नहीं हो पाता है और मर जाता है। मनुष्य कल के प्रति असावधान रहता है। लापरवाह रहता है। उदासीन रहता है। सुख सुविधा भोगी हो जाता है। इस तरह का प्रमाद कम-ज्यादा हर मनुष्य मैं होता है। प्रस्तुत है एक किस्सा-- नवाब(राजा) वाजिद अली शाह के बारे में एक कहावत मशहूर है। बहुत नवाब मत बनो।अमाँ यार नवाबि नयत ना झाड़ो। दरअसल, यह कहावत एक किस्से से जुड़ी है। कहा जाता है 1857 की गदर के समय जब अंग्रेजों ने अवध पर कब्जे के लिए लखनऊ के महल पर हमला किया तो फौज की डर से सब सेवादार भाग गए बेगमें भी इधर- उधर छिप गयीं। नवाब वाजिद अली शाह को गिरफ्तार कर लिया गया। आपसे अंग्रेजी फौज के सरदार ने पूछा, सारा महल खाली हो गया। सब भग गए। आप नहीं भागे।
आपने जवाब दिया, कोई जूती पहनाने वाला नहीं था, फिर मैं बिना जूती के कैसे भागता ? बैठा रह गया। आपको कलकत्ता के मटियाबुर्ज के कारावास में डाल दिया गया। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य अपनी ऐशोआराम (प्रमाद) की ज़िंदगी में इतना मस्त रहता है कि उसे जीवन भर और कुछ दिखता ही नहीं। फिर इन प्रमादी लोगों के पास ईश्वर की तरफ मुड़ने का, ईश्वर के बारे में विचार करने का समय कहाँ ?
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