(४) कर्णापाटव-; मायाधीन होने के कारण मनुष्य में कर्णापाटव का दोष सदैव विद्यमान रहता है--
(४) कर्णापाटव--भ्रम, प्रमाद और विप्रलिप्सा के साथ-साथ कर्णापाटव का दोष हर मनुष्य में सदैव विद्यमान रहता है। कर्णापाटव दोष के कारण अनुभवहीन होने पर भी मनुष्य अपने को समाज में अनुभवी बताता है। मानव जो नहीं है, उसे समाज को बताने का यत्न करता है। प्रायः समाज में यह कहते हुए लोग मिल जाते हैं कि मेरा अनुभव यह कहता है, मेरा अनुभव वह कहता है, जबकि उनका अनुभव कुछ भी नहीं कहता है। बहुत से बनावटी संत चमत्कार के सहारे सीधे-साधे लोगों को ईश्वर तक पहुँचाने की गारण्टी ले रहे हैं।
स्वयं तो ईश्वर को जाना-पहचाना नहीं फिर भी लोगों को ईश्वर तक पहुँचा रहे हैं यह है कर्णापाटव। इसी कर्णापाटव के कारण अनेकानेक धर्म मानव को दिखायी देते हैं और मानव जीवन भर यह तय नहीं कर पाता है कि वह ईश्वर प्राप्ति के लिए किस मार्ग पर चले।
-------+------+---------+--------+-------
Comments
Post a Comment