(३) मनुष्य में विप्रलिप्सा का दोष सदैव विद्यमान रहता है --
(३) मनुष्य में भ्रम और प्रमाद के साथ-साथ विप्रलिप्सा का दोष भी सदैव विद्यमान रहता है। विप्रलिप्सा हर चीज़ में हस्तक्षेप करने की प्रवृत्ति है। विप्रलिप्सा झूठा अहंकार है। विप्रलिप्सा ऊँची आवाज़ में बोलकर अपनी कमी को छुपा लेने की प्रवृत्ति को कहते हैं। मानव इस बात को जानते हुए भी कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग केवल समर्पण का मार्ग है, इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है, फिर भी वह समाज में अपने को आध्यात्मिक अगुआ व्यक्त करने के लिए अलग अपने मार्ग का सृजन करता है। यह है विप्रलिप्सा। मायाधीन मानव विप्रलिप्सा दोष में लिप्त रहने के कारण वह जीवन भर वह करता रहता है, जो उसे नहीं करना चाहिए और वह नहीं कर पाता है जो उसे करना चाहिए। हर बात में अपना हस्तक्षेप करके इस दोष के कारण मानव बनावटी सच को गढ़ता रहता है। कोई बात चली तो बोल पड़े, कुछ आए या न आए। चुप रहना तो ऐसे मनुष्य जानते ही नहीं है।
हर बात में दखल, हर क्षेत्र में दखल।
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