(१) मायाधीन होने के कारण मनुष्य में भ्रम का दोष सदैव विद्यमान रहता है----

मायाधीन होने कारण मनुष्य में भ्रम का दोष सदैव विद्यमान रहता है--मनुष्य दो प्रकार के होते हैं-(१) मायातीत मनुष्य
(२) मायाधीन मनुष्य। मायातीत मनुष्य वह है जिसने ईश्वर ‌को पा लिया है, माया इनको छू नहीं सकती है। मायाधीन मनुष्य वह है जिसने ईश्वर की निकटता अभी नहीं प्राप्त की है, माया के आवरण से  वह सदैव घिरा रहता है इसके अतिरिक्त ईश्वर है, जिसे मायाधीश कहते हैं। मायाधीन होने के कारण मनुष्य में भ्रम का दोष सदैव विद्यमान रहता है--मनुष्य मायाधीन है इसलिए मति विपर्यय होता रहता है। वह कभी-कभी रस्सी को साँप समझ लेता है। पीतल को सोना समझ लेता है । सच्चे को झूठा समझ लेता है और झूठे को सच्चा। मति विपर्यय की इस‌ स्थिति से कोई भी मायाधीन मनुष्व बच नहीं पाया है। इसे भ्रम कहते हैं। हम बूढ़े हो गए हैं, मगर हम आज तक न इस संसार को समझ सके और न इस संसार में बसने वाले मनुष्य के। यह केवल हमारी स्थिति है, ऐसा नहीं है। भ्रम से कोई मनुष्य छोटा नहीं है। भ्रम केवल मनुष्य में  ही नहीं इससे देवी देवता कोई नहीं बच सका है, यहाँ तक कि ब्रह्मा भी। बात द्वापर की है। भगवान कृष्ण अवतार ले चुके हैं। ब्रज में गोपों के संग  बछड़ों को चराने हेतु गए हुए हैं। मध्याह्न में सभी एक साथ बैठककर भोजन कर हैं। जूठा चावल और माखन हाथ में लेकर भगवान कृष्ण के मुख गोप डाल रहे हैं। ब्रह्मा उधर से निकलते हैं, यह दृश्य देखकर उन्हें कृष्ण को अवतारी न होने का भ्रम हो जाता है। समस्त बछड़ों और गोपों को ब्रह्मलोक लेकर चले जाते हैं। कृष्ण अपने को अकेला देखकर ब्रह्मा के करतूत को समझा। स्वयं गोप और बछड़ा बन गए और पहले जैसे ही लीला में फिर लग गए। इस भेद को गोपों ने नहीं जाना। घर लौटे तो उनकी माताओं ने नहीं जाना। बछड़ों की माँओं ने भी नहीं जाना। सब कुछ पहले जैसा ही चलता रहा। वर्ष भर बाद ब्रह्मा
ब्रज मण्डल में फिर आए। देखा सबकुछ सामान्य था। बछड़े चर रहे थे। गोपों के साथ भगवान कृष्ण खेल रहे थे। ब्रह्मा का भ्रम टूट चुका था। भगवान की प्रार्थना में लग गए। अपनी गलती के लिए बार-बार क्षमा माँग रहे थे और कह रहे थे भगवान् ! आपको मेरे कारण गउओं के बछड़े और गोप बनने पड़े। भगवन् ! मैं गोपों को और उनके बछड़ों को अपने साथ लाया हूँ। आप अपने लीला को समेटिए और इनको ग्रहण कीजिए। भगवान् कृष्ण ने ब्रह्मा को क्षमा कर दिया। इसका निष्कर्ष यह है कि भ्रम की स्थिति कम- ज़्यादा सबमें होती है। इसी भ्रम के कारण मैं देह हूँ ऐसा मानव अपने को सदा से समझता आया  है जबकि वह देह नहीं है बल्कि वह आत्मा है। जिस दिन मनुष्य इस सच्चाई को समझ लेता है, माया उससे दूर हट जाती है और ईश्वरीय मार्ग उसे स्पष्ट दिखाई पड़ने लगता है।
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