ईश्वर का निरन्तर‌ चिन्तन करने से ईश्वर की प्राप्ति सम्भव-है------

ईश्वर का निरन्तर चिन्तन करने से ईश्वर की प्राप्ति सम्भव है------
सांसारिक विषयों का अनवरत चिन्तन करने से व्यक्ति अपना प्राण भी गवाँ देता है। यदि व्यक्ति की यही आसक्ति, यही चिन्तन  ईश्वर से हो जाए तो ईश्वर की प्राप्ति  सम्भव है। व्यक्ति के सम्मुख संसार है और संसार का आकर्षण व्यक्ति को अपनी गोद में सदैव लिए रहता है, वह ईश्वर के बारे में सोचने का कभी अवसर ही नहीं देता है। व्यक्ति सोचता है आज नहीं कल ईश्वर के बारे में  सोचेंगे, विचार करेंगे। व्यक्ति रोज़ कल पर ईश्वरीय विषय को टालता रहता है और वह कल उस व्यक्ति के जीवन में कभी नहीं आता है। व्यक्ति बूढ़ा होकर मर भी जाता है और कई- कई जन्म उसके बीत जाते हैं परन्तु उसके द्वारा निर्धारित किया गया कल कभी नहीं आ पाता है।
परमात्मा साक्षी भाव से जीव के हृदय में बैठा हुआ जीव को निरन्तर देखता रहता है कि कब वह संसार से विमुख होकर मेरी ओर मुख करे और मैं उसे इस संसार के आवागमन के दुखों से मुक्त करूँ। इस विषय में एक  कथा आती है उसका उल्लेख यहाँ करना आवश्यक है। एक व्यक्ति ने एक सिद्ध पुरुष को गुरू बनाया। गुरू ने पूछा, तुम क्या चाहते हो ? उसने उत्तर दिया, हम इस संसार को छोड़कर ईश्वरीय आराधन करना चाहते हैं। गुरू ने कहा, छोड़ो इस संसार को, चलो हमारे साथ। उसने कहा, गुरू जी अभी नहीं। बच्चे थोड़ा बड़े हो जाएँ, इनकी शादी-विवाह कर दें, फिर आपके साथ चलते हैं। गुरू जी चले गए। बहुत साल बाद गुरू जी आए और कहा, अब बेटा चलो हमारे साथ। उसने गुरू से कहा, चलूँगा अवश्य चलूँगा। बच्चों की शादी-विवाह हो गया है, मेरी इच्छा कहती है, थोड़े दिन और यहाँ रुककर नाती और पोतों का भी आनन्द ले लें, फिर आपके साथ चलेंगे। गुरू जी चले गए। बहुत दिन गुज़र गए। गुरू जी फिर आए। गुरू जी ने एक युवा से पूछा, एक यहाँ फलाँ नाम का व्यक्ति रहता था,  वह कहाँ चला गया ? उस युवा ने उत्तर दिया,  वह मेरे पिता जी थे। कई वर्ष पहले मर गए। गुरू जी ने ध्यान लगाकर देखा, तो वह बैल बनकर नाँदा में भूसा खा रहा था। गुरू जी ने कहा, बेटा ! अब तो चलो ! उसने उत्तर दिया, मेरे बच्चों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, इसलिए मैं सुबह ही बैलगाड़ी में नध जाता हूँ और दिन भर बोझा ढोकर बच्चों को पैसा कमाने में मदद करता हूँ।
कुछ समय बाद आइएगा फिर चलेंगे।
गुरू जी चले गए। कई वर्ष बाद गुरू फिर आए और घर के मालिक से पूछा, आपके यहाँ एक बलिष्ठ बैल था, वह नहीं दिखता है। मालिक ने उत्तर दिया, हाँ महाराज ! वह बड़ा परिश्रमी था। बिना खाए- पिए दिन भर बैलगाड़ी में जुता रहता था। उसकी वजह से मैने बहुत धन कराया। वह मर गया। गुरु जी ने फिर ध्यान करके देखा, वह कुत्ता बना बैठा था। गुरू जी ने कहा, अरे शिष्य अब तो चलो। उसने कहा महाराज अभी नहीं। चोर रात में आते रहते हैं। बहुत श्रम से धन कमाया है। मैं रात में चोरों के आने पर भोंकता हूँ, जिससे परिवार जग जाता है और चोर धन नहीं ले जा पाते हैं। गुरू जी चले गए। एक बार फिर आए और घर के मालिक से पूछा, आपके घर में एक कुत्ता था, जो अब नहीं दिखता है। मालिक ने उत्तर दिया, हाँ महाराज ! वह कुत्ता बहुत वफादार था, गाँव में चोरों को नहीं आने देता था। वह मर गया। गुरू जी ने ध्यान लगाकर देखा ! तो वह उस घर में साँप बना बैठा था जिसमें धन गड़ा था। वह कुण्डली मारकर उस धन की रखवाली करता था। गुरू जी ने मालिक से कहा, आपके घर में साँप है, क्या आपने उसे भी पाल रखा है ? घर वाले लाठी लेकर घर में घुसे और उस साँप को मार कर फेंक दिया। साँप चिल्लाया अरे गुरूजी ! मुझे भी लेते चलो। गुरू जी ने कहा, बेटा समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता है। अब बेटा, तुम्हें मैं कैसे लेकर चल सकता हूँ ? अब तो मेरे स्वयं के जाने का समय आ चुका है। इस कथा को यहाँ प्रस्तुत करने का केवल आशय यही है कि कितना कठिन है इस संसार को छोड़कर ईश्वरीय चिन्तन करना ? 
----------+---------+---------+----------+---

Comments

Popular posts from this blog

उपनिषद की‌ सूक्तियाँ--

ऋगुवेद सूक्ति--(56) की व्याख्या

(2) Second Guru Angad Dev Ji Maharaj-- When Emperor Humayun pulled out his sword and try to attack on the neck of Guru Angad Dev Ji, his hand was paralyzed--Read more--