किसी भी विषय का अत्याधिक चिन्तन व्यक्ति का प्राण हरण कर लेता है।-------
किसी भी विषय का अत्याधिक चिन्तन व्यक्ति का प्राण हरण कर लेता है-----
अहल्या बहुत सुन्दर थीं। गौतम ऋषि की पत्नी थीं। सती साध्वी थीं। इन्द्र
ने देखा तो आकर्षित हो गए और अहल्या से संसर्ग के लिए चिन्तन करने लगे। लगातार चिन्तन करने से मन कुछ भी करने के लिए तैयार हो गया। उन्हें अहल्या मिलनी चाहिए, चाहे जो हो। उनकी आँख केवल अहल्या को देखना चाहती थी। उनके कान केवल अहल्या के बारे में ही सुनना चाहता था। उनकी नाक केवल अहल्या के मद को सूँघना चाहती थी। उनकी जिह्वा केवल अहल्या के रस को ही पान करना चाहती थी। उनकी त्वचा केवल अहल्या के आलिंगन को ही व्याकुल थी। इस तरह देवराज इन्द्र की सम्पूर्ण इन्द्रियाँ अहल्या को पाने के लिए व्याकुल थीं। हर पल अहल्या का ही चिन्तन चलने लगा। सामान्य व्यक्ति इस स्थित को नहीं सम्हाल पाता है और अपने प्राण गँवा देता है। इन्द्र देवता थे। वह सक्षम थे। फिर भी वह अपने को नहीं सम्हाल
पाए थे। उन्होंने गौतम ऋषि की अनुपस्थिति में गौतम ऋषि का रूप रखकर अहल्या के सतीत्व को भंग कर दिया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। अहल्या मूक बनी रही, अपने पति और अपने पति के प्रति मूर्ति में अन्तर नहीं समझ सकी, पत्थर बना दी गयी। इन्द्र को योनि पसन्द थी इसलिए उनके अपने ही शरीर पर हज़ार योनियाँ हो जाने का शाप दे दिया गया। विषय कोई भी हो--
काम हो, क्रोध हो, लोभ हो, मोह हो अहंकार हो, ईर्ष्या हो इनमें से किसी भी विषय के प्रति आसक्ति हो जाने से जब
व्यक्ति लगातार चिन्तन करने लग जाता है तब व्यक्ति के मरने पर ही वह चिन्तन समाप्त होता है।
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