जीव का चौरासी लाख योनियों में भ्रमण

चौरासी लाख योनियों में जीव का भ्रमण
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जब कभी आध्यात्मिक प्रश्नो का उत्त्तर
खोजना होता है तो हम वेदों का सहारा लेते हैं। 
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्ष परिषस्यवजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तयनश्नन्यो अभिचाकशीति।
        ------ऋगुवेद --1/164/20
दो सुन्दर पक्षी एक वृक्ष पर मित्रवत एक साथ चिपके हुए बैठे हैं, एक वृक्ष के फलों को खाता है दूसरा साक्षी होकर देखता रहता है। इसका भाव यह है कि जीव और परमात्मा दोनों एक साथ चिपके हुए मित्रवत हृदय स्थल में विद्यमान रहते हैं। जीव संसार के भोगों को भोगता रहता है और परमात्मा साक्षी भाव से उसको भोगता हुआ‌ देखता रहता है। इस जीव और परमात्मा का साथ आदिकाल से है और अनन्त काल तक रहने वाला है।परमात्मा जीव के साथ चौरासी लाख योनियों में सदा से भ्रमण करता आया है। हम यहाँ मानव योनि का उदाहरण लेते हैं। मानव का शरीर जड़ है। आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा भी जड़ हैं। यह संसार भी जड़ है। संसार की सभी वस्तुएँ भी जड़ हैं। जीव और शरीर के मध्य एक तत्व मन है। यही मन ज्ञान इंद्रियों- आँख, कान, नाक, जीभ और त्वचा के माध्यम से संसार के सुखों का अनुभव जीव को कराता रहता है और संसार के दुखों का भी अनुभव जीव को  कराता रहता है। इस संसार के भोगों में सुख- दुख को भोगता हुआ यह जीव शरीर को  शैशव काल से बुढ़ापा तक पहुँचा देता है, परंतु भोगों से संतुष्ट नहीं हो पाता है और आखिर में जब इस शरीर की इंद्रियाँ जीव को सुख का अनुभव कराने में असमर्थ हो जाती हैं तब जीव इस शरीर को छोड़ देता है और अपनी अतृप्त भोग को भोगने की चाहत में किसी अन्य योनि के शरीर को धारण कर लेता है। जीव सुख अथवा आनन्द की चाहत में आदि काल से विभिन्न शरीरों को धारण करता हुआ चौरासी लाख योनियो में भ्रमण करता रहता है। इस जीव का आवागमन तभी रुक सकता है जब पास बैठे हुए परमात्मा को जान लेता है, पहचान लेता है, समझ लेता है और संसार से विपरीत दिशा में घूमकर ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है।

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