-----प्राणायाम से विकारों से मुक्ति----
प्राणायाम से विकारों से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है-
कुरंगमातंगपतंगभृंगमीनाहतःपञ्चभिरेव पञ्च। एकः प्रमादी कथं न हन्याद् यःसेवते पञ्चभिरेवपञ्च।--विष्णु पुराण
भावार्थ--हरिण शब्द से, हाथी स्पर्श से,पतंगा रूप से,भँवरा रस से और मछली गन्ध से आसक्त होकर विनाश को प्राप्त होते हैं, फिर प्रमादी पुरुष इन पाँचों विषयों को अपनी पाँचो ज्ञान इन्द्रियों से भोगता है और विनाश को प्राप्त होता है। मनु भगवान का कथन है- 'इन्द्रियाणां प्रसंगेन दोषमृछत्य संशयम्।' इसका भाव यह है कि इन्द्रियों को विषयों में फँसने से दोष आ जाता है आगे मनु भगवान ने मनु स्मृति में लिखा है--दह्यन्ते ध्यायमानानां धातूनां हि यथा मलाः। तथेन्द्रियाणाँ दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्।---मनु: 6/71
भावार्थ--जैसे अग्नि में तपाए हुए धातुओं के मल नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही प्राणायाम करने से इन्द्रियों के दोष दूर हो जाते हैं।'ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्।'
(योग दर्शन सूत्र:2/52)
भावार्थ--उससे (प्राणायाम से) उसके विकार(काम, क्रोध, मोह और लोभ आदि के) नष्ट हो जाने से पुरुष को प्रज्ञा का प्रकाश प्राप्त हो जाता है। योगदर्शन के उपर्युक्त सूत्र पर भगवान् वेदव्यास जी ने भाष्य किया है--'ततो न परं प्राणायामात् , ततो विशुद्धिर्मलानां दीप्तिश्चि ज्ञानस्य।' अर्थात् प्राणायाम से बढ़कर दूसरा तप नहीं है क्योंकि इससे सारे मल (विकार) गल जाते हैं और ज्ञान का प्रकाश होता है।
-------+++-----+++---+++++--
Comments
Post a Comment