आत्मीय सुख प्राप्त करने के लिए हमें परमात्मा की शरण में जाना होगा।

हमें इस बात की पूर्ण जानकारी है कि यदि हमें मिठाई खरीदनी है तो हमें मिठाई की दुकान पर जाना होगा, हम मिठाई खरीदने चप्पल-जूते की दुकान पर नहीं जाते हैं और यदि हमें आभूषण खरीदना है तो हम आभूषण वाली दुकान पर जाते हैं, लोहे वाली दुकान पर नहीं जाते हैं मगर इतना जानने के बाद भी न जाने क्यों हम आत्मीय सुख अर्थात् सच्चा सुख प्राप्त करने के लिए इस संसार में भटकते रहते हैं। यह संसार दुखमय है। सभी रिश्ते माँ, बाप, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन सब एक दूसरे को दुख ही पहुँचाते हैं फिर हम यह क्यों नहीं जान पाते हैं ? कि यदि हमें इस‌ संसार के जाल-जंजाल से निकलना है अथवा आत्मा का सुख प्राप्त करना है तो हमें परमात्मा की शरण में जाना होगा।

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