-----------जैन धर्म में अहिंसा-------------
जैन धर्म में अहिंसा-- अहिंसा जैन धर्म का प्राण है। पूर्ण अहिंसक व्यक्ति को परब्रह्म (परमात्मा) की संज्ञा दी गयी है।
' अहिंसा भूतानां जगत् विदितं ब्रह्म परमम्।'जैन धर्म के अनुसार किसी के प्राणों का घात करना तो हिंसा है ही परन्तु मन में किसी के घात का विचार लाना भी हिंसा है। महाकवि पुष्पदन्त ने 'जसहर चरिउ' में' महाराज यशोधर द्वारा जीवित कुक्कुट के स्थान पर आटे का कुक्कुट बनाकर बलि देने के कारण मरणोपरान्त उन्हें नरक यातना प्राप्त हुयी, ऐसा चित्रण किया है। ' कारिम कुक्कुडेन णिहरण वितुहुं भमिओसि दुब्भवो।'
-----जसहर चरिउ. 4/18/1
इस तरह जैन धर्म में हिंसा के दो भेद हैं--(1) भाव हिंसा (2) द्रव्य हिंसा
.जैन धर्म के अनुसार प्रत्येक श्रावक तथा गृहस्थ के लिए अणुव्रत अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह का जो विधान है, उसमें अहिंसा सर्वप्रथम है। हिंसा न हो इसके लिए जैन मुनि केश नहीं कटवाते बल्कि उसका लुंचन करते हैं। निशा भोजन तो मुनि, श्रावक दोनों के लिए वर्जित है। प्राणि बध वस्तुतः आत्म बध के समान है।' पाणिवहु भडारिए अप्पवहु।'
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